OCTOBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अक्टूबर 2023, अंक 28 | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रजनो,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ और ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।
हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, हिंदी एक ऐसा माध्यम जो हमको और हमारे बच्चों को संस्कृति से जोड़े रखती है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति ने स्वयं हिंदी सीखने का बहुत ही आसान और रोचक तरीके की खोज कर हिंदी को आसान बना दिया है, और इस पाठ्यक्रम मे विद्यार्थी सम्मिलित होते जा रहेहैं, कृपया इस आसान पाठ्यक्रम के माध्यम से बच्चों को लाभान्वित करें और अधिक जानकारी के लिए info@hindi.Org. पर सम्पर्क करें।
आप सभी से मेरा सविनय निवेदन है कि आप हमारी समिति को आर्थिक रूप से सहायता करें। आपके द्वारा की गई आर्थिक सहायता हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक होगी और आने वाले अधिवेशन और हिंदी के कार्यक्रमों को सफल बनाने में पूर्ण योगदान देगी।
अंत में मैं समिति, न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति और स्वयं सेवक सहित सभी को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से और इस फोन नम्बर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-अध्यक्षा
(२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हूस्टन, टेक्सास शाखा
एकता दिवस समारोह, भारतीय कांसुलावास के साथ
अक्टूबर 31, 2023 भारतीय कांसुलावास, हूस्टन, टेक्सास
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - वाशिंगटन डी. सी शाखा
हिंदी दिवस - चौधरी प्रताप सिंह की अध्यक्षता में
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हिंदी दिवस के अवसर पर अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (वाशिंगटन डी. सी , चौधरी प्रताप सिंह की अध्यक्षता में ) द्वारा भारतीय दूतावास के सहयोग से ‘हिंदी दिवस’ मनाया गया।
यह समारोह शुक्रवार, १५ सितम्बर २०२३ को भारत के राजदूतावास में आयोजित किया गया था, जिसमें भारत के राजदूत टी एस संधू जी ने अपनी उपस्थिति से प्रतिभागियों का हौसला बढ़ाया।
इस कार्यक्रम में हिंदी कविता और हिंदी गीत गायन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसमे ७-१२ वर्ष और १३ -१८ वर्ष की आयु के बच्चों ने भागीदारी की जिन्हें भारतीय राजदूत टी एस संधू जी ने प्रमाण -पत्र देकर पुरस्कृत किया। हिंदी समिति की सदस्य आशा चाँद, रेणुका मिश्रा एवं डॉ. अब्दुल्ला ने जज की भूमिका निभाई।
प्रतिभागियों के कविता पाठ के विषय इस प्रकार थे।
* हिंदी भाषा की सुंदरता
* मेरे सपनों का भारत
* भारत की 75 साल की उपलब्धियाँ
* भारत की अंतरिक्ष शक्ति
* मेरा प्रिय त्यौहार
* मेरे जीवन का लक्ष्य
इसके अतिरिक्त स्थानीय कवि ,डॉ अब्दुल्ला व कवियित्री वंदना सिंह, विनीता तिवारी एवं प्रीति गोविंदराज ने कविता पाठ किया| और फर्स्ट सेक्रेटरी अदिति वालुंज ( कल्चर एंड एजुकेशन ) ने सभी को सम्मानित किया। यह कार्यक्रम भारतीय कम्युनिटी के हिंदी के प्रति प्रेम और सद्भाव का अच्छा उदाहरण था जिसमे बड़ी संख्या में माता पिता ने अपने बच्ची को प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। भारतीय राज दूतावास का सहयोग हमें भविष्य में भी मिलता रहेगा ऐसा आश्वासन भारतीय राजदूत ने दिया एवं हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए हिंदी समिति की सराहना की।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - वाशिंगटन डी. सी शाखा हिंदी दिवस समारोह, भारतीय दूतावास में,भारत के राजदूत टी एस संधू , प्रतियोगिता भागी एवं दर्शक।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, ने भाग लिया
14वें वार्षिक पूर्वोत्तर ओहायो इंडिया फेस्टिवल यू. एस. ए.
“NE Ohio India Festival USA”
16 सितंबर, 2023
द्वारा:अनुराग गुप्ता
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा ने 16 सितंबर, 2023 को ब्रेक्सविल ब्रॉडव्यू हाइट्स हाई स्कूल में आयोजित 14वें वार्षिक पूर्वोत्तर ओहायो इंडिया फेस्टिवल यू. एस. ए (NE Ohio India Festival USA) में भाग लिया।
इंडिया फेस्टिवल ने 2010 के बाद से 50,000 से अधिक लोगों और 250 से अधिक विक्रेताओं को आकर्षित किया है। इंडिया फेस्टिवल विविधता और समावेशन से संबंधित विभिन्न कार्यों के लिए 25,000 डॉलर से अधिक का योगदान करने में सक्षम रहा है। इस वर्ष इंडिया फेस्टिवल ने लातीनी (Letino) विरासत और अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने के लिए जूलियो डी बर्गोस कल्चरल आर्ट सेंटर के साथ साझीदारी की। प्रोजेक्ट PAST (Prevailing and Surviving Together) और केस वेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी के छात्र-नेतृत्व वाले “naach di cleveland" ने भी इसमें साझेदारी की।
भारतीय प्रवासी समुदाय और उसके भीतर, विभिन्न भारतीय उप-संस्कृतियाँ सभी मिलकर इस दिन जश्न मनाते हैं। इंडिया फेस्टिवल यूएसए, उत्तरपूर्व ओहायो का उद्देश्य है कि इन संस्कृतियों, समुदायों और पीढ़ियों के बीच सेतु के रूप में कार्य करना । प्रत्येक वर्ष एक थीम पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
इंडिया फेस्ट (India Fest) के उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारत के विभिन्न स्वादिष्ट खानों के स्टॉल, भारतीय कला का प्रदर्शन, अलग अलग संस्थाओं की भागीदारी, विभिन्न भारतीय सामानों की प्रदर्शनी, शॉपिंग प्लाजा और साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन और प्रतियोगिता, सबों की व्यवस्था की गई थी।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की हमारी टीम ने हिंदी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इस प्रदर्शनी में भाग लिया। एक टेबल पर हमारी संस्था के पोस्टर्स और फोल्डर्स थे। हमारी टीम के छह-सात सदस्यों (अनुराग गुप्ता, अश्वनी भारद्वाज, प्रकाश चंद; नरेंद्र सिंह, सोमनाथ रॉय, निशा रॉय, सुनील जानवे) ने सुबह 10 बजे से शाम 5:00 बजे तक बारी बारी से इस प्रदर्शन मे उपस्थित हो कर इस लक्ष्य को सफल किया। समिति के काफी सदस्य परदे के पीछे भी इस प्रोग्राम को सफल बनाने में लगे थे।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के बारे में हमारी सामग्री और जानकारी प्राप्त करने के लिए 75 से अधिक लोग हमारे काउंटर पर रुके। साइन-अप शीट पर 30 लोगों ने हस्ताक्षर किए । एक व्यक्ति आजीवन सदस्यता के लिए प्रतिबद्ध था और दो व्यक्ति आईएचए की वार्षिक सदस्यता के लिए प्रतिबद्ध थे। कई व्यक्तियों ने अपने बच्चों के लिए 'इंडिया संडे स्कूल' में दाखिला लेने में रुचि दिखाई और हमने उन्हें आश्वासित किया कि हम पंजीकरण के संबंध में उनसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क करेंगे।
यह एक बहुत अच्छा अनुभव था और हम भविष्य में भी अपनी हिंदी भाषा को बढ़ावा देने और अपनी नई पीढ़ी में जागरूकता लाने के लिए अवसर आने पर इस प्रकार की प्रदर्शनियाँ लगाना जारी रखेंगे।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति उत्तर पूर्व ओहायो शाखा के सदस्य एवं अन्य स्वयंसेवक
अनुराग गुप्ता, अश्वनी भारद्वाज, प्रकाश चंद, नरेंद्र सिंह, सोमनाथ रॉय, निशा रॉय,
सुनील जानवे और हमारे काउंटर पर आए दर्शक।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा का
हिन्दी दिवस समारोह 2023
(द्वारा डॉ.शैल जैन, पूर्व अध्यक्षा, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा)
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प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा ने ‘हिन्दी दिवस’ समारोह धूमधाम से शिव विष्णु मंदिर, पारमा, ओहायो के साथ मिलकर मनाया। कार्यक्रम शिव विष्णु मंदिर के सभागार में अपने निर्धारित समय २४ सितम्बर, २०२३ को संध्याकाल ५.३० बजे प्रारम्भ हुआ।समारोह के संचालक श्री नरेंद्र सिंह एवं श्रीमती रश्मि चोपड़ा थे। कार्यक्रम का आरंभ गणेश वंदना से किया गया। गणेश वंदना दो बच्चों, ईशान अगरवाला (11 साल) और अभी अगरवाला (7 साल ) ने मिलकर की।
तत्पश्चात पारम्परिक विधि से दीप प्रज्वलन किया गया। श्री मनहर शाह, मंदिर के अध्यक्ष;
श्रीमती किरण खेतान, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा; श्रीमती विमल शरण, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की प्रथम अध्यक्षा; डॉ. विमला पान्या, अ.हि.स. की आजीवन सदस्या एवं श्री अशोक लव, हिंदी भाषा के सेनानी और सेवक जो भारत से अमेरिका भ्रमण करने आये थे, सबों ने मिलकर दीप प्रज्वलन किया। तालियों की गड़गड़ाहट से हाल गूँज उठा।
श्रीमती रश्मि चोपड़ा ने श्रीमती किरण खेतान, डॉक्टर शैल जैन एवं डॉक्टर शोभा खंडेलवाल को मंच पर बुलाया और दर्शकों को आदरणीय सुशीला मोहनका जी की याद दिलायी। उन्होंने कहा कि आज का यह कार्यक्रम हम सबको आदरणीय सुशीला मोहनका जिन्हें सब प्यार और श्रद्धा से “माँ” कहते थे, की याद भी दिलाता है। पूजनीय माँ की अनुपस्थिति में मनाया जाने वाला यह प्रथम ‘हिंदी दिवस’ है। हम सबके लिए उनके जीवन की उपलब्धियों को कुछ शब्दों में समेटना तो संभव नहीं, किंतु उनके जीवन से प्रेरणा ले कुछ पंक्तियाँ याद आती है।
जो अडिग रहा तूफान में बरसात में,
टूट जाता है वही तारा शरद की रात में,
मुक्त जीवन की प्रगति द्वंद में संघात में।
माँ ने स्वयं प्रगतिशील हो, आजीवन सबको विवशताओं से ऊपर उठना सिखाया। सुशीला जी का पुण्य प्रताप और उनकी स्मृतियाँ वास्तव में अमर रहेंगी ।उसके बाद उन्होंने सभी उपस्थित लोगों से 1 मिनट का मौन रखकर उनकी पावन आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करने की प्रार्थना की ।
मन्दिर समिति अध्यक्ष श्री मनहर शाह ने बताया कि हिन्दी भाषा एवं भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने में मन्दिर का हमेशा सहयोग रहा है और आगे भी रहेगा। श्रीमती किरण खेतान ने हिन्दी दिवस के अवसर पर सभी दर्शकों का अभिनंदन किया और संक्षेप में एक्रन में चल रहे हिंदी स्कूल के बारे में बताया। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा द्वारा हिंदी में जो काम हो रहा है और भविष्य में समिति की योजनाओं के बारे में भी दर्शकों को बताया। तत्पश्चात डॉ शोभा खंडेलवाल ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की यात्रा और आगे की योजनाओं के बारे में संक्षिप्त में बताया। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का लक्ष्य हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार एवं भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाना, एवं सुनियोजित करना है।। उनहोंने बताया हम अभी स्थानीय स्कूलों में हिंदी को विदेशी भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिश में लगे हैं और इस काम में सभी दर्शकों से सहायता के लिये अनुरोध भी किया।
‘हिन्दी दिवस’ के महत्त्व को नृत्य, संगीत, कविताओं, भाषण आदि विभिन्न विधाओं के माध्यम से जनता जनार्दन के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। प्रोग्रामों की श्रृंखला
1. साँस्कृतिक कार्यक्रम का प्रारंभ छोटे- छोटे बच्चों के गाने से हुआ। गाना था “छोटी-छोटी गइयाँ, छोटे ग्वाल” प्रस्तुति द्वारा तुलसी श्रीवास्तव और राजवीका आस्थाना, तैयार किया गया स्मृति राव द्वारा।
2 .अगला गाना था “भारत हमको जान से प्यारा है” प्रस्तुति द्वारा आयांश वरहदपांडे, अर्श रखोलिया, नाविका शाहा, अनाहिता मुखर्जी, हनन्या वानापार्थी और आहना शर्मा।
3 .शास्त्रीय नाच स्मिता राव के द्वारा प्रस्तुत किया गया। स्मिता राव केस वेस्टर्न विश्वविद्यालय में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने छोटा सा अर्ध शास्त्रीय नृत्य आज प्रस्तुत कर लोगों को प्रभावित किया ।
4 .अगला गाना “हिंदी हमारी जय” प्रस्तुति करता अनविका राय (9 साल), अमायरा भगत (8 साल), नैयसा पटेल (7 साल) एवं अविका भगत (6 साल) द्वारा थी। यह गाना सुधा पांडेय के द्वारा बच्चों को सिखाया गया था। बच्चों का ये गीत दर्शकों के मन को भा गया।
5 .अगला गाना “ए मेरे प्यारे वतन के लोगों” राधा क्वांटमबर (11 साल) के द्वारा गाया गया। जवानों के बलिदान का ये भावपूर्ण गीत बहुत ही प्यारा था।
6 . अगला कार्यक्रम क्लीवलैंड बॉलीवुड अकैडमी से निखिल के द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने फ्यूजन डांस, भारतीय और वेस्टर्न डांस के सुंदर सामंजस्य का अद्भुत समिश्रण नाच के द्वारा प्रस्तुत किया। यह शानदार नाच दो संस्कृतियों का मिश्रण था और भाषा एवं भाव की अभिव्यक्ति कर रहा था।
7 . तत्पश्चात सिया अरोड़ा चौधरी के द्वारा एक विशेष प्रस्तुति थी। एक कविता जिसका शीर्षक था “बेटी” बेटी की इस प्यारी कविता को सुनकर पूरे श्रोता गन भावुक हो गए। यह कविता कुछ आंखों को नम और कुछ होठों को मुस्कान दे गयी। प्रोग्राम के दिन ही “अंतर्राष्ट्रीय बेटी दिवस” भी था।
8. अगला भजन चारु शर्मा के सुंदर और सुरीली आवाज से था “ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे”, और दर्शकों को बिल्कुल अपने में लीन कर लिया।
9 . अगली प्रस्तुति एक नाच की थी। प्रस्तुति करता गिरीश गुप्ता 9 साल और मोनिश्का गुप्ता 7 साल के द्वारा की गई। “नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं” के बोल पर बच्चों के थिरकते हुए पाँव और चुलबुली हंसी ने लोगों को मुग्ध कर दिया।
10 . पुस्तक लोकार्पण। अशोक लव के द्वारा लिखी गई पुस्तक “अशोक लव की स्त्री विषयक” कहानियाँ का लोकार्पण हुआ। लोकार्पण के लिए मंच पर डॉक्टर शोभा खंडेलवाल एवं श्री अशोक लव मौजूद थे। ये पुस्तक स्त्रियों की दस कहानियों का संग्रह है।
11 . विशेष मान्यता पत्र समर्पित – श्री महेश देसाई को अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, नॉर्थ ईस्ट ओहायो शाखा की तरफ से सम्मानित किया गया। महेश देसाई 2012 से टी. वी. एशिया के साथ क्लीवलैंड और आसपास होने वाली तमाम साँस्कृतिक संस्थाओं में जुड़ने का दायित्व सँभाला और हमारे प्रोग्राम को टी. वी. एशिया के द्वारा पूरे अमेरिका के साथ-साथ दूसरे देशों में भी पँहुचाया यह विशेष मान्यता पत्र श्री महेश देसाई को शाखा समिति की अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान के द्वारा प्रस्तुत किया गया।
12 . अंतिम ग्रैंड फिनाले सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया गया, क्लीवलैंड बॉलीवुड के बच्चों के द्वारा। “लुक छुप ना जाओ जी” और घूमर, “लंदन ठुमकता,आई लव इंडिया” प्रस्तुति करता Minor group: Samya Loomba (साम्य लूम्बा), Saanvi Loomba (सान्वी लूम्बा), Kareena Barra (करीना बर्रा), Ahilan Prakashkumar (अहिलन प्रकाशकुमार), Ashvik Papannagari (अश्विक पपन्नागरी), Suhani Kapoor (सुहानी कपूर), Isha Gupta (ईशा गुप्ता), Vishaan Gundelly (विशान गुन्देल्ली), Nikita Venkat (निकिता वेंकट), Avika Gupta (अविका गुप्ता), Jasmine (जासमीन), Nirgun Krishna Avadhanula (निर्गुण कृष्णा अवधनुला)
Junior Group: Tanvi Devarapalli (तन्वी देवारापल्ली), Sanjana Madhan (संजना मधान), Samiya Mendiratta (समिया मेंदिरत्ता), Surina Mandiratta (सुरीना मेंदिरत्ता), Shleshita Kankata (श्लेशिता कनकटा), Riya Gundelly (रिया गुन्देल्ली).
नाच के साथ-साथ मानो पूरा हाल ही हिल रहा था और बड़ों के साथ-साथ युवा श्रोतागण भी तालियाँ बजा रहे थे।
कार्यक्रम के अंत में अ.हि.स की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के उपाध्यक्ष, डॉ प्रकाश चंद ने समिति की ओर से धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कार्यकारिणी समिति के सभी सदस्यों, सभी स्वयंसेवकों, मंदिर की प्रबन्धन समिति, इंडिया केफे को भोजन के लिए, शाखा की टीम खाना प्रबंध के लिये और समाज के सहयोगिकों को खाना परोसने में सहायता के लिये, टी. वी. एशिया को कवरेज करने के लिए तथा दर्शकों को जिनके कारण ही कार्यक्रम सफल हुआ सबको हृदय से धन्यवाद दिया।
हॉल भरा था सभी उम्र के लोगों से । कार्यक्रम के प्रारम्भ में चाय तथा अंत में रात्री-भोज की व्यवस्था थी। कार्यक्रम लगभग दो धंटो का था। पूरे समय दर्शक प्रसन्न थे तथा मन से कार्यक्रम के साथ जुड़े हुए थे। सबसे अच्छी बात थी बहुत सारे बच्चों की उपस्थिति और उनके चेहरों की ख़ुशी। तालियों की गडगडाहट से हॉल पूरे समय गूँज रहा था।
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अपनी कलम से
"नारी उत्थान में गांधी के विचार"
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द्वारा - डॉ नन्दकिशोर साह
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डॉ नन्दकिशोर साह, पूर्वी चम्पारण, बिहार से हैं।अभी जिला मिशन प्रबंधक (एसएम एंड सीबी), उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन में कार्यरत हैं। समसामयिक मुद्दों पर लेखन में रुचि रखते हैं।
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नारी उत्थान में गांधी के विचार
महात्मा गाँधी स्त्रियों के सामाजिक उत्थान के लिए भी बहुत चिंतित हैं। महिलाओं के जीवन को प्रभावित करने वाले सामाजिक कृतियों के बारे में उनके मन में काफी कड़वाहट थी। वे मानते थे कि बाल विवाह, पर्दा प्रथा सती प्रथा और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियों के कारण महिलाएं नहीं कर पाती और शोषण अन्याय अत्याचार को झेलने के लिए विवश होती है।
महात्मा गाँधी ने महिलाओं को लेकर आजादी से पहले जो बातें कही थी, वह आज भी उतनी ही मौजूद हैं। कहना न होगा कि गाँधी के अलावा किसी ने भारत को इतने बेहतर ढंग से नहीं समझा। स्त्री को चाहिए कि वह खुद को पुरुष के भोग की वस्तु मानना बंद कर दें। इसका इलाज पुरुषों के बजाय स्त्रियों के हाथ में ज्यादा है। उसे पुरुष के खातिर जिसमें पति भी शामिल है, सजने से इंकार कर देना चाहिए। तभी वह पुरुष के साथ बराबर साझेदारी बनेगी। गाँधी की नजर में स्त्री की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने तब लिखा था यदि मैंने स्त्री के रूप में जन्म लिया होता तो पुरुषों के इस दावे के खिलाफ विरोध करता है कि उसका मन बहलाने के लिए ही पैदा हुई है। पुरुष ने स्त्री को अपनी कठपुतली समझ लिया है। स्त्री को भी इसकी आदत पड़ गई है। धीरे-धीरे इस पीढ़ी को अपनी इस भूमिका में मजा आने लगा है क्योंकि पतन के गर्त में गिरने वाला व्यक्ति किसी दूसरे को भी खींच लेता है और गिरना सरल होने लगता है।
गाँधीजी के विचार अनुसार स्त्री व पुरुष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इनमें किसी भी तरह का भेदभाव परिवार व समाज के लिए हानिकारक है। इस संसार को सुंदर और सशक्त बनाने में नारियों की भूमिका अहम है। गाँधी जी कहते थे कि वह स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर कोई समझौता नहीं कर सकते क्योंकि सामाजिक पुनर्जागरण के लिए आवश्यक है कि महिलाओं को भी बराबरी का स्थान दिया जाए तथा प्रत्येक प्रकार की गतिविधियों में उनका भी उचित स्थान हो।गाँधी के अनुसार स्त्री अहिंसा की अवतार है। नारी सृष्टि का प्रमुख उद्गम स्रोत है। देव से लेकर मानव तक सारे की जन्मदात्री स्त्री ही रही है। महिलाएं त्याग और अहिंसा की मूर्ति है। बाल-विवाह, बच्चों एवं महिलाओं के कुस्वास्थ्य का प्रमुख कारण मानते हुए इन को खत्म करने का आह्वान किया था।
1925 में गाँधीजी बिहार आए तो पूर्णिया कटिहार, भागलपुर, देवघर, खगड़िया तथा मधुपुर में महिलाओं की सभा को संबोधित किया। उनका मानना था कि शिक्षित परिवार में भी पर्दा प्रथा कायम है।गाँधीजी ने पर्दा का विरोध धार्मिक उदाहरणों का हवाला देते हुए किया। द्रोपदी, सीता, दुर्गा और राधा के सामने पर्दा नहीं था। बिहार में पर्दा के विरुद्ध मुख लहर 1926 से आई। गाँधी जी ने शिक्षिका के रूप में साबरमती आश्रम से राधा वेन तथा दुर्गा बाई को बिहार भेजा। 31 मार्च 1930 को श्रीमती कमला नेहरू ने बिहार की महिलाओं को परदे से बाहर आकर स्वतंत्रता सेनानियों के साथ कार्य करने का आह्वान किया। स्वतंत्रता आंदोलन में भी सरोजनी नायडू, मधुबन, सुशीला नायर, आभा बेन, सरला देवी, चैधुरानी ने जमकर हिस्सा लिया। गाँधी का आंदोलन फलीभूत होने का कारण महिलाओं को साथ लेकर चलना है। महिलाओं ने घर से निकलकर सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया और स्वर्णिम इतिहास रचा।
गाँधीजी के विचारानुसार स्वावलंबन से आत्मबल बढ़ती है। स्वावलंबन से स्वाभिमान जगता है। बिहार में पर्दा प्रथा की समाप्ति के लिए सामाजिक और स्त्रियों को स्वावलंबी बनाने के लिए खादी आंदोलन को महात्मा गाँधी की अमूल्य देन माना जाता है। उन्होंने कहा कि हमारे सभी कार्यों का सौरमंडल का सूरज चरखा है। निःसंदेह इतिहास मेंगाँधी जी ने नारी उत्थान की महायज्ञ की आहुति दी और बिहार में नारी मुक्ति की लहरें उठने लगी। स्वतंत्रोत्तर भारत में निश्चित रूप से नारी की स्थिति में आशातीत बदलाव हुआ है। वह दफ्तरों, होटलों, शिक्षा संस्थाओं एवं संसद में भी एक अच्छी संख्या में दिखाई पड़ रही हैं।
हमारे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में नारी को बिल्कुल बताया गया है कि देवी शक्तियां वहाँ पर निवास करती है जहाँ नारी का सम्मान होता है। किसी भी राष्ट्रीय समाज का विकास तभी हो सकता है, जब उस राष्ट्र में नारी और नर में कोई भेद न हो। एक समाज सुधारक के रूप में गाँधी जी ने स्त्री उत्थान के लिए भरसक प्रयत्न किये। उनका मानना था यह दुनिया किसी भी दृष्टि से पुरुषों से ही नहीं है।गाँधीजी दहेज प्रथा को खरीद बिक्री का कारोबार मानते हैं उनके अनुसार किसी भी युवक जो दहेज को विवाह की शर्त रखता है। वह अपने शिक्षक को कलंकित करता है अपने देश को कलंकित करता है और नारी जाति का अपमान करता है। गाँधी जी दहेज प्रथा के भी विरोधी थे। उनका कहना था कि कोई भी ऐसा विवाह जो धन के लालच में किया जा रहा हो उसे विवाह नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार ऐसे लोगों को समाज से बाहर निकाल देना चाहिए जो दहेज देते हैं या लेते हैं। गाँधीजी का मानना था कि केवल कानून से इस प्रथा को समाप्त नहीं किया जा सकता अपितु इसके लिए सामाजिक संगठनों को जागरूकता पैदा करनी चाहिए। इसके अलावा अंतरजातीय विवाह को भी प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि कन्या के लिए बाप विवाह के लिए मजबूरी में दहेज ना देना पड़े। गाँधी जी ने स्त्रियों की शिक्षा को पुरुषों की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण माना क्योंकि एक शिक्षित स्त्री पर आर्य समाज को समृद्ध बनाने बच्चों को चारित्रिक गुणों को विकसित करने में अहम भूमिका निभाती है। भारतीय नारी की क्षमता और किसी भी उन्नतशील देश की नारी से कम नहीं है।
गाँधी जी अपने अथक प्रयत्नों के माध्यम से भारत को आजादी दिला कर देश की जनता को अपने मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रेरित किया। वह कहते थे कि अपनी बेटी को पढ़ने का अवसर दो उसके लिए यही सबसे बड़ा दहेज है।गाँधीजी बाल विवाह के विरोधी थे। उनका विचार था कि जब बच्चें के भौतिक विकास की क्रियाएं आरंभ होती है तो उसे शादी के बंधन बाँध दिया जाता है। जिस बच्ची को गोद में उठाकर प्यार करना चाहिए, उसे पत्नी के रूप में स्वीकार कराया जाता है। गाँधीजी विधवा पुनर्विवाह के पक्षधर थे। उन्होंने समाज में विघमान इन रूढ़िवादी परंपराओं को जड़ से मिटाने का प्रयास किया और उसकी जगह एक के युद्ध रहित शांत प्रिय समाज की कल्पना की। एक ऐसा शोषण मुक्त समाज, जहाँ हर व्यक्ति गर्व से सिर ऊँचा करके चल सके। सामाजिक समानता के पक्षधर गाँधीजी अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण लौह पुरुष कहलाए। आज भारत ही नहीं पूरे विश्व के लोग उनके विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। महात्मा गाँधी का स्त्रियों के प्रति बेहद सकारात्मक और स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है।
महात्मा गाँधी ने नारी को नैतिक शक्ति का स्रोत माना है। अपनी शक्ति को न पहचानने के कारण ही नारी शोषित हुई है। भारत के आर्थिक और सामाजिक जीवन में नारी की बराबरी की भागीदारी है। गाँधीजी स्त्रियों को पर्दे में रखने के विरुद्ध थे। उनका कहना था कि पवित्रता पर्दे की आड़ में रखने से नहीं पनपती, बाहर से वह लादी नहीं जा सकती, उसे तो भीतर से ही पैदा करना होगा। वे नारी को पुरुष की दासी नहीं साथी मानते थे।गाँधीजी ने अश्लील विज्ञापनों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने लोगों को प्रेरणा दी की अश्लील विज्ञापनों को हटाने में और हिंसात्मक विरोध करना चाहिए। स्त्री के बिना परिवार के गाड़ी नहीं चल सकती। स्त्री परिवार अर्थशास्त्र रूपी रथ की धुरी है। वह घर और बाहर दोनों के कार्यों को बखूबी निभाती है। घर के सारे कार्य धन पर आधारित होते हैं जो स्त्री के द्वारा ही संपन्न किए जाते हैं। यदि स्त्री बाहर भी कार्यशील है तो वह पुरुष से कई गुना आर्थिक और शारीरिक बोझ उठाती है। इसलिए स्त्री पुरुष की अपेक्षा हर तरह से अधिक श्रेष्ठ है।
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“तीर्थ यात्रा/ बेटी की शादी”
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द्वारा -डॉ. सुरेंद्र नेवटिया
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डॉ. सुरेंद्र नेवटिया न्यूयार्क से है। ये पेशे से मेडिकल डॉक्टर है। १९७९ में ये भारत से आये थे और दिसंबर २०२२ में ये सेवानिवृत्त हुए। बचपन में कविताएँ लिखी और ३ साल पहले पुनः कलम उठाई है और अपनी भावनाओं को अपनी भाषा में काग़ज़ पर लिपि बद्ध किया है। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के आजीवन सदस्य हैं।
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तीर्थ यात्रा/ बेटी की शादी
तीर्थ यात्रा ही तो है बेटी की शादी।
पैदा होते ही तुम दीया हमारा बन गई, घर के मंदिर का उत्तरी तारा बन गई।
चारो तरफ़ ख़ुशियाँ और उत्साह तुम जता लायी, उन थकी आँखो में फिर घटा की बूँदे और रोशनी ले आई।
चहल पहल हर जगह कर आई, घंटियों की आवाज़ जीवन में फिर ले आयी।
सालो के मंथन, प्यार, त्याग, सपनों और जागरण का तुम एक मार्ग हो, हमारे जीवन की इस यात्रा का तुम प्राण हो।
आज हमारे तारे का सितारा बुलंद हो गया, हमे भी अब एक बेटा मिल गया।
हाथ में हाथ मिलाए तुम दोनों हमेशा चलते रहना, कभी पैर हमारे लड़खड़ाये इन पगडंडियों पर, मुड़कर पीछे, एक बार सम्हाल लेना।
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Following is the edited English meaning of poem originally written in Hindi.
by Dr. Surendra Newatia
Translated by courtesy of Dr. Shobha Khandelwal.
Daughter’s wedding/ like a pilgrimage.
Daughter’s wedding is like a pilgrimage.
The moment you were born, you brought light to our lives, you became the NorthStar of our home temple.
Your presence rekindled every joy & celebration, you brought dewdrops & spark back to our tired weary dry eyes.
You created hustle & bustle with every movement & your laughter felt like temple bells chiming in our heart.
All the years of sacrifice, hopes, desires, & dreams that were churning inside us, you brought direction & focus to. You are the backbone of this life’s journey.
Today, our little star is destined for new heights & we too are blessed with a new son on this day. Hand in hand always walk thru this life & if you notice us wobble or falter on this path , don’t forget to turn & offer your sturdy hand.
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मिस रिया गुलाटी जी ने साइबर लॉ में और कॉर्पोरेट में डिप्लोमा किया है। इनके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और वेबसाइटों में 70+ से अधिक प्रकाशन हुए है। ये आयरलैंड में स्थित कई धर्मार्थ संगठनों के लिए एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में स्वयंसेविका है। राष्ट्रीय स्तर के ताइक्वांडो खिलाड़ी भी रह चुकी हैं।
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“दहेज”
शादी है एक बहुत प्यारा सा बंधन,
परंतु ख़ूब मांगा इस अनमोल रिश्ते के लिए लड़के वालो ने धन।
मैं कोई वस्तु नहीं जो बेची जाऊँ,
क्यू मैं उन लोगो की दहेज की लालसा को अपनाउ?
बहुत लाड-प्यार से मैं पली-बढ़ी,
ऐसी हिसाब -किताब वाली शादी से मैं दूर ही सही।
मुझे नाज़ है अपनी काबिलियत पर,
गलत लोगो को नहीं होने दूँगी हावी अपने ऊपर।
बेटिया नहीं होती हैं पराई,
सही चीजों के लिए रखो अपनी गुड़िया के लिए मेहनत की कमाई।
ये विनती है की अपनी बेटीयो को पढ़ाओ,
और ऐसी सामाजिक बुराई को देश से जल्द ही मिटाओ।
नहीं होती है बेटियाँ अपने घर वालो पे बोझ,
जरूरत है संसार में बदलने की लड़कियों के प्रति छोटी सोच।
दहेज मांगना और देना, दोनो हैं गुनाह,
जिसकी है कानून में बहुत सख़्त सज़ा।
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अपनी कहानियाँ
“अभी जिंदा हूँ मैं”
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द्वारा - श्री श्यामल बिहारी महतो
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श्री श्यामल बिहारी महतो बोकारो, झारखंड, भारत से हैं। अभी ‘तारमी कोलियरी सीसीएल’ कार्मिक विभाग में कार्यरत हैं। इनकी भाषा में झारखण्ड की स्थानीय हिंदी स्पष्ट दिखाई देती है।
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अभी जिंदा हूँ मैं
सुबह के उजाले में भी एक क्षण भूत सा लगा था वह। पर न वह भूत था न भविष्य। पूरा का पूरा वर्तमान था वह। नाम था मनसा! हाँ, मनसा तुरी-पूरा नाम था। लाठी के सहारे चलकर वह मेरे घर तक पहुँचा था। दाढ़ी बढ़ी हुई और आँखें भीतर की ओर धंसी हुई, जिनमें सवाल ही सवाल तैर रहे थे।
पिछले छः माह से लापता था वह! मुझे एक-एक कर सब कुछ याद आता चला गया था। उस समय बदली-बहाली का जोर था। धारा (9.4.0) अर्थात कंपनी का एक ऐसा प्रावधान, जिसके तहत कोई माँ, कोई बाप अपने बेटे को अपनी जगह नौकरी देकर अपने बाकी जीवन को सुखमय बनाने और बुढ़ापे का सहारा ढूंढने में लगे हुए थे। जिनका सगा बेटा नहीं, वे दामाद को ही अपनी नौकरी देने की भाग दौड़ करते नजर आ रहे थे। बेटी-खुश दामाद-ख़ुश, ताकि भविष्य खुशहाल हों।
नौकरी और जीवन में बड़ा गहरा संबंध होता है। अपने आश्रित को नौकरी देकर, हर माँ-बाप, अपने घर-परिवार और पोते-पोतियों के साथ हंसी-खुशी का जीवन जीने की तमन्ना रखते हैं। यहाँ जाना है, वहाँ जाना है, बेटे की शादी, बेटियों की शादी, नतनी का वर ढूंढना, पोती की शादी के लिए योग्य दूल्हे की खोज करना, घर-परिवार ठीक-ठाक चलने से ही ये सब हो पायेंगे।
लेकिन मनसा ने परिस्थिति वश बेटे को नौकरी देने का मन नहीं बनाया था। बल्कि ऐसा करने के लिए मनसा को विवश किया गया था। मजबूर होना पड़ा था उसे।
वैसे मनसा का परिवार बहुत बड़ा नहीं था। भाईयों से अलग होने के बाद और गर्भपातों की गिनती छोड़ दें,तो दो बेटे, एक बेटी और स्वयं पति-पत्नी, कुल मिलाकर पाँच ही सदस्य तो थे। परन्तु पाँचों का पाँच रूप। पाँच जीवन दर्शन। जीने के सबके अपने-अपने तौर-तरीके। उस पर अपनी-अपनी जद्दोजहद भी! मनसा ने इसी क्रम में एक दिन बताया था कि कैसे और कितनी मुश्किलों से लड़कर यह नौकरी हासिल की थी उसने और उसी नौकरी को परिवार के भविष्य का नाम देकर और एक अप्रत्यक्ष दबाव के तहत छीनने का जी-तोड़ प्रयास किया जा रहा था। सही अर्थों में कहा जाए तो कमरतोड़ मेहनत और लगन के बल पर ही मनसा इस मुकाम तक पहुँचा था। हाँ, शुरू में मनसा पढ़ा-लिखाकर नौकरी करना चाहता था, टेबुल-कुर्सी पर बैठ कर, बाबुओं जैसे रौब के साथ। पर उस जमाने में जब दलित-पिछडों के जीवन का ही अपना कोई भविष्य नहीं होता था। तो ऐसे में भला मनसा को कौन काम देता, वह भी ऐसा काम ! फिर भी मनसा ने हिम्मत नहीं हारी थी।
मनसा का जन्म एक गरीब तुरी परिवार में हुआ था। उसके अलावा घर में और पाँच भाई-बहन थे। पर उन सबको रखने के लिए भी उसके बाप के पास ढंग का एक घर नहीं था। तब इंदिरा आवास का जमाना भी नहीं था। किसी तरह एक झोपड़ी सा खड़ा कर रखा था उसके बाप ने। कुल मिलाकर दूर से ही सूअरबाड़े की तरह दिखता था। उसी में माँ बच्चे जन्म देती और उसी में बाप बच्चे भी पैदा कर रहा था।
वैसे तो मनसा का गाँव महतो बहुल था और पूरे गाँव में मुखिया नन्दलाल महतो का दबदबा था। उसकी सहमति के बगैर गाँव में कोई अहम काम नहीं हो सकता था। किसी तुरी-महरा को नया काम शुरू करने के पहले मुखिया से इजाजत ले लेनी पड़ती थी। मनसा के बाप को भी मुखिया से अनुमति लेनी पड़ी- गाँव के स्कूल में मनसा का नाम लिखवाने की अनुमति। मनसा पढ़ना चाहता था और स्कूल जाने की ज़िद में वह सप्ताह दिन से जिद पसारे-रट लगाए हुए था।
लेकिन मुखिया सीधे तौर पर हाँ कर दे, तो यह मुखिया पद की तोहीन ही न होती। फिर मुखिया किस बात का? सवाल बड़ा था। उन्होंने हाँ तो कर दिया। लेकिन बदले में मनसा के बाप को उस वर्ष मुखिया के खेतों में बेगार खटना पड़ा था। सारा गाँव इस बात का गवाह था। जब भी किसी तुरी-महरा या घटवार के बच्चों को स्कूल जाना होता, उनके माँ बाप को मुखिया के दरवाजे आकर सर झुकाना ही पड़ता था। भले ही स्कूल का खर्च और किताब-पेन्सिल का प्रबंध बाद में हो। शिक्षा के प्रति ऐसी सामंती व्यवस्था दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ती थी। मनसा के घर में गरीबी इतनी थी कि पैरों में चप्पल की बात तो दूर, पैन्ट-शर्ट भी फटे होते थे। हाँ, मनसा पढ़ने में जितना तेज था, उतना ही बढ़िया फूटबॉल खेलता था। खेल के दौरान यूं लगता था जैसे मनसा के पैर और फूटबॉल के बीच कोई चुम्बकीय सम्बन्ध हो। इस कारण गाँव के कई लड़के उसके साथी बन गये थे। वे ही मनसा को समय- समय पर मदद भी करते थे। कभी किताब तो कभी कॉपियाँ, तो कभी कपड़े भी बनवा देते थे।
परजीवियों जैसा छात्र-जीवन और पिसते-कुचलते स्वाभिमान के बीच एक दिन मनसा ने माध्यमिक परीक्षा दी और पूरे गाँव में एक वही प्रथम आया। मुखिया को मालूम हुआ तो हाथ मल कर रह गया। वहीं कई कानों को विश्वास नहीं हुआ। कई आँखें फटी की फटी रह गयीं। किसी ने सराहा तो किसी के मन में साँप लोट गया तो बहुतों ने सुना मनसा की इस शानदार उपलब्धि के बारे में। महायुद्ध की तरह सरपट दौड़ गयी थी, यह खबर गाँव के एक कोने से दूसरे कोने तक। लेकिन फटेहाल -तंगहाल मनसा अपनी पढ़ाई को आगे न ले जा सका। माँ बाप ने उसे कहीं भी काम करने को लगभग विवश सा कर दिया था। तब किशोरावस्था में उसे परिवार तथा नौकरी की चिंता ओढ़ लेनी पड़ी।
इसी बीच मनसा एक दिन कुछ लोगों के साथ नजदीक के खदान में काम करते देखा गया। कोयला-पत्थर-काटने-फेंकने से लेकर कोयला का पौवा-नापी और ब्लास्टिंग तक का काम। मुखिया नन्दलाल महतो को इस बात का पता चला। कई दिनों से मुरझायी मूंछों पर जैसे फिर से ताव आ गया। अवचेतन में कुछ दिनों से रेंग रहे लिजलिजे कीड़े को जैसे गति मिल गयी, देर तक कहकहों में डूबे रहे। वहाँ उपस्थित लोगों ने सुनी उनकी वह मधुर वाणी "फस्ट आकर मनसा की कौन सी इच्छा पूरी हो गयी और कौन सा कोलियरी मनिजर बन गया ? अरे,ढांक बजाएगा - भूतवां हियां जरूर, पर खाने को तो मिलेगा–घर के पिछवाड़े में ही ..!"
समय का पहिया, अपनी गति से घूमता रहा। दिन महीने साल बदलते रहे। दस बारह साल के युग जैसे समय में बहुत कुछ बदला। बहुत कुछ घटा। बहुत कुछ बढ़ा भी। समय से पहले मनसा तुरी का बाप मर गया। छः माह बाद माँ भी चल बसी। अब मनसा ही घर का सब कुछ था।
उन्हीं दिनों खदानों का सरकारीकरण शुरू हुआ। इस बार भी दफ्तर में टेबुल-कुर्सी पर बैठकर काम करने की मनसा की इच्छा पूरी न हो सकी। हाँ, उसे सूट-फायर के रूप में जरूर बहाल कर लिया गया। घर और बाहर दोनों जगह अब मनसा की जिम्मेवारी बढ़ गयी थी। उसने धैर्य से काम लिया। भाई-बहनों की शादी के पहले उसने पूरे कुनबे को रहने के काबिल एक घर बनाया। फिर उसने अपने बच्चों को पढ़ने स्कूल भेजा। हाँ, इस बार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए किसी मुखिया की " हाँ " की जरूरत नहीं पड़ी थी। न किसी के यहाँ उसे बेगार खटने पर विवश होना पड़ा था।
पर यहीं से घर में खटर-पटर भी शुरू हो गई थी। कुछ भाईयों की पत्नियों के कारण और कुछ उसकी पत्नी के कारण। मनसा चाहता था घर न टूटे,पर ऐसा न हो सका। भाईयों की शादी होती गयी, उधर घर में बर्तन से बर्तन टकराते गये। बर्तनों के टकराव ने एक दिन दीवारों को हिला दिया और घर में बंटवारे की लकीर खींच गयी। घर अलग हो जाने से भले ही किसी को सुख पहुँचा हो, पर मनसा के हिस्से में तो दुःख ही दुःख आये। घाटा ही घाटा। पहले भी रीता था, अब और रीत गया था मनसा। अवसाद और दुःख के बादल भी उतने ही घने हो गये थे।
यह दुःख तब और बढ़ गया, जब बड़ा बेटा रति तुरी पढ़ाई छोड़ ताश का शौकीन बन गया। वहीं बेटी स्कूल जाना छोड़ माँ की पिछलग्गू-नकचढी बन गयी। मनसा चाहता था कि उसके बच्चे पढ़ाई में उससे भी आगे जाएँ, पर कहाँ हो पाया यह सब। छोटा बेटा भी पढ़ाई के प्रति लापरवाह ही निकला। यह देख-सुन मनसा को अपार दुःख होता। लाचार मनसा किसी एक को भी सही रास्ते पर ला पाने में नाकाम रहा। इन सबके पीछे पत्नी परबतिया देवी का शह काम कर रहा था। घर में अब उसी का राज़ चलता था।
बदलते सामाजिक माहौल ने जहाँ मनसा के बच्चों को बाहर से आत्मकेंद्रित कर दिया था, वहीं परिवार में शनै:शनै: उगते स्वार्थ ने एक दूसरे को एक दूसरे के प्रति शंकालु भी बना दिया था।
उस दिन भी ब्लास्टिंग के दौरान धड़ाम-धड़ाम कर खदान में आवाजें हो रही थीं। चारों तरफ कोयला-पत्थर टूट-टूट कर हवा में उड़ते नज़र आ रहे थे और धूल-गर्दा से पूरी खदान पट सी गयी थी। कहीं कुछ नज़र नहीं आ रहा था। यहाँ तक कि ब्लास्टिंग करने वाला मनसा भी दिखाई नहीं पड़ा। लोगों को मालूम था, कि मनसा आज कल पीने लगा है। उस दिन भी उसने पी रखी थी। ब्लास्टिंग के घंटे भर बाद भी जब मनसा नहीं लौटा, तो कानों-कान यह खबर लोगों के बीच फैल गयी। उसके बाद ही लोगों ने इधर-उधर तलाशना शुरू कर दिया। खदान के अलावा झाड़ियों में भी खोज शुरू हुई। घंटा भर बाद जब धूल-गर्दा थम गया, तभी मनसा लहूलुहान एक झाड़ी में बेहोश मिला।
घंटों बाद ही मनसा को होश में लाया जा सका। लेकिन रह-रह कर बेहोशी के दौर भी जारी रहा। इससे न सिर्फ डाक्टरों की परेशानी बढ़ी, बल्कि कोलियरी प्रबंधन की नींद भी उड़ गयी थी। ब्लास्टिंग अफसर पहले ही फरार हो चुका था। उस पर बिना बालू ब्लास्टिंग करने और ठेकेदार के साथ सांठ-गांठ कर फर्जी बिल उठवाने का गंभीर आरोप पहले भी लग चुका था। इस वक्त मजदूरों का सबसे अधिक गुस्सा उसी पर था।
महीने भर बाद मनसा जब अस्पताल से बाहर आया, तो जैसे वह कोई और मनसा हो। ब्लास्टिंग के साथ कोयला गर्द और धुंए के गुब्बारे उसकी आँखों में तैर रहे थे। बल्कि कसैले धुंए तथा बारूद मिश्रित कोयले के गर्द मनसा के मन में कहीं गहरे और गहरे पैठ चुके थे। हमेशा कुछ न कुछ बोलते और गुनगुनाते रहने वाला मनसा के जीवन पर ब्लास्टिंग के बाद की सी चुप्पी और खामोशी छा गयी थी।
अब मनसा का खदान का काम पीछे छूट चुका था। वह हाजरी बनाता और वहीं हाजरी घर के बाहर चौकोर बड़े पत्थर पर घंटों बैठा रहता। अब अफसरों के सामने समस्या आयी कि इसे किस विभाग में रखा जाए ताकि इसका तनख्वाह बन सके। लेकिन मानसिक रूप से अस्वस्थ मनसा को रखने के मामले में सभी अधिकारी होशियार निकले।
कभी का अच्छा फूटबॉल खिलाड़ी रहा मनसा, अब खुद फूटबॉल बन चुका था। फिर तो कभी उत्खनन विभाग में तो कभी विधुत एवं तांत्रिक विभाग में, तो कभी सिविल विभाग में उछाला जाने लगा मानसा। परिणाम यह हुआ कि लगी हाजरी के बावजूद उसके पंद्रह दिनों का वेतन कट गया। परबतिया ने जाना तो खौलते पानी की तरह पति मनसा पर उबल पड़ी "पंठवा, मर ही क्यों नहीं गया। अगर ऐसी हालत रही तो एक-एक कर घर के सारे समान बेचने पड़ेंगे ..!"
तभी एक दिन फूचा महतो ने परबतिया के कान में कहा "चिल्लाती क्यों हो भाभी, अभी नौकरी का फार्म भराया जा रहा है, तुम भी मनसा दादा की जगह रति के नाम फार्म भरवा दो। कंपनी का नियम है भी।" पर बतिया को और क्या चाहिए था, अंधा माँगे दो आँखें ..!
वैसे भी मनसा से घर में कोई खुश नहीं था। सभी की यही इच्छा थी कि मनसा जैसे जीव से मुक्ति मिल जाए, चाहे जैसे भी हो और जब फूचा महतो ने परबतिया के सामने यह प्रस्ताव रखा, तो उसकी आँखें खुल गयीं। इस प्रस्ताव के साथ और भी एक प्रस्ताव था जिसे परबतिया खूब समझती थी और जिस पर उसने मौन स्वीकृति भी तत्काल दे दी थी।
इधर रति अब शराब भी पीने लगा था। यही नहीं, कभी-कभी तो रति बाप मनसा की गर्दन पर हाथ भी फेरने लगा था। सच पूछा जाए तो मनसा के लिए उसके हृदय में अब घृणा ही घृणा पलने लगी थी। उन्हीं दिनों उसके दोस्त मोहन के पिताजी की एक सड़क दुघर्टना में मृत्यु हो गयी, जिसके बदले मोहन को तुरंत नौकरी मिल गयी थी। नशे की हालत में अक्सर रति अपने शराबी मित्रों से कहता "पता नहीं यार, मेरे लिए वह शुभ दिन कब आएगा..!"
हालांकि मनसा को वेतन में जो भी मिलता ले जाकर वह पत्नी को ही देता -सारा का सारा ! फिर भी घर में वह बिलकुल उपेक्षित और अकेला महसूस करता। अन्ततः रति को नौकरी देने के लिए सहमत हो जाना पड़ा था उसे।
और एक माह बाद ही मेडिकल बोर्ड बैठी थी। मनसा का भी उस दिन मेडिकल हुआ। परन्तु जब फिट-अनफिट की सूची निकली, तो उसमें मनसा का नाम फिट लिस्ट पर टंगा था। देखकर लगा था जैसे मनसा खुद रस्सी पर टंगा हो अर्थात, कंपनी ने मनसा को काम करने योग्य पाया था। रति को अब मनसा के जीते जी नौकरी नहीं मिल सकती थी। पर जैसी कि आशा थी, सूचना -पट के सामने ही खड़े कम्पनी के इस निर्णय का परिणाम भी दिख गया। मनसा को रति और परबतिया दो गिद्ध की तरह दिखे। एक दूसरा ही चेहरा उग आए थे उन दोनों माँ बेटे के चेहरों पर। मनसा इधर-उधर देखने लगा था। करता भी क्या ? फिर फिट अपनी इच्छा से तो वह नहीं हुआ था। डाक्टर की मर्जी, जो चाहे लिख दे। तभी मनसा की सोच को विराम लगा था। कारण परबतिया ने उसे ट्रेकर की ओर धकियाया था।
और उस दिन मैं एक जरूरी फाइल में उलझा था। सामने कई मजदूर अपनी बात रखने के लिए आगा-पीछा, ठेला-ठाली हो रहे थे। यह देख एक खीझ-सी उठी थी मन में। कैसे-कैसे मजदूर हैं कोलियरी में! आकर बैठा नहीं कि माथे पर सवार। पियून पंचानन बाहर एक नौजवान से बातें कर रहा था। उसकी दाढ़ी अपेक्षाकृत कुछ बढ़ी हुई थी। पर आँखों की चमक उतनी ही गहरी थी। मैंने दूर से ही देखा, वह रति था, मनसा का बड़ा बेटा। पंचानन ने कुछ दिन पहले बताया था कि मनसा अब इस दुनिया में नहीं रहा। कई दिनों की अफवाह और मनसा को लेकर टुकड़ों-टुकड़ों में मिल रही खबरों के बाद आज उसका मृत्यु प्रमाण-पत्र भी मेरी टेबुल पर पड़ा था। पर पता नहीं क्यों यह मृत्यु प्रमाण-पत्र मुझे एक साज़िश प्रमाण पत्र सा लग रहा था।
कभी मैं मृत्यु प्रमाण-पत्र को देखता, कभी सामने खड़े रति को। थाने से मिली मृत्यु प्रमाण-पत्र के आधार पर ग्राम सेवक के द्वारा "फार्म" टेन निर्गत किया गया था और दोनों की ही छाया-प्रतियाँ दरखास्त के साथ अटैच थीं। एक पल के लिए मेरी आँखों के सामने मनसा का चेहरा उभर आया, वहीं रति का चेहरा पल-पल बदल रहा था-गिरगिट की तरह ! मैंने भी गहरे भाव से कहीं से महसूस किया था मनसा की मृत्यु को,क्षण भर के लिए ही सही।
" कब उसका क्रिया-कर्म है ..?" उनसे पूछा था।
" कल ही दस कर्मा है..!" रति ने हकलाते हुए कहा था।
" बारहवाँ भी करोगे ही ..?" फिर पूछा था।
" नहीं..!" उसका जवाब था।
" ठीक है, तुम जाओ। " आगे और पूछना जरूरी नहीं समझा था।
मनसा मर गया ? पर कहाँ ? और कैसे ? न मैंने रति से पूछा और न उसने बताया, पर उत्तर तो चाहिए ही था। तभी कैंटीन में चेतो घटवार मिल गया। मनसा का पड़ोसी। आलूचोप खा रहा था। उसी ने बताया था कि थाने से मिली लाश काफी क्षत-विक्षत और कुचली हुई थी। लाश मनसा की भी हो सकती थी, और किसी और की भी। लाश ऐसी हालत में थी कि उसका सही-सही पता करना, उतना ही मुश्किल था। सुनने में आया था कि लाश के कपड़े मैले-कुचैले और फटे हुए थे। वह हर तरह से मलबे से निकाली लाश की तरह लग रही थी फिर भी थानेदार ने कहा था कि लाश मनसा की है, ले जाकर जला दो। पर कुछ प्रश्न थे जो अब भी अनुत्तरित थे- क्या गाँव के मुखिया का भी यही कहना है? मनसा के घरवाले क्या कहते हैं?
इस दुर्घटना की पूरी जानकारी किसी के पास नहीं थी।
इन सबसे अलग रति खुश था। बाप की जगह नौकरी उसे मिलने जा रही थी। जिसे प्राप्त करना उसका अंतिम लक्ष्य था। वहीं मुरली नायक खुश था कि उसका पैसा रति के काम में खर्च हो रहा था। वह अच्छी तरह जानता था कि नौकरी लग जाने के बाद रति से सूद कई गुना वसूल लेगा वह। इस क्षेत्र में इस तरह का सूद पर रोजगार करने वालों की कमी नहीं थी।
रति के काम में पंख लग गया और उसकी नौकरी वाला पेपर अब उड़ रहा था। साथ में उड़ रहे थे ऑफिस के बड़ा बाबू - मनसुख कंगाडी ! एक दिन हवा कुछ तेज़ हुई, तो बड़ा साहब को लिए बड़ा बाबू उड़ गए मनसा के गाँव "केस सही है या नहीं" की जाँच करने। लौटे तो दोनों बहुत खुश दिखे। दूसरे दिन वही चेतो ने बताया कि कल दोपहर को मुरली नायक के घर में जम कर मुर्गा-दारू चला था।
महीना दिन बाद कहीं से पता चला कि रति को बाप की जगह नौकरी मिल गयी। सुनकर कोई हैरत नहीं हुई। हाँ, दुःख जरूर हुआ।बड़ी देर तक मनसा-प्रकरण पर सोचता रहा। सर दुखने लगा तो उठकर कैंटीन चला गया। संयोग से वहीं फिर चेतो घटवार मिल गया। मैंने पूछा "चेतो, क्या सचमुच रति को" ज्वाइनिंग लेटर "मिल गया ?"उसने कहा" हाँ, मिल गया, और आज उसी खुशी में रति पूरे गाँव वालों को सही-भात, खिला रहा है..।""क्या कहा, सही-भात ! यह सही-भात क्या है भाई ?" मुझे चेतो की इस नयी बात पर हंसी आ गई" भोज-भात,बहू-भात, और जात-भात भी हमने सुना था, लेकिन यह सही-भात, कभी नहीं सुना था..!""सही-भात, का मतलब सही-भात ! अर्थात मनसा मर गया यह सही है और उसकी जगह रति को नौकरी देकर कम्पनी ने कोई ग़लत नहीं किया - सही है..!"
"बहुत खूब ! पर यह सुझाव किसका था?
मेरा मतलब सही-भात खिलाने की आइडिया किसकी थी ?"
"मुखिया जी की ..!"
"लगता है, मुखिया जी को कोई मोटा माल हाथ लगा है। "
"हाँ, दस हजार का हल्ला है, गाँव में..!"
"और गांव वालों को क्या मिला..?"
"गाँव के शिव मंदिर की ढलाई में बीस बोरी सीमेंट देने की बात है..!"
और विचित्र संयोग यह था कि "सही-भात" खाने के दूसरे दिन मनसा गाँव पहुँचा, बूझे-बूझे और भारी मन से। कारण था कि गाँव घुसने के पहले उसने हल्के धुंधलके में कुछ लोगों की बातें सुनी थीं। कोई कह रहा था" मानना होगा, कल रति ने दम भर खिलाया लोगों को ..!"
"उसकी जिंदगी भी तो बन गयी, नहीं तो नौकरी कहाँ मिलती है अब इस तरह..!"
कहीं रति उसकी नौकरी लेने में सफल तो नहीं हो गया? यदि ऐसा हुआ तो? आन्तरिक उत्साह में बहुत तेज उसके बढ़ते कदमों की गति अचानक मन्द पड़ गयी। लगा वह किसी गहरी खाई में गिर गया है। नहीं, गिरा नहीं, बल्कि गिरा दिया गया था। और यह खाई कोयले की खदानों वाली खाई से भी गहरी और खतरनाक थी। एक क्षण के लिए मनसा की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
उसका जी चाहा कि वह उल्टे पाँव ही लौट जाए। उसे याद हो आया कि जब वह गाँव -घर के लिए चला था तो कितना खुश था। कटे हाथ का दुःख भी भूल गया था वह। बस मन में घर पहुँचने की प्रबल इच्छा थी और उसने चाहा था कि जितनी जल्दी हो सके, वह घर पहुँच जाए। बाल-बच्चों विशेषकर पत्नी से मिलने की खाश ललक थी मन में, उस पत्नी से जिसे देखे बगैर कभी एक रात रहा नहीं जाता था। रति को भी बहुत चाहता था। एक बार वह बीमार पड़ा तो रात-रात भर मनसा ही जागता रहा था। अब वह घर-परिवार से कितना निकट था, सिर्फ सौ-दो-सौ, गज की दूरी.. और वह है कि लौट जाना चाहता है। थोड़ी देर तक " हाँ, या न " की स्थिति में पड़ा रहा।
अन्ततः मनसा ने सोच लिया। सामान उठाकर वह पुनः चल पड़ा -घर की ओर। सामान के नाम पर था ही क्या ? अस्पताल से मिला एक पुराना कम्बल, जिसे उसने कन्धे पर डाल लिया और लाठी को मजबूती के साथ पकड़ गाँव में घुस गया "ठक-ठक-ठक " करती लाठी की आवाज सुन, गली में कदम रखते ही कुत्तों ने मिलकर उसका स्वागत किया। यकायक उसका जबड़ा सख्त हो उठा था। लाठी उठा कर उसने सामने आये कुत्ते पर एक जोरदार प्रहार किया। अब सामने कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
मनसा ने अपने घर के अगल-बगल एक नजर देखा, फिर घर के पिछवाड़े की ओर चला गया। उसने किवाड़ को धीरे से खटखटाया। दरवाजा अन्दर से बन्द था। पहले तो मन में मधुर कल्पना उठी,पर भीतर से कोई जवाब नहीं मिला, तो उसने जोर से सिकरी खटखटायी। यूं लगा जैसे कुत्तों पर का आक्रोश पुनः उसके अन्दर उत्पन्न हो गया था।
तभी अन्दर से खाट चरमराने और फुसफुसाने की आवाज सुन उसके कान खड़े हो गये। इतने में दरवाजा आहिस्ता से खुला और एक आदमी घर से बाहर की ओर लपका। मनसा ने लपक कर एक जोरदार लाठी उस पर दे मारी, "बाप रे,..मरा..!" की चीख के साथ वह पिछवाड़े की ओर भागा। तभी -" कौन है..?" के प्रश्न के साथ दोनों किवाड़ खोल परबतिया बाहर निकली। उजियारी रात में सामने मनसा को देख वह जड़ हो गयी, मानो किसी भूत या प्रेत-आत्मा से भेंट हो गयी हो। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वह मूरत बनी वहीं जम गयी थी-चुपचाप।
तभी भीतर दूसरे कमरे से रति की आवाज आयी-" कौन है माँ..?"
" कितना अच्छा सपना देख रही थी मैं..!" बेटी कुनमुनाते हुए निकली।
" कहाँ, कहाँ से आ जाते है लोग, दूसरों की नींद खराब करने..।" छोटा बेटा कुछ ज्यादा ही नाराज़ दिखा।
अगले ही क्षण मनसा का पूरा परिवार आंगन में खड़ा था। सबके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं थीं। जहाँ रति बाप से नजरें नहीं मिला पा रहा था, वहीं बर्फ बनी परबतिया को लगा कि वह अब घर विहिन हो गयी है। इस घर में उसके लिए अब कोई जगह नहीं बची है। मनसा ने बेटे को हिकारत भरी नजरों से देखा और कहा -"ट्रेकर क्या पलटी, तुमने मुझे मरा ही समझ लिया और षडयंत्र रच लाश बना तुम सबने मुझे ठिकाने भी लगा दिया। लेकिन मैं बच गया ..!" फिर उसने भरपूर नजरों से परबतिया की ओर देखा और एक निर्णायक चीख सी उभरी उसके गले से- "अभी जिंदा हूँ मैं !"
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"बाल विभाग ( किड्स कार्नर)"
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डॉ. राकेश कुमार गुप्ता
डॉ. राकेश कुमार गुप्ता, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से हैं। योग एक्सपर्ट. सेवानिवृत्त अधिकारी इंटेलीजेंस विभाग, उत्तर प्रदेश से हैं। बाल साहित्य में विशेष रूचि रखते हैं।
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हर परीक्षा महत्वपूर्ण
परीक्षाएँ हमारे धैर्य, विवेक और ज्ञान को परखने के लिए आती हैं। कई विद्यार्थियों को हमने देखा कि वे परीक्षा आते ही तनाव, उदासीनता (नर्वसनेस) से ग्रसित हो जाते हैं। परीक्षा अनदेखे भूत जैसी उनके मन में जगह बना लेती है तथा जो उन्हें याद है उसे भी भुलवा देती है। विद्यार्थी ही क्या अनेकानेक सेवाओं की प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होने वाला युवा वर्ग भी इनसे बुरी तरह ग्रसित हो जाता है, विशेषकर साक्षात्कार के समय।
सत्य तो यही है कि पूरा जीवन एक परीक्षा की मानिंद है, जहाँ पल-पल पर हमारे धैर्य, विवेक और बुद्धि की परीक्षा होती रहती है। प्रकृति, समाज और परिवार हमारी परीक्षाओं को रोज ही लेता रहता है।जो भी लोग जीवन को एक परीक्षा मानकर चलते हैं, उन्हें तनाव और उदासीनता से नहीं गुजरना पड़ता। वे उन्हें चुनौती मानकर उनका स्वागत करते हैं और उनका सामना धैर्य पूर्वक कर समाधान करने का प्रयास करते हैं। वही सफलता को प्राप्त करते हैं।
विश्व का प्रत्येक मनुष्य अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने में सक्षम है, यदि उसमें आत्मविश्वास हो। आत्मविश्वास ही एक ऐसी कुंजी है, जिससे मुश्किल से मुश्किल ताले खुल जाते हैं। लेकिन होता यह है कि हम संबंधित कार्य और समस्या का नाम सुनते ही भयभीत हो जाते हैं, हम समस्या का समाधान करने की बजाय स्वयं समस्या का प्रश्न बनकर यूँ ही तनाव पाल लेते हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि जो विद्यार्थी या मनुष्य प्रतिदिन अपनी दिनचर्या को संतुलित रखकर अपने दैनिक कार्यों और नियमित कर, पढ़ाई आदि का अभ्यास करते रहते हैं, उन्हें कभी भी कोई कार्य और परीक्षा बोझ नहीं लगती है और न ही वे तनाव और उदासीनता से ग्रसित होते हैं। प्रत्येक विषय का नियमित अभ्यास हमें परीक्षाओं में उत्कृष्ट सफलता दिलवाता है। समाज और विद्यालय उनका मान-सम्मान करते हैं। उनका भविष्य उज्ज्वल बनता है। जीवन सार्थक बनता है।
किशोरावस्था बहुत नाजुक अवस्था है, जिसमें विद्यार्थी वर्ग को बहुत सँभल कर चलने की आवश्यकता है, साथ ही माता-पिता को भी इस अवस्था में बच्चों पर विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि वे किसी गलत संगत में पड़कर अपना अमूल्यवान जीवन व्यर्थ नहीं गँवाएँ। मोबाइल का बच्चे किस तरह उपयोग या दुरपयोग कर रहे हैं, यह सब देखने की बहुत आवश्यकता है। टीवी और मोबाइल पर वह सब तो नहीं देख रहे हैं जो उनके जीवन को संकट में डाल कर जीवन को बरबादी की ओर ले जाए।
किशोरावस्था में ही गर्लफ्रैंड और बॉयफ्रेंड का आकर्षण सुविधाभोगिता में पल रहे बच्चों में कुछ अधिक ही बढ़ गया है, जो उनकी जिंदगी को रसातल में ले जा रहा है। उनका पढ़ाई से जी चुरवा रहा है। उन्हें बुरे कार्य के लिए प्रेरित करवा रहा है, अनेकानेक उदाहरण आज चोंका रहे हैं तथा सोचने के लिए विवश कर रहे हैं।
हर परीक्षा में सफलता और जीवन में उन्नति के लिए आवश्यक है कि विद्यार्थी लगन, एकाग्रता और आत्मविश्वास से पढ़ाई पर ध्यान देकर नियमित रूप से पढ़ें, जो कुछ समझ न आए उसे अपने शिक्षक से पूछकर समाधान करें। अपने साथियों से ग्रुप डिस्कशन करें। टीवी और मोबाइल का उपयोग उतना ही करें, जितना कि आवश्यक हो। पढ़ाई अर्थात अध्ययन देर रात के बजाय प्रातः काल में जगकर पढ़ें। अपने माता-पिता और सभी को अपने मन, वचन और कर्म से सुख दें। सारा ध्यान अभ्यास और तन - मन को स्वस्थ करने मेंलगाएं। इस प्रकार जीवन में सफलता अवश्य मिलेगी।
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