SEPTEMBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
सितम्बर 2023, अंक २७ | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति
सितंबर संवाद पत्रिका स्वर्गीय सुशीला मोहनका को समर्पित है
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ और इसके साथ ही हम ईश्वर से आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। १४ सितंबर १९४९ को संविधान द्वारा हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में अपनाया गया था, पहला हिंदी दिवस १४ सितंबर १९५३ को मनाया गया था।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति २०२३ जुलाई १४ से लेकर अगस्त २७ तक कवि सम्मेलन में दो कवि और एक कवित्री को लाए थे। जिनमे सुदीप भोला जी जबलपुर से, गौरव शर्मा जी मुंबई से और डॉ. सरिता जी गाजियाबाद से हैं। अमेरिका में ६ सप्ताह का भ्रमण था। जिसमें कवियों ने कविताओं एवं हिंदी प्रचार से सबका दिल मोह लिया। अ.हि.स. के द्विवार्षिक २१ वाँ अधिवेशन जुलाई २८/२९ को सम्पन्न हुआ था, मैं आप सभी को समिति की ओर से सादर धन्यवाद करती हूँ कि आप सभी आए और आकर बहुमूल्य समय देकर कार्यक्रम को सफल बनाया।
आप से निवेदन है कि Amazon के माध्यम से आप हमारा समर्थन करिए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति एक ग़ैर लाभकारी संस्था है, और जहाँ खरीदार अपनी पसंदीदा charitable संस्था के रुप में smile.amezon.com के द्वारा चुन सकते हैं। ख़रीदी कोई भी करता है - amezon.com उस आय का ०.५% अंतर्रष्ट्रिय हिंदी समिति को दान करेगा।
अंत में मैं समिति, न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति और स्वयं सेवक सहित सभी को सहृदय से धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और विश्वा को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल anitagsinghal@gmail.com के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति
अध्यक्षा(२०२२-२०२३)
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स्वर्गीय सुशीला मोहनका की जीवनी का सारांश
द्वारा: डॉ. शैल जैन, सुशीला मोहनका की बेटी, अ. हिं. स. की आगामी अध्यक्षा
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सुशीला मोहनका अपने बाबूजी, पति डॉ. महादेव चाँद, बेटियों और दामादों के साथ
स्वर्गीय सुशीला देवी मोहनका
स्वर्गीय सुशीला देवी मोहनका (स्वर्गीय डॉ. महादेव चंद की पत्नी) का जन्म 28 सितंबर, 1933 को पिता गौरी शंकर डालमिया और माता पन्ना देवी खेमका के घर कोलकाता में हुआ था। माता कर्पूरी देवी के सानिध्य में उनके संस्कार पल्लवित हुये। सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं, उनके बाद भाई गोविंद डालमिया, बहनें दिवंगत गीता जालान, दिवंगत भामा सलारपुरिया, दिवंगत पुष्पा चोपड़ा, जया डोकानिया और दिवंगत मंजू मेहरिया। वें तीन पुत्रियों की माता किरण खेतान (पवन खेतान), डॉ. शैल जैन (डॉ. थानमल जैन) और डॉ. शोभा खंडेलवाल (डॉ. आनंद खंडेलवाल), आठ की नानी और बारह की परदादी / परनानी थीं।
सुशीला मोहनका झारखंड के जसीडीह में पली बढ़ीं, जहां उनके पिता सामाजिक कार्यों में शामिल थे, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक स्वतंत्रता सेनानी, महात्मा गाँधी के विचारों से सहमत और खद्दर धारी थे। पिता की सक्रियता से प्रेरित होकर, दस साल की उम्र से चिरंजीव सुशीला के मन में लोगों के लिए दुनिया को बेहतर बनाने का आह्वान था और जिनके पास आवाज नहीं थी उन्हें भी सम्बल बनाने की उत्सुकता थी। वह केवल खादी, हस्तनिर्मित कपास पहनती थीं - जो महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया एक क्रांतिकारी आंदोलन था, जो सादगी का प्रतीक था और भारतीय आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा भी देता था।
शादी के बाद वह अपने दिवंगत पति महादेव चंद जो शादी के समय मेडिकल स्कूल के विद्यार्थी थे, के साथ अपने ससुराल सुपौल, सहरसा में रहने लगीं। शीघ्र ही उनके पति कॉलेज की पढ़ाई के लिये दूसरे शहर में चले गये। छोटी उमर में ससुराल के संयुक्त परिवार जहां ३०-४० लोग रहते थे वहां भी सबों को अपने व्यहवार, प्रेम एवं इज़्ज़त दे कर अपना बना लिया। जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा के साथ उन्होंने अपने ससुर जी की सहमति ले ली गांव से दूर छात्रावास में रह कर प्रयाग महिला विद्यापीठ, इलाहाबाद में पढ़ने के लिये। अपने साथ उन्होंने सबों की इजाजत से अपनी छोटी बहन एवं जेठ जी की बेटी को भी आगे पढ़ाई के लिए ले गयीं। यह उनकी मानसिकता दिखाता है, नारी उत्थान की तरफ पहला कदम, अपने से एवं परिवार से शुरु १५-१६ साल की उम्र में।
बाद में वें अपने दिवंगत पति डॉ. महादेव चंद के साथ बिहार के पटना शहर में बस गईं। वहाँ तीन बेटियों को उन्होंने जन्म दिया और उन्हें बड़ा कर, १०-१५ सालों बाद उन्होंने पटना विश्वविद्यालय, मगध महिला कॉलेज से बी.ए. की पढाई पूरी की। वह और डॉ. चांद हमेशा अपने मूल्यों पर दृढ़ रहे, उन्होंने घरेलू हिंसा से प्रभावित महिलाओं और जरूरतमंद अन्य लोगों के लिए हमेशा समय और सहायता दी, ऐसी किसी भी शादी में शामिल होने से इनकार कर दिया जिसमें दहेज लिया गया हो या महिलाओं को घूंघट पहनने के लिए मजबूर किया गया हो। शिक्षा समाज के उत्थान की महत्वपूर्ण कड़ी है ऐसा उन दोनों का बहुत विश्वास था और जहां भी जरुरत होती वहां सहयोग के लिये तैयार रहते। उनके पति रोटरी क्लब में सक्रिय रूप से शामिल थे और उन्होंने पति का उसमें पूरा साथ दिया। सक्रिय रोटरी एन की भूमिका निभाई, जिसे अब रोटरी स्पाउस के नाम से जाना जाता है।
1983 में उन्होंने बिहार के पटना शहर में अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन की स्थापना की। यह संगठन महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए स्थापित किया गया था। इस संगठन के माध्यम से वह इंदिरा गांधी से मिलीं और उस समय के सबसे महत्वपूर्ण महिलाओं के मुद्दों को साझा किया, जिससे कांग्रेस के स्तर पर सार्थक बदलाव भी आया। महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों के बारे में जानने के लिए उन्होंने अपने पति के साथ, जो सही माने में उनके हम सफर थे, भारत और नेपाल के 12 अलग-अलग राज्यों के 100 से अधिक शहरों का दौरा किया। यह संगठन आज भी सक्रिय है, 230,000 से अधिक सदस्यों के साथ, महिलाओं के जीवन में बदलाव ला रहा है, विभिन्न तरह से समाज सेवा कर रहा है और सम्मलेन की नयी शाखाओ की स्थापना और उत्थान कर रहा है।
1993 में उनके काम को इंटरनेशनल फ्रेंडशिप सोसाइटी की ओर से मदर टेरेसा द्वारा प्रस्तुत महिला रत्न पुरस्कार (वर्ष की महिला) से सम्मानित किया गया था।
उनको अपने पति का पूरा सहयोग था, सभी सामाजिक कार्यक्रमों में। 1990 में अमेरिका आने के बाद सुशीला मोहनका अपने पति के साथ २ साल एक्रोन में अपार्टमेंट में रहे और एक्रोन यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर पाठ्यक्रम किया ताकि वे दोनों समाज सेवा जिस तरह वे करना चाहते हैं वो कर सकें। सुशीला मोहनका अपने अंतिम समय तक इ मेल, मेल मर्जिंग, चार्ट्स, इत्यादि सभी कर सकती थीं। अमेरिका में वह विश्व स्तर पर हिंदी भाषा और संस्कृति को जीवित रखने के सपने के साथ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति में गहराई से शामिल हो गईं। उन्होंने कई नेतृत्वकारी भूमिकाएँ निभाईं, जिनमें शामिल हैं: कोषाध्यक्ष (2006-2008), सचिव (2008-2009), अध्यक्ष (2012-2013), ट्रस्टी चेयरपर्सन (2016-2021), त्रैमासिक विशवा पत्रिका के मुख्य प्रबंध संपादक (2017-2023), और पिछले दो वर्षों से (जून 2021- जून 2023 )नई अ.हि.स. की मासिक ई-समाचार पत्र, "संवाद" की शुरुआत एवं संपादक।
1989 में अपने पति के साथ क्लीवलैंड अमेरिका में मारवाड़ी एसोसिएशन ऑफ़ ओहायो की संस्थापना की। यह समिति का मुख्य उद्देश्य है अमेरिका में आये मारवाड़ी लोग और खासकर युवा पीढ़ी में मारवाड़ी संस्कृति को जीवित रखना। ये समिति अभी सक्रिय है और साल में 3 -4 कार्यक्रम होते हैं। साथ ही कुछ-कुछ सामाजिक सेवा का कार्यक्रम भी होता रहता है।
अमेरिका में भी उन्होंने एक भरपूर परिवार के साथ-साथ एक बड़ा सामाजिक परिवार भी बना लिया। सुशीला मोहनका की भावना, लोगों को प्यार, अपनापन और प्रभाव अविश्वसनीय रहा। उनकी सेवा कई रूपों में हुई - परिवार, अपने समुदाय, मित्रो, जरुरतमंद लोगों और संगठनों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और समर्पण के माध्यम से जो उनके दिल को प्रिय थे। उन्होंने सभी को बिना शर्त अपना प्यार दिया और सभी को स्वयं से ऊपर परिवार और सेवा का महत्व सिखाया। वह न केवल अपने परिवार के लिए, बल्कि अपने व्यापक समुदाय के लिए भी ज्ञान और शक्ति की स्तंभ थीं। वह सबों के बीच हमेशा जीवित रहेंगी।'
उनका मानना था, "परिवार को हमेशा साथ रखना, परिवार साथ ले कर चलना,"
हमेशा अपने परिवार को अपने साथ रखें - और परिवार से उनका मतलब पूरे समुदाय से था।
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“श्रीमती सुशीला मोहनका को समर्पित श्रद्धांजलि”
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं तत्काल न्यासी समिति सदस्य
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उपाध्यक्ष, द मैजिक मैन एन चंद्रा फाउंडेशन
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द मैजिक मैन एन चंद्रा फाउंडेशन के पटल पर
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बिहार प्रदेश अध्यक्ष,
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
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पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष,अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन,भारत
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द्वारा : सुरेंद्र नाथ तिवारी
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं तत्काल न्यासी समिति सदस्य
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स्मृतिशेष आदरणीया सुशीला मोहनका जी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के लिए मातृ-स्वरूपा थीं। उनके जाने से लगता है, हम सभी समिति के लोगों ने अपनी माँ को खो दिया है। उनका स्नेह ही कुछ ऐसा था कि जो कोई भी उनसे मिलता था, उनकी स्निग्ध विनम्रता से आप्लावित हुए बिना नहीं रह सकता था। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं उनके परिवार से भी परिचित रहा हूँ| उनके परिवार के हिंदी के प्रति प्रेम और मेरे भी बिहार का होने के कारण कहीं कहीं कोई न कोई तार जुड़ ही जाता रहा है। जैसे, १९९६ की बोर्ड मीटिंग सुशीला जी की छोटी बेटी शोभा खंडेलवाल जी के घर में हुई थी, बिहार के कई साहित्यिकों और राजीतिक लोगों को हम दोनों बखूबी जानते थे, उनके बड़े दामाद पवन खेतान जी मेरे कालेज के सीनियर बैच के है।
सुशीला जी और महादेव बाबू, तथा गुलाब खंडेलवाल जी दम्पति भी मेरे घर न्यूजर्सी में अतिथि रहे हैं। इस तरह उनके स्नेह से सिक्त होने का और उन्हें करीब से देखने के मुझे कई अवसर मिले हैं। मुझे याद है जब वे मेरे घर पधारी थीं...सफ़ेद खादी में लिपटा एक महीयस-गरिमामय, सुन्दर, व्यक्तित्व, हिंदी के साफ-सुथरे, स्पष्ट शब्द; और मेरे और मेरी पत्नी के प्रति उनका और महादेव बाबू का स्नेह जैसे किसी बेटे-बहू से मिल रहे हों। उसके बाद से वे कभी-कभी मुझे बेटा कह कर सम्बोधित करतीं, पर फिर इस बात का ध्यान आने पर कि मैं तो परिवार से सम्बंधित नहीं हूँ, वे औपचारिकता पर उतर आतीं। मुझे हँसी आती।
उनके साथ कोई २५ वर्ष काम करने का मौका मुझे मिला था। उनकी लगन और कर्मठता सदा अनुकरणीय थी; विचार सुलझे होते थे, कोई कन्फूजन नहीं, कोई अम्बिगुइटी नहीं; सब कुछ आश्विन के तालाब सा साफ साफ, निर्मल। कुछ ऐसे भी अवसर आये जब हमारे विचार समिति सम्बंधित किसी विषय वस्तु पर अलग होते थे। पर मैंने अनुभव किया था कि वे चेष्टा करतीं हमें प्रबोधित करने की। अपने लम्बे सामाजिक जीवन के अनुभव के आधार पर स्थित अपने तर्कों से हमें अपनी बात समझाने की कोशिश करतीं। पर कभी नाराज नहीं होतीं, कभी आवाज ऊँची नहीं उठती।
जीवन की यात्रा में हम सबों को अलग अलग पथिक मिलते हैं। कुछ का जीवन-अनुभव, तद्जनित ज्ञान, उनके सान्निध्य की स्निग्धता, उनके अपनेपन की ऊष्मा, कभी नहीं भूलती। बल्कि समिति की सेवा जैसे सामाजिक कार्यों में जब कुछ कठिन निर्णय करने होते हैं तो एक बार रुक कर सोचता हूँ: सुशीला जी ऐसी स्थिति में क्या करतीं? संस्कृत कवि जगन्नाथ की एक पंक्ति है "विरल: स कोपि विटपी, यमध्वगो गृह गात: स्मरति।" इसका अर्थ है (जब पथिक अपनी लम्बी यात्रा पर चलता है तो) रास्ते में मिले वृक्षों में कुछ विरले ही ऐसे होते हैं, जिनकी स्निग्ध छाया, जिनके वृक्षों का कलरव, जिनकी खूबसूरती, पथिक घर जाकर भी याद रखता है। सुशीला जी की स्मृतियाँ कुछ ऐसी ही हैं जिनकी स्निग्धता, जिसकी उष्मा, जीवन पर्यन्त याद रहेंगी।
एक बात और: उनकी कर्मठता, लगन, समर्पण और अनवरत परिश्रम अलौकिक थी, दैविक थी। यह मैं केवल अतिशयोक्ति के रूप में नहीं कह रहा। उनके देहावसान की जब खबर मिली थी तो मैं सोच रहा था, कोई दो तीन महीने पहले ही शायद उनका अंतिम ईमेल मिला था? कौन इतना परिश्रम नब्बे साल की उम्र में करता है।आकड़ों के मुताबिक दुनिया के ७०० करोड़ लोगो में केवल एक लाख ९० साल की उम्र तक जीते हैं। उसमें किन में इतनी शक्ति रहती है कि वह इतनी लगन, इतने परिश्रम से, अंतिम क्षणों तक अपना काम करता रहे। यह एक दैविक वरदान है। दिनकर जी की एक पंक्ति है: "अपने पैरों से चल यदि मरघट पहुंच सके, इससे बढ़ कर वरदान मनुज का क्या होगा" उनको यह ईश्वरीय, दैविक वरदान प्राप्त था।
हम सब सचमुच बड़े भाग्यशाली हैं कि हमारी जीवन यात्रा में उनका साथ, उनका स्नेह मिला, उनका आशीर्वाद मिला। इन्हीं शब्दों के साथ मैं उन्हें अपना अंतिम प्रणाम अर्पित करता हूँ।
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द्वारा : डॉ. रेनू श्रीवास्तव
उपाध्यक्ष, द मैजिक मैन एन चंद्रा फाउंडेशन
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ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो इस दुनिया से रुख़्सत होने के बाद अपने पीछे अपना प्रभावी इतिहास छोड़ जाते हैं और उनकी यादें हमेशा दिलो-दिमाग में घर किए होती हैं। ऐसी ही शख्सियत थी आदरणीय सुशीला मोहनका जी।
28 सितम्बर 1933 को विजय दशमी को कोलकाता में जन्मी वो एक ऐसी महिला समाज सेवी थी जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के लिए जब कार्य किया तो अपनी एक अलग छाप छोड़ी, जब उन्होंने मारवाड़ी महिला सम्मेलन में कार्य किया तो अपनी एक अलग पहचान बनाई।
विदेश में रहते हुए भी भारत और भारतीयता उनकी रगो में संस्कार बनकर बहती थी। जिस देश में रहीं, उन्होंने वहाँ अपनी संस्कृति और परांपराओं के लिए हमेशा कार्य किया। खादी के वस्त्रों को अपना साथी बनाया और भारतीय परंपराओं को न वो स्वयं भूली और ना ही अपने बच्चों को भूलने दिया। अपने देश की संस्कृति के मूल्यों को अपने बच्चों और उनके बच्चों तक पहुँचाया।
द मैजिक मैन एन चंद्रा फाउडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के तहत मुझे उनका साक्षात्कार लेने का अवसर प्राप्त हुआ। तब बहुत सारे उनके अनछुए पहलुओं को छुआ और उनको जानने की कोशिश की। मुझे याद है जब साक्षात्कार शुरू करने से पहले मैंने जब उनको कहा कि मैं आज के साक्षात्कार के दौरान आपको माँ कहूँगी। उन्होंने तुरंत इसके लिए मुझे अनुमति दी। उस साक्षात्कार के दौरान उस दिन माँ से इस बेटी ने बहुत कुछ जाना और सीखा। माँ पूरा जहान है, यह यूं ही नही कहा जाता है।
आज जब ये खबर सुनी कि माँ अब इस दुनिया में नही रही दिल और दिमाग में साक्षात्कार के दौरान उनके द्वारा कही गई सारी बातें और उनका चेहरा घूम गया। शोभा दीदी मुझे पता है कि आप अपनी माँ के निधन पर कैसा महसूस कर रही होंगी। वह एक बहुत अच्छी माँ थी, जो हमेशा आपके चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती थी...
ऊपर जिसका अंत नहीं,
उसे आसमां कहते हैं,
जहाँ में जिसका अंत नहीं,
उसे माँ कहते हैं!
सुशीला माँ को भावभीनी श्रद्धांजलि।
द मैजिक मैन एन चंद्रा फाउडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम सुशीला मोहनका के साथ
https://www.youtube.com/live/l0pRxZgJdzQ?feature=share
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द्वारा : नीना मोटानी
बिहार प्रदेश अध्यक्ष,अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन,भारत
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*सभी की अत्यंत प्रिय, कर्मठ, बिहार की हमारी संस्थापिका श्रीमती सुशीला मोहनका जी के निधन पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि। इनका जीवन हम सब एवम आने वाली पीढ़ी के लिए हमेशा मिसाल बन कर रहेगा।*
*मैं कुछ स्मृतियां साझा करना चाहती हूं। मेरे दादा स्व रामप्रताप अग्रवाल (मुजफ्फरपुर) और मेरी दादी से सुशीला आंटी और अंकल का पारिवारिक संबंध था।*
जब मैं प्रांतीय सचिव थी उस समय उन्होंने मेरी पीठ थपथपाकर कहा था कि मुझे बहुत गर्व है कि तुम रामप्रताप जी की बेटी हो।
*आज से 6 साल पहले जब वे पटना में थीं अपने घर पर एक हिंदी टाइपिंग करने वाले लड़के को बुलाकर उसके साथ अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन के इतिहास का Slide Show बना रही थीं। इसी संदर्भ में उन्होंने मुझे भी बुलाया था और उसे दिखाया था। प्रतिदिन उस लड़के के साथ घंटों मेहनत करती थीं ताकि सम्मेलन की शुरुआत कैसे हुई कौन कौन राष्ट्रीय अध्यक्ष कैसे कैसे बनीं सब बहनें जानें समझें*।किसी कारणवश वीरबाला जी के राष्ट्रीय अधिवेशन में वो स्लाइड शो हम नही दिखा पाए। नीरा बथवाल जी ने कहा था कि आगामी अधिवेशन में हम जरूर दिखाएंगे। 2 महीने पहले जब सुशीला आंटी से बात हुई तो मैने बताया कि नीरा जी उसे अपने अधिवेशन में दिखाने तैयार हैं । उन्होंने कहा कि अभी तो अधिवेशन मे समय है उसके पहले मैं उसे अपडेट कर दूँगी।
अब कौन उसे अपडेट करेगा
मेरी दोनों बेटियाँ विदेश में हैं। मैं अभी एक महीने पहले उनसे फोन पर बात कर रही थी तो बताया कि मेरी बेटी ने अपनी पहली salary से निकाले हुए डॉलर मुझे दिए हैं कि उन्हें मैं भारत में किसी नेक सेवा कार्य में लगा दूँ। इस पर *उन्होंने मुझे राय दी*
*कि तुम अपनी दोनों बेटियों को मारवाड़ी महिला सम्मेलन की* *सदस्य बना दो। मैं बोली कि वो तो भारत में नही हैं तो वे बोलीं कि मैने अपनी तीनों बेटियों को सम्मेलन का सदस्य बनाया हुआ है। यह कितनी दूरदर्शी सोच थी उनकी।*
उनकी यह बात ध्यान में रख कर हमारी जो भी बहुएँ बेटियाँ विदेश में हैं अगर उन्हें हम सम्मेलन का सदस्य बनाते हैं तो वे बाहर रह कर भी हमारी गतिविधियों से हमेशा जुड़ी रहेंगी और जब भी उनकी इच्छा होगी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए जरूरतमंदों की मदद कर सकेंगी। विदेश में कहाँ दान करें कौन उपयुक्त पात्र है यह नहीं पता चलता और इच्छा रहने पर भी कोई सेवा कार्य नहीं कर पाते।
*राष्ट्रीय अधिवेशन में हम सभी उनकी तरह की खादी की साड़ी पहन कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित कर सकते हैं। इससे खादी के प्रति उनके विचार को हम अपने व्यवहार मे ला सकते हैं। ऐसा लगेगा कि एक सुशीला ने हजारों सुशीलाओं को जन्म दे दिया। उनके विचारों को अपना कर ही हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं*।
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द्वारा : रश्मि चोपड़ा
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
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Sushila Mohanka ji ko Shradhanjali
Kiran Khaitan
Dr. Shail Jain
Dr. Shobha Khandelwal
“Lives of great men all remind us, we can make our lives sublime, and, departing, leave behind us, footprints on the sands of time.”
Henry Wadsworth Longfellow
Sushila Mohanka popularly known as “Ma” was that luminary and a grand personality who made herself the loving mother for all. She was “Ma” or mother for all who came in contact with her. She has left indelible footprints on the sands of time.
Her journey from a small town in Bihar to a leadership position of several organisations in the USA is a story of courage and convictions. As a young child she had fought for India’s independence from colonial rule. As an adult she actively led the social awareness for woman empowerment. Later she led the crusade to save Indian culture and language among the Indian diaspora in the USA. Sushilaji was an inspiration for all and cheerleader for saving Hindi language.
I came away from the funeral services with a deep sense of loss and yet her life story had ignited the spark in me to do something positive and honour her legacy! Here is what I saw and what impressed me immensely.
The funeral service was held on July 3 at Busch Funeral Home in Parma, Ohio.
The service started with viewing and paying respects while showering rose petals on someone who had been so loved, so admired and so respected. She looked so calm and so much at peace truly now! Our sincere Shraddhanjali to a noble soul.
Grand children were going to run the service and conduct the presentation of eulogy - for a loving mother, a doting grandmother, a great grandmother, a beloved sister, an honored sister in law, a role model for so many relatives and above all a grand community leader.
It started with the three daughters sharing a biographical sketch of their mother, who was born in 1933. Sushila ji had raised them with values and some very strong principles. Her firm faith in women's empowerment meant providing them with the best possible education. They all spoke with heavy hearts and anguish. How could they ever forget her love and affection, her practical guidance and her visionary advice. They made a commitment to carry her legacy forward and continue her initiatives in the community. Her departure for her heavenly abode on June 29, 2023, was a devastating blow to all of them. This is an irreparable loss for all of us.
Sushila Mohanka had grown up in a family that was dedicated to social service. Her father had been a freedom fighter. It was recalled how as an eight year old she accompanied her father on a unity march through the town. Even though so young she would voluntarily walk long distances on foot, urging people to join the independence movement in India.
Indeed these seeds sown so early in a patriotic family, stayed alive and active throughout her life. The same childhood tendencies that had made her a nationalist as a child, eventually as an adult gave her the fervour to save the national language Hindi. Finally in late 1990s when Sushila ji migrated to the USA, she maintained her revolutionary zeal to save this legacy language of her home country in her newly adopted land. North East International Hindi Association (IHA) and the national level (IHA) will forever be indebted to this crusader of Hindi language. Sushila ji was a staunch supporter of this initiative of IHA.
In her youth Sushila ji has been encouraged to wear “Khadi”- a handspun cloth to encourage self reliance among Indian weavers. This cloth had become the symbol of the Indian national independence movement. Imagine Sushila ji’s courage to continue her passion for khadi even after her marriage. Thanks to a supportive husband she wore it in a conservative Marwari joint family in Rajasthan. This was revolutionary indeed. What a befitting and benevolent tribute to her that all her granddaughters wore her khadi sarees on her funeral. This is memorable on all counts!
Sushila ji was a devoted and a rock solid supporter to her physician husband. While he encouraged her to be a social activist, she was always mindful of being by his side too. She was a crusader for women's empowerment, but believed in total devotion to her role as the matriarch of a large family. She managed to attend school for women in another town due to her husband’s support. What a lesson in mutual understanding for young men and women today!
Sushila ji enrolled in Akron University to learn basic computer skills after retirement at age 60. They talk about lifelong learning, Sushila ji proved that she was a living example of being one. She continued her role in the publication of “Vishwa” and “Samvaad” magazine with impressive computer skills.
After the three daughters, it was time for the three sons in law. They praised her, respected her, and were visibly moved due to the tragic loss.Speaks volumes for how much she was loved and respected. Grandchildren shared so many anecdotes and stories - what she cooked, what she said, how she helped, how she heard them, how she was always there for them!. A grandmother can not be loved more. They missed her already and gave her credit for her positive and cheerful attitude.
Someone rightly remarked about her at the funeral that Ma always encouraged everyone…” if someone did not speak Hindi, she encouraged them to speak. If someone could speak she encouraged them to write. If they could write she wanted them to write articles, if they wrote they were encouraged to write books and poetry. She wanted everyone to grow, improve and be proud of their heritage.
One grandchild admired her sense of discipline, self control and regular habits. She believed that Sushilaji’s exemplary discipline was the result of lifelong practice. The grandkids thanked Sushilaji for being the role model of discipline. What a gift to her grandchildren!
So glad I could attend this funeral service, so fortunate to see the strong family bonds, so beautiful to see the children and grandchildren, cousins, uncles and aunts, second and third generations coming together. There is so much to learn and so much to appreciate! Sushilaji you are still living in the hearts of so many people.
Indeed it was a life well lived . Appreciation and admiration flowed not just from near relatives, but those who were distant or totally unrelated. Sushilaji was “ma” to so many, because family for her was the entire community. She was the proverbial guiding light in the family, mother figure for many. Her footprints will be saved for a longtime to come!!
जो अडिग रहा तूफ़ान में बरसात में
टूट जाता हैं वही तारा शरद की रात में
मुक्त जीवन की प्रगति द्वन्द में संघात में.
सुशीला जी का जीवन दिनकर जी की पंक्तिया याद दिलाता है -
“सच है विपत्ति जब आती है.
कायर को ही दहलाती है
सूरमा नहीं विचलित होते
क्षण एक नहीं धीरज खोते
विघ्नो को गले लगाते है
काटों में रहा बनाते है
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द्वारा : तसनीम लोखण्डवाला
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
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"न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।”
In the Bhagavad Gita, Krishna says -
“The soul is never born, it never dies having come into being once, it never ceases to be.
Unborn, eternal, abiding and primeval, it is moving on and exists even when the body perishes.”
Sushila ji, who most of us lovingly called “Ma”, has embarked on her soul’s journey, and I am sure to an “आला मुक़ाम जन्नत में “ -aala mukaam in Jannat - meaning a very exalted place in heaven. Ma was a trailblazer, no doubt! शत् शत् नमन
I remember when I first met her - she called me “मेरी रानी बेटी” - many of my friends had the same experience. She would call us “her Princesses” and “her daughters”. With just those few precious words, we immediately felt enveloped in her circle of love and “आत्मीयता”. There was an instant connection and she garnered immediate respect and awe by just being who she was.
I can’t forget last year, despite her health issues, she made a special effort to travel and come to my Eid function with Shail Di - just to wish me and my family in person. That “extra thoughtfulness” is also very much like her, very much her forte!
Over the years, I have worked with her on the International Hindi Association and in planning many of its events. On behalf of the organization and its members, I can proudly say … there rarely was a meeting she missed, rarely a meeting where she came late and rarely a meeting where she left early. Some of us met her as late as just two weeks back over a zoom meeting. Her energy in these meetings was always contagious and her passion to promote Hindi is a “legacy par excellence” that she has left behind for all of us.
Whenever Sunita (Dwivedi) or I sent draft minutes of our IHA meetings, she always was the first one in the team to respond and give us detailed, unabashed corrective feedback. All color coded too highlighting our spellings or punctuations. That kind of dedication and meticulousness at her age is unparalleled and unheard of!
Every time I recited a poem or spoke at any IHA event, without fail, next day I would get a personal message of appreciation in the email from Sushila ji. Those emails are her blessings that will stay with me for posterity.
At almost 90 years of age, she was also more technologically curious and “सर्व गुण सम्पन्न” than most of us. As we all know, just two years back, she started writing and publishing a brand new e-newsletter, “Samvaad”. In fact, we got the most recent and the last copy of that newsletter just this past Friday posthumously.
Ma was an iconic member of this community who carried herself with ultimate grace in her Khadi - the handloom cotton sarees - proudly representing her ideology of self reliance and self government. I wrote this way before I read her obituary or attended her funeral. It’s so uncanny like me, so many people were impacted and affected by this essential side of her persona - embodying and actually living Mahatma Gandhi’s ideology of “simple living high thinking”.
I share today Mushtaq and my sincerest condolences with the Khaitan, the Jain the Khandelwal and all of your extended families.
I would like to end my Shraddhanjali today with an excerpt from the poem I recited on her birthday a few years ago.
वह आँखें, जिन में ख़्वाब हैं
वह दिल है, जिन में धड़कने
वह बाज़ूँ जिन में है सकत
वह होंठ जिन पे हर्फ़ हैं
रहूँगी इनके दरमियान
कि जब मैं बीत जाऊँगी ….
Woh aankhein, jin mein khwaab hain,
woh dil hai, jinmein dhadkanein,
woh baazoo jinmein hai sakat!
woh hont jin pe harf hain,
rahungi inke darmayan,
ke jab main beet jaaungi …
If there are eyes that dream
If there are hearts that beat
If there are arms that hold
If there are words that speak
You will find her right there
She will always be amidst us
She walks in grace,
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द्वारा : मीना गुप्ता
पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन,भारत
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परम पूज्य सुशीला दीदी को
श्रद्धासुमन अर्पित
मुझे दीदी के बहुत करीब रहने का सौभाग्य प्राप्त था၊ जब भी अमेरिका से आती, एक दिन के बाद मुझे फोन करके बुलाती ၊ सम्मेलन की सारी जानकारियाँ लेती तथा मुझे दिशा निर्देश देती रहती ၊ अपने हर कार्यक्रम में मुझे अवश्य बुलाती, मुझे देखकर बहुत खुश होती ၊ उन्हें खिलाने का बहुत शौक था, मुझे खिलाकर बहुत खुश होती ၊
मुझे याद है अपने 50 वें शादी की सालगिरह पर, उनको रंगीन साड़ी में देखकर, मैं बहुत खुश हुई थी ၊ सादा जीवन, उच्च विचार, सम्मेलन के प्रति समर्पित, कार्य निष्ठा, रानी शब्द द्वारा प्यार देने वाली दीदी के बारे में जितना कहुँ, कम है၊ राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते हुए, मेरी विषम परिस्थिति में भी मुझे, विचलित नही होने दी, हमेशा कहती, रानी ये हवा का झोंका है, शांत होकर पाँव जमाएं रखो, ये हवा अपने आप शांत हो जाएगी।
मैने जब नोटिस के बारे में बताया, तो मुझे घर पर बुलाई, वहाँ वकील को बुलाकर समझी, और मुझे सांत्वना दी, कुछ भी नही होगा, तु एकदम मत घबड़ाना၊ जब मेरे पति का स्वर्गवास हुआ, उस विषम परिस्थिति में, मेरे घर आकर मुझे कलेजे से लगाकर, माँ के जैसा ढांढ़स बधाई थी၊ विदेश में भी में भी रहकर, हमेशा फोन करती, उनकी एक खास बात थी, कभी नही कहती, मेरी तबियत खराब है, जब भी पूछती दीदी आपका स्वास्थ्य कैसा है, हमेशा कहती नरम - गरम चलता ही रहता है၊ मेरे अधिवेशन में आकर बहुत खुश हुई थी, और कहा था तुने तो मुझे इतना सजाया, उतना तो मैं अपने शादी में भी नही सजी थी၊
अभी कुछ दिन पहले फोन पर बात हुई थी, मैने उनसे बिहार की अधिवेशन में आने को कहा था, तब उन्होनें कहा, प्रभु की इक्छा हुई तो जरूर आयेंगे, शुभकामना भेज देगें၊ संविधान छपने के दरमियान अनेको बार उनके घर जाकर, संविधान को सही कराने एवं साथ रहने का सौभाग्य मिला၊ जब भी विदेश से आती मेरे लिए दो दवा लेकर आती और मुझे देती၊ मैं उनका अपनापन और अच्छाईयाँ कितनी लिखूँ, लिखने बैठूँ तो दिन - रात का पता ही नही लगेगा၊ आज मैं शून्य हो गयी, विरान सी जिन्दगी लगने लगी၊ आज एक ही झटके में मुझे संभालने वाला दूर क्षितिज में चली गयी၊ कहने को कुछ रहा नहीं၊ प्रभु निर्मल आत्मा को अपने चरणों में स्थान दे၊
दिल भरा है, आँखो में है ऑसू, होंठ है काँपते, हाथ नहीं उठते, फिर भी नमन है दीदी आपको၊ आपकी यादें, आपका अपनत्व, आपकी शिक्षा, आपके विचार, आपका सानिध्य हमेशा मुझे विचलित करती रहेगी၊ आपके द्वारा सुमार्ग पर चलने की कोशिश करूँगी၊ मेरी श्रद्धासुमन आपके चरणों में समर्पित၊
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द्वारा : सुशीला फरमानिया
नेत्र,अंग, देह,रक्तदान प्रमुख
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन, भारत
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चिट्ठी ना कोई सन्देश
जाने वो कौन सा देश
जहां तुम चले गए
सम्मेलन को लगी है ठेस
जाने वो कौन सा देश
जहाँ तुम चले गए।
उनकी जो बात मेरे और मेरे पति के लिए प्रेरणा स्रोत बनी वह आज भी हमारे दिलों में समाहित है सन् 1992 के संबलपुर अधिवेशन में वह स्टेज पर थी और एक महिला ने क्वेश्चन किया था की दीदी हमारे बच्चे पढ़ाई नहीं करते टीवी देखते हैं इसका क्या उपाय है। तब उन्होंने कहा था तुम कितना घंटे टीवी देखती हो? रानी यह नहीं हो सकता कि तुम टीवी देखो और बच्चों को कहो पढ़ें, तुम अपना टीवी देखना बंद करो बच्चे अपने आप पढ़ लेंगे। वह शिक्षा हमने अपने जीवन में उतारी और जब तक बच्चों ने मैट्रिक नहीं कर ली मैंने घर में केवल ही नहीं लगवाया।
इस सत्र में भी जूम मीटिंग पर तीन बार वह हम सबके बीच आशीर्वाद देने आई। मैं हमेशा सभी रिपोर्ट उनको ईमेल के द्वारा भेजती थी और उनका बराबर रिप्लाई आता रानी तुम्हारी रिपोर्ट मिल गई है और बहुत अच्छे तरीके से कार्य हुआ है तथा अपने सुझाव भी देती थी।
इस उम्र में भी विदेश रहकर वहां पर हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु निरंतर कार्यरत रहना तथा सम्मेलन के कार्यों में अपने सुझाव देते रहना हम सब के लिए एक बहुत ही बड़ी प्रेरणा रही। आप को शत-शत नमन, वंदन। प्रभु आपकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करें तथा परिवार को इस दुःख को सहन करने का संबल प्रदान करें।
ओम शांति।
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द्वारा: डॉ. शोभा खंडेलवाल
सुशीला मोहनका जी की कनिष्ठ पुत्री
(अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, भुतपूर्व अध्यक्षा)
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मैं सुशीला मोहनका जी की कनिष्ठ पुत्री शोभा हूँ| मैं मानती हूँकि हमारी माँ एक असाधारण व्यक्तित्व वाली देवी स्वरूपा महिला थीं| उनका जन्म विजयदशमी के दिन हुआ था तथा उन्होंने शारीरिक रूप से हमारा साथ भी देव शयनी एकादशी जैसे शुभ दिन त्यागा।
उन्हें तपस्वी पुरुष श्री गौरीशंकर डालमिया जी और जन्म दात्री माता पन्ना देवी की पुत्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ| माता कर्पूरी देवी के सानिध्य में उनके संस्कार पल्लवित हुए| मेरे नाना गौरी शंकर जी डालमिया एक सच्चे समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे| उन्होंने इनमें सेवा भाव और कर्तव्य परायणता का बीजारोपण किया, जो कि शादी के बाद मेरे बाबूजी डॉक्टर महादेव चंद्र के सहयोग से पल्लवित हुआ।
माँ ने हमेशा हमें किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान भी दिया| माँ के समय में खासकर भारत ‘क बिहार राज्य में स्त्रियों से केवल बच्चा पैदा करने और घर संभालने की अपेक्षा की जाती थी| बहुत से परिवरों में लड़कियों को शिक्षा के लिये पाठशाला भी नहीं भेजते थे | उस वातावरण में पली और बड़ी हुई माँ की सोच पर हम तीनों बहनों को नाज है| उन्होंने मारवाड़ी समाज की महिलाओं को, महिलाओं का संगठन बनाकर समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़ने की सोच दी | वे संगठन का महत्व समझती थी| वो एक कर्म योगी थी| गीता के 18वे अध्याय के श्लोक नंबर 14 पर पूरा विश्वास रखती थी।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥14॥
श्लोक में बताया गया है कि प्रत्येक कर्म के संपन्न होने में पाँच कारणों का योगदान होता है वे पाँच कारण है स्थान जहाँ काम होता है, करता, भिन्न भिन्न प्रकार के साधन, प्रयत्न और और देव शक्ति जो मानव से परे है।
माँ ने हमें सिखाया की अपना काम सच्चे मन से, पूरी मेहनत से बिना परिणाम की आशा करते हुए करना चाहिए| उनके लिए पूरा समाज ही उनका परिवार था| उन्होंने परिवार के साथ साथ समाज को भी बाँधकर रखा| उनके जाने के बाद देश विदेश से बहुत लोगों ने मुझे कहा कि अब मुझे ‘रानी बेटा’ कहने वाला कोई नहीं है| सबको ऐसा लगता था कि मेरी माँ उसी व्यक्ति को सबसे ज्यादा प्यार करती हैं| वह बुराई में भी अच्छा ही सोचती थीं| मुझे ऐसा प्रतीत होता है ना केवल हम तीनों बहनों ने अपनी माँ को शारीरिक रूप से खोया है बल्कि समाज ने भी अपने मार्गदर्शक को खोया है| यहां मैं यह भी बताना चाहूँगी कि मेरी माँ बहुत भाग्यशाली हैं कि समाज ने उन्हें इतना प्यार दिया| यह माँ का अपना किया हुआ कर्म है की उनकी मृत्यु का समाचार विद्युत गति से पूरे समाज में फैला और देश विदेश से बच्चे, जवान और वरिष्ठ, सभी वर्गों के नागरिकों ने संपर्क कर हमें संवेदना प्रकट की।
माँ की आस्था रामायण में थी वह प्रतिदिन उसका पाठ करती थी|उनका जीवन बहुत नियमित था| वह प्रतिदिन सुबह में व्यायाम करती थी और अगर किसी कारण से नहीं कर पाती तो उसका दुख उन्हें पूरे दिन होता था| वह एक बहुत अच्छी मरीज थी| डॉक्टरों की सलाह को शत प्रतिशत मानती थी| मैं वरिष्ठ नागरिकों की डॉक्टरहूँ और मैं ऐसा मानती हूँ कि अगर मेरे मरीज माँ का 50% भी डॉक्टरों की सलाह माने तो उनकी आधी बीमारी तो दूर हो जाए| उनकी जैसा अनुपालन करने वाला मरीज ढूंढे नहीं मिलता है।
दहेज प्रथा और पर्दा प्रथा के विरोध में बाबूजी और माँ ने जमकर विरोध किया, और यह कार्य उन्होंने अपने परिवार से शुरू किया| यह एक बहुत बड़ी बात है और सब समाज सुधारकों के लिए यह एक उदाहरण है| माँ का मानना था कि हर व्यक्ति समाज की इकाई होता है और वह अगर अपने जीवन में परिवर्तन लाए तो पूरे समाज में परिवर्तन आएगा।
उन्होंने हमें सादा जीवन और उच्च विचार रखने की ही सीख दी| उन्होंने हमें सिखाया कि अपनी देखरेख के साथ-साथ हमें अपने परिवार, समाज, देश और पूरे संसार का ख्याल रखना चाहिए| वे ‘वसुदेव कुटुंबकम’ में सच्चा विश्वास रखती थीं।
जमाने के हिसाब से मेरी माँ बड़ी साहसी महिला थीं| कम उम्र में शादी के बाद भी साहस था कि संयुक्त परिवार में रहते हुए भी अपने ससुर जी से बात कर अपनी पढ़ाई का सपना पूरा कर सकें| जो कभी घर से बाहर नहीं निकली, वही कच्ची उम्र में घर से दूर इलाहाबाद जाकर छात्रावास में महादेवी वर्मा जी के संरक्षण में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की| अपने पिताजी के खादी पहनने के सपने को मारवाड़ी समाज के संयुक्त परिवार में रहने के बावजूद भी संपूर्ण जीवन पूरा किया यह उनके दृढ़ निश्चय की मिशाल है।
मुझे आश्चर्य होता है कि एक व्यक्ति में इतने सारे गुण कैसे हो सकते हैं? उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ शब्दों में कहना बहुत मुश्किल है| भगवान का लाख-लाख शुक्र है वे मेरी जन्म दात्री हैं| आज मैं जो कुछ भी हूं अपने माँ बाबूजी की बदौलत हूँ| ईश्वर से प्रार्थना है कि आप दोनों जहाँ भी हैं किसी न किसी रूप में मेरा मार्गदर्शन करते रहे| शत शत नमन।
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द्वारा : डॉ. शैल जैन
सुशीला मोहनका जी की बीच वाली पुत्री
(अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, भुतपूर्व अध्यक्षा)
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मैं शैल जैन मां सुशीला मोहनका की मंझली बेटी हूं. मां के बारे में बहुत लोगों ने लिखा और मैं काफी गौरवांतित महसूस करती हूं।
हम वास्तव में भाग्यशाली हैं कि हमें ऐसी माँ मिली। माँ तो हमेशा विशेष ही होती हैं लेकिन वह अद्वितीय (अद्भुत ) थीं। उनमें किसी भी उम्र और किसी भी वर्ग के व्यक्तियों के साथ गहराई से जुड़ने की क्षमता थी। यह क्षमता उनकी महान सहानुभूति से आया था। वह वास्तव में समझ सकती थीं कि लोग किस दौर से गुजर रहे हैं। वह सभी का स्वागत करती थीं और किसी भी संभव तरीके से मदद करने के लिए उत्सुक रहती थीं।
उनका सामुदायिक सेवा के प्रति विश्वास और लगन जिंदगी भर साथ रहा। फाउंडेशन उनके पैतृक गृह में हुई जहां वह पली-बढ़ीं और शादी के बाद ससुराल में ससुर और पति डॉक्टर महादेव चंद (मेरे पिताजी) के पूरे समर्थन के कारण हो पाया।
मेरे पिता के साथ मिलकर सामुदायिक सेवाओं में एक-दूसरे का समर्थन और बहुत व्यस्त होने के बावजूद उनके पास हमारे लिए हमेशा समय था। जब हम तीनों बहनें स्कूल में थे तो करीब 3:00 बजे घर आते थे और उसे समय रसोई में काम करने वाली कोई भी सहायता नहीं रहती थी। मां अपने हाथों से रोटियां और सब्जी बनाकर हम लोगों को परोसतीं थीं और बातें करती थीं। हम लोग अपने स्कूल के बारे में सारी बातें उनको बताते थे खुश होने पर अपनी खुशी जाहिर करते थे और नाराज होने पर अपनी नाराजगी। अब सोचती हूं मां ने किस तरह यह समय अपने बच्चों के साथ रखा था ताकि वें स्कूल में हुए वारदातों से अवगत हो सकें।
अपने बच्चों के साथ-साथ दामादों को भी संपूर्ण प्यार और आदर दिया और उनको भी बेटा बना लिया। आठों नाती/ नातनियाँ उनके दिल में बसते थे और उनकी और अपने नाना जी की बहुत इज़्ज़त करते थे। बारह बच्चों की बड़ी नानी /दादी थीं और उनको देखते ही उनकी आंखों में रोशनी चमक जाती थी। मेरा पोता जो सिर्फ 1 साल का है उसके लिए मां ने स्वेटर टोपी एवं मौजा का सेट बनाया और उसे पहनाया। मां की बहुत सी यादगार हैं और उनको शब्दों में लिखना कठिन है। जीवन के हर मोड़ पर अगर कठिनाइयां आयेगी और मैं ठीक से सोचूंगी की ऐसी अवस्था में मेरे मां पिताजी क्या करते? तो शायद उसका भी समाधान मुझे मिलेगा।
मैं और मेरे पति डॉक्टर थानमल जैन दोनों मदीना ओहायो कि रोटरी क्लब से जुड़े हैं। माँ मुझसे रोटरी क्लब और उसकी सेवाओं के बारे में बात करके हमेशा खुश होती थी। रोटरी लंबे समय तक उनके जीवन का हिस्सा रही। मेरे पिता एक सक्रिय रोटेरियन थे और उन्होंने लगभग 50 वर्षों तक कई वर्षों तक सक्रिय रोटेरियन के रूप में काम किया।
माँ, मैं वादा करता हूँ कि हम अपने परिवार और समुदाय के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगे जैसा कि आपने हमेशा हमें सिखाया और चाहा है।
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द्वारा : किरण एवं पवन खेतान
सुशीला मोहनका जी की बड़ी पुत्री और दमाद
(अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, अध्यक्षा)
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आप सभी का अभिनंदन। गीता के इस श्लोक पे माँ अपना जीवन जीती थी। आज माँ के जाने के बाद आभास हुआ कि वो मेरी जिंदगी में कितनी महत्वपूर्ण साथी थी? वे 29 जून 2023 को वैकुंठधाम चली गयी।
सारी जिंदगी वो मेरी प्रेरणास्रोत रही है। किंतु पिछले छह महीने से वे मुझे कहने लगी थी की मुझे क्या करना है उनके जाने के बाद। उनकी अथक परिश्रम के बावजूद भी। वे अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिती अपना काम पूरा नहीं कर पाई थी एवं इसकी उन्हें काफी तकलीफ थी। उन्होंने कोशिश की लेकिन उनकी कोशिश भी पूरी नही हो पायी।
मारवाड़ी महिला समिति से भी वे काफी प्रभावित थी। जब उन्होंने भारत में समिति शुरू की थी तब से अभी तक उसमें काफी बढ़ोतरी हुई है। भारत में हुई है, उसके साथ-साथ -अमेरिका में भी जो शाखाएं वो खोली थी, उस पर काफी काम हो रहा है। उनके मन में कभी भी किसी के लिए कोई मलाल नहीं था। उन्हें यही लगता था शायद मैं ही उन्हें ठीक से समझा नहीं पा रही हूँ।
काफी साल पहले जब अ.हि.स. नैश्नल में बात हुई एवं सभी परेशान थे कि भारत में हम लोग कैसे अपनी शाखा बढ़ा सकते हैं तो उन्होंने निर्णय लिया कि वे भारत शाखाएं ऐक्टिव बनाने के लिए काम करेंगे एवं उनकी सदस्यता बढ़ाएंगे। उन्होंने इतना बड़ा अभियान लिया और उसे पूरा भी किया। यह उनकी इतनी बड़ी साधना थी की अगर वे किसी काम को हाथ में ले लेती थी, तो उसे पूरा करने की पूरी कोशिश अवश्य करती थी। यही बात हम सबों को सिखाती थी।
मुझे याद आ रहा है की 25 वर्ष पहले मैं अपनी जिंदगी में थोड़ी निराश हो रही थी। मैंने माँ से कहा मैं अपने जीवन का संतुलन नहीं कर पा रही हूँ। जॉब का करती हूँ तो घर का काम छुट जाता है, समाज का काम करती हूँ तो जॉब का छूट जाता है और ये सब करती हूँ तो बच्चों के साथ समय नहीं बिता पाती हूँ। तब माँ कुछ देर सोचीऔर फिर बोली कि कल उत्तर दूंगी। दूसरे दिन माँ बोली कि एक हफ्ते सारे काम लिखो। फिर देखो दो-दो चार-चार मिनट कहाँ से निकाल सकती हो और कहाँ लगा सकती हो कि तुम्हे अपनी जिंदगी में थोड़ी संतुष्टि मिले। उसके बाद तुम्हें महीने दो महीने यही करना होगा तब तुम्हें अपने में संतुष्टि मिलेंगे और यही बात मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बनी और गीता का यह दोहा इसका प्रमाण है।
माँ का यह भी मनना था कि जब तक मेरा और इनका (पवन खेतान) दोनों का पहिया साथ नही चलेगा तब तक जिंदगी नही चलेगी। माँ और पिताजी दोनों ने मुझे और इनको (पवन जी) बहुत सम्मान दिया एवं अमेरिका में पवन जी को परिवार का इंजन कहा करते थे।
माँ को हम दोनों का बहुत-बहुत नमन।
किरण और पवन खेतान
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द्वारा : सुशीला मोहनका जी के नाती / नतनियाँ
लीना, मीता, अलका, आभा, सोनल, अंकुर, निधी, पराग
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Dr. Leena Khaitan (first grandchild of Sushila Mohanka)
Sushila Mohanka was my grandmother. Our family all stand together because of her. She planted the seed of family in our parents. They had choices to move to different places, but our parents chose to settle here in NE Ohio to keep all of cousins close. And it worked! We have grown up as brothers and sisters and can rely on each other anytime. What we r sharing represents all of us and a couple of us will have words to add
Nani and Nana picked my name, Leena, naming me after a female physician in Patna that they highly respected. They must have known I would be a surgeon some day!
Nani was a pillar of strength, wisdom and grace. She taught us to be strong women and that there are no limits. She believed women should be independent and self sustaining and that is how she brought us up. She had strong control of every situation and would guide the outcome without anyone knowing it. She did it all with kindness, never raised her voice. She spoke such beautiful Hindi and everything she said sounded like poetry.
She spent a lot of time with us growing up. I remember spending a summer in India where she arranged for singing and Khathak lessons for Alka and I. And all of us kids spent a summer in Utica with Shyam nana and with her where she taught us to read and write Hindi. She would share stories of her experiences and also tell many stories that had a moral like the stories of haldi paldi and satwa sot.
Nani was highly respected by everyone for her wise advice. She allowed us to be vulnerable but then said, “Rona dhona mai kya Faida, aage chal.’ And help talk through a path forward from any situation. She was practical and objective, and also even helped me recognize my own shortcomings, in a kind way.
A few facts about Nani: she had a bachelors in Hindi, nursing and rifle training, she rode horses bare back because she hated the gas smell of cars back then. Nani made the softest roti’s in the world and the best Khir. And she loved Kit Kats. She always had one for the kids. She had unconditional love and considered everyone in her community a part of her family.
She lived “service above self”. We miss her already. But we are her legacy. She lives in all of us and she was so proud of her family. Nani we love you and hope to carry on the strong values you instilled in all of us.
The world will miss her. Hopefully we can continue to shine her light through our actions as her posterity. She touched so many. We will always keep her in our hearts.
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Meeta Nosrati (granddaughter of Sushila Mohanka)
Thank you for the dedicated tribute in the September magazine in honor of my grandmother, Sushila Devi Mohanka.
Nani has positively impacted countless lives throughout her life and career of service for others. She has always been, and will continue to be an inspiration for her children, her grandchildren, and great grandchildren.
Her wisdom, patience, and unconditional love has guided all of us in our path of life and although she is no longer with us, we will continue to carry her with us every day of our lives. I feel so blessed to have had a role model like Nani in my life and will continue to try to make her proud of me with everything that I do.
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Dr. Alka Khaitan Shenolikar (granddaughter of Sushila Mohanka)
I am Srimati Sushila Mohanka’s Natni. It’s an honor and privilege to call her Nani. She was the pillar of our family, a warrior for women’s rights and an ambassador for Hindi language globally.
Nani started her activism in early childhood. As a young girl she accompanied her mother daily to visit every house in every gali in their village to see who was in need. She watched her mother listen to people's needs and challenges and then send grains, lentils and milk for anyone in need. I think these experiences helped shape Nani into an amazing listener with a never ending desire to help people.
I have so many sweet memories of Nani, and I’ll share a few from when she visited me in New York City and Indianapolis. These were precious times in which she shared her wisdom, laughter and childhood memories, and I personally witnessed her dedication to the causes she believed in, as she always continued her work.
In 2013, she visited me in New York City, and wanted to see the Gandhi statue in Union Square Park, which I had never seen after living there for 4 years. This was before Uber and we rode in a yellow taxi to see it and take a photo (shared here). We also booked a car service to go to Queens where she attended a dinner with the local IHA chapter. Last year she visited our family in Indianapolis, at age 89. Every morning she opened her computer and worked for at least two hours and often longer. As she always did, she reached out to the local IHA chapter and she met with the local IHA president at 10 PM! This shows her dedication to the organization. She firmly believed that teaching Hindi language to the next generation was the best way to preserve Indian culture globally and IHA is an important platform for this cause.
Nani’s image is etched in my memory with her starched white khadhi saris that she wore with pride and dignity every day. Her voice echoes within me. She was the most eloquent and uplifting orator I’ve ever known and always spoke with love, positivity and insightful wisdom. Nani’s spirit will forever be in our hearts.
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Dr. Abha Khandelwal (granddaughter of Sushila Mohanka)
I deeply miss my Nani and feel her absence frequently. She was the pillar of our family, a warrior for women’s rights and an ambassador for Hindi language globally. She represented relentless strength surrounded by grace and compassion. She inspired me to work for women’s rights in her shadows. She also taught my family about the importance of civil service and how one’s life must have meaning and contribute to the broader good for society. Further, I remember how many hours she spent with me working on the hindi correspondence course so I could get a certificate from the Indian government in Hindi.
She would tell me stories of when she was just a teen, and her father was away- how she looked after her younger siblings, and protected the underground printing press from the British. When I visited schools in India, they all spoke about how she protected the safety of children and women and enriched their community by protecting them from domestic violence.
I remember after my nana passed away unexpectedly everyone around her was a wreck, yet she remained strong for all of us. She advised me on my relationships, my work, and my spiritual health. Nani was one of the most social people I knew, she had to meet everyone wherever she went. So considered her community her family, and she gave and received love from so many people it was amazing to see. I miss her smell when I hugged her after doing pranaam- it was of khadhi and coconut oil.. It was so comforting. I would like to believe that some of her qualities live on in us and my children. My family aspires to carry her work forward, and in our lifetime to make her proud of us.
From :Sushila Mohanka’s great granddaughter Ilina: Badi nani told us the Ramayan stories and always made my day.
I miss her food like roti, pedha, and kheer. I look for her in the stars.
I can picture her on a computer editing the hindi magazine.
From Sushila Mohanka’s great grandson Milan: I loved bari nani; she used to tell me stories about indian itihas (history) because she was a big part of it. She made kheer for us every time we came to her house to visit her. We would always do pranam and touch her feet everytime we went back to our own home in California. I still think about the khadi clothes that she wore when I sleep.
She had several awards such as the one from mother teresa. She was a freedom fighter for India that everyone will remember, working in the shadows, and fighting for women's rights. I will never even come close to everything she has done for the good of India, the family, and frankly, the entire world. I hope that everything she has done will make good karma for her next life. She still walks in my dreams comforting me with whatever challenge I face, thank you bari nani.
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Ankur Khandelwal Groen (granddaughter of Sushila Mohanka)
Meri Nani Ma
I am so lucky to say that my Nani, Sushila Mohanka, helped raise me. From when I was a baby, she came from India for 6 months at a time and stayed with us or at my Mausi’s house just 1 mile away. I have warm memories of eating her naan, gup-chup, and nimbu ka aachar. She shared bedtime stories and taught me to crochet. She also taught me the importance of service to your community. Nani Ma was so disciplined in how she took care of herself and did her work. I hope that I can emulate even a fraction of that. Nani was also constantly learning. When I was in high school, her and Nana ji enrolled themselves at Akron University. It was amazing to see them studying and learning how to use a computer.
She was such an incredible grandmother to me that at times I would forget she gave this same love to her community. At the Marwari picnic this year, I was reminded that so many others felt she was like a grandmother for them too. She never stopped thinking about how to make things better. I was blessed that when I became a mom she taught me how to massage my kids. She would tell them the same stories I heard as a baby and sing them beautiful songs to calm them down. When she came to visit, she introduced me to new people who eventually taught my kids Hindi and classical Hindi music. She never let me feel like she was too busy for me, even if she had an IHA deadline. She has left the world a better place, and I hope I can follow in her footsteps.
Since I can remember, Nani would always be teaching us lessons. Even the birthday cards she wrote to me always had new Hindi vocab words. When I asked her once why she uses such tough Hindi words, she responded simply - “So that you can learn them.” I can hear her lessons and advice still sounding in my ears. I can feel her soft hands in my hands. In what would be my last visit with Nani this summer I told her I didn’t want to go back on my flight to California. “Mera mann nehi maan raha hai.” Even in that last meeting, she left me with a nugget of wisdom. She said, “Beta, mann ko kabu mein rakhana chaihiye.” You should have control over your mind, not let your mind control you. Nani Ma was an endless fountain of wisdom and strength, and I am so proud to be her granddaughter. When I feel sad, I remind myself that my Nani and Nana are together again.
From ; Sushila Mohanka’s great grandson Mihir My name is Mihir, I am Sushila Mohanka’s great grandson. I loved Bari Nani because she got me into a Hindi class which used to be my favorite thing. She also got me into music classes. She also told me the best stories about Hindi mythology. Finally, she gave me tic-tacs and kit kats whenever my mom wasn’t looking! As you can see, there are many reasons why I love Bari Nani. I’ll miss her calm presence in Medina. I will always love her.
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Dr. Sonal Jain (grandson of Sushila Mohanka)
Our Nani Ji was a powerful and brilliant woman whose impact and legacy on will continue on for years to come. But she was also a truly wonderful grandmother. She always made time for us - whether it was cooking the naan and chole we loved so much or helping us with Hindi lessons. She often knew when we were struggling or when we were down, and without needing to understand the specifics of our struggles she could offer profound guidance with just a few powerful words. She loved all of us deeply. She was a constant presence in our lives and it’s hard to think she’s gone. Nani Ji, we love you and we miss you dearly.
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Parag Khandelwal (grandson of Sushila Mohanka)
Nani was a critical person in my life, someone who raised me and taught me so much. A day doesn’t go by without me thinking about her. I miss her a lot, and she comes to mind every time I think about home, or I utilize one of the many life lessons she taught me. I strive to be able to live up to her morals and principles, following everything she showed me. It will be impossible because she was such a kindred soul and prolific community leader. I love her so much and she lives on in my heart and daily actions, where I try to honor her every day.
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द्वारा : अन्य परिवार और उत्तरपूर्व ओहायो समाज
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Sachin, Bhavika and Mrinalini, USA
This picture is from July 2018, I moved to Ohio from India and I cant even express the feeling when I first met Naani, she told me ' बेटा मैं तेरी नानी ही हूं, ऐसा मत समझना की तू अकेली है, हम सब एक परिवार है बेटा ।
She taught me so many things about life in these last five years, I feel proud to know such strong and independent woman who inspired me everyday, she taught me how to perfectly right an email, how to live and adjust in a family,
she would always say to me the saying I just read in obituary 'बेटा परिवार को साथ में लेके चलना चाहिए, she gave me immense strength and support when I was about to give birth to my first child and there are so many things and experiences like that. I felt extremely happy and proud to share my birthday with Naani, 28th Sep. We used to wish same to you to each other on that day.
We really will gonna miss her.
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Indira, Puran, Ankush Khandelwal (Nottingham, UK)
Naniji our deepest Regards to you on your way to the final journey
We feel so blessed that we had the opportunity to meet you, face to face.
That one meeting was enough to leave such motivating positive impact on our minds It was amazing to see your energy and drive. Age did not have limits there.
You leave as a proud mother, grandmother and great grandmother and Aunty and dadiji to so many and as Naniji to us You shall always be in our hearts and hope we can follow your motto of selfless commitment to the family, community and to all those who came in contact with you.
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Sumit Mohanka
Our deepest condolences. May god give us strength to bear this loss. Grand ma was a source of inspiration for all of us. She was a pillar not only for her family, but also her wider community who touched so many people.
We are so sorry for your loss of mother. Our family will miss her too.
She will always be in our heart forever. Praying to almighty to let her rest in peace
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Anup Kanodia and Rupal Shah
Sushila Dadiji was the grandmother that Anup grew up around always close, ready to provide guidance, and nurturing. Anup remembers learning so much from her. She ensured children and the next generation knew about their roots, culture, and where they came from. She was great at building communities.
Therefore, because of her efforts our families here always had a large network of supporters. We now, have a strong and deep sense of community, and that's because of her.
We are grateful for her presence for many reasons but for our parents, Puru and Sudha, Dadaji and Dadiji were also the matchmakers. Without them, we truly wouldn't be here.
Anup is very blessed to have had her love and ever since I joined the family, I have felt nothing but immense love from her. When we think of Sushila DadiJi, two words come to mind, courage and grace. She embodied both.
She was a woman who certainly will be remembered for her many beautiful qualities. Anup and I are blessed by her (and Dadaji's) unconditional love. We pray for her soul to rest in eternal peace. And as we remember her today, we will (try to) smile as we think of her graceful and truly, beautiful spirit.
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Jyoti Singh, USA
नानीजी दयालु और सुंदर चेहरे वाली एक शख्सियत थीं। वह हमेशा बेहद सादगी से सफेद खादी की साड़ियां पहनती थीं। उसके चेहरे पर दयाभाव और शांति रहती थी और वह जिन लोगों से भी मिलती थी, उनके लिए उसके पास हमेशा ज्ञान भरे शब्द होते थे, चाहे वह वयस्क हो या बच्चा।
मुझे नानीजी के साथ रहने का अवसर तब मिला जब मैं एक्रन विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी और वह कंप्यूटर कौशल पाठ्यक्रम ले रही थी। वह ऐसा इसलिए कर रही थी ताकि वह उन सामाजिक कार्य संगठनों की बेहतर सेवा कर सके जिनसे वह जुड़ी हुई थी। उनका अभियान न केवल जिज्ञासा से बल्कि समाज की सेवा से भी प्रेरित था। उन्हें अपना बैग पैक कर के, अपनी छड़ी लेकर कक्षाओं में भाग लेने के लिए दरवाजे से बाहर निकलते हुए देखना प्रेरणादायक था। उस समय उनकी उम्र लगभग 65 वर्ष थी लेकिन सीखने की उनकी इच्छा एक युवा छात्रा की तरह थी। इस दौरान उन्हें अपने आपको अंग्रेजी भाषा कौशल को बेहतर बनाने के लिए पाठ्यक्रमों में भी नामांकित किया था। यह सारी सीख उस समाज की भाषा बोलने में सक्षम होने की उनकी इच्छा से प्रेरित थी जिसमें वह रह रही थी।
नानीजी पारंपरिक मूल्यों को मनाती थी लेकिन आधुनिक अंदाज के साथ। इस वक्त उनके घर में हम तीन लोग रहते थे, नानाजी, वह और मैं और हम तीनों में से वह सबसे अच्छी रसोइया थीं, लेकिन उन्होंने फिर भी इस बात पर ज़ोर दिया कि हम बारी-बारी से खाना पकाएँ। मुझे लगता है कि उन्होंने मुझमें अनुशासन लाने और स्वस्थ भोजन का महत्व सिखाने के लिए ऐसा किया। मैं जो कुछ भी पकती थी, वह उसे खा लेती थी, भले ही उसका स्वाद अच्छा न हो और वह हमेशा प्रोत्साहित करती रहती थी। वह खाना पकाने पर उतना ही जोर देती थी जितना वह मेरी पढ़ाई पर और मेरे खुद को अभिव्यक्त करने के महत्व पर। वह महिलाओं के चहुमुखी विकास में विश्वास करती थीं लेकिन महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए उनका विचार परिवार से अलग हो कर नहीं था वह हमेशा परिवार को साथ ले कर चलने की बात करती थी।
वह वास्तव में जानती थी कि परंपरा और आधुनिकता को कम से कम संघर्ष के साथ कैसे संतुलित किया जाए।
उनका निधन एक युग का अंत है, लेकिन वह न केवल अपने परिवार में बल्कि उन महिलाओं के समाज के एक बड़े हिस्से में भी मूल्यों, परंपराओं और प्रेम को पीछे छोड़ गई हैं जिनके लिए उन्होंने काम किया था। नानीजी हम आपको हमेशा हमारे दिलों में संजोए रहेंगे और आशा करते हैं कि हमें हमेशा आपके मूल्यों को जीने का साहस मिलेगा।
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सरोज बजाज
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, हैदराबाद, भारत
श्रद्धांजलि
आदरणीय सुशीला दीदी के निधन का समाचार सुनकर मेरा ह्रदय विदीर्ण हो गया। सुशीला दीदी शांत, कर्मयोगी, दूरदर्शी, निष्ठावान, संवदेनशील, विलक्षण प्रतिभा संपन्न एवं समर्पित व्यक्तित्व की धनी थी। भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठावान, सहयोग,त्याग ,ममता ,करुणा की प्रतिमूर्ति और अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन को एक नई दिशा देकर ,आलोकित करने वाली ज्योति पुंज थी । मेरी बडी बहन , मार्गदर्शक , प्रेरणास्त्रोत और प्रेम का सागर थी ।
मैं उनसे समाज की, परिवार की कई बातें साझा किया करती थी। बदले में वैसा ही प्यार, दुलार उनसे पाती थी। जब भी मैं अमेरिका जाती थी तब उनका स्नेह अवश्य मिलता था।डेढ़ महीने पहले ही मेरी उनसे भेंट हुई , पर मैं ये नहीं जानती थी की उनका यही आशीर्वाद मेरे लिए अंतिम होगा। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति एवं हम सबको और परिवार जनों को दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करे। ॐ शांति।
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रमेश जोशी
प्रधान सम्पादक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
मुझे कोई छोटी या बड़ी सहोदरा नहीं है लेकिन 2000 और विशेषरूप से 2012 में विश्वा का संपादन संभालने के बाद मुझे उनसे बड़ी बहिन का जो स्नेह और मार्गदर्शन मिला वह मेरे लिए एक नया और रोमांचक अनुभव था। मैं उसे 'मिस' करूंगा ।
लेकिन साथ ही यह भी सच है कि हम अपने भौतिक अतीत से पूरी तरह मुक्त कहाँ हो पाते हैं ? अच्छा है, मैं अपने इस अतीत से पूरी तरह मुक्त होना भी नहीं चाहता ।
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डॉ. डी. के. उपाध्याय
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
President IHA Houston ( ex) Houston Texas
I used to call her Bua ji , she was totally committed to Hindi bhasha ki growth in this country and every where.she has devoted her whole life for this reason and so her whole family , IHA LOST A REAL DIMOND TODAY ,she was an awesome person and will always be in our memories in whole IHA .
Om shanti om
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Jayant Dugar, Bharat
Respected Kiran Ji, Shail Ji & Shobha Ji,
Pranam.
Whenever I wanted to pen down something for naniji I always got emotional and was not able to express my emotions. But no day could be as auspicious as her birthday. It's been five years since I've been knowing her. She was a person full of motivation and inspiration. I was always amazed to see her curiosity for learning new things that too with so much patience specially at her age.
Every day as the clock struck 8:30 P.M. (IST). I do remember her as it was time when we sat for our work. And I do remember how she used to remain low if we missed our work even a single day. She used to say that 'beta ji aapke saath kaam karti hoon to thik ho jati hu.' Her dedication to her work always kept me motivated to work hard.
Although we had a professional relationship, she made me feel that I am a part of her family. When I started working with her, I addressed her as Ma'am, as we generally used to do. But the very next day she said 'Ma'am ma'am nahi bolo mein tumhari naani hu, naani bolo'. And that day I got a Naani.
I can proudly say that I came across a 'SUPER WOMAN' in my life and that is none other than my Naaniji 'Smt. Sushila Mohanka'. She made a special corner in my heart and will always be there in my prayers.
Wishing a very happy birthday to the most beautiful and kind soul in heavenly abode.
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अलका खंडेलवाल
“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
सुशीला बुआजी कर्मठ, कर्तव्य परायण व्यक्तित्व वाली समाजसेवी महिला थीं| वे छोटे हों या बड़े सबके लिए प्यार का भाव रखती थीं| उनकी डाँट में भी अपनेपन का एहसास होता था| कुछ वर्षों से मैं उन्हें मारवाड़ी सम्मलेन और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के कार्यों में मदद कर रही थी| कई बार उनकी कंप्यूटर की जानकारी देख मैं स्तब्ध हो जाती थी| किसी भी अड़चन आने पर तुरंत उनका दिमाग चलता था कि इससे कैसे बाहर निकला जा सकता है और वो बिना हिम्मत हारे अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य की प्राप्ति में जुट जाती थीं और सफल भी होती थीं।
उनके कंप्यूटर पर दसियों सालों के हर संस्था के documents बहुत ही व्यवस्थित ढंग से store होते थे। किसी नए व्यक्ति को भी हर information आसानी से मिल सकती थी| किसी भी आयोजन की रिपोर्ट हो, उसका लेखा जोखा हो या उससे सम्बन्धित किसी भी प्रकार का दस्तावेज हो वे पूर्णता के साथ करती थीं| हर छोटी से छोटी बात को भी कभी नज़र अंदाज़ नहीं करती थीं।
वे घर हो या समाज सभी को जोड़ कर और परिवार की तरह मानती थीं| ‘वासुधैव कुटुम्बकम’ उनके ऊपर पूरी तरह चरितार्थ होता था।
वे हर किसी के हुनर, कौशल को पहचानते हुए उसकी क्षमता अनुसार उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहती थीं| अंतिम समय तक भी वे अपने कार्यों में जुटी रहीं और उनकी कोशिश रही की समाज का कार्य जो उनके जिम्मे है किसी तरह वे उसे पूरा कर सके। मेरी उनसे निकटता जब मैं अमेरिका आई, २०-२५ वर्षों से थी और इस दौरान उनके सानिध्य में मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है।
बुआजी को भाव भीनी श्रद्धांजलि और शत शत नमन।
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अंजू सरावगी
निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष 2024 26
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
सम्मेलन की संस्थापिका एवं द्वितीय राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशीला मोहनका मौसी जी को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। मेरा यह सौभाग्य रहा कि उनसे जालना में मैं मिल सकी। उम्र के उस पड़ाव पर उनकी कार्यशैली- क्षमता एवं स्फूर्ति को करीब से देखा, उनका आधुनिक तकनीक से जुड़ाव - लैपटॉप पर उनको काम करते हुए देखना -उनकी प्रतिबद्धता- एक प्रेरणादायक अविस्मरणीय उदाहरण है।
उनकी मीठी वाणी रानी रानी अपने लिए सुनना -दिल की गहराई को छू गया। सुशीला मौसी जी अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन जगत की एक ऐसी मिसाल हैं जिनके द्वारा प्रज्वलित की गई मशाल हम बहनों को निरंतर रोशनी दिखाती रहेगी।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें एवं परिवार को यह दुख सहने की शक्ति दें।
ॐ शांति
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राकेश कुमार
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति-इंडियाना
आदरणीय सुशीला जी की खबर से मुझे और समस्त हिन्दी परिवार गहरा दुःख हुआ है। हमारी प्रार्थनाएं आदरणीय सुशीला जी के परिवार के साथ हैं। भगवान उन्हें शाश्वत शांति प्रदान करें, और उनके परिवार को इस अपूरणीय क्षति और कठिन समय से गुजर ने के लिए साहस दें।
सुशीला जी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति परिवार के लिए एक मजबूत स्तंभ थीं और ८९ की उम्र में आखिरी सांस तक हिन्दी की सेवा में लगी रहीं। ऐसे व्यक्तित्व को कोटि कोटि नमन।
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अनिल एवं अनीता गुप्ता
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति- इंडियानापोलिस
बोहोत बहुत दुख हुआ है आदरणीय सुशीला जी के बारे में उनसे मेरी बात हुई उन्होंने मुझे ख़ुद फ़ोन किया मेरे से और अनीता है से बात किया कि हिंदी को आगे बढ़ाओ और विश्वl हिंदी पत्रिका में आप अपने लेख भेजे उनकी उम्र को देखते हुए उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि मैं क्या नहीं कर सकती हूँ उन्होंने हमेशा अग्रसर होते हुए हिंदी को बढ़ाने के लिए हर प्रयास अपने जीवन की हर साँस तक उन्होंने प्रयत्न किया यहाँ तक की हिंदी अधिवेशन इंडियाना में जुलाई 29 को हो रहा है उसमें भी उनकी प्रमुख भूमिका रही अभी तक । उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षमता हिंदी को बढ़ाने का हरसंभव प्रयास किया है हम उनके हमेशा आभारी रहेंगे ।ईश्वर करे उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे यही इतना बड़ा दुख है और इतनी बड़ी हानी है कि जिसको शब्दों में बयान नहीं कर सकते हैं आदरणीय सुशीला जी ने विश्वापत्रिका समय पर निकालने के लिए जी जान से इतने सालों से भागीरथी प्रयत्न करते रही है आज वो स्थान उनके बिना रिक्त हो हुआ है लेकिन उनकी यादें उनके कार्य हमेशा हमेशा हम सभी लोग याद करते रहेंगे उन्होंने एक अविस्मरणीय छवि हमारे हृदय में हमेशा रहेगी
ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनके मार्गदर्शन से और लोग हिन्दी को बढ़ाने के लिए जुड़े हैं यही उनके लिए यही उनके दिल के लिए श्रद्धांजली होगी भगवान ने उनके सभी समर्थकों वह परिवार के सदस्य को इस दुख सहने की शक्ति दें जय श्रीराम।
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माया सिंघल, मध्य प्रदेश प्रांत
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
मध्य प्रदेश प्रांत की ओर से श्रद्धांजलि। आदरणीय सुशीला जी मोहनका हमारे मारवाड़ी सम्मेलन की संस्थापिका मजबूत स्तंभ थी आज मारवाडी महिलाओं को इतना आगे लाने का सारा प्रयास सुशीला जी का ही था उन्होंने घूम घूम कर सब जगह महिलाओं को जागरूक करके पटना में पहला अधिवेशन किया था वहीं से महिला सम्मेलन की इंडिया में शुरुआत हुई जो कि आज महिलाओं की बहुत बड़ी संस्था बन गई है।
ऐसी महान मार्गदर्शिका प्रेरणा स्रोत बाई से मिलने का अवसर हमें जमशेदपुर उज्जैन पटना राष्ट्रीय अधिवेशन में मिला बहुत ही मीठा और इतनी अच्छी मारवाड़ी बोलती थी ऐसा लगता था उन्हें सुनते ही रहो ।हम सब आपके विचारों और मार्गदर्शन दर्शन पर हमेशा अग्रसर रहेंगे।
पटना राष्ट्रीय अधिवेशन में सुशीला जी का आशीर्वाद मध्य प्रदेश की बहने को मिला।
चंदा जी दधीच कविता द्वारा श्रद्धांजलि, रतलाम शाखा, इंदौर पश्चिम शाखा, भाग्यलक्ष्मी नागदा शाखा, छनेरा शाखा सीहोर शाखा, देवास शाखा, शिवपुरी शाखा, खिड़कियां शाखा द्वारा श्रद्धांजलि दी गई । सम्मेलन के सभी सदस्यों का कर्तव्य है कि हम सब सम्मेलन को और ऊंचाइयों पर ले जाएं एक नई दिशा दें उसका यश बढ़ाएं, कीर्ति फैलाएं यही हमारी बाई को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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सुशीला मोहनका को श्रद्धांजलि देवघर में
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अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
सुशीला फरमानिया
नेत्र,अंग, देह,रक्तदान प्रमुख
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“श्रीमती सुशीला मोहनका को समर्पित श्रद्धांजलि की कवितायेँ”
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“श्रद्धांजलि अर्पित करतीं हूँ”
द्वारा : किरण अग्रवाल, प्रतापगढ,
यू. पी. प्रदेश अध्यक्ष, अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
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सुशीला मोहनका
श्रद्धांजलि अर्पित करतीं हूँ
मै बड़ी बहन सुशीला जी को
मिथ्या जग को त्याग दिया और
भ्रमण कर रहीं स्वर्ग लोक में
जन्म हुआ था 1933 में
बिहार के जैसिडी में
पिता थे गौरीशंकर डालमिया जी
समाज सेवा की आधारशिला
बाई भी पिता की तरह ही
र्कत्तव्य परायण और र्कमठ थीं
जीवन भर खादी पहनीं
सादा जीवन उच्च विचार रक्खा
शादी हुईं डा महादेव चांद जी से
वो भी थे समाज सुधारक
फिर क्या था बाई के जीवन की
चाहत सारी पूर्ण हो गई
जो भी चाहा वो ही पाया
1983 में मारवाड़ी महिला समिति की
दीदी ने बुनियाद रक्खी
तन मन और धन किया समर्पित
महिलाओं का उत्थान किया
नारी को ससक्त बनाया
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तीन पुत्रीया है दीदी की
बड़ी बेटी का नाम किरन है
हीरो का शोरूम है इनका
किरन दीदी संभालती है
उससे छोटी शैल दीदी है
बहुत ही प्रसिद्ध डाक्टर हैं
सबसे छोटी शोभा भाभी है
वो भी बहुत बड़ी डाक्टर हैं
आप सोच रहे हौगे की मैंने
भाभी कैसे लिख दिया
वो मेरी जिठानी भी है
किन्तु बहुत ही प्यारी प्यारी है
भरा पुरा परिवार है सुशीला बाई का
आज वेवश और लाचार हो गया
माँ का हाथ सिर से हट जाये
इसकी व्यथा को कैसे लिखूँ
बाई को लाखों श्रद्धांजलि अर्पित करतीं हूँ मैं
नम आँखों से नमन कर रहीं
किरण अग्रवाल
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*पंच तत्वों से बने इस शरीर को,*
द्वारा : माया सिंघल, मध्य प्रदेश अध्यक्ष
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन, मध्यप्रदेश, पश्चिम इंदौर
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*पंच तत्वों से बने इस शरीर को,*
*पंच तत्वों में ही है विलीन हो जाना,*
*मगर जीवन की इस सच्चाई को*
*बड़ा ही कठीन है स्वीकार कर पाना*
*आपके निधन पर*
*भावभीनी श्रद्धांजलि।*
*ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे।*
*हालांकि कोई भी शब्द*
*दुःख को कम नहीं कर सकता*
*लेकिन यह जान लें कि हम हर*
*विचार और प्रार्थना,*
*में उनके बहुत करीब हैं*।*
*ॐ शांति*
*माना अच्छे लोग इस दुनिया से*
*जल्दी चले जाते हैं,*
*मगर पीछे अपनी*
*यादों का खजाना छोड़ जाते हैं।*
*आपका जाना हम सबके लिए*
*बेहद दुखद है*,
*ईश्वर आपके परिवार को*
*इस दुःख की घड़ी में शक्ति दें।*
*दुःख कितना भी बड़ा क्यों ना हो*
*धैर्य और संतुलन रखनेसे*
*वक्त के साथ जख्म तो भर जायेंगे,*
*मगर जो बिछड़े सफर जिन्दगी में*
*फिर ना कभी लौट कर आयेंगे !*
*अच्छे लोग दिलों में इस*
*तरह उतर जाते हैं,*
*कि मरने के बाद भी*
*अमर हो जाते हैं*….
*ईश्वर की इच्छा के सामने*
*इंसान बेबस होता हैं* *आपका साथ अवश्य छूट गया हैं,*
*आप हमारे दिलों में हमेशा ही*
*एक अच्छी याद बनके रहोगे।*
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“आपके जाने से मेरा ये घर, शहर ये मंदिर वीरान हो गया”
द्वारा : श्री अनुराग गुप्ता, क्लीवलैंड,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
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“आपके जाने से मेरा ये घर, शहर ये मंदिर वीरान हो गया”
नहीं आप क्या गई, यहाँ का हर कोई शक्श हैरान हो गया,
आपके जाने से मेरा ये घर, शहर ये मंदिर वीरान हो गया
आप क्या गई, इतने बड़े कुनबे का मिलन इस दौरान हो गया,
आपकी साथ रखने की सीख से एक ही परिवार में अब गीता और कुरान हो गया !
आप विदुषी, नाम से शुरू करता हूँ, सुशीलता और प्रिय मोहन,
आप मानुषी, स्वभाव भी नामानुसार और दया और शालीनता का सम्मोहन,
आज आसमां भी इंद्रधनुषी, छोड़ चुकी हो आप ये धरा और चली बैकुंठ की ओर,
प्रार्थना है हमारी, आपके किये पुण्य कर्म ले जायेंगे गौरी और आपके महादेव की ओर !
आप क्या गई, यहाँ का हर कोई शक्श हैरान हो गया,
आपके जाने से मेरा ये घर, शहर ये मंदिर वीरान हो गया
सादगी आपका आभूषण, हिन्द की सभ्यता और संस्कार आपकी किरण,
सत्कर्म आपकी शोभा, परोपकार सी शैली, और हिंदी के लिए जीवन मरण,
भारत की आजादी की गवाही, और गाँधी और खादी की रही आप अनुनादी,
संयुक्त परिवार की आप करती पैरवी, सोच रही आपकी हमेशा आधुनिकतावादी,
आपको विनम्र श्रद्धांजलि, आपकी बातें और सुनाये हुए प्रेरक प्रसंग बहुत याद आएंगे,
माँ और दादी जैसा दुलार, कल तक का वो साथ, वो सफर हम सब भुला नहीं पाएंगे,
आपके दशकों के प्रयासों से हिंदी की ये अद्भुत विरासत, निष्प्राण से प्राण हो गई,
परिवार को साथ लेके चलने की सीख से अब घर घर में गीता और क़ुरान हो गई !
आप क्या गई, यहाँ का हर कोई शक्श हैरान हो गया,
आपके जाने से मेरा ये घर, शहर ये मंदिर वीरान हो गया !
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“क्या कहा? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई??”
द्वारा : श्री गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर, म.प्र.
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“ क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई?? ”
क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई
जिसने हिन्दी की सेवा से भाषा परिवार सँवारा था।
जिसने वीणा का बार - बार हर टूटा तार सुधारा था।
जिसने संकल्पों के बल पर धरती पर स्वर्ग उतारा था,
वह महीयशी बिखरा - बिखरा परिवार जोड़ कर चली गई।
क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई??
जिसकी कल - कल सुन जल भरते हर भाण्ड बोलने लगता था।
जल वेद विभूषित शब्दों का रस काण्ड खोलने लगता था।
जिसके तट पर नर्तन करता ब्रह्माण्ड डोलने लगता था।
वह सरस नदी सी अग्रगम्य निज धार मोड़ कर चली गई??
क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई??
वह सूर्य सुता सी दिव्य तेज की पुंज प्रभा खो गई कहीं।
शालीन सुशीला मोहनका को नींद लगी सो गई कहीं,
आमरण जागरण की बातें करने वाली तो गई कहीं।
सेवा बन्धन से बँधी आज हर बन्ध तोड़ कर चली गई।।
क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई??
इस युग की भक्तिरता शबरी जो बेर बीनकर लाती थी।
अपनी साहित्य साधना से बेटों को रोज खिलाती थी।
हो मगन गगन को देख - देख जो धरती पर इठलाती थी,
वह अनायास कंचन काया का कलश फोड़ कर चली गई।
क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई??
जो कहीं नहीं जा सकती है उसको प्रणाम करता हूँ मैं।
उस महाप्रयाणी आत्मा को मन से प्रणाम करता हूँ मैं।
जिसका कृतित्व यशकाय यहीं उसको प्रणाम करता हूँ मैं।
हाँ लगता है हम सबको यह वह मन मरोड़ कर चली गई।
क्या कहा ? सुशीला मोहनका संसार छोड़ कर चली गई??
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“मुंह मोड़ गए, क्यों छोड़ गए साथ यू परिजनों का?”
द्वारा : श्रीमती अरुणा जैन, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष,
रामगढ़ झारखंड, अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
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“ मुंह मोड़ गए, क्यों छोड़ गए साथ यू परिजनों का ? ”
मुंह मोड़ गए, क्यों छोड़ गए साथ यू परिजनों का,
सारे बंधन तोड़ गए क्या ख्याल ना आया अपनों का .
क्यों हमें अचानक छोड़ गए, हम दर्द कहे किससे अपना,
ताबीर भी जिसकी बनी नहीं वह टूट गया सुंदर सपना."
सच में कहने को कुछ नहीं रह गया है .
समझ में नहीं आ रहा कि इतने बड़े हादसे पर सांत्वना के शब्द कैसे लिखें, कितना क्रूर होता है काल,कितनी पीड़ादायक होती है विधि की विडंबना.
आंखों के सामने वह ममतामई चेहरा बार-बार आ रहा है,उनकी प्रेरणा से ही आज अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन ऊंचाई के बुलंदी पर पहुंचा है .
आदरणीय बाई का अचानक हमारे बीच से चले जाना जब हमें इतना दुख पहुंचा रहा है तो उनके परिवार का दर्द कितना असहनीय होगा .
आदरणीय जया जी एवं उनके परिवार के सभी सदस्यों पर जो दुख का पहाड़ टूट पड़ा है,ऐसे में धीरज की लाठी से ही इस वक्त की पगडंडी पर चलना होगा.
परमात्मा आदरणीय बाई की आत्मा को चिर शांति प्रदान करें एवं देवलोक में देवों सा सम्मान उन्हें मिले यही हम सभी की तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं
ओम शांति ओम
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“अनगिनत थी आपके जीवन काल की उपलब्धियाँ”
द्वारा : अनिता नि : शब्द, राष्ट्रीय पर्यावरण सखी
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
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आदरणीय सुशीला जी
अनगिनत थी आपके जीवनकाल की उपलब्धियाँ,
व्यापक रहा है आपकाकार्यक्षेत्र
और कार्य क्षेत्रों में भी थीविविधता,
अनेक संस्थानों द्वारा हुईं सम्मानित,
नारियों के उत्थान मेंकिया जीवन समर्पित,
हर समितियाँ आपके कार्यों सेहोती रहीं प्रेरित,
हमेशा आप हम सबोंको करती रहीं उत्साहित,
क्षितिज की ऊँचाइयों परपहुँचाई है,
आपने इस सम्मेलन कीप्रतिष्ठा,
अपने कार्यों के प्रति आपकीकर्तव्यनिष्ठा,
हम सभी हैं साक्षीऔर मूक द्रष्टा,
मदर टेरेसा द्वारा मिला महिला रत्नपुरस्कार,
लगा मानो हम सभीनारियों को मिला हैये उपहार,
आपका जीवन हम सबोंके लिए है एकउदाहरण,
सम्पूर्ण जीवन आपने खादीको ही किया धारण,
आपके कार्यों की फ़ेहरिस्त नहींहै साधारण,
मारवाड़ी महिलाओं को पहनाया हैआपने
एक प्रगतिशील आवरण,
अमेरिका में भी कियासम्मेलन और हिंदी काप्रचार प्रसार,
हमें हमेशा मिलता रहा आपका मार्गदर्शनऔर प्यार ।
कभी नहीं भुला सकतेआपका समाज के प्रतियोगदान,
हमारे कार्यों में, हर संस्थामें आपका होता रहेगागुणगान ।
माना आप हमारे मध्यनहीं हैं,
पर आपके द्वारा निर्देशितपथ ही तो हैसंस्थाओं की जान ।
आपकी सुनहरी यादों को दिल मेंबसाये हुए
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“आपके द्वारा रोपित पौधा सघन वृक्ष में परिवर्तित”
द्वारा : अपर्णा पोद्दार, प्रान्तीय सहसचिव
अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन
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आपके द्वारा रोपित पौधा सघन वृक्ष में परिवर्तित
उसकी छांव तले नारी एक शक्ति बन हुई गर्वित।
प्रेरणा सबकी शीतल मन्द बयार-सी मुस्कान न्यारी
नम आँखों से विदाई भावभीनी श्रद्धांजलि हमारी।
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श्रीमती सुशीला मोहनका की जीवन की छोटी- छोटी यादें / कहानियाँ
संकलित द्वारा : डॉ शैल जैन
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1 ) बचपन में घोड़े का प्यार
मैं बहुत छोटी थी करीब 9 -10 साल की। बाबूजी ने सोनपुर मेले से एक घोड़ी लाई। घोड़ी सजी थी और उसका कोचवान था अब्दुल। मैं और मेरा भाई गोविन्द उसपर बैठ कर घुड़सवारी करते थे और गर्मी की छुट्टियों में देवघर जाते थे। मेरी छोटी माँ अपने हाथ से घोड़े के लिये रोज एक बड़ी रोटी, घी के साथ बनाती थी और घोड़ा उसे प्रेम से खता था। घोड़ा हमलोगों का बहुत ध्यान रखता था। जब हम दोनों उसपर बैठते थे तो वो धीरे धीरे चलता था और जब बड़े लोग बैठते तो कस कर भागता था। कभी कभी रेल गाड़ी से रेस भी होती थी।
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2 ) जापान का बॉम्ब कोलकत्ता पर
1942 -1943 के बीच द्वितीय विश्व संग्राम (world war 2 ) में जापान के द्वारा कलकत्ता में बॉम्बिंग हुई। मैं तीसरी वर्ग में थी और अपने क्लास में प्रथम स्थान पायी सो बहुत खुश थी कि दुसरे दिन स्कूल के वार्षिक समारोह में मुझे पुरस्कार मिलेगा। उसी रात शहर में हल्ला हुआ कि कलकत्ता में बॉम्बिंग होने वाली है। हम सभी, पूरा परिवार कलकत्ता का घर छोड़कर समान सहित जसीडीह के लिये रवाना हो गये। शहर से काफी लोग बाहर जा रहे थे।
दूसरे दिन से ही कलकत्ता में बॉम्ब गिरने लगे। ट्रैन में लोग बिना समान लिये ही भागने लगे। कलकत्ता से निकली जो भी रेलगाड़ी जसीडीह में रुकती वहां मेरे बाबूजी की तरफ से फुला काला चना, हरी मिर्च, नमक और पानी वितरित होता था ताकि लोग कुछ खा सकें। पैकेट बने थे और बस लोगों को जल्दी-जल्दी दिया जाता। उसमे मैं और मेरा भाई गोविन्द भी हर रेलगाड़ी में मदद के लिए जाते थे।
बाद में पता चला कि कलकत्ता में हमारी दादी जी एवं चाचा जी के घर पर भी बम गिरा और आगे का घर नष्ट हो गया। मैं करीब 1 -2 सालों के बाद कलकत्ता गयी और उस घर को देखा।
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3 ) ससुराल में पहला स्वागत और पति का सहयोग
जब मैं पहली बार ससुराल गई तो वहाँ नेग के लिए बहुत सी लाख की चूड़ियां रखी थीं। मुझे मेरी दादी सास ने बताया की सारी चूड़ियां तुम्हारे लिए हैं। मैं दुखी हो गई और आंखों में आंसू भरे अपने कमरे में चली गई। उस समय महात्मा गांधी जी ने अहिंसा आंदोलन में कहा था कि चूड़ियां लाख की नहीं पहनी चाहिए क्योंकि उन्हें बनाने में बहुत से कीड़े मकोड़े की हत्या होती है।
कुछ ही देर में मेरे पति आए और मुझे दुखी देखकर इसका कारण पूछा। मैंने सब सच- सच बताया और उसका कारण भी उन्हें बताया।
वह चुपचाप कमरे से बाहर चले गए। कांच की चूड़ियां उस समय सुपौल में नहीं मिलती थी। पहले वह बाजार गए फिर वह मेरी चाची सास (मिठू मोहनका की दादी ) के घर गए जो कोलकाता से थीं और कांच की चूड़ियां पहनती थीं।
मेरे पति ने उनसे आग्रह किया कि वह कुछ कांच की चूड़ियां सुशीला के नेग के लिए दे दें। वे बहुत खुश हुईं, क्योंकि उन्हें बहू के लिए चूड़ियां देने का मौका मिला। उन्होंने एक सुन्दर सी टोकरी में सभी रंगों की चूड़ियां सजाकर दे दी।
मेरे पति ने वह टोकरी लाकर अपनी दादी को दिया और सीधा-सीधा कहा “दादी सुशीला के नेग की यह चूड़ियां है और वह इसे ही पहनेगी। ”
मैं आवाक खड़ी थी शादी के तुरंत बाद अपने पति का यह सहारा पाकर।
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4 ) परिवार का सहारा, चुप चाप
बात उस समय की है जब मेरे पिताजी जेल में थे और उन पर साढ़े तीन सौ रूपयों का जुर्माना हुआ। महात्मा गांधी जी ने स्वतंत्रता संग्राम में आवाज दी कि यदि लोग जेल जाएं और ब्रिटिश सरकार किसी तरह का उन पर जुर्माना लगाए तो उसे नहीं भरा जाए। .मैं उस समय बहुत छोटी थी, 10 साल से कम उम्र की। कोलकाता से मेरे में मेरे चाचा जी जसीडीह आए हुए थे। चाचा जी ने कहा कि अगर यह जुर्माना नहीं भरा गया तो ब्रिटिश सरकार के लोग हमारे घर की सारी खिड़कियों को निकाल कर ले जाएंगे।
उन्होंने मेरी मां से आग्रह किया कि वह रकम जमा कर दें। मां ने सरल भाव से मारवाड़ी भाषा में उत्तर दिया “थारे भैया न, यह पसंद कोनी ईस लिए मैं यह काम कोनी करूं” . इसका मतलब हुआ आपके भैया को यह काम पसंद नहीं इसीलिए मैं यह काम नहीं कर सकती हूं। मेरे चाचा जी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने किसी तरह पैसा इकट्ठा करके जमानत भर दिया और बिना किसी को बताये वापस चले गए।
यह था परिवार का चुपचाप सहारा किसी को कभी पता ही नहीं चला कि यह हुआ था।
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5 ) भाषा का महत्व और बड़ों का प्यार
मेरे बाबूजी को अंग्रेजों के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा से भी काफी नफरत थी। परंतु मेरे चाचा जी का विभिन्न विचार था। उन्होंने हमें बताया कि थोड़ी अंग्रेजी भाषा सीखने में हर्ज नहीं है और यह जीवन में आवश्यक एवं सुविधाजनक भी है। इसके बिना काम आसानी से नहीं चलेगा।
उन्होंने एक नोटबुक में करीब 500 शब्द लिखकर मुझे दिया, शब्दकोश के रूप में, ताकि मैं शब्दों से इंग्लिश सीख सकूं और रोज के काम में दिक्कत ना हो, अंग्रेजी न जानने की वजह से।
मेरे चाचा जी जब भी आते थे वह हम दोनों भाई-बहन को बहुत लोक- कथा सुनाते थे। अभी तक ज्यादातर लोक कथाएं जो मैं सुनती हूं वह पहले कभी सुनी हुई सी लगती है। मेरे चाचा जी भी पिताजी के जैसे खादी पहनते थे।
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6 ) जनता के लिए लाइब्रेरी
स्वतंत्रता आंदोलन के समय माँ घर में और बाबूजी बाहर काफी रहते थे। बार- बार जेल जाने और मीटिंग के बीच में वह व्यस्त रहते थे। जब भी बाबूजी घर आते थे तो हमेशा दो किताबें लेकर आते थे हम दोनों भाई बहनों के लिए। पूरी किताब खत्म करने के बाद हमदोनों अपने घर की जन लाइब्रेरी में किताबों को दे देते थे। यह लाइब्रेरी समाज के लिए थी और उसमें रजिस्टर रहता था। किताबों की यह लाइब्रेरी सबों के लिए खुली थी और लोग पढ़ने के लिए किताबें उसमें से ले जाते थे और फिर पढ़ कर लाइब्रेरी में वापस कर देते थे।
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7 ) समाज के नुकसान को बचाना, मानव धर्म
यह घटना मुझे अपने घर में काम करने वाली औरतों ने तथा गांव के लोगों ने बताई। उस समय मैं बहुत छोटी थी। महात्मा गांधी के आह्वान पर माँ ने भी घुंघट को हटाया और बाबूजी के साथ साथ खादी पहनना शुरू की। खादी कपड़ों के लिए धागा रुई से अपने से बनाया और बुना जाता था। बाबूजी जी ने कहा था कि सारे अंग्रेजी कपड़ों को त्याग दिया जाए और जला भी दिया जाए। मां के विचार अलग थे और उन्होंने उसका विरोध किया। वह बोली कि हम इसे जलाएंगे नहीं उसे गरीबों में बांट देगें। इसमें समाज का पैसा लग चुका है और उसे जालना उचित नहीं है।
मां ने अपने कपड़े के साथ-साथ घर के नीचे जो हमारी कपड़ों की दुकान थी उसके पूरे अंग्रेजी कपड़ों को निकाला। यह कपड़े गाड़ी से ले जाकर सड़क के दोनों तरफ गिरा दिये गये और जरुरत मंद लोग उन्हें उठा- उठा कर ले गये। समाज के नुकसान को बचाना हर नागरिक का कर्तव्य है।
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8 ) स्वतंत्रता संग्रामियों के परिवार की सहायता
स्वतंत्रता संग्राम के समय जो भी जेल चले जाते थे, मेरी मां उनके परिवार के लिए हर महीने राशन भेजती थी। राशन में सिर्फ चावल, दाल, आंटा, आलू तथा नमक यह पांच चीजें भेजी जाती थी। जितने लोग परिवार में थे उनके हिसाब से सामान भेजा जाता था। यह मदद सिर्फ बाबूजी की पार्टी के लोगों के लिए नहीं थी, बल्कि किसी भी पार्टी के स्वतंत्रता संग्रामियों के परिवार के लिए थी और यह सुविधा मेरी मां की तरफ से दी जाती थी। मैं और मेरा भाई गोविंद समान रखने मेंऔर परिवारों में सामान बांटने में मदद करते थे। सहयोग की भावना शुरू से ही अनजाने में ही हमारे हृदय में बैठ गई।
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9 ) घर में प्रिंटिंग प्रेस, स्वतंत्रता संग्राम के समय
स्वतंत्रता संग्राम के समय हमारे घर पर काफी काम होते थे न्यूज़ पेपर प्रिंटिंग का भी काम चलता था, जो ब्रिटिश सरकार से प्रतिबंधित था. बीच-बीच में सरकार की तरफ से टीम आती थी अचानक निरीक्छण NIRIKCHAN के लिए जो बहुत मुश्किल समय होता था घर और स्वतंत्रता संग्रामियों के लिये। गांव वालों से इस तरह की खबरें कुछ मिनट पहले हमारे घर में पहुंच जाती थी।
एक बार इसी तरह की घटना मुझे अच्छी तरह याद है। तीन-चार गाड़ियों में पुलिस भर के बंदूकों के साथ हमारे यहां पहुंचें। सभी जरुरी कागजों और प्रेस वाले कमरे में मशीनों और आदमियों के ऊपर पुवाल डालकर दरवाजा बंद कर दिया गया था।
पुलिस कमांडर सीधे ऊपर रसोई में आये, जहां माँ खाना बना रहीं थीं। उन्होंने मां से पूछा कि हमें आपका पूरा घर देखना है। मां ने बड़ी ही सरलता से बिना घबराहट के अपनी चाबी का गुच्छा उठाया और उनके साथ एक एक कर सभी कैमरे की तरफ जाती गयी। ऊपर में ९-१० कमरे थे । मैं और मेरे भाई भी उनके दोनों तरफखड़े थे और उनके साथ ही गए।
नीचे में बाकि कमरों के साथ साथ उन्होंने प्रेस वाला कमरा भी अपनी चाबी से खोला और उन लोगों को दिखा दिया। यह कमरा काफी सकड़ा परंतु अंदर की तरफ काफी लंबा था। पुलिस ने बाहर से उस कमरे को देखकर फिर दूसरे कमरे की तरफ चले गए। . उस समय तो मैं ज्यादा नहीं सोची परंतु आज सोचती हूं की कठिन समस्या के समय अपने को शांत रखना कितना आवश्यक है और माँ ने कितनी अच्छी तरह सम्हाला। अगर चेहरे पर जरा भी घबराहट आती तो ब्रिटिश सिपाहियों को जरूर संदेह हो जाता और हमारा पूरा परिवार खतरे में आ जाता।
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10 ) बचपन की छोटी छोटी सीख, सबों का सम्मान
मेरे पिताजी के घर पर बहुत मीटिंग होती रहती थीऔर हम लोग दोनों भाई बहनों को मीटिंग में जाना, वहां चुपचाप बैठना और आगे पीछे का काम करना होता था और बहुत अच्छा भी लगता था । इन कामों में हम बहुत गर्वान्तित महसूस करते थे। घर में करीब 40- 50 आदमियों का खाना सदा बनता रहता था। खाना परोसने, नाश्ता ले जाने से लेकर झूठी प्लेट उठाने तक का काम हम लोग भी करते थे। बड़ों की इज्जत करना, उनको खाना खिलाना और उनके झूठे प्लेट को उठाने में भी हम अपना बड़प्पन समझते थे।
मीटिंग में सभी श्रेणी के लोग आते थे। एक बार एक छोटे वर्ग के आदमी जो पिताजी की पार्टी में थे वो आए। घर में काम करने वाली महिला ने उनका प्लेट उठाने और धोने से साफ इनकार कर दिया। मां ने उसे कुछ भी नहीं कहा और तुरंत झूठी प्लेट उठाकर धोने वाली जगह ले आई। वहां प्लेट को राख से साफ करके धो दिया। काम करने वाली को खुद अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने आगे से कभी भी यह भेदभाव के विचार नहीं रखें। मां की यह सीख मुझे अभी भी याद है। आदमी कोई बड़ा और छोटा नहीं होता उसके काम बड़े और छोटे होते हैं।
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महाकवि गुलाब खंडेलवाल साहित्योत्सव, २०२३
द्वारा: डॉ. रेनू श्रीवास्तव, उपाध्यक्ष, द मैजिक मैन एन चंद्रा फ़ाउंडेशन
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विश्व कीर्तिमान प्राप्त द मैजिक मैन एंड चंद्रा फाउंडेशन द्वारा आदरणीय गुलाब खंडेलवाल स्मृति साहित्य उत्सव का फेसबुक और यूट्यूब चैनल पर 15 अप्रैल से 15 अगस्त तक ऑनलाइन प्रसारण किया गया। इस कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय हरीश नवल जी, प्रबंधक शोभा खंडेलवाल जी, महाप्रबंधक श्री नरेश चंद्र जोशी जी और सचिव श्री बी. के. पाटिल जी थे। जिसमें 17 देश के 459 रचनाकारों की भागीदारी रही। जिसमें से 320 महिला और 139 पुरुषों द्वारा काव्य पाठ किया गया।
4 महीने तक चलने वाले इस कार्यक्रम का संचालन देश की विभिन्न राज्यों की 57 संचालिकाओं द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम का सम्मान समारोह का आयोजन झीलों की नगरी उदयपुर राजस्थान में 1 सितंबर से 3 सितंबर 2023 तक किया गया। इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों के भाग लेने के साथ ही सात समुद्र पार से आदरणीय गुलाब खंडेलवाल जी के सुपुत्र श्री आनंदवर्धन खंडेलवाल जी, श्री अशोक खंडेलवाल जी, श्री शरद खंडेलवाल जी एवं पुत्रवधु डॉक्टर शोभा खंडेलवाल जी, श्रीमती अलका खंडेलवाल जी, चित्रा खंडेलवाल जी, आदरणीय गुलाब जी की बेटी श्रीमती विभा झालानी जी गुलाब जी के दामाद श्री अविनाश झालानी जी के साथ – साथ गुलाब जी कि नातिन श्रीमती दिव्या गुप्ता एवं श्री सौरभ गुप्ता और इनकी बेटी आरोही गुप्ता और बेटा तेजस का भी सानिध्य प्राप्त हुआ।
उदयपुर में आयोजित सम्मान समारोह का आरंभ 1 सितंबर को शाम 4:00 बजे महाराष्ट्र के परंपरा “दिन्डी” पोथी यात्रा के तहत आदरणीय गुलाब जी के साहित्य को पालकी में लेकर ढोल के साथ ग्रंथ यात्रा के साथ हुआ। जिसमें अमेरिका से पधारे आदरणीय गुलाब खंडेलवाल जी के सुपुत्र श्री आनंदवर्धन खंडेलवाल जी एवं पुत्रवधु डॉक्टर शोभा खंडेलवाल जी और उनके समस्त परिवार और फाउंडेशन के सभी सदस्यों ने पालकी को कंधे पर उठाकर उनके साहित्य को सम्मान दिया। उसके पश्चात सम्मान समारोह के उद्घाटन सत्र का आरंभ हुआ। इस सत्र के मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ साहित्यकार श्री सत्यनारायण व्यास जी एवं श्री दयाशंकर त्रिपाठी जी, कार्यक्रम की अध्यक्षता की श्रीमती रजनी कुलश्रेष्ठ जी ने और विशिष्ट अतिथि थे वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर उमेश मेहता जी, वरिष्ठ साहित्यकार और समाज सेवी श्रीमती सरोज बजाज जी, गीतकार श्री शेखर अस्तित्व जी,वरिष्ठ कवि श्री सूरज राय सूरज जी, अंतर्राष्ट्रीय व्यंग्यकार डॉ. हरीश नवल जी और डॉक्टर शोभा खंडेलवाल जी।
रायपुर की डॉक्टर अनुराधा दुबे द्वारा कत्थक शैली में गणेश वंदना एवं गुलाब जी द्वारा रचित शीर्षक गीत की प्रस्तुति दी गई और सरस्वती वंदना प्रमिला शरद व्यास जी द्वारा की गई। उदयपुर पधारे हुए सभी अतिथियों का शब्दों से स्वागत किया किरण बाला “किरन” ने। उद्घाटन सत्र का संचालन किया डॉ. रेनू श्रीवास्तव एवं सुनीता निमिष सिंह ने। उद्घाटन सत्र के पश्चात गुलाब जी की लिखी ग़ज़ल और गीतों के कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आरंभ गुलाब जी की सुपुत्री विभा झालानी जी, विभा जी की सुपुत्री दिव्या गुप्ता और विभा जी की नातिन आरोही गुप्ता ने किया। उसके पश्चात डॉक्टर प्रेम भंडारी जी और डॉक्टर पामिला मोदी जी ने गुलाब जी की गजलों को सुना कर समां बांध दिया। इस ग़ज़ल के कार्यक्रम का संचालन ममता लड़ीवाल जी द्वारा किया गया। रात्रि भोजन के पश्चात देश के विभिन्न भागों से आए कवियों द्वारा काव्य पाठ किया गया, जो देर रात तक चला। सम्मान समारोह के दूसरे दिन का आरम्भ रेनू सिरोया “कुमुदिनी” जी के मेवाड़ वंदना के साथ हुआ।
उसके पश्चात गुलाब जी के व्यक्तित्व कृतित्व को जानने के लिए *गुलाब जी व्यक्ति से व्यक्तित्व तक* कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वक्ता थे गुलाब जी की पुत्रवधु डॉक्टर शोभा खंडेलवाल जी, पुत्र श्री आनंदवर्धन खंडेलवाल जी, पुत्री विभा झालानी जी, श्रीमती सरोज बजाज जी, डॉक्टर हरीश नवल जी। सभी ने गुलाब जी के कृतित्व और व्यक्तित्व से परिचित कराया। इस सत्र का संचालन भूमिका जैन "भूमि" द्वारा किया गया। उसके पश्चात 15 अप्रैल से 15 अगस्त तक ऑनलाइन होने वाले कार्यक्रम के तहत जिन रचनाकारों द्वारा काव्य पाठ किया गया था। उनमें से 20 रचनाकारों को विजेता घोषित किया गया था। उनका काव्य पाठ एवं सम्मान उदयपुर में होने वाले इस सम्मान समारोह में आदरणीय हरीश नवल जी की अध्यक्षता में हुआ। इस सत्र का संचालन शिल्पा जैन द्वारा किया गया।
उसके पश्चात देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग 200 रचनाकारों का काव्य पाठ एवं सम्मान वरिष्ठ साहित्यकारों की अध्यक्षता में हुआ। काव्यपाठ के विभिन्न सत्र का संचालन सोनाली बॉस, नम्रता चौधरी, के. संगीत, मोनिता महक और सुनंदा झा द्वारा किया गया। 2 सितंबर की शाम को ही मुंबई से पधारे संगीतकार एवं गायक शिवा राजोरिया और ज्योत्सना राजोरिया ने गुलाब जी की रचनाओं को अपनी खूबसूरत आवाज के साथ गाकर सबका मन मोह लिया। इस कार्यक्रम का संचालन सुनीता निमेष सिंह द्वारा किया गया। तीसरे दिन यानी 3 सितंबर को काव्य पाठ से सत्र आरंभ हुआ। उसके पश्चात देश के विभिन्न राज्यों से आई सभी संचालिकाओं का सम्मान के साथ मैजिक मैन नरेश जोशी जी द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया गया और राजस्थान की लोक संस्कृति की छठा बिखेरता राजस्थान का खूबसूरत लोक संगीत जिसमें चरी नृत्य, घूमर नृत्य के साथ इस शानदार कार्यक्रम का समापन हुआ। फिर मिलने के वादे के साथ खूबसूरत यादों की पोटली को अपने साथ लेकर सभी आंखों में नमी लिए हुए अपने घरों को लौट गए।
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हिंदी दिवस को समर्पित - कविता
“मैं हिंदी हूँ”
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द्वारा : श्री अनुराग गुप्ता
श्री अनुराग गुप्ता भरतपुर, राजस्थान से हैं। इन्होने जयपुर से इंजीनियरिंग की पढाई की। २०१६ में कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका आये। अभी क्लीवलैंड, ओहायो में कार्यरत हैं। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के नये जीवन सदस्य और उत्तरपूर्व ओहायो शाखा में सक्रिय स्वयं सेवक । कविता लिखना इन्हें प्रिय है, नृत्य का भी शौख रखते हैं।
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"मैं हिंदी हूँ,"
मैं हिंदी हूँ,
बनालो मुझे आज़ हिंदी दिवस पे अपने माथे का चंदन, वाणी लेखन से करो विस्तार मेरा,
थल, जल और नभ सा आकार दो मुझे, गुनगुनाओं जगत में शुभ संवाद मेरा,
भारत की राजभाषा हूं मैं, कुछ अपनों से ही कुम्हलाई हुईं हूं,
भारत की अधिनायक हूं मैं, सूरदास, मीरा, टैगोर से गाई गई हूं,
भारत का कलाम, कलम और कमल हूं मैं, आज़ादी के दीवानों से सजाई हुईं हूं,
कल चंद्रमा पे थीं, आज़ सूरज पे हूं और अब सागर में समाई हुईं हूं,
मैं हिंदी हूँ,
भारत की प्रस्तावना हूं, पहला अध्याय संस्कृत हूं,
अपनों से ही तिरस्कृत, सभ्यता संस्कृति से सुसंस्कृत हूं,
हिंद की आत्मा हूं, प्रेम, शक्ति और भक्ति का साहित्य हूं,
निराला, महादेवी की कहानी हूं, भारतेंदु, दिनकर की आवाज़ हूं,
पूर्वजों का प्रसाद हूं, भगत आज़ाद की रणभेरी से गुलज़ार हूं,
वसुधैव कुटुंबकम् की भावना, वन्देमातरम जय हिंद का नारा मैं हूं,
वेदों और ऋषियों की कामना, इस भवसागर का किनारा मैं हूं,
मैं हिंदी हूँ,
बनालो मुझे आज़ हिंदी दिवस पे अपने माथे का चंदन, वाणी लेखन से करो विस्तार मेरा,
थल, जल और नभ सा आकार दो मुझे, गुनगुनाओं जगत में शुभ संवाद मेरा,
भारत की राजभाषा हूं मैं, कुछ अपनों से ही कुम्हलाई हुईं हूं,
भारत की अधिनायक हूं मैं, सूरदास, मीरा, टैगोर से गाई गई हूं,
भारत का कलाम, कलम और कमल हूं मैं, आज़ादी के दीवानों से सजाई हुईं हूं,
कल चंद्रमा पे थीं, आज़ सूरज पे हूं और अब सागर में समाई हुईं हूं!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - २१ वां द्विवार्षिक अधिवेशन में
प्रकाशित स्मारिका और समाचार मीडिया/पत्रिकाओं के लिंक
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के सभी सदस्य, पदाधिकारीगण, रचनाकार। समस्त हितचिंतक एवं हिंदी प्रेमी पाठकों
जैसा कि आप जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय हिंदी एसोसिएशन (आईएचए) ने अपना 21वां द्विवार्षिक सम्मेलन शुक्रवार, 28 जुलाई -शनि, 29 जुलाई, 2023 को कार्मेल, इंडियाना, यूएसए में आयोजित किया। सम्मेलन का उद्देश्य हिंदी भाषा से प्यार करने वाले जीवन के सभी क्षेत्रों के व्यक्तियों को एक साथ लाना था, ताकि हिंदी भाषा से संबंधित विषयों पर चर्चा की जा सके, भारत के बाहर दूसरी भाषा के रूप में हिंदी को बढ़ावा देने और उपयोग करने पर विचार साझा किया जा सके और हमारे समुदाय के भीतर संबंध बनाए जा सकें। उपस्थित लोगों में युवा, कवि, लेखक, आईएचए सदस्य, शहर और राज्य के नेताओं के साथ-साथ भारत से अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल थीं। इस सम्मेलन का विषय "अगली पीढ़ी के लिए हिंदी शिक्षा" था। यह सम्मेलन बहुत सफल रहा।
समाचार मीडिया/पत्रिकाओं ने सम्मेलन की ख़बरों का लिंक
1. New India Abroad
https://www.newindiaabroad.com/news/iha-hosts-21st-biennial-convention-in-indiana
2. India West
https://indiawest.com/international-hindi-associations-convention-held-in-indiana/
3. Desibuzz.com
https://thedesibuzz.com/21st-biennial-conference-of-international-hindi-association-successfully-hosted/?fbclid=IwAR0J7-O7nRoXpoaWFMWi3cGnFXtyRO5TXxIDxximJUF4rPDNVjZaykumngQ
इस अवसर को चिह्नित करने के लिए, 21वें सम्मेलन की स्मृति में एक सुंदर स्मारिका प्रकाशित की गई है, जिसमें सम्मेलन के विषय पर विभिन्न लेख शामिल हैं।
हमें इस ऑनलाइन स्मारिका को आपकी सेवा में सादर प्रेषित करते हुए खुशी हो रही है। हम आशा करते हैं कि आप इस स्मारिका में प्रकाशित सभी कविताएँ और लेख पढ़ेंगे और उनसे लाभान्वित होंगे।
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सम्पूर्ण पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें:
https://ihaindiana.org/publications/
यदि कोई भो अपनी प्रतिक्रियाओं को साझा करना चाहें तो नीचे दिये संपादक मंडल से या सीधे मुझसे संपर्क करें।
डॉ. राकेश कुमार
Dr. Rakesh Kumar
संयोजक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का 21वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन
Convener, International Hindi Association’s 21st Biennial Convention
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा, यूएसए
President, International Hindi Association-Indiana Chapter,
Email/ईमेल: ihaindiana@gmail.com
Phone/WhatsApp: +317-249-0419
Web: http://ihaindiana.org; http://www.hindi.org
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखाओं से हास्य कवि सम्मलेन की रिपोर्ट्स
उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, कवि-सम्मेलन २०२३
द्वारा : डॉ. शैल जैन, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा,पूर्व अध्यक्षा
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उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, हास्य कवि सम्मलेन
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा ने अगस्त २५, २०२३, शुक्रवार को रिचफील्ड ओहायो के ‘क्वालिटी इन’ में हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इस कवि सम्मेलन में भारत से तीन कवियों का पदार्पण हुआ। हाल के बाहर बरामदे में समिति के विगत वर्षों के कार्य कलापों की फोटो प्रदर्शनी लगी हुई थी और दर्शकों को आकर्षित कर रही थी।
वही पर स्वर्गीय सुशीला मोहनका जी का एक फोल्डर उनके जीवन के उद्देश्यों और उपलब्धियों की थी। वे अ.हि.स. के साथ १९९० से जुड़ी थीं और अ.हि.स की भूतपूर्व अध्यक्षा एवं बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टी चेयरमैन का पद भी निभा चुकी हैं। जनवरी २०१७ से जीवन के अंत तक प्रबन्ध संपादक भी रहीं। दिनांक जून २९, २०२३ पर सुशीला मोहनका के स्वर्गवास ने पूरे अ.हि.स के साथियों और समाज के लोगों को स्तब्ध कर दिया। हिन्दी भाषा एवं भारतीय संस्कृति केलिये उनका योगदान, अंतिम सांस तक कर्तव्यरत रहना और समाज में सबों से प्रेमभाव, एक उदाहरण है।
हॉल के बाहर रजिस्ट्रेशन डेस्क पर सभी स्वयं सेवक अपने कार्य में लगे थे। रजिस्ट्रेशन के बाद सभी दर्शकगण भोजन के लिये जा रहे थे। भोजन के समय दर्शकों ने फोटो प्रदर्शनी का आनन्द भी उठाया।
संध्याकालीन भोजन के पश्चात कार्यक्रम साढ़े छः बजे प्रारम्भ हुआ। श्रीमती किरण खेतान, उत्तरपूर्व ओहायोकी अध्यक्षा ने दर्शकों का अभिनंदन किया और कवियों को मंच पर आमंत्रित किया। कार्यक्रम की शुरुआत दीप-प्रज्ज्वलन से हुई। दीप-प्रज्ज्वलन के लिए गणमान्य व्यक्तियों को निमंत्रित किया गया। डॉ. प्रकाश चंद, अ.हि.स. के उत्तर पूर्व शाखा के उपाध्यक्ष; श्रीमती किरण खेतान, अ.हि.स. के उत्तर पूर्व शाखा की अध्यक्षा; श्रीमती रेणु चड्ढा, अ.हि.स. के उत्तर पूर्व शाखा की पूर्व अध्यक्षा; श्री माइकेल व्हीलर, रिचफील्ड ओहायो के मेयर; डॉ. तेज पारीख, शाखा के सहयोगी; डॉ. शोभा खंडेलवाल, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा एवं श्री पवन खेतान, शाखा के माननीय संयोजक। दीप-प्रज्वलन के बाद तालियों की गडगडाहट से सभागार गूँज उठा।
इसके बाद श्रीमती सुगाता चैटर्जी को सरस्वती-वन्दना के लिए बुलाया गया। वन्दना के बोल थे "अयि मानस-कमल-विहारिणी" जो स्वर्गीय महाकवि गुलाब खंडेलवाल द्वारा रचित थी। सुगाता जी की मधुर आवाज और गुलाब जी के शब्दों ने सभी को मुग्ध कर लिया और सभागार पुन: करतल ध्वनी से गूँजउठा।
समिति अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान ने पुनः सबका स्वागत किया और मेयर माइकल व्हीलर को हमारे कार्यक्रम में आने के लिये विशेष धन्यवाद दिया। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम प्रतिवर्ष अ.हि.स. की केन्द्रीय समिति की ओर से आयोजित किया जाता है। इस वर्ष अमेरिका के क़रीब २४ स्थानों में कवि-सम्मेलन का आयोजन रहा। समिति का लक्ष्य हिन्दी भाषा एवं संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन करना तथा उसे सुदृढ़ करना है। आज का यह कार्यक्रम अ.हि.स. के इस लक्ष्य की पूर्ति में सहायक है। हमारी शाखा की तरफ़ से राष्ट्रीय लक्ष्य की पूर्ति के लिये कई काम हो रहे हैं। हमारी एक अहम परियोजना है, हिंदी भाषा एवं भारतीय संस्कृति को अमेरिकी स्कूल में दूसरी भाषा या आफ़्टर स्कूल हिंदी क्लास में लाने का प्रयास है, जिसपर हमारी कोशिश जारी है।
तत्पश्चात कवियों का संक्षिप्त विवरण दर्शकों से साझा किया गया। डॉ. शैल जैन ने श्री गौरव शर्मा को, श्रीमती तसनीम लोखंडवाला ने श्री सुदीप भोला को एवं श्रीमती रेणु चड्ढा ने डॉ. सरिता शर्मा के बारे में बताया।
श्री गौरव शर्मा हास्य-व्यंग्य के माहिर, समाज के दर्पण, हिन्दी के प्रतिभाशाली कवि हैं जो लाफ्टर शो, कवि सम्मेलन एवं राजस्थानी ग्रुप प्रोग्राम सबों में लोकप्रिय हैं। गौरव जी को हाज़िर-ज़बाबी तथा हास्य विरासत में मिली है। उनके पिता श्री श्याम ज्वालामुखी देश के महान हास्य कवि थे। पिता की मेधा का विकास करते हुए गौरव जी ने देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बनाई है।
श्री सुदीप भोला जबलपुर के युवा कवि हैं। इनकी कवितायें हमें हंसाती हैं, रुलाती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं और समाज के प्रति जागरूक करती हैं। SAB TV के चर्चित शो ‘वाह-वाह क्या बात है’ में इनकी प्रस्तुति को दर्शकों ने बहुत सराहा है। ये अपने काव्य पाठ से नई ऊर्जा प्रदान करते हैं, जो हमें देश-प्रेम, समाज-सेवा, और मानवता के प्रति प्रेरित करती है।
डॉ. सरिता शर्मा हिंदी काव्य मंच की एक प्रतिष्ठित, प्रतिभावान और प्रेरक कवयित्री हैं। इनका काव्य हमें सात्विक शृंगार का अनुभव कराता है और साथ ही साथ हमें सामाजिक दायित्व की प्रेरणा भी देता है। उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त कर चुकी हैं। लालकिला कवि सम्मेलन से ग्यारह बार अपने भावों का पाठ किया और कई मीडिया प्लेटफार्म पर इनकी कविताओं को प्रकाशित किया गया है।
रेणु चड्ढा ने डॉ. सरिता शर्मा को मंच-संचालन के लिये माईक सौंप दिया।
प्रोग्राम की शुरुआत श्री गौरव शर्मा ने की और हास्य-व्यंग की शृंखला से दर्शकों को मोहित किया। पूरा हॉल दर्शकों के ठहाकों और तालियों से गूंज गया। व्यस्त ज़िंदगी में ये माहौल लोगों को पूरी तरह से आनन्दित कर रहा था।
कवि सुदीप भोला ने भारतीय सैनिकों तथा भारतीय समाज में महिलाओं और लड़कियों का स्थान विषय पर कलात्मक कविताओं से दर्शकों को लुभाया। भोला जी ने बॉलीवुड गानों पर पैरोडी भी सुनाई। हास्य-रस और कविताओं का संगम अद्भुत था।
डॉ. सरिता शर्मा ने अपनी भावभिनी कविताओं के सागर में दर्शकों को पूरी तरह डूबा दिया। सामाजिक दायित्व को अनुभव भी कराया। अंतिम कविता माँ को समर्पित थी जो सबों के दिलों को छू गई। अंत तक दर्शक जुड़े थे, मुग्ध होकर कविताओं का आनन्द लेते रहे और तालियों की आवाज़ करते हुए प्रसन्न लग रहे थे।
अंत में डॉ प्रकाश चंद, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के उपाध्यक्ष ने कार्यकारिणी के सदस्यों, स्वयंसेवकों, प्रोग्राम के आर्थिक मददगारों तथा दर्शकों को धन्यवाद दिया। उन्होंने क्वालिटी इन के मालिक तथा कार्यकर्ताओं, इण्डिया कैफे, इण्डिया इंटरनेशनल तथा टी. वी. एशिया को धन्यवाद किया, स्थान और सेवा, अहार, विज्ञापन तथा विस्तृत प्रोग्राम की सूचना जनता-जनार्दन तक पहुँचाने के लिए अपनी ओर से और समिति की ओर से आभार प्रगट किया। अंत में हँसते हुए सभी बिदा हुए।
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