OCTOBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अक्टूबर 2025, अंक ५१ प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र। सम्पादक: डॉ. शैल जैन
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों एवं संवाद के पाठकों का अभिनंदन !
गांधी दिवस , अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस, लाल बहादुर शास्त्री दिवस , नवरात्रि , दशहरा , करवा चौथ ,छठ, हैलोवीन एवं राष्ट्रीय एकता दिवस की शुभ शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ ।
“हिन्दी दिवस का 14 सितंबर का दिन अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखाओं और कुछ आउटरीच राज्यों ने अपने स्थानीय सामुदायिक क्षेत्रों में आयोजित किया। ह्यूस्टन, वाशिंगटन डी. सी. ने भारतीय दूतावास के साथ मिलकर हिन्दी दिवस कार्यक्रम किया और इनके कार्यक्रमों की रिपोर्ट सितंबर माह के संवाद में प्रकाशित हुई है। न्यू जर्सी में यूनिवर्सिटी में बच्चों के साथ हिंदी दिवस बनाया गया और कार्यक्रम की रिपोर्ट भी सितंबर संवाद में प्रकाशित हुई थी । इंडियाना , टेनेसी एवं न्यू जर्सी के कार्यक्रमों की रिपोर्ट इस अंक ( अक्टूबर ) में संलग्न है। उम्मीद करती हूँ कि आप कार्यक्रमों के बारे में पढ़ेगें और अपनी प्रतिक्रियाओं को हमसे साझा करेंगें ।बचे कार्यक्रमों की रिपोर्ट नवंबर में प्रकाशित होगी। मैँ सभी शाखाओं और आउटरीच राज्यों के आयोजकों और उनकी कार्यकारिणी समिति को तहे दिल से धन्यवाद और बधाई देती हूँ। आप सबों ने कार्यक्रम को सफल बनाया , युवाओं को ज़्यादा शामिल करने की कोशिश की और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के उद्देश्य को आगे बढ़ाने में और दृश्यमान करने में अपना संपूर्ण योगदान किया है ।
इस महीने में उत्तर पूर्व ओहायो शाखा ने स्थानीय समिति आईएफ़ यू एस ए ( IFUSA) संस्था के साथ मिल कर स्थानीय मेयरों के साथ दिवाली मनाई । मुझे इन तीनों कार्यक्रम में उपस्थित होने का सौभाग्य मिला । ये एक बहुत ही शानदार प्रयास था और बहुत सफल रहा ।ये कार्यक्रम तीन सिटी मेयर के साथ ओहायो राज्य में हुआ । १५ अक्टूबर – सिटी ब्रॉडव्यू हाइट्स मेयर सैम अलाई; १६ अक्तूबर – सिटी ऑफ़ पार्मा मेयर टिमोथी डीज़ीटर; २१ अक्टूबर – सिटी ऑफ़ इंडिपेंडेंस मेयर ग्रेगरी पी. कर्ट्ज़ के साथ । आईएफ़ यूएसए (IFUSA) ने ये कार्यक्रम का आयोजन किया और उनके साथ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति राष्ट्रीय, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा और ७-८ अन्य भारतीय संस्था ने इस कार्यक्रम में भाग लिया । कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन के द्वारा की गई, मेयर और सभी समुदाय के प्रतिनिधियों द्वारा ।दिवाली के बारे में संचिप्त विवरण उपस्थित सज्जनों को दिया गया ।सबों को यह जानकारी अच्छी लग रही थी । उपस्थित लोगों ने नास्ते और आपस में बातें करने का मज़ा लिया । यह पहल विविधता के सम्मान और हमारी भारतीय संस्कृति एवं दीवाली पर्व के प्रति जागरूकता फैलाने का सुंदर उदाहरण रही। इस अवसर पर विभिन्न भारतीय संस्थाओं की एकजुट उपस्थिति ने हमारी एकता और सहयोग की भावना को भी प्रदर्शित किया।
समिति के लिये आपके विचारों और सुझाओं का हमेशा स्वागत है। समिति के कोई विशेष कार्य करने के लिए यदि आप अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।।
धन्यवाद
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
ईमेल: president@hindi.org | shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: +1 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना की युवा समिति के लिए
अध्यक्षा, सह-अध्यक्षा और कार्यक्रम समन्वयकों की घोषणा
2025–2026 युवा नेतृत्व नियुक्तियाँ
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना को यह घोषणा करते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि वर्ष 2025–2026 की युवा समिति के लिए निम्नलिखित उत्कृष्ट हाई स्कूल छात्रों को नियुक्त किया गया है।
1. अन्विता राजपूत – चेयर
2. अन्वी जामनिस – को-चेयर
3. अंशी टोखी – कार्यक्रम समन्वयक
4. एंजेल गुप्ता – कार्यक्रम समन्वयक
5. एकता गुप्ता – कार्यक्रम समन्वयक
6. मायरा सूद – कार्यक्रम समन्वयक
अन्विता, अन्वी, अंशी, एंजेल और एकता, कार्मेल हाई स्कूल की प्रतिभाशाली छात्राएं हैं, जिन्होंने हिन्दी भाषा क्लब में भाग लेकर नेतृत्व क्षमता और पहल की भावना का अद्वितीय प्रदर्शन किया है। मायरा, हैमिलटन साउथईस्टर्न हाई स्कूल, फिशर्स, इंडिआना की एक समर्पित छात्रा हैं। इन सभी की सांस्कृतिक जागरूकता के प्रति प्रतिबद्धता और हिंदी भाषा की शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रति जुनून, आईएचए-इंडियाना के मूल्यों को सही मायनों में प्रतिबिंबित करता है। हमें पूर्ण विश्वास है कि ये प्रतिभावान युवा नेता प्रभावशाली पहलों की शुरुआत करेंगे और हमारे समुदाय में युवाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए एक सजीव मंच प्रदान करेंगे।
कृपया अन्विता, अन्वी, अंशी, एंजेल, एकता और मायरा को इस नए और उत्साहजनक सफर के लिए शुभकामनाएँ दें। आईएचए-इंडियाना को इनके जोश, रचनात्मकता और नेतृत्व से नई ऊँचाइयों की उम्मीद है!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- नैशविल , टेनेसी शाखा रिपोर्ट
हिंदी दिवस समारोह – भाषा और कला के संग एकता का उत्सव
सितम्बर 21 , 2025
द्वारा : कोमल जोशी, नैशविल शाखा
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के नैशविल शाखा ने हिंदी दिवस समारोह – भाषा और कला के संग एकता का उत्सव मनाया। मेरे सुर और तुम्हारे सुर, जब मिल जाएँ… तो सुर बने हमारा।”
इसी भावना के साथ, रविवार 21 सितम्बर 2025 को नैशविल में 3055 Haywood Lane पर हिंदी दिवस का भव्य आयोजन हुआ।
·सरस्वती वंदना और “मिले सुर मेरा तुम्हारा” पर नृत्य से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ, जिसने भारत की विविधता में एकता का सुंदर संदेश दिया।
अटलांटा की धूप-छाँव टीम ने दो मनमोहक नाटक प्रस्तुत किए –
1. “चीफ़ की दावत” – माँ-बेटे के रिश्ते पर आधारित भावपूर्ण प्रस्तुति।
2. “जुकाम जारी है” – हास्य और व्यंग्य से भरपूर, जिसने सबको खूब गुदगुदाया।
यह आयोजन दर्शकों की गर्मजोशी और सहभागिता से और भी यादगार बन गया। उनकी तालियों और उत्साह ने हर कलाकार का मनोबल बढ़ाया।हमारे समर्पित स्वयंसेवकों और आयोजन टीम ने पूरे कार्यक्रम को सहज और व्यवस्थित बनाया – चाहे सजावट हो, भोजन प्रबंधन, मेहमानों का स्वागत या सोशल मीडिया पर प्रचार, हर कार्य में उनकी मेहनत झलकती रही। सच में, हमारे स्वयंसेवक इस शाम के अनदेखे नायक रहे।
प्रायोजक – Rarit Financials, Path Realty और Hair & Beauty Passion by Vandy – का हार्दिक धन्यवाद, जिनके सहयोग से यह संभव हुआ।
कार्यक्रम का समापन सभी का अभिनन्दन और पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र के साथ किया गया।
हिंदी दिवस का यह उत्सव भाषा, कला और एकता का प्रतीक बनकर सभी के दिलों में एक मधुर स्मृति छोड़ गया।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- न्यू जर्सी शाखा रिपोर्ट
हिंदी दिवस समारोह-- सितम्बर 19 , 2025
विलियम पैटर्सन यूनिवर्सिटी (William Paterson University)
द्वारा : बबिता श्रीवास्तव अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति ,न्यू जर्सी शाखा की अध्यक्ष
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न्यू जर्सी शाखा की तरफ़ से William Paterson University के छात्रों के साथ हिंदी दिवस 19 सितम्बर को मनाया गया ।बबिता श्रीवास्तव अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति ,न्यू जर्सी शाखा की अध्यक्ष ने हिंदी दिवस के अवसर पर छोटी सी हिंदी गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें उन्होंने हिंदी भाषा के बारे में छात्रों को महत्वपूर्ण जानकारी दी। इस गोष्ठी में प्रवासी छात्र ( International students) भी शामिल थे।
कुछ शब्द जो उन्हें सिखाया गया—
ठग thug
बरामदा veranda का अपभ्रंश है
चाय chai
द the
जंगल jungle
लूट loot
पैजामा pyjama
चटनी chutney.
Students को गोष्ठी बहुत अच्छी लगी उनका उत्साह बहुत अच्छा लगा। ये छोटी सी पहल ने भारतीय और प्रवासी सभी छात्रों को हिंदी से जोड़ा ।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- इंडियाना शाखा रिपोर्ट
हिंदी दिवस 2025: भाषा, संस्कृति और युवा शक्ति का उत्सव
सितम्बर 14 , 2025
द्वारा :आदित्य कुमार, विद्या सिंह एवं राकेश कुमार
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति इंडियाना शाखा द्वारा इस वर्ष का हिंदी दिवस समारोह उत्साह, गरिमा और सांस्कृतिक समरसता के साथ मनाया गया। सेंट्रल इंडियाना के हिंदू मंदिर के सामुदायिक केंद्र में आयोजित इस भव्य आयोजन में सैकड़ों हिंदी प्रेमियों ने भाग लिया, जहाँ पूरा सभागार कविता, संगीत, नृत्य और देशप्रेम की भावनाओं से गूंज उठा।
कार्यक्रम का शुभारंभ अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडिआना की अध्यक्षा श्रीमती विद्या सिंह के स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने हिंदी को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और पहचान का मूल स्तंभ बताया। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से हम नई पीढ़ी में हिंदी के प्रति प्रेम, गर्व और आत्मीयता को जागृत कर सकते हैं। साथ ही, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडिआना की युवा समिति का परिचय कराते हुए यह गौरवपूर्ण तथ्य साझा किया कि इस वर्ष के आयोजन की संपूर्ण रूपरेखा और संचालन युवा स्वयंसेवकों द्वारा किया गया , यह हमारे समुदाय में नई ऊर्जा और नेतृत्व का प्रतीक है।
भारत और अमेरिका के राष्ट्रगानों के साथ कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत हुई, जिसे स्थानीय बाल प्रतिभागियों ने प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति की कोमलता और भावनात्मक गहराई ने सभी उपस्थितजनों को अभिभूत कर दिया। श्वेता भदौरिया के संचालन में यह सत्र अत्यंत प्रभावशाली और भावनात्मक रहा। रंगारंग प्रस्तुतियों की शुरुआत बालगोकुलम समूह के बच्चों के नृत्य से हुई, जिसे वृंदा दोशी ने कोरियोग्राफ किया था। नीयति दोशी, ऐश्वी सैनी और नव्या ठक्कर की लयबद्ध प्रस्तुति ने दर्शकों को आनंद से भर दिया। इसके बाद काव्य पाठ का मनोहारी क्रम शुरू हुआ, जिसमें वेदिका, त्वरिता शर्मा, अन्वी सिंह और सात्विक सिंह ने अपनी कविताओं से समां बाँध दिया। सबसे छोटे प्रतिभागी वर्धन राजपूत ने अपनी प्रस्तुति से पूरे हॉल को बचपन की मधुर यादों से जोड़ दिया और सभी की सराहना पाई।
कार्यक्रम के विद्वत्तापूर्ण क्षण तब आए जब अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडिआना के पूर्व अध्यक्ष और संस्थापक सदस्य डॉ. राकेश कुमार ने “AI के युग में हिंदी सीखना” विषय पर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा को सरल और सुलभ बनाने के लिए वैज्ञानिक और एआई विशेषज्ञ निरंतर प्रयास कर रहे हैं। इसी क्रम में प्रोफेसर रशिम शर्मा की प्रस्तुति भी साझा की गई, जिसमें इंडियाना विश्वविद्यालय, ब्लूमिंगटन में हिंदी स्नातक पाठ्यक्रम के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम की संगीतमय छटा तब और निखर उठी जब मिडिल स्कूल के छात्र अनीश कर्वा ने सैक्सोफोन पर मधुर धुन बजाई और फिर “ऐ वतन” गीत गाकर सभी के मन में देशभक्ति की भावना जाग्रत कर दी। इसके बाद ओडिसी नृत्यांगना अनन्या कर की प्रस्तुति ने मंच को भक्ति, सौंदर्य और शुद्ध कला की दिव्यता से आलोकित कर दिया। उन्होंने अत्यंत भावपूर्ण और सुसंगत ताल-लय में एक मनमोहक ओडिसी नृत्य प्रस्तुत किया, जिसमें शास्त्रीय परंपरा, सौंदर्यबोध और आध्यात्मिक गहराई का अद्भुत संगम देखने को मिला। उनकी मुद्राएँ, भाव-भंगिमाएँ और मंच पर सहज आत्मविश्वास इतना प्रभावशाली था कि दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए और प्रस्तुति की समाप्ति पर पूरे हॉल ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से उनका अभिवादन किया। अनन्या की प्रस्तुति एक कला अनुभव बन गई, जिसने हर दर्शक के हृदय को गहराई से छू लिया।
कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत “कृष्ण और सुदामा की मित्रता” पर आधारित नाटिका ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया, जिसमें दोस्ती के निश्छल, आत्मिक और निःस्वार्थ स्वरूप को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाया गया। श्वेता भदौरिया की कोरियोग्राफी में यह प्रस्तुति भाव-भंगिमाओं और नाट्य अभिव्यक्ति के माध्यम से इतनी सजीव बनी कि मंच पर कृष्ण और सुदामा की अमर मित्रता साकार हो उठी और पूरा हॉल गहरी भावनाओं में डूब गया।
समापन पर Cheerful Sakhi Dance Group की ऊर्जा से भरपूर प्रस्तुति ने पूरे कार्यक्रम को अंतिम उत्कर्ष पर पहुँचा दिया। दर्शकों की गूंजती तालियाँ इस बात की गवाह थीं कि यह आयोजन उनके हृदयों में गहरा प्रभाव छोड़ गया। अंत में अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडिआना के उपाध्यक्ष आदित्य कुमार शाही ने सभी प्रतिभागियों, आयोजकों, अभिभावकों और दर्शकों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। पूरे हिंदी दिवस कार्यक्रम का सजीव और प्रभावशाली संचालन अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडिआना की युवा समिति के सदस्ययों (अन्विता राजपूत, अन्वी जामनीस, एंजेल गुप्ता, अंशी तोखी और एकता गुप्ता ) ने उत्कृष्ट कौशल और उत्साह के साथ किया। इन सभी ने न केवल कार्यक्रम को सुचारू रूप से संचालित किया, बल्कि इंडियाना के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत भी साबित हुए। यह आयोजन न केवल हिंदी भाषा का उत्सव था, बल्कि समुदाय की एकता, युवाओं की सक्रिय भागीदारी और सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत उदाहरण भी सिद्ध हुआ। सभी उपस्थितजनों ने इस प्रेरणा के साथ कार्यक्रम से विदा ली कि हिंदी की यह ज्योति यूँ ही पीढ़ी दर पीढ़ी प्रज्वलित होती रहेगी। संपूर्ण कार्यक्रम की कुछ विशेष झलकियाँ संलग्न तस्वीरों के माध्यम से प्रस्तुत हैं।
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द्वारा - प्रो० अनिल कुमार
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अनिल कुमार छपरा (बिहार) के मूल निवासी हैं; उन्होंने जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा से 31 जुलाई 2016 को भौतिकी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर के रूप में अवकाश ग्रहण किया. तत्पश्चात वे अपने हिन्दी में लिखे वैज्ञानिक आलेखों एवं कहानियों से हिन्दी की सेवा में जुटे हैं। प्रो० कुमार ने सैद्धांतिक भौतिकी में पीएच०डी० की थी और फ्रांस के एक प्रमुख शोध संस्था ‘सेन द सक्ले’ एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के दो विश्वविद्यालयों ‘राईस विश्वविद्यालय, ह्यूस्टन, टेक्सास’ तथा ‘फामु, टलाहास्सी, फ्लोरिडा’ में शोध सहायक-सह-व्याख्याता के रूप में भी कुल 6 वर्षों तक कार्य किया। उनकी एक पुस्तक ‘फ़रिश्ते’ कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई है और वैज्ञानिक आलेखों पर दूसरी पुस्तक प्रकाशन हेतु तैयार है। अवकाश ग्रहण के पश्चात प्रो० कुमार स्थाई रूप से पटना, भारत में ही निवास करते है।
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जैसे ही “लक्ष्मी” ने घर में प्रवेश किया मैं उबल पड़ी, “यह आने का समय है तुम्हारा, कितनी बार समझाया सबेरे समय पर आ जाया करो, सबों की अपनी-अपनी व्यस्तता होती है, पर तू है कि समझती ही नहीं.” “गलती हो गयी दीदी, माफ कर दो, अब कभी देर नहीं .
.” मैंने उसे बीच में ही रोक दिया क्योंकि मेरी नजर उसके गाल पर पड़ चुकी थी, “पहले तू इधर आ, यह कैसा निशान है तेरे गाल पर, आज तेरे ‘मरद’ ने फिर तुझे मारा, है न?” सहानुभूति के दो शब्द सुन वह फूट-फूट कर रो पड़ी, “हाँ दीदी, आज सुबह उठ कर अपने दारू के लिए पैसे माँगने लगा, मैं कहाँ से लाऊँ पैसे, मेरे पास कोई खजाना रखा है क्या? पहले छः घरों में काम करती थी, रोज-रोज के लड़ाई झगड़े और मार पीट ने मुझे कमजोर कर दिया और अब तो चार, नहीं-नहीं केवल तीन, जगह ही काम कर पाती हूँ महीने के जितने पैसे मिलते हैं सब छीन लेता है, वह तो भला हो सरकार का जो हर महीने हमारा पेट भरने लायक राशन, जैसे चावल,गेहूँ, दाल, इत्यादि ‘फ्री’ में दे देती है, खरीदना नहीं पड़ता; ‘कोरोना’ के समय जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक चल रहा है, पता नहीं कब तक चलेगा. फिर तुम सब की कुछ अतिरिक्त सेवा-टहल कर जो पैसे इकट्ठा करती हूँ उस से सब्जी वगैरह खरीदती हूँ नहीं रहे पैसे तो बच्चों को ‘फुसला’ कर नमक और अचार के साथ रोटी खिलाती हूँ, उस समय दिल रोता है दीदी; कभी-कभी तो सोचती हूँ कि अपनी जिंदगी ही खतम कर दूँ, पर बच्चों का ख्याल कर के रुक जाती हूँ”
“नहीं लक्ष्मी, ऐसा नहीं सोचते, तू नहीं रही तो तेरे बच्चों की देखभाल तेरा ‘मरद’ कर पाएगा, वे बेचारे तो अनाथ हो जाएंगे?” “हां दीदी, जानती हूँ, इधर मैं मरी, उधर वह दूसरी औरत कर लेगा, यही सोच कर मैं अपने को रोक लेती हूँ, नहीं तो मेरा मन अब हार गया है. और घर-घर जाकर काम करना भी मुश्किल होता जा रहा है, एक तुम हो दीदी, और दूसरी वह सामने की ‘बिल्डिंग’ में फ्लैट नंबर 315 वाली, जो मेरे साथ एक इंसान की तरह व्यवहार करते हो, बाकी के लिए तो मैं एक ‘पैसे से खरीदी गई गुलाम’ से भी बदतर हूँ गरीब हूँ तो क्या मेरी कोई इज्जत नहीं दीदी?
सामने के ‘कॉम्प्लेक्स’ के 1103 में एक नया किरायादार आया, उसे ‘मेड’ की जरूरत थी; मुझ से ‘सिक्योरिटी’ भैया ने वहाँ काम करने के बारे में पूछा. मैंने भी सोचा चलो एक काम और कर ही लेती हूँ. बीबी किसी ‘अंग्रेजी’ स्कूल में पढ़ाती थी और उसका मरद किसी कंपनी में बड़ा ‘साब’ था. सात दिनों तक सब ठीक-ठाक चला, मगर एक दिन जब उसके घर पहुँची तो मरद अकेला था, मुझे ठीक तो नहीं लगा पर फिर भी मैं अपने काम में लग गई. इसी बीच वह ‘हराम..’ पीछे से आया और मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया; मैंने भी एक जोड़ का ‘लाफा’ (थप्पड़) लगाया, उसकी कीमती प्लेट पटकी और भाग आई।फिर कभी नहीं गई उस ‘बिल्डिंग’ में, 315 का काम भी छोड़ दिया. वह तो भला हो तुम्हारे ‘कॉम्प्लेक्स’ के ‘सिक्योरिटी भैया’ का जिसने मुझे एक नया काम लगवा दिया.” मैं उसे रोकती नहीं तो उसकी कहानी चलती ही जाती
, मैं जानती थी उसका मरद एक नंबर का नालायक था, मैंने भी उसे दो-तीन बार समझाया था, एक बार किसी से कह कर उसे उधार में एक ‘ठेला’ दिलवाया, सोचा ठेला चलाकर दो पैसे कमाएगा तो इस बेचारी की सहायता हो जाएगी पर उस नालायक ने कुछ ही दिनों में अपना ठेला भी बेच दिया और सारे पैसे पी गया; बेचारी लक्ष्मी को वह कर्ज भी चुकाना पड़ा। लक्ष्मी फिर शुरू हो गयी, “इतना ही नहीं है दीदी, ठीक है आप पैसा देते हो, साथ में कम से कम प्यार से तो बात कर लो, इंसान हूँ मैं भी, गलती हो जाती है, तो इसका मतलब यह थोड़ी हुआ कि मुझे ‘जली-कटी’ सुनाती रहो, और वह आपकी बिल्डिंग की 1205 वाली, वह तो कभी गलती से कोई प्लेट छूट कर टूट गया तो उसके पैसे भी मेरे पगार से काट लेती है; यह ठीक हुआ क्या?” “देख, काम करने निकली है तो यह सब झेलना ही पड़ेगा, हर आदमी एक तरह का नहीं होता, थोड़ा ‘चमड़ी’ मोटी कर ले, एक कान से सुन दूसरे से निकाल दे, तकलीफ कम होगी। अच्छा चल, जल्दी से ‘किचन’ ठीक कर दे और मेरे लिए चाय बना दे, मैं नाश्ता कर चुकी हूँ अतः कुछ बनाने की जरूरत नहीं है; साहब दफ्तर जा चुके हैं और बच्चे कॉलेज; बस शाम को थोड़ा पहले आ जाना और साफ-सफाई कर देना।
लक्ष्मी काम बड़ा साफ-सुथरा करती थी, साथ ही कभी कोई चीज बिना माँगे ‘छूती’ नहीं थी; फिर भी लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं समझ नहीं आता. अपना काम पूरा कर मेरी चाय मेरे सामने रख अपना चाय का प्याला ले लक्ष्मी पास आकर बैठ गयी. मैंने हँसते हुए पूछा, “ अरे दूसरे घरों में नहीं जाना क्या, या आज सबों के यहाँ छुट्टी करेगी तू?” “नहीं दीदी, आज 304 और 1205 वाले अपने गाँव गए हैं, इसलिए आज मेरी छुट्टी; बस शाम को आकर तुम्हारे यहाँ साफ-सफाई कर दूँगी.” “अच्छा, तो यह बात है, चल, एक बात बता, क्या तेरा ‘मरद’ बहुत ताकतवर है, हट्टा-कट्ठा है?” “नहीं दीदी, कभी था” कहते हुए वह शरमा गई, “अब तो दारू पी-पी कर उसने अपना शरीर खराब कर लिया है, अब तो उसे चलने फिरने में भी परेशानी होने लगी है”. “फिर जब तुझ पर हाथ उठाता है तू भी पलट कर एक थप्पड़ क्यों नहीं जड़ देती, एक बार ऐसा कर दे तो तुझ पर हाथ उठाने के पहले दस बार सोचेगा”. “राम-राम दीदी, कैसी बात करती हो, वह मेरा ‘मरद’ है, मेरा ‘भगवान’ है, मैं उस पर कैसे हाथ उठा सकती”।“तो फिर मर, कोई दूसरा तेरे लिए कुछ नहीं कर सकता; अच्छा यह बता तेरी बड़ी बेटी तो अब 12 साल की हो चुकी होगी, वह अपने बाप को कुछ नहीं कहती”? “एक दिन उसने उसे बहुत सुनाया, उसपर हाथ उठाने चला तो उसने हाथ पकड़ ऐसा मरोड़ा कि वह खुद ‘बाप-बाप’ चिल्लाने लगा. अब वह उससे डरता है, उसके सामने मुझे कभी कुछ नहीं कहता, मगर जब वह घर में नहीं रहती ‘चूहा’ ‘शेर’ बन जाता है और मेरी मार-कुटाई कर देता है”. “कहा न, ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’, उसके साथ तुझे वैसा ही व्यवहार करना होगा जैसा वह तेरे साथ करता है”. “ना दीदी ना, मैं अपने ‘भगवान’ पर हाथ नहीं उठाऊँगी चाहे वह मुझे मार ही क्यों न दे”।
लक्ष्मी से ऐसी बातचीत महीने में एक बार तो अवश्य हो जाती थी, कभी-कभी दो-तीन बार भी, उसका ‘भगवान’ उसे बेरहमी से कूटता, मगर क्या करे बेचारी अपने ‘भगवान’ पर हाथ कैसे उठाए, ऐसा करने से उसे ‘नरक’ जो जाना पड़ जायेगा; मौत के बाद ‘स्वर्ग’ की कामना में बेचारी लक्ष्मी जीते जी ‘नरक’ भोगने को अभिशप्त थी। हमारी बात आगे बढ़ती उसके पहले ‘अपार्टमेंट’ की घंटी बज उठी, लक्ष्मी ने दरवाजा खोला, सामने मेरी एक बहुत प्रिय और पुरानी सहेली ‘गुलनार’ खड़ी थी। यह मेरे लिए बिल्कुल अप्रत्याशित था, “ अरे गुलनार, इतने वर्षों बाद तू कहाँ से टपक पड़ी?”। “भूल गई, तेरे ‘कॉम्प्लेक्स’ में मेरा भी एक अपार्टमेंट है, समझ ले ‘लौट के बुद्धू घर को आए’, मैं वापस लौट आई हूँ अपने शहर में, अब यहीं रहूँगी”। “अच्छा, तभी देखा 8वीं फ्लोर पर तेरे अपार्टमेंट में कुछ साफ सफाई चल रही थी, मुझे लगा शायद कोई नया किरायादार आ रहा है”. “नहीं अलका, मैं अपनी नातिन ‘पंखुरी’ को लेकर सिंगापुर से वापस आ गई हूँ, बेटी और जमाई बाबू तो आने से रहे, पंखुरी का दाखिला यहीं के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में करवा दिया है। हम दोनों अब यहीं रहेंगे. सुन, तू मेरे लिए एक अच्छी सी मेड खोज दे, बस हम दोनों को ही केवल रहना है”।
मैंने गौर किया ‘मेड’ का नाम सुनते लक्ष्मी का सारा ध्यान इधर ही केंद्रित हो गया था। मुझे भी लगा यह लक्ष्मी के लिए सही रहेगा, उसको एक सुरक्षित घर मिल जाएगा काम करने के लिए और गुलनार को एक भरोसे की मेड; पैसे भी उसे ठीकठाक मिल जाएंगे क्योंकि मेरी सहेली इस मामले में काफी उदार थी। मैंने लक्ष्मी से कहा, “चल हम दोनों के लिए फिर से एक बार चाय बना दे और अपने लिए भी एक कप जोड़ ले और यहाँ आकर अपनी नई ‘मालकिन’ से मिल, कल सुबह से तुझे 811 में भी काम करने होंगे”. लक्ष्मी खुश थी पर उसकी नजरों में मुझे एक प्रश्न उभरता दिखा; यह उसकी पगार के विषय में था। वह कुछ पूछे उसके पूर्व ही गुलनार बोल पड़ी, “देख जितनी पगार तुझे अलका दे रही होगी मैं भी वही दे दूँगी, आदमी तो हम केवल दो हैं, फिर भी”. हमने अपनी चाय खत्म की और शाम को आने के वायदे के साथ लक्ष्मी ने अपने घर की ओर का रुख किया।
लक्ष्मी के विदा होते गुलनार ने कहा, “मेरे आने से तेरी बातचीत में कुछ व्यवधान आ गया था, कोई गंभीर चर्चा हो रही थी क्या, वैसे यह मेड भरोसे की है न”? “हाँ यार तू आँख मूँद कर इस पर भरोसा कर सकती है, काम भी सफाई के साथ करती है, बस एक उसकी व्यक्तिगत समस्या है जिससे कभी-कभी परेशानी हो जाती है”. “ ऐसी भी क्या परेशानी जिसका समाधान हमारी अलका के होते न हो सके, वर्षों पूर्व की हमारी ‘रोटरी प्रेसिडेंट’ बूढ़ी हो चली है क्या”? उसके इस कथन पर हम दोनों सहेलियाँ ठहाके लगा कर हंस पड़ी. मैं भी शुरू हो गई, “ तू तो जानती है गुलनार; तुम ने और मैंने भी, इस शहर को समय के साथ चोला बदलते देखा है। इसके ‘आईटी (IT) हब’ बनने के साथ-साथ नगर के विभिन्न संस्थानों में काम करने वाले नौजवान लड़के लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ती गई, देखते-देखते यह स्थान ‘शहर’ से ‘नगर’ और फिर ‘महानगर’ में परिवर्तित हो गया। जैसे-जैसे इन ‘बच्चों’ की संख्या बढ़ी आसपास के गाँवों से आर्थिक रूप से कमजोर लोग भी नगर की ओर आने लगे, उनके लिए काम के नए-नए अवसर जो बनने लगे थे। उनकी जिंदगी भी बेहतर होने लगी, घरों में काम करने वाली ‘मेड’, ‘कूक’ और ‘सप्लाई-चेन’ में लगे लड़के, सबों को रोजगार मिलता गया, और उन्हें अच्छी आमदनी भी होने लगी. मेरे पड़ोस के ठाकुर साहब के यहाँ जो ‘मेड’ काम करती है वह एक महीने में बतौर पगार 30-35 हजार कमा लेती है, उसका पति एक ‘कॉम्प्लेक्स’ में ‘गार्ड’ का काम करता है जहां से उसे मिलते तो हैं केवल 20 हजार, पर ‘गार्ड’ होने के कारण उसी ‘कॉम्प्लेक्स’ के ‘बेसमेंट’ में वह अपने परिवार के साथ आराम से रह लेता है। दोनों समझदार हैं, मेहनती हैं, अपने पैसों का कभी दुरुपयोग नहीं करते; मैं तो आश्चर्य में पड़ गई जब पड़ोसिन ने बताया कि वह अपने दोनों बच्चों को एक निजी ‘अंग्रेजी’ स्कूल में भेजती है।
यह पढ़े-लिखे आईटी के नौजवान लड़के-लड़कियों की संगति का प्रतिफल था, क्योंकि उन्हें देखकर, उनकी बातें सुनकर उनको भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की प्रेरणा मिली”। जब मैंने लक्ष्मी को उस मेड के बारे में बताया और उससे कुछ सीखने को कहा, तो उसने स्वीकार किया, “हाँ दीदी, मैं जानती हूँ उस ‘सरस्वती’ को; मेरा मरद भी पहले एक कॉम्प्लेक्स में गार्ड ही था और हम उसी की तरह ‘बेसमेंट’ में रहते थे. ‘कोविड’ में मेरे काम तो एक-एक कर छूटते गए, क्योंकि कोई मेड को अपने घर आने भी नहीं देता था, पर उसकी नौकरी चलती रही. सरकार द्वारा तभी से हमें खाने-पीने लायक राशन मिलना शुरू हो गया था। हमारा काम आराम से चल जाता था, पर अब लगता है ऐसी ‘मुफ़्त वाली’ सरकारी सुविधा कोविड के बाद नहीं चलती तो ज्यादा अच्छा होता, कम से कम मेरे जैसे परिवारों के लिए. सरस्वती जैसे लोगों ने तो इसका फायदा उठाया, अपने परिवार को बेहतर बनाने का काम किया, अतः उनकी बात अलग है।
कोविड खत्म हुआ और धीरे-धीरे मैं भी काम पर लौटने लगी, वहीं दूसरी तरफ मेरा मरद ‘दारू’ और, वो क्या कहते हैं – ‘ड्रग्स’ - से यारी करने लगा क्योंकि बीबी की कमाई ने उसे ‘करोड़पति’ जो बना दिया था। दीदी, किसी अच्छी चीज का भी कैसे बुरा प्रभाव हो सकता है, उसका उदाहरण मेरा मरद और मेरा परिवार है; वहीं उसका फायदा उठा कर कैसे बच्चों को आगे बढ़ायें इसका उदाहरण सरस्वती और उसका परिवार है”। आईटी में कार्यरत लड़के-लड़कियों की संगत में रहकर लक्ष्मी ने हिन्दी, अंग्रेजी के ढेर सारे शब्दों का सही-सही प्रयोग करना सीख लिया था. उसने अपनी बात आगे बढ़ाई, “ मुफ़्त राशन अच्छा ही नहीं हमारे जैसे परिवार के लिए आवश्यक भी है, मगर इसके साथ सरकार और समाज को यह भी देखना चाहिए कि कौन उसका लाभ उठा रहा है और किसके लिए यह ‘अमृत’ ‘जहर’ बन रहा है, जैसा मेरे परिवार के साथ हुआ”। गुलनार यह सुनते उछल पड़ी, “क्या कहती है तू, ऐसा कहा उसने, कमाल है यार; ऐसे ही दुनिया नहीं मानती कि अपेक्षाकृत कम शिक्षित होने के बावजूद हमारे देश में लोकतंत्र दिन प्रति दिन मजबूत होता जा रहा है. जब इतनी समझदार है वह तो फिर समस्या क्या है”?
“इतना ही नहीं, आगे सुन;” एक दिन उसने मुझ से कहा था, “ जानती हो दीदी, वो 508 है न, जहां मैं काम करती हूँ, उसमें आईटी वाले तीन लड़के रहते हैं और सब तुम्हारे ‘मुल्क’ (उसका मतलब था मेरा प्रदेश बिहार) से हैं; बड़े अच्छे हैं, सब मुझे ‘लक्ष्मी अम्मा’ बोलते हैं. उनकी बातें सुनी तो पता चला कि इन ‘आईटी’ वाले बच्चों में ज्यादातर साधारण परिवार से आते हैं जो अपने ‘बाप-दादा’ की समझदारी से आगे बढ़ते हुए आज इतनी अच्छी जगह पहुँच गए हैं; इनमें से लगभग सभी बच्चे हर महीने अपने माँ-बाप को कुछ पैसे भी भेजते हैं. मैंने एक से पूछा, “तू घर पैसे क्यों भेजता है, तेरे घर वाले तो सभी अमीर ही होंगे?” तो उसने हँसते हुए कहा, “नहीं लक्ष्मी अम्मा, मेरे बाबू जी तो सरकारी दफ्तर में एक साधारण क्लर्क हैं, मेरे भेजे गए पैसों से वे मेरे छोटे भाई-बहन को अच्छी तरह पढ़ा पाते हैं, और भी कुछ जरूरी काम कर लेते हैं; ऐसे ही तो परिवार आगे बढ़ता है”. जब लक्ष्मी यह सब बात कर रही थी उस वक्त उसकी नजरें शून्य में कुछ तलाशती लग रही थी, उसकी आवाज भर्रा गई, “ और दीदी, हमारे नेताओं को देखो, वे हमें ‘मुफ्तखोरी’ का लालच देकर रातों रात ‘लखपति’ बना देने का सपना दिखाते हैं और होता है कुछ और, ये लुभावने वायदे केवल उन्हें ‘करोड़पति’ बनाने का काम करते हैं”. गुलनार सारी बातें को ध्यान से सुन रही थी, “समझी, परेशानी उसके परिवार में है और वह भी उसके ‘मरद’ के कारण”. फिर भी मेरी अलका, ‘द ग्रेट सोशल वर्कर’, परेशान क्यों है? अरे तुझे अपने घर में ही एक ‘चैलेंज’ मिल गया, बस लग जा ‘बेटे’, और इसका समाधान खोज; मैं भी आ गई हूँ और तुझे मेरा सहयोग बतौर एक ‘जूनियर’ तो मिलेगा ही”।
“अरे यार मैं भी यही सोच रही थी कि किया क्या जाए, तभी अचानक एक दिन ‘समुद्र मंथन’ की कहानी याद आ गई, जब देवों और दानवों ने मिलकर ‘रत्नगर्भा समुद्र’ का मंथन कर अन्य वस्तुओं के साथ ‘अमृत और विष’ दोनों प्राप्त किए थे। अमृत-पान के लिए तो सभी बेचैन थे पर ‘हलाहल की ज्वाला’ को झेलना उनके लिए अत्यंत दुष्कर था। वैसी स्थिति में ‘भगवान शिव’ ने स्वयं विष-पान कर उनकी परेशानी दूर कर दी”। “अच्छा तो अब समझी, तू यह सोच रही है कि इस मामले में भी कोई ‘नीलकंठ’ आएगा और इस समस्या का समाधान कर देगा। तो मेरी ‘बहना’ इस ‘कलयुग’ में ऐसा तो होने से रहा, फिर यह समस्या ज्यादा उलझी हुई भी है। पिछली बार तो ‘अमृत और विष’ अलग-अलग थे, ‘औघड़ दानी’ शिव ने विष को अपने गले में धारण कर सबों को उसकी ज्वाला से बचा लिया था, पर इस बार स्थिति दुष्कर है. गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं में से अपने परिवार के लिए ‘अमृत को विष से विलग’ करने का कार्य कोई अन्य नहीं बल्कि परिवार ही करेगा।” “और, ऐसा होगा कैसे?” “क्या तू ने ‘नीर-क्षीर विवेक’ का नाम नहीं सुना है; परिवार को, विशेष रूप से उसके मुखिया को, अपने भीतर छुपी क्षमता, जिसे मैं ‘नीर-क्षीर विवेक’ कहती हूँ, का प्रयोग कर ‘पानी मिले दूध’ से दूध को अलग करना पड़ेगा, ठीक एक ‘राजहंस’ की तरह। जिसने यह कर लिया वह अपने सम्पूर्ण परिवार के लिए ‘अमृत’ को ‘विष’ से सफलता पूर्वक विलग कर सकेगा, जैसे सरस्वती के परिवार ने किया, अन्यथा लक्ष्मी के परिवार की तरह दी गई सुविधा उनको आगे बढ़ाने की जगह और पीछे धकेल देगी।
” “मगर यह भी तो सोच, वह अल्प-शिक्षित समाज जिसके लिए इस ‘स्कीम’ की शुरुआत हुई, क्या इतना विवेक पूर्ण कदम उठाने में सक्षम होगा”. “हाँ होगा, सरस्वती ने किया न, तो लक्ष्मी क्यों नहीं, वैसे भी हमारे देश में लोकतंत्र की जड़ें इन्हीं लोगों के विवेक पूर्ण निर्णय से मजबूत होती गई है। आम चुनाव में इन तथाकथित ‘अल्प शिक्षितों’ द्वारा राज्य और केंद्र की सरकारों को बनाने में क्या तुझे इनका ‘नीर-क्षीर विवेक’ दिखाई नहीं देता; इन्होंने तो पता नहीं कितने उच्च शिक्षित ‘चुनाव विश्लेषकों’ को ‘बेकारी’ की सीमा तक पहुँचा दिया है। हाँ, इतना अवश्य है कि यदि हम अपनी व्यस्त जिंदगी से थोड़ा वक्त इन जरूरतमंद परिवारों के लिए निकाल सकें और निःस्वार्थ भाव से प्यार पूर्वक इनका मार्गदर्शन करें तो ‘लक्ष्मी को भी सरस्वती बनने’ में देर नहीं लगेगी’।
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अपनी कहानियाँ
"जगह मिलने पर पास दिया जायेगा"
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इन्होने अब तक लगभग 365 कहानियॉं, 100 समीक्षा आलेख, 50 व्यंग्य, 50 आलेख, कुछ संस्मरण, यात्रा वृतांत लिखे हैं जो प्रतिष्ठित पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये हैं।
इन्हे कई पुरष्कार प्राप्त हुए हैं -मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय गजानन माधव मुक्ति बोध पुरस्कार।मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का प्रादेशिक सुभद्रा कुमारी चैहान पुरस्कार। प्रकाश रानी हरकावत पुरस्कार (म0प्र0)।गायत्री कथा पुरस्कार (म0प्र0)। निर्मल साहित्य पुरस्कार (म0प्र0)रत्नकांत साहित्य पुरस्कार (म0प्र0) इत्यादि।
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"जगह मिलने पर पास दिया जायेगा"
आपको भवन निर्माण देखना अच्छा लगता है।
जैसे जीवन का एक बड़ा और जरूरी सपना पूरा होने जा रहा है। यह सुदूर क्षेत्र पूरी तरह रिहायशी नहीं बना है। यह जरूर है इधर-उधर निर्माण कार्य होता जा रहा है। अपने घर की बॉलकोनी में आराम कुर्सी पर बैठे हुये आप निर्माण से संबंधित हलचल देखकर पुलकित हो उठते हैं। आपको लगता है इस मैदान जैसे क्षेत्र को धीरे-धीरे एक तरतीब मिलती जा रही है। आप तत्काल निर्माण स्थल पर जाकर समुचित जानकारी ले आते हैं, अपने बारे में दे आते हैं। कह सकते हैं आप पूरे क्षेत्र की जानकारी रखते हैं।
आपने देखा आपके घर से कुछ दूरी पर भवन निर्माण हो रहा है। आप जानकारी लेने जा पहुँचे। छाता ताने और काला चश्मा धारण किये हुये एक भव्य और खूबसूरत वृद्धा काम का निरीक्ष्सण-परीक्षण कर रही थी। आपने अपना परिचय दिया -
‘‘मैं हरिओम पुरोहित। सेवा निवृत्त प्राचार्य। कृषि महाविद्यालय। उधर, उस मकान में रहता हूँ।’’
वृद्धा तनिक मुस्कुराई ‘‘मैं मिसेस शाह। यह मकान मेरा बेटा अमोल बनवा रहा है। मैं कभी-कभी काम देखने आती हूँ।’’
आप बहुत शुद्ध हिन्दी जिसे परिष्कृत हिन्दी कहा जाता है में बात करना पसंद करते हैं ‘‘गृह निर्माण को लेकर एक कहावत है। पहले प्रयोग के तौर पर भवन बनवाओ और उसमें त्रुटियाँ ढूँढ़ो। फिर दूसरा भवन बनवाओ जहाँ वे त्रुटियाँ ढूँढ़ने से भी न मिलें। यदि ऐसा त्रुटि-रहित भवन बनता है तो वह अवश्य हमारे स्वप्न और रुचि का घर होगा। मैंने बहुधा देखा है लोग घर बनवाते हैं और त्रुटियों को लेकर जीवन भर असंतुष्ट रहते हैं। पर दो मकान बनवा पाना औरसत मनुष्य के लिये सम्भव नहीं होता। एक मकान ही कठिनाई से बनता है।
वृद्धा सतत मुस्कुराती जा रही थी। आपकी बात पर या यह देख कर कि आप पहले ही परिचय में कितना अधिक बोलते जा रहे हैं।
‘‘यह आपने अच्छा फार्मूला बताया।’’
‘‘तो आपने प्रत्येक बिंदु पर विचार कर लिया है न ? अब लोग वास्तुशास्त्र का महत्व स्वीकारने लगे हैं। सर्वप्रथम शल्य शोधन प्रक्रिया द्वारा भूमि को शुद्ध करना चाहिये।’’
मिसेस शाह का मुस्कुराना थम गया ‘‘यह क्या होता है ?’’
‘‘ईशान कोण में स्थित भवन शुभ होते हैं। दिशा का अपना एक महत्व होता है। बहुत से मनुष्य मकान के गलत स्थिति के कारण गृह कलह, व्याधि, अवसाद, असफता से त्रस्त रहते हैं किंतु वास्तविक कारण न समझ कर उपचार में पैसा व समय व्यय करते हैं।’’
खिसकती उम्र में भगवान और भाग्य पर भरोसा बढ़ने लगता है। आपकी बात सुन मिसेस शाह दुविधा में आ गईं ‘‘अनमोल ने पता नहीं किस बेवकूफ आर्किटैक्ट से नक्शा बनवाया है। देखिये न घर का प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में रहेगा।’’
‘‘तो बरामदे का द्वार सामने न रख कर पूर्व में रखें। प्रवेश द्वार पूर्व की ओर हो जायेगा।’’
‘‘ठीक बात। अमोल को बताऊॅंगी।’’
अगले दिन मिसेस शाह ने बताया -
‘‘मि. पुरोहित, अमोल वास्तुशास्त्र को नहीं मानता। कहता है फ्रंट तो घर का अट्रैक्शन होता है। प्रवेश द्वार पूर्व की ओर रख क रवह घर का लुक खराब नहीं होने देगा।’’
आप उदास हो गये। आप उपयोगी सिद्ध होना चाहते हैं। लम्बे जीवन के वृहत्तर अनुभव के सूत्र-सिद्धांत अगली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं पर यह पीढ़ी पूरी तरह हड़बड़ाई हुई है।
‘‘कोई बात नहीं। मकान दक्षिणमुखी भी होते ही हैं।’’
मिसेस शाह ने आपकी उदासी को लक्ष्य किया ‘‘अमोल मेरी नहीं सुनता। मिस्टर शाह आज होते तो मैं अपनी बात मनवा लेती। दरअसल अमोल और मेरी बहू माधुरी को सिर्फ अपनी नौकरी से मतलब है। आर्किटैक्ट बेवकूफ है कि नहीं है पर थोड़ा अपने दिमाग का इस्तेमाल करो तो काम अच्छा होता है।’’
जैसे एक व्यस्तता हाथ आ गई है। आप उपेक्षित-प्रताड़ित नहीं हैं। प्रभुता सम्पन्न हैं पर अकेलापन समस्या है। अक्सर ठीहे पर पहुँच जाते हैं। पहले आप झिझके कि मिसेस शाह स्त्री हैं फिर मान लिया पकी उम्र में स्त्री-पुरुष का विभेद खास मायने नहीं रखता। आप नाती-पोते वाले। मिसेस शाह भी।उधर मिसेस शाह भी आपको देखकर स्फूर्त हो जाती हैं ‘‘ आइये। आप कल नहीं आये तो मैंने सोचा वक्त न मिला होगा।’’
आप चकित हुये ‘‘जबकि मेरे पास बहुत समय है। समस्या है कैसे व्यतीत करूँ ? आप स्त्रियाँ घर-गृहस्थी, रसोई में तन्मय रहती हैं किंतु हम पुरुष तो रसोई में घुसते हुये शोभा नहीं देते। निष्ठा (बहू) हल्ला मचा देती है। पति को पत्नी से पहले मर जाना चाहिये। पत्नी, पति के अहम् को समझती है। निष्ठा को अपनी आवश्यकतायें क्या बताऊॅं और बिना बताये वह कैसे जानेगी मुझे क्या चाहिये ?’’
‘‘मेरी मानें तो पत्नी को पति से पहले मरना चाहिये। पति न रहे तो बुढ़ापे में पत्नी बेसहारा हो जाती है। कमी कुछ नहीं है लेकिन है। वे होते तो तेज धूप में मैं यहाँ अकेले न बैठी होती।’’
‘‘सचमुच गर्मी है। मेरे घर चलें। थोड़ा विश्राम मिलेगा। निष्ठा कार्यालय चली जाती है इसलिये चाय नहीं पिला सकूँगा किन्तु मेरे पोते शांत और जोश ठंडा पानी अवश्य पिलायेंगे।’’
धूप से व्यथित मिसेस शाह चल पड़ी ‘‘चाय मैं बना दूँगी।’’
क्रम बन गया। मिसेस शाह दोपहर में एक घण्टा सुस्ता लेंती। चाय पी लेती। निष्ठा को हेलमेल न सुहाया। आपने निष्ठा को कहते स्पष्ट सुना -
‘‘शांत और जोश बताते हैं बाबूजी पूरा दिन उधर रहते हैं। फिर मिसेस शाह यहॉ आती हैं। चाय बनाती हैं। बाबूजी ने यह क्या संगत पकड़ ली ? यह नहीं होता कि शांत और जोश की पढ़ाई पर ध्यान दें।’’
‘‘बोर होते होंगे। थोड़ा चले जाते हैं।’’ अभिराम ने आपके पक्ष की बात की लेकिन आप बेतरह ठिसके रहे - इस उम्र में भी मैं अपनी तरह से समय व्तीत करने हेतु स्वतंत्र नहीं हूँ ? पूरा दिन ? एक फेरा उधर लगा लेता हूँ तो यह पूरा दिन जैसी बात है ? एक कप चाय का इतना बवाल ? शांत और जोश की पढ़ाई पर कब ध्यान नहीं दिया ? ............ आप सुस्त पड़े रहे। ठीहे पर नहीं गये। दुपहरी में मिसेस शाह आ गईं -
‘‘आप आये नहीं ?’’
‘‘सुस्ती का बोध हो रहा है।’’
‘‘मेरा तो टी टाइम हो गय है।’’
‘‘बनायें। मैं भी ग्रहण कर लूँगा।’’
निष्ठा की आपत्ति से आप आहत हैं। मिसेस शाह को बैरंग लौटा देना चाहते थे पर अचानक कुछ हुआ है। मिसेस शाह को देख कर आपको एक मजूबती का बोध होने लगा। यही कि अभिराम या निष्ठा आपत्ति करेंगे तो आप साफ कहेंगे - किसी को एक प्याला चाय पिलाने या कुछ अच्छी बातें कर उत्साह पाने के लिये मैं पूर्णतः स्वतंत्र हूँ। यह मेरा अधिकार है।
मिसेस शाह का मकान बन कर तैयार हो गया। गृह प्रवेश के उपलक्ष्य में दिये गये मध्यान्ह भोज पर वे आप सपरिवार गये। मिसेस शाह प्रायः आप पर केन्द्रित रहीं -
‘‘हमारा गुजराती खाना पसंद आया ?’’
‘‘व्यवस्था उत्तम है।’’
मिसेस शाह ने लाम हर्षक ठहाका लगाया। निष्ठा को लगा ठहाके के सूत्र आपसे जुड़ रहे हैं। निष्ठा आपको लेकर किस हद तक बात कर सकती है जानने के लिये उचित-अनुचित जैसे तथ्य को भूल कर आप प्रयत्नपूर्वक बेटे-बहू की बातें सुनने लगे हैं।
‘‘अभिराम, मिसेस शाह, बाबूजी पर फिदा है। ऐसे ठहाके लगा रही थी।
‘‘बाबूजी आज भी इतने फिट हैं निष्ठा कि कहना पड़ता है साठ साल के बूढ़े या जवान।’’
आपने अपना अवलोकन किया। हाँ, भव्य पर्सनालिटी है।
‘‘तभी इस उम्र में इश्कियाने चले हैं।’’
‘‘कहूँ क्या जोड़ी बना लें ? निष्ठा तुम्हें नई-नवेली सास मिल जायेगी।’’
‘‘रहम।’’
आप दंग हैं। यह प्रतिकार है या परिहास ? आपने ऐसा क्या कर दिया जो निष्ठा किस्से बना रही है ? स्त्री से बात करना इश्क हो जाता है ? आप अचानक सामने पड़ कर बेटे-बहू को फटकारना चाहते हैं। पर बेटे-बहू कह सकते हैं - बाबूजी आप छिपकर हमारी बातें सुनें, यह ठीक नहीं है।
पर आप अपनी जिज्ञासा का क्या करेंगे ?
जिज्ञासा विकराल होती है।
आप सावधानी सतर्कता बरतते हुये बेटे-बहू की बातें सुनना चाहते हैं। अपनी चर्चा सुन एकाग्र हो जाते हैं -
निष्ठा का स्वर ‘‘बाबूजी हद करते हैं।’’
‘‘क्या हुआ ?’’ अभिराम पूछ रहा था।
‘‘मेरी कोलीग है न सुमन। बल शाम को वेंकटेश्वर मंदिर गई तो तो देखती है कुंड के पास बाबूजी, मिसेस शाह के साथ आसन जमाये हैं।’’
‘‘मंदिर में न। निष्ठा जगह का ख्याल करो।’’
‘‘पर लोग जगह नहीं संगत को प्वाइंट करते हैं।’’
आप खुद को सरासर ठगा हुआ पा रहे हैं तो अब मेरी गुप्तचरी होगी ? कारण बताओ नोटिस जारी होगा ? मैं स्पष्टीकरण दूंगा, रोज ही पैदल वेंकटेश्वर मंदिर जाता हूँ। कुंड के पास चबूतरे पर बैठता हूँ। वहाँ की शीतलता और शांति अच्छी लगती है। संयोग से मिसेस शाह वहाँ मिल गईं। मधुमेह को नियंत्रित रखने के लिये कभी-कभी पैदल चलती हैं। कह रही थीं कोई साथ रहे तो रोज ईवनिंग वाक पर आयें। मैंने नहीं कहा मैं दोनों वक्त सैर पर जाता हूँ, आप चल सकती हैं। एक स्त्री के साथ सैर करना गजब बात नहीं होगी लेकिन स्त्रियाँ धीमी गति से चलती हैं, मैं सरपट भागता हॅूं। सामन्जस्य नहीं बनेगा। मेरी चाल में बाधा पड़गी इसलिये मैंने उन्हें प्रेरित नहीं किया। निष्ठा, बात छोटी है तुम घटना का रूप देना चाहती हो। शायद इसलिये कि मैं विधुर और श्रीमती शाह विधवा हैं। क्या सोचती हो पुरुष हर आयु में छिछोरा है और स्त्री फिसल पड़ने को तैयार बैठी है ? जान लो, यहॉ स्त्री-पुरुष जैसा भाव नहीं है। मुझे समवयस्क की संगत अच्छी लगती है। इतना ही। यदि श्रीमती शाह के स्थान पर श्रीमान शाह होत तो मैं सचमुच उनसे घनिष्ठता बढ़ा लेता।
शाम का चार बज रहा है। आप शांत और जोश को पढ़ा रहे हैं। मिसेस शाह का फोन कॉल आ गया -‘‘आपने कहा आपको पालक के पकौड़े पसंद हैं। बनाये हैं। आइये, चाय तैयार कर रही हूँ।’’‘‘आपने कष्ट ...........‘‘आइये।’’
आप कहना चाहते हैं बेटे-बहू को हमारी संगत पसंद नहीं है इसलिये आग्रह न कीजिये। किंतु बात-बात पर ठहाका लगाने वाली मिसेस शाह हॅंसेगी - खिसकती उम्र में आप शक के दायरे में हैं ? जवानी में बड़े कुकांड किये हैं क्या ? खफा भी हो सकती हैं - आप यदि बेटे बहू के मिस अपनी मंशा जाहिर कर रहे हैं तो आप धूर्त हैं। हमारे बीच जो मर्यादा, गरिमा, बुजुर्गियत है उसका ख्याल करें।
आप असमंजस में हैं पर चाय-पकौड़ी का लोभ पुराना हैं कुछ विशेष खाने की इच्छा हो तो निष्ठा से नहीं कर पाते हैं। वह दफ्तर से थकी आती है। दूसरे अभिराम दोहराता रहता है -बाबूजी आपको खान-पान में संयम बरतना चाहिये। पकौड़ी आपको मिसेस शाह के दर पर खींच ले गई। आपका स्वागत कर मिसेस शाह बोलीं -
‘‘हाजमा खराब रहता है पर कभी-कभी चटपटा खाने को मन ललकता है।’’
‘‘इसीलिये आप रसोई में घुसीं और बना लाईं। फिर कहता हूँ आप स्त्रियाँ भाग्यशाली होती हैं। मर्द अपनी इच्छानुसार बना-खा नहीं पाते। जबकि बुढ़ापे में जीभ चटोर हो जाती है। अच्छा भोजन सचमुच एक सुख है।’’
‘‘टेस्ट कीजिये। अदरक का अचार भी बनाया है। ले जाइयेगा। जायका बदल जायेगा।’’
आपने मिसेस शाह द्वारा प्रदत्त अदरक के अचार का छोटा मर्तबान डायनिंग टेबुल पर रख दिया। आप जोश और शांत के साथ जल्दी खा लेते हैं। अभिराम और निष्ठा देर से खाते हैं। अभिराम को अचार खास पसंद आया -
‘‘निष्ठा, मिसेस शाह अच्छी कुक हैं।’’
‘‘अच्छी दिलफेंक भी। अचार, चटनी खिला कर बाबूजी को लुभा रही हैं। एक दिन माधुरी मुझसे मिलने आईं थी। मैंने आलू पराठा के साथ उसे नींबू का मीठा अचार खिलाया तो कहने लगी बिल्कुल ऐसा अचार मम्मीजी बनाती हैं। मिसेस शाह घर में हवा नहीं लगने देतीं बाबूजी को क्या-क्या दे रहीं हैं।’’
आप पीड़ित। निष्ठा की सोच घटिया होती जा रही है। बात कुछ नहीं है लेकिन अभिप्राय बहुत है। रविवार को आपने बाल सखा सनत कुमार से मिलने गये तब भी आप पीड़ित नजर आ रहे थे। सनत कुमार ने आपकी पीड़ित अवस्था को लक्ष्य किया ‘‘कौन सी गाज गिरी है जो गम का सागर बने हुये हो ?’’
आप पीड़ा कहते नहीं किन्तु अनायास निष्ठा का आचरण बता बैठे कि सनत कुमार मानसिक सम्बल देंगे। वे आवारा होने लगे -
‘‘पटा लो पुरोहित। उधर की पार्टी तो तैयार मालूम होती है।’’
‘‘सहृदय स्त्री का अनादर न करो सनत।’’
‘‘सहृदय है, इसीलिये कह राह हूँ पटा लो।’’
‘‘मैं तुम्हारी तरह रोचक होकर नहीं सोच पाता।’’
‘‘बेशक हम उम्र के अंतिम दौर में हैं पर रोचक सोचें यह हमारा हक है। और नहीं सोचना चाहते हो तो बेटे-बहू को जमकर फटकार लगाओ। दबने जैसेी क्या बात है ? मैं तो अपने बेटे-बहुओं को उतना ही स्पेस देता हूँ जितना शोभा दे। चुप रहो तो बच्चे लिहाज छोड़ देते हैं। तुम तो दोनों वक्त वॉक पर जाते हो। आते-जाते कभी ट्रकों पर ध्यान देना। पीछे लिखा रहता - जगह मिलने पर पास दिया जायेगा। अर्थ पकड़ो तो यह बहुत अच्छा सूच वाक्य है। घर में अपने लिये अतना स्पेस सुरक्षित जरूर हो जब आजादी महसूस होती रहे। बाकी तो बेटे-बहू को हम कौन सा सूली पर टाँग रहे हैं कि हमारी निंदा करें। हमारा मजाक उड़ायें।’’
आपको लगा सनत कुमार ने आपके समक्ष जो पीड़ा हारी वाक्य कहे उनसे आपको मजबूती मिली है। जह मिलने पर पास दिया जायेगा - यह तो मानो जीवन जीने की बेहतरीन कला है।
आप नित्य की भाँति मंदिर के चबूतरे में बैठे थे। देखते हैं मिसेस शाह चली आ रही है।। पैदल चलने की थकान उनके चेहरे पर स्पष्ट थी। रोचकता जैसे तत्व अपने भीतर नहीं पा रहे हैं लेकिन आप बोले -
‘‘कई दिनों बाद आई हैं।’’
वे निष्कर्ष सा देने लगीं ‘‘यह बुढ़ापा। यह थकान। आप देखें यहॉ अधिकतर बूढ़े ही दिख रहे हैं। बूढ़ों के लिये एक भगवान का ही आसरा क्यों रह जाता है ? वे मंदिर ही क्यों आते हैं ? जैसे दूसरी जगह उनके लायक नहीं रह गई है।’’
‘‘मतलब ?’’
‘‘अमोल मुझे राय देता है आस्था चैनल देखो, माला जपो। लेकिमन तुम इसी में उलझी रहती हो माधुरी ऐसा नहीं करती, वैसा नीं करती। तुम शांत बैठो। बाकी जिसकी गृहस्थी है उसे देखने दो। आप कहते हैं औरतें किस्मतवाली होती हैं। उनकी पहॅुच रसोई में रहती है। और मुझे बताया जा रहा है जिस गृहस्थी को मैंने मेहनत से बनाया वह मेरी नहीं माधुरी की है। मैं अपनी गृहस्थी से खुद को अलग क्यों कर लूँ ? आस्था चैनल क्यों देखूँ ? अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीने का हक क्यों छोड़ दॅू ?’’
‘‘यह क्रोध इसलिये कि गृहस्थी आपकी नहीं रही ?’’
‘‘बात और भी है। मि. शाह कहते थे एक बार भारत भ्रमण जरूर करेंगे। मैंने अमोल से कहा कहीं घूम आते हैं तो कहता है न उसे वक्त है न माधुरी को। और बुढ़ापे में तुम्हारा अकेले जाना ठीक नहीं। बताइये मेरे पास पैसा भी है वक्त भी लेकिन नहीं जा सकती।’’
‘‘अब तो घूमना-फिरना बहुत आसान हो गया है। एक ट्रैवल ऐजेंसी ट्रेन द्वारा चालीस दिन की तीर्थ यात्रा कराती है। कन्या कुमारी से लेकर कश्मीर तक लगभग पूरा भारत देखा जा सकता है। मुझे लगता है ऐसे पैकेज बूढ़ों को ध्यान में रख कर ही बनाये जाता हैं।’’
‘‘डीटेल मालूम कीजिये। यदि जा सकें तो यह मेरे लिये अच्छा चेंज होगा। अरे ........... आप भी क्यों नहीं चलते ?’’
‘‘घूमने का चाव है पर ..................
‘‘चलिये ना आप साथ रहेंगे तो अमोल को भरोसा रहेगा कि मुझे कोई परेशानी नहीं होगी।’’
‘‘विचार बनाता हूँ।’’
आप जानते हैं आपके विचार का घर में स्वागत नहीं होगा। आपका विचार सुन निष्ठा ने अभिराम की कनपटी पर मंत्र फूँक दिया - तीर्थाटन के नाम पर किसी मंदिर में विवाह कर दोनों कंठ में जयमाल डाल कर वापसी करेंगे। मंत्र विहद अभिराम आपके सम्मुख हुआ -
‘‘बाबूजी। डेढ़ महीने घर से बाहर रहेंगे तो आप बीमार हो जायेंगे।’’
‘‘मैं पूरी तरह स्वस्थ हॅू।’’
‘‘नहीं हैं। हाजमा बिगड़ा रहता है। आप यहॉ न होंगे तो घर कौन ............ मेरा मतलब निष्ठा को डेढ़ माह की छुट्टी नहीं मिलेगी। शांत और जोश दिनभर अकेले कैसे रहंेगे ? आप हेल्प न करें तो ठीक से होमवर्क भी नहीं कर पाते हैं।’’
‘‘घर में सहायक के तौर पर रहूँ, अब यही मेरा जीवन हो गया है ? तुम निष्ठा और बच्चों को लेकर वर्ष में एक बार घूमने अवश्य जाते हो। मैं भी कुछ देखना चाहता हूँ। मुझे भी परिवर्तन की आवश्यकता है।’’
‘‘मिसेस शाह के साथ .........
‘‘मतलब ?’’
‘‘लोग बातें बनातें हैं बाबूजी’’ अभिराम को कहना पड़ा।
‘‘क्योंकि लोगों को चित्तरंजन करने की आदत होती है। स्त्री और पुरुष के बीच स्वस्थ मित्रता नहीं हो सकती ? मेरी श्रीमती शाह से मित्रता भी नहीं है। समवयस्क से बात करना मुझे अच्छा लगता है। यह मेरी भावनात्मक आवश्यकता है। श्रीमती शाह को अकेले जाने में अड़चन होगी इसलिये जा रहा हूँ। यह मुद्दा बनाने जैसा प्रसंग नहीं है।’’
आप आगे कहना चाहते थे मरेी जिंदगी है और मैं अपनी तरह से जीने के लिये स्वतंत्र हूँ। रही सहायक बन कर रहने की बात तो अपने तौर-तरीकों के बाद जो समय बचेगा उसमें जो सहायता सम्भव होगी, करूँगा। अरे, ट्रक वाले भी जगह मिलने पर पास देने जैसी धौंस देते हैं। मेरी भी कुछ कामनायें हैं।
आप सूचि बना रहे हैं इतने दिनों के लिये क्या-क्या सामग्री ले जाना चाहिये कि श्रीमती शाह फोन पर हैं। भूमिका नहीं, सीधे कहने लगीं -
‘‘मैं नहीं जा रही हूँ।’’
‘‘अग्रिम राशि ट्रैवल एजेंसी को दी जा चुकी है।’’
‘‘औरतों के खटराग बहुत हैं। अमोल मुँह फुलाये है कि इतने दिन घर कौन देखेगा। मेरी परेशानी समझिये।’’
आप उदास हो गये - मिसेस शाह भी प्रतिकार, परिहास, आक्षेप से गुजर रही हैं ? अमोल ने स्वास्थ्य बिगड़ने जैसी चिंता और घर की चैकादारी, अपनी दोनों बच्चियों की सार-सम्भाल जैसे दायित्व की आड़ले न जाने का आदेश सुना दिया है ?
‘‘आपने कार्यक्रम बनाया, आप ही रद्द कर रही हैं।’’
‘‘मन नहीं बना पा रही हूँ। आप चलें जायें।’’
‘‘मेरी तैयारी भी रद्द समझिये।’’
‘‘आप हो आयें।’’
‘‘आप क्यों नहीं ? आप अपने अनुसार कोई योजना और कार्यक्रम बनाती हैं, यह आपका अधिकार है। हम बूढ़े थोड़ा स्वतंत्र होकर अपनी तरह से समय व्यतीत करना चाहते हैं। इतना ही तो।’’
‘‘ओके.ओके। तैयारी शुरू करती हूँ।’’
फोन पर मिसेस शाह की छवि नहीं देख सकते हैं लेकिन अनके प्रफुल्ल भाव को आपने बखूबी पकड़ लिया। आप कहना चाहते थे अमोल या माधुरी अधिक हस्तक्षेप करें तो श्रीमती शाह आप स्पष्ट कहें जगह मिलने पर पास दिया जायेगा। पहले हम अपने लिये जगह बनायेंगे, अवसर ढूँढ़ेंगे समय निकालेंगे। बाकी तो यही घर है, यही गृहस्थी जहाँ रिचार्ज होकर हमें लौटना ही है। आपने तैयारियाँ तेज कर दी हैं।
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अपनी कवितायेँ
"सुपरनोवा — अस्तित्व की आख़िरी गवाही"
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डॉ. गगनदीप सिंह समकालीन पंजाबी साहित्य का एक प्रसिद्ध नाम हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग से कविता के क्षेत्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है। डॉ. गगनदीप सिंह उर्फ़ संधू गगन की पहली काव्य-कृति ‘पंजतीले’ आर्सी पब्लिशर्स से प्रकाशित हुई है। इस कृति के लिए उन्हें साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया। इन्होने पंजाबी भाषा में साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में भी उसी उत्साह से योगदान कर रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘परवासी पंजाबी कविता : संवाद दर संवाद’, सहज पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित, कविता के प्रति उनकी गहन विद्वतापूर्ण समझ का प्रमाण है।इसके अतिरिक्त, उन्होंने कश्मीरी कवि रफ़ीक मसूदी की कविताओं का पंजाबी में अनुवाद ‘मेरी पीड़, मेरा बिरहारा’ शीर्षक से किया है। वर्तमान में वे पंजाबी विश्वविद्यालय कॉलेज, धिलवां में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।
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सुपरनोवा — अस्तित्व की आख़िरी गवाही
तारा जब अपने भीतर की सीमा तक जल चुका होता है,
वह शान्त होकर नहीं बुझता।
उसकी अंतिम धड़कन चीख़ नहीं होती,
बल्कि एक ऐसा विस्फोट होती है
जिसमें नश्वरता भी अमरत्व में बदल जाती है।
सुपरनोवा केवल आकाशीय घटना नहीं —
यह वह क्षण है जब अस्तित्व अपनी परिधि तोड़ देता है।
जहाँ अंधकार सोचता है कि अब प्रकाश थक चुका होगा,
वहीं प्रकाश अपने चरम पर पहुँचकर
सारी दिशा को निगल लेता है।
उस पल तारा अपने बोझ, अपनी परतों,
अपनी पुरानी पहचान से मुक्त हो जाता है।
वह कहता है —
“मैं अब वस्तु नहीं, मैं ऊर्जा हूँ।
मैं अब एक नाम नहीं, मैं अनंत ध्वनि हूँ।
मैं केवल तारा नहीं,
मैं हर कण की धड़कन में गूँजता ब्रह्मांड हूँ।”
सुपरनोवा हमें सिखाता है
कि हर अंत का वेश बदलकर नया आरंभ बनता है।
धूल ग्रहों में ढलती है,
प्रकाश किसी दूर बैठे जिज्ञासु की आँख में उतरता है,
और विस्फोट की गूँज किसी मौन साधक की आत्मा में प्रार्थना बन जाती है।
मनुष्य भी ऐसा ही है —
धीरे-धीरे जलते हुए,
अपनी थकान, अपने दुख, अपने सपनों का भार उठाते हुए।
फिर एक दिन वह भी फट पड़ता है,
कभी प्रेम में, कभी विद्रोह में, कभी चुप्पी में।
पर वह राख बनकर समाप्त नहीं होता,
वह शब्दों, स्मृतियों और संबंधों की अदृश्य परतों में फैल जाता है।
सुपरनोवा याद दिलाता है —
मरना लोप होना नहीं है,
बल्कि अंतिम क्षण में
स्वयं को इतना प्रकाशमान कर देना है
कि अंधकार भी श्रद्धा से मौन हो जाए।
यह अस्तित्व की अंतिम गवाही है,
एक अनसुनी प्रार्थना —
कि मैं बदल जाऊँगा,
पर मिटूँगा नहीं।
मैं स्वरूप खो दूँगा,
पर सार बनकर युगों तक गूँजता रहूँगा।
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बाल विभाग (चिल्ड्रेन कार्नर)
अपनी कवितायेँ
"हिंदी हमारी पहचान, हमारा गर्व"
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नरेंद्र सिंह, का जन्म सोनीपत, हरियाणा में हुआ, आई.टी. उद्योग से जुड़े हैं और वर्तमान में अपने परिवार के साथ क्लीवलैंड, ओहायो (अमेरिका)में निवास करते हैं। उन्हें प्रारंभिक दिनों से ही ग़ज़लों एवं हिन्दी और उर्दू शायरी में गहरी रुचि रही है। उन्होंने समय-समय पर ग़ज़लें लिखी हैं, जिनमें से कुछ भारत के समाचारपत्रों, पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, और एक पुस्तक में भी शामिल हैं जिसमें सात प्रवासी भारतीय (NRI) कवियों तथा कुछ चयनित भारतीय कवियों की रचनाएँ प्रकाशित की गईं।
वे “हिन्दुस्तानी महफ़िल” नामक हिन्दी काव्य समूह का सक्रिय रूप से संचालन कर रहे हैं। उन्होंने क्लीवलैंड, अमेरिका में आयोजित मुशायरों और कवि सम्मेलनों में प्रमुख कवियों के साथ मंच साझा किया है। IHA NEO USA Chapter उनके हृदय के बहुत निकट है, और वे प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के अवसर पर अपनी ग़ज़लें प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं।उनकी रचनाएँ ऑनलाइन YouTube, Facebook आदि पर #NarenderNadeem नाम से देखी जा सकती हैं।
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हिंदी हमारी पहचान, हमारा गर्व
हर दिन हर पल संग है, हिंदी जीवन का प्रसंग है,
देश को जोड़ती संस्कृति का अभिन अंग है
भारत माता के माथे की बिंदी है, सोचो तो हिंदी,
जितने रंग हैं संसार में, उतने रंगों से रंगी है हिंदी।
हिंदी भाषी की अभिव्यक्ति का यही एक ढंग है,
हर दिन हर पल संग है, हिंदी जीवन का प्रसंग है।
जाने कितने लहजे हैं, जाने कितनी सारी बोली,
जिसने जैसी हिंदी बोली, ये हिंदी उसी की होली।
सबको गले लगाती हिंदी, नहीं किसी से जंग है,
हर दिन हर पल संग है, हिंदी जीवन का प्रसंग है।
हिंदुस्तान से आए हैं, हिंदी हमारी पहचान है,
प्रवासी जीवन में हिंदी संस्कृति की जान है।
बच्चे हिंदी नहीं बोलते, सोच सोच के माँ तंग है,
हर दिन हर पल संग है, हिंदी जीवन का प्रसंग है।
हिंदी ही गुनगुनाते हैं, हिंदी से मिलते मिलाते,
हिंदी भाषियों को ढूँढते, खुशी जब भी मनाते।
हिंदी जैसे चलती साँस, साथ धड़कती ये उमंग है,
हर दिन हर पल संग है, हिंदी जीवन का प्रसंग है।
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पाठकों की अपनी हिंदी में लिखी कहानियाँ, लेख, कवितायें इत्यादि का
ई - संवाद पत्रिका में प्रकाशन के लिये स्वागत है।
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"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
हिंदी लेखन के लिए स्वयंसेवकों की आवश्यकता
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यह आपके लेखन कौशल को प्रदर्शित करने, हमारी समृद्ध संस्कृति को दर्शाने और हिंदी साहित्य के प्रति जुनून रखने वाले समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ने का एक अच्छा अवसर है। यदि आपको लेखन का शौक है और आप इस उद्देश्य के लिए अपना समय और प्रतिभा योगदान करने में रुचि रखते हैं, तो कृपया हमसे alok.iha@gmail.com पर ईमेल द्वारा संपर्क करें। साथ मिलकर, हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने और संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र
alok.iha@gmail.com
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – श्री आलोक मिश्र, NH, alok.iha@gmail.com
संपादक -- डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
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