"चल खुसरो घर आपने…"
आज दो दिन हो गए दीदी का फोन नहीं आया था।दीदी मतलब पूजा दीदी,सोनल की ननद और सौरभ की बहन… सोनल पूजा दीदी के फोन आने का शिद्दत से इंतजार कर रही थी। ऐसा नहीं था कि ननद-भाभी में बहुत अच्छे रिश्ते थे उनके रिश्ते वैसे ही थे जैसे आज के युग में ननद-भाभी के होते हैं।महीनों दो महीने में बात हो जाती थी फिर अब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त और मस्त…पूजा दीदी के फोन के इंतजार के पीछे वजह कुछ ख़ास थी। पूजा दीदी के दो बेटे थे देखने में लंबे-चौड़े और दिमाग़ से होनहार… बड़ा बेटा विदेश में एक कंपनी में नौकरी करता था और अपनी पत्नी के साथ वहीं बस गया था। मियां-बीबी दोनों कमाते थे।कुल मिलाकर माँ लक्ष्मी की पूरी कृपा थी। जीजा जी की तबियत इन दिनों कुछ ठीक नहीं रहती थी वो अपने छोटे बेटे अंकुर की शादी कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहते थे। अखबार, समाज और ऑनलाइन ऐप तक लड़की की खोज जारी थी पर बात बन नहीं रही थी।लड़की पसंद आती तो परिवार नहीं,परिवार पसंद आता तो लड़की नहीं…
सोनल ने पापा जी मतलब ससुर जी अक्सर कहते,”ज्यादा छाना-बिनी करोगे तो ढूंढते ही रह जाओगे।सबको सब मिल जाए जरूरी तो नहीं और हाँ एक बात और… हमें लड़की लानी है देनी नहीं है जो परिवार ठीक-ठाक ढूंढ रहे हो।”
सोनल आश्चर्य से पापा जी का मुँह देखती रह जाती।नए रिश्तों के जुड़ने में परिवार का कोई महत्व नहीं!लड़के को लड़की मिल जाएगी लड़की को लड़का पर परिवार को एक अच्छा परिवार नहीं मिलना चाहिए जो उनके सुख-दुख में खड़े हो सके जिनका आप समाज में परिचय करा सकें,क्या ये जरूरी नहीं!सोनल को इस तरह से परेशान देख सौरभ हंसकर कहते,
”तुम क्यों इतना सर खपाती हो जिसकी शादी जब होनी होगी हो ही जाएगी।वैसे भी जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती है। हम तुम तो सिर्फ माध्यम है”।
सोनल सौरभ के इस तरह के प्रवचन को सुन खीझ जाती। उसका शिक्षित मन ऐसी बातों के लिए कभी तैयार नहीं होता। वह अक्सर सोचती सौरभ जैसे लोग बात आगे ना बढ़े इसलिए इस तरह के फंडे अपना लेते हैं। कुल मिलाकर पूजा दीदी के बेटे अंकुर के लिए जोर-शोर से लड़की की खोजाई हो रही थी।
पापा जी से पता चला था एक फोटो आई है। अंकुर को फोटो से लड़की ठीक लग रही है। अंकुर उसे देखने जाने वाला है। लड़का-लड़की पहले मिल ले अगर उन दोनों को वे दोनों पसंद आ जाते हैं तो परिवार मिल लेगा… वैसे भी लड़की को लड़का और लड़के को लड़की पसंद आना जरूरी है ।परिवार को तो बस औपचारिकता के लिए हाँ कहकर रिश्तें पर मुहर लगानी है।
सोनल ने चिढ़कर कहा था,
”आज के युग में बच्चों को परिवार की जरूरत मुहर के लिए नहीं शादी के खर्चों को वहन करने की है।”
सोनल को ये बात पच नहीं रही थी।आखिर जमाना कितना बदल गया है!यादों की बेल फिर से हरी हो गई थी। उसकी शादी के वक्त पापा ने पास-पड़ोस के लोगों से ससुराल वालों के बारे में कितना पता लगाया था। हर तरफ से आश्वत होने के बाद वह सोनल को दिखाने को तैयार हुए थे। परिवार के देखने के बाद सौरभ और सोनल को बगल के कमरे में बात करने के लिए छोड़ा गया था।ससुर जी ने हँसते हुए कहा था।
“भाईसाहब! जिंदगी तो इन्हें काटनी है इन्हें एक-दूसरे को समझ लेने दीजिए।कल को ये न हो कि बच्चे कहे कि हमें तो एक-दूसरे को समझने का मौका भी नहीं दिया।”
पाच मिनट की मुलाकात में जीवन भर का साथ निभाने का फैसला!पाँच मिनट तो छत ताॅंकते,गला खाखरते और एक-दूसरे के नाम पूछने में ही बीत गए थे। बाकी सवाल उम्र भर सवाल बनकर ही रह गए।दिल से जबान तक का सफर तय करने का उन्हें मौका ही कब दिया गया बुआ जी ने कहा था
“सारी उम्र पड़ी है पूछते रहने एक-दूसरे के बारे में…”
सोनल और सौरभ की आँखें मिली वो समझ गए थे उनकी हाँ या न का कोई मतलब नहीं था।परिवार इस रिश्ते के लिए तैयार था। परिवार की खुशी में उन्होंने अपनी खुशी ढूंढ ली थी। हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा यह तय करने वाले हमसे बड़े थे, दुनिया देखी थी उन्होंने… उनके निर्णय गलत कहाँ हो सकते थे! पर क्या सचमुच…?
सोनल के लिए इससे पहले भी एक रिश्ता आया था सुना था लड़के को तो सोनल पसंद थी पर उसकी मा को सोनल के आगे के दो टेढ़े दात पसंद नहीं थे।पान के पत्ते की तरह लड़के की माँ ने उसके रिश्ते को फेर दिया था। सोनल कसमसा कर रह गई थी। उस समय एक-दूसरे से फोन पर बात करने की भी मनाही थी मिलना तो बहुत दूर की बात थी।
”ज्यादा बात करने से बात बिगड़ने की भी संभावना रहती है।”
मम्मी के अपने ही फंडे थे या यूॅं कहिए उस दौर में लोगों की सोच ही यही थी पर वक्त ऐसी करवट लेगा किसी ने सोचा भी नहीं होगा।
पापा जी कुछ बता नहीं रहे थे और सोनल की उनसे पूछने की हिम्मत नहीं थी फिर…क्या सौरभ से पूछे!
“तुम औरतों का समझ नहीं आता, अरे तय होएगी तो खुद ही पता चल जाएगा। वैसे तो दीदी को फोन करने में तुम्हारी नानी मरती है तुम्हारी बहन है तुम करो। अब काहे की इतनी छटपटाहट…!”
सौरभ ने ग़लत तो नहीं कहा था पर ये मन, इस मन को कैसे समझाए।सोनम को सौरभ पर बहुत गुस्सा आ रहा था सोनम की छटपटाहट देख सौरभ ने पूजा दीदी को फोन को मिला दिया। सौरभ के चेहरे पर भाव तेज़ी से आ और जा रहे थे।बात कुछ गम्भीर ही थी। सोनम कुछ-कुछ समझ रही थी पर वह सारी बात सिल-सिलेवार ढंग से सुनना और समझना चाहती थी पर सौरभ…सौरभ टी वी ऑन कर बैठ गए।सोनम बेचैनी से कमरे में चहलकदमी कर रही थी।
“क्या कहा दीदी ने!”
“रिश्ता शायद ही हो।”
सौरभ ने बड़े ही ठंडे स्वर में कहा
“क्यों?”
सोनम की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गई।
“अंकुर को लड़की पसंद नहीं आई!”
सौरभ टी वी पर ही आँखें गड़ाए बैठे हुए थे।सोनम ने सौरभ के हाथ से रिमोट छीन लिया और टी वी का स्विच ऑफ कर दिया।
“साफ-साफ बताइए ना…”
सोनम ने बेचैनी से कहा
“लड़की को शायद अंकुर पसंद न आए।”
सौरभ के शब्दों में तंज था।सोनम की आँखें फटी रह गई। ये बात उसके गले से उतर नहीं रही थी। अंकुर जैसे लड़के को भी कोई लड़की रिजेक्ट कर सकती है।
“क्यों?”
“होना क्या था,चले थे हरिश्चंद बनने। अब भुगतों,लड़की है उससे उसी के हिसाब की बात करनी चाहिए थी न…”
“मतलब!”
सोनम की आँखों में प्रश्न उग आए थे।
“महाशय कह कर आए हैं कि वह जॉइंट फैमिली में रहते हैं।”
“इसमें ग़लत क्या है, सच ही तो कहा है!”
सोनम समझ नहीं पा रही थी कि सौरभ आखिर कहना क्या चाहते हैं।
“क्या जरूरत थी उसे यह कहने की कि उसकी जॉइंट फैमिली है।बारह लोग साथ रहते हैं।”
“तो क्या नहीं हैं!”
सौरभ तिलमिला गए।
“कौन समझाए तुमको…अरे ये आजकल की लड़कियाँ हैं।ये अपने सास-ससुर को तो बर्दाश्त नहीं कर सकतीं।तईया ससुर और चचिया ससुर के परिवार को कैसे बर्दाश्त करेंगी।वैसे भी चूल्हे तो अलग ही हैं।”
“पर काम-धंधा तो एक ही है।सौरभ कल को वो लड़की घर में आएगी तो घर के किस कोने में इन रिश्तों को छुपाएंगे!”
“घर में रहते-रहते खुद ही समझ में आ जाता पर हमारे बुद्धिमान भांजे को कौन समझाए।सब लीप-पोत के चले आए हैं।”
सोनम ने कुर्सी खींची और सौरभ के बगल में बैठ गई।
“सौरभ झूठ बोलने से क्या फायदा…जो है सब सच है, सामने है।कल को शादी होगी तो उसे दिखाई नहीं देगा कि घर में कौन-कौन रहता है।”
“काहे का परिवार मौके-मौके पर पूछ लिया, वैसे भी उन सबको हाथ झुलाते आना है और जाना है।”
“कुछ भी हो दीदी भी तो हमेशा कहती हैं कि मेरे बच्चे तो यहाँ रहते नहीं हैं। जेठानी-देवरानी के बच्चों का ही सहारा है। मौके-मौके पर वही खड़े होते हैं। बीमारी से लेकर है बाजार-हाट तक वही लेकर जाते हैं फिर आखिर अंकुर उनके वजूद को कैसे इंकार कर दे कि उनसे कोई रिश्ता नहीं है।आखिर उसकी आत्मा पर भी बोझ है।”
“कैसा बोझ?”
“अपने माँ-बाप के साथ ना रहने का बोझ और उनके लिए कुछ भी न करने का बोझ…”
सौरभ ने सोनम को घूर कर देखा जैसे पूछना चाहते हो,
”क्या सचमुच आज की पीढ़ी की आत्मा पर इस तरह का कोई बोझ है?”
गलत भी तो नहीं है।आज की पीढ़ी अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने बूढ़े माँ-बाप को छोड़ दूर चले जाते हैं।माता पिता की उम्र उनके इंतजार में गुजर जाती है।पहले तो सिर्फ़ लड़कियाँ ही घरों से विदा होती थी पर अब तो लड़के भी विदा हो जाते हैं।बेटे भी बेटियों की तरह मेहमानों की तरह घर आते हैं और कुछ दिन ठहर अपने-अपने घोंसलों में लौट जाते हैं।
सोनम की बात सुन सौरभ एक पल के लिए चुप हो गए।गलत तो नहीं कहा था सोनम ने…इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद दीदी के दोनों बच्चों की मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी लग गई थी। एक तरफ बच्चों को पैरों पर खड़ा होता देख पूजा दीदी बहुत खुश थी पर बच्चों को दूर जाता देख वह मन ही मन दुखी थी।पक्षी अपनी घोंसलों को छोड़ दूर जाने लगे थे। अब इस बुढ़ापे में उनका क्या होगा यह यक्ष प्रश्न उनके सामने मुँह बाए खड़ा था।जिन रिश्तेदारों से जीवन भर पटरी नहीं खाई थी।आज उनके साथ सामंजस बनाकर चलना पड़ रहा था।उम्र के इस पड़ाव पर जब उन्हें अपने बच्चों के सहारे की जरूरत थी,सहारा देने वाला हजारों किलोमीटर दूर बैठे थे। जिन्हें गिनती के नाम मात्र की छुट्टियाँ मिलती थी।जो परिवार जो कभी उन्हें फूटी आँख सुहाता नहीं था, आज हर सुख - दुख में उनके साथ खड़ा रहता था।बच्चे इस बात को समझने लगे थे वे अपनी मजबूरियाँ जानते थे पर दीदी जुड़ कर भी जुड़ नहीं पाई थी।
सोनम का कोई भी तर्क सौरभ को शांत नहीं कर पा रहा था।
“लड़की ने अंकुर से पूछा आपके पास कार है? जनाब कहते हैं भैया विदेश में रहते हैं मैं बंगलौर में… वहाँ ओला-उबर से काम चल जाता है।पापा को कार चलाने नहीं आती पर ताऊ जी और चाचाजी के पास कार है। जरूरत पड़ती है तो काम चल जाता है।इतना भी सच नहीं बोलना चाहिए था न…”
सोनम सोच रही थी,हम जिंदगी भर बच्चों को सच बोलना सिखाते हैं और आज उन्हीं को सच बोलने से रोक भी रहे है।सच को आखिर किस तराजू पर तौले कितना बोलना है और कितना नहीं!सौरभ बदस्तूर जारी थे।
“क्या करें इस लड़के का… अरे एक तरफ तो कहता है कि जॉइंट फैमिली में रहता है जब जॉइंट फैमिली में रहता है तो उसकी चीज भी तो तुम्हारी हुई।”
“क्या सचमुच?”
सोनम ने सौरभ की आँखों में आँखें डाल कर कहा।सौरभ का छोटा भाई और सोनम का देवर अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहता था उसके कमरे में हमेशा ताला लगा रहता।जब उनका आना होता तो कमरे की साफ-सफाई करवा दी जाती।वह कमरा उनकी अनुपस्थिति में भी उनका बना हुआ था जिस पर सोनल जरूरत पड़ने पर भी अधिकार दिखा और जता नहीं सकती थी।घर में कोई मेहमान भी आ जाए तो उसे उन्हीं तीन कमरों में एडजस्ट करना होता पर देवर के कमरे को खोलने और उसे प्रयोग में लाने की हिम्मत और इजाज़त नहीं थी।
तभी फोन की घंटी बजी मोबाइल की स्क्रीन पर अंकुर नाम देख सोनम की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गई।
“हेलो सोनम!दीदी बोल रहीं हूँ।”
“ओह नमस्ते दीदी!अंकुर के फोन से…!”
“मेरा फोन चार्जिंग पर लगा था।सौरभ ने तुमको यहाॅं का हाल बताया ही होगा!”
इस सवाल का जवाब सोनम को कभी समझ नहीं आया कि लोग आखिर चाहते क्या है? पति को अपनी पत्नी को बातें बतानी चाहिए या नहीं!अगर वो न बताए तो सामने वाला यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि हमने सोचा कि आपको तो पता ही होगा और बताए तो उसकी विश्वसनीयता पर संदेह हो जाता है।
“जी…”
सोनम ने ज्यादा न सोचते हुए एक छोटा सा जवाब दे पल्ला छुड़ा लिया।
“हम और सौरभ समझा-समझा कर हार गए।तुम भी समझा कर देख लो।”
सोनम संकोची से दोहरी हो गई
“दीदी आजकल के बच्चे खुद ही इतने समझदार हैं उन्हें मैं क्या समझाऊॅंगी।”
सोनम सोच रही थी घर के छोटे से बड़े किसी भी फैसले में आज तक कभी उसकी राय नहीं ली गई।आज उससे उसकी राय पूछी जा रही थी और इस बात की उम्मीद की जा रही कि वह उनके बेटे को समझाए। सनम कुछ समझती और कहती उससे पहले दीदी ने फोन अंकुर को पकड़ा दिया।
“नमस्ते मामी जी…”
“कैसे हो अंकुर?”
“ठीक हूँ मामी जी!”
“और आप…?”
“मैं भी ठीक हूँ।”
सन्नाटा!दोनों के बीच एक लंबा विराम आ गया सोनम समझ नहीं पा रही थी कि वह बात कहाॅं से शुरू करें।शायद अंकुर भी जानता था कि उसके सामने अगला सवाल क्या रखा जाएगा? क्या सच में वह उसका हाल-चाल पूछ रही थी!वह सोच रही थी कि यूॅं फोन पर तो हर कोई यही कहेगा,ठीक हूँ खैरियत से हूॅं पर क्या यह कहने वाला वाकई में ठीक होता है।शायद उसकी अंतरात्मा चीख-चीख कर यह कहना चाहती है,कभी फुर्सत से मेरे पास बैठो, साथ बैठो तो मैं अपने दिल के छाले दिखाऊॅं।बयां करूॅं अपने दर्द को… कह सकूॅं अपने दर्द को… दूर से तो सब ठीक और खैरियत ही कहेंगे।आसमान से गिरी पानी की हर बूंद को पत्तों का सहारा मिल जाए ये जरूरी तो नहीं… कुछ बूंदों की किस्मत में मिट्टी में लोट जाना,मिल जाना और मिट जाना भी होता है।सोनम ने बिना किसी औपचारिकता के सीधे-सीधे ही सवाल दाग दिया।
“अंकुर लड़की कैसी लगी?”
“लड़की तो अच्छी है पर मुझे उम्मीद नहीं है कि उसे मैं पसंद आया हूॅंगा।”
उसकी आवाज में एक निराशा थी और सोनम आश्चर्य में थी।
“ऐसा क्यों?अच्छे खासे हो।मल्टी नेशनल कंपनी में नौकरी करते हो, ठीक-ठाक कमाते हो।एक लड़की को और क्या चाहिए?”
अंकुर चुप था।शायद वह सोनम के सवालों का जवाब ढूंढ रहा था।
“मामी जी यह आपका जमाना नहीं है।पहले लड़के दहेज मांगने के लिए बदनाम थे पर आज के युग में लड़कियाॅं दहेज मांग रही हैं।”
सोनम अंकुर की बात सुन आश्चर्य में थी।
“लड़कियाॅं और दहेज?”
“जिस लड़की से मैं मिलने के लिए गया था वह एक मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की है।देखने में ठीक-ठाक है।एम बी ए कर रखा है।नौकरी की तलाश में है।आज नहीं तो कल उसे नौकरी मिल भी जाएगी।”
“फिर दिक्कत क्या है?”
“उसके सपने बहुत बड़े-बड़े हैं।”
“मतलब?”
सोनम अंकुर को समझने का प्रयास कर रही थी।
“एक आदमी को अपना घर-गाड़ी बनाने और लेने में उम्र निकल जाती है।वह लड़की डबल स्टोरी मकान,अपनी गाड़ी,एक लंबा चौड़ा बैंक बैलेंस की उम्मीद के साथ मुझसे मिलने आई थी।चार साल की नौकरी में मैं अपना मकान,गाड़ी और एक लंबा चौड़ा बैंक बैलेंस के सपने कैसे दिखा सकता था।क्या यह दहेज मांगना नहीं है?”
सोनम को अंकुर की बात गलत नहीं लगी।
“मामी जी लड़कियों का हमेशा से रोना है की लड़कियां रिजेक्ट कर दी जाती हैं पर लड़के भी रिजेक्ट होते हैं क्या किसी ने सोचा है!लड़कों का जीवन इतना भी नहीं कर सकता से इतना ही कर सकता पर आकर खत्म हो जाती है।मम्मी को लगता है कि इतना स्पष्ट बोलने की क्या जरूरत है जो चीज मेरी नहीं है उस पर मैं अपना अधिकार कैसे जता सकता हूॅं।वैसे भी झूठ की बुनियाद पर गृहस्थी की गाड़ी नहीं चल सकती।”
सोनम ने फोन रख दिया। सोनम के पास अंकुर के सवालों के कोई जवाब नहीं थे।शायद इन सवालों के जवाब कभी मिल भी नहीं पाएंगे।सोनम चुप थी वह समझ नहीं पा रही थी कि अंकुर को कैसे गलत कह दे।आखिर वह कहाॅं गलत है! नए रिश्ते की शुरुआत झूठ की बुनियाद पर तो नहीं खड़ी की जा सकती थी। विवाह एक ऐसा दरवाजा है जिसके दोनों ओर दो अजनबी रहते हैं।आप दरवाजा खटखटा भी दे पर क्या जरूरी है दरवाजे के उस पार रहने वाला आपके लिए दरवाज़ा खोल ही दे।कहीं पढ़ा था सोचो…किसी स्त्री के द्वारा तुम्हें चुना जाना तुम्हें उसका नायक बना देता है और तुम किसी के सर्वश्रेष्ठ पुरुष हो जाते हो…!पर एक स्त्री के चुनाव से पहले एक पुरुष को कितने दरिया पार करने होंगे यह भी किसी ने सोचा है।
आज से पच्चीस साल पहले जब सोनम इस घर की बहू बनकर आई थी अंकुर पाँच साल का था।गोरा,गोल-मटोल गुदगुदा रुई के उस खिलौने की तरह जिसका प्यारा सा रूप सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है ।सोनम भी उसकी तरफ आकर्षित थी,वह भी तो मामी-मामी कहकर दिन भर आगे-पीछे डोलता रहता।सोनम को उसके पूरे शरीर में उसकी आँखें बहुत प्रभावित करती थी। सफ़ेद चमकदार शरारतों से भरीं…दुनिया की दुनियादारी से दूर एक अजीब सी सच्चाई दिखाई देती थी।जिनमें ना कोई चिंता थी,ना कोई परेशानी,थी तो सिर्फ एक सच्चाई… बचपन का वह अंकुर न जाने कहाॅं पीछे छूट गया था पर उसकी सच्चाई आज भी उसके साथ थी।दीदी और सौरभ आज उसके सच बोलने से दुखी थे पर शायद दोनों यह बात भूल गए थे कि जीवन भर हम अपने बच्चों को सच बोलना सिखाते हैं पर क्या सच दुनिया भी सुनना चाहती है!
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