NOVEMBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
नवम्बर 2023, अंक 29 | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रियप्रियमित्रों ,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को थैंक्स गिविंग की हार्दिक शुभकामनाएँ और ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। आप सभी के सहयोग के लिये आभार प्रकट करती हूँ!
आप सभी ने दीपावली का त्यौहार बहुत ही आनंद से मनाया होगा। पिछला माह पूरे त्योहारों से सराबोर रहा। इसी के साथ नववर्ष भी दस्तक दे रहा है, आप सभी को नववर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ।
पिछले दो वर्षों में मुझे आप सभी का समर्थन, स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है। पिछले दो वर्षों में मैंने पूर्ण निष्ठा के साथ अपनी सेवायें प्रदान की हैं और आने वाले समय में भी अपनी सेवाएँ प्रदान करती रहूँगी। मैं अनीता सिंघल आगामी अध्यक्षा श्रीमती शैल जैन को हार्दिक शुभकामनायें देती हूँ और आपके सहयोग की प्रशंसा करती हूँ।
आप सभी से मेरा सविनय निवेदन है , कि आप हमारी समिति की आर्थिक रूप से सहायता करे। आपके द्वारा की गई आर्थिक सहायता हिंदी के प्रचार- प्रसार में सहायक होगी और आने वाले अधिवेशन और हिंदी के कार्यक्रमों को सफल बनाने में पूर्ण योगदान देगी। अंत में मैं समिति, न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति और स्वयं सेवक सहित सभी को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर“संवाद” और विश्वा को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से और इस फोन नम्बर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं। .
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -अध्यक्षा
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हूस्टन, टेक्सास शाखा
हिंदी दिवस समारोह-- कविता की एक शाम
दिसम्बर 1, 2023 भारतीय कांसुलावास, हूस्टन, टेक्सास
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - इंडिआना शाखा द्वारा आयोजित
"डिजिटल क्रांति के युग में हिन्दी"
द्वारा: डॉ. मिथलेश मिश्रा
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति-इंडिआना शाखा द्वारा 14 अक्टूबर 2023 को "डिजिटल क्रांति के युग में हिन्दी" विषय पर डॉ. राकेश कुमार के नेतृत्व में एक आभासी संगोष्ठी आयोजित किया गया। इस संगोष्ठी में भारत और अमेरिका के निम्नलिखित पांच विशेषज्ञों ने भाग लिया।
- प्रो. अवधेश कुमार मिश्र, मुख्य समन्वयक (शैक्षिक), भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
- प्रो. गिरीश नाथ झा, अध्यक्ष, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
- अवतंस कुमार, न्यासी, इंडिक एकेडमी, अमेरिका
- डॉ. पल्लब मिद्या, अध्यक्ष, एडीएक्स रिसर्च, अमेरिका
- डॉ. मिथिलेश मिश्र, निदेशक, हिन्दी एवं दक्षिण एशियाई भाषाएँ, युनिवर्सटी ऑफ़ इलिनॉय, अरबाना-शैम्पेन, अमेरिका
प्रोफेसर अवधेश कुमार मिश्र, मुख्य समन्वयक (शैक्षिक), भारतीय भाषा समिति ,शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली ने ‘प्रौद्योगिकी एवं हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का विकास और संवर्धन : राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में’ पर एक सारगर्भित वक्तव्य दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कैसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी-2020) भाषा विकास और संवर्धन के सभी आयामों, विशेषकर अधिग्रहण नियोजन, स्टेटस नियोजन और कॉर्पस नियोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एनईपी-2020 ने भाषा शिक्षा में प्रौद्योगिकी के महत्व को उचित रूप से पहचाना है और डिजिटल इंडिया अभियान को शिक्षा के क्षेत्र में भी लायी है।
प्रोफेसर अवधेश कुमार मिश्र ने यह भी समझाया कि भारतीय स्कूलों में ‘हिंदी भाषा का शिक्षण-अधिगम पूरी तरह से पाठ्यपुस्तक की सामग्री / सामग्री और उसमें प्रदान की गई गतिविधियों द्वारा परिभाषित किया जाता है, इसलिए भाषा शिक्षा प्रवीणता-उन्मुख होने के बजाय उपलब्धि-उन्मुख रहती है’, और चूंकि सभी प्रकार की शिक्षा भाषा के माध्यम से ही होती है, इसलिए छात्रों की शिक्षा में न कई कमियाँ, असंगतियाँ आ जाती हैं, बल्कि भाषा के ठोस सुदृढ़ आधार के बिना उनके शिक्षोपार्जन का ऊँट किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने श्रोताओं को यह भी बताया कि शोध से पता चलता है कि प्रौद्योगिकी-समर्थित भाषाओं को सीखने और भाषाओं के माध्यम से किसी भी विषय को सीखने के नए तरीकों के लिए असीम अवसर प्रदान करता है - सीखना जो कई तौर-तरीकों पर आकर्षित करता है और जो शिक्षार्थियों को वास्तविक जीवन स्थितियों में अपने भाषा कौशल और अनुशासन ज्ञान का उपयोग और लागू करेगा। उनके अनुसार ‘पाठ, ध्वनि, छवियों, ग्राफिक्स, एनिमेशन और वीडियो के संयोजन से हिंदी शिक्षण को अत्यंत रुचिकर बनाया जा सकता है’।
प्रोफेसर गिरीश नाथ झा, अध्यक्ष. वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार ने ‘हिंदी और तकनीकी शब्दावली में कृत्रिम मेधा के अनुप्रयोग’ के बारे में बिस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि तेजी से बदलते भाषाई और डिजिटल परिदृश्य में हिंदी को ‘सर्व समावेशी ‘ और सशक्त बनकर, संस्कृत का आधार लेकर अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द और संप्रेषण क्षमता को स्वीकार करते हुए शिक्षा का सफल माध्यम बनना होगा। ‘ भारती’ जो कि हिन्दी का LLM (Large Language Model) है उसे बहुत ही विशाल डाटा समूह और लक्षणों से प्रशिक्षित करने की आवश्यकता की और भी उन्होंने ध्यानाकर्षित किया। प्रोफेसर गिरीश नाथ झा के वक्तव्य से देश-विदेश के विद्वानों को शब्दावली आयोग के दो उल्लेखनीय और अति महत्वपूर्ण योगदानों के बारे में पता चला – एक, हिन्दी शब्दसिन्धु ऑनलाइन कोश, और दूसरा, भारतीय भाषा कॉरपोरा प्रॉजेक्ट जिसमें हिन्दी वाक्यों का अन्य अनुसूचित भाषाओं में अनुवाद और व्याकरणिक अंकन अतर्निहित है।
प्रो. गिरीश झा ने वेबिनार के वैश्विक मंच पर श्रोताऔं के साथ हिंदी के कृत्रिम मेधा मॉडल को विस्तरित और विकसित करने के लिए के दो महत्वपूर्ण उपांग बताए- पहला, शैक्षणिक प्रौद्योगिकी पर आधारित और दूसरा, भाषा प्रौद्योगिकी पर आधारित। इस सिलसिले में उन्होंने कई महत्वपूर्ण सोपानों का भी वर्णन किया, जैसे, हिंदी में LLM बनाना, बहुत ही अधिक संख्या में हिंदी भाषाई डेटा का संकलन या निर्माण, LLM से युक्त इंटरफ़ेस और एजेंट का निर्माण (जो हिंदी के उपलब्ध टूल्स का प्रयोग करेंगे), नए एल्गोरिथ्म बनाना या पूर्व निर्मित को पुनः प्रशिक्षित करना,उच्चस्तरीय डाटा केंदों को स्थापित करना,इत्यादि। उन्होंने इस बात पर दुख प्कट किया कि हिंदी विश्व की चौथी सबसे बड़ी भाषा (उर्दू के साथ तीसरी) होते हुए भी इसकी इंटरनेट पर उपस्थित सिर्फ 0.1 प्रतिशत है, हालांकि, यूट्यूब पर 500 मिलियन भारतीयों की उपस्थिति हर्षदायक भी है। मशीनी अनुवाद (गूगल, माइक्रोसॉफ्ट बिंग द्वारा), स्पीच तकनीकी का प्रयोग (गूगल असिस्टेंट, अमेजन अलेक्सा द्वारा), ASR, OCR का प्रयोग हस्तलेख पहचाने के लिए,यूनिकोड फॉन्ट आदि निश्चिय तौर पर डिजिटल क्रांति के युग में हिन्दी के उज्ज्वल भविष्य के संकेतक भी हैं और मील-स्तंभ भी। उन्होंने भारत के प्रमुख शिक्षा संस्थानों जैसे, आई.आई.टी. चेन्नई, आई.आई.टी. दिल्ली, आई.आई.एस. बेंगलुरु, जे.एन.यू. सीडैक,आई.आई.टी. हैदराबाद, आई.आई.टी.एम. केरल, आई.आई.टी. मुंबई, जादवपुर विश्वविद्यालय, आई.आई.टी. पटना, का इस क्षेत्र में व्यापक योगदान का उल्लेख किया। जे.एन.यू. के कई मबत्वपूर्ण प्रोजेक्टों, जैसे, “विद्यापति” (हिंदी -मैथिली मशीन अनुवाद के लिए), भारतीय भाषा कॉरपोरा उपक्रम (100000 हिंदी वाक्य का 17 भाषाओं में अनुवाद और व्याकरण अंकन), संस्कृत- हिंदी मशीन अनुवाद, भारतीय भाषा शब्द संसाधन, के बारे में जानकारी साझा की।
भारत सरकार के उपक्रमों द्वारा निरिनित और विकसित “अनुवादिनी” MT (तकनीकी शब्दावली के साथ इंजीनियरिंग पाठ्यपुस्तकों के त्वरित अनुवाद के लिए), “भाषिणी” जैसे नितान्त उपयोगी सॉफ़टवेयर के बारे में भी बताया। माइक्रोसॉफ्ट ,गूगल, स्विफ्ट की अमेजन एआई,सैमसंग, एडोबी, उद्योगों के डिजिटल क्रांति को निरंतर लोकोपयोगी बनाने में उनके सहयोग और समर्थन पर हर्ष प्रकट किया।
श्री अवतंस कुमार, इंडिक अकैडमी की अमेरिकी शाखा के ट्रस्टी, ने राजभाषा को लोक भाषा बनाने में टेक्नोलॉजी का योगदान पर अपने वक्तव्य के क्रम में सर्वप्रथम ‘निज भाषा’ के महत्व को विद्यापति के ‘देसिल बयना सभजन मिट्ठा’ और भारतेन्दु हरिश्चंद्र के ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ एक बौद्धिक मंत्र के रूप में स्मरण करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि कैसे राजभाषा हिन्दी को टेक्नोलॉजी के माध्यम से सार्वभौमिक लोकभाषा बनाया जा सकता है और कैसे इस सार्वभौमिक लोकभाषा की समरूपता का सामंजस्य और तालमेल इसके मानकीकृत रूपों से भी बिठाया जा सकता है।
डॉ. पल्लब मिद्या, अध्यक्ष, एडीएक्स रिसर्च, ने ‘परंपरा और टेक्नोलॉजी का संगमः डिजिटल पेन’ के बारे में अति सरलता और स्पष्टता से समधाया। डॉ पल्लब मिद्या अपने इस डिजिटल पेन को निर्माण के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं और इसे पूरा करने के लिए अनुदान प्राप्त करने के लिए भी सतत प्रयत्नशील भी हैं। उन्होने इस डिजिटल पेन की संकल्पना ही भारतीय संदर्भों के लिए की है। इस बात की पुष्टि के लिए उन्होंने यह ज़ोर देकर बताया कि इस पेन का निर्माण आसानी से महज एक हजार रुपयों में हो सकता है। यह पेन एक आम पेन की तरह काम करेगा लेकिन इससे जो भी हिन्दी में लिखा जाएगा उसका भंडारण पेन में डाले गए एक चिप में आसानी से हो सकेगा। कोई व्यक्ति अपनी पूरे जीवन में जो भी इस पेन से हिन्दी में लिखेगा, वह इस पेन के चिप में ल सिर्फ़ सुरक्षित रहेगा, बल्कि उसे किसी अन्य कम्प्यूटर या फ़ोन या आई पैड जैसे उपकरणों में डाउनलोड भी किया जा सकेगा। डॉ. मिद्या 50 से अधिक अमेरिकी पेटेंटों के स्वामी हैं, अद्भुत मौलिक सोच के लिए कई संगठनों में अपने सहकर्मियों और सहयोगियों द्वारा सराहे जाते रहे हैं, इसलिए हम सभी को पूरा विश्वास है कि उनका यह डिजिटल पेन निकट भविष्य में हम सब के हाथों में, खासकर अर्थाभाव से जूझते भारत ही नहीं, पूरे विश्व के हर छात्र-छात्राएं के हाथ में होगा।
अपने संयोजकीय वक्तव्य में डॉ. मिथिलेश मिश्र, निदेशक, हिन्दी और दक्षिण एशियाई भाषाएँ, इलिनॉय विश्वविद्यालय, आरबाना-शैम्पेन (UIUC), अमेरिका, ने सबसे पहले डॉ. राकेश कुमार, शाखा अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति, इंडियाना, के प्रति इस विषय पर विश्व में पहली संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया और मूलतः इन बिन्दुओं पर ध्यान दिलाया- एक, डिजिटल क्रांति के युग में हिन्दी एक वैश्विक भाषा बनने के सोपानों को एक-एक कर पार कर रही है, अमेरिका के 22 से अधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में ही नहीं, बल्कि इंगलैंड, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जैसे आर्थिक रूप से अति उन्नत देशों में भी हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन चल रहा है। उन्होंने उस बात पर भी बल दिया कि अगर हिन्दी भाषियों के मन में भाषा के प्रति ममत्व भी जगेगा तो बहुत शीघ्र ही हिन्दी एक वैश्विक भाषा के रूप में विश्व के हर कोनें में प्रयुक्त होने लगेगी। डिजिटल क्राति की ऊर्जा से एक भावनात्मक क्रांति के भी उदय होने का युग आ गया है, सभी का साथ और सहयोग की आशा बनी रहेगी।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - इंडियाना शाखा
सेंट्रल इंडियाना के हिंदू मंदिर उत्सव में
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के मूल्यों और लक्ष्यों का प्रदर्शन
द्वारा:डॉ. कुमार अभिनव
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति - इंडियाना शाखा को 10 सितंबर, 2023 को सेंट्रल इंडियाना के हिंदू मंदिर के वार्षिक मंदिर उत्सव में एक बूथ रखने का अवसर दिया गया। हिंदू मंदिर द्वारा हर साल मंदिर उत्सव आयोजित किया जाता है और यह एक विशाल अयोजन है जो सैकड़ों लोगों को आकर्षित करता है। संगीत और नृत्य प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं। स्वादिष्ट विशुद्ध भारतीय भोजन और पेय पदार्थ परोसे जाते हैं। भारतीय कला एवं संस्कृति को प्रदर्शित किया जाता है।
मंदिर उत्सव का प्रदर्शन "कार्निवल" शैली (अधिक बाहरी खुली हवा) का था, जिससे उपस्थित लोगों को सभी बूथों और खाद्य स्टालों को देखने के लिए अधिक दृश्यता मिलती थी। हमें मुख्य मंडप के बाहर एक बूथ दिया गया था। हमारा बूथ डॉ. कुमार अभिनव द्वारा अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति बैनर और डॉ. राकेश कुमार द्वारा प्रदान की गई अन्य प्रदर्शन सामग्री के साथ स्थापित किया गया था। बूथ का प्रबंधन डॉ. अभिनव द्वारा किया गया था और आदित्य शाही, राघवेंद्र और श्वेता भदोरिया ने उनका कुशल समर्थन किया था।
हमने अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के उद्देश्यों, मूल्यों और लक्ष्यों के बारे में जानकारी प्रदर्शित की। हमारे बूथ के स्थान को देखते हुए हमारी उपस्थिति उचित रही। सबसे आश्चर्यजनक और सुखद पहलू स्थानीय अमेरिकी (गैर-भारतीय) लोगों की हिंदी और भारतीय संस्कृति सीखने में दिखाई गई रुचि थी। इनमें से अधिकांश लोगों का भारत से कोई न कोई संबंध या रुचि थी और इसलिए हिंदी सीखने की इच्छा थी। अधिकांश उपस्थित लोग हिन्दी सीखने में रुचि रखते थे। हमने उन्हें अपनी वेबसाइट और ऑनलाइन हिंदी शिक्षण कार्यक्रम के लिंक प्रदान किए।
उत्सव में उपस्थित लोगों से हमें जो प्रतिक्रिया मिली वह यह थी कि उद्देश्यों के संदर्भ में हमारे संदेश को अधिक केंद्रित और स्पष्ट होना चाहिए। अधिकांश उपस्थित लोग हिंदी सीखने में रुचि रखते थे और हमारे संदेश और प्रदर्शन सामग्री में यह प्रतिबिंबित होना चाहिए। लोगों को अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति और उसके मूल्यों और लक्ष्यों के बारे में सूचित करने के लिए यह सही मंच था। यह आयोजन अच्छी तरह सफल रहा और हमें उम्मीद है कि हम अगले साल भी इसमें हिस्सा लेंगे।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - इंडियाना शाखा के स्वयंसेवक और काउंटर पर आए दर्शक
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कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अन्तर्राष्ट्रीय हलचल : हरियाणा लेखक मंच का
दूसरा दो सत्रीय वार्षिक सम्मेलन, भारत
प्रस्तुति : जयपाल
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हरियाणा हरियाणा लेखक मंच का दूसरा वार्षिक सम्मलेन 15 अक्टूबर 2023 को कुरुक्षेत्र में दो सत्रों में आयोजित हुआ। मंच के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक भाटिया ने वक्ताओं का परिचय देते हुए वर्तमान समय में दोनों विषयों की जरूरत पर प्रकाश डाला।
लगभग एक सौ साहित्यकारों की उपस्थिति में पहला विचार-सत्र, आज के दौर में लेखक के सरोकार' विषय पर केन्द्रित था। विषय-प्रस्तावक डॉ. कृष्ण कुमार (एसोसिएट प्रोफेसर) ने कहा कि जगत-गति पूँजी से संचालित है, मूल्यों से नहीं। जब तक यह मूल्यों से संचालित नहीं होगी, तब तक लेखक लिखता रहेगा। साहित्य का सरोकार प्रतिरोध में ही निखरता है, तभी वह साहित्य को मनोरंजन और उन्माद में जाने से बचा सकता है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक तर्क, विवेक की रक्षा करता है और तर्क को उन्माद में नहीं बदलने देता। डॉ. कृष्ण कुमार ने मृणाल सेन की फिल्म 'कलकत्ता-71', डॉ. शम्भुनाथ की पुस्तक 'संस्कृति की उत्तरकथा', आलोक धन्वा की कविता, संजीव की कहानी 'बाज के ऊपर चिड़िया की सवारी' आदि का उल्लेख करते हुए कहा कि लेखक को जन- शक्ति को भी पहचानना चाहिए, ताकि दोनों मिलकर इस बर्बर समय का मुकाबला कर सकें।
सत्र के मुख्य वक्ता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुभाष चन्द्र ने लेखकों के सामने अनेक सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मनुष्य-निर्माण की परियोजना से लेखक जुड़ा है या नहीं, यह बड़ा सवाल है। क्या मेरा सोचने का तरीका जन-निर्माण योजना का हिस्सा बन सकता है कि नहीं?-लेखकों को सोचना होगा। टॉलस्टॉय की कहानी का उदाहरण देते हुए डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि आज लेखक बिना पीड़ा के कुछ पैदा करना चाहता है, तो वह पीड़ा का आनंद भी नहीं जान सकता। हमारे सारे सौन्दर्यबोध को अवमूल्यित किया जा रहा है। साहित्य पाठक की। भावनात्मक जरूरतों को पूरा करते हुए उनमें विवेक जगाता है, यह उसकी ताकत है। लेखक का काम सच बोलना, उलझी बात को सुलझाकर पाठक को बताना और विकृति के प्रति सचेत करते हुए पाठक को परिष्कृत करना है। यदि आप मनुष्य हैं, तो उसकी स्वतंत्रता का हनन करने वाले कारकों के खिलाफ कार्यवाही करनी होगी। आज अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल सबसे बड़ा सवाल है। अपने परिवेश में से ही लेखक अपनी भूमिका तलाशता है और समाज को देखने और उससे जुड़ाव से ही लेखकीय सरोकार निकलते हैं। अगली पीढ़ी द्वारा साहित्य को ग्रहण करने के उपाय भी विकसित करने होंगे। हमारे सामने इतना झूठ फैला है कि पाठक को उससे बचाने की भी बड़ी चुनौती है. सत्र में ओम बनमाली, डॉ. गुरदेव सिंह देव, हरपाल सिंह, कमलेश चौधरी, अनुपमा शर्मा आदि के सवालों का जवाब देते हुए डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि पूँजीवाद ने हमेशा मिथक, झूठ और कर्मकांड को उठाया है। अब लोग अधिकारों के प्रति सचेत होते जा रहे हैं। साहित्य सार्वजनिक हो चुका है, लेखक के लिए अब कोई फरमान जारी करना बेमानी है छोटे-छोटे हीरो हर गली में मिल जाएँगे, सो लेखन-विषय की खोज के लिए कहीं अलग से भटकने की जरुरत नहीं। जो अपने समय में अप्रासंगिक हो गया या जो लेखक बदल नहीं रहा, उस पर बात करने का कोई लाभ नहीं। सत्र की अध्यक्षता अमृतलाल मदान ने की, संचालन डॉ. बी मदन मोहन और अजय सिंह राणा का रहा और धन्यवाद जयपाल ने किया।
मंच द्वारा हरियाणा की पाँचों साहित्य अकादमियों को संयुक्त कर बनाई एक अकादमी को बदलकर पुनः पाँचों अकादमियों को पहले की तरह बरकरार करने का प्रस्ताव रखा गया, जो सर्वसम्मति से पारित हुआ।
दूसरे विचार-सत्र में विमर्श का विषय था- 'वर्तमान दौर के लेखन में स्त्री-संघर्ष की अभिव्यक्ति'। सामाजिक कार्यकर्ता, प्रोफेसर मनजीत राठी (रोहतक विश्वविद्यालय) ने कहा कि जीवन में समाज के पटल पर स्त्रियाँ जो मुद्दे उठाती रही हैं, वही उनके संघर्ष और लेखन का भी केंद्र बनते हैं। 'सीमन्तनी उपदेश', बहिनाबाई की आत्मकथा, सुलताना का सपना, श्रृंखला की कड़ियाँ के प्रसंगों आदि के ज़रिए डॉ. मनजीत ने कहा कि परिवार तथा विवाह संस्था के ढांचों की आलोचना व पुनर्निरीक्षण तथा हिन्दू शास्त्रों को चुनौती 19 वीं सदी के भारतीय नवजागरण काल से ही स्त्री-लेखन का केंद्र रहे हैं। 20वीं सदी में भूख, गरीबी, हिंसा, रूढ़िवाद व रीति-रिवाज़ तथा यौनिकता से जुड़े स्त्री-संघर्ष ने यह स्थापित किया है कि लैंगिक मुद्दों को शामिल किए बिना सामजिक न्याय संभव नहीं। स्त्री-लेखन ने नए व पुराने के बीच टकराव को नए आयाम दिए हैं और नैतिकता की परतें खोलकर रख दी हैं। उन्होंने कहा कि स्त्री के दर्द और अकेलेपन को समझे बिना स्त्री-संघर्ष की बात अधूरी है। स्त्री-संघर्ष एक अधिक मानवीय, न्यायप्रिय और सर्वसमावेशी समाज का निर्माण करता है और व्यापक मानव-मुक्ति के द्वार खोलता है।
सत्र की मुख्य वक्ता, कथाकार प्रोफेसर प्रज्ञा (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि लेखन का कोई जेंडर नहीं होता, न ही संघर्ष कोई इकहरी इकाई होती है। पितृसत्ता, नैतिकता और परंपरा की अमरबेलें स्त्री-जीवन से हमेशा चिपटी रही हैं। 'कायांतर' (जयश्री राय), 'रेणुका' और 'अलाव' (सुशील टाकभौरे), चार बहनें शीशमहल की' (नासिरा शर्मा) 'स्याह घेरे' (प्रज्ञा), आदि के उद्धरणों द्वारा डॉ. प्रज्ञा ने स्पष्ट किया कि समानता, सुरक्षा और स्वावलंबन की चाह में स्त्री को सदा भूख, अपमान और शोषण से गुजरना पड़ता है। स्त्री अब पितृसत्ता को चुनौती देने लगी है। लेकिन उसके प्रति पूर्वाग्रह अभी भी बरकरार हैं। उसकी समझ और संघर्ष को कमतर करके देखने की मनोवृत्ति अब भी सक्रिय है। वह देश के प्रधानमन्त्री को तो चुन सकती है, लेकिन जीवनसाथी को नहीं। ओम बनमाली, कमलेश चौधरी, कुलदीप, दीपक वोहरा, गुरदेव सिंह देव आदि के सवालों का जवाब देते हुए डॉ. प्रज्ञा ने कहा कि स्त्री-मुक्ति की बात एक यूटोपिया की तरह दिखाई देती है, ऐसा यूटोपिया जिसके लिए समाज आज भी संघर्षरत है। इक्कीसवीं सदी की कहानी स्त्री-रुदन से आगे बढ़कर तर्क से हर विषय पर सशक्त कहानी रच रही है। स्त्री कथाकार साहित्य की उस बाड़ेबंदी का जवाब रच रही है जिसके अनुसार स्त्री-लेखक अपने अनुभवों पर ही अच्छी कहानी लिख सकती हैं। सत्र के अध्यक्ष डॉ. रतन सिंह ढिल्लों ने कहा कि हरियाणा में नारी-आन्दोलन को सुधारवादी नहीं, इंकलाबी होना पड़ेगा। संचालन ब्रह्मदत्त शर्मा और राधेश्याम भारतीय ने तथा धन्यवाद मदनलाल मधु ने किया. सम्मेलन में पंकज शर्मा, अरुण कुमार, सतविंदर राणा, अरुण कैहरबा, अशोक बैरागी का विशेष योगदान रहा।
इस अवसर पर 'शुभ तारिका' पत्रिका (सं.उर्मि कृष्ण) सहित 'आसमां तेरी मुट्ठी में' (रेखा शर्मा), 'बारिश दी बूंदां' (पंजाबी, सुखविंदर मान), 'मौसम रोज़ बिगड़ता है' (स्नेह लता), 'अपने अपने मलाल' (नवरत्न पांडे), 'चाँद अलसाया हुआ हैं' (रोजलीन), 'पछुआ बनी पुरवाई' (अंग्रेजी से अनूदित, दिनेश दधीचि), 'पंटरबाज' (विनोद शर्मा दुर्गेश), 'मनमंच के रंग' (अमृतलाल मदान) ' बाढ़ की त्रासदी' (जय भगवान् सिंगला), महासमर की सहस्रधारा' (हरिश्चंद्र झंडई) पुस्तकों का विमोचन किया गया और मंच द्वारा आयोजित युवा कविता-लेखन प्रतियोगिता के छह विजेताओं कमल किशोर, किंशुक गुप्ता, विश्व वर्मा, डिंपल सैनी, गरिमा नंद्वाल, वीरेन्द्र राठौर को पुरस्कृत किया गया। पुस्तक-प्रदर्शनी भी लगाई गई। मंच के अध्यक्ष कमलेश भारतीय अस्वस्थता के कारण उपस्थित नहीं हो पाए।
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हरियाणा लेखक मंच का दूसरा दो सत्रीय वार्षिक सम्मेलन, भारत ***
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अपनी कलम से
" आदिवासी हिंदी कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि"
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द्वारा - डॉ. संजय राठोड़
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डॉ. संजय राठोड़ औरंगाबाद, महाराष्ट्र के रहने वाले हैं। ये औरंगाबाद, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर हैं।
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आदिवासी हिंदी कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि
इस देश के आदिवासियों को समझने के लिए हमें सबसे पहले भारतीय समाज की व्यवस्था को समझना पड़ेगा। हमारा भारतीय समाज दो तरह का है- एक मुख्यधारा में बसा हुआ समाज और दूसरा हाशिये का समाज। मुख्यधारा के बाहर वे लोग आते हैं जिन्हें हम दलित, आदिवासी, घुमंतू कहते हैं। "जाती जैसी हमारे यहाँ की विशिष्ट सामाजिक संरचना की एक छोटे तबके के लिए गैरमौजूदगी और एक बड़े तबके के लिए उसकी अत्यधिक सदृश्यता "। इस व्यवस्था का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा है। आदिवासी हरी - भरी धरती का दावेदार होकर भी वह जंगल से बाहर है। आज के बाजारीकरण के दौर में इन जनजातियों की पहचान कराना हमारे लिए एक चुनौती बन गयी है। लोक साहित्य में इन जनजातियों का साहित्य अधिकतर मौखिक रूप में प्राप्त होता है। हरिराम मीणा लिखते हैं
," भारतीय साहित्य के संदर्भ में जब आदिवासी साहित्य को देखा जाता है तो मौखिक साहित्य की एक लंबी और समृद्ध परंपरा हमारे सामने आती हैं।" आज प्रादेशिक भाषा एवं बोलियों में लिखा जा रहा साहित्य चर्चा के केंद्र में आ रहा है। इसलिए आज आंचलिक बोली में लिखे गए साहित्य का अनुवाद होना बहुत ही जरूरी बन गया है। इसके माध्यम से हम उस समाज की संस्कृति एवं बोली को समझ सकतें हैं। वर्तमान में इन पर संकट मंडरा रहा है।
आदिवासी साहित्य मूलतः आदिवासी और गैर आदिवासी साहित्यकारों द्वारा लिखा जा रहा है। इनके लेखन के केंद्र में आदिवासी जीवन दर्शन है। इनके काव्य लेखन के प्रेरणा स्त्रोत - बिरसा मुंडा, टंट्या भील, कर्मा भगत, गुरु गोविंद बंजारा, तिलकामांझी, झलकारी बाई आदि रहें हैं। इसलिए आदिवासियों की कविता में उनका जीवन संघर्ष बार-बार उठ रहा है। भाव के साथ कविता ने अपनी विरासत की वाणी को भी जिंदा रखा है। इसलिए सामूहिक भाव बोध आदिवासी कविता की विशेषता बन जाती है। आर्थिक उदारीकरण की नीति का प्रभाव आदिवासी कविता पर अधिक हुआ है। 1990 के बाद इसका गहरा असर हमें आदिवासी समाज पर दिखाई देता है। इस नीति ने बाजारवाद का एक नया रास्ता खोल दिया। मुक्त बाजार या मुक्त व्यापार की संकल्पना समाज के सामने आई। इसका काफी असर आदिवासी समाज पर हुआ है। आदिवासी जमीन, जंगल और जल के दावेदार होकर भी जंगल से बाहर हो गए। इसके कारण कई आदिवासियों को दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे अजनबी महानगरों में काम की तलाश में आना पड़ा। आज जो भी आदिवासी गांव या जंगलों में बचे हुए हैं वे विस्थापन के कगार पर खड़ें हैं। इन परिवेश से प्रभावित होकर आज के नए आदिवासी हिंदी कवि भी जागृत हुए है। इसलिए आदिवासी हिंदी कविता में आदिवासी जीवन दर्शन का अधिक महत्व है दिखाई देता है। कल्पना, सौंदर्य, रोचकता को वे अपनी कविता में स्थान नहीं देना चाहतें हैं। वास्तविक आदिवासी के जीवन के विविध पहलुओं को कविता में देखा जा सकता है। जैसे: विस्थापन की समस्या,अस्मिता की पहचान, पर्यावरण को बचाने की ललक,अर्थनीति का दमन चक्र, आदि का वर्णन सहज रुप में प्राप्त होता है। अब आदिवासी लोग अपने विस्थापन के षडयंत्र को अच्छी तरह से समझ रहें हैं। हरिराम मीणा अंडमान निकोबार में बसे हुए आदिवासी की स्थिति को उजागर करते हैं। कवि उनकी खत्म होती हुई नस्लों पर चिंता व्यक्त करते हैं। जमीनों से उनकी जो बेदखली हो रही है उस पर वे कहते हैं
" कैसे करोगे साबित
सभ्यता की इस अदालत में
की यह भौम तुम्हारी थी....। " २
प्रकृति के प्रति आदिवासी का गहरा लगाव रहा है। कवियों के लिए आदिवासी विमर्श एक सामाजिक आंदोलन बन गया है, इसलिए आदिवासी कवियों की नजरें बिरसा के उलगुलान पर, संथाल विद्रोह पर, सिद्धू कानू को दी गई फांसी आदि पर टिकी हुई है। वे आदिवासियों का संघर्ष, विस्थापन, व्यवस्था-शोषण आदी को चित्रित करतें हैं। महाराष्ट्र का कवि वाहरू सोनवणे ने सदियों से चली आ रही भ्रष्ट व्यवस्था पर सवाल उठातें हैं। उनकी 'स्टेज' नाम की कविता इस भ्रष्ट व्यवस्था का पर्दाफाश करती है। इसलिए उनकी कविता में हाशिये पर पडे हुए समाज की अस्मिता, अधिकार, अपमान, पीड़ा आदी सहज रुप में व्यक्त होती है। इसके लिए कवि स्थापित समाज को जिम्मेदार मानता है, जिन्होंने सदियों से वंचित लोगों को समाज की मुख्यधारा में आने ही नहीं दिया। 'स्टेज 'कविता में स्टेज एक ऐसा मंच है जिस मंच पर केवल स्थापित व्यवस्था से जुड़े हुए लोग ही दिखाई देते हैं। वंचित समाज के लिए यह मंच कभी अवसर प्रदान करता ही नहीं है। इसलिए कवी कहतें हैं ,
"हम स्टेज पर गए ही नहीं ,और हमें बुलाया भी नहीं
उंगली के इशारे से, हमारी जगह,
हमें दिखाई गई हम वहीं बैठे रहे ,हमें शाबाशी भी मिली
और वे स्टेज पर खड़े होकर, हमारा दुख, हमें ही बतातें रहें
हमारा दुख अपना ही रहा, जो कभी उनका हुआ ही नहीं । " ३
आदिवासियों का प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति लगाव दिखाई देता है। आदिवासी समाज प्रकृति के सानिध्य में रहने वाला समाज है। वैसे तो उनके जीवन जीने की मूल जड़े धरती में आर-पार धंसी हुई है। इसलिए यह हरी भरी धरती उनके लिए अन्नदाता के समान है। प्रकृति कुदरत की देन है। उसने मानव को बहुत कुछ दिया लेकिन हमने उसके बदले में क्या दिया है उसे ? हमनें केवल उसके साथ छेड़खानी ही अधिक की है। परिणाम स्वरूप आज के समय में उसका एक रौद्र रूप हमारे सामने उभर रहा है ,जिसका असर सभी मानव जगत पर हो रहा है। आदिवासी समाज इस संकट को झेल नहीं पा रहा है, वह प्रकृति के प्रति सचेत होकर कहने लगता है-
क्या तुमने कभी देखा है, पर्वत को रोते ?
उसके दृश्य की आवाज, क्या कभी सुनी है ? उसके टुकड़े-टुकड़े होकर,
बिखर जाना एक बूंद पानी के लिए , तड़प- तड़प जाएंगी, हमारी पीढियाँ
इसलिए , मैं सच कहती हूँ ?
इस समय के पहरेदारों.......।"४
इससे स्पष्ट होता है कि आदिवासी समाज नें प्रकृति को अपना माना है ,उनके लिए वे हमेशा प्रतिबद्ध है। उनकी यह प्रतिबद्धता ही पर्यावरण को बचाना चाहती है।
निर्मला पुतुल सामाजिक सभ्यता में आदिवासी स्त्री के अस्मिता के सवालों को उठाती है। निर्मला पुतुल पर अंबेडकरवादी विचारधारा का प्रभाव दिखाई देता है। प्रोफेसर ऋषभ देव शर्मा ने लिखा है कि "अंबेडकरवादी कविता के उन नायकों में निर्मला पुतुल का महत्वपूर्ण स्थान है उन्होंने केवल दलित जीवन को ही नहीं बल्कि दलितों में भी दलित अर्थात आदिवासियों और स्त्रियों के जीवन संघर्ष को अपनी कविता का विषय बनाया है।"
आदिवासी साहित्य प्रकृति के सौंदर्य को महत्व देता है। क्योंकि प्रकृति और मानव का गहरा संबंध है। लेकिन शासन -परियोजनाओं के कारण आदिवासियों का पुनर्वसन शुरू हो गया है। गांव के परिवेश को छोड़कर ये लोग अब शहरों की अजनबी दुनिया में प्रवेश करने लगें हैं, लेकिन यहाँ आकर उन्हें क्या मिलता है। मजदूरी के नाम पर शोषण का ही मुकाबला अधिक करना पड़ता है। महानगरीय जगमगाती रोशनी में ये लोग परेशान हैं।इसके खिलाफ वे लगातार लड़ रहें हैं। निर्मला पुतुल की कविता पुरुष की सोच की मानसिकता से लडती है। 'माँ कविता में अपनी जमीन को तलाशती हुई बेचैन स्त्री की व्यथा व्यक्त हुई है।आदिवासी सांवली लड़कियों के बारे में उनकी कविताएं काफी बोलने लगती है। निर्मला पुतुल सभ्य समाज की मानसिकता का निंदा करती है। यह समाज आदिवासियों के रंग- रुप को लेकर मजाक उड़ाता है। निर्मला पुतुल पुरुष के शरीर की अपेक्षा नारी मन को अधिक महत्व देती है। वह तन के भूगोल के परे एक स्त्री के मन की गांठे भी खोलना चाहती है। वह कहती है,
" तन के भूगोल से परे / एक स्त्री के
मन की गांठें खोलकर /कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास । "६
निर्मला पुतुल पुरुषवादी सोच को नकारते हुए कहती है ,
क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए.........?
एक तकिया
कि कहीं से थका - मांझा आया और सिर टिका दिया ।"७
इस प्रकार पुतुल ने सामाजिक व्यवस्था में आदिवासी स्त्री की चुप्पी को तोड़ने का काम किया है। विकास के नाम पर आदिवासियों के लिए विस्थापन की समस्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी हैं। राष्ट्रीय मार्ग,रेल लाइने,खनन- उद्योग,बांध -परियोजना,सडकों का विस्तार आदि कारणों से विस्थापन की समस्या तेजी से बढ़ रहीं है। उन्हें अपने जंगल - जमीन से खदेड़ने की कोशिश हो रही है। इसकी वजह से उनके जीविका के आधार भी समाप्त हो रहें हैं। इस दौर में आदिवासी पढ़ लिख रहें हैं, लेकिन आज भी उनकी स्थिति इतनी अच्छी नहीं बन पाई है। कवि सूर्यभान गुप्त की 'पेड़ अब भी आदिवासी है' कविता में आदिवासी और प्रकृति के गहरे संबंध उत्पन्न हुए हैं। कवि समय के साथ आदिवासी जनजाति में भी बदलाव चाहतें हैं। वे कहतें हैं,
"हो गई सदियाँ मगर फिर भी है
अजूबा पेड़ अभी आदिवासी है
पत्तियाँ अब तक पहनते हैं,
मुड़ हो, नंगे ही रहते हैं
घुट रहा है जिंदगी का दम
पेड़ इतने हो गए हैं कम
को चुकी अपना हरापन जो
उन अभागी जर्द नस्लों की उदासी है
पेड़ अब भी आदिवासी हैं। " ८
इस प्रकार आदिवासी कवियों की कविताऍं शासन की नीति और शोषकों की साजिशों के खिलाफ आवाज उठाती है। वे ओढी हुई सभ्यता को नहीं चाहते हैं, इसलिए उन्होंने बिरसा मुंडा को फिर से इस हरी भरी धरती पर आने की कामना करते हैं। एक आदिवासी कवि ने ठीक ही कहा है कि ,
उठो कि अपने अंधेरे के खिलाफ उठो
उठो अपने पीछे चल रही साजिशें के खिलाफ
अब उन्हें पता लग गया है ............!
आज ना घने बेहड हैं
ना तू है....
है केवल बीहड़ों में फैलता असंतोष ।
सच बताऊॅं...
अब हमें जल्दी है
नहीं चाहते अब हम ओढी हुई सभ्यता
बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा ।" ९
इस प्रकार आदिवासी कविता के केंद्र में आदिवासी लोगों के जीवन का संघर्ष हैं। ऋतुराज कोयला खदान में काम करने वाले आदीवासी की स्थिति को उजागर करते हैं। ऋतुराज बाजार विरोधी है, क्योंकि साम्राज्यवादी बाजार में गरीब आदिवासियों एवं सामान्य आदमी कहाँ टिक पा रहें हैं। ऋतुराज की कविता में साधारण आदिवासी का संसार व्यक्त होता है। जंगल के दावेदार' कविता में जंगलों के प्रति आस्था दिखाई देती है। तो दूसरी ओर शहरों की अमानुष दुनिया भी नजर आती है। इस बदलती दुनिया में वे आदिवासी की स्थिति को देखते हैं -
"उन्हें घर नहीं चाहिए
घर में अंधेरा होता हैं
अकेले व्यक्तियों का
वे घर की बजाय पेड़ चाहते हैं
जिस पर तरह तरह की चिड़ियाँ बैठेंगी
और उड़ जाएंगी........।"
निर्मला पुतुल की कविता में आदिवासी स्त्री की शोषण की स्थिति उभरती है। गांव से लड़कियों का शहरों में पलायन हो रहा है, लेकिन उनके लिए शहर असुरक्षित है। चमचमाती रोशनी में उन्हें शोषण का डर लगने लगता है । बाजार की बदलती अर्थ नीतियों ने आदिवासी लड़कियों को बाजार में आने के लिए मजबूर कर दिया। आज शहरों में आदिवासी लड़कियों को श्रम मंडी में लाकर खड़ा कर दिया जा रहा है जहां पर उनका शोषण हो रहा है। दिल्ली जैसा शहर भी इसे अलग नहीं हैं। निर्मला पुतुल कहती है,
" कहाँ हो तुम माया ? कहाँ हो
दिल्ली नहीं है हम जैसे लोगों के लिए
क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता माया
कि वह ऐसा शमशान है जहाँ
जिंदा दफन होने के लिए भी लोग लाइन में खड़े हैं ? "
आदिवासी हिंदी कविता शोषकों के प्रति ऐलान करती है। शोषण के खिलाफ ऐलान करना आदिवासी चेतना की विशेषता है। आज हम 21वीं सदी में भारत के प्रगतिशील होने की बात करते हैं, लेकिन आदिवासी जनजातियों के अधिकार पर सवाल उत्पन हो रहें हैं। आदिवासी की मूल समस्या अपने अस्तित्व को टिकाने की है। पारंपरिक साहित्य से इनकी मान्यताएं अलग होगी। आदिवासी जनजाति बड़े संकट से जूझ रही है। जमीन से बेदखल होकर वे विस्थापन के कगार पर खड़े है। बांध परियोजना, सड़कों का निर्माण, रेल लाइन, खदान व्यवसाय, शहरीकरण, आदि से आदिवासियों को जीवन जीना मुश्किल हो गया है। अनुज लुगुन की कविता बाजार और पूंजी - पतियों के चपेट में आये आदिवासी का चित्रण करती है। 'लड़ रहें हैं आदिवासी' कविता में माफियों की कुल्हाड़ी से कटते हुए वृक्ष और बन रहें कंक्रीट के जंगलों को वे 'अघोषित उलगुलान' कह देतें हैं। उलगुलान यानी आंदोलन। एक ऐसा आंदोलन निर्माण करते हैं जिसमें वे आदिवासी के सरोकार को देखते हैं। इसलिए जल, जंगल और जमीन से जुड़े आदिवासी की व्यथा उन्हें बार-बार सताती रहती है। वे कहते है,
"अघोषित उलगुलान में कट रहे हैं वृक्ष
माफियों की कुल्हाड़ी से और
बढ़ रहे हैं कंक्रीटों के जंगल"
इस प्रकार आदिवासी कवि अपने जल,जंगल और जमीन को बचाने की बात करते हैं। आज के इस तांत्रिक युग में भी वे प्रकृति के प्रति सजग रहना चाहतें हैं। क्योंकि प्रकृति ही हमारी देवता हैं। प्रकृति के सानिध्य में ही मानव का पालन पोषण हुआ है। हमनें भले ही विश्व को छूने की कोशिश क्यों न कर ली हो ? लेकिन आनेवाले दिनों में हमें प्रकृति के प्रति हमें सजग रहना ही पड़ेगा।
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“तू तो मैं में, मैं में तू तू”
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द्वारा -डॉ. सुरेंद्र नेवटिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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तू तो मैं में, मैं में तू तू
जब से तेरी लगन लगी है कुछ भी और नहीं भाता।
भाना तो अब दूर जगत से टूट गया झूठा नाता।।
रोम - रोम में हुलक मारती पुलक न जाने क्या कर दे।
एक झलक की चाह लिए यह ललक न जाने क्या कर दे।।
जब - जब मैं तुझमें डूबा हूँ क्षण भंगुरता भूल गया।
प्रकृति सामने रही और मैं हर सुन्दरता भूल गया।।
ऐसा रमा कि द्वैत स्वयं अद्वैत दिखाई देता है।
महासिन्धु में उठी लहर सा वैत दिखाई देता है।।
मुझको तुझमें मैं दिखता है, तू मेरी रग - रग में है।
लगता है दो नहीं एक ही सत्ता इस जग मग में है।।
तेरी पूजा मैं करता हूँ वह मेरी ही पूजा है।
सच कह दूँ ब्रह्माण्ड काण्ड में अपने सिवा न दूजा है।।
इसीलिए मैं आत्ममुग्ध हो अपने पर इतराता हूँ।
जीवित मोक्ष पा लिया मैंने बार - बार बल खाता हूँ।।
अब चाहे अल मस्त कहे जग अस्त कहे या पस्त कहे।
ध्वस्त कहे आश्वस्त कहे विश्वस्त कहे या त्रस्त कहे।।
मैं भी मैं हूँ तू भी मैं हूँ वह भी मैं के अन्दर है।
मैं में असत् जगत की माया - माया कितनी सुन्दर है।।
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द्वारा - डॉ.महेन्द्र अग्रवाल
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डॉ.महेन्द्र अग्रवाल जी शिवपुरी, मध्य प्रदेश में रहते हैं। इनकी दस व्यंग्य संग्रह, दो व्यंग्य उपन्यास, नौ ग़ज़ल संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक नवगीत संग्रह सहित ग़ज़ल विधा पर आठ आलोचनात्मक व तीन अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित है। इन्हें मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी व मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत किया गया है।
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“पहली ग़ज़ल”
शादी तेरी दावत पे इक पंछी भी दाने पर नहीं आया
अभी तक तीर कोई भी निशाने पर नहीं आया
तुम्हारी रहबरी तुमको मुबारक़ हो मेरे आक़ा
हमारा क़ाफ़िला अब तक ठिकाने पर नहीं आया
हमारी मुफ़लिसी देती है बच्चों को चने अब तक
हमारे घर में कोई भी मखाने पर नहीं आया
बहू बेटे के आसुर्ता नहीं रहना, समझता था
बुढ़ापा काम करने कारखाने पर नहीं आया
अभी इस हैसियत में है हमारे नाम का सिक्का
ख़रे क़ल्दार सा चलता है आने पर नहीं आया
नहीं आया ‘सुदर्शन चक्र चलने का समय अब भी
मेरा धीरज अभी ‘शिशुपाल ताने पर नहीं आया
"दूसरी ग़ज़ल"
डाह रिश्तों में कुछ ऐसी मरी भी होती है
आग लगती है धुंए से भरी भी होती है
याद आती है उसी की जो अभी है दिल में
बेल उठती है वही जो हरी भी होती है
रोज़ लगता है यही आपसे मिलकर हमको
दोस्ती आजकल बाज़ीगरी भी होती है
सीख आया हूं मैं अहले सुखन की सुहबत में
शायरी लफ़्ज़ों की कारीगरी भी होती है
ज़िन्दगी यार बुज़ुर्गां के नए सपनां सी
ज्यूं कहानी में अभी तक परी भी होती है
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द्वारा - श्री हरि प्रसाद राठी
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श्री हरिप्रकाश राठी जोधपुर, राजस्थान से हैं। इस कहानी में उन्होंने मानव की भावनाओं को भी बहुत ही अच्छी तरह अभिव्यक्ति दी है। इनकी रचना में मुहाबरों और लोकोक्तियों का सुंदर एवं उचित प्रयोग है।
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निष्कर्ष
यह पेड़ों पर नई कोपलें आने का मौसम था। इन दिनों पूरे शहर की रंगत बदल गई थी। यही वह समय था जब दिन साफ़-शफ्फाक एवं रातें चांदनी में नहाई हुई लगती थी। सूरज जो अब तक ठिठुरन में दुबका हुआ था यकायक तेवर दिखाने लगा था। इसी के चलते समूची प्रकृति की कैफ़ियत ऐसी बन गई थी जैसे पुराना लबादा छोड़ नया चोगा पहने किसी फकीर को नवबोध हुआ हो।
मेरे घर के बाहर भी सुबह की उजली धूप उतर आई थी। इस धूप में लेकिन वह गरमी कहाँ थी जो हमारे घर के भीतर डाइनिंग टेबल पर छिड़ी चर्चा से उठ रही थी।
हर दिन ब्रेकफास्ट पर हमारे यहां किसी न किसी विषय पर चर्चा छिड़ जाती थी। यह विषय कभी पारिवारिक समस्या से सम्बंधित होता था, कभी मित्र-रिश्तेदारों को लेकर तो अनेक बार सामाजिक-राजनैतिक एवं आध्यात्मिक मुद्दों तक पर लम्बी गुफ्तगू होती थी। हमें एक-दूसरे की खोपड़ी खुजाने में अद्भुत आनन्द मिलता था। जैसे पानी गर्म होने पर भाप उठती है, हमारे यहाँ ब्रेकफास्ट भीतर उतरते ही बतियाने का खमीर उठता है। इस बातचीत में अनेक बार खेमे तक बन जाते हैं, कुछेक बार तो वाकयुद्धों तक की नौबत आ जाती थी। एक बार ऐसी ही बहस में मैं हावी हुआ तो प्रज्ञा दो दिन तक नहीं बोली। मैंने मन ही मन कहा, 'मत बोल ! मेरी बिल्ली मुझी से म्याऊं।' वह कौन-सी कम थी, दो दिन वे डिशेज बनाई जो मुझे जरा पसंद नहीं थी। तीसरे दिन मुझे लुगाई की ताकत का अहसास हुआ। मैंने यह कहकर हथियार डाल दिए 'यार ! उस दिन तू ही ठीक थी' तब जाकर स्थितियाँ सामान्य हईं। बड़े-बड़े विद्वान तक जब स्त्री के आगे बौने बन जाते हैं तो मैं किस खेत की मूली हूँ? अनुभवी विज्ञ यूँ ही थोड़े कह गए हैं, जो सुख चावै जीव का तो मूरख बणकर जी।
बहुधा हर चर्चा कहीं न कहीं कोई सार ढूंढ लेती है। आज के मंथन में लेकिन अमृत अब भी नदारद था। इतनी बहस के बाद भी कोई उत्तर नहीं मिल रहा था। विषय फिर इतना दिलचस्प था कि जिज्ञासा थमने की बजाय परवान चढ़ रही थी।
मेरे कुनबे में या यूं कहूँ आज की बहस में कुल आठ लोग थे। मैं, प्रज्ञा, बेटा- बहू, पोता-पोती बने छः एवं चूंकि आज बेटी-दामाद भी बनारस से आए हुए थे, आठ कुर्सियों वाली डाइनिंग टेबल फुल थी। हमारे यहाँ बैठने की कुर्सी भी तय है। मैं, प्रज्ञा बीच वाली कुर्सियों पर बैठते हैं तो बाकी साइड की कुर्सियों पर। बेटी दाएं कोने वाली कुर्सी पर बैठती है जो उसके विवाह के पश्चात बहुधा खाली रहती है। ब्रेकफास्ट में देरी होने पर बहुधा मैं उस कुर्सी को तकता। उसकी माँ नाश्ता लगाकर जब कहती तुम सभी पहले कर लो तो वह अड़ जाती, 'ना मम्मी ! ब्रेकफास्ट करेंगे तो साथ अन्यथा नाश्ते का क्या मज़ा ?' बेटी-बहू मिलकर तब प्रज्ञा को रसोई समेटने में मदद के तत्पश्चात हमारा सामूहिक भोज प्रारंभ होता था। ओह ! सहयोग एवं साहचर्य किस तरह हमारे आनंद को दूना कर देते हैं। सहभोज पेट भरने के साथ मन को भी प्रफुल्लित करता है। आज तो लेकिन बिटिया थी। उसने आज भी वही किया जो पहले करती थी यानी टेबल पर नाश्ता लगा था एवं हम सभी साथ बैठे थे।
ब्रेकफास्ट के दरम्यान आज एक अजीब-सा प्रश्न उभर आया 'आखिर भगवान खाता क्या है ?' यह प्रश्न भी कोई पूर्वचिन्तित प्रश्न नहीं था, बस अनायास प्रकट हो गया। दामादजी खाने के शौकीन हैं। वे जब नाश्ते पर डटे थे बिटिया उन्हें छेड़ते हुए बोली, 'मम्मी ! देखो तो ! इनका वजन पिछले वर्ष से पाँच किलो बढ़ गया है पर ये भोजन का मोह नहीं छोड़ते।' दामादजी कौनसे कम थे, हंसकर प्रज्ञा की ओर देखते हुए बोले- 'मम्मीजी ! बनाया आपने, खिलाया आपने। यह तो वही बात हुई दाता दे और भंडारी का पेट दूखे। आप ही बताओ आदमी अपने छोटे-से मुंह से कितना भर खा सकता है?' यह नहले पर दहला था।
'मम्मी! आपने वह कहावत भी सुनी होगी, मुँह सुपारी पेट पिटारी। वह इन पर खूब लागू होती है।' बिटिया कौन-सी पीछे रहने वाली थी। 'मैडम ! कुछ खाऊंगा तो काम करूंगा। आज दिनभर जोधपुर में कार्य है। तुम्हारी परचेजिंग करनी है। यहां के मसाले-मिठाइयां लेनी हैं। कुछ हैंडीक्राफ्ट आइटम्स बुक करने हैं। तुम भी तो कह रही थी इस बार बन्धेज की चार बढ़िया साड़ियां खरीदनी है।' वे बिटिया की कोहनी पर गुड़ लगाते हुए बोल रहे थे।
प्रज्ञा को बिटिया का टोकना अखरा तो वह उसे तरेरती हुई बोली ,' खाने दो उन्हें ! तुम्हें कुछ तमीज है कि नहीं ?' उत्तर देते हुए प्रज्ञा की आंखों में दुलार सिमट आया था।उसका स्नेह देख मुझे ख्यात आंचलिक गीत के बोल याद आए...एक बार आओजी जंवाईजी पाँवणा, थानै सासूजी बुलावै घर आव...जंवाई लाडकड़ा। सास की शह मिलते ही जंवाई ने मोर्चा संभाल लिया। 'जरा इसे समझाओ मम्मी! इससे पूछो दुनिया में ऐसा कौन है जो बिना खाए चलता है ? ऊर्जा तो भोजन से ही मिलती है।' दामादजी दबे होठों मुस्कराते हुए बोले।
स्थिति देख मैंने बीच बचाव किया। 'सच कहा आपने! संसार में जड़-चेतन सभी को ईंधन तो चाहिए। बिना खाए कोई कैसे चलेगा?' मैंने दामादजी को दुलारते हुए उनका तर्क परवान किया। मेरे बोलते ही उनका हौसला बढ़ गया, चहक कर बोले- 'यस पापा ! मनुष्य ही क्यों, पशु-पक्षी, वनचर, जलचर, नभचर यहाँ तक कि पेड़-पौधों तक को भोजन मिले तो चले। चेतस ही क्यों जड़ चीजों को ही लीजिए, क्या स्कूटर, कार, ट्रैन, प्लेन बिना ऊर्जा चल सकते हैं?' यह कहते हुए उन्होंने बिटिया से नज़र चुरा कर सामने प्लेट में रखे दो गुलाबजामुन और उदरस्थ किए।
बिटिया की गोटियां पिट गई। कुछ पल सोचकर बोली, 'भगवान तो कुछ नहीं खाते पर वे भी तो सारे संसार को चलाते हैं। पृथ्वी ही क्यों चांद, तारे, नक्षत्र यहाँ तक कि समूचा ब्रह्मांड उनके इशारे पर ही तो चल रहा है।' मैंने दामादजी की ओर देखा। उनकी दशा ऊंट पहाड़ के नीचे आने जैसी थी। बस यहीं से आज की चर्चा गरमा गई। आखिर भगवान खाता क्या है? उसकी ऊर्जा का स्रोत क्या है ?
बिटिया अनन्या की बात को सुन सभी आश्चर्यचकित रह गए पर मैं गौरव भाव से भर उठा। मुझे पहली बार लगा मैंने उसके लिए दर्शनशास्त्र का चयन कर कोई गलती नहीं की। वह प्रारंभ से ही प्रतिभावान थी। पूत के पग पालने में दिखते हैं। घर की बातों में ऐसे-ऐसे प्रश्न उठाती कि सुनने वाला दंग रह जाता। एमए दर्शनशास्त्र में करने के बाद उसने इसी विषय में पी.एच.डी. की, दो वर्ष पूर्व अभिजीत से विवाह हुआ एवं सौभाग्य से बनारस विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक पद पर चयनित हो गई। दामाद अभिजीत यूँ तो इंजीनियर एमबीए हैं पर वे पिता के पुश्तैनी अनाज व्यवसाय से ही जुड़ गए। दोनों की जोड़ी खूबसूरत है। अनन्या अब तीस की होने को आई। अभिजीत उससे दो वर्ष बड़ा है। उसका साला यानी हमारे सुपुत्र अनन्त अनन्या से पाँच वर्ष बड़ा है। बहू भावना उससे एक वर्ष छोटी है। दोनों एमए इंग्लिश साथ कर रहे थे एवं इस दरम्यान ही अनन्त ने भावना से विवाह का निर्णय ले लिया। दोनों इसी शहर में प्रशासनिक परीक्षाओं में चयन हेतु कोचिंग सेंटर चलाते हैं एवं यह सेंटर अब शहर का अग्रणी संस्थान है। मुझे बैंक से सेवानिवृत्त हुए पांच वर्ष बीत गए हैं। सेवानिवृत्ति के दिन विदा करते हुए महाप्रबंधक ने ठीक ही कहा था, 'आनंदप्रकाशजी ! सारी उम्र आपने खूब मेहनत की पर अब नाम के अनुरूप आपके आनंद से रहने के दिन आए हैं।'
सूरज कुछ और ऊपर चढ़ आया था। भगवान क्या खाता है विषय पर चर्चा भी उतनी ही गरम हो चली थी। सभी अपनी-अपनी बात रख रहे थे यहां तक कि इस चर्चा में सहभागी हम सभी को पोता अभिमन्यु एवं उससे दो वर्ष छोटी अवनि ऐसे देख रही थी मानो टेबल पर कौतुक उभर आया हो एवं वे भी इस चर्चा में भाग लेने के लिए के उत्सुक हों।
चर्चा में सभी अपने-अपने तर्क रख रहे थे। मैंने कहा, 'भगवान भक्तों का चढ़ाया प्रसाद खाते हैं, हो सकता है सब का नहीं खाते पर कुछेक का ग्रहण कर लेते हैं। सम्भवतः यही उनका भोजन हो।' कहते हुए मैंने बिटिया की ओर देखा। उसका चेहरा बता रहा था उसे यह बात हज़म नहीं हुई। मैंने ठीक ही सोचा था। अब वही बोल रही थी।
'पापा! ऐसा न कभी सुना गया है न देखा गया है। यह उत्तर न तर्कसिद्ध है न अनुभूत, न ही किसी पुस्तक में लिखा है।' उसने बात आगे बढ़ाई। 'लिखा है अनन्या! सुना भी है! क्या भगवान ने करमा का खीच, विदुर का साग, शबरी के बैर नहीं खाये थे?' मेरे उत्तर में दम था पर अनन्या अब भी संतुष्ट नहीं थी।
'पापा! कथा-कहानियों की बात अलग है। आप प्रश्न के मूल तत्व को पकड़िए। जैसे अभी आपके दामादजी ने दो गुलाब जामुन गले से नीचे उतारे वैसे भगवान खाता है क्या ?' यह कहते हुए उसने पति की ओर ऐसे देखा मानो कह रही हो मुझे अंधा नहीं समझना। स्त्री जिस ओर नहीं देखती उस ओर भी उतनी ही मुस्तैद नज़र रखती है। बुआ की बात सुन अब पोता दादा की तरफदारी में आया। 'दादा ! आप ठीक कहते हैं ! कृष्ण माखन खाते थे न, खाते क्या चुराते भी थे।' उत्तर देते ही वह ऐसे मुस्कुराया कि सभी उसकी भोली बात पर फिदा हो गए। अभिजीत ने बच्चे का हौसला बुलन्द किया।
'ठीक कहा पुतर! वे चुरा करके खाए तो भगवान और हम परोसा हुआ खाएं तो भी पेटू।'
अभिजीत के उत्तर से टेबल पर हंसी के अनार बिखर गए। अनन्या लेकिन बात छोड़ने वाली नहीं थी। 'ओफ्फहो! प्लीज बी सीरियस!' उसकी आवाज़ इस बार पहले से तेज़ थी।अब सभी गम्भीर थे। अनन्त कम बोलता है पर बहन के तेवर देख उसने मोर्चा संभाला-
'मुझे लगता है भगवान कुछ ऐसी गैसेज का भक्षण करते हैं जो यहाँ से दिखाई नहीं देती।' अनन्त ने अपना मत प्रगट किया।
'आप ठीक कह रहे हैं। यही सम्भवः है।' बहू ने पति का तर्क पुरजोर किया। उसे अनन्त की हाँ में हाँ मिलाने की आदत है।अब पोती अवनि के पेट में कुछ कुलबुला रहा था।
'मैं बताऊं! भगवान नूडल्स खाते हैं।' अवनि को नूडल्स बहुत पसंद है। उत्तर देते हुए उसके छोटे-छोटे दांत मोतियों से बिखर गए। सभी ने इस सहभागिता के लिए मुस्कुराकर उसका हौसला बढ़ाया। इसी बीच अनन्या ने अभिजीत की ओर इस तरह देखा कि कुछ आप भी उगलिए।
'मुझे लगता है भगवान रात अदृश्य रूप से आते हैं एवं राशन की दुकानों, सरकारी गोदामों से अनाज भक्षण करते हैं। ऐसा नहीं होता तो इन दुकानों में माल रातों रात गायब कैसे हो जाता है?' अभिजीत का उत्तर व्यवस्थाओं पर गहरी चोट थी पर उस प्रश्न का उत्तर तो अभी भी नेपथ्य में था जो बिटिया चाहती थी। सभी के कान चौकन्ने थे कदाचित उचित उत्तर निकल आए पर प्रज्ञा समझ गई इसका असल उत्तर मिलना मुश्किल है। बातों का रुख मोड़ते हुए बोली, 'चलो इस प्रश्न को छोड़ो ! आज सभी यह बताओ वह कौनसी घटना है जिसने तुम्हें जीवन में सर्वाधिक उद्वेलित किया।
'उद्वेलित याने?' मैंने बात आगे बढ़ाई। 'याने जिसने तुम्हारे चिंतन, विचारों को नई दिशा दी। ' उसने स्पष्ट किया। प्रज्ञा की बात को सभी गम्भीरता से लेते थे। सर्वप्रथम उसने अभिजीत की ओर देखा जिसका अर्थ था आगाज़ आप करेंगे। धूप अब खिड़कियों, दरवाजों पर उतर आई थी। अभिजीत अब गम्भीर होकर सास के प्रश्न का उत्तर दे रहे थे।
'यह बात पाँच वर्ष पुरानी है। मम्मी आप जानती हैं मैं स्कूल के दिनों से ही लगातार कक्षा में अवल्ल रहता था। आगे कॉलेज में मेरे सहपाठी ही नहीं प्राध्यापक भी मेरी प्रतिभा का लोहा मानते थे। मेरी तूती बोलती थी। एम .बी .ए. फाइनल की परीक्षा के पूर्व एक सहपाठी हेमन्त जो कक्षा के मिडियोकर, साधारण विद्यार्थियों में था, मेरे पास आया और बोला, 'आप तो अव्वल विद्यार्थियों में हैं। सांख्यिकी के कुछ विषयों में मैं अटका हुआ हूँ। लाख प्रयास करने पर भी समझ नहीं आ रहा। अगर आप किंचित सहयोग करें तो मेरा कल्याण हो जाए।' वह एक साधारण परिवार से था। होना तो यह चाहिए था कि मैं उसकी आगे बढ़कर मदद करता पर प्रतिभा का भूत मेरे सर पर सवार था। मैं बिफर पड़ा।
'मैं किसी ऐरे-गेरे को समय नहीं देता। तुमने मुझे खाली समझ रखा है क्या? यूँ ज्ञान बांटता फिरूं तो अव्वल कैसे आऊंगा।' मैंने क्रूरता से उत्तर दिया। वह चुपचाप चला गया। परीक्षा परिणाम के दिन मैं यह देखकर सकते में रह गया कि हेमन्त अव्वल था एवं मैं दूसरे-तीसरे नहीं, दसवे स्थान पर था। मेरे औसान जाते रहे। गरूर बालू की भीत की तरह गिर गया। उस दिन से मैंने तय कर लिया कि मैं कभी किसी को कमतर नहीं आंकूंगा। न जाने किसमें कितनी छुपी प्रतिभा हो। इस छोटे से वाकये का मुझ पर इतना प्रभाव पड़ा कि आज मैं दुकान के मातहतों तक से विनम्र होकर बात करता हूँ। उनका कभी शोषण नहीं करता, हर जायज मांग पूरी करता हूँ। कौन जाने कल मेरा धंधा पिट जाए एवं वे इसी अनुभव से मुझसे आगे निकल जाए। ईश्वर जिसे चाहे राई से पर्वत एवं पर्वत से राई कर सकता है।' घटना सुनाते हुए अभिजीत एक अदृश्य लोक में खो गया था। मैंने बात संभाली ।
'सच कहा बेटा! कभी किसी को छोटा बोल नहीं बोलना चाहिए। भगवान की लाठी में आवाज़ नहीं होती पर उसकी मार कमर तोड़ देती है। अब बारी बेटे अनन्त की थी एवं वह अपनी बात रख रहा था।
'ये बात मेरे कोचिंग सेन्टर लगाने के दो वर्ष बाद की है जब मेरा व्यवसाय अच्छा चलने लगा था। इसी दौरान एक अत्यंत निर्धन लड़का मेरे पास आया, उसके पिता मज़दूरी करते थे एवं परिवार की माली हालत अत्यंत दयनीय थी। उसका विद्यालय एवं आगे कॉलेज में भी ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा था। अत्यंत संकोच के साथ उसने मुझसे प्रशासनिक सेवाओं की कोचिंग निःशुल्क करने को कहा। उसने यह भी कहा कि इस कृपा हेतु वह मेरा अहसान जीवनभर नहीं भूलेगा एवं भाग्य ने साथ दिया तो आगे चुका भी देगा। उसकी बात ही नहीं मांग भी जायज थी। साठ बच्चों की दस कक्षाओं में उसे कहीं भी पचाया जा सकता था। यह मेरा सामाजिक दायित्व भी था पर मैंने उसे दो टूक उत्तर दिया, ' तुम बेवकूफ हो क्या ? घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या? तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी बकवास करते हुए।' वह नीची आंख कर चला गया।
निरन्तर सफलता ने मुझे मदांध बना दिया था, मैं उसका दर्द नहीं समझ सका। फकत तीन वर्ष बाद वह इसी शहर में जिलाधीश बनकर आया तो मेरे पांवों तले जमीन सरक गई। मुझे लगा वह अवश्य प्रतिशोध लेगा। धंधे में हज़ार विसंगतियाँ होती है। अपराध बोध से ग्रसित मैं उससे क्षमा मांगने गया तो उसने यही कहा,' समय सबका बदलता है सर! लेकिन आप मेरी वजह से भयभीत न होइये। मैंने उन्हें गुलदस्ता एवं उपहार देने का प्रयास किया तो उसने विनम्रतापूर्वक लौटाते हुए कहा,' कुछ देना ही है तो उन्हें दीजिए जिन्हें ईश्वर ने कुछ नहीं दिया है। इससे शायद आपकी आत्मा को सुकून मिले।' मुझे लगा जैसे मैं कुएं में धस गया हूँ। वे अत्यंत विनम्रता से कह रहे थे पर उनका एक-एक शब्द मेरी आत्मा को बेध रहा था। इस एक घटना से मैं समझ गया कि समय एक जैसा नहीं रहता। जगत में मात्र समय बादशाह है बाकी सभी उसके गुलाम हैं।
अनन्त के बाद अब प्रज्ञा अपना अनुभव रख रही थी। उसकी आंखें मानो अतीत में झांकने लगी थी। यकायक उसकी आंखें पनीली हो गई। पल्लु के कोर से आंखें पोंछते हुए उसने बताया, 'कॉलेज के दिनों में उसके रूप के चर्चे थे। मैं लगातार दो वर्ष मिस कॉलेज रही। अगले वर्ष प्रतियोगिता में अन्य रूपसियों के साथ एक पके रंग की सांवली लड़की भी थी। उसका नाम चाँदकुंवर था। उसे देखकर जाने कैसे मेरे मुंह से निकल गया, 'अब हबशनें भी ऐसी प्रतियोगिताओं में आएगी क्या? रंग कौव्वे का नाम चाँदकुंवर।' यह कहकर मैं हंस पड़ी। उसने न सिर्फ मुझे देखा सुन भी लिया। आश्चर्य ! उस वर्ष उसी का चयन हुआ। मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। चयन बोर्ड के अध्यक्ष ने उसे ताज़ पहनाने के बाद उद्बोधन दिया तो मेरा सर घूमने लगा। उनकी बात का सार यही था कि रूपवती होने से भी कहीं अधिक मनुष्य के संस्कार, सिद्धांत अधिक महत्वपूर्ण हैं। विजेता प्रतिभागी का रंग भले सांवला हो, उसकी वाणी, व्यवहार एवं विद्वता बेमिसाल है। उसने ज्यूरी के हर प्रश्न का सटीक उत्तर दिया। उस दिन मुझे समझ आया रूप गुणों के अभाव में व्यर्थ हैं। उनके उद्बोधन के एक-एक अक्षर आज भी मेरे हॄदय पर अंकित है। हम किसी की संस्कार न करें। हँसी की खसी हो जाती है। इसीलिए मैं आज भी किसी भी व्यक्ति की ऊंचाई उसके रूप से नहीं आंकती। रूप ढल जाते हैं पर गुण अनुदिन निखरते हैं।' अपनी बात पूरी करते प्रज्ञा के शब्द अटकने लगे, आखें आंसुओं से भर गई।
अब सबकी नज़रें मेरी ओर थी। अपने इस खास अनुभव को बताने के पूर्व क्षणभर को मेरी आँखें मुंद गई। मैंने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोली एवं अपनी बात कहने लगा,' यह मेरे यौवन की बात है। तब मेरे पिता ने मेरे ही कहने पर एक नई कार खरीदी थी। ड्राइविंग मेरा पैशन, फितूर था। मुझे मेरी ड्राइविंग पर इतना आत्मविश्वास हो गया कि मैं लापरवाह बन गया। उन दिनों शहर में कम गाड़ियां होती थी, मैं भीड़ भरी जगहों पर भी तेज रफ्तार से चलाता। लोग मुझे कार चलाते देख सिरफिरा कहते पर मैं किंचित ध्यान नहीं देता। एक बार देर रात एक पार्टी से बीयर पीकर घर लौट रहा था। मैं स्टीयरिंग पर पूरे आत्मविश्वास से बैठा था। उस दिन बारिश होने से सड़कें पानी से भर गई थी। इसके बावजूद मैं नित्य की तरह तेज गाड़ी चला रहा था। यकायक एक मजदूर सड़क किनारे खड़े पेड़ के पीछे से निकला एव मेरी गाड़ी के नीचे आ गया। अब तो अफरा-तफरी मच गई। मैंने भागने की कोशिश की। यह मेरा दूसरा गुनाह था पर वहां खड़े कुछ लोगों ने मुझे दबोच लिया। भीड़ ने पहले तो मेरी धुनाई की फिर पुलिस के सुपर्द किया। मुंह लाल हो गया, आंखें शर्म से झुक गई। पिताजी थाने आए तो थानेदार ने कहा,' अगर मज़दूर को कुछ हो गया तो इसका जेल जाना तय है।' मैं एवं पिताजी दोनों कांप उठे। हमारा पूरा परिवार मज़दूर की तीमारदारी में लग गया। सौभाग्य से वह कुछ दिनों में ठीक हो गया, पिताजी ने उसे क्षतिपूर्ति रकम भी दी तो उसने केस आगे नहीं बढ़ाया अन्यथा कैरियर चौपट हो जाता। इसके बाद पिताजी ने गाड़ी बेच दी। मैं फिर साईकल पर आ गया। तब मुझे बोध हुआ कि कुछ भी पाकर हमें हमारी सीमाओं में रहना चाहिए। वक्त का मिज़ाज़ बदलते देर नहीं लगती।' कहते-कहते मैं हांफने लगा था।
टेबल पर अब चुप्पी पसर गई थी। यकायक बिटिया अनन्या तेज आवाज़ में बोली, 'मिल गया ! मुझे उत्तर मिल गया पापा।' उसके चेहरे की चमक देखने लायक थी।
'क्या?' इस बार मैं ही नहीं सभी एक साथ बोले।
'भगवान अहंकार खाता है। उसका यही भोजन है। मनुष्य के प्रज्ञाचक्षु इसी से खुलते हैं।' कहते हुए उसने हल्की मुट्ठी से टेबल को ठोका।
इस अद्भुत उत्तर के आगे हम सभी निरुत्तर थे। अब सभी एक-एक कर टेबल से उठ रहे थे।
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"बाल विभाग ( किड्स कार्नर)"
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"जब बाघ के जबड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर चीर दिया था
हरिसिंह नलवा ने"
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स
डॉ. उमेश प्रताप वत्स, यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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जब बाघ के जबड़ों को दोनों हाथों से पकड़कर चीर दिया था हरिसिंह नलवा ने
एक बार महाराजा रणजीत सिंह जंगल में शिकार खेलने गये। कुछ सैनिकों सहित हरि सिंह भी उनके साथ थे तभी अचानक एक विशालकाय बाघ ने उन पर हमला कर दिया। सभी सैनिक डर के मारे पीछे हो गए। तभी हरि सिंह बाघ के सामने आ गए।हरि सिंह व बाघ का जबरदस्त मुकाबला हुआ। अंत में इस खतरनाक मुठभेड़ में हरि सिंह ने बाघ के जबड़ों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसके मुँह को बीच में से चीर डाला। उनकी इस बहादुरी को देख कर रणजीत सिंह के मुख से अचानक ही निकल गया अरे ! तुम तो राजा नल जैसे वीर हो। तभी से उनके नाम में नलवा जुड़ गया और वे सरदार हरिसिंह नलवा कहलाने लगे।
हरि सिंह नलवा का जन्म 28 अप्रैल 1791 को एक सिक्ख परिवार में, गुजरांवाला पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंह उप्पल और माता का नाम धर्मा कौर था। बचपन में उन्हें घर के लोग प्यार से हरिया कहकर पुकारते थे। सात वर्ष की आयु में इनके पिता का देहान्त हो गया था। महाराजा रणजीत सिंह ने 1805 ई. के बसन्तोत्सव पर एक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता आयोजित की। जिसमें हरि सिंह ने भाला चलाने, तीर चलाने तथा अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इससे प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया। अपनी बहादुरी व समझ के कारण शीघ्र ही वे महाराजा रणजीत सिंह के विश्वासपात्र सेना नायकों में से एक बन गये।
उनको कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेजा गया वहा की स्थिति देखकर वे हैरान हो गए, उनके अन्दर गुरु गोविन्द सिंह के संस्कार और वीर बंदा बैरागी का रक्त था। वे पहले ऐसे हिन्दू वीर सेनापति थे जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानते थे।
'शठे शाठ्यम समांचरेत' जो जैसा होता वैसा ही व्यवहार करते थे। महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। कश्मीर घाटी में पहुँचते ही मुगलों ने जिन मंदिरों को ढहाकर मस्जिद बनाई थी, हरिसिंह नलवा ने उसी स्थान पर मंदिरों का निर्माण कराया। उन्होंने आदेश जारी किया कि हिंदुओं की तरह मुसलमानों से भी टैक्स लिया जाय। मुस्लिम शासक हिन्दुओं के साथ जैसा व्यवहार करते , वे मुसलमानों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे। उन्होंने मुसलमान बन चुके सैंकड़ों बंधुओं की घर वापसी भी की। जिससे बिना किसी संकोच के बड़ी संख्या में लोगो की घर वापसी होने लगी, लेकिन हिन्दुओ की नासमझी और रूढ़ियों के कारण ऐसा हो न सका, आज उसका परिणाम कश्मीरी पंडित झेल रहे है। 1837 में जामरोद पर अफगानों ने आक्रमण किया। रणजीत सिंह के बेटे का विवाह लाहौर में था हरिसिंह पेशावर में बीमार थे। आक्रमण का समाचार सुनते ही वे जामरोद पहुंचे। जबरदस्त मुकाबले के बाद अफगानी सैनिक पराजित हो भाग निकले नलवा और सरदार निधन सिंह उनका पीछा करने लगे। रास्ते में सरदार सम्सखान एक घाटी में छिपा हुआ था। घाटी में पहुँचते ही नलवा पर आक्रमण हुआ और हरिसिंह नलवा को धोखे से पीछे से गोली मार दी ।इसके बाद भी हरीसिंह दुश्मनों से लड़ते रहे जब वे जामरोद पहुचे तो उनका निष्प्राण शरीर ही घोड़े पर था।
महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में 1807 ई. से लेकर 1837 ई. तक हरि सिंह नलवा लगातार अफगानों से लोहा लेते रहे। अफगानों के विरुद्ध लड़ाई जीतकर उन्होंने कसूर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर में सिख शासन की स्थापना की। काबुल बादशाहत के तीन पश्तून उत्तराधिकारी सरदार हरि सिंह नलवा के प्रतिद्वंदी थे। पहला था अहमद शाह अब्दाली का पोता, शाह सूजा, दूसरा फतहखान और तीसरा सुल्तान मोहम्मद खान। सरदार हरि सिंह नलवा ने अपने अभियानों द्वारा सिन्धु नदी के पार अफगान साम्राज्य के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार करके सिख साम्राज्य की उत्तर पश्चिम सीमांत का विस्तार किया था। हरि सिंह नलवा की सेनाओं ने अफगानों को खैबर दर्रे के उस ओर खदेड़ कर इतिहास की धारा ही बदल दी थी। खैबर दर्रे से होकर ही 500 ईसा पूर्व में यूनानियों के भारत पर आक्रमण करने और लूटपाट करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दर्रे से होकर यूनानी, हूण, शक, अरब, तुर्क, पठान और मुग़ल लगभग एक हज़ार वर्ष तक भारत पर आक्रमण करते रहे। तैमूर लंग, बाबर और नादिरशाह की सेनाओं ने भारत पर आक्रमण कर बहुत अत्याचार किये। हरि सिंह नलवा ने खैबर दर्रे का मार्ग बन्द कर के इस ऐतिहासिक अपमानजनक प्रक्रिया का पूर्ण रूप से अन्त कर दिया था।1837 ई. में जब महाराजा रणजीत सिंह अपने बेटे के विवाह में व्यस्त थे तब सरदार हरि सिंह नलवा उत्तर पश्चिम सीमा की रक्षा कर रहे थे। महाराजा रणजीत सिंह की व्यस्ता के कारण एक महीने तक सैनिक न पहुँचने पर हरि सिंह नलवा अपने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ वीरतापूर्वक लड़ते हुए 30 अप्रैल,1837 को वीरगति को प्राप्त हुए।
कहते हैं कि आज भी अफगानिस्तान की महिलाएं नलवा के नाम से अपने बच्चो को डराती है, (सो जा बेटे नहीं तो नलवा आ जायेगा) नलवा एक महान योद्धा, भारतीय सीमा का विस्तार करने वाले गुरु गोविन्द सिंह के असली उत्तराधिकारी थे। वे 12 बजे रात अथवा दिन को हमला करते थे लगता था कि जैसे कोई देवदूत हमला कर रहा हो। वह महान देश भक्त, सीमा रक्षक और धर्म रक्षक थे, वे किसी के विरोधी नहीं थे बल्कि उनके अन्दर हिन्दू स्वाभिमान था, ऐसे हिन्दू हृदय सम्राट वीर सेनापति नलवा को उनके बलिदान दिवस पर स्मरण करना हम सब भारतीयों का कर्त्तव्य है।
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