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INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
सितम्बर 2021, अंक 4| प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अध्यक्षीय संदेश
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-- अजय चड्ढा
मुझे आशा है कि आप सभी डेल्टा संस्करण से स्वस्थ और सुरक्षित हैं। पिछले महीने के समाचार पत्र सम्वाद में सूचित किया गया था कि अ.हि.स. का २० वां द्विवार्षिक अधिवेशन आभासी (वर्चुअल) रूप में आयोजित कियाजाएगा। अधिवेशन के आभासी रूप में होने से अमेरिका के अन्य राज्यों और विश्व के अन्य देशों के लोगों की भागीदारी बढ़ेगी। सम्मेलन के लिए एक और आकर्षण यह है कि इस सम्मेलन के मूल विषय को प्रस्तुत करने के लिए कार्यशालाओं को एक दिन के बजाय दो दिनों में किया जा रहा है। श्रोताओं तक सर्वोत्तम गुणवत्तापूर्ण कार्यक्रम पहुँचाने के लिए अधिवेशन की संयोजक समिति और आतिथ्य समिति बहुत मेहनत कर रही है। दूरी के कारण समय को ध्यान में रखकर अधिवेशन की तिथियों को बदलकर ९ अक्टूबर और १० अक्टूबर कर दिया गया है। मुझे आशा है कि आपको कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी पहले ही मिल चुकी होगी। अधिवेशन को सफल बनाने के लिए आपकी उपस्तिथि प्रतीक्षित है।
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अ.हि.स. का २०वाँ द्विवार्षिक आभासी अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन (वर्चुअल/Virtual)
अक्टूबर ९ एवं १०, २०२१
आतिथ्य – अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
अधिवेशन का मूल विषय – ‘दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने और सिखाने की विधि’
‘Teaching & Learning Techniques for Hindi as a 2nd Language’ |
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नोट - अधिवेशन में सारी गतिविधियाँ मूल विषय के लक्ष्य की पूरक रहेंगी।
हिन्दी भाषा हमारी भावी पीढ़ियों के बीच हमारी संस्कृति और पहचान को बनाए रखने की कुंजी है।
नोट: आज पुरी दुनिया Covid-19 की तीसरी लहर (COVID डेल्टा वैरिएंट सर्ज) से त्रस्त है। अमेरिका के ओहायो राज्य में भी Covid-19 का प्रकोप पिछले सप्ताह बड़ी तेजी से बढ़ा है। इस विषम परस्थिति को देखते हुए समिति ने आपत्तिकालीन बैठक आहूत की। गहरे विचार-विमर्श के बाद यह निश्चित किया गया है कि अब अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २०वां अधिवेशन आभासी रूप में ही किया जाये, अभी की परस्थिति में यही उचित और न्यायसंगत है।
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२० वें द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन 2021 के पदाधिकारी
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२० वें द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन 2021 के पदाधिकारी
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| Register at: |
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For any queries for Convention:
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Kiran Khaitan
(330) 622 1377
Convener
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Dr. Shobha Khandelwal
(330) 421 6638
Co- Convener
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Renu Chadda
(216) 544 7285
Co- Convener
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स्मारिका, पुरस्कार, सम्मान, पुस्तक-विमोचन, कवि-सम्मेलन, कार्यशालाओं, प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विभिन्न खेलों और सभी उम्र के लोगों के लिए आनन्द ही आनन्द, साथ ही बहुत कुछ नया सीखने के लिए, कृपया अपने परिवार और मित्रों के साथ बड़ी संख्या में शामिल हों।
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स्मारिका - इस अवसर पर सुन्दर, आकर्षक और सुरुचिपूर्ण रंगीन स्मारिका भी छापी जा रही है। इसके लिए तन-मन और धन तीनों की आवश्यकता है, आपका सहयोग चाहिये। आप अपनी रचनायें प्रकाशन हेतु जल्दी भेजने का कष्ट करें। रचना के साथ अपना संक्षिप्त परिचय, पासपोर्ट साईज फोटो क्लियर बैकग्राउंड के साथ अवश्य भेजें।
आभासी अधिवेशन की विशेष सूचनाएँ जल्दी ही अ.हि.स. की निम्नलिखित वेबसाइट पर देखी जा सकेंगी –
१. www.hindi.org
२. http://iha-neohio.com
३. Facebook - IHA Northeast Ohio Chapter
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| अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-कारमेल इंडियाना में 2021 हिंदी-दिवस समारोह |
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द्वारा- डॉ. राकेश कुमार
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- कारमेल, इंडियाना शाखा २०२१
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-कारमेल, इंडियाना ने हिंदी-दिवस मनाने के लिए रविवार, 19 सितंबर, 2021 को इंडियानापोलिस के ईगल पार्क में हिंदी-दिवस पिकनिक का आयोजन किया। इस पिकनिक में बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्थानीय कवियों द्वारा हिंदी कविता पाठ, खेल, हिंदी प्रश्नोत्तरी और अन्य मनोरंजक गतिविधियों को शामिल किया गया था ताकि हिंदी भाषा के महत्व और अगली पीढ़ी के लिए इसके प्रचार-प्रसार को उजागर किया जा सके। पिकनिक में कुल पैंसठ (65) लोग शामिल हुए। बारह (12) बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुति और हिंदी प्रार्थना में भाग लिया। पाँच (5) स्थानीय कवियों ने अपनी हिंदी कविता का पाठ किया और दस (10) वयस्कों ने सामूहिक हिंदी प्रार्थना गीत प्रस्तुत किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के बाद सभी प्रतिभागियों को 10 मिनट में उत्तर देने के लिए 20 हिंदी प्रश्नों का प्रश्न पत्र दिया गया। बच्चों को ट्राफियाँ दी गईं और सभी कवियों और अन्य वयस्क प्रतिभागियों को प्रशंसा प्रमाण-पत्र प्रदान किये गये। हिंदी प्रश्नोत्तरी के विजेताओं को मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित "गोदान", "प्रेमचंद की अमर कहानियां", "बड़े घर की बेटी" शीर्षक वाली पुस्तक दी गई। अन्य विजेताओं को ट्राफियां भी दी गईं।
पिकनिक की शुरुआत सुबह 10:30 बजे चाय और नाश्ते पर मिलने और अभिवादन के साथ हुई। पूर्वाह्न 11:30 बजे, अ.हि.स., कारमेल, इंडियाना शाखा के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और हिंदी दिवस समारोह के महत्व और कारण के बारे में जानकारी दी। इसके बाद, प्रमुख सलाहकारों में से एक और अ.हि.स. की आजीवन सदस्या, श्रीमती श्वेता सिंह ने अनुष्ठान प्रमुख के रूप में मंच संभाला और बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम, कविता पाठ और हिंदी में अन्य प्रस्तुतियों का सफलतापूर्वक समन्वय किया। अ.हि.स कारमेल, इंडियाना शाखा के सचिव, श्री राघवेंद्र सिंह भदौरिया ने हिंदी प्रश्नोत्तरी आयोजित करने में मदद की और डॉ. कुमार अभिनव ने ट्रॉफी और प्रमाण पत्र वितरित करने में मदद की। डॉ. कुमार अभिनव ने एक बहुत ही प्रेरणादायक हिंदी, “इतनी शक्ति हमें देना दाता...” गीत पृष्ठभूमि संगीत के साथ भी गाया। कार्यक्रम के बाद, सभी ने शाकाहारी दोपहर के भोजन का आनंद लिया और फिर कुछ मजेदार हिंदी गतिविधियों और समाजीकरण के साथ उत्सव को जारी रखा। अ.हि.स., कारमेल, इंडियाना शाखा के प्रमुख सलाहकारों में से एक और अ.हि.स., की आजीवन सदस्या, श्रीमती अनुराधा कुमार ने दोपहर के भोजन की व्यवस्था में बहुतसहायता की और सुनिश्चित किया कि सभी को दोपहर का भोजन मिले। उन्होंने हिंदी दिवस पिकनिक योजना में भी मदद की थी। अ.हि.स. की वरिष्ठ आजीवन सदस्या और प्रमुख सलाहकार श्रीमती विद्या सिंह ने भी हिंदी पिकनिक की योजना बनाने में मदद की थी। अ.हि.स. के आजीवन सदस्य डॉ. देवव्रत सिंह और श्री प्रकाश श्रीवास्तव ने फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए मदद की थी। अ.हि.स के सभी सदस्यों ने श्रीमती विद्या सिंह, श्रीमती अनुराधा कुमार, श्रीमती श्वेता सिंह, डॉ. देवव्रत सिंह और श्री प्रकाश श्रीवास्तव के प्रति उनके सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। हमारा हिंदी दिवस समारोह दोपहर 3:00 बजे तक चला। कुल मिलाकर यह एक बड़ी सफलता थी और सभी ने इस कार्यक्रम का आनंद लिया।
अंत में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, कारमेल, इंडियाना शाखा की ओर से डॉ. राकेश कुमार ने भाग लेने वाले सभी लोगों का उनके प्रोत्साहन और समर्थन के लिए धन्यवाद किया, और सभी भाग लेने वाले माता-पिता से विशेष रूप से अनुरोध किया कि वे घर पर हिंदी में बातचीत करें ताकि उनके बच्चे उनका अनुसरण कर सकें।
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उपस्थित लोगों से प्राप्त कार्यक्रम के बाद की कुछ टिप्पणियाँ:-
-यह हिंदी पर केंद्रित एक बहुत ही सुव्यवस्थित कार्यक्रम था। बच्चे हमारा भविष्य हैं, और आप बच्चों द्वारा दिखाए गए उत्साह से आयोजन की सफलता को माप सकते हैं। यह सभी माता-पिता और दादा-दादी के अपार योगदान और भागीदारी के बिना हासिल नहीं किया जा सकता था। इसे सफल बनाने के लिए सभी ने इसे दिल से लिया। बहुत धन्यवाद, राकेश जी और उनकी टीम!
-प्रिय राकेश जी आपने और आपकी टीम के सदस्यों ने आज के कार्यक्रम को इतनी बड़ी सफलता दिलाने के लिए नेतृत्व और सेवा का एक सुंदर मिश्रण प्रदर्शित किया। बधाई हो।
-यह एक सुव्यवस्थित आयोजन था। टीम को पांच स्टार। हम सभी ने इसका आनंद लिया। इसकी सफलता के लिए शुभकामनाएं हमारा समर्थन आपके साथ है।
-सब कुछ बढ़िया था! हमारे बच्चों को हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए महान कार्य।
-राकेश जी यह एक प्रेरणादायक मुलाकात थी। भविष्य के लिए हमारी शुभकामनाएं।
-महान समारोह। इसे व्यवस्थित करने के लिए धन्यवाद। यह आयोजन युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ी उम्मीद लेकर आया और इसमें शामिल सभी लोगों के लिए खुशी का ठिकाना नहीं रहा। प्रशंसा।
कृपया हमसे ईमेल, फोन और सोशल मीडिया के जरिए सम्पर्क करें।
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| हिन्दी दिवस- अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति नैशविल चैप्टर |
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हिन्दी दिवस परिचर्चा - हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति नैशविल चैप्टर द्वारा एक ऑनलाइन परिचर्चा और काव्य पाठ का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम के लिए हमने भारतवर्ष से दो कवियों को आमंत्रित किया था। डॉ राजीव राज एवं डॉ भावना तिवारी । ये दोनो हस्तियां, हिंदी साहित्य जगत के जाने माने गीतकार है। इनका नाम सुंदर सशक्त शब्दावली में पिरोए गीत और उतनी ही मधुर आवाज और अन्दाज़ में उसकी प्रस्तुति के लिए विख्यात है।
इस कार्यक्रम में हमारे साथ क्लीवलैंड, Ohio से भी डॉ तेज पारीक जी जुड़े थे, जो हिंदी कविता के पठन पाठन में विशेष रुचि रखते है, हिंदी भाषा के प्रति माता जैसा स्नेह रखते है।
तेज जी , अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के माननीय सदस्य भी है।
इस कार्यक्रम का विषय था - “समाज और संस्कृति की उन्नति में भाषा का महत्व” -
हम लोगों ने अपने हिंदी प्रेमी अतिथियों के इस विषय पर विचार जाने ।
हमें इस बात पर भी चर्चा करी कि अपनी हिंदी भाषा को प्रति आज के युवा वर्ग में कैसे प्रेम जगाया जाये। इस बारे में क्या प्रयास हो रहे है और क्या करने चाहिए। इस विषय पर हमारे अतिथियों ने बहुत सुंदर एवं महत्वपूर्ण सुझाव दिए ।
राजीव जी ने भाषा को रोजगार से जोड़ने की बात कही वहीं भावना जी ने अभिभावको के योगदान और उनके द्वारा बच्चों को हिंदी भाषा सीखने के लिए प्रेरित करने पर ज़ोर दिया।
तेज जी से जब पूछा गया कि विदेश की धरती पर जन्मे और पले बढ़े बच्चों को हिंदी भाषा की उपयोगिता कैसे समझायीं जाए तो उनका जवाब बहुत सुंदर था ।
इस महत्वपूर्ण विषय पर संक्षिप्त परिचर्चा के बाद वो वक्त आया जिसकी हम सबको प्रतीक्षा थी।
अपने माननीय अतिथियों की कविताओं और गीतो के रसास्वादन का वक्त।
जब राजीव जी ने “यादें झीनी रे” के सुर छेड़े तो हम सब झूम उठे।
भावना जी ने “ ये पिंजरा सोने का स्वीकार नहीं मुझको” गीत में अपने सुरीले स्वर और सशक्त भाव से हम सबको सम्मोहित कर लिया।
तेज जी “ हिंदी मेरे मन जी भाषा “ कविता जब पढ़ी तो अन्त पंक्तियां आते आते हम सब भाव विभोर हो उठे।
हम अपने सभी माननीय अतिथियों का हृदय से धन्यवाद करते है। आशा करते है कि भविष्य में भी इसी तरह हमें उनका सानिध्य सुख प्राप्त होता रहेगा।
ये कार्यक्रम IHA। के फ़ेसबुक प्रष्ठ पर साझा किया गया है।
आप इन कवियों को अवश्य सुने। हमें पूरा विश्वास है कि हिंदी भाषा की मधुरता और भावपूर्ण सरलता से भरी इनकी प्रस्तुति आप सबका मन मोह लेगी ।
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| कवि परिचय , नैशविल चैप्टर |
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डॉ राजीव राज —
साहित्य जगत में डॉ राजीव राज एक जाना -पहचाना नाम है | जनपद इटावा ( उoप्रo) में कार्यरत डॉ राजीव राज देश के महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। अध्यापन के साथ-साथ इनकी स्वतंत्र लेखन में विशेष रूचि है | कवि सम्मेलन की मुख्य धारा में बतौर गीतकार लोकप्रियता के नित नये सोपान चढ़ने वाले डॉ राजीव राज आज हर एक कविता प्रेमी के हृदय में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके हैं। लाजवाब धुन और अद्भुत प्रस्तुति के कारण आपके गीत बड़ी सहजता से लोगों के होठों पर चढ़ जाते हैं। “यादें झीनी रे” और “हिंदुस्तान हूँ” जैसे गीत मंचों की माँग और आपकी पहचान बन गये हैं। प्रह्लाद यदुवंशी अलंकरण-2015, गोपाल दास नीरज युवा गीतकार सम्मान- 2018, महाप्राण निराला सम्मान-2018, डॉ विष्णु सक्सेना गीत सम्मान ३ -2019, कविवर ब्रजशुक्ल घायल स्मृति सम्मान- 2019, गीत गंगोत्री सम्मान- 2021 सहित गीतकार के रूप में अनेक विशिष्ट सम्मान प्राप्त करने वाले डॉ राजीव राज द्वारा श्री कृष्ण उद्घोष (त्रैमासिक पत्रिका), ज्योत्सना (वार्षिक पत्रिका) का संपादन किया जा रहा है | ‘वेदना के फूल ‘ की लोकप्रियता के बाद आपका एक और गीत संग्रह “यादें झीनी रे” प्रकाशनाधीन है।
डॉ भावना तिवारी —
डॉ भावना तिवारी देश की उन चुनिंदा कवयित्रियों में से हैं जिनको कविता में सामर्थ्य और मौलिकता का पर्याय कहा जाना अतिश्योक्ति न होगी। मंचों पर अपनी कविताओं के साथ साथ सम्मोहक स्वर से श्रोताओं को सहज ही अपना मुरीद बना लेने वाली डॉ भावना तिवारी के गीत ये पिंजरा सोने का और और उस पर अधिकार नहीं मेरा सहज ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गए हैं। कवि सम्मेलन में वे कविताप्रेमी श्रोता जो यह शिकायत किया करते हैं कि कवि सम्मेलनों में कविता गायब हो गयी, वे इस के प्रति निश्चिंत हो सकते हैं कि कविता की नाव को खेने वाले हाथ अभी सामर्थ्यवान और कुशल हैं। डॉ भावना तिवारी को उनकी कविताओं के लिए विकासिका संस्था कानपुर से सर्वश्रेष्ठ गीतकार 1996, अक्षरा साहित्यिक संस्था द्वारा माहेश्वर त्रिवारी गीत सृजन सम्मान 2018, गीत वातायन सम्मान 2017, काव्य रत्न समान 2016, नवगीत गौरव सम्मान 2018,संस्कार भारती काव्य श्री सम्मान 2016, माँ वीरमति स्मृति सम्मान 2018, महादेवी वर्मा सम्मान 2018, साहित्य सूर्य अमृतलाल नागर सम्मान 2017, आचार्य शारदा चरण दीक्षित स्मृति सम्मान 2014, हिंदुस्तानी भाषा अकेडमी द्वारा हिंदुस्तानी भाषा काव्य प्रतिभा सम्मान 2018, आगमन भूषण सम्मान 2016 जैसे अनेकों सम्मान प्राप्त हुए हैं। डॉ भावना तिवारी प्रसिद्ध ऑडियो प्लेटफॉर्म गाथा की निदेश हैं। उनका एक गीत संग्रह बूंद बूंद गंगाजल प्रकाशित हो चुका है और साथ ही एक और गीत संग्रह पिंजरा सोने का प्रकाशनाधीन है।
डॉ तेज पारीक —
डॉ तेज पारीक अमेरिका के एक प्रसिद्ध न्यूरो वैज्ञानिक और एक सफल उद्यमी हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलोर, CwRU ओहायो अमेरिका से आपने बॉयोमेडिकल के क्षेत्र में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
आपकी जन्मस्थलि जयपुर हैं पर वर्तमान में आप कई वर्षों से अमेरिका के क्लीवलैंड में निवास कर रहे हैं और यही आपका कार्यक्षेत्र हैं । साहित्य और हिंदी भाषा के प्रति आपकी गहन अभिरुचि हैं, और आप निरंतर हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार में लगे रहते हैं, अपने व्यस्तम समय के बावजूद आप न केवल कविताएं लिखते हैं बल्कि उनको अपना स्वर भी देते रहते हैं ।
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| भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस- आभासी कवि सम्मेलन |
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द्वारा- प्रिया भारद्वाज
शार्लेट, नॉर्थ कैरोलिना
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भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समिति की अध्यक्षा प्रिया भारद्वाज जी द्वारा वर्चुअल कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।
भारतीय कहीं भी हों उनके हृदय से अपने देश के लिए प्रेम कभी कम नहीं होता। इसी भावना के चलते, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना राज्य स्थित शार्लेट नगर की अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के तत्वावधान में भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समिति की अध्यक्षा प्रिया भारद्वाज जी द्वारा वर्चुअल कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बड़े सम्मान के साथ शहीदों को याद किया एवं देश भक्ति की रचनाओं का पाठ किया गया। कार्यक्रम में शार्लेट एवं लंदन, यूके के कवियों ने भाग लिया और देश भक्ति से प्रेरित अपनी कविताएँ प्रस्तुत की। कार्यक्रम के संयोजक थे श्री आशीष तिवारी एवं कार्यक्रम का संचालन श्रीमती तौषी चौरे द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ सदस्य श्री बाल गुप्ता जी ने अपनी देश भक्ति की कविता सुनाकर की। जिसमें उन्होंने बड़े रोचक तरीक़े से नदी और देश का वर्णन किया।
इसके पश्चात अंजु अग्रवाल जी द्वारा ये पंक्तियाँ सुनाई गयी, जिससे देश की यादें जीवंत हो उठी,
“विदेश में रहकर भारत मां की, भारत परिवार की याद रह रह कर सताती है !!
बरसात में कच्ची मिट्टी की सोंधी सुगन्ध की महक भी याद आती है !!”
कार्यक्रम में पधारे अतिथि कवि श्री तारकेश्वर जी चौरे ने अपनी कविता गायन के साथ प्रस्तुत की, जिसमें तिरंगे की आन बान शान का संदेश कुछ इस प्रकार दिया गया-
“झंडा तिरंगा लहरता है, अपनी पूरी शान से।
मिली आज़ादी हमें, वीरों के बलिदान से।“
अगले क्रम में आए कवि श्री आशीष तिवारी जी जिनकी कविताएँ अत्यंत प्रभावशाली रहती हैं। अपनी चिर-परिचित रोचक शैली में लयबद्धता के साथ उन्होंने भारत देश की महानता का वर्णन इस मुक्तक के साथ किया-
“बड़ा ही गर्व है जिसपर, वो मेरा देश भारत है,
जहाँ कण-कण में है ईश्वर, वो मेरा देश भारत है,
ये भूमि हो गयी पावन, महापुरुषों के चरणों से,
जहाँ है स्वर्ग धरती पर, वो मेरा देश भारत है।”
इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास एवं प्रगतिशील वर्तमान का वर्णन अपनी कविता “तब मेरा भारत बनता है” के द्वारा किया।
तत्पश्चात्, गम्भीर कविताओं की विशेषज्ञ श्रीमती श्वेता गुप्ता जी ने अपनी कविता के माध्यम से देश के आदर्शों को और देशसेवा की भावना को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा इन पक्तियों से दी-
“कोई ले जाए इस युग को फिर गाँधी के पदचिन्हो पर,
न रह जाए लिखा हुआ सब इतिहास के पन्नो पर।
आज फिर वही जोश फिर वही शक्ति पैदा करनी है ,
हर पग पर, हर एक कदम भारत माँ की सेवा करनी है”
अगले क्रम में पधारे, श्री अवनीश अवस्थी जी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में जो पंक्तियाँ सुनाई गयी, उन पंक्तियों को सुनकर एक सैनिक की पत्नी की विरह-वेदना का आँकलन किया जा सकता है, जिसको यह भी नहीं पता उसकी प्रतीक्षा कब ख़त्म होगी अथवा ख़त्म होगी भी या नहीं-
“ एक बार फिर से आया सावन,
पर तुम कब आओगे..!!
सावन की ये घटायें,
मेरे दिल को हैं तड़पायें,
रिमझिम बारिश की ये बूँदे ,
इन्तज़ार करूँ या पलके मूँदे !!”
कार्यक्रम का संचालन कर रही श्रीमती तौषी शर्मा चौरे द्वारा एक सैनिक के जीवन की महानता एवं मार्मिकता का अपनी पंक्तियों में प्रभावशाली चित्रण निम्न पंक्तियां द्वारा किया गया-
“शब्द अम्बर भी है छोटा, स्तुति तेरी गाने को।
शांत मौनभी है चीख़ता, गाथा तेरी सुनाने को।”
कार्यक्रम के अंत में, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज जी ने अपनी इन पंक्तियों के द्वारा सावन और आज़ादी की स्मृतियों को पुनर्जीवित किया -
“आज धारा की प्यास बुझी है, आज़ादी है पायी,
मंगल मंगल गीत सजे है , द्वार -द्वार दीप जले है
आज़ादी है पायी , आज़ादी है पायी !!”
कार्यक्रम का समापन, प्रिया भारद्वाज जी ने सभी कवियों के आभार प्रदर्शन के साथ किया।
भारतीय कहीं भी हों उनके हृदय से अपने देश के लिए प्रेम कभी कम नहीं होता। इसी भावना के चलते, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना राज्य स्थित शार्लेट नगर की
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के तत्वावधान में
भारत के ७५वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर समिति की अध्यक्षा प्रिया भारद्वाज जी द्वारा वर्चुअल कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बड़े सम्मान के साथ शहीदों को याद किया एवं देश भक्ति की रचनाओं का पाठ किया गया। कार्यक्रम में शार्लेट एवं लंदन, यूके के कवियों ने भाग लिया और देश भक्ति से प्रेरित अपनी कविताएँ प्रस्तुत की। कार्यक्रम के संयोजक थे श्री आशीष तिवारी एवं कार्यक्रम का संचालन श्रीमती तौषी चौरे द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ सदस्य श्री बाल गुप्ता जी ने अपनी देश भक्ति की कविता सुनाकर की। जिसमें उन्होंने बड़े रोचक तरीक़े से नदी और देश का वर्णन किया।
इसके पश्चात अंजु अग्रवाल जी द्वारा ये पंक्तियाँ सुनाई गयी, जिससे देश की यादें जीवंत हो उठी,
“विदेश में रहकर भारत मां की, भारत परिवार की याद रह रह कर सताती है !!
बरसात में कच्ची मिट्टी की सोंधी सुगन्ध की महक भी याद आती है !!”
कार्यक्रम में पधारे अतिथि कवि श्री तारकेश्वर जी चौरे ने अपनी कविता गायन के साथ प्रस्तुत की, जिसमें तिरंगे की आन बान शान का संदेश कुछ इस प्रकार दिया गया-
“झंडा तिरंगा लहरता है, अपनी पूरी शान से।
मिली आज़ादी हमें, वीरों के बलिदान से।“
अगले क्रम में आए कवि श्री आशीष तिवारी जी जिनकी कविताएँ अत्यंत प्रभावशाली रहती हैं। अपनी चिर-परिचित रोचक शैली में लयबद्धता के साथ उन्होंने भारत देश की महानता का वर्णन इस मुक्तक के साथ किया-
“बड़ा ही गर्व है जिसपर, वो मेरा देश भारत है,
जहाँ कण-कण में है ईश्वर, वो मेरा देश भारत है,
ये भूमि हो गयी पावन, महापुरुषों के चरणों से,
जहाँ है स्वर्ग धरती पर, वो मेरा देश भारत है।”
इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास एवं प्रगतिशील वर्तमान का वर्णन अपनी कविता “तब मेरा भारत बनता है” के द्वारा किया।
तत्पश्चात्, गम्भीर कविताओं की विशेषज्ञ श्रीमती श्वेता गुप्ता जी ने अपनी कविता के माध्यम से देश के आदर्शों को और देशसेवा की भावना को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा इन पक्तियों से दी-
“कोई ले जाए इस युग को फिर गाँधी के पदचिन्हो पर,
न रह जाए लिखा हुआ सब इतिहास के पन्नो पर।
आज फिर वही जोश फिर वही शक्ति पैदा करनी है ,
हर पग पर, हर एक कदम भारत माँ की सेवा करनी है”
अगले क्रम में पधारे, श्री अवनीश अवस्थी जी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में जो पंक्तियाँ सुनाई गयी, उन पंक्तियों को सुनकर एक सैनिक की पत्नी की विरह-वेदना का आँकलन किया जा सकता है, जिसको यह भी नहीं पता उसकी प्रतीक्षा कब ख़त्म होगी अथवा ख़त्म होगी भी या नहीं-
“ एक बार फिर से आया सावन,
पर तुम कब आओगे..!!
सावन की ये घटायें,
मेरे दिल को हैं तड़पायें,
रिमझिम बारिश की ये बूँदे ,
इन्तज़ार करूँ या पलके मूँदे !!”
कार्यक्रम का संचालन कर रही श्रीमती तौषी शर्मा चौरे द्वारा एक सैनिक के जीवन की महानता एवं मार्मिकता का अपनी पंक्तियों में प्रभावशाली चित्रण निम्न पंक्तियां द्वारा किया गया-
“शब्द अम्बर भी है छोटा, स्तुति तेरी गाने को।
शांत मौनभी है चीख़ता, गाथा तेरी सुनाने को।”
कार्यक्रम के अंत में, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज जी ने अपनी इन पंक्तियों के द्वारा सावन और आज़ादी की स्मृतियों को पुनर्जीवित किया -
“आज धारा की प्यास बुझी है, आज़ादी है पायी,
मंगल मंगल गीत सजे है , द्वार -द्वार दीप जले है
आज़ादी है पायी , आज़ादी है पायी !!”
कार्यक्रम का समापन, प्रिया भारद्वाज जी ने सभी कवियों के आभार प्रदर्शन के साथ किया।
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| - आदित्य कुमार शाही |
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कारमेल,इंडिआना से हैं। पेशे से सूचना प्रौद्योगिकी में है। इसी वर्ष अन्तराष्ट्रीय हिंदी समिति के सदस्य बने है।
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| मेरी गुड़िया है तू |
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मेरी गुड़िया है तू ।
मेरी चिड़िया है तू ।।
मेरे आँगना का झिलमिल सीतारा है तू ।
मेरे सपनों की अविरल धारा है तू ।।
मेरे दिल की राजदुलारी है तू ।
मेरे अंगने की फुलवारी है तू ।।
मेरी नन्ही सी सोन चिरईया है तू ।
मेरी जीवन के नइया की खिवईया है तू ।।
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मेरी गुड़िया है तू ।
मेरी चिड़िया है तू ।।
मेरे बगिया की कोयलिया है तू ।
मेरे सुखदुख की सहेलिया है तू ।।
मेरी गोदी में सुनती कहनिया है तू
मेरी बाहों पे रखती सिरहनिया है तू ।।
मेरे अन्खियों का काजल है तू ।
मेरे जीवन में सावन का बादल है तू ।।
मेरी गुड़िया है तू ।
मेरी बिटिया है तू ।।
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| - श्री समीर उपाध्याय |
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गुजरात, भारत से हैं|पेशे से शिक्षक हैं। इनकी शिक्षा एम.ए.,बी.एड.,एम.फिल.(हिन्दी) है। इन्होने कई काव्य संग्रहों में साझा काम किया है। इनको कई सम्मान भी मिल चुके है। इनकी लिखनी का भविष्य उज्वल लग रहा है।
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| हिन्दी हूँ मैं |
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हिन्दी हूँ मैं।
पुनित अक्षर हूँ मैं।
शब्द का सौंदर्य हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
वाक्य की व्यंजना हूँ मैं।
भाषा की गरिमा हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
कर्णों को प्रिय हूँ मैं।
सुमधुर संगीत हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
ज्ञान की गिरा हूँ मैं।
अमृत का कलश हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
तिमिर मिटाती हूँ मैं।
प्रकाश फैलाती हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
शिखर की ऊंचाई हूँ मैं।
सागर की गहराई हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
सौम्य शांत तन्वंगा हूँ मैं।
उछलती कूदती रेवा हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
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पापों की नाशिनी हूँ मैं।
शिव का अर्धांग हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
हिन्द को जोड़ती हूँ मैं।
अवरोधों को तोड़ती हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
संस्कृति की प्रतीक हूँ मैं।
सभ्यता की मूरत हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
बहनों में जेठी हूँ मैं।
विश्व में व्याप्त हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
कुंकुम तिलक हूँ मैं।
विजय केतन हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
माँ भारती का मुकुट हूँ मैं।
तेजोमयी धारा हूँ मैं।
हिन्दी हूँ मैं।
भारतवर्ष की गौरवमयी गाथा हूँ मैं।
गौरवमयी गाथा हूँ मैं।
गौरवमयी गाथा हूँ मैं।
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द्वारा- सविता मिश्रा
सविता मिश्रा 'अक्षजा' आगरा, उत्तरप्रदेश, भारत से हैं। इनका 'रोशनी के अंकुर' लघुकथा एकल-संग्रह प्रकाशित है। जिसे कई सम्मान प्राप्त हैं।यह कहानी ‘सोचा न था’ एक लम्बी कहानी है पर तीन पीढ़ियों को जोड़ती है और प्रकृती के एक मूल विषय को सोचने को विवश करती है।
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बाथरूम से रह-रहकर हर-हर-गंगे, ओम-नमः शिवाय की आवाजें आ रही थीं। कमरे में बैठा पीयूष, दादा जी के बाथरूम से निकलने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। वह रह-रहकर गुस्से में भुनभुनाने लगता-
पीयूष - “बाथरूम में घंटो लगा देते हैं। न जाने नहाने-धोने में कितना पानी बहाते हैं।”
कभी सिर्फ खिसियाता हुआ कंधे ऊचकाकर मुँह थोड़ा-सा टेढ़ा कर देता, स्कूल में बच्चों के साथ लड़ते हुए वह ऐसा अक्सर करता रहता था अतः उसकी आदत ही पड़ गई थी। दादाजी निकले ही थे कि वह मुँह बनाता हुआ बाथरूम में अपनी तौलिया संभालते हुए जाने लगा।
रामकृपाल - ‘’हनुमान चालीसा पढ़ते हुए दादाजी अपने गीले कपड़े आंगन में डालने चले गए थे। कपड़े झटकते हुए डाल ही रहे थे कि पोते के चीखने-चिल्लाने की आवाज उनके कानों में आने लगी।
पीयूष - "मम्मी देखो ! बाबा ने फिर से पानी की पूरी टंकी खाली कर दी।"
पीयूष की मम्मी -"कोई बात नहीं बेटा ! अभी मोटर चालू कर देती हूँ। बस 5 मिनट रुक जा, फिर तू भी नहा लेना।"
लेकिन बेटा तो कमान से छूटे तीर की तरह बाथरूम से सीधे आंगन में जा पहुँचा था।
आंगन में पहुँचकर रामकृपाल को आवाज दी –
पीयूष - "दादाजी..!" उसकी आवाज की खराश से रामकृपाल अवाक रह गए थे।
पीयूष - “दादाजी यह आपका गांव नहीं है जो आप रोज इतना ज्यादा पानी नहाने में बहा देते हैं। शहरों में पानी की कितनी किल्लत है ! आपको इसका अंदाजा भी है।"
रामकृपाल स्टेच्यु की भांति सन्न से खड़े बस सुनते रहें।
इलाहाबाद में आरटीओ विभाग में काम करने वाले अपने बेटे शेषधर के यहां, गाँव से उनके पिताजी पहली बार कुछ दिन के लिए रहने आए थे। अब तक कुछ न कुछ बहाना बनाकर बेटे का आग्रह वह ठुकराते रहे थे। शहर में अपने घर आने पर बहु-बेटा उनका खूब ख्याल रखते थे। रोज कहीं न कहीं घूमाने ले जाते थे। घर के थोड़ी दूर पर स्थित रमणीक पार्क को भी उन्हें अपने साथ लेकर पहले ही दिन दिखा आए थे। जिससे की वह सुबहो-शाम तफ़री कर सकें। वहाँ पर जाकर रामकृपाल कुछ देर बैठने लगे थे। समय से चाय-नाश्ता, खाना-पानी बहु सम्मानपूर्वक देती थी। रामकृपाल के इक आवाज पर वह हाजिर हो जाती थी उनके सामने।अपनी तरफ से बेटे-बहू ने उनकी तीमारदारी में कोई कसर नहीं रख छोड़ी थी। लेकिन शेषधर के बेटे को दादा जी का सुबह-शाम नहाते हुए पानी बहाना, बाहर निकलने के बाद, घर लौटने पर बाल्टी भर पानी से हाथ-पैर धुलने के बहाने पानी बहाना अच्छा नहीं लगता था। अतः वह अपने दादाजी से चिढ़ा बैठा था, आज उसकी चिढ़न, कटु शब्दों में ढ़ल दादा जी पर निकल रही थी।
रामकृपाल के कानों में उसकी आवाज आती रही थी और वह उस आवाज के चुभन से छलनी होते रहे। और उधर उनका बेटा भी पिता के प्रति अपने बेटे के व्यवहार से आहत हुआ जा रहा था। लेकिन ऑफिस के लिए लेट होने के कारण चुप्पी बरकरार रखते हुए ऑफिस के लिए निकल गया।
बेटे के जाते ही आहत पिताजी अचानक अपने कमरे में पहुँचे। अलमारी से कपड़े निकाल उन कपड़ों को भूसे की तरह अपने थैले में भरने लगे, मानो सारा गुस्सा कपड़ों पर ही निकाल रहे हों।
फिर थैला उठाकर भारी कदमों से मेनडोर की ओर चल पड़े।
पीयूष की मम्मी - "पिताजी ! बच्चा है माफ कर दीजिए उसे। इन्हें घर तो आने दीजिए ! पिताजी !”
बहु पीछे से आवाज देती रही, किन्तु रामकृपाल के कानों में तो पोते के कहे कुटिल शब्द फुदक रहे थे।
बहू की सुरीली आवाज़ में मनुहार से पगे शहद से मीठे शब्द, उन्हें सुनाई ही नहीं पड़ रहे थे।
यंत्रवत वह घर से निकलकर कुछ दूर पैदल चलकर ऑटो में बैठ लिए। ऑटो वाले ने पूछा-
आटो वाला - “कहाँ चलना बाबूजी?”
रामकृपाल - "ट्रेन-बस, जो भी इस समय कन्नौज को जाती हो, वहीं को ले चलो।"
उन्होंने धीरे से कहा|
आटो वाला- "ठीक है बाबूजी !"
कहकर उसने ऑटो स्टार्ट कर दी। बस स्टेंड के बाहर रुकी तो ऑटो में बैठे- बैठे ही रामकृपाल ने अपनी नजरों को बाहर निरीक्षण करने भेज दिया।
ऑटो-वाला उनके चेहरे के भाव को पढ़कर बोला -
आटो वाला - "बाबूजी! ट्रेन को तो आने में कई घण्टे हैं
लेकिन यहां से आधे-आधे घंटे में बस निकलती रहती है, कोई न कोई बस आपको मिल जाएगी।"
ऑटो से उतरकर रामकृपाल बस स्टैंड के अंदर की ओर बढ़ गए। 'कन्नौज-कन्नौज' की आती आवाज के दिशा की ओर बढ़ते चल दिए। बस में पाँव धरते ही देखा कि बस तो खचाखच भरी है। लेकिन वह पल भर भी इस धरती को ठहरने के राजी नहीं थे इस धरती पर, जहाँ उनके अपने ही रत्न ने उनका अपमान किया था। अतः वह बोझिल मन लिए बस में चढ़ लिए।
सिर पर साफा, धोती-कुर्ता दूर से ही उनके गरिमा व्यक्तित्व की गवाही दे रहा था लेकिन लग रहा था जिस धोती कुर्ता को उन्होंने पहन रखा था उसे महीनों से उन्होंने साबुन का दर्शन नहीं कराया था। कुर्ते की उधड़ी हुई सिलाई भी उनके साधारण होने की गवाही दे रही थी। लेकिन चेहरे का तेज कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था। चंद्रशेखर आजाद की तरह तनी हुई उनकी मूँछे और चेहरे पर हल्की-सी दूध जैसी सफेद दाढ़ी उनके धनी-धाकड़ होने का एहसास करा रहे थे
बस में बैठे लोग उनके चेहरे को देककर प्रभावित होते, लेकिन कपड़े से होते हुए जैसे ही उनसब की निगाह उनके पैरों पर गिरती वो अपनी सीट पर चिपक के रह जाते थे। पैरों में अति साधारण टूटी-सी चप्पल पहन रखी थी उन्होंने। एक नवयुवक ने अपनी सीट उन्हें देनी चाही तो बगल में बैठी उसकी पत्नी ने मुँह बनाते हुए उसका हाथ खींच लिया। वह मन मारकर चुपचाप बैठ गया। रामकृपाल आगे बढ़ गए। नजरें सीट की ओर दौड़ती रही लेकिन उन्हें एक भी सीट नहीं मिली बैठने को, तो वह पीछे की ओर जाकर, नीचे ही बस की जमीन पर बैठ गए। एक तो बुढ़ापा दूसरे अपमान के बोझ से उनके पैरों में खड़े होने की शक्ति तो थी नहीं कि जो वह घंटों खड़े रहकर सफ़र करते।
जमीन पर जहाँ रामकृपाल बैठे, वहीं पिछली सीट पर दो लड़कियां बैठी थीं, जो उन्हें नीचे बैठा हुआ देख आपस में फुसफुसाई, फिर खिस्स से हँस पड़ी। रामकृपाल देखकर भी अंजान होने का ढोंग करके, सिर नीचे किए बैठे रहे। बस चल पड़ी थी। काफी लोग खड़े थे। रामकृपाल का मुख लड़कियों की ओर ही था।
दोनों ही सिविल सेवा परीक्षा की बातें कर रही थी। लग रहा था जैसे वह परीक्षा देने ही कहीं जा रही थीं। उन दोनों को नीचे बैठा सामान्य कद काठी वाला वह बूढ़ा किसी दूसरे ग्रह का प्राणी लग रहा था। क्योंकि उन लड़कियों ने आज तक बस में किसी को जमीन में बैठे देखा ही नहीं था अतः किरण हिकारत भरी नजर से उस बूढ़े को देख लेती और नाक-भौं सिकोड़ते हुए अपनी सहेली शिखा के साथ चर्चा में तल्लीन हो जाती।सिविल सेवा में आने वाले बहुविकल्पीय-प्रश्नों के हल निकालते-निकालते वो दोनों रसोई-घर की बातें करने लगी थी।
मधू - “मम्मी ने बहुत ही स्वादिष्ट गोभी के पराठे बनाए थे|”
मधू की बात सुनकर शिखा ललचा उठी।
शिखा - “मेरी मम्मी के तो सिर में बेइंतहा दर्द था।
देर रात तक पापा के घर न लौटने के कारण वह जगती रही थीं।
भाभी ने भुनभुनाते हुए बड़ी मुश्किल से दो सादे पराठे बना दिए थे।
टोमैटो केचप से खाकर, मैं बस पकड़ने बस स्टैंड आ गई थी|
मधू - “यानी कि तू टिफ़िन नहीं लायी है?”
शिखा - “नहीं यार ! मम्मी दुखी हो रही थी।
लेकिन मैंने उनको समझाया कि आजकल बस ढाबे पर रुकती है।
मैं खा लूँगी कुछ न कुछ।”
मधू - “चिंता क्यों करती है यार ! मैं लाई हूँ ना।
मेरी मम्मी को तो मालूम था कि तू भी है साथ,
तो उन्होंने थोड़ा ज्यादा पराठे रख दी हैं।”
रामकृपाल - दोनों की बातें सुनकर रामकृपाल मुस्कुराए – और मन ही मन सोचने लगे
“दोस्ती में इतना प्यार और एक हमारा खून का रिश्ता, वह भी पोता!
ऐसी बोली बोला, जो सीधी मेरे हृदय में गोली की तरह धंस गई।”
बस में फुलझड़ी-सी छूटी –
एक अन्य छात्र - “भई ! पराठे तो मेरी माँ भी बढ़िया बनाती है
लेकिन आपकी माँ के पराठे हमें भी चखवाईए जरा।
” इसी वाक्य के साथ दो-तीन की हँसी की गूंज बस में फ़ैल गई।
लड़कियां खिसिया के रह गई।
रामकृपाल के घूरते ही उन लड़कों की लड़कियों की ओर घूमी गर्दन सीधी हो गयी।
बस में लड़कियों की आवाज अब जरा धीमी हो चली थी।
लेकिन बगल में बैठे रामकृपाल के कानों में तो जा ही रही थी।
वो दोनों अब लगभग फुसफुसा के वार्तालाप करने लगी थी
कि टॉपिक रसोई से सरक कर कोचिंग सेंटर के छात्रों पर आ गई।
दोनों एक न एक का नाम लेकर उनकी बुराइयां बताने लगी थी।
मधू - “यार! अनिल से बच के रहना, साला बड़ा फेंकू है।
वह बस लड़कियों को फंसाता है और उससे अपने काम निकलवाता है।”
शिखा - “सही कह रही है तू।
कोचिंग हफ्ते में दो-तीन दिन आता नहीं है
फिर किसी न किसी लड़की की तारीफों के पुल बांध उसके जरिए
अपने नोट्स पार कर लेता है।”
मधू - “मतलब !”
आश्चर्य भरी फटी आँखों से देखती हुई बोली।
शिखा - “अरे बुद्धू!
लड़कियों की सुंदरता की झूठी तारीफ कर-करके उनसे नोट्स लिखवा लेता है।"
मधू - “तू सही कह रही है। सही में! बड़ा घाघ है वह।"
रामकृपाल - रामकृपाल सुनकर फिर मुस्कुराए बिना ना रहे –
“शहर हो या गांव या फिर कोई कस्बा ! ये घाघ तरह के लोग, सभी जगह पाए जाते हैं।
गांव में भी तो था, शेरसिंह का बेटा राकेश !
पूरा गांव उससे परेशान रहता था।
झूठ बोलने में माहिर, लोगों को परेशान करना तो उसकी आदत में शुमार था।”
अतीत के चलचित्र उसकी आँखों के सामने नाचने लगे।
दो बच्चे आपस में लड़ रहे होते हैं। दोनों को एक दूसरे से अलग-अलग करना
बड़े बच्चों के लिए मुश्किल हो रहा था।
एक कोने में राकेश बैठा हँसे जा रहा था
और रह-रहकर चिल्लाते हुए दोनों ही की आपसी लड़ाई में घी डालता जा रहा था।
राकेश - “अरे टिंकू! तुझे तो यह कामचोर भी बोल रहा था।
कह रहा था कि टीचर काम देती हैं तो तू दूसरे बच्चों से करवा कर कॉपी जमा कर देता है।
खुद एक शब्द भी नहीं लिखता है।”
टिंकू गुस्से से चीखता हुआ बोला-
टिंकू - “क्यों बे सन्नी ! तूने कभी देखा क्या?”
कहकर फिर से तेजी से झपट पड़ा सन्नी के ऊपर।
तभी एक बच्चा दौड़कर गांव के बड़ों को बुला लाया।
तब उन लोगों ने दोनों को गुत्थमगुत्था से छुटकारा दिलवाया।
और राकेश को बुरा भला कहते हुए खूब डांटा –
रामकृपाल - “राकेश ! तुम इतने बड़े हो गए।
तुन्हें इतनी-सी बात समझ नहीं आती
कि ऐसी लड़ाइयों के परिणाम घातक हो सकते हैं।”
टिंकू के पिता बोलें-
टिंकू के पिता - “तुम्हें लड़ाई रोकनी चाहिए थी
पर तुम तो जलती हुई हवन कुंड में घी डालने का काम कर रहे थे।
यह काम नेताओं पर ही छोड़ दो
राकेश। गांव में अराजकता का माहौल नहीं पैदा करो।
जब देखो तब तुम कुछ न कुछ कांड कर ही देते हो।
मारपीट, दंगा-फसाद बस यही तुम्हारा पेशा-सा हो गया है।”
रामकृपाल बोल उठे थे –
रामकृपाल - “पढ़ाई-लिखाई अच्छे से करो,
कोई अफसर-सफसर बनो!
यह क्या कि दिनभर तीतर-बटेर की तरह
गांव भर के बच्चों को लड़वाते रहते हो।”
टिंकू के पिता बात पूरी करते हुए जोर से बोले –
टिंकू के पिता - “अरे भैया ! बच्चे क्या, यह तो बड़ों के भी ऐसे कान भरता है
कि वह भी एक दूसरे के खिलाफ तलवार खींच लेते हैं।"
राकेश जैसे अब उन लोगों की कोई बात नहीं सुन रहा था।
उसके दिमाग में बस एक बात चल रही थी जो डांटते हुए टिंकू के पिता ने बोली थी
'यह काम नेताओं पर छोड़ दो'
राकेश - “यानी मैं नेता बन सकता हूँ! मुझ में नेता बनने के वो हर गुण मौजूद हैं
जो किसी नेता के कैंडिडेट में होने चाहिए।" समय पंख लगाकर उड़ गया था।
रामकृपाल – “मैंने एक बार उसकी इन्हीं हरकतों से परेशान होकर एक थप्पड़ क्या मारा था, वह गांव से ही भाग खड़ा हुआ था। उसी दिन से उसकी माँ उस पल के लिए मुझे कोसती रहती थी। लेकिन दो-तीन साल बाद वह नेता जैसी पोशाक में लौटा था। सफेद कुर्ता- पजामा, नेहरू जैकेट पहने आँखों पर चढ़ा काला चश्मा वह दिखने में स्मार्ट हो गया था। वाणी से प्रभावित करने की कला तो उसमें पहले से ही थी। फिर तो वह विधायकी का चुनाव भी लड़ा, भले ही हार गया।”
रहस्यमई मुस्कुराहट रामकृपाल के चेहरे पर तारी हो चुकी थी। बस में बैठे- बैठे उन लड़कियों की वार्तालाप को आत्मसात करते हुए वह अतीत के गलियारे में घूम रहे थे। पोते की दिल चीरती बातों का जख्म की लकीरें भी अब उनके चेहरे पर कमतर हो चली थीं।
तभी लड़कियों के तीखे स्वर कान में पड़ते ही वह पूरी तरह से वर्तमान में लौट आए।
बस की हिचकोले से उनका बदन दुखने लगा था। घुटनों को मोड़कर बैठने के कारण घुटनों में भी दर्द होने लगा था। अब वह पालथी मारकर बैठ गए थे।
लड़कियों की बात भी रसोई दोस्त और जीके के सवालों से ढुलककर राजनीति पर आ गई थी।
जिससे उनके स्वर की मिठास तितली की तरह फुर्र हो चुकी थी।
मधू की बातें जहां भाजपा को सपोर्ट कर रही थी तो वहीं शिखा कांग्रेस की पक्षधर थी।
अब तो दोनों सहेलियां एक दूसरे पर कटाक्ष रूपी तीर छोड़े जा रही थीं।
मधू - “देखो भाजपा ने चार साल में कितना विकास किया।
कहाँ कांग्रेस साठ साल तक बस सोती रही और अपने तंदुरे जैसे पेट को भरती रही।
लखनऊ में भी मेट्रो चलने लगी।" मधू ने भाजपा का समर्थन करते हुए गर्वपूर्वक कहा।
शिखा - “अरे तुझे नहीं पता मेट्रो तो सपा सरकार की योजना थी।
दूसरों के कामों को भाजपा अपना काम बताने में लगी है।” शिखा ने तीखा-सा जवाब दिया।
शिखा - “बनी तो अभी न ! और किसानों का बिजली का बिल भी माफ कर दिया सरकार ने और किसानों के लोन को भी।"
मधू - “सरकार ने किसानों पर जो डंडे बरसाए, वह भी इन उपलब्धियों में गिना दे तू।"
शिखा ने व्यंग्य तीर छोड़ा।
शिखा - “नई-नई नौकरियों की राह बनाई।
वरना सपा सरकार ने तो बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देकर इतिश्री कर ली थी।”
फिर वह गर्व से बोली।
मधू - “ हां ! और शिक्षक पद से हटाकर, सड़क पर शिक्षकों के ऊपर लाठियां बरसवाई।
निर्दोषों के सिर-पैर से खून बहाया।
भई ! यह भी कोई बात हुई भला !"
शिखा - “अरे क्यों ना बरसवाए!
मतलब टीचर थे या सब के सब गुडे थे !
जबरदस्ती मुख्यमंत्री आवास में घूसेगें, हो-हल्ला करेंगे, ईंट -पत्थर चलाएंगे
तो डंडा तो खाएंगे ही न।
शांति से भी तो विरोध कर सकते थे।”
शब्दों में कटुता उतर आई थी।
एक दूसरे पर चलते इन कटाक्ष तीरों से कभी मधू घायल,
कभी शिखा मधू के मुख से निकली आग से रुई-सी हुई जा रही थी।
तभी दोनों की चर्चा के बीच में एक तल्ख़ आवाज गूँजी –
रामकृपाल - ये राजनीति के बंदे किसी के कभी भी हुए जो अब होंगे। आपस का प्रेम ऐसे क्यों किसी
ऐसे के लिए गवाँ रही हो, जो 'पानी में दिखता चाँद' सरीखा है।
न वो शीतलता दे सकता है, न रोशनी और न ही पकड़ में आएगा।"
दोनों अवाक-सी, पहनावे से दीनहीन उस व्यक्ति को देखती रह गईं।
मधू यह सोच हतप्रभ थी कि सामान्य से दिखने वाले लोग भी दार्शनिक सोच रखते हैं।
अब सफ़र का बचाखुचा समय, चुप्पी साध, मुग्ध-सी सिर्फ सुन रही थीं दोनों।
तीन-चार घंटे से चुपचाप बैठा रामकृपाल ने जब मुँह खोला, तो चुप कहाँ हुआ।
एक से बढ़कर एक फिलासफी भरी उसकी बातें।
और बस में चुप्पी साधे सुनते हुए लोग।
लड़कियों की बातों को सुनकर चुहल करते लोगों के कान भी रामकृपाल की बातों को ध्यान से सुनने में लग गए थे।
एकाएक मधू ने पूछा –
मधू - “बाबा, कितना पढ़े हो ?"
रामकृपाल थोड़ी देर सोचते रहे। अचानक आए इस अप्रत्याशित सवाल पर क्या बोले, सोचते रहे। फिर बोले –
रामकृपाल – “पाठशाला में तो नहीं गया कभी।
पर जीवन की पाठशाला बखूबी पढ़ी है
और बहुत ही नजदीक से पढ़ी है।
वैसे तो अपने बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते दो-चार अक्षरों का ज्ञान मुझे भी हो गया था।
बच्चों यह बाल यूं ही नहीं सफेद हुए
और ना ही चेहरे की झुर्रियाँ ही ऐसे आ गई।
चेहरे की एक एक झुर्री में तुम्हारी यह मोटी-मोटी पोथियाँ समाहित है।”
बस सड़क किनारे रुकी। कंडक्टर चिल्लाया-
कंडक्टर - किसको उतरना है?"
रामकृपाल - “जीवन का उतार-चढ़ाव न जाने कितनी पोथियों का ज्ञान देता गया
और यह मेरा दिमाग ग्रहण करता गया।"
कहकर वह बस से उतर गए।
मधू और शिखा के बैग में रखी डिग्रियाँ, अब जैसे उन्हें ही मुँह चिढ़ा रही थी|
रामकृपाल बस से उतरकर कुछ दूर चलकर पुलिया पर बैठ, घंटो अपने गाँव को निहारते रहें।
अपने आप से ही बात करते हुए बोले –
रामकृपाल - “ जहाँ तक नजर जा रही एक्का-दुक्की पेड़ दिख रहें,
कहाँ मेरे किशोरावस्था तक पेड़ ही पेड़ थे चारों तरफ।
खेतों में हरियाली होती थी और पेड़ों से पटे हुए कई बाग़ ही बाग़ दीखते थे।
अब तो सब शहरी बाबू हों गए।
न खेती हो रही पहले की तरह और न पेड़ लगाने का शौक रहा कीसी में भी।
मैंने भी तो अपने जीवन में यह पुण्यकार्य न किया।
वह उठे और खिन्न मन से पैदल ही अपने गांव की ओर चल पड़े थे कि राकेश की नजर उनपर पड़ गई।
उसने अपनी कार रोकते ही कहा
राकेश - आओ चाचा शहर से आ रहे हो, आओ बैठो
वह अपनी जीप से उन्हें उनके घर तक छोड़ने के लिए बैठा लिया।
न रामकृपाल ने कोई बात शुरू की न ही राकेश ने कुछ कहा। सिवाय घर परिवार के कुशलक्षेम के।
घर पहुँचते-पहुँचते सूरज सुनहरा पिला हो चुका था।
गांव में पिनड्राप शांति फैल चुकी थी।
घर के दरवाजे पर जब जीप की घर्र-घर्र आवाज सुनी तो मालती देवी ने घर का दरवाजा खोल दिया।
सामने रामकृपाल को देखकर वह खुश हो गई।
राकेश रामकृपाल को प्रणाम करके जा चुका था।
पत्नी ने कहा
मालती - तुम तो आठ-दस दिन रहकर आने वाले थे !”
लेकिन रामकृपाल बिना जवाब दिए घर में घुसते चले गए।
थैले से अपने गीले कपड़े निकालकर मालती देवी को पकड़ा दिया।
मालती देवी कपड़ों को डालते हुए बोली-
मालती - “राकेश कितना सुधर गया है ना।
कहाँ वह कितना बदमाश बच्चा था।
पूरा गांव त्रस्त रहता था उससे।
कहाँ अब, हर किसी की मदद करता रहता है।
रामकृपाल - “वोट की राजनीति बड़े-बड़े को झुकना सिखा देती है।
तो फिर राकेश किस खेत की मूली है।”
कहकर रामकृपाल बिस्तर पर लेट गए।
मालती देवी ने भोजन पकाया फिर थाली परोसकर लाई और खाते-खाते सवाल करती रही –
मालती - “बेटवा-बहुरिया कैसे हैं, दोनों ठीक है ना ?
और मेरा पोता वह भी ठीक है ना।”
रामकृपाल बड़े रूखे स्वर में बोले –
रामकृपाल - “सब ठीक हैं।”
खाना खाकर पानी पिया फिर दोनों सोने के लिए लेट गए।
रामकृपाल खटिया पर पड़ते ही सो चुके थे।
लेकिन मालतीदेवी की आँखों से नींद कोसो दूर थी।
उन्हें शक होने लगा था कि कुछ तो हुआ है शहर में।
लेकिन डर के कारण वह सीधे पूछ न पा रही थी।
सुबह उठकर मालती देवी अपने काम में लग गई। (क्रमशः अगले अंक में ....)
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| भावुकता की चरमसीमा |
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१९८९ की बात है। अप्रैल का महीना था। बसंत ऋतु आरंभ हो चुकी थी। ठंड और हिम वर्षा से छुटकारा मिल रहा था। बसंत बहार और फूलों के आगमन का इंतज़ार किया जा रहा था। मुझे याद है कि उस दिन २९ तारीख़ थी जिस दिन मेरी भावनाएँ चरमसीमा तक पहुँच गई थीं। उस दिन क्या हुआ था यह बताने के पहले कुछ पूर्वभूमिका का विवरण देना चाहता हूँ।
मैं अमरीका में १९७५ में आया था। तीन साल मैंने न्यूयार्क में स्थित माउण्ट सायनाय होस्पिटल व मेडीकल सेंटर में एनेस्थीसिया की रेसीडेन्सी करने में गुज़ारे और रेसीडेन्सी समाप्त की। रेसीडेन्सी समाप्त होने के बाद एक इम्तिहान लेना आवश्यक होता है जिसमें सफ़ल होने पर बोर्ड सर्टिफ़िकेट की परीक्षा के लिए लायक हुआ जाता है। इसके बाद ही आप एनेस्थीसिया में काम कर सकते हैं। जो बोर्ड सर्टीफाइड होना चाहते हैं उन्हें बोर्ड सर्टिफ़िकेट की परीक्षा पास करना ज़रूरी होता है। बोर्ड सर्टिफ़िकेट की परीक्षा दो विभागों में होती है - पहली लिखित और फिर मौखिक। लिखित पास करने के बाद आपको हर साल एक ऐसे तीन मौक़े मिलते है मौखिक पास करने के लिए।
१९७८ में मैंने लिखित परीक्षा पास कर ली लेकिन मौखिक में असफल रहा। मुझे ये पता है कि हमेंशा ही मुझे मौखिक परीक्षा पास करना आसान नहीं होता था। जब भी मुझ से सवाल पूछा जाता था उसी समय मेरी स्मृति- मेरी याददाश्त शीशे के टूटने पर बिखर जाने की तरह तितर बितर हो जाती और मैं भ्रमित हो जाता और उत्तर अपूर्ण ही रहता। ख़ैर अगले साल फिर प्रयत्न किया पूरी तैयारी के साथ। और फिर फ़ेल हो गया। तीसरी बार भी यही हुआ। तीन अवसर मिलने पर भी असफल रहने के कारण मुझे लिखित परीक्षा दुबारा लेनी पड़ी जिसे पास करने में कोई दिक़्क़त नहीं हुई। अब मुझे तीन मौक़े फिर मिल गए लेकिन ऐसे मेरे नसीब कहाँ कि मुझे सफलता मिल जाए। जैसा कि आपने अनुमान लगा ही लिया होगा तीनों बार में मैं पास न हो सका।
अब साहब, मुझे वो इम्तिहान दुबारा लेना पड़ा जो रेसीडेन्सी समाप्त करने पर लेना होता है ताकि बोर्ड सर्टीफिकेशन के लिये लायक हो सकूँ जो मैंने आसानी से पास कर लिया। और फिर बाद में मैंने बोर्ड की लिखित परीक्षा भी पास कर ली। अब बारी आई फिर वही मौखिक की। आश्चर्य की बात ये थी इतनी बार असफल रहने पर भी मुझे हताशा कभी
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| डॉ. देव कुमार गुप्ता |
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न्यू जर्सी में रहते है। आप एक सेवानिवृत्त निश्चेतना विशेषज्ञ (Anesthesiologist) है। सेवानिवृत्त होने के बाद, इन्होंने फोटोग्राफी स्कूल में जा कर पढाई की और एक पेशेवर फोटोग्राफर बन गये। अब ये पूर्ण रूप से फोटोग्राफी का आनंद स्वयं भी लेते हैं तथा ओरों को भी सिखाते हैं। स्थानीय हिन्दी भाषी व्यक्तियों की मासिक बैठकों में, चर्चा के लिए चुने गए विषयों पर लिखते भी हैं। उनका कहना है कि ‘इससे मेरी हिंदी भाषा अपडेट रहती है’।
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नहीं हुई। और इसका सारा श्रेय मेरी पत्नी कृष्णा को ही जाता है जिन्होंने कभी भी मुझे हताशा के दो शब्द भी नहीं कहे और हर बार बढ़ावा और सहारा ही देती रही। इस बार ईश्वर कृपा से हमारे डिपार्टमेंट का chief नया आया और वो ये चाहता था कि हमारे एनेस्थीसिया के ग्रुप में अधिक से अधिक बोर्ड सर्टीफाइड डॉक्टर हों। उसने मुझे पूरी मेहनत के साथ पूरी तरह से तैयार किया।
इस बार मुझे काफी आत्मविश्वास था। हर बार तो मैं ढेर सारी किताबें लेकर एक दिन पहले अकेला जाता और पढ़ता ही रहता। अबकी बार मैं अगले दिन ही गया और वो भी बिना किताबें लिए और मेरी पत्नी कृष्णा को लेकर। परीक्षास्थल था Scottsdale, Arizona। दूसरे दिन अच्छी तरह प्रश्नों के उत्तर दिए। मुझे ये लग रहा था कि अबकी बार सफलता मिल ही जाएगी। परीक्षा के बाद हम दोनों दो दिन के लिए Grand Canyon घूमने चले गए।
घर आने के कुछ दिन बाद डाक से बोर्ड की ओर से पत्र आया कि मैं पास हो गया।
वो दिन २९ अप्रैल १९८९ का दिन था। अब आप समझ ही गए होंगे कि उस दिन मेरी ख़ुशियाँ नहीं समा रही थीं। शायद यही मेरी भावनाओं की चरमसीमा थी!
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| पत्रिकाएं: हिंदी के वैश्वीकरण का सशक्त माध्यम |
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साहित्यिक पत्रिकाओं ने हिंदी साहित्य को पाठकों के बीच जीवित रखा है। हिंदी साहित्य को बनाए रखने में पत्रिकाओं का बहुत योगदान है। बहुत से लोग पत्रिकाओं को पढ़ने के बाद ही पुस्तकों से मिल पाते हैं। हिंदी की पत्रिकाओं में जो सबसे पहले नाम याद आता है वो है "धर्मयुग" का। हालांकि हर किसी का विचार यहाँ अलग हो सकता है। पाठकों को पत्रिकाओं की प्रतीक्षा रहती है। जो लोग पत्रिकाएं पढ़ते हैं उनका एक समय के बाद संपादक से एक रिश्ता बन जाता है। ऐसा लगता है जैसे कि हाथ में पत्रिका आने के बाद संपादक आपसे बात कर रहा हो। यहाँ हम कुछ ऐसी ही हिंदी पत्रिकाओं का उल्लेख करने
जा रहा है, जिन्होंने हिंदी साहित्य की ज्योति को जलाने का काम किया है। हालांकि इनमें से कुछ हमारे बीच नहीं हैं (बंद हो चुकी हैं), तो कुछ आज भी प्रकाशित हो रही हैं। यदि हिंदी साहित्य को बचाना है, तो ऐसी पत्रिकाओं को पढ़ना होगा अन्यथा कोरी बातें ही बची रह जायेंगी।
"धर्मयुग" एक साप्ताहिक पत्रिका थी। यह पत्रिका "टाइम्स ऑफ़ इंडिया" ग्रुप द्वारा मुंबई से प्रकाशित होती थी। यह पत्रिका 1949 से लेकर 1993 तक प्रकाशित हुई थी। अपने दौर में यह पत्रिका पत्रकारिता और साहित्य में रूचि रखने वालों की अलख को ज़िंदा रखने का काम बख़ूबी करती थी। आज के बहुतेरे लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी वर्ग से जुड़े लोग शुरुआत में कहीं न कहीं इससे जुड़े रहे थे। पहले इसके संपादक पंडित सत्यकाम विद्यालंकर थे। लेकिन जब इसका संपादकिय विभाग धर्मवीर भारती के पास आया तो इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। धर्मवीर भारती एक साहित्यकार थे। इन्होंने “गुनाहों के देवता” जैसा उपन्यास लिखने के अलावा "ठंडा लोहा" जैसा कालजयी और संजीदा कविता संग्रह लिखा था। इस पत्रिका के कारण लोगों का विश्वास साहित्य और बुनियादी पत्रकारिता की ओर एक बार फिर से स्थापित हो गया था। आज ये प्रकाशित नहीं होती। इसकी कमी पाठकों को कहीं न कहीं अवश्य खटकती है।
‘हँस’ का प्रकाशन उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने किया था। इस पत्रिका के संपादक मंडल में महात्मा गांधी भी रह चुके हैं। प्रेमचंद के देहांत के बाद हालांकि पत्रिका का कार्यभार उनके पुत्र अमृतराय ने संभाल लिया था। इसके बाद अनेक वर्षों तक ‘हँस’ का प्रकाशन बंद रहा, फिर साहित्यकार राजेंद्र यादव ने प्रेमचंद के जन्मदिन के दिन ही 31 जुलाई 1986 को अक्षर प्रकाशन के तले इस पत्रिका को पुन: शुरू किया। राजेंद्र यादव का निधन हो चुका है, इस समय ‘हँस’ के संपादक संजय सहाय हैं। बीते दिनों ‘हँस’ ने घुसपैठिए नाम से नया कॉलम शुरू किया गया है। इसमें साहित्यकारों की नहीं, बल्कि आमजन की कहानियों को जगह दी जाती है। हिंदी साहित्य में ऐसी पहल लोगों के पढ़ने की क्षमता को बढ़ाने का काम कर रही है।
हिंदी साहित्य में "आलोचना" को स्थापित करने का श्रेय नामवर सिंह को जाता है। आपको बता दें कि "आलोचना" एक त्रैमासिक पत्रिका है एवं इसके प्रधान संपादक नामवर सिंह थे। अब इसका संपादन अरुण कमल संभाल रहे हैं। यह पत्रिका हिंदी साहित्य में आलोचना को ज़िंदा रखे हुए है। यह पत्रिका राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा प्रकाशित होती है।
"नया ज्ञानोदय" यह साहित्यक पत्रिका नई दिल्ली के भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित की जाती है। पहले इसका संपादन साहित्यकार रवीन्द्र कालिया देखते थे लेकिन उनके इंतकाल के बाद लीलाधर मंडलोई इसके संपादन का कार्यभार संभाल रहे हैं। इस पत्रिका में साहित्य के अलावा संस्कृति विमर्श को लेकर भी लेख छपते हैं।
मासिक पत्रिका "पाखी" के संपादक प्रेम भारद्वाज हैं। सिंतबर 2008 में इसका लोकार्पण नामवर सिंह ने किया था। आज हिंदी साहित्य के प्रति लोगों की रुचि जगाने का काम "पाखी" बखूबी कर रही है। इंटरनेट पर भी इसका एडिशन समय-समय पर छपता रहता है। हिंदी साहित्य अभी इंटरनेट पर ज़्यादा उपलब्ध नहीं है। "पाखी" के अलावा कुछ गिनी-चुनी पत्रिकाएं ही सोशल मीडिया से अपने आप को जोड़कर काम कर रही हैं। यहाँ आप इwww.pakhi.in वेबसाइट पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं। यह पत्रिका "इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसाइटी" द्वारा प्रकाशित की जाती है।इसे पढ़ सकते हैं। यह पत्रिका "इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसाइटी" द्वारा प्रकाशित की जाती है।
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| डॉ. सुनील त्रिपाठी निराला |
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डॉ. सुनील त्रिपाठी निराला राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं। अभी ये उच्च श्रेणी शिक्षक, शिक्षा विभाग म.प्र. में हैं। पढ़ने-पढ़ाने के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन में प्रसारण भी करते है। स्वतन्त्र लेखक के साथ-साथ इनकी रचनाएँ दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। हिंदी दिवस(14 सितम्बर) पर विशेष लेख।
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स्थान दिया जाता है। इसके संपादक शंकर हैं। अपने एक इंटरव्यू में शंकर बता चुके हैं कि सरकार साहित्यक पत्रिकाओं को लेकर गंभीर नहीं है।
शंकर की इतनी सी बात ने सारे हिंदी साहित्य में छाई मंदी को बयान कर दिया। न जाने क्या कारण है कि हिंदी की साहित्यक पत्रिकाएं गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही हैं? सुनने में आता है कि प्रकाशन बढ़ते जा रहे हैं। सरकार की आलोचना करो, तो इन पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापन मिलने बंद हो जाते हैं। विज्ञापनों के अलावा पाठकों के सिर पर तो पत्रिका चलने से रही। इसी कारण बहुत सी हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की सांसें उफ़न रही हैं। मुद्दा गंभीर है। यदि अपनी हिंदी को बचाना है तो इन पत्रिकाओं को बचाने का प्रयास करें। इन्हें पढ़ें, इन्हें समझें, इनके साथ बातचीत करें। बहुत से संकट पाठक की बढ़ोत्तरी होने के कारण हल हो सकते हैं। हिंदी साहित्य को बचाने में पाठक को अपनी भागीदारी देनी होगी।
‘पहल’ हिन्दी की एक अनियतकालिक पत्रिका थी। यह पत्रिका 1973 में शुरू हुई और 2021 में अपने 125वें अंक के साथ समाप्त हो गयी। प्रगतिशील वामाग्रह रखते हुए वह सर्वसंग्रहवाद और संतुलनवाद के सिद्धांत का विस्तार करने वाली यह पत्रिका 47 बरस तक छपती रही। यह जबलपुर से अपने संस्थापक ज्ञानरंजन के सम्पादन में प्रकाशित होती थी।
‘नवनीत’ हिन्दी की मासिक पत्रिका है। इसके सम्पादक वरिष्ठ लेखक-पत्रकार विश्वनाथ सचदेव हैं। इसकी शुरुआत जनवरी 1952 में स्वर्गीय श्री गोपाल नेवटिया ने की थी जो कि बाद में भारतीय विद्या भवन द्वारा अधिग्रहित कर ली गई। भारतीय विद्या भवन द्वारा इससे पूर्व हिंदी मासिक पत्रिका ‘भारती’ का प्रकाशन होता था। 69 साल बाद आज भी यह अनवरत प्रकाशित हो रही है। नवनीत एक सांस्कृतिक साहित्य पत्रिका है जो भारतीय विद्या भवन के मूल्यों और आदर्शों की संवाहक है।प्रतिवर्ष जनवरी माह में इसका विशेषांक निकलता है।
"दिनमान" यह हिन्दी की एक प्रमुख एवं पहली साप्ताहिक समाचार पत्रिका थी जिसे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने आरंभ किया और बाद में रघुवीर सहाय ने कई वर्षों तक संपादित किया। तारसप्तक के कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के सम्पादन में इस पत्रिका ने हिन्दी को कई प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी एवं पत्रकार ही नहीं दिए बल्कि हिन्दी प्रदेश में एक विचारधारात्मक ऊर्जा का भी संचार किया। सन् 1960 में शुरू हुई ‘कादम्बिनी’ पत्रिका बीते पांच दशक से निरंतर हिंदी जगत में एक खास मुकाम बनाए हुए हैं। राजेन्द्र अवस्थी लंबे समय तक इसके सम्पादक रहे। संस्कृति, साहित्य, कला, सेहत जैसे विषयों पर सुरुचिपूर्ण सामग्री की प्रभावी प्रस्तुति इसकी पहचान। पत्रिका में संवेदना, सरोकार और स्वस्थ मनोरंजन की सुगंध के साथ-साथ जिंदगी को बेहतर बनाने का हौसला है। किशोर वय से लेकर बड़े-बुजुर्गों तक, हर किसी के लिए पठनीय है।
भिण्ड से 2017 में ए.असफल ने किस्सा कोताह त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। पत्रिका ने कम समय में पाठकों के मध्य अच्छी पहचान बना ली है।
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| प्रबंध सम्पादक |
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- सुशीला मोहनका
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी मानद सदस्यों का अभिवादन है।
आशा करती हूँ आप इस Covid-19 की सुनामी की इस तीसरी लहर में अपना एवं अपने परिवार का पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे एवं स्वस्थ्य रहें।
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का २०वाँ अधिवेशन ९ और १० अक्टूबर २०२१ को ओहायो में आभासी विधि से होने जा रहा है तथा अधिवेशन का मूल विषय ‘’दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने और सिखाने की विधि” (Teaching and Learning Techniques for Hindi as a 2nd Language) है।
अधिवेशन में आप सभी अपनी-अपनी भागीदारी निभायेंगे ऐसा मेरा विश्वास है। उसमें तन-मन-धन से सभी का सहयोग अपेक्षित है। आप सभी से विशेष निवेदन है कि आप अपने और अपने हिंदी प्रेमी परिवार,मित्र, परिचितों से भी अधिवेशन के लिए पंजीकरण करवाएं। आभासी होने के कारण आने-जाने का समय और खर्च सबकी बचत होगी, पंजीकरण भी निशुल्क है। कम से कम समय में अधिक से अधिक जानकारी मिल पायेगी। आप सभी जानते हैं कि अधिवेशन के समय समिति को विभिन्न विधायों के विशेषज्ञ स्वयंसेवकों की आवश्यकता होगी जैसे:- वैबसाइट, पत्रकारिता, पब्लिक रिलेशन, आदि विधायें, आपसे आग्रह है कि आप अपनी सेवाएँ अर्पित करें और इसके लिए अधिवेशन समिति से संपर्क करें।
प्रत्येक बार की तरह इस बार भी अधिवेशन में विराट कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कार्यशालाएँ, उद्घाटन-सत्र, समापन-सत्र, पुरस्कार वितरण, पुस्तक-विमोचन आदि कार्यक्रम भी सुरुचिपूर्ण एवं आकर्षक होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।
नोट : पुस्तक विमोचन के लिए तीन पुस्तकें डाक द्वारा भेजें:
डाक का पता : Mrs. Kiran Khaitan,
Convention Convenor, IHA 20th Convention 2021
203, Cheltenham Lane, Munroe Falls, OH 44262
Email: kirankhaitan@yahoo.com
इस शुभ अवसर पर एक स्मारिका भी प्रकाशित हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के जो स्थानीय शाखा के अध्यक्ष अपनी दो वर्ष (सत्र २०२०-२१) की रिपोर्ट भेज चुके हैं उनको बहुत-बहुत धन्यवाद तथा उनके कार्य विवरण के लिए बधाई है। जो नहीं भेज पाए हैं उनसे निवेदन है कि वे इसी सप्ताहंत में अपनी समिति की रिपोर्ट अवश्य भेज दें।
विशेष अनुरोध: अ.हि.स. की कार्यकारिणी समिति के सभी सदस्यों एवं स्थानीय समिति अध्यक्षों से निवेदन किया गया था कि वे अपना संस्मरण ८ या १० पंक्ति में लिखें कि वे अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति से क्यों जुडें – जिन्होंने अपना संस्मरण फोटो के साथ भेज दिया है, उनको धन्यवाद। जो अभी तक नहीं भेज पाए हैं उनसे निवेदन है कि वे इसी सप्ताहंत तक भेजने का कष्ट करें।
आप सभी को मालूम है कि १९५३ से १४ सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। पहली बार हिंदी साहित्य सम्मेलन ने इस दिन हिंदी दिवस मनाने की घोषणा की थी तबसे पूरे भारत में और अन्य देशों में प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाया जाता है। अमेरिका के सभी राज्यों में यह दिन छोटे बडें रूप में मनाया जाता है। आशा है आप में से अधिकांश लोगों ने हिंदी दिवस मनाया होगा। उसका एक विवरण भेजने का कष्ट करें ताकि उसकी सूचना अन्य हिंदी प्रेमियों को भी प्राप्त हो सके।
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