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OCTOBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अक्टूबर 2022, अंक १७ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों,
अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व दीपावली की आप सभी को हार्दिक कामनाएँ, दीये की रोशनी से आपके जीवन का अन्धकार हमेशा के लिए दूर हो जाये और आशा करती हूँ कि आप जो चाहो वो आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हों जायें। दीये का प्रकाश हर पल आपके जीवन को एक नयी रोशनी दे। रोशनी का यह पावन त्यौहार आपके जीवन में सुख शान्ति एवं समृद्धि लेकर आये।
हिंदी शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों ने कुछ सप्ताह में सम्पूर्ण कर लिया है। सफलता के परिणाम प्राप्त होने के पश्चात् आप सभी से अनुरोध है कि आप सभी हिंदी सीखने के कार्यक्रम में सम्मिलत होकर इसे सफल बनाएँ और यू.एस.ए. में अधिक से अधिक बच्चों को हिंदी के ज्ञान से लाभान्वित करें। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल
(anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति आप सभी के सहयोग के लिए आभारी है, Amazon के माध्यम से आप हमारा समर्थन करिये, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एक ग़ैर लाभकारी संस्था है और जहाँ खरीदार अपनी पसंदीदा charitable संस्था के रुप में smile.amazon.com के द्वारा चुन सकते हैं, कोई भी ख़रीदी करता है amazon.com उस आय का ०.५% अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति को अपनी ओर से देगा।
अंत में मैं सम्पादकीय समिति को सहृदय धन्यवाद देती हूँ जो निर्धारित समय पर “संवाद” और विश्वा को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने कार्य कर रहे हैं। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल
(anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं ।
शुभकामनाओं सहित
अनिता सिंघल
अंतरराष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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जागृति वेबिनार : 12 नवंबर 2022
"आधुनिक हिन्दी साहित्य और स्त्री विमर्श"
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 12 नवंबर 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की अगली कड़ी की वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी आलोचक एवं साहित्यकार डॉ. कंचन शर्मा, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, मणिपुर विश्वविद्यालय, इंफाल (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "आधुनिक हिन्दी साहित्य और स्त्री विमर्श "।
स्त्री विमर्श आधुनिककाल का बहुचर्चित विषय है। स्त्री-विमर्श जिन बिंदुओं पर खड़ा है, क्या उनके बीज भी हिन्दी साहित्य के इतिहास की क्रोड (गर्भ) में है? क्या स्त्री-विमर्श चिंतन, सृजन और व्यवहार के धरातल पर सफल है? क्या स्त्री-विमर्श को पुरुष चिंत -सृजक और महिला चिंतक-सृजक के खेमे में बाँटकर देखा जाना चाहिए? क्या स्त्री विमर्श हिंदी साहित्य के विशाल कलेवर में न्याय पाता है? इन सवालों पर आइए विचार करते हैं, इस चर्चा में।
समिति शनिवार,12 नवंबर 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
https://www.facebook.com/events/900412204263746
www.facebook.com/ihaamerica
https://youtu.be/vYYETzXoEiY
https://youtu.be/UgiNV7v5IZM
शनिवार, 12 नवंबर 2022; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 10:00 AM EST, 9:00 AM CST, 8:00 AM MST, 8:00 AM PST
UK: 4:00 PM, Mainland Europe: 5:00 PM
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आशा है कि आप शनिवार, 12 नवंबर 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं। समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” का जून 2021 से प्रकाशन प्रारम्भ किया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना।
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति -- जागृति रिपोर्ट
जागृति व्याख्यानमाला की आठवीं कड़ी: १० सितम्बर २०२२
“रीतिकाल को हीनकाल या पतनशील काल कहना गलत है”
वक्ता: प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी
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प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी
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वक्ता: प्रोफ़ेसर डॉo सुधीश पचौरी
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"'रीतिकाल को हीनकाल या पतनशील काल कहना गलत है,'.... यह आधुनिक हिंदी साहित्य के पुरोधाओं की विक्टोरियाकालीन नैतिक दृष्टि का परिणाम था" ....यह कहना था प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी का। प्रोफ़ेसर पचौरी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की जागृति-व्याख्यानमाला की आठवीं कड़ी में बोल रहे थे। आजादी के इस अमृत महोत्सव वर्ष में प्रारम्भ जागृति व्याख्यानमाला की यह आठवीं कड़ी 10 सितम्बर, 2022 को स्ट्रीमयार्ड (Streamyard ) से वेबिनार के रूप में आयोजित हुई। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था : "रीतिकाल- एक पुनर्पाठ"। प्रोफेसर सुधीश पचौरी दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं। प्रोफ़ेसर साहब के शोधकार्य के मुख्य विषय हैं, साहित्यिक सिद्धांत और परा-आधुनिकतावाद । प्रोफ़ेसर पचौरी की अब तक 60 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त वे कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में नियमतः लिखते हैं। इनके साप्ताहिक कॉलम जनसत्ता और दैनिक जागरण में देखे जा सकते हैं।
अपने व्याख्यान में डॉ. पचौरी ने रीतिकाल के विषय में पुनरुत्थान काल के विद्वानों द्वारा स्थापित, जिसके अगुआ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी थे,अवधारणाओं का खंडन किया। उन अवधारणाओं के मुताबिक स्त्री की ओर देखना भी अश्लील समझा जाने लगा था। यह द्विवेदीकालीन प्रवृति अंग्रेजों की तत्कालीन नैतिकतावादी सोच और उस वक्त के प्रखर राष्ट्रजागरण आंदोलन के कारण उपजी थी। कालांतर में प्रमुख छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने भी अपने संग्रह ''पल्लव" की भूमिका में भी रीतिकाल को जम कर कोसा है, वे तो रीतिकाल की कविता को "दाँतों में मिश्री,लगी पतुरिया" की तरह बताते हैं, याने वेश्या की तरह। पर सेक्सुअलिटी को दबाकर रखने की यह प्रवृति भारत की परम्परा नहीं थी। प्रोफ़ेसर पचौरी के अनुसार, रीतिकाल के साहित्य में सेक्सुअलिटी बहुत हद तक उजागर अवश्य है, पर वह अश्लील नहीं है। उनकी पुस्तक "रीतिकाल- सेक्सुअलिटी का समारोह" उनके इस चिंतन का प्रतिफलन है। अपनी पुस्तक के विषय में बताया कि जब वे इस विषय पर सोच रहे थे तो उनका परिचय फ़्रांस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक चिंतक फुको (Foucault) के विचारों से हुआ। वे फुको के सेक्सुलिटी सम्बन्धी विचारों से इतने प्रभावित हैं कि उनकी इस पुस्तक के पहले दो अध्याय फुको की अवधारणाओं को ही व्याख्यायित करते हैं, और पुस्तक का अनु-शीर्षक ही है "रीतिकाल में फुको विचरण"। फुको की किताब : " हिस्ट्री आफ सेक्सुअलिटी" का हवाला देते हुए प्रोफ़ेसर पचौरी ने कहा कि फुको के अनुसार भारत और जापान का समाज सेक्सुअलिटी को व्यक्त करने में काफी स्वतंत्र था, जबकि ये पश्चिम के देश थे जो इस विषय में पीछे थे। जिस देश में कामसूत्र कभी टेक्स्ट की तरह पढ़ा जाता रहा हो, वहाँ सेक्सयुअलिटी निंदनीय कैसे हो सकती है ? अत: सेक्सुअलिटी व्यक्त करने के प्रयास को, जो रीतिकाल में मुखर था, निंदनीय बताना भारतीय परम्परा नहीं थी ।
प्रोफेसर पचौरी ने बताया कि रीतिकाल के प्रमुख भक्त कवि सूरदास की वियोग-लहरी में तो श्रृंगार भरा पड़ा है, आचार्य शुक्ल उस वियोग- श्रृंगार की प्रशंसा करते हैं, पर अन्य तरीके का श्रृंगार वर्णन उन्हें मान्य नहीं है। विद्वान प्रोफ़ेसर के अनुसार हमारी परम्परा में नीति और श्रृंगार साथ-साथ चलते आ रहे हैं, जैसे भर्तृहरि ने श्रृंगार-शतक भी लिखा और नीति-शतक भी। रीतिकाल में भी नीति और श्रृंगार दोनों की प्रचुर रचनाएँ हुई हैं। उन्होंने रहीम का हवाला देते हुए कहा कि रहीम नीति के कवि समझे जाते हैं, पर उन्होंने नायिका भेद लिखा जो उनकी प्रसिद्ध रचना है। उनकी रचना "नगर शोभा" तो अकबर के जमाने में आगरे के लाल किले में लगी मीना बाजार में श्रृंगार के समारोह जैसी है। उसमें उन्होंने अनेक तरह की स्त्रियों का, जो बाजार में सामान बेचने आईं हैं, विशद वर्णन किया है । बनिआइन, नटिनी, जिलेदार की पत्नी, ब्राह्मणी आदि समाज की तरह-तरह की स्त्रियों का रूप वर्णन है। जैसे, ब्राम्हणी के विषय में कहते हैं -
"उत्तम जाति ब्राह्मणी देखत चित्त लुभाय, परम् पाप पल में हरत परसत जाके पाय"।
एक ही दोहे में ब्राह्मणी की उत्तम जात, उसका लुभावना सौंदर्य, और उसके चरण छूने से पाप का कटना, सब समाहित हैं।
प्रोफेसर साहब ने इस तरह के कई दोहों द्वारा यह साबित करने की चेष्टा की कि इस सौंदर्य- श्रृंगार वर्णन में अश्लीलता कहीं नहीं है? बिहारी-सतसई के सात सौ से अधिक दोहों में भी श्रृंगार भरा पड़ा है, पर साहित्य की अन्य विधाएँ भी जैसे व्यंग्य गुँथी पड़ी है। देखिये:
"बहु धन ले, अहसान ते; पारो देत सराही; वैद बधू हँस भेद सो रही नाह मुस्काई"।
प्रसंग यह है कि वैदबधू का प्रेमी , नपुंसक वैद्य की दवा लेने आया है; और वैद की पत्नी जो दोनों बातें जानती है (अपने पति की नपुंसकता, और दवा लेने आये मरीज से अपना प्रेम), इस भेद को समझ कर मुस्करा रही है। इस तरह नगर शोभा के १४३ दोहो में और पूरी बिहारी सतसई में श्रृंगार भरा पड़ा है, रसिकता भरी पड़ी है, पर नग्नता नहीं है।
रीतिकाल के साहित्य को पतनशील कहने वालों को चुनौती देने के अतिरिक्त प्रोफेसर पचौरी ने दूसरे साहित्यिक पहलुओं को भी अपने व्याख्यान में उजागर किया जैसे कवि और काव्य। प्रसिद्ध आचार्य राजशेखर की पुस्तक "काव्य मिमांसा" के उद्धरण से उन्होंने बताया कि भारतीय साहित्य में कवित्व एक पेशा था, कवित्व की बकायदे शिक्षा होती थी आदि। प्रोफ़ेसर पचौरी के इस रोचक व्याख्यान का पूर्ण आनंद लेने के लिए पूरी प्रस्तुति इस लिंक पर देखें: http://hindi.org/Jagriti.html
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अपनी कलम से
“पंच प्रण” दीपोत्सव
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द्वारा- डॉ. आशीष कंधवे, दिल्ली
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“पंच प्रण” दीपोत्सव का आयोजन 20,21 और 22 अक्टूबर 2022 को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र एवं हिंदुस्तान समाचार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।
इस अभिनव आयोजन के अंतर्गत काव्य प्रतियोगिता, चित्रकला प्रतियोगिता एवं रंगोली प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र एवं हिंदुस्तान समाचार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इन कार्यक्रमों का लक्ष्य भारतीय संस्कृति से नई पीढ़ी को अवगत कराना एवं भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अभिरुचि को जागृत करना था।
भारत के यशस्वी माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुरूप “पंच प्रण“ के अंतर्गत इसे आयोजित किया गया था।
ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता को पंच प्राण लक्ष्य दिया है। इसमें पहला विकसित भारत, दूसरा परतंत्रता की हर सोच से मुक्ति पाना, तीसरा विरासत पर गर्व, एकता और एकजुटता को चौथा प्राण और नागरिकों के कर्तव्य को पाँचवाँ प्राण बताया। इसी पंचप्राण अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के द्वारा आयोजित किया गया ।
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्यौहार सामाजिक जीवन के प्रवाह से पैदा होते रहे हैं। इन पर्व-त्यौहारों से जुड़ी लोक-कथाओं को काल-खंड में नहीं बाँधा जा सकता। भारतीय परंपरा में पर्व 'साधना' है, तो त्यौहार 'उत्सव'। लंका विजय के बाद भगवान राम जिस दिन वापस अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने खुशी में दीप जलाये। उत्सव मनाया। वही उत्सव दीपावली के रूप में प्रसिद्ध हुआ। देश के अलग-अलग भागों में दीपावली का त्यौहार अलग-अलग मान्यताओं व स्वरूपों में मनाया जाता है।
दीपावली के अनुष्ठान का अर्थ है, अपने संकल्प को दोहराते रहना, अर्थात सत्य की सिद्ध के लिये निरंतर प्रकाश की तरफ बढ़ते रहना। दीप से निकला प्रकाश संपन्नता की कामना को समर्पित है। यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि समाज की संपन्नता को उसके सभी रूपों में सिद्ध करते रहने का आवश्यक प्रयास होते रहना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी दिशा में उन्मुख हैं। उनके प्रयास से हम सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बेला में प्रवेश कर रहे हैं। जैसे भी ज्ञान और शौर्य की अल्पता हो जाए, तो संपन्नता नहीं रह सकती। भगवान राम 'ज्ञान और शौर्य’ की प्रतिमूर्ति हैं। इसलिए उनका स्मरण आवश्यक है। दीपोत्सव हमें यही अवसर प्रदान करता है।
दीपोत्सव के पावन अवसर पर आयोजित इन प्रतियोगिताओं में विजयी होने वाले प्रतिभागियों को ₹15,000, ₹10,000 और ₹5,000 सम्मान राशि के रूप में प्रदान की गई।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के प्रांगण में आयोजित प्रथम दिन रंगोली एवं चित्रकला प्रतियोगिता में विभिन्न भागों एवं महाविद्यालयों से आए हुए अनेक कलाकारों ने प्रतिभागिता की। इन प्रतियोगिताओं में प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान पर चयन करना इतना सरल नहीं था परंतु फिर भी विवेक, कौशल और अनुभव के आधार पर निर्णय किये गए।
इस महत्वपूर्ण एवं विशिष्ट सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के आयोजन में मुझे (डॉ. आशीष कंधवे) को निर्णायक के रूप में आमंत्रित किया गया था। ह्रदय से आभार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली एवं हिंदुस्तान समाचार एवं इस अभिनव आयोजन से जुड़े हुए सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को। विशेष आभार प्रीति राय का जिन्होंने मुझे इस संकल्पना से जोड़ा।
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डॉ. आशीष कंधवे एवं प्रतियोगिता में भाग लेने वाले
तैयार युवा वर्ग के साथ
“पंच प्रण”
दीपोत्सव का फ्लायर >>>>>
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रंगोली प्रतियोगिता की एक झलक
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अपनी कलम से
"सब साधै सब जाय"
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द्वारा - डॉo अंगदकुमार सिंह
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डॉ. अंगदकुमार सिंह गोरखपुर, उत्तर प्रदेश से हैं। हिन्दी साहित्य में एम. ए. बाद में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। अभी जवाहरलाल नेहरू पी. जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर में हिन्दी विभाग में असिस्टेण्ट प्रोफेसर हैं।
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मध्ययुगीन यह सन्त वाणी (सब साधै सब जाय) ध्वनित करती है कि चतुराई के साथ तमाम लोगों को साधने का यत्न विफल परिणामी बनता है। सुन्दर फल प्राप्त करने के लिए,अभीष्ट की सम्प्राप्ति के लिए ‘एक’ की साधना उपयुक्त है। इसी छन्द के उत्तरभाग में आया हुआ संकेत यही आशय सौंपता है-“रहिमन मूलहि सींचिबो, फूलै फलै अघाय।” (रहीम) एक दिन सुबह रेडियो मन्त्रा पर गीत बज रहा था- “सजना तेरे प्यार में हम तो दीवाने हो गये रे” है तो यह फ़िल्म की वाणी परन्तु, इस वाणी के भीतर बैठी हुई निर्गुण भाष्यरेखा को पढ़ने के बाद इसका अभिधेय अर्थ बदल गया। इस गीत को सुनकर मेरा मन-मस्तिष्क कुछ सोचने के लिए अनेक प्रकार से भाग-दौड़ करने लगा। कभी यह व्यग्रता को अपनाता तो कभी उद्वेलन की स्थिति को प्राप्त करता। इसी उठा-पटक की स्थिति में यह इस निष्कर्ष के क़रीब पहुँचा कि कहीं इस काव्य के माध्यम से कवि ने यह सन्देश तो नहीं देना चाहा कि सजना (परमेश्वर) के प्यार (समागम) के लिए प्रेमिका दीवानी हो गयी। आशय यह कि प्रेमिका (आत्मा) जब प्रेमी (परमात्मा) के प्यार में पड़ जाती है या वशीभूत हो जाती है तो वह उसके प्यार को प्राप्त करने के लिए दीवानी हो जाती है। इसके लिए उसे अनेक प्रकार की कठिनाइयों, कष्टों, रीति-रिवाजों का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों को वह कभी झेल लेती है, सह लेती हैऔर सभी कुछ सहन करती हुई आगे अपने पथ पर बढ़ती जाती है तब उसे लक्ष्य (प्यार) की प्राप्ति होती है। जो इन परिस्थितियों को नहीं झेल पाती हैं वे घुट-घुटकर दम तोड़ देती हैं, जान गवाँ बैठती हैं और संसार में विलीन हो जाती हैं। जायसी ने ठीक ही कहा है- “तपनी मृगसिरा जे सहे ते आर्द्रा पलुहन्त” अर्थात् मृगशिरा नक्षत्र के तपन (कष्ट) को जो वनस्पतियाँ झेल लेती हैं, सह लेती हैं वे ही आर्द्रा नक्षत्र आने पर फलती-फूलती हैं। वहीं जो वनस्पतियाँ मृगशिरा नक्षत्र के तपन (कष्ट) को नहीं सहन कर पाती वे दम तोड़ देती हैं, अपना अस्तित्व समाप्त कर लेती हैं और अपना वजूद मिटा लेती हैं तथा उनको कोई लाभ नहीं होता।
अभी कुछ वर्ष पहले एक संस्था में वर्षों से कार्यरत लोगों की नियुक्ति सरकार के लाये गये एक अध्यादेश के तहत हुई। वे लोग संस्था के इतने दीवाने हो गये कि वे अपना तन-मन-धन सब कुछ उस पर न्यौछावर करने को तैयार रहने लगे तब जाकर उनके स्थायित्व का सपना साकार हुआ और साथ ही सेवा का अवसर भी। नहीं तो वे भी यदि अन्य लोगों की भाँति संस्था छोड़कर चले गये होते, बैठ गये होते या हताश हो गये होते तो यह सुनहरा मौका उनको नहीं मिलता। कहने का तात्पर्य यह कि जब तक कोई किसी चीज़ को प्राप्त करने के लिए दीवाना नहीं होगा उसे वह चीज़ नहीं मिलेगी। परमेश्वर को प्राप्त करने के लिए भी दीवाना होना पड़ता है, त्याग करना पड़ता है, अपने अहंकार की बलि देनी पड़ती है,आठों प्रहर उसी का नाम पुकारना पड़ता है तब वह चीज़ मिलती है। इसीलिए कबीदास ने भी कहा है कि- “केसव कहि-कहि कूकिए, ना सोइए असरार/ रात दिवस के टुकड़े, कबहि सुनी पुकार”। आगे पुनः इसी गीत की पंक्ति है- “सजनी तेरे प्यार में कितने कुँआरे मर गये रे” इसका आशय यह है कि सजनी यानी ‘आत्मा’ को प्यार के चंगुल में फँसाने के लिए कितने कुँआरे (विषय वासना) मर गये। कहने का मतलब यह कि आत्मा या प्रिया को प्राप्त करने के लिए अनेक विषय वासनाएँ भरोसा देती हैं, तिकड़म करती हैं और यहाँ तक कि दम तोड़ती हुई फिरती रहती हैं अपनी गिरफ्त में लेने के लिए। मगर, यह होता है कि जो प्रेमिका (आत्मा) विषय वासना रूपी लोगों के चक्कर में नहीं पड़ती हैं, वही प्रेमिका सफल होती हैं। जो सिर्फ़ ‘एक’ अतल, अनन्त, अनादि परमेश्वर का वरण करती हैं तो उसका साक्षात्कार उसी से होता है और मिलन भी। परन्तु, जो विषय वासना रूपी प्रेमियों से नज़र मिलाकर सभी से अपनाकर समागम करना चाहती हैं, उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता है, बल्कि उन्हें सिर्फ़ बदनामी, अपमान का सामना करना पड़ता है और एक दिन ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसकी छवि धूमिल हो जाती है तथा अस्तितत्त्व भी खतरे में पड़ता नज़र आने लगता है। “घर का न घाट का” ऐसे ही लोगों को लक्ष्य करके यह काव्यात्मक लोकोक्ति प्रसिद्ध हुई। उसका महत्त्व भी समय के साथ समाप्त हो जाता है क्योंकि हर चीज़ प्राप्त करने का एक समय होता है जो लोग समय से सचेत नहीं होते समय के अनुसार नहीं चलते वे समय निकल जाने पर सिर्फ़ पछताते हैं और हाथ मलते रह जाते हैं। प्रख्यात् भाषाविद् और प्रसिद्ध समीक्षापुरुष आचार्य रामदरश राय ने एक विमर्श के अनुक्रम में एक बार कहा कि, “समय से पहले कुछ करना नहीं चाहिए और समय पर चूकना भी नहीं चाहिए, जो लोग समय से पहले करते हैं और समय पर चूक जाते हैं, वे सदैव विलीन हो जाते हैं और उनका कोई अस्तित्त्व संसार में नहीं रह जाता है”। (प्रो. रामदरश राय से डॉ. अंगदकुमार सिंह के विमर्श का अंश, भाषाभावन, गोरखपुर, दिनांकः 14 सितम्बर, 2022) कहने का तात्पर्य यह है कि समय बड़ा होता है, समय महान होता है और समय ही लोगों को महान बनाता है। इसलिए समय की धार को प्रत्येक व्यक्ति को पहचानना चाहिए। रीतियुगीन किसी आचार्य-कवि ने समुचित बात कही है कि, “जैसी बहै बयार पीठ तँह तैसी कीजै”। इसी को आगे बढ़ाते हुए रहीम ने भी कहा है- “रहिमन चुपके बैठिए, देख दिनन कै फेर/ निकै दिन जब आइहै, बनत न लागी बेर”। यानी समय ही सब कुछ है, समय ही सब ठीक करता है, यदि समय ख़राब है तो हर काम ख़राब होता है।
महाभारत की कथा को लक्ष्य करके प्रसिद्ध हो गयी लोक काव्योक्ति भी अपना यही आशय सौंपती है- “पुरुष बलवान नहीं होत है, समय होत बलवान। भीरिन छीनी राधिका वही अर्जुन वही बाण”। इसी बात को प्रसिद्ध दोहाकार कवि आचार्य सत्यनारायण त्रिपाठी ने भी लिखा है- “भीष्म पितमह रुक गये, देख शिखण्डी गात/ स्यार खदेड़े सिंह को, समय समय की बात”। (समय समय की बात) एक बड़ी संस्था में एक समय ऐसा आया जब कुछ लोगों की थोड़ी भी पूछ नहीं थी, पर समय के परिवर्तन के साथ उनकी पूछ बढ़ी तो वे लोग ऐसे निरंकुश हो गये जैसे उनका किसी से कुछ लेना-देना ही नहीं। एक अधिकारी आये तो लोगों को रोज़ी-रोटी दिये पर जब वह चले गये तो ये कुछ लोग सबकी एक ही झटके में रोज़ी-रोटी छीन ली और दर-दर भटकने के लिए मज़बूर कर दिया।
कहने का आशय कि जब आकाश बादलों से आच्छादित होता है तो सूर्य की कोई न कोई किरण ऐसी निकलती है जो बादलों को समाप्त कर प्रकाश का आगाज़ करती है परन्तु ऐसे विकट समय में प्रत्येक व्यक्ति को अपने अस्तित्त्व को बचाये रखना चाहिए। जो लोग ऐसे समय में अपने अस्तित्त्व नहीं बचा पाते हैं, अपने को सम्भाल नहीं पाते हैं, अपने को तटस्थ नहीं रख पाते हैं, अपने को इधर-उधर भटकाते हैं अनेक पर विश्वास करने लगते हैं, अनेक प्रेमियों के चक्कर में पड़ते हैं वे समाप्त हो जाते हैं। किसी को भी कई लोगों से दिल नहीं लगाना चाहिए। एक व्यक्ति के प्रति वफ़ादार रहना चाहिए। एक व्यक्ति का विश्वास जीतना चाहिए तथा उसके विश्वास को कभी किसी परिस्थिति में खण्डित नहीं करना चाहिए। मृत्युपर्यन्त उसका विश्वास जीते रखना चाहिये, क्योंकि विश्वास बहुत दिनों के परीक्षणस्वरूप बनता है और क्षण भर में समाप्त हो जाता है लेशमात्र में टूट जाता है। यह अक्सर होता है कि समय के साथ कई विषय वासनाएँ हाथ बढ़ाती है अपने आगोश में लेने के लिए तत्पर देखती है जो इनकी भावनाओं के चक्कर में पड़कर अपना आपा खो देती हैं विवेकशून्य हो जाती हैं वे कहीं की भी नहीं रह जाती, न घर का, न घाट का।
अभी कुछ वर्ष पहले एक संस्था में ऐसा ही कुछ घटित हुआ कि जितने मानदेय कर्मचारी थे सभी को एक व्यक्ति ने अस्तित्त्व दिलाया, कद बढ़ाया, उनके लिए कुछ भी कर गुज़रने-हेतु हर समय तत्पर रहा, सबके हित की बात करी और सबका हित चाहा, परन्तु सभी मानदेय कर्मचारियों ने अपने शुभचिन्तक अगुआ के विश्वास को खण्डित कर दिया और भावना (विषय वासना) में आकर सभी ने अपने-अपने अलग-अलग अगुआ खोज लिये। सभी ने अपने पंख जमा लिये और अपने-अपने मान हो गये तब यह हुआ कि उस व्यक्ति ने अपना हाथ कर्मचारियों के सर से हटा लिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि बहुत लोग सड़क पर आ गये और जो लोग बच गये थे वे भी कुछ दिन में सड़क पर आ जायेंगे। इसलिए कभी भी किसी का विश्वास नहीं तोड़ना चाहिए। विश्वास तोड़ने वाले का साथ परमेश्वर भी कभी किसी दशा में साथ नहीं देता क्योंकि जो पैदा करने वाले का, अस्तित्व दिलाने वाले का, नहीं हुआ वह दूसरे का कैसे होगा? इसीलिए इसमें कहा गया है कि, “सजनी तेरे प्यार में.......।” कहने का सार यह है कि जब कोई अनेक लोगों को परखकर, पहचानकर किसी भले व्यक्ति (वास्तविक अगुआ) को चुनता है तो वह एक व्यक्ति ही उसका उद्धार करता है।
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द्वारा - श्रीमती मीना सिन्हा
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श्रीमती मीना सिन्हा, राँची, झारखण्ड से हैं। पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण और आलेख प्रकाशित करती रहती हैं। चित्रकला कई साहित्यिक सम्मानों में सम्मानित भी हैं।
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१. जिंदगी इस तरह तरसाया न करो (मुक्तक)
जिंदगी इस तरह तरसाया न करो ।
हरदम भागदौड़ तड़पाया न करो ।
चलते-चलते थक भी जाते हैं हम -
इधर-उधर कर तुम भरमाया न करो ।
चूहे-बिल्ली का खेल खेलती हो ।
रोटियों-सी गोल-गोल बेलती हो ।
क्या-क्या कोशिश करते रहते हैं हम-
एक पल में सभी कुछ ढकेलती हो ।
भयावहता दिखा न घबराया करो ।
बेवक्त हमेशा न सहमाया करो ।
खुशियाँ दबे पाँव आती रहें हरदम -
मुस्कुराकर कभी-कभी आया करो ।
हारने वाले भी सारे चल दिए ।
जीतने वाले भी देखो चल दिए ।
आने-जाने का लगातार मौसम -
मंजिल वही रहता लोग बदल दिए ।
आज फिर सीने में उठता तूफान है ।
रगों में दौड़ते लहू का उफान है ।
एक आग है जलती धधकती हरदम -
क्या कुछ बतायें तुम्हें क्या अरमान है ।
आओ जिन्दगी करीब बैठो जरा ।
बहने मत दो तुम आँखों का कजरा ।
खुशियों के रंगों में सराबोर कर -
महकने दो अभी आनन्दित गजरा ।
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२. मौन साधना कर मन मेरा (गीत)
मौन साधना कर मन मेरा, क्यों उलझे जग-जाल में ।
खुदगर्जी के रिश्ते सारे, मानव भेड़िए खाल में ।।
घात लगाए बैठे हैं, मौके की है तलाश जारी ।
बोटी-बोटी चिंचोड़ लेंगे, हो जाएँगे सबपर भारी ।
चिकने-चुपड़े चेहरे चमके, हैं मधुरिम बोलचाल में ।
मौन साधना कर मन मेरा, क्यों उलझे जग-जाल में ।।
खुद को खुद में खोज जरा, अंतस्तल की राह बढ़ें ।
गहराई में मोती मिलते, शीर्ष शिखर पर स्वतः चढ़ें ।।
घबराओ मत मेरे मनवाँ, खुश रहो रोटी-दाल में ।
मौन साधना कर मन मेरा, क्यों उलझे जग-जाल में ।।
मौन मीत है जग की रीत है, मुखर नहीं, भूलना अतीत है ।
सहा सभी सब लिखते जाओ, जग में जानो यही जीत है ।
अपना ही खून आग लगाए, पड़ना मत तुम भ्रम-जाल में ।
मौन साधना कर मन मेरा, क्यों उलझे जग-जाल में ।।
मौन साधना कर मन मेरा, क्यों उलझे जग-जाल में ।
खुदगर्जी के रिश्ते सारे, मानव भेड़िए खाल में ।।
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३. सुख हरदम है भरमाता (गीत)
सत्य कहा था माँ ने मुझसे, कभी नहीं सुख भूला जाता ।
दुख की बातें भूलें-बिसरें, सुख है हरदम भरमाता ।।
बिटिया जो अपने घर रहती, सुख में खोई रहती है ।
विदा हुई जब अपने घर से, अपनी दुनिया सहती है ।
सुखद स्वच्छंद मनमौजी बचपन, कभी नहीं है बिसराता ।
दुख की बातें भूलें-बिसरें, सुख है हरदम भरमाता ।।
कपड़े तूने कहाँ रखे हैं, भूख लगी है खाना दे माँ ।
दो चोटी या एक करूँ मैं, जल्दी- जल्दी बतला दे माँ ।
मैं न कभी जाऊँ चाची घर, तुम्हीं निभाओ रिश्ता-नाता ।
दुख की बातें भूलें-बिसरें, सुख है हरदम भरमाता ।।
सुख की बातें कौन सुनेगा, रखना है दिल में ही गौण ।
कोई नहीं अब बाँटनहारा, चुप से रहना मन में मौन ।
सत्य कहा था माँ ने मुझसे, कभी नहीं सुख भूला जाता ।
दुख की बातें भूलें-बिसरें, सुख है हरदम भरमाता ।।
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द्वारा- श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव
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श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय”, औरंगाबाद, महाराष्ट्र से हैं। लेखन के साथ-साथ शोध कार्य में अध्ययनरत हैं।
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राम “विज्ञापन आया है, सहायक प्राध्यापक पद हेतु” विकास ने कहा।
“पद पर्मानेंट है या कान्ट्रैक्ट बेसिस पर” राम ने पूछा।
“कान्ट्रैक्ट बेसिस पर” विकास ने उत्तर दिया।
"पर्मानेंट पद होता तो भी क्या फायदा विकास, मेरी हैसियत नही पैसे भरने की।"
"मतलब, मैं नही समझा राम।"
“धीरे-धीरे सब समझ आएगा, यह शुरुआती दौर है तुम्हारा”।
"राम, मैंने एम.ए., एम.फिल., सेट, पी.एच.डी. आदि शिक्षा हासिल की है। मैं गुणवत्ता के बलबूते पर सहायक प्राध्यापक जरूर बनूँगा", विकास ने कहा।
विकास – “हमारे पहले भी बहुत से छात्र ने नेट, सेट, पी.एच.डी. आदि तक शिक्षा प्राप्त की हैं, लेकिन वे सहायक प्राध्यापक नहीं बन पाए”।
“आख़िर क्यों राम?” विकास ने पूछा।
“वही कारण, पैसा और राजनीतिक पहचान न होना”।
“पैसा और राजनीतिक पहचान किस लिए?” “सहायक प्राध्यापक बनने के लिए”।
“मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रही तुम्हारी बात। जो है साफ़-साफ़ बता दो राम”।
"तो फिर सुनो विकास, सहायक प्राध्यापक बनने के लिए कम से कम पचास लाख लगते नही हैं ; इसी के साथ विधायक, सांसद की सिफ़ारिश भी। एक-दो कालेज में गुणवत्ता के नहीं नहीं पर सहायक प्राध्यापक पद का चयन होता होगा, बाकी सब जगह पैसा और सिफ़ारिश चलती है।"
राम – “मैं कहाँ से लाऊँ इतना पैसा”।
विकास – “मेरी भी परिस्थिति तुम्हारे जैसी है, मैं भी इतने पैसे नहीं भर सकता। मैं घर और खुद का अपना शरीर बेच दूँ तो भी मैं पचास लाख रुपए इकट्ठा नहीं कर सकता। माँ-बाप को मुझ से बहुत उम्मीद है; लेकिन मैं पूरी नहीं कर पा रहा हूँ, इसका सबसे ज़्यादा दुःख है। मैं उन्हें सच बात बताकर और दुःखी नहीं करना चाहता।"
“मेरी भी वही अवस्था है राम। किंतु हम संघर्ष जारी रखेंगे। बदलाव जरूर होगा, आने वाले समय में। वह कान्ट्रैक्ट बेसिस के पद का फार्म कब भरना है राम?”
“फार्म भरने की अंतिम तारीख क्या है?”
“दो दिन बाकी है, लेकिन हम जल्द भर डालेंगे राम”।
“कल ही फार्म भर डालेंगे विकास, लेकिन एक बात कहनी थी”।
“बताओ राम”।
“तू मुझे नकारात्मक विचार का कहने की संभावना है”।
“बता तो सही”।
"सी.एच.बी. इंटरव्यू के लिए भी सिफ़ारिश लगती है, यह बात मेरे सुनने में आयी है, सच क्या है मुझे भी मालूम नही।"
राम- “सी.एच.बी. इंटरव्यू के लिए सिफ़ारिश, यह सच नहीं हो सकता”।
“अच्छा, तो फिर हम अच्छी तरह इंटरव्यू की तैयारी करेंगे। पर्मानेंट पद नहीं तो ना सही लेकिन सी.एच.बी. पद तो हासिल करेंगे विकास”।
फार्म भर दिया, देखते-देखते इंटरव्यू की तिथि आई और एक जगह के लिए पच्चीस फार्म आए।
राम- “इंटरव्यू की तिथि तेरह अगस्त है। तुम्हारी तैयारी अच्छे से हुई है न”, विकास ने पूछा।
“हाँ, हुई है देखते है क्या होता है विकास?”
“इंटरव्यू के दिन कालेज में जल्द जाना होगा राम”, विकास ने कहा।
“कितने बजे विकास?”
“सुबह आठ बजे”।
“जी, जरूर”।
“विकास कालेज बढ़िया है। हमें पढ़ाने का अवसर मिला तो हम अच्छी तरह तैयारी करके छात्रों को पढ़ाएंगे”।
“हाँ, वह तो करेंगे राम”।
“लेकिन विकास, दो जगह के लिए पच्चीस फार्म है”।
“हमारी तैयारी है और पात्रता भी, तो हमारा ही चयन होगा राम। फार्म चाहे कितने भी क्यों न हो।
विचार करना छोड़ दो राम, अभी तेरा ही नंबर है साक्षात्कार के लिए। बेस्ट ऑफ लक तुझे”।
सेवक ने जोर से कहा, "राम शिरवाडकर नामक छात्र है तो इंटरव्यू हाल में जाए।"
राम हाल के दरवाजे के पास गया और पूछा “अंदर आऊँ सर।"
सर ने काजू, बादाम खाते-खाते कहा- "आइए,बैठिए। आपका शुभ नाम?"
राम ने उत्तर दिया “राम शिरवाडकर”।
“आपकी शिक्षा?”
“एम.ए., एम फिल, सेट, नेट, पी.एच.डी. आदि हूँ”।
“अच्छा। आपको कितने साल का पढ़ाने का अनुभव है?”
“कुछ भी नहीं सर।“ राम ने कहा
“आप में कमियाँ है शायद”।
“सर, मुझे मेरी कमियाँ बताइए, मैं उस में सुधार करूँगा”
"मुझ से ज़बान लड़ाता है; यही कमियाँ है तुम्हारी।"
“मतलब, मैं नहीं समझा सर”।
"तेरा इस कालेज में और मेरे पहचान के किसी भी कालेज में चयन नही होने दूँगा मैं। समझा तू। निकलो बाहर, हो गया तुम्हारा इंटरव्यू।"
“जी सर”।
राम बाहर आया और जोर से सुकुन की साँस ली।
विकास ने पूछा, "राम कैसा रहा इंटरव्यू।"
“अच्छा रहा”, राम ने कहा।
“विषय संबंधित क्या पूछा राम?”
"बहुत कुछ पूछा, तैयारी की थी वह सार्थक हुई।"
“विकास तुझे भी बेस्ट ऑफ लक।"
आखिरकार इंटरव्यू संपन्न हो गया। सब अपने-अपने घर जाने लगे थे। कैंपस में चर्चा हो रही थी कि यह जगह पहले से मैनेज थी। इस नौकरी के लिए कुछ बच्चों ने विधायक, सांसद, मंत्री आदि की सिफ़ारिश
लायी थी, उन्हीं का चयन होना निश्चित है। यह सुनकर राम और विकास निराश हो गए।
“राम! तुम ने जो कहा था, वही सच हुआ”।
“जाने दो विकास, हम फिर से तैयारी करेंगे”।
"तैयारी करके क्या फायदा राम, वे गुणवत्ता को कहाँ महत्व देते हैं, वे जाति-बिरादरी, सिफ़ारिश आदि को देखते हैं। उन्होंने मेरे रिसर्च पेपर और सृजनात्मक साहित्य को देखा तक नहीं। राम हम सहायक प्राध्यापक कभी बन सकते।"
“ऐसी नकारात्मक बातें मत करो विकास, हमें इन व्यवस्था को बदलना है”।
"कैसे बदलेंगे व्यवस्था? शिक्षण संस्था या तो राजनेता की है या उनके पहचान वालों की। वे ही लोकसभा, विधानसभा के सदस्य हैं, शिकायत करें तो किनके पास।"
“विरोधी पक्ष के पास”।
"सभी की मिली भगत है राम। शिक्षा को उन्होंने व्यवसाय बना रखा हैं। उदाहरण के रूप में जैसे की रयत शिक्षण संस्था, पीपल एजुकेशन संस्था आदि जो आदर्श संस्था थी। उन संस्था के उद्देश्य को, विचार को खत्म किया वर्तमान व्यवस्था ने।"
“विकास, हम जैसे सुशिक्षित व्यक्ति ने हार मान ली तो कैसे होगा”।
"सही है राम तेरा। हम भ्रष्ट व्यवस्था के ख़िलाफ अंत तक लड़ेंगे। हमारी जो अवस्था हुई है वैसी
आनेवाली पीढ़ी की नही होने देंगे।"
“राम, हम सरकार से माँग करेंगे कि सभी राज्यों की शिक्षक भर्ती आयोग के माध्यम से ही हो। जब तक हमारी माँग पूरी नहीं होती तब तक हम नि:स्वार्थ भाव से निरंतर लड़ते रहेंगे। जब आयोग के माध्यम से सहायक प्राध्यापक पद का चयन होगा, तब शिक्षा का स्तर भी अच्छा होगा और महात्मा फुले, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, राजर्षि शाहू महाराज, कर्मवीर भाऊराव पाटिल आदि महापुरुषों का शिक्षण विषयक का अधूरा सपना पूरा होगा”
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बाल खंड (किड्स कार्नर)
"पंच से पक्षकार"
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श्री अंकुर सिंह जौनपुर, उत्तर प्रदेश से हैं। इन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। ये आदित्य बिरला ग्रुप में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।
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हरिप्रसाद और रामप्रसाद दोनों सगे भाई थे। उम्र के आखिरी पड़ाव तक दोनों के रिश्ते ठीक-ठाक थे। दोनों ने आपसी सहमति से रामनगर चौराहे वाली अपनी पैतृक जमीन पर दुकान बनाने का सोचा, ताकि उससे जो आय हो उससे उनका जीवन सुचारू रूप से चल सके।
दुकान का काम चल ही रहा था तभी हरिप्रसाद और रामप्रसाद के बीच कुछ बातों को लेकर विवाद हो गया और उनमें बातचीत होना बंद हो गयी जिससे उनकी दुकान का काम भी रुक गया। दोनों एक दूसरे पर खूब आरोप-प्रत्यारोप भी लगाने लगे। बढ़ते विवाद को देख उसे सुलझाने के लिए उनके पड़ोसियों ने मोहल्ले के कुछ लोगों को जुटाकर एक पंचायत बुलाई, परन्तु पंचायत के सामने भी दोनों आपसी विवाद को खत्म करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। बल्कि एक दूसरे पर एक से बढ़कर एक आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे थे। पंचायत ने भी मामले को बढ़ते देख उन्हें कुछ दिनों के लिए एक-दूसरे से दूर रहने की कड़ी हिदायत दी जिससे उनका विवाद हिंसा का रूप धारण ना कर सके। इसके साथ ही पंचायत ने दुकान के बचे आधे-अधूरे काम को पूरा करने की जिम्मेदारी गाँव के पढ़े-लिखे एक व्यक्ति विनोद को दे दी ताकि दोनों भाईयों के विवाद से उनके धन का नुकसान ना हो। हरिप्रसाद और रामप्रसाद भी विनोद को पंच परमेश्वर का दर्जा देते हुए दुकान के बचे हुए काम को पूरा करने के लिए विनोद के नाम पर सहमत हो गए।
प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी “पंच परमेश्वर” की तरह यहाँ भी समाज में हरिप्रसाद का सम्मान उनके धन से तो रामप्रसाद का सम्मान उनके व्यक्तिगत अच्छे व्यवहार की वजह से लोगों में था। परन्तु, शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में मूर्ख, चोर और बेईमान आदमी अपने पद और धन के कारण समाज में श्रेष्ठ होगा और उसके प्रति लोगों का झुकाव जल्दी होगा। ठीक वैसे ही विनोद का झुकाव हरिप्रसाद की तरफ जल्दी हो गया। विनोद हरिप्रसाद के हर बातों का अमल दुकान के कार्यों में करता और यदि रामप्रसाद इसका विरोध करना चाहता तो उसकी बातों को अनसुना कर देता या रामप्रसाद को तीन-पाँच पढ़ाकर उसकी बात टाल देता। कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा और धीरे-धीरे रामप्रसाद को भी इस बात का एहसास होने लगा की वह ठगा जा रहा है और उसके साथ अन्याय हो रहा है। उसने इसके संदर्भ में विनोद से सीधी बात करना ही उचित समझा।
अगली सुबह खेत और घर के जरूरी काम निपटा रामप्रसाद विनोद के घर जा पहुँचा और कहने लगा- "विनोद भाई, पंचायत की सहमति पर मैंने आपको पंच परमेश्वर माना है और इसलिए एक पंच के नाते आपसे निष्पक्ष न्याय करने की गुहार लगाने आया हूँ।"
इतना सुनते ही विनोद गुस्से में रामप्रसाद को भला बुरा कहते हुए हरिप्रसाद के सामने उसकी तुच्छ औकात की बात करने लगा और हरिप्रसाद की तारीफों के पुल बाँधने लगा। विनोद के इस स्वभाव और एक पक्षीय नजरिया को देखते हुए रामप्रसाद ने कहा- "विनोद जी, आज भले ही मेरी आर्थिक औकात हरिप्रसाद से छोटी है, परन्तु हरिप्रसाद के चंद रुपयों के लालच में आपने अपनी औकात पंच परमेश्वर जैसे ऊँचे दर्जे से गिराकर एक पक्षकार के स्तर की बना ली।"
इतना सुनते ही विनोद के चेहरे का रंग उड़ गया और रामप्रसाद गमछे से अपना पसीना पोंछते हुए अपने घर की तरफ चल पड़ा।
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१३ अक्टूबर २०२२ को अमेरिका के विभिन्न शहरों में हुए
“करवा चौथ” की झलक
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अ.हि.स. की आजीवन सदस्या नीलम जगेटिया के घर में - सोलन,ओहायो
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अ.हि.स. की आजीवन सदस्या सत्या अगरवाल के घर में - स्टो,ओहायो.
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शिव विष्णु टेम्पल- पारमा, ओहायो
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अनीता सिंघल, अ.हि.स. की राष्ट्रीय अध्यक्षा द्वारा – डल्लास, टेक्सास
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प्रिया भरद्वाज, शाखा अध्यक्षा द्वारा - शॉर्लट, उत्तरी कैरोलिना
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प्रिया भरद्वाज, शाखा अध्यक्षा द्वारा - शॉर्लट, उत्तरी कैरोलिना
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भावपूर्ण श्रद्धांजलि - “ओम जुल्का”
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( 30 अगस्त 1918 – 29 सितम्बर 2022)
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स्वर्गीय ओम जुल्का ने 104 साल का पूर्ण जीवन जिया। बड़े-छोटे सबके प्रिय अंकल जुल्का क्लीवलैंड समुदाय के एक माननीय स्तंभ थे। उन्हें भारतीय सेना में एक प्रसिद्ध लेफ्टिनेंट कर्नल के साथ-साथ 15 अगस्त, 1947 को पंडित नेहरू के प्रभावशाली भाषण को उन्ही के मुँह से सुना था। इस प्रकार उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री के भाषण को सुनने वाले क्लीवलैंड के एकमात्र नागरिक होने का गौरव भी प्राप्त हुआ था। उनकी मुस्कुराती हुई झलक में हमेशा उनकी याद आएगी। अंतरराष्ट्रिय हिंदी समिति की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं शतत नमन।
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“यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक को हार्दिक बधाई”
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यूनाइटेड किंगडम के पहले भारतीय मूल के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक को
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एवं हिंदी प्रेमियों की ओर से हार्दिक बधाई।
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“अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से हार्दिक बधाई”
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विराट कोहली ने रविवार, 23 Oct. 2022 को T20 विश्व कप के पहले मैच में
भारत के प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान पर अंतिम गेंद में उल्लेखनीय प्रदर्शन करके
भारतीयों का सर गर्व से ऊँचा कर दिया, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एवं भारतियों की ओर से बधाई।
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Date 08 अक्टूबर 2022
Re: Sub.:जागृति वेबिनार: "क्या आधुनिक काल के बीज भक्तिकाल में ही पड़ चुके थे”
विद्वद्वर सुरेन्द्र जी,
अनिवार्य कारणों से "जागृति" द्वारा आयोजित
प्रो. राजकुमार जी का व्याख्यान आज ही यूट्यूब पर सुन सकी हूँ। भाषण बहुत ज्ञानवर्धक रहा। तदर्थ संस्था को बधाई। मैं निमन्त्रण के लिये आपके प्रति आभारी हूँ। आशा है आप सपरिवार सानन्द होंगे। मैं भी सकुशल हूँ।
शुभकामनाओं सहित,
शकुन्तला बहादुर
कैलिफोर्निया, अमेरिका
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Date: Sept. 2022
Re: Sub.:संवाद - International Hindi Association's Newsletter
Mon 10/10/2022 8:45 AM
संवाद की सामग्री बहुत स्तरीय और संग्रणीय है। संपादक मंडल को साधुवाद।
बधाई।
भवदीय
डॉ रामगोपाल भारतीय
Dr. Ram Gopal Bhartiya
Vice-President IHA India Chapter UP
Meerut, U.P. (NCR), Bharat
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"संवाद" की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
सहसंपादक – डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP, dr.archana2309@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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सुशीला मोहनका
(प्रबंध सम्पादक)
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विजयादशमी, शरद पूर्णिमा, करवा चौथ, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवायें एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है। जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी। जागृति’ की दसवीं कड़ी शनिवार, ५ नवम्बर २०२२ को दिन में ११:०० बजे (EST) से अमेरिका में और ५ नवम्बर २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
एक विशेष निवेदन है कि अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें। साथ ही कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
‘संवाद’ सितम्बर २०२२ का अंक पढ़कर जिन्होंने प्रतिक्रया भेजी हैं उनको धन्यवाद। आप सभी से विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का अक्टूबर २०२२ का अंक भी अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निःसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
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sushilam33@hotmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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Management Team
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© 2020 International Hindi Association
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