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NOVEMBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
नवम्बर 2022, अंक १८ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों,
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से देव दिवाली और गुरुनानक जयंती की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के सर्टिफ़ाइड हिंदी कार्यक्रम को बहुत सफलता मिली है और बहुत से बच्चे हिंदी शिक्षा कार्यक्रम में सम्मिलित होते जा रहे हैं। आपका अगर कोई भी प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति आप सभी के सहयोग के लिए आभारी है। Amazon के माध्यम से आप हमारा समर्थन करिए। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एक ग़ैर लाभकारी संस्था है और जहाँ खरीदार अपनी पसंदीदा charitable संस्था के रुप में smile.amazon.com के द्वारा चुन सकते हैं। ख़रीदी कोई भी करता है तो amazon.com उस आय का ०.५% अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति को दान करेगा।
‘जागृति’ अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी साहित्य केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी,12 नवंबर 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा। कृपया अवश्य देखें। इस बार की कड़ी बड़ी ही रोचक है।
मैं आशा करती हूँ, कि आप सभी को हमारी विश्वा तिमाही पत्रिका और संवाद समाचार-पत्र प्रतिमाह प्राप्त होते होंगे
आप सभी से आग्रह है, कि आप हमें अपनी रचनाएँ और आलेख अवश्य भेजें।
अंत में मैं सम्पादकीय समिति को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने कार्य का कर रहे हैं।
शुभकामनाएँ सहित
अनिता सिंघल
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति -अध्यक्षा (२०२२-२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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जागृति वेबिनार : “सम्यक् हिंदी साहित्य: प्रवृत्तियाँ व प्रमुख कृतियाँ”
10 दिसंबर 2022
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 10 दिसंबर 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की इस कड़ी की वक्ता हैं: साहित्य अकादमी पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार प्रो. अनामिका, प्रोफ़ेसर, अंग्रेजी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "सम्यक् हिंदी साहित्य: प्रवृत्तियाँ व प्रमुख कृतियाँ"।
आइए, इस रोचक परिचर्चा में विदुषी प्रोफ़ेसर अनामिका जी से सुनते हैंः आजादी के बाद हिंदी साहित्य में क्या नए प्रयोग हुए; इन प्रयोगों, प्रवृतियों, और विधाओं की अस्मिता के संघर्ष; उनका उल्लास, उनकी हताशा; इंटर्नेट का साहित्य पर प्रभाव, समकालीन प्रमुख कृतियाँ आदि आयामों पर एक विषद विवेचन।
समिति शनिवार, 10 दिसंबर 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
https://www.facebook.com/events/524630459275093
www.facebook.com/ihaamerica
https://youtu.be/nK723U0Ut_w
https://youtu.be/-Uhq7oEniJ0
शनिवार,10 दिसंबर 2022; 8:30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada:10:00 AM EST, 9:00 AM CST, 8:00 AM MST, 7:00 AM PST
UK: 4:00 PM, Mainland Europe: 5:00 PM
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आशा है कि आप शनिवार, शनिवार, 10 दिसंबर 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं। समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” जून 2021 से प्रकाशन प्रारम्भ किया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना।
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति -- जागृति रिपोर्ट
जागृति व्याख्यानमाला की नौवीं कड़ी
८ अक्टूबर २०२२
“क्या आधुनिक काल के बीज भक्तिकाल में ही पड़ चुके थे?”
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प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी
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वक्ता: प्रोफ़ेसर डॉo सुधीश पचौरी
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स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष में प्रारम्भ अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की जागृति व्याख्यानमाला की नौवीं कड़ी ८ अक्टूबर २०२२ को स्ट्रीमयार्ड (Streamyard) से वेबिनार के रूप में आयोजित हुई। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था : "क्या आधुनिक काल के बीज भक्तिकाल में ही पड़ चुके थे?" इस रोचक विषय को अपने विशद ज्ञान द्वारा और भी रोचक बना दिया परिचर्चा के अगुआ, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजकुमार ने। हिंदी साहित्य पर कई पुस्तकों के रचयिता डॉ. राजकुमार ने बेल्जियम और स्विट्ज़रलैंड के विश्वविद्यालयों में भी अध्यापन किया है; उनकी रचनाओं और अध्यापन में उनकी गहरी वौद्धिकता और आधुनिकता को एक नई दृष्टि से व्याख्यायित करने की चेष्टा मुखर है। उन्होंने "आधुनिक क्या है? आधुनिकता क्या है? "आदि प्रश्नों पर अपने वक्तव्य को केंद्रित करते हुए; अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक सन्दर्भों और उदाहरणों द्वारा, अपने इस वक्तव्य में, हिंदी -साहित्य के आधुनिक काल और भक्तिकाल के सामंजस्य को ढूंढने की चेष्टा की है।
आधुनिकता क्या है? आधुनिक की परिभाषा क्या है? विशेषतः भारत में आधुनिक होने की परिभाषा क्या है? इस आधुनिकता की परिभाषा हमें किसने सिखाई? भारत में आधुनिक युग की शुरुआत कब हुई? ये सारे प्रश्न हिंदी साहित्य की आधुनिकता के केन्द्र में हैं? डॉ. राजकुमार का कहना है कि एक बड़े अरसे तक यह माना जाता रहा कि भारत में आधुनिकता की शुरआत उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में हुई। यह वह समय था जब भारत में अंग्रेजों का शासन प्रारम्भ हो गया था, भारत ब्रिटैन का एक उपनिवेश बन गया था। ब्रिटिश और अन्य यूरोपियन इतिहासकारों ने भारत का इतिहास अपने मन-मुताबिक लिखना शुरू किया; क्योंकि वे शासक थे। उनसे प्रभावित होकर भारतीय इतिहासकारों ने भी वही राग अलापा। इन सबों के मुताबिक भारत के आधुनिक युग की शुरआत अंग्रेजों के आने के बाद हुई। इसमें अंग्रेजों का अपना वर्चस्व स्थापित करने की लिप्सा भी थी। यह बात आम है कि शासक इतिहास के माध्यम से अपना वर्चस्व स्थापित करने की चेष्टा करते हैं। कोई दो शताब्दियों तक भारत में यह धारणा आम थी कि अंग्रेजों के कारण ही भारत में आधुनिक युग की शुरुआत हुई। पर विद्वानों के मन में एक प्रश्नचिन्ह सदा रहा : क्या यह सही है?। यह मुखर हुआ बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों और इक्कसवी शताब्दी के आरम्भिक दशक में। कई भारत के और भारतेतर विद्वानों ने अपने लेखों और विचारों में इसे रेखांकित किया।
डॉ. राजकुमार ने अमरीकी पत्रिका ‘Dedalus’ के १९९८ एक विशेषांक के दो लेखों का हवाला देते हुए कहा कि विशेषांक के दो लेख इस बात के साक्षी हैं। विशेषांक में निकले, न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर शेल्डन पोलॉक का लेख "India in the Vernacular Millenium: Literary culture and Polity, 1000-1500" और उसी अंक में डॉ. संजय सुब्रमण्यम का लेख "Hearing Voices: Vignettes of Early Modernity in South Asia, 1400-1750" , विद्वानों के इस प्रश्न की मुखरता के साक्षी हैं। संजय सुब्रमण्यम ने लिखा है कि "आधुनिकता कोई वायरस नहीं है जो यूरोप से चलकर एशिया में पहुँची "। पोलॉक ने कहा है कि यूरोप में आधुनिक युग का प्रारम्भ रेनेसां के समय से माना जाता है। भारतीय भाषाओँ के (केवल हिंदी के ही नहीं) साहित्य का अभ्युदय का भी वही समय है। जिसे हम आम तौर पर भक्तिकाल कहते हैं, वह भी उसी कालखंड में आता है। अत: यह कहना गलत होगा कि "भारतीय समाज" में आधुनिक युग की शुरुआत १९वीं सदी में हुई; या अत; प्रकारांतर से : "हिंदी साहित्य" का आधुनिक युग १९वी सदी से प्रारम्भ हुआ।
विद्वान प्रोफ़ेसर ने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए बताया कि आधुनिकता की परिभाषा हर समाज में एक जैसी नहीं होती। प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्रज्ञ चार्ल्स टेलर की पुस्तक Modern Social Imaginaries के हवाले से उन्होंने बताया कि यूरोप की आधुनिकता की कुछ खास प्रवृतियाँ थीं; जैसे तर्क और विवेक। १८ वीं सदी में, जिसे यूरोप में
"Enlightenment" की सदी कहते हैं, तर्क और विवेक के लिए जगह थी, जिनके आधार पर यूरोप विकसित हुआ। पर हर समाज में आधुनिकता के लिए वही वैशिष्ट्य, वही प्रवृतियाँ आवश्यक नहीं हैं। टेलर के अनुसार एशिया और यहाँ तक कि अमेरिका में भी आधुनिकता अलग-अलग विषेशताओं को लिए हुए आई और वे समाज विकसित हुए। इस लिए सबों की 'आधुनिकताएँ’ अलग-अलग हैं। आधुनिकता को एकवचन नहीं अपितु बहुवचन की तरह देखा जाना चाहिये। ।
जहाँ तक साहित्य का प्रश्न है, १३-१५ सदी में जब यूरोप की स्थानीय भाषाओँ में साहित्य लिखा जाने लगा था, उसी वक्त के आसपास भारतीय भाषाओँ में भी साहित्य लिखा गया। वह काल भक्तिकाल था। आधुनिकता की यूरो-केंद्रित परिभाषा से हट कर अगर सोचें तो हमारा जो आधुनिक साहित्य है वह उसी काल से लिखा जाता रहा है, आज के साहित्य के बीज उसी काल में पड़ चुके थे। विद्वान प्रोफ़ेसर ने, तब जो लिखा गया था उसकी बृहत्तर लोक तक पहुँच और आज जो लिखा जा रहा है उसकी सीमित पहुँच, जैसे कई विषयों को भी वक्तव्य में रेखांकित किया। पूरा वक्तव्य देखने के लिए https://youtu.be/WatjtJhPsrw पर क्लिक करें।
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भारतीय वाणिज्य दूतावास (शिकागो) के
“राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह” में
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति - इंडियाना शाखा
29 अक्टूबर 2022
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प्रस्तुति : डॉ. राकेश कुमार
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दीप प्रज्वलन, भारत के महावाणिज्यदूत सोमनाथ घोष, अनिंदिता घोष, डॉ. भरत बरई, और डॉ. पन्ना बरई द्वारा
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भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की 147वीं जयंती के अवसर पर भारतीय वाणिज्य दूतावास (शिकागो) ने राष्ट्रीय एकता दिवस मनाने के लिए 29 अक्टूबर 2022 को अपने परिसर में एक समारोह का आयोजन किया। अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के इंडियाना शाखा को भारत के महावाणिज्य दूतावास द्वारा इस समारोह का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिला। समिति के इंडियाना शाखा से डॉ. राकेश कुमार (अध्यक्ष), डॉ. कुमार अभिनव (उपाध्यक्ष), वेदिका शर्मा (12 वर्षीय छात्रा) और तवरिता शर्मा (9 वर्षीय छात्रा) ने सक्रिय रूप से कार्यक्रम में भाग लिया।
समारोह का आरम्भ महावाणिज्यदूत श्री सोमनाथ घोष के वक्तव्य से हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल असाधारण समय में असाधारण जीवन जिये थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राज्यों के एकीकरण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने उन्हें 'भारत के लौह पुरुष' की उपाधि दी। सरदार पटेल 1947 में स्वतंत्र भारत के पहले उप-प्रधान मंत्री बने, और इतिहास उन्हें नए भारत के निर्माता और समेकनकर्ता (consolidator) के रूप में याद करता है।
इस कार्यक्रम में हिंदी और भारत की विभिन्न भाषाओं के विद्वानों ने भाग लिया। इसमें यूएस मिडवेस्ट के विभिन्न राज्यों से कई बच्चे, युवा और भारतीय डायस्पोरा के सदस्य भी शामिल थे। प्रमुख प्रवासी भारतीय सम्मान पुरस्कार विजेता डॉ. भरत बरई ने सरदार पटेल के जीवन और कार्यों के बारे में बताया। अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार ने अपने वक्तव्य में बताया कि कैसे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के प्रयासों ने राष्ट्रीय एकता में योगदान दिया है। श्री राकेश मल्होत्रा, हिंदी कवि और अध्यक्ष, फेडरेशन ऑफ इंडियन एसोसिएशन, शिकागो ने "एक भारत, श्रेष्ठ भारत" पर एक कविता पाठ किया। तीन बंगाली छात्राओं द्वारा बंगला भाषा में एक सामुहिक गीत प्रस्तुत किया। तेलगु, तमिल, पंजाबी, बंगाली, मराठी और गुजराती प्रतिनिधियों ने भाग लिया और अपने संक्षिप्त वक्तव्य दिये।
इंडियानाकी वेदिका शर्मा (छात्रा) ने एक सुंदर एवं प्रेरणादायक हिन्दी कविता पढ़ी जिसका शीर्षक था " मुठ्ठी में कुछ सपने लेकर" और तवरिता शर्मा (छात्रा) ने एक राम भजन प्रस्तुत किया। इन दो युवा छात्राओं का हिंदी में प्रदर्शन करते देखना सभी दर्शकों के लिए खुशी की बात थी, साथ ही दर्शकों में अन्य बच्चों के लिए एक प्रेरणा थी।
डॉ. राकेश कुमार ने अपने वक्तव्य का आरम्भ सरदार वल्लभभाई पटेल के मद्रास में हुए 23 फरवरी 1949 के भाषण के उल्लेख के साथ किया जिसमें सरदार पटेल ने कहा था कि “आप चाहते हैं कि मैं आपसे अंग्रेजी में बात करूँ तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा; परन्तु वह दिन दूर न होगा जब तुम्हें स्वयं हमारी राष्ट्रीय भाषा में बोलना पड़ेगा। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आप देश को पीछे की ओर घसीटेंगे।“ इसके बाद डॉ. कुमार ने महात्मा गाँधी द्वारा 1918 में स्थापित "दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा" के बारे में बताया जिसका एकमात्र उद्देश्य दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार करना और देश भर के लोगों को एकसूत्र में बाँधना था। 1965 से 2022 तक हिन्दी भाषा पर हुए कुछ प्रमुख वक्तव्यों (जिसमें पूर्व प्रधान मंत्री श्री मोरार देसाई जी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी, वर्तमान केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी, शिक्षा मंत्री माननीय श्री धर्मेंद्र प्रधान जी और माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का वक्तव्य शामिल है) का उल्लेख किया जिसमें हिंदी को भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना है। राष्ट्रीय एकता और देश की समृद्धि और स्वतंत्रता के लिए हिंदी भाषा महत्वपूर्ण है। हिन्दी भाषा द्वारा भारत को विश्व स्तर पर विशेष सम्मान मिलना और हमेशा लोगों को आकर्षित करने में हिन्दी की सादगी और संवेदनशीलता के महत्त्व को बताया।
डॉ. कुमार ने 1980 से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के अथक एवं निःस्वार्थ प्रयासों का विवरण दिया और विशेष रूप से समिति के चार आयामों (बच्चों की शिक्षा, कवि सम्मेलन, त्रैमासिक पत्रिका विश्वा का संपादन और इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में हिन्दी साहित्य केंद्रित प्रयत्न 'जागृति") का उल्लेख करते हुए यह बताया की समिति ने अमेरिका में भारतीय मूल और गैर भारतीय मूल की अगली पीढ़ी को बिना किसी भेदभाव के हिन्दी सिखाने (दूसरी भाषा के रूप में) का कार्य समिति के हिंदी शिक्षकों और स्वयंसेवकों द्वारा किया गया है और समिति का प्रयास आज भी जारी है। तकनीकी प्रगति के साथ, समिति ने अब ऑनलाइन हिंदी कक्षाएं भी शुरू की हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति कैसे शुरू हुयी और भारत के कई गणमान्य लोगों ने इसके प्रयासों में संगठन की शोभा बढ़ाई है।
डॉ. कुमार ने हिंदी भाषा की शिक्षा को राष्ट्रीय संस्कृति से जोड़ा और कहा कि हिन्दी सीखने के माध्यम से हम सभी भारत की संस्कृति से भी जुड़ते हैं जो हमें एक सूत्र में बाँधने का महत्वपूर्ण कार्य करती है और पश्चिमी देशों में भारतीय होने का गर्व महसूस कराती है। उन्होंने अन्य भारतीय भाषाओं की भी प्रशंसा की और उल्लेख किया कि वे महत्वपूर्ण हैं और एकता में योगदान देती हैं, लेकिन राज्य स्तर पर। डॉ. कुमार ने सभी से अपनी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषा को न छोड़ते हुए हिन्दी सीखने और सरदार पटेल के सपने को साकार करने के लिए अनुरोध किया और कहा कि हिन्दी को सिर्फ राजभाषा न रहने दें इसे राष्ट्रभाषा बनाने में सहयोग करें। डॉ. कुमार ने मैथिलीशरण गुप्त जी इन पंक्तियों के साथ अपने वक्तव्य को विराम दिया ।
मानस भवन में आर्य्जन जिसकी उतारें आरती-
भगवान् ! भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
हो भद्रभावोद्भाविनी वह भारती हे भवगते !
सीतापते। सीतापते !! गीतामते! गीतामते !!
राष्ट्रीय दिवस समारोह का समापन अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा के डॉ. कुमार अभिनव के हवाईयन गिटार पर देशभक्ति की धुन से हुआ। डॉ. अभिनव जी अपने इलेक्ट्रिक हवाईयन गिटार पर देशभक्ति गीतों की एक मेडली प्रस्तुत की। मेडली में शामिल थे - "है प्रीत जहाँ की रीत सदा" और "होठों पे सच्चाई रहती है"। दोनों गीतों को गायन और धुनों के साथ सराहा गया और तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूँज उठा।
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डॉ. कुमार अभिनव - अपने हवाईयन गिटार पर राष्ट्रीय धुन पेश करते हुए
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वेदिका शर्मा (12 वर्षीय छात्रा) और तवरिता शर्मा (9 वर्षीय छात्रा) - हिंदी कविता की प्रतुति
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राष्ट्रीय एकता दिवस पर व्याख्यान देते अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार
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अंतर्राष्ट्रीय 29 अक्टूबर, 2022 को शिकागो वाणिज्य दूतावास में भारत के राष्ट्रीय एकता दिवस समारोह में भाग लेने वाले प्रतिभागी
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के नार्थ ईस्ट ओहायो चैप्टर का प्रतिनिधित्व
“इंडिया फेस्ट यू एस ए (India Fest USA) में”
17 सितंबर, 2022
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के नार्थ ईस्ट ओहायो
अशोक खंडेलवाल, डॉ. प्रकाश चाँद, किरण खेतान, अलका खंडेलवाल, अश्विनी भरद्वाज,
कविता भानवाला
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा ने 17 सितंबर, 2022 को ब्रेक्सविल ब्रॉडव्यू हाइट्स, हाई स्कूल में आयोजित 13 वें वार्षिक पूर्वोत्तर ओहायो इंडिया फेस्टिवल यूएसए में भाग लिया।
2010 से, इंडिया फेस्टिवल, हमारे एरिया में 50,000 से अधिक लोगों को आकर्षित किया है, साथ ही 250 से अधिक विक्रेताओं को भी आकर्षित किया है और विविधता और समावेशन के लिए $ 25,000/- से अधिक धन राशि का योगदान करने में सक्षम रहे हैं। इस त्योहार में लातीनी विरासत और अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने में जूलियो डी बर्गोस सांस्कृतिक कला केंद्र, द पास्ट प्रोजेक्ट (प्रचलित और जीवित एक साथ), और केस वेस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी में छात्र के नेतृत्व वाले नाच डी क्लीवलैंड के साथ भागीदारी की है।
भारतीय समुदाय के भीतर, विभिन्न उप-संस्कृतियाँ भारतीय विविधता के प्रसार का जश्न मनाती हैं। पूर्वोत्तर ओहायो इंडिया फेस्टिवल यूएसए का उद्देश्य इन संस्कृतियों, समुदायों और पीढ़ियों के बीच सेतु के रूप में कार्य करना है। यह हर साल एक थीम पर केंद्रित होता है। वो चाहते हैं की उनके वार्षिक, एक दिवसीय ऐतिहासिक कार्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हों और हमारे समुदायों के बहुआयामी वैभव का आनंद उठाएं।
इंडिया फेस्टिवल का मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति, विभिन्न भारतीय वस्तुओं और भोजन जैसे कि टेस्ट ऑफ इंडिया फूड प्लाजा के लिए प्रदर्शनी और शॉपिंग प्लाजा का उत्सव है ताकि भारत के कुछ स्वादिष्ट सांस्कृतिक व्यंजनों के साथ-साथ हमेशा उत्सुकता से प्रतीक्षित प्रतिभा प्रतियोगिता का नमूना लिया जा सके।
अन्तरराष्ट्रीय हिंदी समिति उत्तरपूर्व ओहियो शाखा की हमारी टीम ने हिंदी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रदर्शनी में भाग लिया। इस कार्य में समिति के ६ सदस्यों ने इस दिन अपनी सेवायें अर्पित की और उस दिन कुल २५ घंटे का समय प्रदर्शनी के लिये दिया । हमारी समिति में काफी सदस्य हैं जो अ.हि.स. के लक्ष्य की पूर्ती के लिये अपने अनुभवों के द्वारा सहायता करते रहते हैं।
अन्तरराष्ट्रीय हिंदी समिति के काउंटर में सामग्री और जानकारी प्राप्त करने के लिए 75 से अधिक लोग काउंटर पर रुके। 42 लोगों ने साइन-अप शीट पर साइन किया और एक व्यक्ति ने उसी दिन अन्तराष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्यता के लिए फॉर्म भर सदस्यता भी प्राप्त की|
यह एक अच्छा अनुभव था और हम भविष्य में भी इस प्रकार की प्रदर्शनियाँ करना जारी रखेंगे जिससे -हमारी हिंदी भाषा को बढ़ावा मिलेगा और हमें हमारी नई पीढ़ी में भी जागरूकता लाने का अवसर मिलेगा।
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति उत्तर पूर्वी शाखा एवं शिव विष्णु मंदिर
द्वारा आयोजित ‘हिंदी दिवस’
18 सितम्बर, 2022
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर पूर्वी शाखा एवं शिव विष्णु मंदिर के द्वारा 18 सितम्बर, 2022 को शिव विष्णु मंदिर, पारमा के सभागार में ‘हिंदी दिवस’ के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समारोह के प्रारंभ में श्रीमती रेणु चड्डा और डॉ. तस्नीम लोखंडवाला द्वारा दोहे और कविताओं के साथ "आज़ादी का अमृत महोत्सव" को सम्मान देने के साथ हुई। शाम के समारोह संयोजक के परामर्शदाता श्री तेज पारिख, श्रीमती रेणु चड्ढा और डॉ. तस्नीम लोखंडवाला थे। इस बार के कार्यक्रम में बच्चों ने MC की भूमिका निभाई। डॉ. तस्नीम लोखंडवाला ने शाम के समारोह के MC (समारोह संयोजक) - मास्टर निकुंज खंडेलवाल (संतोष एवं कल्पना खंडेलवाल) और सुश्री इशिका चंद (डॉ. प्रकाश एवं मनीषा चाँद) तथा उनके माता-पिता का परिचय दिया, जिन्होंने अपने बच्चों को इस कार्य के लिए तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत की थी।
सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ की गई। अ.हि.स. की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती सुशीला मोहनका; डॉ शोभा खंडेलवाल, अ.हि.स. की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा; श्री मनहर शाह, मंदिर के अध्यक्ष और श्रीमती किरण खेतान, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा; श्रीमती किरण गोयल, पूर्व अध्यक्षा उत्तर पूर्व ओहायो शाखा और श्रीमती दुर्रिया धिनोजवाला, अ.हि.स. की आजीवन सदस्या ने किया। तालियों की गड़गड़ाहट से हाल गूंज उठा। इसके बाद श्रीमती प्रेरणा खेमका ने अपने मधुर स्वरों में सरस्वती वंदना की।
श्रीमती सुशीला मोहनका, अ. हि.स. की प्रबंध संपादिका, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा के द्वारा अब तक के काम के इतिहास को साझा किया, साथ ही जनता जनार्धन से आजीवन सदस्य बनने का आग्रह किया।
श्री मनहर शाह, शिव विष्णु मंदिर के अध्यक्ष ने बड़े ही सरल शब्दों में अपनी भावना व्यक्त की तथा हमेशा हिंदी और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये अपना सहयोग, समर्थन देने का संकल्प दोहराया।
श्रीमती किरण खेतान, अध्यक्ष उत्तर पूर्व ओहायो शाखा, ने दर्शकों का स्वागत किया। उन्होंने 'हिंदी दिवस' के महत्व के बारे में बताया। साथ ही 20वाँ अंतरराष्ट्रीय हिंदी अधिवेशन, सितम्बर 21, 2021 में मेडाइना में कोविद-१९ के कारण आभासी रूप में आयोजित किया गया था। उसके सफल आयोजन के लिए कार्यकारिणी समिति के सदस्यों और स्वयंसेवकों को उनकी विविध भूमिकाओं के योगदान के लिए पट्टिका के रूप में सम्मान पत्र (Plaque) दिए गए। जिन्हें सम्मानित दिया गए उनके नाम- सुशीला मोहनका, मेडाइना; अजय चड्डा, कोपली; किरण खेतान, मूनरोफाल्स; डॉ. शोभा खंडेलवाल, मेडाइना; अशोक खंडेलवाल, एक्रन; डॉ.विवेक खंडेलवाल, मेडाइना; रेनू चड्डा, कोपली;. डॉ. तसनीम लोखंडवाला, ब्रॉडव्यूहाईटस; रश्मि चोपड़ा, नार्थ केंटन, अनंत माथुर’, मेसिलन; अलका खंडेलवाल, एक्रन एवं डॉ. शैल जैन, मेडाइना है।
तत्पश्चात सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत हुई। पहली प्रस्तुति महाकवि गुलाबजी खंडेलवाल द्वारा रचित कविता ‘जननी जीवनदायनी’ की प्रस्तुति से हुई| यह कविता भारत की धरती माता के प्रति हमारे सम्मान और प्रेम को दर्शाती है, जो सभी के लिए शुभ है और जीवन को ऊर्जा प्रदान करने वाली है। अपनी अनुपम सुंदरता और आकर्षण के कारण राम-सीता और कृष्ण-राधा ने इसे अपने निवास के लिए और अपने साँसारिक कर्तव्यों को निभाने के लिए चुना। जिसे सामूहिक रूप से श्रीमती विभा झालानी, डॉ शोभा खंडेलवाल, श्रीमती रेनू चड्डा, श्रीमती ऋचा माथुर और अलका खंडेलवाल ने प्रस्तुत किया|
इसके बाद स्थानीय कवि श्री नरेंद्र सिह जी ने स्वरचित कविता प्रस्तुति की। राधा और शिव द्वारा उनकी मन को छूने वाली आवाज में ‘हर हर शम्भो’ भजन की प्रस्तुति ने सभी का मन छू लिया था, वह अविस्मरणीय था।
नन्हें मुन्ने महक सभरवाल ने अपने नाना जी श्री अशोक लव की कविता “सबसे प्यारी हिंदी भाषा” जो कि हम भारतियों लिए बहुत ही उपयुक्त थी को सस्वर गाया। श्रीमती चन्द्रिका और उनके पति डॉ. गोपाल जी ने तुलसीदास के भजन की प्रस्तुति की, यह भजन दोनों ही बचपन में गाया करते थे और आज इस मंच पर दोनों ने एक साथ गाया।
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिंदुस्तान की प्रस्तुति मोक्ष बाफ़ना, अंविका राय, प्रद्दयूमन इरावेलि ने बहुत ही लुभावने ढंग से की।
अर्चना पूला द्वारा तुलसीदास के भजन पर भरत्नाट्यम नृत्य प्रदर्शन अनोखा था।
बालगीत ‘नन्हा मुन्ना राही हूँ’ ईशान और अवि अग्रवाला द्वारा गाया गया। ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ सान्वी और सौम्या द्वारा गाया गए। इन बच्चों ने सभी को दिखा दिया कि वे छोटे-छोटे बच्चे भी किन्हीं से कम नहीं हैं। भागवंती खत्री, पिया खत्री, आयुष्मान खत्री ने अपने नृत्य द्वारा मस्ती का माहौल बना दिया। ऋचा माथुर और कविता भानवाला ने ‘हिदी हमारी जय हिंदी हमारी’ गीत को सुन्दर तरीके से गाया जिसमें हिंदी की जय और उसका गुण गान था । वंदना भरद्वाज जी ने स्वरचित कविता का सस्वर पाठ किया यह कविता देश के ऊपर आधारित थी। उसके बाद कृष पारेख जी ने अपनी मधुर आवाज में ”ओ पालन हारे, निर्गुण और न्यारे” भजन का बहुत ही सुन्दर प्रदर्शन किया।
दर्शकों द्वारा सभी प्रस्तुतियों को बहुत सराहा गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम लगभग १ घंटा २० मिनट्स का था और दर्शक अंत तक पूरे कार्यक्रम से जुड़े रहे। सभी उम्र के लोगों ने उत्साहपूर्वक इन कार्यक्रमों में भाग लिया था। प्रदर्शनों में विविधता थी और वे मनोरंजक थे। कार्यक्रम में 200 से अधिक लोग शामिल हुए। शुरुआत में हल्का जलपान और अंत में रात्रिभोज की अच्छी ब्यवस्था थी।
अंत में अ. हि. स. उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की उपाध्यक्ष श्रीमती ऋचा माथुर ने कार्यकारिणी समिति के सदस्यों, सभी स्वयंसेवकों, मंदिर के पदाधिकारियों, प्रतिभागियों, टीवी एशिया और दर्शकों को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम के समापन के पूर्व सभी बड़ों और बच्चों द्वारा अमेरिका और भारतीय राष्ट्रीय गान किया गया।
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हिंदी दिवस समारोह में भाग लेने वाले प्रतिभागी एवं दर्सक
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खड़े व्यक्ति – लाल सी जगेटिया, डॉ. बिमला पाणियां, डॉ. आनंद खंडेलवाल, सुनीत जैन,
डॉ. विवेक खंडेलवाल, अजीत राय, डॉ. राकेश रंजन, डॉ. शैल जैन, सुधा कनोडिया, मनीषा जैन, अजय चड्डा, रिचा माथुर, अशोक खंडेलवाल
बैठे व्यक्ति – डॉ. अनूप कपूर, अंजू कपूर, पवन खेतान, डॉ. शोभा खंडेलवाल, सुशीला मोहनका,
किरण खेतान , डॉ. प्रकाश चाँद, शांता जगेटिया, रेणु चड्डा, डॉ. तसनीम लोखंडवाला,
अलका खंडेलवाल
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अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति शार्लट, उत्तरी केरोलाइना शाखा रिपोर्ट
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द्वारा - समिति अध्यक्षा, प्रिया भरद्वाज
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अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति शार्लट,
उत्तरी केरोलाइना शाखा में आगामी सत्र के लिए मनोनयन
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति, शॉर्लट, उत्तरी कैरोलिना शाखा में अगले सत्र के लिये मनोनयन की प्रक्रिया विधिवत सम्पूर्ण हुयी। ८ नवम्बर २०२२ को 409 Creeping Cedar Court, Waxhaw, Charlotte, NC-28173, प्रिया भरद्वाज के निवास स्थान पर एक आम सभा हुई।
निम्नलिखित पदाधिकारियों का आगामी सत्र २०२३-२४ के लिए पुनः सर्वसम्मति से मनोनयन किया गया:
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अन्य पदाधिकारियों के लिये बाद में निर्णय लिए जायेंगे।
धन्यवाद ज्ञापन के बाद सभा की समाप्ति की घोषणा की गयी।
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अपनी कलम से
“समकालीन साहित्य एवं हिंदी आलोचना”
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द्वारा - डॉo अंगदकुमार सिंह
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डॉ. दीपक कुमार गोंड, उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले से हैं। इन्होने हिंदी में एम.ए. एवं पीएच.डी. की है। अभी भाषा विभाग, क्राईस्ट विश्वविद्यालय, बेंगलुरु में कार्यरत हैं। इनके अनेक आलेख, कविता, उपन्यास आदि प्रकाशित है।
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समकालीन साहित्य एवं हिंदी आलोचना
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समकालीन या समकालीनता के बारे में बात करना या कहें कि आज के दौर के बारे में बोलना, लिखना बेहद चुनौतीपूर्ण भरा कार्य है। क्योंकि समकालीनता के आग्रह में आधुनिकता एवं प्रासंगिकता जैसे विचारों से भी टकराना पड़ता है। सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर जो कला, संस्कृति, साहित्य या मानव मूल्य निर्मित होते हैं, समकालीनता उसे आधुनिकता से जोड़ती है जबकि आधुनिकता ये बतलाती हुई चलती है कि ये सारे मूल्य, चिंतन या स्थितियाँ जो हैं वह समकालीन हैं। अर्थात समकालीनता, आधुनिकता का आधार तत्व है। ऐसे में प्रासंगिकता का सवाल भी खड़ा होता है कि कौन सी चीज प्रासंगिक है और ‘समकालीन’ शब्द अगर अपने-आप में बहुआयामी और व्यापक शब्द है तो प्रासंगिकता के सन्दर्भ में समकालीनता का दायरा भी अपने समय के तात्कालीक एवं अपने से पूर्ववर्ती साहित्य में आने-जाने या देखने की छूट देता है। या यह कह सकते हैं कि अपने इतिहास को पुनर्मूल्यांकित करने का अवसर देता है। प्रासंगिकता एक हद तक अपनी परम्परा के पुनर्मूल्यांकन का अवसर देती है।
पुनर्मूल्यांकन की इस प्रक्रिया में प्रासंगिकता अपने-अपने प्रतिमान भी निर्धारित करती है। समकालीन हिंदी समीक्षा अपने इतिहास और परम्परा के आधार पर साहित्य का पुनर्मूल्यांकन करने का प्रयास है। मजेदार बात यह है कि चाहे कविता हो या कहानी, उपन्यास, निबंध आदि हो, समकालीन हिंदी समीक्षा, परम्परा के पुनर्मूल्यांकन के सहारे कबीर, तुलसी, देव, बिहारी, प्रेमचंद, आचार्य शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, नामवर सिंह आदि का एक कैनन (Canon) या प्रतिमान निर्धारित करती है। साहित्य में प्रगतिशील मूल्यों के साथ प्रगतिवादी युग ने शोषित समाज के नए प्रतिमानों को स्थापित किया। इसी प्रकार उत्तर-आधुनिकता, उत्तर–संरचनावादी या विखंडनवादी नई समीक्षा ने भी अपना प्रतिमान निर्धारित किया है। समकालीन साहित्य में दलित, स्त्री, आदिवासी, अल्पसंख्यक, कृषक, किन्नर आदि प्रवचन (Discourse)
की अवधारणा भी परम्परा के इसी पुनर्मूल्यांकन के द्वारा ही अद्भुत हुए हैं और इनके द्वारा पुनर्मूल्यांकन से स्थापित प्रतिमानों ने हिंदी साहित्य ही नहीं बल्कि भारतीय समाज और उसके इतिहास को ही नए सिरे से व्याख्यायित करने का आग्रह किया है, जबकि समकालीनता के दबाव ने कुछ अति-परम्परावादी समीक्षकों को समकालीन साहित्य में आये इन नए प्रतिमानों से दिक्कत होती है। दरअसल हिंदी आलोचना की जितनी चर्चा व लेखन कार्य समकालीन समीक्षा के दौर में हुई, उतनी शायद स्वयं शुक्ल युग या शुक्लोत्तर (आजादी से पहले) में भी नहीं हुई थी। एक बात ध्यान देने योग्य है कि ब्रिटिश उपनिवेश के अधीन भारत में जिस वक्त आजादी के नारे लग रहे थे, और देश में आजादी के नाम पर जन-व्यापी क्रांतियाँ हो रही थीं। उस वक्त हिंदी साहित्य में एक वर्ग ऐसा था जो ब्रिटिश राजसत्ता की अमानवीयता, किसान, मजदूर, जन-चेतना एवं जन-क्रांति आदि प्रतिमानों के सहारे साहित्य रच रहा था। वहीं एक वर्ग व्यक्ति-अस्मिता, संत्रास, कुंठा, अजनबीपन (strangerness) आदि के मनोभावों का साहित्यिक प्रतिमान रच रहा था और यह वही समय है जब प्रथम ‘तारसप्तक’ (1943) का प्रकाशन हुआ था और वैश्विक धरातल पर महामानव-लघुमानव आदि की बात की जा रही थी। हिंदी समीक्षा में इस दूसरे वर्ग के द्वारा रचित एवं वैश्विक विचारधाराओं से अभिप्रेरित साहित्यिक प्रतिमानों को ‘आधुनिकता’ के रूप में देखा जाने लगा। दरअसल इन दोनों वर्गों की ‘प्रगतिशीलता’ एवं ‘आधुनिकता’ के वैचारिक विचलन ने ही नई कविता के समानांतर नई कहानी, नई समीक्षा आदि की विस्तृत पृष्ठभूमि तैयार की। इस आधार पर पाँचवें और छठवें दशक में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘परिमल’ की भूमिका को देखा जा सकता है।
साहित्य समीक्षा की दृष्टि से भारत की आजादी के बाद का दौर बेहद महत्त्वपूर्ण रहा है, जिसमें साहित्य और संवाद का एक व्यापक सिलसिला चलता है। भारत ही नहीं हिंदी साहित्य के युगों में भी इतनी सारी घटनाएँ होती हैं इतने युगों का बवंडर खड़ा होता है कि कई विद्वान उस दौर को घटनाओं का दौर या घटनाओं का साहित्य कहते हैं। कारण स्पष्ट था, उस दौर में वैश्विक स्तर पर शीत युद्ध के साथ आजादी मिली। आजादी के बाद एक तरह से लोगों में वैचारिक स्थिरता आयी, तब तक तीसरा ‘तारसप्तक’ (1959) का प्रकाशन भी हो चुका था। नेहरू एवं शास्त्री जैसे दो महान नेताओं का युग चला। 1960 तक आते-आते शीत युद्ध की समाप्ति तक भारतीय राजनीति में एक तरह की वैचारिक स्थिरता देखी गयी। लेकिन जल्द ही नेहरू और शास्त्री के देहावसान ने इस वैचारिक स्थिरता में पुनः एक विचलन पैदा कर दिया। यह दौर भारत के आजादी से मोहभंग होने का दौर था। आमजन मानस को लगने लगा कि यह आजादी दरअसल गरीब, असहाय, मजलूम, शोषित, उत्पीड़ित जनता की नहीं बल्कि मुट्ठी भर नेताओं एवं धन-कुबेरों, पूँजीपतियों की आजादी है। इस दृष्टि से सत्ता के खिलाफ़ 1967 के बंगाल के नक्सलबाड़ी आन्दोलन को देखा जा सकता है जिसने देश की राजनीति को ही नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से भी प्रभाव डाला। 70 के दशक में अनेक भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी इसकी गूँज सुनाई देती है। इसी बीच भारतीय राजनीति में इंदिरा गाँधी का उदय, भारत-पाक युद्ध,1975 में घोषित आपातकाल, दो साल बाद के आम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नवगठित सरकारें और पुनः से जनता की (नवगठित सरकार) असंतुष्टि, मध्यावधि में कांग्रेस का पुनरागमन, इंदिरा गाँधी की हत्या, नागरिक असंतोष आदि घटनाओं ने मानवीय जीवन के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी गहरा प्रभाव डाला। नई कविता आन्दोलन के बाद सन् 60 के बाद की कविता या साठोत्तरी कविताओं के काल में ही किसिम-किसिम की कविताओं का दौर चला जैसे अकविता, सहज कविता, विचार कविता, नक्सलबाड़ी कविता आदि अनेक तरह की कविताएँ। कुछ विद्वान समकालीन कविता का दौर इसी दौर से मानते हैं। कुछ 70 या 80 के दशक की कविताओं को समकालीन मानते हैं। यहाँ शिकायत या मतभेद किसी तरह का नहीं है लेकिन यहाँ एक बात को कहने से बात ज्यादा स्पष्ट हो जाएगी कि समकालीनता में ‘कलन’ शब्द जोड़ने, तोड़ने, गिनने या विध्वंस करने के पर्याय के रूप में ही नहीं है या एक कालखंड विशेष के रूप में ही नहीं है। अगर ऐसा होता तो साहित्य के लगभग हर युगों में ऐसी स्थिति प्रायः मिलती रही है मात्र 60 से या 70, 80 के दशक में आकर ही ऐसा नहीं हो गया। साहित्य के प्रत्येक युगों में अधिकांश साहित्यकार और उनका साहित्य अपने समकालीनता के प्रभाव में ही लिखा गया है। नई कविता के दौर में भी आधुनिकता का बोध था, जो आगे चलकर समकालीनता के आधार तत्व के रूप में जाना गया। यही कारण था कि प्रयोगवाद में नए प्रयोग, व्यक्तिवाद, क्षणवाद से लेकर आधुनिकता के आधार पर आधुनिक भावबोध, नई संभावनाएँ एवं आत्मसत्य आदि की बातें होने लगी थीं। लेकिन जल्द ही आधुनिकता के अतिआग्रह ने साहित्यिक प्रतिमान बदले और साहित्य में आधुनिक भावबोध के प्रति लोगों में असंतोष दिखाई देने लगा। मुक्तिबोध को भी एहसास हो गया था कि जब तक कविता में प्रगतिशील तत्त्व को शामिल नहीं किया जायेगा तब तक कविता मानवीय नहीं हो पायेगी। नई कविता का आन्दोलन इसी मानवीय, प्रगतिशील तत्वों के आग्रह की लड़ाई थी। जो 60 के दशक से लड़खड़ाते, गिरते, भटकते, हाँफते, भागते 70 या 80 के दशक में मजबूती से खड़ी होती है।
चूँकि 80 के बाद के वैचारिक दौर का दृश्य भी बेहद रोचक है, जिसमें दो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियों भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस के अवसरवादी रुख को देखा जा सकता है। जनता पार्टी अपने बिखरे असबाब एवं ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ के मोह के साथ अपने नए रूप में (भाजपा) उग्र राष्ट्रवादी, सांप्रदायिक राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी। खुद इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी भी उस दौर के सांप्रदायिक, धार्मिक तत्ववादी और अलगाववादी आंदोलनों के साथ नेहरू के समाजवादी सोच को तिलांजलि देते हुए सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में निजीकरण एवं उदारीकरण की नीतियों के अनुरूप कार्य करने लगी। लिहाजा पंजाब, कश्मीर एवं समूचा उत्तर भारत विभिन्न तरह के आंदोलनों की गिरफ्त में फँसता चला गया, जिसका फायदा धीरे-धीरे उग्र-राष्ट्रवादी, सांप्रदायिक पार्टी एवं जातिगत नवनिर्मित पार्टियों को मिलता गया। वामपंथी पार्टियाँ चूँकि पहले ही अपने अस्तित्व के साथ अलग विचारधारा रखती थी, हालाँकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आपातकाल के दौरान कांग्रेस के साथ ही थी लेकिन बाद के बदलते राजनीतिक मूल्यों के कारण यह पार्टी (मार्क्सवादी) कांग्रेस से अलग होकर वामपंथी मोर्चे में शामिल हो गई, जो आज भी अपने उसी रूप में कायम है। इसके साथ एक और चीज है जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण होने के साथ-साथ भारतीय समाज को अपने गहरे स्तर पर प्रभावित होते देखी जा सकती है। वह है अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पूँजीवादी विकसित एवं विकासशील देशों के बीच के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि संबंधों का स्वरूप। इन संबंधों के कारण अधिकांश देश भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पूँजीवादी साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, नागरिक अधिकार, प्रेस का स्वरूप, सूचना और प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों के अलावा विभिन्न वैश्विक मुद्दों जैसे नस्लवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद, अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, बाल-श्रम, नागरिक असुरक्षा, सीमा-विवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, लैंगिक-भेदभाव आदि चीजे केवल वैश्विक न होकर भारतीय समाज के भी प्रासंगिक मुद्दे बने। भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ आज भी आबादी के नाम पर एक तिहाई हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे हो और जहाँ निरक्षरता, बेरोजगारी, अपराध, कुपोषण आदि का प्रतिशत विश्व के किसी भी देश से ज्यादा होना इस बात की ओर इशारा करता है कि यहाँ आज भी अधिकांश राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व विफल ही रहा है। वामपंथी पार्टियों से एक उम्मीद उस दौर में भी जगी थी जब सयुंक्त मोर्चे की सरकार बनी थी लेकिन उनके वैचारिक-पार्टीगत आपसी-फूट ने संभावित नेतृत्व को शिथिल कर दिया। इस शिथिलता की आलोचना उस वक्त मुख्य रूप से हिंदी के आलोचक रामविलास शर्मा ने ‘आलोचना’ पत्रिका के एक लेख में की थी। उन्होंने साफ़ लफ्ज़ों में कहा था कि ‘अगर देश में फाँसीवाद आया तो इसका मुख्य कारण वामपंथ पहले होगा।’ दरअसल रामविलास जी के कहने का आशय यह था कि जो पार्टियाँ या नेता, समाज सुधारक एवं चिन्तक इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि देश में घटित हो रहे सामाजिक-आर्थिक आदि असमानताओं, समस्याओं एवं शोषण आदि का स्वरूप बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में यह दायित्व सबसे पहले वामपंथ को ही जाता है कि वह इनके ख़िलाफ़ एक जनव्यापी आन्दोलन करे एवं उसके नेतृत्व को स्वयं आगे बढ़कर उठाये। जबकि अन्य पार्टियों की भाँति उस दौर में वामपंथी पार्टियाँ आपसी वैचारिक गृहयुद्ध में फँसी हुई थी। सोवियत संघ के विघटन एवं मध्यमार्गी राजनीतिक पार्टियों के सीमित नेतृत्व के बावजूद वामपंथी पार्टियाँ अपने प्रभावित-क्षेत्रों को सुरक्षित रखते हुए अपना विरोधी स्वर सदैव बनाए रखा। हिंदी साहित्य के वैचारिक धरातल पर एवं साहित्यिक समीक्षा के मानदंड पर मार्क्सवादी रामविलास शर्मा एवं नामवर सिंह सरीखे हिंदी के आलोचकों ने उस दौर के हिंदी साहित्य में दक्षिणपंथी एवं फांसीवादी ताकतों के खिलाफ एक जनव्यापी मोर्चा खोलते हुए वैचारिक वाद-विवाद की परम्परा को कायम किया था। उस दौर में हिंदी समीक्षा की दृष्टि से इन आलोचकों ने नवउपनिवेशवाद, नवपूँजीवादी साम्राज्यवादी एवं साम्प्रदायिकता आदि पर जितना प्रहार किया, लिखा, पढ़ा उसे देखे जाने की जरूरत है। और ऐसा भी नहीं है कि उस दौर में भी खतरे कम थे।
अस्सी के दशक के बाद हिंदी साहित्य में अमूमन हम कुछ बदलते हुए समाज एवं वैचारिकी के ऐसे साहित्यिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं जहाँ सहृदयता से अधिक आग्रह बौद्धिकता का है। लोक-मंगल, रसिक-समाज, रसास्वादन, लालित्य, सौन्दर्य से अधिक ज्ञानात्मक संवेदना और अनुभूत यथार्थ का आग्रह ज्यादा है। इस दृष्टि से प्रगतिशील साहित्य के अंतर्गत ‘मध्य प्रदेश कला परिषद्’ और ‘भारत भवन’ के साथ-साथ ‘प्रलेस’, ‘जलेस’ एवं ‘जसम’ के सभा-गोष्ठियों एवं उनमें दिए गए विद्वानों के व्याख्यान आदि को देखा जा सकता है। इसी दौर में सामाजिक अस्तित्व से वंचित स्त्री, दलित के द्वारा लिखा गया साहित्य भी महत्त्वपूर्ण है जिसने न केवल साहित्य बल्कि सामाजिक-राजनीतिक आदि क्षेत्रों को भी गहरे स्तर पर प्रभावित एवं उद्वेलित किया। अस्सी व नब्बे के दशक में अधिकांश इन साहित्यिक गोष्ठियों एवं सभाओं के अलावा विश्वविद्यालय स्तर पर विभिन्न विभागों के प्रोफेसरों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दलित-स्त्री अधिकारों के लिए काम किया। आज हम पाते हैं कि इन वंचित समाजों की आवाज ने केवल साहित्य ही नहीं बल्कि इतिहास, राजनीति आदि क्षेत्रों को भी पुनः से व्याख्यायित किये जाने की बात उठाई है। साथ ही इन्हीं आंदोलनों से प्रेरणा लेकर और भी कई वंचित समाज जैसे आदिवासी, अल्पसंख्यक, कृषक, किन्नर आदि के प्रवचन (Discourse भी सामने आ रहे हैं। अस्सी, नब्बे के दशक के कथा साहित्य में अस्मितामूलक विमर्शों ने गजब का आत्मविश्वास पैदा किया था। जिसकी वैचारिकी ने साहित्य ही नहीं अन्य वैचारिक क्षेत्रों में भी एक नए दृष्टिकोण की मांग की। यथा स्त्री, दलित, आदिवासी, किन्नर, किसान-मजदूर, हिन्दू-मुस्लिम आदि विमर्श वर्ग से ज्यादा स्त्री-लैंगिकता, दलित-वर्ण, आदिवासी-कारपोरेशन, किन्नर-मानवीयता, किसान-मजदूर-पूंजीपति, हिंदू-मुस्लिम-सेक्लुर जैसी प्रवृतियाँ प्रमुख है जो हिंदी कथा साहित्य ही नहीं बल्कि भारतीय कथा साहित्य में भी एक युगांतकारी परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। साथ ही आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की चुनौती भी उपस्थित की। विभिन्न अस्मिताओं ने विधागत कहानी, उपन्यास, आत्मकथा आदि के जरिये सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, संवैधानिक, सांस्कृतिक चेतना को उभारने का काम किया। अस्मिता आधारित कथा साहित्य की रचना प्रक्रिया को ध्यान में रखकर एवं रचनाकार आलोचक की हैसियत से भी कई कथाकारों ने आलोचना की। दलित, स्त्री, आदिवासी आदि विमर्श एवं उसकी वैचारिकी, एक तरह से कथा आलोचना के विकास की संवाहिका के रूप में देखी जा सकती है। अतः कहना यह है की नई कहानी की वैचारिकी ने आगे चलकर एक तरफ आलोचकों को कथा आलोचना की दृष्टि से विचार किए जाने के लिए विवश किया साथ ही कथा आलोचना की पद्धति व उसकी प्रक्रिया के लिए वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की गयी। वास्तव में हिंदी में कथा आलोचना की व्यवस्थित शुरुआत लगभग 60 के दशक से शुरू होती है । ‘हिंदी कहानी समीक्षा को वास्तविक अर्थों में संतुलित आलोचना का स्वरूप प्रदान करने में सुरेन्द्र चौधरी, देवीशंकर अवस्थी एवं डॉ. नामवर सिंह का ऐतिहासिक योगदान है।’ 70 के दशक में इन तीन आलोचकों की पुस्तकें एक दो वर्ष के अंतराल में प्रकाशित हुई थी। मधुरेश के अनुसार ‘इसमें सबसे अधिक क्षमतावान आलोचक सुरेंद्र चौधरी थे। कथा आलोचना में देवीशंकर अवस्थी का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उनके योगदान को याद करते हुए सुधीश पचौरी, देवीशंकर अवस्थी को बड़े आलोचक का दर्जा देते हैं और उन्हें नई कहानी आंदोलन के बदलते संदर्भ और बनती प्रकृति की संतुलित समझ का सामर्थ्य कथा आलोचक मानते है। अतः इन सभी आलोचकों ने न केवल साहित्य की विभिन्न वैचारिक प्रतिबद्धता एवं समकालीन बोध के स्तर पर बल्किा अतिआधुनिकता, व्यक्तिनिष्ठता, अवसरवाद, अतिबौद्धिकता, अराजकता का विरोध किया। कथा अलोचक कौन ?, कविता आलोचकों कौन ? के पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इन आलोचकों ने विशुद्ध रूप में साहित्यिक आलोचना को ज्यादा से ज्यादा संवादधर्मी बनाया। सन 60 के बाद हिंदी आलोचना में संवादधर्मिता एवं सहयोगी प्रयास से साहित्य की सामाजिक-सांस्कृतिक एवं खासकर राजनैतिक क्षेत्रों का निष्पक्ष, प्रतिबद्ध, तटस्थ, निर्भीक एवं निर्मम ढंग से मूल्यांकन होने लगा। यही कारण है कि समकालीन हिंदी समीक्षा या कथा समीक्षा के बारे में आज लिखने कहने के लिए बहुत कुछ है क्योंकि आज समीक्षा के मानदंड केवल साहित्य तक सीमित नहीं है बल्कि इसका दायरा काफी व्यापक हो गया है। भाषा, सिनेमा, मीडिया, विमर्श आदि भी साहित्यिक-सामाजिक चिंतन के दायरे में आने लगे हैं।
एक और चीज़ जो इस दौर में देखी गई है कि ज्ञान के क्षेत्र में आजकल एक भयानक किस्म का आत्मविश्वास देखा जा रहा है। अर्थात जो भी है वही सही है। जैसे रोजाना की जिंदगी में हम घर पर सारी वस्तुएं अपने यथावत जगह पर रख देते हैं और घर के किसी सदस्य से पूछे जाने पर कि फलाँ सामान कहाँ पर रखा है? तो उत्तर में केवल झटके से यही जवाब मिलता है ‘वही तो है!’ अर्थात वह वस्तु चाहे वहाँ रहे चाहे न रहें लेकिन यह आत्मविश्वास कि अगर बोला गया है कि फलाँ वस्तु वही होगी तो वह वही होगी भले ही वह वस्तु वहाँ कभी रखी ही न गई हो। तो आज का दौर अनिश्चित भावों का गहन या आत्मविश्वास या अभिव्यंजना का दौर है और अगर सौभाग्यवश वस्तु ढूँढने वाले को यथाशीघ्र वहीं बड़ी मिल जाए तो ज्ञान साधना सर्जक (खोजने वाले) और समीक्षक (बतलाने वाले) दोनों की सिद्धी हो जाती है। इस अनिश्चित आत्मविश्वास ने साहित्य में विचलन से ज्यादा उत्सुकता को पैदा किया है। अधिकाँश ऐसे आत्मविश्वास से आह्लादित भी है, जो बिना देर किए वो भी जैसे पट्टी बाँधकर समीक्षात्मक प्रतिमानों से संधान करना चाहते हैं। वैसे इसमें भी एक कला होती है जिसे आजकल अनुभवी, वरिष्ठ या ब्राण्डधर्मी धनुर्धर भी खूब चलाने लगे हैं। हम जैसों की क्या बिसात। यह केवल दूसरों की देखती हुई आँखों में संधान करने के लिए धनुष उठाते हैं और जब अपनी देखती हुई आँखों में देखने या संधान करने की बारी आती है तो स्वयं की बँधी हुई आँखों की पट्टी और पट्टी बाँधकर संधान करने की कला की बेबसी का हवाला देकर दाँत निपोर देते हैं।
समकालीन हिंदी कविता के युवा कवि मृत्युंजय समकालीन हिंदी आलोचना के संबंध में एक विचारणीय बात कहते हैं। वह कहते हैं कि समकालीन हिंदी समीक्षा में ऐसी अनिश्चित, आत्मविश्वास से परिपूर्ण उत्सुकता के निर्मित होने का एक कारण सोशल मीडिया को जिम्मेदार मानते हैं। आगे वह कहते हैं कि एक दौर था जब हिंदी साहित्य में संपादक (साहित्यिक पत्रिका) की अहम भूमिका होती थी। एक तरह का खौफ था, जैसे भारतेंदु, महावीरप्रसाद द्विवेदी सरीखे संपादकों की। उस दौर में विभिन्न साहित्यिक रचनाओं को इनकी नजरों से गुजरना पड़ता था। जब तक इनकी हरी झंडी या स्वीकृति नहीं मिलती थी तब तक साहित्य, समाज या पाठक वर्ग के बीच रचना की मुँह दिखाई भी नहीं हो पाती थी। इसे एक किस्म का आतंक कहिए या अनुशासन हर किसी साहित्यकार की रचना इनकी स्वीकृति के बिना सम्मान नहीं पाती थी। इस बात के गवाह उस दौर के कई साहित्यकार थे। बाद के दिनों में यही काम प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े आलोचकों ने भी किया। इनके भी साहित्यालोचन के कोई भी पाठ या पाठक, पाठ्य लोचन नहीं कर पाता था और तो और रचनाएं भी सुविख्यात या कुख्यात भी यहीं से होती थी तो इस विरासत को खत्म करने में सोशल मीडिया आज के संदर्भ में एक हद तक कामयाब हो चुकी है। आज सोशल मीडिया पर अपनी अभिव्यक्ति करने के लिए कई साधन उपलब्ध हैं और जिसने रचना और पाठक के बीच ऐसे फिल्टर पेपर वाले संपादक की भूमिका को ही समाप्त कर दिया। रचना बिना किसी आतंक या अनुशासन के पाठक या श्रोता तक सीधे पहुँच रही है, और उससे रचनाकारों को तत्काल प्रतिउत्तर या फीडबैक भी मिल जाता है।
आज हिंदी समीक्षा में सहृदयता से ज्यादा सह बुद्धि से काम लिया जा रहा है। हिंदी के आलोचक नामवर सिंह का मानना है कि आलोचक को खूब पढ़ना चाहिए, जितना मुमकिन हो उतना, मगर इसलिए नहीं कि उसे आलोचना लिखनी है। सहृदयता बनावटी नहीं बल्कि सहज होती है, उसको अभिव्यक्त करने से ज्यादा आत्मसात करने की चाह होती है, बिलकुल शांत, फुरसत, नितांत, स्वांत सुखाय जैसी। जबकि सह बुद्धि के प्रपंच में आलोचना आकर्षक, अचंभित, आक्रांत, भयानक, दुर्दांत, निर्मम तो हो सकती है मगर सहज, गंभीर, व्यापक एवं मर्मी तो कभी नहीं हो सकती। प्रोफेसर रवि रंजन का मानना है कि आज का समीक्षक अपने ऐतिहासिक एवं श्रेष्ठ साहित्य कृतियों के पुनर्पाठ से कट गया है, जो आज भी साहित्यिक समीक्षा की नींव माने जाते हैं जैसे जैन साहित्य, रसो साहित्य, बीजक, रामचरितमानस, महाभारत, गीता, मेघदूतम्, पदमावत, सूरसागर, रामचंद्रिका, बिहारी सतसई, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, प्रिय प्रवास, साकेत, उसने कहा था, कामायनी, गोदान, सरोज स्मृति, राम की शक्तिपूजा, पल्लव, शृंखला की कड़ियाँ, मधुशाला, उर्वशी आदि के अलावा केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, यशपाल जैनेद्र, रेणु, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी, ममता कालिया, कृष्णा सोबती, निर्मला पुतुल, ओम प्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, रामचन्द्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नागेंद्र, रामविलास शर्मा, साही, नामवर सिंह, देवीशंकर अवस्थी, सुरेंद्र चौधरी, मैनेजर पांडे आदि कई रचनाएँ एवं रचनाकार आलोचक हैं यहाँ कई नाम छूट भी जा रहे हैं, ये सभी साहित्य के नींव (Foundation) है। जिनके बारे में पढ़ना एवं उनका पुनर्पाठ पुनर्मूल्यांकन करना एक तरह से साहित्य का कैनन (Canon) निर्मित करना है। जिससे साहित्य एवं समाज में वैचारिकता के नए प्रतिमान स्थापित होते हैं। अतः समकालीन हिंदी समीक्षा अपने अनिश्चित आत्मविश्वास से परिपूर्ण उत्सुकता सह्बुद्धि एवं बिना ऐतिहासिक ज्ञान के कारण साहित्य ही नहीं बल्कि ज्ञान के क्षेत्र में भी स्थायी कम अस्थायी ज्यादा बनी है क्योंकि जैसे एक अच्छी जुताई के बगैर खेत में बोया गया बीज उकठ जाता है ठीक उसी प्रकार सुनिश्चित आत्म से बाह्य सत्य से परिपूर्ण धैर्यता सहृदयता एवं साहित्य के कैनन के बिना साहित्य की समीक्षा, मूल्यांकन या पुनर्पाठ करना निर्मूल होगा।
अपने साहित्यिक वंशावली या विरासत की व्यापकता को अगर हम ध्यानपूर्वक देखें तो आलोचना एक यात्रा प्रतीत होती हैं, जिसमें हर कोई अपना कैनन (Canon) या रास्ता बनाता हुआ गंतव्य तक पहुँचने का प्रयास करता है। आलोचना का यही लोकतंत्र भी है। जिसमें हर किसी को अपना रास्ता स्वयं बनाना पड़ता है नहीं तो दूसरों के रास्तों पर अपनी यात्रा तय करने वाले तो आज बहुतेरे है और तो और हिंदी में ऐसे कम ही आलोचक हैं जिन्होंने साहित्य ही नहीं बल्कि वैचारिकता के अन्य माध्यमों के द्वारा भी समकालीन परिस्थितियों के संदर्भ में खुलकर कुछ भी बोला हो। आज हर कोई लीक पर साधकर, संभलकर, स्वांत सुखाय की भांति यात्रा कर रहा है। आजकल कहा जाता है माहौल खराब है, बोलने या लिखने पर जबान या हाथ ही नहीं कटेंगे बल्कि पदवी, शोहरत, मान, वेतन, परिवार, समाज, भाषा सब छोड़कर भागना पड़ेगा जबकि परिस्थितियाँ हर दौर में वैसी ही थी जैसी कि आज हैं लेकिन हिंदी के कुछ आलोचकों ने साहित्य के तत्कालीन मठाधीशों को ही नहीं बल्कि तत्कालीन सत्तारूढ़ सरकार की आँखों में आँखें डाल कर बोलने का साहस रखा। शुक्ल आचार्य, आचार्य द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह जैसे आलोचकों को हम किसी रूप में याद कर सकते हैं इनकी आलोचना की सबसे बड़ी ताकत उनका साहित्य एवं वैचारिकी के क्षेत्र में एक दूसरे के सहयोगी प्रयास की भूमिका निभाने से है। नामवर सिंह के अनुसार आलोचना एक सहयोगी प्रयास है और इस प्रयास ने ही इन्हें खूब बुलवाया, लिखवाया, तराशा, संवारा, उतारा, चढ़ाया एवं श्रेष्ठ बनाया। आज हम स्वयं से पूछें कि क्या हम अपने साहित्यिक विवेक में अपने समकालीन, सहपाठी, शोधार्थी, अध्यापक, विचारक आदि को महत्त्व या स्थान देते हैं, उनके द्वारा व्यक्त किए गए किसी भी गंभीर बातचीत का कभी कहीं कोई संस्मरण प्रस्तुत करते हैं, क्या कहीं किसी भी लेख, परिचर्चा, प्रस्तुति आदि में हम उनका जिक्र करते हैं? उत्तर होगा, कभी-कभी या प्रसंगवश या नहीं! कभी-कभी हमारा साहित्य-घराना एक तरह की हीन ग्रंथी का शिकार भी दिखाई देता है। लेकिन जब कभी कोई प्रतिष्ठित आलोचकों या चिंतकों की नजरों से कोई परख लिया जाता है तो हम उसके हितैषी होने या फिर हीन ग्रंथि के शिकार होकर उसकी ऐसी की तैसी करने लगता है। जबकि परंपरा की दृष्टि से हमारे हिंदी साहित्य का यह सौभाग्य रहा है कि एक दौर में भारतेंदु मंडल, द्विवेदी मण्डल, छायावादी कवि, प्रयोगवादी (तारसप्तक) की परंपरा कुछ ऐसी ही थी, हिंदी में बनारस का रसिक समाज, प्रलेस, जलेस एवं जसम के अलावा परिमल आदि के वैचारिक सहयोग एवं प्रयास आज भी अविस्मरणीय है। लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता गया ऐसे प्रयास या परम्पराएं दम तोड़ती गई। अंततः आज स्थितियाँ बिल्कुल भिन्न हैं। ऐसे ने समकालीन हिंदी आलोचना आज के संदर्भ में बहुरंगी, बहुध्रुवी, बहुआयामी रूपों में ज्यादा दिखाई देती है। और इसे हम गलत भी नहीं मान सकते, क्योंकि साहित्य में गुटबाजी, खेमेबाजी का भी एक दौर रहा है जिसमें साहित्य लोकतंत्र से ज्यादा राजतंत्र, वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा वैचारिक पक्षपात, अराजकता, अधिग्रहण आदि का भाव ही समृद्ध हुआ। अतः बहुआयामी वैचारिकता के कोलाज के बीच आज हिंदी आलोचना असंख्य रास्तों की एक ऐसी यात्रा है जिसमें समकालीनता निरंतर नए नए विचारों की दुनिया के कई द्वार खोल रही है साथ ही प्रासंगिकता उस नई दुनिया से अपने पूर्वजों के दुनिया के बीच की यात्रा करने की छूट दे देती है। अब आलोचक का यह दायित्व है कि वह आलोचना के लोकतांत्रिक पक्ष को जीवित रखते हुए समकालीनता के द्वार पर खड़ा होकर उस नई दुनिया का भी विशलेषित करें साथ ही नई दुनिया का पुरानी दुनिया से जोड़कर प्रासंगिकता के आधार पर नए प्रतिमान स्थापित करें।
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द्वारा - श्रीमती मीना सिन्हा
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श्रीमती मीना सिन्हा, राँची, झारखण्ड से हैं। पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण और आलेख प्रकाशित करती रहती हैं। चित्रकला कई साहित्यिक सम्मानों में सम्मानित भी हैं।
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१. तेरी मेरी कहानी रहे- (गीत)
तेरी मेरी कहानी रहे- (गीत)
जंग जिंदगी की, जिंदगानी रहे ।
जारी तेरी मेरी कहानी रहे ।।
रुकना बेमतलब की बातें यहाँ।
कोशिश में हर ओर घातें हैं यहाँ।
जीवन की यूँ बहती रवानी रहे ।
जारी तेरी मेरी कहानी रहे ।।
घातों का प्रत्युत्तर देना नहीं ।
करना अब और लेना-देना नहीं ।
मधुरिम सबकी बोली-बानी रहे।
जारी मेरी-तुम्हारी कहानी रहे।
मंजिलों की तरफ तुम बढ़ते रहो।
अर्जुन बन लक्ष्यभेद करते रहो।
मछली की आँख में निशानी रहे।
जारी मेरी-तुम्हारी कहानी रहे ।
भूल जाना है सारी मजबूरियाँ ।
तेरी मुट्ठी में होगी यह दुनिया।
बीच दिलों के न दरमियानी रहे ।
जारी मेरी-तुम्हारी कहानी रहे ।
जंग जिंदगी की, जिंदगानी रहे।
जारी तेरी तुम्हारी कहानी रहे ।।
२. आओ अपनाएँ स्वदेशी (गीत)
आओ अपनायें स्वदेशी, त्यागें हमसब वस्तु विदेशी ।
परदेशी का मोह क्या करना, अभी यही है दूरंदेशी ।।
चकाचौंध से दूर रहना, क्यों दूसरों को देखें हम ।
सक्षम सभी तरह से होकर निज मेहनत से चमकें हम ।
अंधी दौड़ तो होता रहता, समझो हरदम ही क्लेशी ।
परदेशी का मोह क्या करना, अभी यही है दूरंदेशी ।।
विश्वगुरु का पद है अपना, जग नेतृत्व सफल हो सपना ।
औरों को है नाहक जपना, बेमतलब छोड़े विलपना ।
देख-देख कर ऐसी हालत, होते रहते खुश प्रतिवेशी ।
परदेशी का मोह क्या करना, अभी यही है दूरंदेशी ।।
पद्धति यही सबसे न्यारी, है इसमें ही होशियारी ।
अपने को तैयार करें हम, हरियाली भर जाए क्यारी ।
जन-जन तक सभी पहुँचाएँ, प्यारा गीत यह संदेशी।
परदेशी का मोह क्या करना, अभी यही है दूरंदेशी।।
आओ अपनाएँ स्वदेशी, त्यागें हमसब वस्तु विदेशी ।
परदेशी का मोह क्या करना, अभी यही है दूरंदेशी ।।
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द्वारा- श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव
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श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय”, औरंगाबाद, महाराष्ट्र से हैं। लेखन के साथ-साथ शोध कार्य में अध्ययनरत हैं।
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सुबह-सुबह मैं घूमने निकला, वातावरण का आनंद लेने। रास्ते के बगल में बड़ा पेड़ था, उसके नीचे कोई बैठा था। उसके रोने की आवाज आ रही थी। नजदीक जाकर देखा, तो वह मित्र कैलाश था। उसे समझाते हुए मैंने कहा- "कैलाश, खुद को संभाल, अब परिवार की जिम्मेदारी तुम पर है।"
"अब अन्ना मेरे साथ नहीं है, मैं जीकर क्या करूँ? बालू, मुझे नहीं जीना।"
"तुझे जीना पड़ेगा, माँ, भाई, बहन के लिए।"
"पिताजी का निधन, यह सदमा मैं भूल ही नहीं सकता।" कैलाश ने कहा।
जितना दुख तुझे है, शायद उससे ज्यादा तुम्हारी माँ सावित्री को होगा। किंतु वह दुख भी व्यक्त नहीं कर सकती। क्योंकि वह सुन सकती है, बोल नहीं सकती। उसके दुख को तुझे समझना है। माँ का सहारा बनना है। हाँ, मैं अब माँ के लिए जीऊंगा। उसे अकेलापन कभी महसूस नहीं होने दूँगा उसके साथ समय बिताऊँगा।
"कैलाश, एक बात पूछनी थी।"
"पूछ, बालू।"
“अन्ना का निधन हुआ, यह मुझे मालूम है। किंतु समाज में निधन के कई कारण बताए जा रहे हैं। सही कारण मुझे भी पता नहीं। वह मुझे जानना है”।
“बालू भैया, मैं तुम्हें बड़ा भाई समझता हूँ जो हुआ वह सच बताउँगा। अन्ना का निधन शराब से हुआ। इतना ही नहीं तो अन्ना जुगार भी खेलते थे। माँ को मारते थे, गालियाँ देते थे। मैं देखकर, सुनकर अनदेखा करता था। समाज के कारण। कैलाश, तुम्हारी माँ सावित्री पहले से दुख सहती आई है शायद”। बालू, “अन्ना ने मुझे कई बार कहा था कि शादी मैंने सिर्फ जायदाद के लिए की थी। मतलब, मैं नहीं समझा। दहेज में अन्ना को दो एकड़ जमीन मिलने वाली थी”।
“मिली क्या कैलाश”?
“नहीं मिली। माँ के पिताजी का देहांत हुआ, तो माँ के भाई ने नहीं दी। इन कारणवश भी माँ को अन्ना बहुत पीटते थे। यानि सावित्री काकी के साथ सिर्फ बुरा व्यवहार हुआ। कैलाश, मैं आप से विनती करता हूँ कि तू माँ को कभी दुख मत दो क्योंकि वह सिर्फ वेदना ही सहती आई है”।
“कभी नहीं दूँगा दुख। मैं मरते दम तक उसके साथ रहूँगा, बालू”।
“अब आगे क्या करने का सोचा है कैलाश? परिवार का गुजारा किस तरह करेगा”।
“मैं बकरियाँ संभालूँगा । मुझे छोटे भाई माणिक को पढ़ाना है और बहन की शादी भी करनी है”।
“हो जाएगा, ज्यादा सोच मत। कुछ जरूरत पड़ी तो मुझे कभी भी बताना, मैं तुम्हारे साथ हूँ और निरंतर रहूँगा”। “कैलाश बहुत बातचीत हुई, अब मैं चलता हूँ। मुझे वापिस शहर जाना है। इस बार सावित्री काकी से नहीं मिला। अगली बार उनसे जी भर के बात करूँगा । काकी को बता देना बालू ने याद किया था। जल्द मिलेंगे दूसरी बार”।
देखते-देखते उच्च शिक्षा पुरी हुई। दुनिया दारी समझ आने लगी। ज़िंदगी में माँ, बाप का क्या महत्व है, यह गाँव छोड़ने के बाद समझ आया। माँ की याद आ रही थी। माँ को मिले बहुत दिन हुए थे। फोन पर हर दिन बात होती थी लेकिन माँ को देखने का मन हुआ। मैं रात को ही गाँव के तरफ निकल गया।
सुबह-सुबह कैलाश का भाई माणिक रास्ते से जाते हुए दिखाई दिया, मैंने घर से ही जोर से आवाज दी-"माणिक! माणिक...।"
उसने पीछे मुड़कर देखा और कहा- "बालू भैया आप कब आए शहर से।" "आज ही आया हूँ। परिवार में सब ठीक ठाक है न।"
"परिवार ही नहीं रहा।"
"मतलब, मैं नहीं समझा। क्या हुआ?"
“बहन की शादी हुई, वह चली गई। कभी मिलने नहीं आई या आने नहीं दिया, उसे ही मालूम। कैलाश की शादी हुई, वह भी चला गया नासिक। फिर परिवार कहाँरहा। रही सिर्फ माँ”।
"बकरियाँ कौन संभालता है?"
"सब मर गई। किस वजह से मरी यह आज तक पता नहीं चला।"
"फिर बहन की शादी कैसे की?"
"ब्याज से पैसें निकालकर की। इन कारणवश तो कॉलेज छोड़कर खेत में काम कर रहा हूँ। पैसें वापिस देने के लिए। माँ भी काम करती रहती है।"
"कैलाश के शादी को कितने दिन हुए?"
"डेढ़ साल। उसे लड़का भी हुआ, अभी।"
"तुम्हारी माँ कैलाश के साथ होगी।"
"नहीं। घर पर है। उसे कहाँ है माँ के लिए समय। माँ को जब से पता चला तब से वह बच्चे को देखना चाहती है, लेकिन लेकर कौन जाएगा? मुझे मालिक छुट्टी नहीं देता। उसे समय नहीं है। बालू भैया, घर आइए। माँ आप को बहुत याद करती है। मैं चलता हूँ, काम पर जाना है।"
मैं जिस अवस्था में था, उसी अवस्था में घर से बाहर निकला और सावित्री काकी के घर की ओर बढ़ा। घर जाने के बाद दरवाजा खटखटाया। कुछ समय बाद दरवाजा खुला, तो सामने सावित्री काकी दिखाई दी। मुझे देखकर वह बहुत खुश हुई, जैसे उसे मेरे रुप में कैलाश दिखाई दिया हो। वह बोल नहीं सकती थी, लेकिन इशारों से उनके भाव मुझे समझ आते थे। वह साक्षात बोल रही है ऐसा भास होता था। सावित्री काकी मुझे इशारों में बोली -”आ बेटा। बैठो।"
मैंने कहा- "कैसी है आप? सब अच्छा है न।"
सावित्री काकी ने गर्दन हिलाते हुए कहा- "जो है अच्छा है।"
मैंने कहा- "कैलाश का फोन आता है क्या? आप से आता है मिलने?।"
सावित्री काकी इशारों में बोलने लगी-" न फोन आता है न मिलने। मैं उससे बोलने और उसके बेटे को देखने के लिए तरस रही हूँ। उसके साथ समय बिताना भी चाहती हूँ।"
मैंने कहा-"आप को पैसों की जरूरत है?" सावित्री काकी इशारों में बोली- "मुझे पैसों की जरूरत नहीं है। मुझे अकेलापन सता रहा है। मुझे व्यक्त होने के लिए अपना कोई चाहिए, बस!"
मैंने कहा- "आप का परिवार तो बड़ा है। फिर तुम्हें किस बात की चिंता।"
सावित्री काकी इशारों में बोलने लगी- "परिवार बड़ा होने से कुछ नहीं होता, उनमें अपनापन होना चाहिए। नहीं तो पास होकर भी इंसान दूर होते हैं। माणिक मेरा बेटा है, पास है लेकिन कभी मुझ से प्यार से बात नहीं करता। समाज के लोग अक्सर मुझे गूँगी नाम से पुकारते हैं, तब मुझे ज्यादा बुरा नहीं लगता। किंतु जब माणिक मुझे गूँगी कहकर बोलता है, तब बहुत तकलीफ होती है।"
मैंने कहा- "मैं कैलाश और माणिक को समझाता हूँ।"
सावित्री काकी इशारों में बोलने लगी- "किसी को मत समझाना। वे नादान नहीं हैं। जो है अच्छा है। मेरी किस्मत ही ऐसी है, उसे कौन क्या करेगा। हाँ, लेकिन एक बात सच है, गूँगे व्यक्ति की ज़िंदगी पीड़ादाई होती है। मैं गूँगी हूँ इसका कतहीं दुख नहीं है, किंतु मैं सब सुन सकती हूँ, इसका ज्यादा दुख ह क्योंकि लोग इतना कुछ बोलते हैं, मैं सुनती हूँ, वेदना सहती हूँ, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती। मेरे दिल में बहुत कुछ है अच्छा-बुरा। शाब्दिक पीड़ा से परेशान हूँ। दिल का बोझ हलका करना चाहती हूँ, लेकिन सुनने के लिए कोई तैयार नहीं। मुझे भले ही बोलना नहीं आता हो, लेकिन भावना तो व्यक्त कर सकती हूँ। मैंने बहुत दिनों बाद मनमुक्त बात की बालू। अब दिल का बोझ हालका हुआ। मेरी एक ही इच्छा है, समाज में तुम्हारे जैसे व्यक्ति का निर्माण हो। तब गूँगे, बहरे को मानसिक आधार मिलेगा। जीने की आस भी...।"
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बाल खंड (किड्स कार्नर)
"पाँच लघुकथायें"
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द्वारा - डॉ उमेश प्रताप वत्स
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डॉ उमेश प्रताप वत्स लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है। ये यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। इनकी लघुकथायों में ‘गागर में सागर’ भरा है।
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1.लघुकथा - करवा चौथ
पायल ने आज बहुत ही श्रद्धा से करवा चौथ का व्रत रखा था किंतु लगभग एक महीने से राहुल से नाराजगी के चलते बातचीत न होने से वह कुछ परेशान भी थी। बात भी कुछ नहीं हुई थी, बस! बाजार जाने को लेकर छोटी-सी बात प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई और खिंचती चली गई। राहुल भी मन ही मन दुखी था कि इतने महत्वपूर्ण व्रत पर भी वह पायल के साथ शॉपिंग तो क्या बात तक नहीं कर पा रहा था। व्रत की तैयारी, कथा आदि सुनने में पूरा दिन निकल गया। रात में माँ ने आवाज लगाई, बहू! चाँद निकल गया, सामान लेकर छत पर आ जा। पायल छत पर चली आई और राहुल चुपचाप नीचे ही बैठा रहा। माँ की आवाज पर राहुल भी छत पर आ गया। जब पायल ने दीपक जलाकर छलनी से चंदा को देखा और फिर राहुल को तो राहुल की आँखों में आँसू आ गये। पायल ने जैसे ही राहुल के पैर स्पर्श करना चाहा तो दोनों ही फूट-फूटकर रोने लगे। महीनेभर से दबा प्रेम अपने चरम पर था। दोनों को इस तरह देखकर माँ की अश्रुधारा भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वह दोनों को डाँटने का अभिनय करने का प्रयास कर रही थी।
2.लघुकथा: चश्मा
देख! आज फिर चावलों में से कितना कचरा निकला है, ठीक से बीन भी नहीं सकते।
बहू! जब से चश्मा टूटा है कुछ ढंग से दिखाई नहीं देता, क्या करूँ?
सोनू! ले अपनी फीस, ध्यान से दे देना मैडम को।
वापिस आने पर माँ ने सोनू से पूछा - फीस जमा करवा दी ?
सोनू - नहीं माँ, मैं दादी का चश्मा लेकर आया हूँ।
इस बात पर सोनू की खूब पिटाई हुई किंतु वह तनिक नहीं रोया बल्कि वह खुशी से फूला नहीं समा रहा था और दादी की आँखों से अश्रुधारा रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
3.लघुकथा - परीक्षा
कॉलेज के लिए घर से निकलकर जैसे ही सड़क पर पहुँचा, एक्सीडेंट के कारण भीड़ जमा हो रही थी। देखा कि एक महिला एक्टिवा से छिटक कर दोनों बच्चों के साथ बुरी तरह घायल होकर सड़क से नीचे पड़ी कराह रही थी। भीड़ तमाशा देख रही थी। मुझे एक ओर परीक्षा में देरी हो रही थी किंतु इधर मानवता की परीक्षा सामने थी। मैं तुंरत उन्हें अस्पताल ले गया। अपनी परीक्षा तो छुट गई किंतु इस परीक्षा में पास होने की खुशी अंदर तक महसूस हो रही थी।
4.लघुकथा - दुआएं
गाड़ी के शीशे पर टक-टक की आवाज़ सुनकर जैसे ही देखा, एक माई हाथ पसारे खड़ी थी। मैंने उसे दस का नोट दिया। वह दस का नोट ले गई और बदले में सैंकड़ों दुआएं दे गई। मैं सोचता रहा कि गरीब मैं हूँ या वो माई।
5.लघुकथा - चोर
चोरी करते हुए पकड़े जाने पर मैंने चोर को समझाते हुए कहा कि कोई काम-धंधा करले भाई और पर्स निकालकर उसे मदद के लिए एक हजार रुपये भी दिये। घर जाकर देखा तो मेरा पर्स गायब था।
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“अमेरिका में छठ पूजा की एक झलक”
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छठ के प्रातः के अर्घ्य के समय Pennsylvania, CA - Greencastle, USA की धरती पर
इंद्रधनुष का द्वार बना कर प्रकृति ने मानो सूर्यदेव का स्वयं स्वागत किया
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ग्रीनकैसल (पेंसिलवेनिया,अमेरिका) से संध्या काल के अर्घ्य के समय
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कृपा एवं अनीता सिंह के घर पर ‘खरना’ के समय (वर्जीनिया, डीसी)
*’खरना’ से ही छठ व्रत प्रारंभ होता है
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भावपूर्ण श्रद्धांजलि - “श्याम सरन नेगी”
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(1 जुलाई 1917 – 5 नवम्बर 2022)
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श्याम सरन नेगी, हिमाचल प्रदेश, स्वतंत्र भारत के पहले मतदाता का 105 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने 1951 में भारत के आम चुनावों में एवं लोकसभा तथा राज्यसभा चुनावों में भी हमेशा अपना वोट डाला है। अंतरराष्ट्रिय हिंदी समिति की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं शतत नमन।
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“गुलाब चाँद जगेटिया एवं उनके परिवार को बधाई है”
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गुलाब चाँद जगेटिया एवं उनके परिवार को बधाई है। भीलवाडा के गुलाबपूरा रूपाहेली कला राजकीय बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय के भवन निर्माण के लिए भूमि पूजन के अवसर पर सवा करोड़ की धन राशि देने की घोषणा की। रूपाहेली में विद्यालय भवन का मॉडल दिखाते जगेटिया परिवार।
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“अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से हार्दिक बधाई”
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राकेश बिजारणियाँ को राजस्थान विश्वविद्यालय से पी. एच. डी. की उपाधि मिली है। राकेश बिजारणियाँ मंडवरा पंचायत के पहले पी. एच. डी. धारक हैं। इन्होंने अपना शोध कार्य ‘आदरणीय गुलाब खंडेलवाल की कविता में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति’ विषय पर डॉ. सरला गुप्ता के निर्देशक में पूरा किया है। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एवं हिंदी प्रेमियों की ओर से हार्दिक बधाई।
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“डॉ. अर्चना श्रीवास्तव को अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से
हार्दिक बधाई”
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डॉ. अर्चना श्रीवास्तव पूर्व प्राचार्य, आर. एस. वाई ,पी. जी कालेज, बाराबंकी, को भव्या फाउन्डेशन के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय मैत्री सम्मेलन जयपुर (राजस्थान) में दिनांक 19 जून 2022 को प्रतिभाग किया। इनको को 22 जून २०२२ को मेवाड़ वि.विश्व विद्यालय चित्तौड़ गढ़ (राजस्थान) में हिन्दी विभाग के सभागार में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए "राष्ट्र गौरव सम्मान" से ट्राफी और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
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"संवाद" की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
सहसंपादक – डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP, dr.archana2309@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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सुशीला मोहनका
(प्रबंध सम्पादक)
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गुरु नानक जयंती, गंगा महोत्सव, देव दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, वंगला (द 100 ड्रम फेस्टिवल) एवं बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवायें एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी। जागृति’ की दसवीं कड़ी शनिवार, १० दिसम्बर २०२२ को दिन में १०:०० बजे (EST) से अमेरिका में और १० दिसम्बर २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं से एक विशेष निवेदन है कि वे अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें समय से प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजे तथा कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके। २०२२ का वर्ष अपने अंतिम चरण पर है, अगर इस वर्ष के किसी कार्यक्रम की रिपोर्ट अपरिहार्य कारणों से नही आसकी है तो अब भेजने का अंतिम अवसर आपके पास है, जल्दी से जल्दी भेजें।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
‘संवाद’ अक्टूबर २०२२ का अंक पढ़कर जिन्होंने प्रतिक्रया भेजी हैं उनको धन्यवाद। आप सभी विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का अक्टूबर २०२२ का अंक भी अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
सुशीला मोहनका
sushilam33@hotmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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This email was sent to {{ contact.EMAIL }}You received this email because you are registered with International Hindi Association
mail@hindi.org | www.hindi.org
Management Team
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© 2020 International Hindi Association
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