|
|
|
|
| |
|
|
| |
SEPTEMBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
सितम्बर 2022, अंक १६ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
| {C}
|
{C}
| |
{C}
आदरणीय महोदय / महोदया ,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ और ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं . नार्थ कैरोलाइना के द्वारा अत्यन्त हर्ष और उल्लास के साथ अपने प्रथम "हिन्दी दिवस" के उपलक्ष्य में 10 सितम्बर 2022 को दोपहर को मनाया गया और अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस ह्युस्टन समिति ओर से १४ सितम्बर को बुधवार सायंकालमनाया गाता
जागृति वेबिनार, शनिवार, 10 सितम्बर 2022 को हुआ था जिसमें जागृति शृंखला की कड़ी के वक्ता थे प्रतिष्ठित हिन्दी आलोचक एवं साहित्यकार डॉ. सुधीश पचौरी, पूर्व कुलपति एवं हिंदीविभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय था" रीतिकाल : एक पुनर्पाठ "। विद्वानो केद्वारा जिसकी विधिवत व्याख्या की गई थी ।
२० अगस्त को डालास शाखा का अमृत महोत्सव हमारे ( अनिता सिंघल ) निवास में हुआ था , जो कि बहुत ही हर्षोलास से मनाया गया। जिसमें ४० से अधिक सदस्यों ने भाग लिया ।
आप सभी जानते हैं कि हिंदू त्योहार हमारे द्वार पर हैं , इसी के साथ आपको नवरात्रि की शुभकामनाएँ और माता रानी आप सभी को स्वास्थ्य , सौभाग्य , और संपति में वृद्दि करें ।
आजकल कोरोंना का प्रकोप फिर से बढ़ गया है , इसलिए आप सभी अपना ध्यान रखें और सावधानी रखे ।
आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोननम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं ।
शुभकामनाएँ सहित
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर-राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
(anitagsinghal@gmail.com)
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हिंदी सीखें
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
{C}
| |
{C}
| |
| |
"जागृति वेबिनार: , 08 अक्टूबर 2022
"क्या आधुनिक काल के बीज भक्तिकाल में ही पड़ चुके थे”
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 08 अक्टूबर 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी आलोचक एवं साहित्यकार डॉ. राज कुमार, प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "क्या आधुनिक काल के बीज भक्तिकाल में ही पड़ चुके थे"।
आइये उनसे सुनते हैंः औपनिवेशिक इतिहासकारों ने जिसे मध्यकाल अथवा अंधकार युग कहा उससे अब नये इतिहासकार ( भारतीय और पश्चिमी ) आरंभिक आधुनिक युग की संज्ञा देते हैं। पर क्या यह सही है? क्या हिंदी साहित्य के तथाकथित आधुनिक युग के प्रारम्भ के विषय में जो प्रचलित अवधारणाएँ हैं, वे सही हैं? आइये इन प्रश्नों का उत्तर जानते है इस सत्र के विद्वान वक्ता प्रोफेसर राजकुमार से।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति शनिवार, 08 अक्टूबर 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
www.facebook.com/ihaamerica
https://youtu.be/WatjtJhPsrw
https://youtu.be/I1j1OlI1Kfw
शनिवार, 08 अक्टूबर 2022; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST, UK: 4:00 PM
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
आशा है कि आप शनिवार, 08 अक्टूबर 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान हैं | पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं | समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” जून 2021 से प्रकाशन प्रारम्भ किया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है |"जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना |
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
{C}
| |
| |
शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
{C}
| |
| |
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा
ह्यूस्टन, टेक्सास शाखा में
बुद्धवार, १४ सितम्बर २०२२ को हिंदी-दिवस सम्पन्न
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
 |
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
{C}
 |
| |
|
द्वारा - श्री स्वपन धैर्यवान, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं ह्यूस्टन शाखा अध्यक्ष
स्थान - इंडिया हाउस, ह्यूस्टन, टेक्सास
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
{C}
इंडिया हाउस में बुद्धवार, १४ सितम्बर २०२२ को शाम ६.०० से ७.३० बजे तक हिंदी दिवस के उपलक्ष में आजका कार्यक्रम बहुत ही बेहतरीन और सफल रहा। ह्यूस्टन भारतीय दूतावास के काउंसलर जनरल माननीय श्री असीम आर. महाजन बहुत प्रभावित थे।
‘वी. वी. एम. विद्यालय’ के बच्चों ने अभूत ही अच्छी तरह से ‘दुर्योधन को कृष्ण की चेतावनी’ की प्रस्तुति की और दर्शकों के मन को मोह लिया ।
HSS के कम उम्र वाले बच्चों ने निस्संकोच, बिना किसी झिझक के वीर रस की रचना प्रस्तुति की। अल्पा बेन का सुमधुर गीत और अनिल कुमार के ‘पल-पल’ ने श्रोताओं को गुनगनाने पर विवश कर दिया।
संगीता पसरीजा जी के विचार एवं स्वामीजी के प्रवचन से शुरुआत कर के कार्यक्रम अंत तक जीवन्त और ऊर्जा दायी थे।
आदेश जी के द्वारा पढ़ी गयी स्वनामधन्य मैथिली शरण गुप्त की कविता बहुत ही जानी पहचानी और मन को छू लेनावाली थी।
संदीप जी Acting CG और अजय जी Consul ह्यूस्टन जन से और पूर्ण कार्यकारिणी से स्नेह जोड़ रहे थे।
बुधवार जैसे काम के दिन शाम को भोजन के ना होते हुए भी सभागार में ७५ लोग उपस्थित थे।
हमने सीन्यर सिटिज़ेन, गुजराती समाज, वदतल धाम, लेवा पतिदार समाज, वल्लभ प्रीति, IMAGH. आदि संस्थाओं को समिति से जोड़ा है।
अपरिहार्य कारणों से राजीव चार्ली, संतोष जी, मीरा जी, फ़तह प्रमोद जी, निशा बेन, मनीषा बेन नही आ पाये, सूचना भेजने के लिये कोटि-कोटि धन्यवाद।
सभी उपस्थित स्वंय-सेवकों, कवियों एवं श्रोतागण को अपना-अपना समय निकालकर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। ‘संघटन में शक्ति है’ इसी मूल मंत्र को मान कर ह्यूस्टन, टेक्सास शाखा काम कर रही है।
***
|
|
|
|
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
हिंदी-दिवस इंडिया हाउस, ह्यूस्टन, टेक्सास
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
हिंदी-दिवस इंडिया हाउस, ह्यूस्टन, टेक्सास
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
{C}
| |
| |
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा
शॉर्लट, नार्थ कैरोलाइना (Charlotte, NC)
शनिवार, १० सितम्बर २०२२ को हिंदी-दिवस सम्पन्न
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
 |
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
{C}
 |
| |
|
द्वारा- श्रीमती प्रिया भरद्वाज,
शॉर्लट, नार्थ कैरोलाइना,
शाखा अध्यक्ष
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
हिन्दी-दिवस का कार्यक्रम प्राकृतिक कारणों और श्री बाल गुप्ता जी के नरम-गरम स्वास्थ्य के कारण असमंजस में था, किंतु सभी के सहयोग और लगन से, यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक शनिवार, १० सितंबर अपराह्न १२:०० से प्रारम्भ होकर ४:०० सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम तयवोला रोड में ‘मैरियन ड्वेल पार्क’
में किया गया।
श्री बाल गुप्ता जी कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं हो सके, उनकी कमी महसूस की गई , और उनके अच्छे स्वास्थ्य की सभी ने ईश्वर से कामना भी की। समिति के अभय सिंह राठौर और श्रीमती अंजू अग्रवाल जी के द्वारा दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का श्रीगणेश किया गया।
समिति अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज जी के द्वारा कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया, उन्होंने बताया कि अ.हि.स. की शॉर्लट शाखा में यह प्रथम हिंदी-दिवस का आयोजन हो रहा है। १४ सितम्बर १९४९ को भारत की पार्लियामेंट में हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया गया, तभी से उस दिन हर वर्ष हिंदी-दिवस मनाया जाता है।
इसके पश्चात अभय सिंह राठौर जी ने हिंदी और भारतीय संस्कृति के बारे में अपने विचार व्यक्त किये उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय परम्परा में हाथ से भोजन ग्रहण करने का महत्व पाँचों इंद्रियों को शामिल करना है, आगे उन्होंने बताया कि हाथों की सभी अंगुलियाँ भोजन ग्रहण करते हुए जुड़नी चाहिए। आगे उन्होंने बताया कि भारत के गाँव में एक नया कार्यक्रम प्रारम्भ करने जा रहे हैं, जिसमें ग्रामीण बच्चों को भारत में निःशुल्क शिक्षा दी जाएगी। प्रिया भारद्वाज भी इसने कार्य में सहायता करेंगी और कुछ अन्य बालक बालिकाएँ भी इस पुनीत कार्य में अपना पूर्ण सहयोग देंगे।
इसके पश्चात् रघुवंशी जी और अंजु जी ने अपनी-अपनी कविताएँ पढ़ी उन दोनों की कवितायें सबके दिलों को छू गयीं और तालियों की ध्वनि से सभागार गुंजित हो उठा। दिल में जोश हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती। इस बात की मिसाल हमारी प्रिय अंजु अग्रवाल जी हैं, जिन्होंने शास्त्रीय नृत्य की पेशकश की और पुनः तालियाँ बज उठी।
इसके पश्चात् श्रीमती रीना बानी ने तंबोला का शुभारम्भ किया इसमें बच्चे बड़े सभी साथ में खेले और ८ प्रतिभागियों को पुरस्कार वितरित किये गये। तम्बोला के दौरान सभी का बहुत मनोरंजन हुआ और सभागार बार-बार तालियों से गूँजता रहा। खेल का आनंद लेते हुए बड़ों और बच्चों ने साथ में तम्बोला का समापन किया। कार्यक्रम को बच्चों के लिए रोचक बनाने की पूरी ज़िम्मेदारी श्रीमती नेहा वर्मा और सोनिया संतोष ने पूर्णतया निभाई। सभी बच्चों से विभिन्न तरह के गणपति जी की पैंटिंग्स करवाई गयीं। बच्चों ने मिट्टी से कुछ-कुछ बना कर आनंद उठाया। इस आयोजन में ४ साल से १४ साल तक के बच्चों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम के पश्चात सभी बच्चों को और वोलनटीयर बच्चों को कार्य के अनुसार प्रमाण-पत्र दिए गए ।
इस कार्यक्रम के लिए रीना बानी, प्रवीण जी, जितेंद्र जी, अभिलाषा जी, तृप्ति तिवारी और मधुमिता रघुवंशी ने कार्यक्रम की साज-सज्जा में चार चाँद लगाए और भोजन की पूर्ण व्यवस्थता भी की।
अंत में कार्यक्रम का समापन समिति अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज द्वारा किया गया। बच्चों को प्रोत्साहित और उत्साहित करते हुए कार्यक्रम का समापन किया गया।
***
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
शॉर्लट, नार्थ कैरोलाइना हिंदी-दिवस की कुछ झलकियाँ
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
{C}
| |
| |
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा
सेराक्यूस, न्यू यॉर्क शाखा में
शनिवार, १७ सितम्बर २०२२ को "एक सांझ हिन्दी के साथ"
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
 |
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
{C}
 |
| |
|
द्वारा- प्रोफेसर किशन मेहरोत्रा, निदेशक अ.हि.स. २०२२-२३
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
सेराक्यूस, न्यू यॉर्क में हिन्दी का कार्यक्रम, ‘इंडिया सेंटर’ में शनिवार, १७ सितम्बर २०२२, को किया। हमने इस कार्यक्रम को नाम दिया था ‘एक सांझ हिन्दी के साथ’।
हिन्दी सम्बधित कार्यक्रम शाम ७:०० से ९:०० बजे तक चला। इस कार्यक्रम में लगभग ४० लोग आये।
लोगों ने निराला, महादेवी वर्मा, नीरज, आदि महान कवियों की कविताओं के साथ-साथ अपनी लिखी
कविताएँ एवं लेख भी पढ़े। कार्यक्रम में भाग लेने वालों में मेरे अतिरिक्त कुमार आशुतोष, चिलिकूरी मोहन, रमा मेहरोत्रा, सुरभी रैना, प्रमोद वार्शनेय, जयश्री प्रसाद, गीता संघानी, इत्यादी अन्य बहुत से लोग थे। सभी को कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा। दो फोटो भी भेज रहा हूँ।
कार्यक्रम के अन्त में भोजन भी था जिसमें रमा मेहरोत्रा, सुनील गुप्ता और अंजु गुप्ता का सहयोग प्रमुख था।
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
 |
| |
|
|
|
|
|
|
{C}
 |
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| {C}
|
{C}
| |
|
|
| |
{C}
सेराक्यूस, न्यू यॉर्क शाखा ‘एक सांझ हिन्दी के साथ" की कुछ झलकियाँ
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
| |
| |
| |
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा
ड्लास ( Dallas) , टेक्सास शाखा में
शनिवार, २० अगस्त २०२२ को आज़ादी का अमृत महोत्सव
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
द्वारा- श्रीमती अनीता सिंघल, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की
राष्ट्रीय अध्यक्षा २०२२-२३
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
आज़ादी का अमृत महोत्सव शनिवार, २० अगस्त को शाम ७:३० बजे से ९:०० तक चला। कार्यक्रम २७०१ मार्क ट्वेन कोर्ट, अर्लिंग्टन, टेक्सास-७६००६, अमेरिका (राष्ट्रीय अध्यक्षा जी का निवास स्थान) पर डालास, टेक्सास शाखा में मनाया गया। कार्यक्रम का संचालन शाखा अध्यक्ष अखिल कुमार जी द्वारा किया गया। कार्यक्रम में ४० से अधिक लोग उपस्थित हुए।
इस ‘अमृत महोत्सव’ में एक लघु कवि गोष्ठी की गयी। इस कवि गोष्ठी में स्थानीय अ.हि.स. के सदस्यों और स्थानीय कवियों द्वारा उत्साह के साथ भाग लिया। इस कवि गोष्ठी के दौरान सम्पूर्ण
वातावरण जोश, उत्साह, उमंग, हास्य और आनंद से परिपूर्ण था।
उत्साहपूर्ण वातावरण और तिरंगे की पृष्ठभूमि में देव प्रकाश जी की मधुर आवाज़, धीरेन जी के मार्मिक व्यंग्य, निशी जी की क्षणिकाएँ और गुदगुदाने वाले हास्य, नीरज गुप्ता की स्टैंडअप मेरठी कॉमडी, शालिनी राय की शालीन शैली में अभिव्यक्ति, अखिल कुमार के द्वारा आशुतोष राणा द्वारा लिखित कविता की जीवन्त प्रस्तुति, संजीव अग्रवाल की चार-चार पंक्तियाँ, जयंत जी की ज्वलन्त राष्ट्रभक्ति की प्रस्तुति, सुभाष सिंघल और अनीता सिंघल की नारी शक्ति और राष्ट्रभक्ति के उद्गार सभी ने
‘अमृत महोत्सव’ की संध्या को ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ बना दिया। अनीता सिंघल ने सभी आये हुए मेहमानों एवं स्वंय सेवकों को धन्यवाद ज्ञापन किया ।
कवि गोष्ठी के समापन के पश्चात सभी ने सुरुचिपूर्ण, स्वादिष्ट रात्रि-भोज का आनंद लिया और जैसा कि
कहा गया है,‘अतिथि देवों भवः’ की भारतीय परम्परा के अनुसार अमृत महोत्सव के कार्यक्रम का समापन
सफलता पूर्वक हुआ ।
***
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
डॉ. सुभाष सी. सिंघल, अनीता सिंघल, श्रीमती शीला सिंह एवं डॉ. नन्द लाल सिंह
श्रीमती शीला सिंह द्वारा सब्जियों से बनाया गया भारतीय तिरंगा
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
| |
शाखा सचिव, मोती अगरवाल एवं श्रीमती परम अगरवाल
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
|
|
| |
श्री ज्योति पी. भाटिया एवंश्रीमती निशि भाटिया, पर्वू शाखा अध्यक्ष
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
| |
| |
अपनी कलम से
"75 वाँ अमृत महोत्सव सम्पन्न अब चिंतन की बारी"
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
75 वाँ अमृत महोत्सव सम्पन्न अब चिंतन की बारी
|
| |
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स
|
| |
|
| |
डॉ उमेश प्रताप वत्स लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है। ये यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं।
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने पर अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में देश ने 76 वाँ स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाया । लाल किले की प्राचीर से विश्व के सर्वमान्य नेता व भारत के आज तक के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया भी कि यह महोत्सव कोई सरकारी कार्यक्रम न रहकर जन आंदोलन बन गया है। अटक से कटक तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक चारों ओर बस अमृत महोत्सव की ही धूम थी, कुछ दिखाई दे रहा था तो बस तिरंगा।
शायद ही आजादी के बाद ऐसा महोत्सव देश ने कभी देखा हो जिसमें एक मजदूर भी दियाह्ड़ी करने अपनी पुरानी साईकिल पर तिरंगा बाँधकर शान से जा रहा हो। ना ही देश ने ऐसा महोत्सव आजादी के 25 वर्ष पूरे होने पर रजत-जयंती के रूप में देखा और न ही 50 वर्ष पूरे होने पर स्वर्ण-जयंती के रूप में देखा जो देखा जाना चाहिए था। देश के हर नागरिक ने अपने नये-नये ढंग से गली-गाँव-घरों को सजाया। सोशल नैटवर्क पर भाँति-भाँति प्रकार की वीडियो वायरल हुई। एक तो अपने दुपहिया वाहन पर सीलिंग फैन लेकर जा रहा था जिसकी पँखुडियाँ तिरंगे से रंगी गई थी और वह हवा में घूमने पर बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहा था। अब इस पंखें वाले को कोई जज्बाती कहे या पागल या अंधभक्त, इसे कोई फर्क नहीं पड़ता, यह तो अपने अलग अंदाज में हर घर तिरंगा कार्यक्रम के संकल्प को उत्साहित होकर निष्ठा से निभा रहा था और अपने इस कारनामे से बेहद खुश था।
जनता के राष्ट्रभक्ति के तिरंगे रंग में रंगे इसी जोश को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले 25 साल की यात्रा को देश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण बताया और इस अमृत महोत्सव से सजे अमृत काल में विकसित भारत, गुलामी की हर सोच से मुक्ति, विरासत पर गर्व, एकता और एकजुटता व नागरिकों द्वारा अपने कर्तव्य पालन के ‘‘पंच प्राण’’ का आह्वान किया। प्रधानमंत्री के अनुसार देश को विश्वगुरु के पूर्व स्थान पर फिर से स्थापित करने के लिए देश के नागरिकों को पंच प्राण का पालन करना होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी का 76 वाँ स्वतंत्रता दिवस एक ऐतिहासिक दिन है और यह पुण्य पड़ाव, एक नयी राह, एक नए संकल्प और नए सामर्थ्य के साथ कदम बढ़ाने का शुभ अवसर है। उन्होंने कहा कि जब वह 130 करोड़ देशवासियों के सपनों को देखते हैं और उनके आगे बढ़ने के जुनून को देखते हैं तो आने वाले 25 साल के लिए देश को ‘पंच प्राण’ पर अपनी शक्ति को पहचानना होगा, अपने संकल्पों को स्मरण रखना होगा तथा अपने सामर्थ्य को केंद्रित कर आगे बढ़ना होगा। लाल किले की प्राचीर से अपनी आवाज बुलंद करते हुए मोदी जी ने कहा कि हमें ‘पंच प्राण’ को लेकर 2047 तक चलना है। जब आजादी के 100 साल होंगे, आजादी के दीवानों के सारे सपने पूरा करने का जिम्मा उठा करके चलना होगा।
अब देश बड़े संकल्प लेकर चलेगा, और वो बड़ा संकल्प है विकसित भारत। किसी भी कोने में, मन के भीतर अगर गुलामी का एक भी अंश है तो हमें उससे मुक्ति पानी ही होगी। हमें हमारी विरासत पर गर्व होना चाहिए क्योंकि यही विरासत है, जिसने भारत को स्वर्णिम काल दिया था। हमें 130 करोड़ भारतियों में एकता चाहिए न कोई अपना न कोई पराया, एक भारत और श्रेष्ठ भारत के लिए यह प्रण है। नागरिकों के कर्तव्य से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी बाहर नहीं होते हैं। प्रधानमंत्री के आह्वान का उद्देश्य भारत को स्वावलंबी बनाकर विश्वगुरु के स्थान पर स्थापित करना है। जिसके लिए भारत को सर्वप्रथम विकसित भारत बनना होगा। यह तभी संभव है जब हम गुलामी की हर सोच से मुक्ति पा लेंगे। क्योंकि इस सोच ने कई विकृतियाँ पैदा कर रखी है, इसलिए गुलामी की सोच से मुक्ति पानी ही होगी। इसके साथ ही हर भारतीय को अपनी विरासत पर गर्व होना ही चाहिए। जब तक सब भारतीय आपस में एकजुटता के साथ नहीं रहेंगे और अपने नागरिक के नाते सभी कर्तव्यों को नहीं निभायेंगे तब तक लक्ष्य तक पहुँचना आसान नहीं है। प्रधानमंत्री जी के अनुसार जब सपने बड़े होते हैं, जब संकल्प बड़े होते हैं तो पुरुषार्थ भी बहुत बड़ा होता है, शक्ति भी बहुत बड़ी मात्रा में जुट जाती है और मंजिल हमारे कदमों में होती है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारी का सम्मान करने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि हमारी बोलचाल में कुछ विकृति आई है। हम अपने व्यवहार में अक्सर नारी का अपमान करते हैं। नारी का सम्मान करना देश की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है और हमें ऐसे शब्दों का त्याग करना चाहिए, जिससे महिलाओं का अपमान होता हो।
केवल मंदिर पर बजने वाला भजन 'रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता राम, ईश्वर अल्लाह तेरे नाम सबको सन्मति दे भगवान' मस्जिद पर भी बज सकेगा और जिस दिन यह भजन मस्जिद पर बजेगा उसी दिन से एक जुटता शुरू हो जायेगी तभी भारत के विकसित राष्ट्र व परम वैभव पर ले जाने वाला मार्ग प्रशस्त हो पायेगा।
****
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
| |
पहली कविता
--अन्धकार की बातें करते
बीत गए यूँ साल भतेरे।
तुमने जाने क्या सोचा है
मैंने तो बस यह सोचा है
एहसासों की दुनिया में मैं
अब कदम रखूँगा धीरे-धीरे।
नई कहानी कुछ लिख दूँगा
कुछ लिखूँगा पानी-सानी
राहगीर बन कुछ लिख दूँगा
इस ज़मीर पर नई दीवानी।
कोई जाने या न माने
नहीं रखूँगा कलम पैताने
अन्धकार की बातें करते बीत गए...
धरती का बज गया अलार्म
नदिया-नाते टें बोल रहे
टें बोल उठी गौरैया।
वोट-नोट में लिपटे रहकर
एक गया औ दूजा आया
प्रश्न खड़ा है अभी अनुत्तरित
लोक कहाँ है. तंत्र कहाँ है.
खोज लाये वो जंत्र कहाँ हैं।
बातें खाना-बातें पीना
धन-यश की खातिर बस जीना
आखिर इसकी भी तो हद हो
रिश्तों में कुछ तो मन रस हो
कैसे रखूँ मैं कलम पैताने
अन्धकार की बातें करते बीत गए ....
ऐसे प्यारे नहीं चलेगा
नहीं चलेगी सीनाजोरी
नहीं चलेगी देखा-देखी
नहीं चलेगी हरम तिजोरी।
जाने मुट्ठी कब बँधेगी
जाने नज़रें कब सधेंगी
जाने कब धरा ध्वजा पर
मेरा मस्तक उठ जायेगा
जाने कब लोक भेष ले
ध्वजा प्रहरी बन जायेगा।
जाने-जानम के चक्कर में
प्रश्न रहे जो प्रश्न थे मेरे
संकल्पों में वक्त लगेगा
पर नहीं रखूँगा कलम पैताने,
अंधकार की बातें करते बीत गए...
तुमने भी कुछ सोचा होगा
तुम भी रुस्तम छिपे घनेरे
अपनी खातिर नहीं सही पर
मेरी खातिर ही बतलाओ
मेरी खातिर खुद को जानो
खुद की ताक़त को पहचानो
मर्म नहीं पर धर्म को जानो।
सच कहता हूँ
एक बार जो धम्म बोलोगे
शांति-प्रीत के रस घोलोगे
एक बार जो उठा फावड़ा
हर किसान का सच बोलोगे।
बस, एक बार जो निकल पड़े तुम
पगडंडी पर लोकतंत्र की
दंड ध्वजा का तुम्ही बनोगे
साथ तुम्हारे कलम मिलेगी
संकल्पों की राह चलेगी
नहीं रखूँगा इसे पैताने
अंधकार की बातें करते बीत गए...
पर ये बातों से न होगा
शोणित लहू की चाह नहीं है
नहीं चाहिए बही खजाना।
कुछ फटे हुए दिलों को सीना
कुछ चली हुई हरकत को पीना
कुछ आँखों में खुशियों खातिर
कुछ आँखों में तरल वेदना
कुछ माटी में अथक पसीना।
कुछ बूंदें गर दे जाओगे
जीना सचमुच हो जायेगा
एक सुन्दर सार्थक जीना
क्या तुम ये करना चाहोगे ?
साल मुबारक कह पाओगे ?
एहसासों से भर पाओगे ?
मैंने तो बस सोच लिया है
नहीं रखूँगा कलम पैताने
अंधकार की बातें करते बीत गए....
***
दूसरी कविता
--हम भी भारत, तुम भी भारत...
खोज रहा तू अल्लाह-ईश्वर,
जीसस में प्रभु का संदेशा।
गौतम, नानक, महावीर सब
सेवा, करुणा, प्रेम बताते।
रहो कुदरती सब सिखलाते,
सब संप्रदाय का यही मर्म है।
हैं अनेक पर मूल को धारो,
पिण्ड नहीं, तुम प्राण निहारो।
प्रेम पगो औ दिलों को जोड़ो,
हम भी भारत, तुम भी भारत... .
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
द्वारा - श्री अरुण तिवारी जी
|
| |
|
| |
श्री अरुण तिवारी जी अमेठी, उत्तर प्रदेश से हैं|
इनकी अभिरुचि शिक्षा, पानी ,ग्रामीण विकास एवं सबलीकरण, आदि में हैं|
~*~*~*~*~*~*~*~
.
चाहे जिस घर शीश झुकाओ,
चाहे जैसी करो उपासना,
चाहे जिस तुम नाम पुकारो,
चाहे जैसा वेश तुम धारो।
वली वही है, वही है जीसस,
अंतस में सब करें रोशनी।
झूठे को पथ साँच दिखायें,
मेलजोल के खेल सिखायें।
कण कण जो रमता प्यारे,
राम रमैया वही तो न्यारे।
प्रेम पगो औ दिलों को जोड़ो,
हम भी भारत, तुम भी भारत... .
ढूँढ सको तो कुरान में ढूँढो,
न्याय की खातिर सूली चढ़ना।
ग्रंथ साहिब में सत्य अहिंसा,
रामायण में त्याग बुद्ध सा।
बाइबिल में नानक सी सेवा,
आगम में सब निगम एकेश्वर।
जेंद अवेस्ता में ओम् मंत्र को
त्रिपिटक में मुआफी मोहम्मद वाली।
वेदों में शबरी राम की प्यारे,
किस चक्कर में उलझा न्यारे।
प्रेम पगो औ दिलों को जोड़ो,
हम भी भारत, तुम भी भारत... .
पंचतत्व हर पिण्ड बना है,
सब कुदरत के बंदे प्यारे।
कुदरत चाहे एक बन्दगी,
इस जीवन में जितना पाया,
उतना सब तू अर्पण कर दे।
मानुस तन का यही धर्म है,
अधिक लेवे तो दानव है तू
अधिक देवे तो देव कहाए।
प्यार पगो और प्यार लुटाओ,
बँटवारे में प्रभु सुख नहीं प्यारे।
प्रेम पगो औ दिलों को जोड़ो,
हम भी भारत, तुम भी भारत...
***
तीसरी कविता
---कर्तव्य पथ
हमने चुना, हमने गुना,
वे दलों के दलदलों में,
स्वार्थ में डूबे हुए पथ भूलते,
पथ सही उनको दिखाओ,
लीक बदलो; नेता नहीं, प्रतिनिधि बनाओ।
बुहार दो, तैयार है पथ,
ले तिरंगा कर किनारे कीले काँटें कंटकों को,
यह समय की माँग है, कर्तव्य पथ है।
क्या पुतलियाँ काठ की हम,
खींचते जो डोर वे हम को नचाते,
कर हाथ खाली, भीख का दे कटोरा,
लूटते खातिर अमीरों, थाली बजाते,
तान छेड़ो, गान अंतिम जन का वक्त आ गया है।
बुहार दो, तैयार है पथ,
ले तिरंगा कर किनारे कीले काँटें कंटकों को,
यह समय की माँग है, कर्तव्य पथ है।
रोज चलते लोग कोसों,
उम्मीद की साँसें संभाले,
जब पाँव अपने खुद खडे़ हों,
खुद बढ़ें जिस ओर जन पग,
उसको सराहो, यह लोक का आलोक पथ है।
बुहार दो, तैयार है पथ,
ले तिरंगा कर किनारे कीले काँटें कंटकों को,
यह समय की माँग है, कर्तव्य पथ है।
इस पथ चला जो धीर धारे,
गले मिलता, दर्द सुनता,
ऐलानिया सब की सुनाता,
ललकारता मदहोश सत्ता को जगाता,
पथिक नहीं वह है स्वर अपना, उसको बढ़ाओ।
बुहार दो, तैयार है पथ,
ले तिरंगा कर किनारे कीले काँटें कंटकों को,
यह समय की माँग है, कर्तव्य पथ है।
सत्ताशाही के नशे में,
कुर्सियों में लिप्त नरों से,
वे तोड़ते, रोडे़ बिछाते,
जोड़ते हैं जो दिलों को,
उनको मिलाओ, पुल यही पथ भारती हैं।
बुहार दो, तैयार है पथ,
ले तिरंगा कर किनारे कीले काँटें कंटकों को,
यह समय की माँग है, कर्तव्य पथ है।
मौन तोड़ो, उठ खडे़ हो,
तोड़कों का तोड़ लेके,
जोड़ का मतलब बताओ,
है अधूरी आज़ादी को पूरी बनाओ।
भूलना मत, यह धर्म औ न्याय पथ है।
बुहार दो, तैयार है पथ,
ले तिरंगा कर किनारे कीले काँटें कंटकों को,
यह समय की माँग है, कर्तव्य पथ है।
***
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
| |
विश्वकर्मा जयंती
तकनीकी कला के ज्ञाता,
देवालय, शिवालय के विज्ञाता।
सत्रह सितम्बर है जन्म दिवस,
कहलाते शिल्पकला के प्रज्ञाता।।
कला कौशल में निपुण,
बनाए सोने की लंका,
विश्वकर्मा भगवान तो है,
सभी देवों के अभियंता।।
शिल्प कला के हैं जो ज्ञाता,
विष्णु वैकुंठ के हैं निर्माता।
कहते हम प्रभु दो हमको ज्ञान,
क्योंकि हमें कुछ भी नहीं आता।।
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
|
|
| |
श्री अंकुर सिंह जौनपुर, उत्तर प्रदेश से हैं। इन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। ये आदित्य बिरला ग्रुप में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।
~*~*~*~*~*~*~*~
पृथ्वी, स्वर्ग लोक के भवन बनाएं,
विष्णु चक्र, शिव त्रिशूल तुम्हीं से पाएं।
किए सब देवन पर कृपा भारी,बनाएं
पुष्पक दें कुबेर को किए विमान धारी।।
इंद्रपुरी, कुबेरपुरी और यमपूरी बनाएं
द्वारिका बसा कृष्ण के प्रिय कहलाएं ।
तुम्हारे बनाए कुंडल को धारण कर,
दानी कर्ण कुंडल धारक कहलाए ।।
विश्वकर्मा जी है पंच मुखधारी
करते है हंस की सवारी,
तीनों लोक, चौदहों भुवन में,
सब करते उनकी जय जयकारी।।
मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी, दैवज्ञा पुत्र तुम्हारे,
पधार संग इनके प्रभु आज द्वार हमारे ।
महर्षि प्रभास, देवी वरस्त्री के सुत आप,
आए हरो प्रभु अब, कष्ट सब हमारे।।
***
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
द्वारा- श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव
|
| |
|
| |
श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय”, औरंगाबाद- महाराष्ट्र से हैं। लेखन के साथ-साथ शोध कार्य में अध्ययनरत हैं।
~*~*~*~*~*~*~*~
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
गाँव में सामाजिक परिवर्तन किस तरह से किया जा सकता है, इस संदर्भ में उच्च शिक्षित लड़कों में चर्चा हो रही थी, उसी समय जोर से आवाज आई- "जीत बेटा जल्द घर आना, काम है तुमसे" माँ ने कहा। जीत घर दौड़ते-दौड़ते आया ओर कहने लगा- "बताइए माँ क्या काम है?"
"जीत, पढ़ाई कब तक करनी है?" माँ ने पूछा।
"माँ मुझे बहुत पढ़ना है, सिर्फ़ नौकरी के लिए नहीं, समाज परिवर्तन के लिए" जीत ने कहा।
"बेटा, पढ़ाई बहुत हुई है तेरी, अब तू डाक्टर बना है साहित्य का" माँ ने कहा।
“हाँ, सही है माँ, लेकिन मुझे और पढ़ना है, लिखना है। स्री समस्या समाज के सामने लानी हैं और समाज सेवा भी!”
"तुझे जो करना है वह कर, उसके पहले विवाह कर" माँ ने कहा।
“इतना जल्द विवाह, संभव नहीं माँ, मुझे समय चाहिए” ।
“बेटा जीत, मेरी अब उम्र हुई है और हम देहात में रहते है, जल्द विवाह नहीं किया तो समाज ताने मारेगा”।
"मुझे कौन लड़की देगा माँ? मेरे पास क्या है? न नौकरी न घर" जीत ने गंभीर स्वर में कहा।
"तेरे पास शिक्षा है, मेहनत करने की क्षमता भी और क्या चाहिए तुम्हें ?" माँ ने कहा।
“ठीक है माँ, मैं विवाह करने के लिए तैयार हूँ किन्तु मुझे पढ़ी, लिखी लड़की चाहिए”।
"पढ़ी, लिखी लड़की है मेरे नज़र में" माँ ने आनंदित होकर कहा।
"कौन माँ ?" जीत ने उत्साहपूर्ण भाव से पूछा।
“आशा नाम की तरह ज़िंदगी में आशावादी है और निरंतर रहेगी। वह गरीब परिवार से है किन्तु संस्कारी है। वह मेरी बहू बनने के लिए पात्र है। उसकी शिक्षा स्नातकोत्तर तक हुई है। दोनों के विचार भी मिलेंगे। लड़की को देखने के लिए जल्दी जा, जीत”।
“देखने की जरूरत नहीं है माँ। आप को पसंद हैं, तो मुझे भी। विवाह का मुहूर्त निकाल दीजिए” ।
विवाह का मुहूर्त निकला। जीत और आशा का विवाह धूमधाम से हुआ। ज़िंदगी की नई शुरुआत हुई। एक दूसरे से प्रेम बढ़ता गया। सुख-दुःख के साथ विवाह को तीन साल पूरे हुए।
एक दिन जीत ने कहा- "आशा हमारे विवाह को तीन साल हुए, अब मुझे लड़का चाहिए।"
"जल्द ही खुशख़बरी दूँगी तुम्हें। लेकिन आप को लड़का ही क्यों चाहिए?" आशा ने पूछा।
"घरानों का नाम चलाने के लिए" जीत ने कहा।
"घरानों का नाम, सिर्फ़ लड़का चलता है, यह धारणा सरासर गलत है, लड़की तो दो घरानों का नाम
चलाती है, ससुराल और मायके का" आशा ने कहा।
"मतलब, मैं नहीं समझा" जीत ने कहा।
“तो सुनो जीत, किसी लड़की का विवाह होता है, वह कालांतर से नौकरी में लगती है, तो वह पहले मायके का सरनेम लगाती है और बाद में ससुराल का” ।
"तब भी मुझे सिर्फ़ लड़का चाहिए, मुझे ही नहीं तो मेरे माँ को भी लड़का ही चाहिए" चिल्ला कर जीत ने कहा।
“आख़िर क्यों जीत? बुढ़ापे की चिंता सताती है क्या तुम्हें? वर्तमान में ज़्यादातर लड़कियाँ ही माँ-बाप का
सहारा बन रही हैं, उनकी देखभाल कर रही हैं। बहुत से लड़के माँ, बाप को अनाथ कर रहे हैं और बाद में आश्रम में डाल रहे हैं, यह वास्तविक परिस्थिति तुम्हें स्वीकारनी होगी” ।
"आप पढ़े-लिखे होकर भी ऐसी बातें कर रहे हो जीत, यह शोभा नहीं देता। आप तो समाज सेवा करते हैं और विचार ऐसे...!"
"मुझे प्रेगनेंट रहे चार माह हुए जीत लेकिन मैंने आप को बताया नहीं" आशा ने शांत आवाज में कहा।
"अच्छा, कोई बात नहीं। हम कल चेकअप कर लेते है, समझ आएगा लड़का है या लड़की" जीत ने कहा।
"चेकअप तो बंद है" आशा ने कहा। "पैसों से सब कुछ होता है, प्राइवेट अस्पताल में। चल, काम हो जाएगा" जीत ने कहा। अस्पताल में चेकअप हुआ, आशा को रूम से बाहर निकाल दिया और जीत को सब बातें बताई गई। अस्पताल के बाहर जीत आने के बाद आशा ने पूछा- "क्या हुआ जीत? डाक्टर साहब ने क्या कहा?" जीत ने कहा- "जो नहीं होना था वही हुआ।" “मतलब, जीत” ।
"लड़की है" जीत ने दुःख भरे स्वर में कहा।
“यह किसी के हाथ में नहीं है जीत। लड़की को हम अच्छी तरह पढ़ाएंगे” ।
"नहीं! नहीं!! गर्भ गिराना होगा" जीत ने तिरस्कार भाव से कहा।
“मैं नहीं गिराऊँगी जीत। लड़का या लड़की होना तो पुरुष पर निर्भर रहता है, इसमें स्री का क्या दोष? तब भी स्री को दोषी ठहराया जाता है”।
"तुझे घर छोड़ना पड़ेगा, आशा" जीत ने कहा।
“मैं कुछ भी करूँगी किन्तु लड़की को जन्म देकर रहूँगी जीत”। वह अपने गाँव के तरफ़ गई। वहाँ, परिवार वाले आशा को स्वीकार ने के लिए तैयार नहीं थे। सब स्वार्थी बन गए थे। सब अपने कार्य में व्यस्त थे। माँ-बाप का लड़कों के सामने कुछ नहीं चला। आशा दिन भर गाँव में घूमती रही। उसी समय सुमन की नज़र आशा पर पड़ी और उसने कहा- "कब आई आशा?"
"आज ही आई हूँ" आशा ने उत्तर दिया।
"तुम अपने घर क्यों नहीं गई?" सुमन ने पूछा।
"मेरा कोई घर नहीं रहा, न ससुराल का न मायके का। मैं बेघर हूँ बेघर...! भाई कहते है कि तुम्हारा विवाह हुआ, तुम्हारे यहाँ के अधिकार खत्म हुए और पति कहता है, मेरे घर में मत रहना। मैं करूँ तो क्या करूँ?" निराश भाव से आशा ने कहा।
डरना मत आशा, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मेरे घर चल, वह घर तेरा समझ और मुझे माँ।
"मैं आती हूँ लेकिन एक शर्त पर" आशा ने कहा।
"कौन-सी शर्त?" सुमन ने पूछा।
मैं आप के घर के पास रहूँगी, आप के घर में नहीं। मैं तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती।
"जो तुझे सही लगे वह कर" सुमन ने कहा।
आशा मेहनत करती रही, ख़ुद के पैरों पर खड़ी हुई। देखते-देखते समय बीत गया और नौ माह पूरे हुए। एक दिन रात को आशा को बहुत तकलीफ़ होने लगी। आवाज सुनकर सुमन उसके पास गई और पूछने लगी- "क्या हुआ आशा?"
आशा ने कहा- "मुझे बहुत तकलीफ़ हो रही है, मुझे अस्पताल लेकर चल, प्राइवेट नहीं सरकारी अस्पताल।"
सुमन ने कहा- "सरकारी अस्पताल में डाक्टर साहब ध्यान नहीं देते। मेरे पास पैसे है, प्राइवेट अस्पताल चलेंगे।"
"नहीं, सरकारी अस्पताल में ही" आशा ने जोर से कहा।
रात के बारह बजे अस्पताल जाने के बाद देखा वहाँ कोई नहीं था। नर्स थी, वह भी अच्छी तरह बात नहीं कर रही थी। डाक्टर साहब को फोन लगाने के बजाय जोर-जोर से कहने लगी- "तुझे यही समय मिला क्या आने के लिए? नींद ख़राब की। ख़ुद भी सुकुन से नहीं जीती और दूसरे को भी नहीं जीने देती।"
यह सुनकर सुमन को बहुत गुस्सा आया। उसने बहुत गालियाँ दी, तब भर्ती कर लिया।
सुमन कहने लगी - "आशा,लोग इस तरह बर्ताव क्यों करते है?"
आशा ने कहा- "जाने दो सुमन, छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती है। किन्तु डाक्टर साहब कब आ जाएंगे, मुझे दर्द हो रहा है।"
सुमन ने कहा- "धीरज रख, जल्द आ जाएंगे।"
"मुझे शौचालय के लिए जाना है, मुझे लेकर चल भला" आशा ने कहा।
"यहाँ तो शौचालय नहीं है, कहाँ जाएंगे रात के समय?" सुमन ने कहा।
“अस्पताल के बाहर चल सुमन, शौचालय तो जाना ही पड़ेगा। सरकारी अस्पताल है, इतना तो कष्ट झेलना होगा। यहाँ पैसे भी कम लगते हैं...”
सुमन ने कहा- "आशा, क्या सरकार उन्हें पैसा नहीं देती, बहुत फण्ड देती है किन्तु सब मिल बाँटकर खा जाते हैं। सुविधा कुछ नहीं करते। इस कारणवश यह दिन देखने को मिल रहे हैं। डाक्टर साहब सरकार का पगार लेते हैंऔर ख़ुद के प्राइवेट अस्पताल में रहते हैं। उनके पास सरकारी अस्पताल में आने के लिए समय नहीं”।
“सुमन बस हुआ भाषण, चल जल्दी अस्पताल के अंदर” । शौचालय से आने के बाद थोड़ी देर के लिए अच्छा लगा, बाद में दर्द और बढ़ा। दर्द सहते-सहते सुबह हुई, तब भी डाक्टर साहब नहीं आए थे। कुछ समय बाद नर्स की आवाज सुनाई दी, डाक्टर साहब सुबह आठ बजे तक आ जाएंगे।
डाक्टर साहब को आते हुए देखकर सुमन ने कहा- "आशा अंदर चल, मैं नर्स को बुलाती हूँ। नर्स को बहुत आवाज दी, वह आने के लिए तैयार नहीं थी क्योंकि उन्हें पैसों की लालसा थी।"
नर्स ने धीरे आवाज में कहा- "मुझे पाँचसौ रुपये चाहिए, तभी मैं आशा को अंदर लेकर जाऊँगी।"
सुमन कहने लगी- "क्या समय आया है, किसी को किसी व्यक्ति की कीमत नहीं है। सब पैसों के पीछे पड़े हैं, यह कहकर पाँचसौ रूपये दिए।"
आशा को अंदर लेकर जाने के बाद बहुत तेज़ी से तकलीफ़ शुरू हुई, खून कम होने के वजह से। दो-तीन घंटों बाद अंदर से आवाज आई- “लड़की हुई है लड़की, बाहर कोई रिश्तेदार हो तो अंदर आइए”। वहाँ अपने कोई रिश्तेदार नहीं थे, सुमन दौड़ते-दौड़ते गई और आशा को वार्ड में लेकर आई।
आशा को होश आया और वह कहने लगी- "मेरी बेटी कैसी है? सब ठीक ठाक है न....”
"हाँ, सब ठीक ठाक है" सुमन ने कहा।
आशा ने कहा- "पति, सास, भाई, माँ-बाप आदि में से कोई मिलने आया है क्या?"
सुमन ने कहा- "मैं हूँ न, तुझे किसी की ज़रूरत नहीं।"
“हाँ, वह तो मुझे समझ में आ गया सुमन, तू ही मेरे लिए सब कुछ है। अब मैं मेरी बेटी को लेकर
दूर चली जाऊँगी, दूसरे गाँव, शहर में। बेटी ही मेरा सब कुछ है। मैं कभी हार नहीं मानूँगी, जान भी नहीं दूँगी। उसे बहुत पढ़ाऊँगी और स्वावलंबी बनाऊँगी और उसे अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए सक्षम
बनाऊँगी” ।
***
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
| |
| |
| |
बाल खंड (किड्स कार्नर)
"एक पिता का पत्र पुत्री के नाम"
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
एक पिता का पत्र पुत्री के नाम
|
| |
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
द्वारा - श्रीमती संगीता शर्मा
|
| |
|
| |
श्रीमती संगीता शर्मा एक सफल गृहिणी हैं और इन्होंने हाल ही में उन संघर्षों के बारे में कहानियाँ लिखना प्रारंभ किया है, जिनका सामना एक मध्यम, निम्न-मध्यम वर्ग की भारतीय महिलाएँ करती हैं।
~*~*~*~*~*~*~*~
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
शुभी आज बहुत रो रही थी , उसके हाथ में अपने पापा का लिखा हुआ लंबा चौड़ा पत्र था। जब पापा थे तो हमेशा पापा से लड़ती रहती थी पापा के तर्कों को कभी सही नहीं बताती थी, और आज जब वह नहीं है तो उनकी बहुत याद आ रही है। लगता है क्यों वह पापा से हर समय बहस करती थी पापा का देहांत हुए आज एक महीना हो गया था।
जब पापा का सभी काम करके शुभी ससुराल वापस आ रही थी , तो मम्मी ने यह पत्र शुभी के हाथ में दिया था और कहा था “ देहांत के २ दिन पहले तुम्हारे पापा तुम्हारे लिए दे गए थे”
तब शुभी ने कहा “ क्या पापा को पहले से ही मालूम था कि वह जाने वाले हैं ?”
तब मम्मी ने कहा “नहीं जब उन्होंने यह पत्र मेरे हाथ में दिया था मैंने कहा था कि आप ही क्यों नहीं दे देते ?”
तो उन्होंने कहा “मेरे से हर समय बहस करती रहती है पता नहीं पढ़ेगी की नहीं तुम दोगी तो शायद पढ़ लेगी”
तब शुभी ने वह पत्र लेकर अपनी अटैची में रख लिया था।
शुभी ने सोचा था की घर पहुँच कर पढूँगी लेकिन काम धाम में वह भूल गई आज वह अटैची खोलकर कुछ ढूँढ रही थी तभी वह पत्र मिला और वह पढ़ने बैठ गई, जैसे- जैसे पत्र पढ़ती जा रही थी उसकी सिसकियाँ बढ़ती जा रही थी पत्र का विवरण इस प्रकार से था :-
मेरा प्यारा बच्चा शुभी,
मैं जानता हूँ की तुझे मुझसे बहुत शिकायतें होंगी। तेरी शिकायत वाजिब है। लेकिन बेटा क्या तुझे अपने पापा के जीवन के संघर्षों के बारे में पता है?
तुम लोग अपनी मम्मी के साथ दूसरे शहर में रहते थे और मैं दूसरे शहर में रहता था। मैंने और तुम्हारी मम्मी ने बहुत ही मुश्किलों से तुम लोगों का पालन पोषण किया है। मैं हफ्ते में एक दिन के लिए आता था उस एक दिन में २४ घंटे दौड़ता ही रहता था क्योंकि बाकी के ६ दिन तो तुम्हारी मम्मी को ही सँभालना पड़ता था। मेरी कोशिश यही रहती थी कि उस एक दिन में घर के बाहर का अंदर का जो भी काम मुझसे हो सके चाहे राशन-पानी हो दवा-दारू हो कॉपी-किताब हो या फिर घर की कोई टूट-फूट मैं कर सकूँ।
तुम्हारे दादा-दादी और बड़े पापा मम्मी के जाने के बाद तो मेरी जिम्मेदारियाँ और भी बढ़ गई थीं उनके पाँच बच्चों और अपने पाँचों बच्चों की शादी विवाह किस मुश्किलों से की है तुम्हें शायद नहीं पता, तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पापा लड़कियों से प्यार नहीं करते खासकर के तुम्हारी बड़ी दीदी से ऐसा नहीं है बेटा।
तुम सोचती हो कि जब तुम्हारी बड़ी दीदी तुम्हारे जीजा जी से लड़कर आई थी और ससुराल वापस ना जाने के लिए कह रही थी, मैंने समझा बुझा कर उसे वापस ससुराल भेज आया था तुम्हें लगता था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मैं तुम्हारा प्यार समझता हूँ अपनी बहन के लिए या तुम्हें यह बुरा लगता है की घर के किसी मामले में मैं तुम लोगों को बोलने नहीं देता हूँ और हमेशा यही कहता हूँ की अपने ससुराल में मस्त रहो जब खुशी-खुशी आना हो तभी मायके आना नहीं तो वहीं रहना।
अब मैं ऐसा क्यों कहता हूँ सुनो बेटा हर घर में थोड़ा बहुत झगड़ा होता है जहाँ दो बर्तन होते हैं वह टकराते ही रहते हैं यदि मैं तुम लोगों के छोटे- मोटे झगड़े में तुम्हारा साथ दूँगा तो तुम हर समय अपने मायके भागती रहोगी और अपने ससुराल को अपना घर नहीं बना पाओगी। आज मैं हूँ साथ दे दूँगा ! कल नहीं रहूँगा तब भी तो तुम्हें अकेले ही सँभालना है। तो आज से ही क्यों नहीं?
चाहे जैसी भी परिस्थिति हो आपको उसमें ढलना आना चाहिए मैं यह नहीं कहता कि आप पर कोई अत्याचार करे तो आप सहन करें। नहीं ! उसका मुकाबला करें और मुँह तोड़ जवाब दें जैसे जब कोई डूबने लगता है तो हाथ पाँव मारना शुरू कर देता है और किनारे पर आ जाता है उसी प्रकार मैं चाहता हूँ कि तुम लोग भी जीवन की कठिनाईयों में तैरना सीख जाओ और आसानी से किनारे पर पहुँच जाओ।
जब तक मैं जीवित हूँ हो सकता है कि मैं किनारे पहुँचने में तुम्हारी मदद कर सकूँ तुमने तो देखा ही होगा की अब तुम्हारे दीदी जीजाजी कितनी खुशी से अपना जीवन बिता रहे हैं मैं जानता हूँ कि तू अपनी शादी में खुश नहीं है तुझे लगता है कि मैंने जानबूझकर तेरी शादी ऐसी जगह की जहाँ तुझे बाहर घूमने-फिरने की आजादी नहीं है तुझमें और तेरे पति में सही से तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। जब तू यह सारी बातें अपनी मम्मी को बताती है और रोती है तो क्या मुझे दुख नहीं होता? मैं नहीं रोता? लेकिन बेटा मैं दिखाता नहीं हूँ। यदि मैं भी तेरे सामने रोने लग जाऊँगा तो तू हिम्मत हार जाएगी, तू बड़ी हिम्मत से अपनी घर गृहस्थी सँभाल रही है। बहुत जल्दी ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है, नहीं तो तू सामान्य कर देगी।
बेटा जोड़ियाँ ऊपर से बनकर आती हैं इसमें हम और आप कुछ नहीं कर सकते कोई भी माँ बाप अपने बच्चों के लिए बुरा नहीं सोचते वह सदैव ही चाहते हैं कि उनका बच्चा वह सारी खुशियाँ पाए जो माँ बाप ने कभी सोचा भी नहीं था। यह कभी मत सोचना की पापा तुझसे प्यार नहीं करते पापा भी तुझे बहुत प्यार करते हैं लेकिन वह बताते नहीं है मुझे उम्मीद है की सारी बातें जानकर तूने अपने पापा को माफ कर दिया होगा और सारी गलतफहमियाँ दूर हो गई होंगी।
तेरे प्यार के लिए तरसता,
तेरा पापा
***
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
| |
| |
| |
"विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day)"
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
पहली पंक्ति –भारत के प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी की भाभी, शशि मोदी, अंजना शाह,
श्रीमती हीराबेन मोदी
दूसरी पंक्ति - शैली सूरी, सुनीता पटेल, सुरक्षा प्रहरी(खड़े हैं)
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
| |
|
|
| |
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्या, श्रीमती शशि मोदी, अहमदाबाद, गुजरात में अपनी ३ सहेलियों के साथ विश्व पर्यावरण दिवस पर श्रीमती हीराबेन मोदी के निवास स्थान पर गयीं। गाँधीनगर में वृक्षारोपण का कार्य चल रहा था, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्या, श्रीमती शशि मोदी, अहमदाबाद, गुजरात में अपनी ३ सहेलियों के साथ पूज्य माताजी हीराबा के दर्र्शन करके उनसे आशीर्वाद लिया और उनके हाथ से स्पर्श करवा कर वह बेलपत्र का पोधा पास ही के शिवालय में लगवा दिया।
***
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
| |
| |
| |
विनम्र श्रद्धांजलि सत्य प्रकाश श्रीवास्तव, "राजू श्रीवास्तव"
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
(२५ दिसंबर १९६३ – २१ सितम्बर 2022)
|
| |
|
|
|
|
|
|
 |
| |
|
|
|
| |
स्वर्गीय सत्य प्रकाश श्रीवास्तव, जिन्हें पेशेवर रूप से राजू श्रीवास्तव के नाम से जाना जाता है और अक्सर उन्हें गजोधर के रूप में श्रेय दिया जाता है। स्टेंडिंग कोमडी के प्रसिद्ध कलाकार राजू श्रीवास्तव जी हमारे बीच नहीं रहे। लगभग एक माह से वे आल इंडिया मैडिकल इंस्टीट्यूट में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। एक साधारण परिवार में जन्मे और एक आम आदमी की तरह दिखने वाले राजू श्रीवास्तव जी ने अपनी प्रतिभा के बल पर हास्यव्यंग्य की दुनिया में एक बड़ी जगह बनाई और स्टेंडिंग कोमेडी से टीवी और फिल्मों तक पहुँचे वे कलाजगत में अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत थे। उनका असमय जाना उनके प्रशंसकों के लिए बड़ा आघात है। मेरी ओर से एवं अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से उनको विनम्र श्रद्धांजलि।
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
Date: Sun 9/11/2022 9:32 AM
हार्दिक धन्यवाद। आदरणीया।सुशीला मोहनका जी।
IHA Id No.: LM15070301
Dr. Ram Gopal Bhartiya
Vice-President IHA India Chapter UP
***
Date: Sun, Sep 11, 2022, 8:12 PM
नमस्ते मैम
आप में साहित्य के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की जो ललक है उसी का परिणाम है कि आप निरन्तर उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जा रही हैंऔर साहित्य को उस फलक तक ले जायेगीं ऐसा मेरा विश्वास है।आप का जो चुनाव है,जो वैविध्य है, वह मुझे बहुत प्रभावित करता है और आप से बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है।साहित्य में निरंतरता बनी रहे इन्ही शब्दों के साथ आपको बहुत बहुत धन्यवाद देती हूँ।
आपकी शुभेच्छु
डॉ. नीलम सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी)
सम्पूर्णानंद,संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी
***
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
| |
| |
| |
"संवाद" की कार्यकारिणी समिति
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
. सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
. सहसंपादक – डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP, dr.archana2309@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
| |
सुशीला मोहनका
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्य एवं सदस्याओं को,
ओणम, विश्वकर्मा पूजा, नवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी
है।‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी। जागृति’ की सातवीं कड़ी शनिवार, ८ अक्टूबर २०२२ को दिन में ११:०० बजे (EST) से अमेरिका में और ८ अक्टूबर २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से विनम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों ने १४ सितम्बर २०२२ को अपने अपने यहाँ “हिंदी दिवस”उत्साह और ऊर्जा के साथ मनाया होगा। कार्यक्रम की रिपोर्ट भेज दी है तो मेरा धन्यवाद स्वीकार करें | अगर किसी कारण से नहीं भेज पाए हैं तो आपसे अनुरोध है कि रिपोर्ट भेजने या भिजवाने का कष्ट करें।
एक विशेष निवेदन है कि अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें साथ ही कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया
गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं
को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य
प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
आप सभी विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का सितम्बर २०२२ का अंक अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में
आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें। सहयोग की अपेक्षा के साथ,
***
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
| |
| |
|
 |
|
| |
|
|
| |
 |
| |
|
|
|
| |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
This email was sent to {{ contact.EMAIL }}You received this email because you are registered with International Hindi Association
mail@hindi.org | www.hindi.org
Management Team
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
© 2020 International Hindi Association
|
|
|
|
|
| |
|
|
|