संवाद - November 2021

संवाद - November 2021

 
 
 
 
 
INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
 नवम्बर  2021, अंक  ६ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
 
-- अजय चड्ढा
मुझे उम्मीद है कि आप सभी स्वस्थ होंगे और अब सभी अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस आ गये होंगे। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की संपादकीय टीम ने एक मासिक समाचार पत्र "संवाद" जून २०२१ माह से प्रारम्भ किया है, आशा है आप सभी को पसंद आया होगा । अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की गतिविधियों, घोषणाओं, प्रतिक्रियाओं और स्थानीय शाखाओं के समाचारों को प्रकाशित करने, बताने के विचार से इस मासिक समाचार पत्र "संवाद" का प्रकाशन समिति के लिए आवश्यक हो गया था। मासिक समाचार पत्र के द्वारा दुनिया भर से उभरने वाली बहुमुखी हिंदी लिखने वाली प्रतिभाओं को भी उनकी रचनाओं के प्रकाशन का अवसर मिला है। मासिक संवाद में उन्हें भी स्थान दिया गया। 2021 के अंत तक, डिजिटल प्रारूप में ७ मासिक संवाद पत्र प्रकाशित हो जायेंगे और इन्हें भी http://hindi.org/newsletter.html के शीर्षक में ऑनलाइन पढ़ा जा सकेगा जैसे की अभी ‘विश्वा’ को पाठक ऑनलाइन भी पढ़ रहे हैं।
 
 
 
अ.हि.स. का २०वाँ द्विवार्षिक आभासी अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन 
कार्यक्रम की झलक  
 
 
 
 
 
 
 हिंदी भाषा के सम्मान और स्वाभिमान की वैश्विक स्थापना के संकल्प के साथ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २० वें द्विवार्षिक अधिवेशन सम्पन्न हुआ 
अधिवेशन में सारी गतिविधियाँ मूल विषय के लक्ष्य की पूरक रही ।
मेडाइना, ओहायो अक्टूबर ९ अक्टूबर, २०२१
 
हिंदी भाषा के सरंक्षण और संवर्धन को प्रतिबद्ध और इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार में जुटी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २० वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन उत्तरी अमेरिका के ओहायो राज्य के मेडाइना शहर में संपन्न हुआ। ९ अक्टूबर सुबह दस बजे से लेकर १० अक्टूबर शाम ७ बजे तक चला यह द्विवार्षिक अधिवेशन भारत के अलावा अन्य  देशों में हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में मान्यता दिलवाने और इसके लिए भाषा को सीखने और सिखाने की नयी तकनीकों को विकसित करने हेतु समर्पित रहा।
 
 
डॉ. तेज पारीक, उद्घोषक, ९ अक्टूबर २०२१
कोरोना की वैश्विक़ महामारी के चलते इस बार का अधिवेशन आभासिय और व्यक्तिगत रूप में मिश्रित रूप से आयोजित किया गया जिसे विश्व के पाँच महाद्वीपों के विभिन्न देशों से हज़ारों हिंदी प्रेमियों ने परोक्ष और अपरोक्ष रूप से ज़ूम, यूट्यूब, फेसबुक पर हुए सीधे प्रसारण अथवा प्रत्यक्ष रूप से अधिवेशन स्थल पर जुड़कर सफल बनाया।
अधिवेशन की विशेष सफलता इस बात से लगाई जा सकती है कि इस बार ओहायो राज्य के चार बड़े शहरों के महापौरों ने अधिवेशन के समर्थन में हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार हेतु अपने-अपने शहरों में राजकीय उद्घोषणा की। कोरोना काल की विषमतम परिस्थितयों में आयोजित यह अधिवेशन कई अर्थों में अभूतपूर्व रहा जो निश्चित रूप से हिंदी समिति की सांगठनिक विकास यात्रा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।
अधिवेशन का विधिवत उद्घाटन स्वर्गीय गुलाब खण्डेलवाल जी के निवास स्थान पर श्रीमती सुशीला मोहनका (न्यासी समिति अध्यक्ष और विश्वा की प्रबंध संपादक), श्रीमान अजय चड्डा (समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष) श्रीमती किरण खेतान (अधिवेशन की संयोजिका), डॉ. शोभा खंडेलवाल (अधिवेशन की सहसंयोजिका और उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की अध्यक्षा) और डॉ. राकेश रंजन (हिंदी समिति के सहयोगी और शुभचिंतक) ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
 
 
 
दीप प्रज्वलन: बायें से दायें - डॉ राकेश रंजन, डॉ  शोभा खंडेलवाल, श्रीमती सुशीला मोहनका, श्रीमती किरण खेतान, श्री अजय चड्डा।
 विगत चालीस वर्षों से ओहायो राज्य के एक्रोन शहर  में चलाये जा रहे हिंदी प्रशिक्षण विद्यालय के विद्यार्थी कुमार कृष पारीख ने अपने मधुर स्वरों में सरस्वती वंदना का गायन कर सभी का मन मोह लिया।
 
 
 
 
डॉ. तेज पारीक, उद्घोषक, ९ अक्टूबर २०२१
 
 
 
 
कुमार कृष पारीख, सरस्वती वंदना  
 
 
 
 
कार्यक्रम की अगली कड़ी में मैडाइना शहर के महापौर डैनिस हैनवेल ने भिडियो के द्वारा  उपस्थित होकर हिंदी भाषा के विकास, प्रचार और प्रसार में जुटे अधिवेशन के आयोजकों को बधाई और शुभकानाएं दी तथा साथ ही मैडाइना शहर में हिंदी भाषा की जागरूकता बढ़ाने हेतु अधिकारिक राजकीय उद्घोषणाओं का वाचन भी किया।
ब्रॉडव्यू हाइट्स के महापौर सैम अलाइ, इंडिपेंडेंस शहर के महापौर ग्रेगरी कर्टज़ और सोलन शहर के महापौर एडवर्ड क्रॉस ने भी अपनी शुभ कामनाएं लिखित रूप में भेजी जो कि स्मारिका में प्रकाशित है। 
 
 
 
 
डैनिस हैनवेल (मैडाइना शहर के मेयर)
 
Proclimation -- Oct 4 -10, 2021
"International Hindi Awareness Week"
 इन्हों ने अक्टूबर ९ के कार्यक्रम  का उद्घाटन किया 
 
 
एडवर्ड क्रॉस (सोलन शहर के मेयर)
 
Proclimation -- Oct , 2021 
"International Hindi Awareness Month"
इन्हों ने अक्टूबर  १० के कार्यक्रम का उद्घाटन किया
 
 
 
 
ग्रेगरी कर्टज़ (इंडिपेंडेंस शहर के मेयर)
 
Proclimation -- Oct 4 -10, 2021
"International Hindi Awareness Week"
 
 
सैम अलाइ (ब्रॉडव्यू हाइट्स शहर के मेयर)
 
Proclimation -- Oct 9 -10, 2021
"NEO Indian Community Cultural Night"
 
 
ओहायो के गवर्नर श्री माइक डीवाइन एवं  जॉर्जिया  के गवर्नर श्री ब्रायन पी केम्प ने अपनी शुभ कामनाये भेजीं। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के ट्रस्टी श्री आलोक मिश्रा जी ने अपने विचारों को और समिति के प्रयत्नोँ के बारे में लिख कर संदेश भेजा। भारत से राजस्थान के राज्यपाल  श्री कलराज मिश्र एवं  पश्चिम  बंगाल के राज्य्पाल  श्री जगदीप धनखड़ जी ने अपने संदेशों से हमलोगों का उत्साह  बढ़ाया ।   
 
 
 
 
 श्री कलराज मिश्र 
राज्यपाल, राजस्थान 
 
 
 
 
श्री जगदीप धनखड़ जी,
राज्यपाल, प. बंगाल 
 
 
 
 
श्री आलोक मिश्रा, 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के ट्रस्टी  
 
 
 
 
अधिवेशन के उद्घाटन सत्र के प्रारम्भ  में अधिवेशन संयोजिका श्रीमती किरण खेतान ने अधिवेशन में जुड़े सभी सदस्यों का स्वागत करते हुए अधिवेशन की रूपरेखा और भारत के अलावा अन्य  देशों में हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में मान्यता दिलवाने के अधिवेशन के मूल उद्देश्य को विस्तार से बताया। श्रीमती खेतान ने अधिवेशन में हिंदी भाषा को सीखने और सिखाने के लिए आयोजित नौ कार्यशालाओं, हिंदी भाषा की विकास यात्रा पर आयोजित नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम और कवि-सम्मेलन के बारे में सभी सहभागियों को अवगत करवाया।
इसके बाद श्रीमती सुशीला मोहनका ने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की १९८० के स्थापना काल से लेकर २०२१ तक की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला।  इस ऐतिहासिक यात्रा में समर्पित कार्यकर्ताओं और हिंदी प्रेमियों के योगदान को खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ याद किया। उन्होंने अधिवेशन के सभी सहभागियों से समिति की आजीवन सदस्यता को बढ़ाने की अपील करते हुए अमेरिका और अन्य देशों में समिति की नयी शाखाएं खोलने का आह्वान किया। उन्होंने  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की पत्रिका "विश्वा" के संपादक और प्रकाशन मंडल की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए हाल ही में प्रकाशित हुए पत्रिका के रंगीन संस्करणों पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।
कार्यक्रम के अगले क्रम में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति केअध्यक्ष श्री अजय चड्डा ने अपनी  ग्यारह सदस्यीय कार्यसमिति  का परिचय दिया। उन्होंने ने  धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपने दो वर्षीय अध्यक्षीय काल में समिति द्वारा हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, हिंदी साहित्य के विकास और संस्था के संगठनात्मक विस्तार से जनता जनार्दन को अवगत कराया। अधिवेशन के सभी सहभागियों ने श्री अजय चड्डा जी के कार्यकाल में उनके द्वारा किये गये प्रयासों की खुले मन से प्रशंसा की।
 
 
 
 
किरण खेतान, अधिवेशन संयोजक
 
 
 
 
सुशीला मोहनका,न्यासी समिति अध्यक्षा 
 
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उद्घाटन सत्र का समापन भाषण उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की अध्यक्षा और अधिवेशन की सहसंयोजिका
डॉ. शोभा खंडेलवाल ने दिया। उन्होंने एक बार पुनः अधिवेशन के सहभागियों का स्वागत करते हुए अपने परिवार के समिति से लम्बे जुड़ाव के संस्मरणों को भी साझा किया और अधिवेशन को सफल बनाने में कई महीनों से जुटे उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के कार्यकर्ताओं को  धन्यवाद ज्ञापित किया।
 
 
 
 
श्री अजय चड्ढा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
 
 
 
 
डॉ. शोभा खंडेलवाल, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा अध्यक्ष
 
 
 
 
विश्वा के अक्टूबर २०२१ अंक  का लोकार्पण – श्रीमती सुशीला मोहनका, न्यासी अध्यक्ष के द्वारा किया गया।  उन्होंने विश्वा की विशेषतायें बताते हुए पहली प्रति राष्ट्रीय अध्यक्ष  श्री अजय चड्डा जी को दी।
 
 
 
सुशीला मोहनका, प्रबंध संपादक, विश्वा अक्टूबर २०२१ राष्ट्रीय अध्यक्ष,श्री अजय चड्डा को देते हुये। 
...
स्मारिका का लोकार्पण – डॉ. पुरुषोत्तम गुजराती, पूर्व अध्यक्ष, अ.हि.स. की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा ने
स्मारिका का लोकार्पण किया और पहली प्रति पूर्व अध्यक्ष, अ.हि.स. की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
डॉ. शैल जैन को दी।
 
 
 
 
डॉ.पुरुषोत्तम गुजराती, स्मारिका, डॉ. शैल जैन, को देते हुए। 
 
 
अधिवेशन स्मारिका २०२१ का प्रकासन श्रीमती सुशीला मोहनका एवं श्री रमेश जोशी, के नेतृत्व में और संयोजक समिति के अकथ परिश्रम से हुवा।
 
 
 
 
अजय चड्डा, सुशीला मोहनका एवं आलोक नंदा, नैशविल शाखा अध्यक्ष, ९ अक्टूबर २०२१
 
 
अजय चड्डा, डॉ. तेज पारेख एवं आलोक नंदा, नैशविल शाखा अध्यक्ष, ९ अक्टूबर २०२१
 
 
कवि सम्मेलन ( Kavi-Sammelan )-- अक्टूबर १०, २०२१    
              मन, माटी और मानुष से जोड़ते गीतों और कविताओं के रस में सरोबार हुए
                अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति से जुड़े अप्रवासी एवं प्रवासी भारतीय श्रोतागण 
 
 
कवि परिचय
 
 
 
 
श्री चंदन राय

 
 
 
युवा गीतकार हैं। अपने श्रृंगार रस के गीत और सुमधुर कंठ के लिए भारतवर्ष के कवि सम्मेलनों का बहुचर्चित स्वर हैं। इन दिनों मुंबई में निवास करते हैं। अपनी अद्भुत लेखन शैली के लिए विख्यात हैं।
 
 
कर्नल वी पी सिंह
 
 
ओज के वरिष्ठ कवि हैं। लाल किले के कवि सम्मेलन से लेकर देश-विदेश के अनेक कवि सम्मेलनों में भारत की मिट्टी की गंध को शब्दों के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंचा चुके हैं।
 
 
श्री दिनेश रघुवंशी
 
 
गीत, ग़ज़ल, छंद और मुक्तक के सर्वाधिक सिद्ध और प्रसिद्ध रचनाकार। माँ, जैसे विषय पर 1000 से ज्यादा मुक्तक लिख चुके हैं। 8 वर्षों से प्रतिदिन कविता लिखने वाले कवि हैं।
 
 
 
 
डॉ प्रवीण शुक्ला
 
 
हास्य-व्यंग्य कवि एवं श्रेष्ठ मंच संचालक हैं। अभी तक उनकी विभिन्न विधाओं की 23 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं।
 
 
डॉ राजीव राज
 
 
इस समय सर्वाधिक लोकप्रिय युवा गीतकार। जिन्हें उनकी लेखन शैली और प्रस्तुतीकरण के कारण केवल देश मैं ही नहीं वरन विदेशों में भी अभूतपूर्व पहचान मिली है।
 
 
श्री गजेंद्र प्रियांशु
 
 
 
 
पिछले 10 वर्षों की हिंदी गीत की महत्वपूर्ण उपलब्धि। हास्य व्यंग्य के साथ-साथ गंभीर गीत लेखन के लिए सुविख्यात। बाराबंकी के रहने वाले हैं ।
 
 
 
 
सुश्री कविता किरण
 
 
गीत, गज़ल हास्य-व्यंग्य की लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकार। मंच के साथ-साथ कई फिल्मों में गीत लेखन। अपने सु मधुर प्रस्तुतीकरण के लिए विशेष पहचान रखती हैं।
 
 
श्री सत्यपाल सत्यम
 
 
गीत विधा के लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकार। अपनी मौलिक लेखन शैली और प्रस्तुतीकरण के लिए विख्यात। लाल किला सहित देश के अनेक कवि सम्मेलनों में विशिष्ट काव्य पाठ।
 
 
श्री शंभू शिखर
 
 
हास्य-व्यंग्य को गाकर पढ़ने वाले भारत के अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं। नेताजी लपेटे में और अनेक टीवी चैनल्स के माध्यम से प्रचारित प्रसारित। जिनके आज करोड़ों प्रशंसक हैं।
 
 
अन्तरराष्ट्रिय हिंदी समिति के कवि सम्मलेन का आयोजन १० से अधिक वर्षों से श्री अलोक मिश्रा करते आये हैं।  उनको समिति की तरफ से बहुत बहुत धन्यवाद।   कहते हैं की भाषा का विस्तार उसके साहित्य के सृजन में निहित है और हिंदी भाषा को ये समृद्धि उसकी अपनी संतानों ने कविता, गीत और ग़ज़ल के रूप में नित नए रूपों में दी है। वर्तमान पीढ़ी के ऐसे ही मंचीय सितारों ने अपनी कालजयी रचनाओं का वाचन अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २० वें द्विवार्षिक अधिवेशन में कर सभी श्रोताओं का मन जीत लिया। भारत के सुप्रसिद्ध कवि ड़ॉक्टर प्रवीण शुक्ल के मंचीय सञ्चालन में तीन घंटे से भी अधिक देर तक चला यह अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मलेन भारत की सुप्रसिद्ध काव्य विभूतियों से सुशोभित रहा। पूना से जुड़े भारत के प्रसिद्द ओज़ कवी कर्नल ड़ॉक्टर वी.पी. सिंह ने कवि सम्मेलन की अध्यक्षता की। दिल्ली से जुड़े भारत के सुप्रसिद्ध वीर रस के कवि श्री दिनेश रघुवंशी, नोयडा से जुड़े मंचों और सोशल मीडिया के चहेते हास्य कवि श्री शम्भू शिखर, गीत परंपरा के सर्वश्रेष्ठ नवांकुर बाराबंकी से श्री गजेंद्र प्रियांशु, राजस्थान की प्रसिद्द गजलकार ड़ॉक्टर श्रीमती कविता किरण, मेरठ से जुड़े श्रृंगार रस के हस्ताक्षर कवि श्री सत्यपाल सत्यम, इटावा से जुड़े भारत के प्रसिद्द युवा गीतकार ड़ॉक्टर राजीव राज, और मुंबई से गीत की नवीनतम अमूल्य निधि के रूप में जुड़े श्री चन्दन राय वे कुछ नाम थे जिन्होंने ज़ूम, यूट्यूब, और फेसबुक पर जुड़े हज़ारों श्रोताओं का अपनी नवीन और प्रसिद्द हस्ताक्षर कविताओं को सुनाकर मन मोह लिया।
कवि सम्मलेन के प्रारम्भ में सोलन शहर के महापौर एडवर्ड क्रॉस ने अपने शहर में सांस्कृतिक विविधता के प्रति प्रतिबद्धता अभिव्यक्त करते हुए अपने शहर में हिंदी भाषा के प्रचार, प्रसार और जागरूकता को राजकीय संकल्प के रूप में उद्घोषित किया। कवि सम्मलेन का विधिवत शुभारम्भ ड़ॉक्टर कविता किरण ने माँ वाग्देवी की स्तुति में अपनी कविता "तू ही तो हे मात शारदे कवि कुल की आराध्या है" सुनाकर किया। इसके बाद श्री चन्दन राय ने अपने प्रसिद्द गीत "बस मोहब्बत को मजहब बना लीजिये ख़त्म होने से दुनिया बचा लीजिये " और "जो मेरे पास आना नहीं चाहता, मैं भी उसको बुलाना नहीं चाहता" द्वारा विश्व शान्ति और प्रेम का सन्देश अपने मीठे सुरों में देते हुए कवि सम्मलेन को जैसे चन्दन सा महका दिया। कार्यक्रम के अगले क्रम में सर्वप्रिय गजेंद्र प्रियांशु ने जब श्रोताओं के आग्रह पर अपना सुप्रसिद्ध लोकप्रिय गीत "अभिशापित राम सुनाया" तो दुनिया भर से जुड़े श्रोताओं की आँखें अश्रुओं से नम और हथेलियाँ तालियों की गड़गड़ाहट से। इसके बाद युवा गीतकार ड़ॉक्टर राजीव राज ने "यादें झीनी रे-झीनी रे, झीनी रे " के अपने विश्व प्रसिद्द गीत को अपने चिर परिचत अंदाज़ में सुनाते हुए अप्रवासी एवं प्रवासी भारतीयों को न सिर्फ भारत की माटी से जोड़ा अपितु जीवन यात्रा का अनूठा अनुभव भी अपने सरल शब्ब्दों के माधुर्य से करवाया।
कविताओं की अगली श्रंखला में जहां कवि शंभू शिखर ने अपने चिर परिचत अंदाज़ में हास्य की फुहार से श्रोताओं को भरपूर गुदगुदाया वहीँ  कवि सत्यपाल सत्यम ने सावन और बसंत के महीनों में उपजे प्रकृति के सौंदर्य और श्रृंगार को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ते हुए अपने मीठे गीतों से कवि सम्मलेन की फ़िज़ा रंगीन कर दी। ड़ॉक्टर कविता किरण ने अपने मधुर स्वर में जहाँ अपनी गजलें गुनगुनायी खूबसूरत बिम्बों से सज्जित अपने प्रतिनिधि गीत के माध्यम से श्रोताओं के मन में उम्र को धता बताते नवयौवन का उल्लास जागृत कर दिया। कवि श्री दिनेश रघुवंशी ने तीखे व्यंग्य "पैसे पैसे करने वाले इंसां सुन, इंसानों से पैसे बात नहीं करते" के माध्यम से टूटते रिश्तों और विकृत हो रहे मानवीय संबंधों, संवादों और शहरी जीवन शैली पर ज़रूरी और तीखे कटाक्ष के साथ अपना काव्य वाचन किया। कवि ड़ॉक्टर प्रवीण शुक्ल ने राजनीती और चापलूसी पर पढ़ी अपनी हास्य कविताओं के माध्यम से व्यंग्य के तीखे बाण भी छोड़े और श्रोताओं के  चेहरे पर मुस्कान भी बिखेरी। कवि सम्मेलन के अंत में कार्यक्रम अध्यक्ष कर्नल ड़ॉक्टर वी.पी. सिंह ने अपनी विश्व प्रसिद्द भारत और हिन्दुस्तान के चरित्र, इतिहास और इसके निर्माण में खपे महापुरुषों, साहित्यकारों, और कलाकारों को वर्णित करती कविता सुनाकर श्रोताओं को शब्दहीन कर दिया। कार्यक्रम का अंत अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की सदस्या श्रीमती ऋचा माथुर ने सभी कवियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन कर किया।
 
 
सांस्कृतिक कार्यक्रम संध्या  (Cultural Evening)  विस्तृत समाचार अगले अंक (दिसम्बर) में
 
 
कार्यशाला (Workshops) – कार्यशालाओं  विस्तृत समाचार अगले अंक (दिसम्बर) में 
 
 
समुदाय  के समाचार 
 
 
 बधाई Pravasi Bhartiya Award-UPMA-2021 Dr. Nilu Gupta, CA 
 
 
 
प्रो. नीलू गुप्ता का जन्म स्थान फ़रीदाबाद, हरियाणा है। पिछले ४ दशकों से अधिक समय से कैलिफ़ोर्निया में रह रही हैं और ‘डि एन्जा ‘कॉलेज,कुपरटीनो, यूनिवर्सिटी में हिन्दी की प्रोफ़ेसर हैं। इनकी रुचि समाजसेवा, अध्यापन, कविता, कहानी लेखन प्रकाशन में है। इनके काव्य संग्रह ‘जीवन फूलों की डाली’,‘मेरे देश की धरती’ हाइकु संग्रह ‘गगन उजियारा’ कहानी संग्रह ‘ सर्वे भवन्तु सुखिन: ‘सरल हिन्दी भाषा’, ‘सरल हिन्दी भारती’, ‘अहा हिन्दी’ पत्रिका ‘कौस्तुभ’ सम्पादन ‘छज्जू का चौबारा’, ‘माँ धरणी पिता गगन’ चीख से चिन्तन ‘लॉकडाउन’, ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ अनुवाद रिसोर्स गाइड (सान्ता क्लारा) संस्थापिका ‘उपमा ग्लोबल अमेरिका ‘विश्व हिन्दी ज्योति’ अमेरिका।
अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान। कोन्सलावास के तत्वावधान में ‘हिन्दी दिवस’, कविसम्मेलन तथा साहित्यिक वेबिनार की 20 वर्षों से आयोजिका हैं।
सम्मान महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा ‘प्रवासी भारतीय सम्मान’ से 2021 में सम्मानित। हिन्दी नागरी प्रचारिणी सभा देहली, संस्कृत भारती देहली, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्थान मुम्बई, कोन्सलालास कैलिफ़ोर्निया, अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी समिति अमेरिका इत्यादि के द्वारा राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय सम्मानों से पुरस्कृत। कोरोना काल 2020-2021 में, राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा अनेक विश्वविद्यालयों के साथ, विभिन्न विषयों के वेबिनार तथा कविसम्मेलनों में भागीदारी तथा सम्मानित। राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में लेख तथा कविताएँ प्रकाशित। विश्व हिन्दी सचिवालय मॉरिशस। 
 
 
श्रद्धांजलि: डॉ. मन्नू भंडारी (दिल्ली, भारत)  
 
 
 
 
डॉ. मन्नू भंडारी
 
३ अप्रैल १९३१ – १५ नवम्बर २०२१
मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्य प्रदेश के भानपुरा में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई अजमेर, राजस्थान में हुई। कोलकाता एवं बनारस विश्वविद्यालयों से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। पेशे से अध्यापिका मन्नू जी ने लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘मिरांडा हाउस कॉलेज’ में पढ़ाया।
 
 
Title
 
 हिन्दी साहित्य के अग्रणी लेखकों में गिनी जाने वालीं मन्नू भण्डारी ने बिना किसी वाद या आंदोलन का सहारा लिए हिन्दी कहानी को पठनीयता और लोकप्रियता के नए आयाम दिए। ‘यही सच है’ शीर्षक उनकी कहानी पर आधारित बासु चटर्जी निर्देशित फिल्म ‘रजनीगंधा’ ने साहित्य और जनप्रिय सिनेमा के बीच एक नया रिश्ता बनाया। बासु चटर्जी के लिए उन्होंने कुछ और फिल्में भी लिखीं। उनकी कई कहानियों का नाट्य-मंचन भी हुआ। उनके लिखे ‘महाभोज’ उपन्यास का नाट्य-रूपांतरण आज भी देश भर में अनेक रंगमंडलों द्वारा खेला जाता है।उनके उपन्यास ‘आपका बंटी’ को दाम्पत्य जीवन तथा बाल-मनोविज्ञान के संदर्भ में एक अनुपम रचना माना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘एक कहानी यह भी’ नाम से अपनी आत्मकथा भी लिखी जिसे मध्यवर्गीय परिवेश में पली-बढ़ी एक साधारण स्त्री के लेखक बनने की दस्तावेजी यात्रा के रूप में पढ़ा जाता है।
मन्नू भंडारी जी ने अपने लेखन में स्वतंत्रता-बाद की भारतीय स्त्री के मन को एक प्रामाणिक स्वर दिया और परिवार की चहारदीवारी में विकल बदलाव की आकांक्षाओं को रेखांकित किया।
उनके न रहने से हिन्दी के पटल पर एक बड़ी जगह खाली हो गई है जो हमेशा हमें उनकी अनुपस्थिति का भान कराती रहेगी। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से आदर सहित श्रन्धांजलि।
 
 
 
दो कविताएँ
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 डॉ. लक्ष्मीनारायण गुप्ता
 
Lडॉ. लक्ष्मीनारायण गुप्ता, हर विषय पर सदैव अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए सक्रिय हैं। अ.हि.स. के पुराने आजीवन सदस्य हैं। रोचेस्टर, न्यू यॉर्क शाखा के अध्यक्ष रह चुके हैं.
 
 
 
 
मुजरिम
 
.लिख नहीं सकता अब प्यार मोहब्बत के तराने
पश्त है दुनिया सभी इस वायरस के सामने
करोड़ों बीमार हैं मर चुके लाखों
कब ख़त्म होगी यह मुसीबत कोई नहीं जाने
एक इंसान जो है मूर्ख निकम्मा और चोर
उसके गंदे हाथों में है मुल्क की बागडोर
वह वही करेगा जो पूटिन कहेगा
मुल्क जाये भाड में वह अपनी जेब भरेगा
नक़ाब पहनने वालों की हँसी उड़ाता है
दूरी रखने की बात बिलकुल नहीं समझता है
जनता के स्वास्थ्य की फ़िक्र नहीं करता है
इतने लोग मर गए हैं फिर भी अपने को ए प्लस देता है
ख़ुद ही बीमार हो गया फिर भी
उनका रवैया नहीं बदला है
ब्राज़ील के बोल्सनारो की तरह
झूठी दबंग से बाज नहीं आता है
कितने लोगों की जान नहीं जाती
अगर सत्ता ने इस बीमारी की
गम्भीरता को समझा होता
और इस व्याधि का शुरू
से ही नियंत्रण किया होता
अब ज़रूरी है कि सभी अमेरिकन
नागरिक प्रजातंत्र में भाग लै
और इस मुजरिम का पत्ता काट दें
अच्छा होगा कि इस पर मुक़दमा चलायें
और इसे बड़े घर की हवा खिलायें
 
 
  नशा
 
किसी को अपने हुस्न का नशा है
किसी को अपनी दौलत का नशा है
किसी को अपनी शोहरत का नशा है
किसी को अपनी शक्ति का नशा है
कोई अपनी इज़्ज़त के क़ायल हैं
कोई अपनी शराफ़त के क़ायल हैं
कोई अपनी दरियादिली के क़ायल हैं
कोई अपनी शान शौकत के क़ायल हैं
कोई अपने को भारी विद्वान समझते हैं
कोई अपने को भगवान समझते हैं
कोई अपने को बड़ा समझदार समझते हैं
कोई अपने को बड़ा पहलवान समझते हैं
हर एक को लगता है कि वह सबसे अच्छा है
हालाँकि अपने आप कहना शोभा नहीं देता है
कुछ लोगों को चाटुकार मिल जाते हैं
जो अपने स्वार्थ के लिेए गधे को भी दादा कह सकते हैं
सारांश में कहूँ तो बात यह है
सभी का अहं बहुत ज़्यादा प्रबल है
बौद्ध कहते हैं कि अहं होता ही नहीं है
ये अहं कुछ कामदेव की तरह है
न होने के बावजूद भी होने वालों से अधिक सफल है
इसे अहं कहो या माया कहो
वेदान्ती कहते हैं कि यह मिथ्या है
लेकिन सब ज्ञानी ध्यानी इसकी लपेट में आए हैं
नारद जैसे ज्ञानियों के इसने छक्के छुड़ाए हैं
 
 
 
 
श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
 
 
वीरांगना झलकारी बाई
 
 झाँसी की रानी के समान, झाँसी की एक निशानी है।
है सदा शौर्य की प्यास जहाँ, पिघले लोहे सा पानी है।।

बचपन से लेकर मरने तक, मरती ही नहीं जवानी है।
वीरता लहू में बहती है, घर घर की यही कहानी है।।

बुन्देले तो बुन्देले हैं, जिनकी गाथा अलबेली है।
उस पर गर्वित बुन्देलखण्ड, हर कौम यहाँ बुन्देली है।।

मैं कथा सुनाऊँ यहाँ एक, योद्धा झलकारी बाई थी।
जो मर्द न थी पर मर्दों के, भी कान काटने आई थी।।

वह वीर व्रता अपनी रानी, झाँसी के लिए समर्पित थी।
लक्ष्मीबाई की सेना में, दुर्गा दल की सेनापति थी।।

हूबहू लक्ष्मी बाई सी, वीरता भवानी जैसी थी।
वय में भी लगभग थी समान, सूरत भी रानी जैसी थी।।

तलवार पकड़ते ही कर में, पुरजोर उछलने लगती थी।
जब युद्ध भूमि में उतरी तो, पैंतरे बदलने लगती थी।।

पानी सी गति पानी सी मति, वह पत्थर वायु तरल भी थी।
भारत के लिए सुधा सी, तो बैरी के लिए गरल ही थी।

है ग्राम भोजला झाँसी, का कह रहा कथा किलकारी की।
थे पिता सदोवा माता थी, जमुना देवी झलकारी की।।

सन अट्ठारह सौ तीस और, दिन था बाईस नवम्बर का।
धरती नाची थी झूम झूम, तन मन पुलकित था अम्बर का।।

उस दिन जमुना देवी ने थी, बालिका नहीं वीरता जनी।
कोरी कुल की कोमल कन्या, जो झाँसी की अस्मिता बनी।।

छः वर्ष बाद जमुना देवी, संसार छोड़ कर चली गईं।
कह गई पिता से पालो तुम, कर जोड़ मोड़ मुख चलीं गईं।।

फिर पिता पालने लगे उसे, चल तीर चला तलवार चला।
घोड़े पर बैठ लगाम पकड़, तू सीख सीख हर युद्धकला।

शाला गुरुकुल की सीख न थी, फिर भी कौशल सीखे सारे।
चर्चे चल पड़े वीरता के, गलियों में क्या द्वारे द्वारे।।

करने पड़ते थे सभी काम, घर की ऐसी लाचारी थी।
जंगल से ईंधन तक लाती, आखिर कुछ जिम्मेदारी थी।।

आ गया एक दिन एक बाघ,वन में बाणों सा छूट पड़ा।
झपटा सहसा झलकारी पर, बन काल क्रूर सा टूट पड़ा।।

झलकारी लिए कुल्हाड़ी थी, देखा तो ऐसा वार किया।
बस उसी वार से एक बार, में ही हिंसक पशु मार दिया।।

बच गई लली बच गई आज, यह खबर पवन ले चले उड़े।
हो उठी वीरता पूजनीय, इस तरह कीर्ति के चरण बढ़े।।

झाँसी की सेना में योद्धा, पूरन तोपची सिपाही से।
हो गया विवाह वधू बाला, झलकारी का शुचिताई से।।

गौरी पूजा के अवसर पर, रानी का मान बढ़ाने को।
नारियाँ गाँव की जाती थीं, झाँसी पर भेंट चढ़ाने को।।

इस बार वधू झलकारी भी, चल पड़ी देखने रानी को।
यूँ लगा भाग्य ने भेज दिया, लक्ष्मी के पास भवानी को।।

देखी कद काठी रूप रंग, वीरता भरा यशगान सुना।
अपनी सी छवि पा रानी ने, सेविका बना कर मान चुना।।

रानी प्रसन्न थी सेवा से, विश्वास बढ़ा निर्देश किया।
रुचि देख वीर झलकारी को दुर्गा सेना में भेज दिया।।

धीरे-धीरे रण कला खुली, हथियार चलाने लगी सभी।
रानी अभ्यास कराने को, खुद भी आती थी कभी कभी।।

कद बढ़ा और पद भार बढ़ा, विश्वास बढ़ा नवनारी थी।
दुर्गासेना की सेनापति, बन चुकी आज झलकारी थी।।

बस उसी समय डलहौजी ने, जब हड़प नीति का दाँव चला।
रानी को भी सन्तान न थी, झाँसी पर धरने पाँव चला।।

कर चला कूच ह्यूरोज ओज, के साथ किले को घेर लिया।
झाँसी का विलय करो या रण, प्रस्ताव किले में भेज दिया।।

गोरों की ताकत के सम्मुख, हर ताकत बौनी लगती थी।
पर झाँसी के मंसूबों से, अनहोनी होनी लगती थी।।

प्रस्ताव सुना बलिवीरों ने, रानी से राय शुमारी की।
रणभूमि रक्तरंजित करने, की वीरों ने तैयारी की।।
रानी का उत्तर सुनने को , रुक गई साँस सरदारों की।
बिजली सी कौंध उठी धड़कन, बढ़ गई उड़ान सितारों की।।

दरबार भरा था वीरों का,सन्नद्ध सन्न थे दरबारी।
हर दृष्टि गड़ी थी रानी पर, झाँसी की रानी हुंकारी।।
सूरज पश्चिम में उगे या कि, हर तारा रोज पलट खाए।
धरती धँस उठे रसातल में, चाहे ब्रह्माण्ड सिमट जाए।।
 
 
श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम ए की डिग्री प्राप्त की | इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आप हिन्दी काव्य में छन्द परम्परा की रचनाओं का सृजन कर रहे हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है। 22 नवम्बर 2021को प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की सेनानी वीरांगना झलकारी बाई की 191वीं जयन्ती है। इस अवसर पर यह विशेष रचना प्रस्तुत है।
 
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तो भी जीते जी धरती माँ, माँ सी है कभी नहीं दूँगी।
कितने भी संकट टूट पड़ें, पर झाँसी कभी नहीं दूँगी।

निर्णय ले लिया उठो वीरो, आ गई घड़ी बलिदानों की।
इतना सुनते ही गूँज उठी, हाँ में हाँ वीर जवानों की।।

तन गईं किले की तलवारें, बुन्देलखण्ड कुलबुला उठा।
सूरज तक ठिठुर गया सुनकर, वीरत्व लिए जलजला उठा।।

तन गई तोप चल पड़ी कुमुक, बुन्देले वीर जवानों की।
दुर्गा सेना चल पड़ी बढ़ी अभिलाष लिए बलिदानों की।।

जिस ओर अड़ा गोरों का बल, उस ओर बढ़ गए बुन्देले।
कायर दुश्मन की छाती को, झकझोर चढ़ गए बुन्देले।।

प्राणों को रखा हथेली पर, दुर्गा सेना का कहर ढहा।
दुश्मन के मरते वीरों ने, जब अबलाओं को बला कहा।।

इस छोर अड़ गई रानी तो, उस छोर चढ़ गई झलकारी।
इस ओर मौत का ताण्डव था, उस ओर काल की किलकारी।।

शोणित की प्यासी तलवारें, क्रूरता बढ़ाने लगीं वहीं।
दोनों चण्डी के चरणों में, नव मुण्ड चढ़ाने लगीं वहीं।।

अँगरेज मारते चौदह तो, दस बीस मारती झलकारी।
दस पाँच उड़ाते बुन्देले, फिर भी रानी सबसे भारी।।

गद्दार सिपाही दुल्हे ने, झाँसी को डाँवाडोल किया।
रखना था बन्द किले का जो, उस कवच द्वार को खोल दिया।।

पर खतरा देखा रानी पर, झलकारी नया खेल खेली।
अपनी पगड़ी रानी को दी, रानी की पगड़ी खुद ले ली।।

बोली चिन्ता छोड़ो रण की, दुश्मन को मैं सदमा दूँगी।
नकली रानी बन झाँसी की, इन गोरों को चकमा दूँगी।।

पति देव किले की रक्षा में, हो गए खेत झलकारी के।
लेकिन इस दुख को भुला दिया, दिन याद किए लाचारी के।।

फिर कहा चली जाओ जल्दी, रानी जी तुम्हें बचाना है।
लो पवन वेग से उडो, यहाँ से अभी निकल कर जाना है।।

सकुशल रानी को भेज दिया, चुपचाप मगर फिर हुंकारी।।
गोरों ने रानी ही समझा, लेकिन थी असली झलकारी।।

फिर वीर बाँकुरी चण्डी सी, दुश्मन सेना पर टूट पड़ी।
सिंहनी खून की प्यासी सी, विष बुझे तीर सी छूट पड़ी।

गोरों ने समझ महारानी, झलकारी को जब घेर लिया।
सौ सौ दुश्मन के साथ भिड़ी बावन गोरों को ढेर किया।।

इतने में एक सिपाही ने, धमकी दी भेद बताने को।
गोली मारी झलकारी ने, पर लगी फिरंगी डाने को।।

खुल गया भेद कर लिया कैद, जब नकली रानी बाई तब।
ह्यूरोज न रोक सका रण में, खुद करने लगा बड़ाई तब।।

पर यह तो पूरी पागल है, यह सोच उसी क्षण छोड़ दिया।
जैसे ही छूटी झलकारी, चुपचाप युद्ध को मोड़ दिया।

लग गई किले पर फिर से चढ़, तोपों से गोले बरसाने।
हिल उठी फौज अँग्रेजों की, भागो भागो सब चिल्लाने।।

धज्जियाँ उड़ाती काल बनी, मजबूत खम्भ से टूट गए।
बाँटती मौत थी तोपों से, गोरों के छक्के छूट गए।।

यमराज बन गई झलकारी, अनलिखी मौत सी लिखती थी।
बस मौत मौत बस मौत मौत, बस मौत मौत ही दिखती थी।

लेकिन दुश्मन की एक तोप, का गोला गिरा मुहाने पर।
हो गयी मौन वह वीर बली, सीधी चढ़ गई निशाने पर।।

थम उठीं टनन टन तलवारें, चूड़ियाँ खनन खन खन्न हुईं।
थम गया काल घिर गई घटा,रुक गई हवा सुन सन्न हुई।।

थी अन्तिम साँस रही तब तक, झलकारी हार नहीं मानी।
जब प्राण पखेरू हुए तभी, हथियारों ने हारी मानी।।

गिर पड़ी गाज सी धरती पर, हो गई रक्त से लाल मही।
कह उठी टिटहरी सुनो सुनो, झलकारी जग में नहीं रही।।

रो उठी धरा रो उठा गगन, रो उठा पवन सन्नाटा था।
लगता था आज वीरता को, कुछ कापुरुषों ने काटा था।।

हे धन्य धरा की धन्य सुते ! झाँसी की न्यारी नारी तू।
तू कालजयी वीरांग लली, भारत भर की झलकारी तू।।

तुझ पर गर्वित है ऋणी देश, भीषण रण की बलिहारी तू।
कवि प्राण नमन करता है कर, स्वीकार अरी झलकारी तू।।

बलि पथ पर निकले वीरों की, वीरता समर हो जाती है।
शुभ कीर्ति फैलती है जग में, जीवनी अमर हो जाती है।।


 
 
 
अपनी कलम से 
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. देव कुमार गुप्ता
 
 
डॉ. देव कुमार गुप्ता न्यू जर्सी में रहते है। आप एक सेवानिवृत्त निश्चेतना विशेषज्ञ (Anesthesiologist) है। सेवानिवृत्त होने के बाद, इन्होंने फोटोग्राफी स्कूल में जा कर पढाई की और एक पेशेवर फोटोग्राफर बन गये। अब ये पूर्ण रूप से फोटोग्राफी का आनंद स्वयं भी लेते हैं तथा ओरों को भी सिखाते हैं। स्थानीय हिन्दी भाषी व्यक्तियों की मासिक बैठकों में, चर्चा के लिए चुने गए विषयों पर लिखते भी हैं। अपने बाल काल के और अपने पुत्र के बाल काल की दो घटनाओं को बड़े ही रोचक ढंग से लिखा है। उनका कहना है कि ‘इससे मेरी हिंदी भाषा अपडेट रहती है’
 
 
 बचपन की एक दिलचस्प कहानी
 
 
मैं उस समय शायद तीसरी कक्षा में था। स्कूल बहुत दूर नहीं थी। अकेले पैदल चले जाया करते थे। पंडित जी जो घर करने का काम देते थे, वो कब कर लेते थे, पता ही नहीं लगता था। घर में बहनों के साथ और बाहर दोस्तों के साथ खेला करते थे। ऐसी ही कुछ कहानियाँ याद हैं जो काफी धुँधली हो चुकी हैं। पंडित जी का काला डंडा जो मेज पर रखा रहता था, अभी भी याद है। यदि homework ठीक से नहीं किया तो हाथ पर डंडे पड़ते थे। मुझे एक बार पड़े थे। हाथ सूजकर लाल हो जाता था - वो कैसे भूल सकता हूँ?
एक कहानी मैं ज़रूर बताना चाहूँगा जो मैं अभी तक भूला नहीं हूँ। हमारे पंडित जी का नाम नंदकिशोर दिक्षित था। काफी अच्छे थे। पढ़ाते भी अच्छा थे। एक बार उन्होंने घर पर करने के लिए कुछ homework दिया था। वो शायद मुश्किल होगा या फिर किसी और कोई कारणवश मेरे सिवा और किसी ने भी नहीं किया था। पंडित जी ने जिन्होंने नहीं किया था उन्हें खड़ा हो जाने को कहा। उन दिनों हम क्लास में ज़मीन पर बैठा करते थे और लिखना या किताब पढ़ना डेढ़ या दो फ़ुट उँची लकड़ी के डेस्क जो सामने रखी रहती थी, उस पर करते थे। अब पंडित जी ने मुझे खड़ा होने के कहा। मैं बड़े असमंजस में पड़ा। मेरे खड़े होने पर पंडित जी ने हुक्म दिया, ‘देवकुमार, सब को एक एक चाँटा लगाओ’। मैं बड़ा झिझका। पंडित जी बोले, ‘लगाओ, वर्ना ये सब तुम्हें लगाएँगे’।
मेरे पास अब कोई चारा रहा नहीं रहा। मैंने धीरे से मेरे पास जो मेरा सहपाठी था, उसे चाँटा लगाया।
पंडित जी फिर दहाड़े, ‘अरे ऐसे नहीं, बाँए हाथ से उसका दाँया कान पकड़ो और फिर जोर से लगाओ’।
मैंने वैसा ही किया। एक लड़का मुझ से काफी ऊँचा था। मैं काफी छोटा था तो उसके गाल तक पहुँचना आसान नहीं लग रहा था। पंडित जी ने मुझे डेस्क पर खड़े होकर लगाने को कहा। मैं डेस्क पर खड़ा हुआ और मैंने उसकी ओर देखा। मैं झिझक रहा था। उसे ख़्याल आ गया। उसने मेरे सामने देखा और थोड़ा सा सिर हिला दिया, मानो क़ह रहा था ‘लगा दो, कोई बात नहीं’ और मैंने अपना काम पूरा किया। क़रीब १५ बच्चे होंगे। सबको लगाते लगाते मेरा हाथ लाल हो गया। पंडित जी हलके से मुस्कुरा रहे थे।
मुझे डर था कि सारा क्लास मेरा दुश्मन हो जायगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। कोई रोष नहीं, कोई दुश्मनावट नहीं, कोई झिझक नहीं, वही साथ में हँसना हँसाना, खेलना-कूदना। यही तो बचपन की सुंदरता है। उस समय प्रेम, क्षमा, समझदारी आदि सभी गुण होते हैं जो इस संसार में बड़े होते होते सब छूट जाते हैं।
 
 
ये क्या विडंबना है?
 
 
कुछ वर्षों पहले मैंने, मेरे बेटे के साथ एक फोटो खिंचवाया था। उस समय मैं मेरे गंजे सिर पर बनावटी बाल (hair piece) लगाया करता था और मेरे बेटे ने अपने सिर के अच्छे खासे बाल मुंडवा लिए थे। ये फ़ोटो मैं जब भी देखता हूँ तब-तब मुझे हँसी आती है। जिसके सिर पर बाल हैं, उसे नहीं चाहिए और जिसके सिर पर बाल नहीं है, उसे चाहिए। और यही मैं देखता आया हूँ और ये शायद मानव स्वभाव है कि ‘जो है वो नहीं चाहिए और जो नहीं है, वो चाहिए’। जैसे कि जिनके चेहरे का रंग गहरा है वे रंग हल्का करना चाहते हैं - मेकअप वग़ैरह लगाकर और जिनका रंग गोरा है वे क्रीम लगाकर या टेनिंग सलून या सागरतट (beach) पर जाकर कड़ी धूप में पड़े रहकर अपना रंग गहरा करना चाहते हैं। जिन युवा महिलाओं के बाल सीधे हैं, उन्हें घुंघराले चाहिएँ और जिन के बाल घुंघराले हैं, उन्हें सीधे बाल चाहिएँ ।
जैसा कि आप सब जानते है और मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि हमारा अमरीका स्पर्धा का देश है। लेकिन इसकी भी कोई एक सीमा होनी चाहिए। बच्चों को हम बच्चे नहीं रहने देना चाहते। थोड़ा सा बड़ा हुआ कि उसे ढेर सारी प्रवृत्तियों में भरती कर देते हैं। फ़ुटबॉल, जिसे यहाँ हम soccer कहते है, टेनिस, बास्केटबॉल, तैराकी (swimming), गाना-बजाना, पियानो सीखना आदि जैसी अनेक गतिविधियों में लगा देते हैं और बिचारे बच्चों को स्कूल का होमवर्क भी करना होता है। आप नहीं मानेंगे, एक जगह मैंने एक विज्ञापन देखा था जिसमें डेड़ साल की उम्र के बच्चों के लिए soccer camp का ज़िक्र था। आपको पता होगा कि सन् १९९६ में एक ६ साल की बच्ची को उसकी माँ ने जो खुद ब्यूटी क्वीन न बन सकी, उसे ख़ूब सेक्सी कपड़े और मेकअप वग़ैरह करके उसे ब्यूटी क्वीन की स्पर्धा में भाग लिवाया और वो जीती भी लेकिन थोड़े से समय में किसी ने उसकी हत्या कर दी। उसका नाम JonBenét Patricia Ramsey था। अरे भाई, कुछ साल तो उन्हें बच्चा रहने दो। लेकिन जैसा मैंने कहा, बचपन है तो नहीं चाहिये, बड़ा नहीं है तो उसे बड़ा बनाना है। बच्चों का बचपन छीन लिया जाता है।
Halloween आया तो बच्चों को जानवर, भूत-भूतनी या फिर और कोई TV character बना देंगे। यहाँ तक कि अपने पालतू कुत्तों को भी नहीं छोड़ते। उन्हें देखने में इन्सान जैसे बनाने लगे रहते हैं। उसे लड़की से कपड़े पहनाकर, चश्मा लगाकर पिछले दो पैरों खड़ा करके अपने साथ चलाएँगे या फिर कभी तो बिचारे के सारे शरीर के बाल मुंडवाकर सिर्फ़ सिर के आसपास के बाल छोड़कर उन्हें सिंह जैसा दिखाना चाहते है। बेचारा कुत्ता भी सोचता होगा कि ये मुझे क्या कर रहे हैं, अरे भई, मुझे कुत्ता ही रहने दो। लेकिन सुने कौन?
जब हम बड़े हुए, बुड्ढे हुए तो बुढ़ापा नहीं चाहिए, जवानी चाहिए। हम exercise करेंगे, walk करने जाएँगे, Gym में जाएँगे, खाने पर ध्यान देंगे, तोंद कम करने की कोशिश करेंगे, अपने दिमाग़ को व्यस्त रखने का प्रयत्न करेंगे। अपने मुखारविंद पर अगर झुर्रियाँ दिखाई देने लगीं तो वो नहीं चाहिए, युवावस्था की आभा वापिस लाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी द्वारा उन्हें निकलवाने में लग जाएँगे। यदि पुरानी कार है तो नहीं चाहिए, कोई महँगी exotic कार चाहिए। पहला मकान लिया, कुछ वर्षों बाद वो नहीं चाहिए, बड़े वाला चाहिए, फिर कुछ सालों बाद वो भी नहीं चाहिए, छोटा चाहिए!
ये क्या विडंबना है? सोचने पर लगता है कि शायद ये मानव स्वभाव की ही विडंबना है। आपने सुना होगा कि अमरीका की ये फिलोसोफी है ‘Bigger or Better’. और यही मन की विचित्रता है और शायद हमेशा से ही चली आई है।
 
 
 
 
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. रवि कांत चंदन
 
 
डॉ. रविकांत चन्द, अध्यापक, लेखक और विचारक है। अभी लखनऊ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर है। इनका ईमेल आई.डी.: rush2ravikant@gmail.com है।
 
 
"बच्चा किसके साथ अच्छी तरह से खेल सकता है, अपनी माँ के साथ या पराई माँ के साथ! अगर कोई आदमी किसी जबान के साथ खेलना चाहे और जबान का मजा तो तभी आता है, जब उसको बोलने वाला या लिखने वाला उसके साथ खेले, तो कौन हिंदुस्तानी है जो अंग्रेजी के साथ खेल सकता है? हिंदुस्तानी आदमी तेलुगू, हिंदी, उर्दू, बंगाली, मराठी के साथ खेल सकता है। उसमें नए-नए ढांचे बना सकता है। उसमें जान डाल सकता है, रंग ला सकता है। बच्चा अपनी माँ के साथ जितनी अच्छी तरह से खेल सकता है, दूसरे की माँ के साथ उतनी अच्छी तरह से नहीं खेल सकता।"- डॉ. राममनोहर लोहिया

आज यूपी और राजस्थान जैसे राज्यों में अंग्रेजी को अनिवार्य बना रहे हैं। हिंदी प्रेमी नेता शुद्ध हिंदी में संबोधन देते हैं और प्रश्न भी उठाते है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन सकी, लेकिन सरकारी कार्यालयों से लेकर शिक्षण संस्थानों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए उनके प्रयास सिफर हैं। दरअसल, हिंदू धर्म की तरह ही हिंदी भाषा भी उनके लिए प्रोपेगेंडा मात्र है। वास्तविकता यह है कि ये ना हिंदी भाषा के प्रति ईमानदार हैं और ना वफादार।

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा बनाया गया। लेकिन इसमें एक शर्त जोड़ दी गई कि अगले 15 साल तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा। तर्क यह दिया गया कि इस दौरान हिंदी को समुन्नत बनाकर 26 जनवरी 1965 को अंग्रेजी के स्थान पर पूर्णरूप से लागू कर दिया जाएगा। इतिहास गवाह है कि यह तारीख आज तक नहीं आई। 1960 के दशक में बंगाल और दक्षिणी प्रांतों खासकर तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन हुए। नतीजे में 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित करके अंग्रेजी को सह राजभाषा का दर्जा दे दिया गया और यह प्रावधान किया गया कि गैर हिंदी भाषी प्रांतों की जब तक सहमति नहीं होती है, राजभाषा हिंदी को लागू नहीं किया जाएगा। यह व्यवस्था आज भी जारी है। 1976 के राजभाषा अधिनियम द्वारा भाषिक आधार पर भारत को क, ख, ग, तीन क्षेत्रों में विभाजित करके सरकारी कामकाज चल रहा है। दरअसल, अंग्रेजी का प्रयोग अनवरत जारी है। हिंदी की स्थिति अभी भी, प्रसिद्ध हिंदी कवि रघुवीर सहाय के शब्दों में 'दुहाजू की बीवी' की तरह है।

प्रतिवर्ष 14 सितंबर को सरकारी दफ्तरों, निकायों और महकमों में हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। एक रस्मी उत्सव की तरह हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए संकल्प दोहराए जाते हैं। लेकिन अगले दिन से सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। सवाल उठता है कि हिंदी के प्रयोग में सफलता क्यों नहीं मिली? गैर-हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी को स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त हुई? राजभाषा हिंदी को लागू करने में सरकारी ढुलमुलपन का विरोध करते हुए समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया ने सार्थक हस्तक्षेप किया। डॉक्टर लोहिया ने मुखरता से राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग पर कड़ी आपत्ति की। इस वजह से आम तौर पर माना जाता है कि लोहिया अंग्रेजी के विरोधी थे। सच्चाई यह है कि लोहिया अंग्रेजी के विरोधी नहीं बल्कि हिंदी के समर्थक हैं। दरअसल, अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में डॉक्टर लोहिया किसी भाषा के विरोधी नहीं थे। वे हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के भी उतने ही समर्थक थे। लोहिया अंग्रेजी भाषा के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उसकी मानसिकता और सामंती स्वभाव के विरोधी थे। अंग्रेजी भाषा जन विरोधी है। देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों के लिए अंग्रेजी नुकसानदेह है। 'सामंती भाषा बनाम लोक भाषा' निबंध में लोहिया ने लिखा है, "अंग्रेजी हिंदुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिए नहीं पहुँचा रही है कि वह विदेशी है बल्कि इसलिए कि भारतीय प्रसंग में वह सामंती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह उसे सत्ता या स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जनसमुदाय पर अधिकार और शोषण करने का हथियार है।"

डॉ लोहिया ने हिंदी विरोधी आंदोलन को भी बहुत बारीकी से परखा। उनका स्पष्ट मानना है कि तटीय प्रदेशों में हिंदी का विरोध संपन्न वर्ग द्वारा किया गया। इस तबके ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि भाषाओं को बढ़ाने और उनका समर्थन करने के बजाय हिंदी का विरोध करते हुए अंग्रेजी की वकालत की। दरअसल यह वर्ग मेहनतकश कमजोर वर्गों को यथास्थिति में रखने के लिए और अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी का समर्थन करता है। वस्तुतः हिंदी का विरोध भाषाई अस्मिता की राजनीति के जरिए अंग्रेजी पढ़े लिखे संपन्न वर्ग के हितों के संरक्षण और उनके वर्चस्व को कायम रखने के लिए किया गया। सरकारी कामकाज और देश स्तरीय परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता से हाशिए के तबकों को न तो न्याय मिल सकता है और ना ही सही अर्थ में जनतंत्र स्थापित हो सकता है। लोहिया ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है, "लोकभाषा के बिना लोकराज असंभव है। कुछ लोग यह गलत सोचते हैं कि उनके बच्चों को मौका मिलने पर वह अंग्रेजी में उच्च वर्ग जैसी ही योग्यता हासिल कर सकते हैं। सौ में एक की बात अलग है, पर यह असंभव है। उच्च वर्ग अपने घरों में अंग्रेजी का वातावरण बना सकते हैं और पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं। विदेशी भाषाओं के अध्ययन में जनता इन पुश्तैनी गुलामों का मुकाबला नहीं कर सकती।"

जब हिंदी की जगह अंग्रेजी को राजभाषा पद पर बिठाया गया, तब यह तर्क दिया गया कि हिंदी समृद्ध नहीं है। उसके पास पारिभाषिक शब्दावली की कमी है। यही तर्क देशी भाषाओं के लिए दिया गया और पूरे देश में विदेशी अंग्रेजी भाषा को थोप दिया गया। यह बात सही है कि अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली की कमी है। लेकिन तमाम भारतीय भाषाओं के पास अंग्रेजी की अपेक्षा दो गुना शब्द भंडार है। हिंदी का प्रयोग करने और नई शब्दावली के निर्माण से इस कमजोरी को दूर किया जा सकता है। लोहिया ने 'देशी भाषाएं बनाम अंग्रेजी' निबंध में लिखा, "जो लोग कहते हैं कि तेलुगू, हिंदी, उर्दू, मराठी गरीब भाषाएं हैं और आधुनिक दुनिया के लायक नहीं है उनको तो और इन भाषाओं के इस्तेमाल की बात सोचनी चाहिए, क्योंकि इस्तेमाल करते-करते ही भाषाएं धनी बनेंगी। जब मैं कभी इस तर्क को सुनता हूं,हिंदुस्तान में, तो बहुत आश्चर्य होता है कि मामूली बुद्धि के लोग भी कैसे इस बात को कह सकते हैं कि अंग्रेजी का इस्तेमाल करो क्योंकि तुम्हारी भाषाएं गरीब हैं। अगर अंग्रेजी का इस्तेमाल करते रह जाओगे तो तुम्हारी अपनी भाषाएं कभी धनी बन ही नहीं पाएंगी।" इसके लिए समय की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति की जरूरत है। हिंदी का प्रयोग कैसे होगा? हमारी भाषा नीति क्या होनी चाहिए? डॉ. लोहिया ने अपना दृष्टिकोण पेश करते हुए लिखा है कि , "केंद्रीय सरकार की भाषा हिंदी होनी चाहिए। ठीक इसके बाद दस वर्ष के लिए दिल्ली केंद्रीय सरकार की गजटी नौकरियाँ गैर हिंदी लोगों के लिए सुरक्षित रहें। केंद्र का राज्यों से व्यवहार हिंदी में हो और जब तक कि वे हिंदी जान लें, केंद्र को अपनी भाषाओं में लिखें। स्नातकी तक की पढ़ाई का माध्यम अपनी मातृभाषा हो और उसके बाद का हिंदी। जिला जज व मजिस्टर अपनी भाषाओं में कार्यवाही कर सकते हैं, उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय में हिंदुस्तानी होनी चाहिए। जबकि लोकसभा में साधारणतः भाषण हिंदुस्तानी में हों लेकिन जो हिंदी ना जानते हों, वे अपनी भाषा में बोलें।" हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग संबंधी डॉ. लोहिया के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है। लोहिया के रास्ते भाषा के मुद्दे को हल ही नहीं किया जा सकता है बल्कि राष्ट्रीयता को भी मजबूत किया जा सकता है।
 
 
 
 
 
 संस्मरण (भूरि-भूरि आभार)
 
“अरे, कांता जी, आ गयी, अति सुंदर; सुस्वागतम्, शुभागमनम्। यात्रा सुगम तथा सफल रही ? कितनी प्रलंबित लगी तुम्हारी यह तीर्थ यात्रा ? पौष की कृष्णपक्ष पंचमी को प्रारम्भ हुई थी, और अब बसंत पंचमी आने को है। इस बीच यहाँ तो शिशिर का शीत, ऊपर से हिमपात , चतुर्दिश घोर सन्नाटा, सड़कों पर कारों की गति मंद, आवागमन कम, और घर से बाहर निकलना कठिन, “हिम-श्वेत धरा तृण पात विहीना, असह्य उग्र अति माघ महीना”। अब कभी मत जाना ऐसी विषम यात्रा पर मुझे एकाकी छोड़ कर। ऐसी संपर्क-वर्जित हो गयी जैसे पांच दशक पूर्व भारत-यात्रा में हुआ करता था। एक बार भारत पहुँचे, फिर न कोई पत्र, न पत्रिका, न टेलीफोन, न ईमेल। इतनी व्यस्त हो गयी सहयात्री महिलाओं के साथ, कि मुझे विस्मृत ही कर दिया, छोड़ दिया नितांत एकांत में। मंजू और अजय ने पूर्ण सहायता की, ध्यान रखा। परन्तु तुमको तो अच्छी प्रकार विदित है; मैं प्रति दिन कई कई बार तुम से 
 
 
 डॉ. आनंद प्रकाश
 
डॉ. आनंद प्रकाश, ‘कवि न होऊं नहिं लेख प्रबीनू’, हिंदी रचनाओं का प्रशंसक वयोवृद्ध जल अभियंता; हिंदी तथा संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा; तत्पश्चात कवियों और लेखकों की रचनाओं का स्वाध्याय और मनोरंजन; व्यवसाय-जल विज्ञान और तत्संबंधित अभियांत्रिक कार्य, १२ वर्ष भारत में, लगभग ५१ वर्ष अमेरिका के लगभग ३० प्रदेशों में, और यदाकदा १५ विभिन्न देशों में व्यावसायिक विशेषज्ञ सलाहकार, टेक्निकल राइटिंग और सम्पादकीय कार्य।
अ.हि.स. के आजीवन सदस्य हैं और अभी Western Springs, Illinois, अमेरिका में हैं।
 
 
 
कहा करता था, ‘तुम हो तो यह घर लगता है; तुम बिन इसमें डर लगता है”।
“हाँ हाँ सब स्मरण है, किन्तु अपने पुत्र-पुत्री के साथ अपने ही निवास स्थान में डर-भय कैसा और क्यों?”
“अरे बाबू, तनिक विचार करो, श्री राम सीता जी के विरह में बसंत ऋतु की शोभा का अवलोकन करके व्यथित होकरलक्ष्मण से क्या कह उठे थे, ‘देखहु तात बसंत सुहावा, प्रिया हीन मोहि भय उपजावा'। और, उसके पश्चात् वर्षा ऋतु में वारिद-गर्जन सुनकर और विद्युत-दमक से चौंधिया कर उनके मुख से क्या वचन निकले थे, 'घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा'। राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे, वह भयग्रस्त हो जाते थे। मैं तो फिर एक साधारण प्राणी हूँ। कैसे भयभीत न होता?”
“चलो, अब तो भय नहीं है, अब तो मैं तुम्हारे समक्ष हूँ।”
‘आ जाओ, श्रमित लगती हो, थोड़ा विश्राम कर लो।’
“ठीक है, पहले तनिक अपनी कर्मभूमि, पाकगृह अर्थात् किचेन पर दृष्टिपात करती हूँ। ऐसा प्रतीत होता है कि आपने तो राइस कुकर और स्लो कुकर का चावल दाल बनाने में तथा चाय के लिए केतली का पूर्णतया दिन प्रतिदिन प्रयोग किया है। वाह, वाह, सब खाद्यपदार्थ, सब भोजन सम्बन्धी सामग्री और पात्र इत्यादि कितने संयोजित तथा सुसंगठित रूप से रख रखी हैं! देख कर संतुष्टि हुयी कि आपने गृहस्थ सम्बन्धित अधिकतर कार्य सीख लिए हैं और सुचारु रूप से निभाये हैं।”
“क्या करूँ, विवशता तथा आवश्यकता बहुत कुछ सिखा देती है, प्रियवर! मनुष्य को परिस्थितियों के अनुसार ही चलना तथा रहना पड़ता है। अभी तो बहुत कुछ है जो मुझ को नहीं आता या तुमने नहीं सिखाया या सीखने दिया। प्रत्येक कार्य में बालकों के जैसी इतनी सुरक्षा, संरक्षण, और प्रतिबन्ध रखती थी कि बहुत कुछ सीख ही नहीं पाया। इसमें जलने की आशंका है, इसमें चोट लगने का भय है, यह मत करना, इससे दूर रहना, आदि-आदि नाना प्रकार की शिक्षाएं देती रही हो। सोचता रहता हूँ, तुम मेरा रक्षा-कवच हो , मेरी पत्नी हो, या भ्राता, मित्र एवं माता भी हो, अथवा एक ही शरीर में बहुरूप देवबाला हो? अब जो सीखना शेष है वह सब कैसे सीखूँ, कहाँ से सीखूँ? 'वृद्ध अवस्था जीर्ण बुद्धि; है अंग-अंग निर्बल'। छोड़ो, कुछ और सुनाओ, यात्रा में २४ घंटे क्या-क्या कार्य क्रम रहता था?”
“क्या-क्या बताऊँ, वहाँ यात्रा के नियोजक एवं कर्मचारी बहुत व्यस्त कार्यक्रम रखते थे। प्रातः कुछ योगाभ्यास, भजन-कीर्तन, फिर कुछ जलपान, तत्पश्चात् कुछ पारस्परिक विचार-विमर्श; मध्याह्न का शाकाहारी भोजन; अपरान्ह में फिर जलपान, चाय आदि और कुछ पुस्तक अध्ययन, टी. वी. एवं मनोरंजक प्रोग्राम, मूवी, इत्यादि; संध्या का भोजन तथा प्रार्थना और आरती के पश्चात् शयन। प्रबंधकों ने कई एक पुरानी कथाओं पर आधारित चलचित्र (मूवी) तथा धारावाहिक दिखाए, जैसे कि झाँसी की रानी, मीरा, राधा-कृष्ण, सिया के राम, कुंती, शिव-पार्वती, चंद्रकांता, उर्मिला, आम्रपाली, और चित्रलेखा इत्यादि। स्वाध्याय के लिए कुछ पुरानी पुस्तकों की प्रतियाँ भी उपलब्ध थीं। प्रायः मनोरंजक कथाओं पर तर्क-वितर्क होता था, विशेषकर पुराने ग्रंथों तथा उपन्यासों पर आधारित पटकथाओं पर। इस प्रकार के विचार-विमर्श से प्रेरित होकर मुझे भारत की सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक महिलाओं के विषय में कुछ अध्ययन करने की जिज्ञासा हुयी। संयोगवश दो पुराने उपन्यास, वैशाली की नगरवधु और चित्रलेखा, की प्रतियाँ वहाँ उपलब्ध थीं। इन में दोनों ही की लेखन शैलियाँ अत्यंत सुन्दर एवं रोचक लगी। आम्रपाली और चित्रलेखा की असाधारण नीति निपुणता, अद्भुत प्रतिभा और उच्च कोटि के शास्त्रीय ज्ञान के अतिरिक्त उनके महिलाओं के लिए अनुकरणीय साहस, प्रभुत्व एवं आधिपत्य-भावना, तथा त्याग और सन्यास ने मुझे बहुत प्रभावित किया। यद्यपि कथाएं पूर्व-विदित एवं सुपरिचित हैं, फिर भी आपके साथ सूक्ष्मरूपेण पुनरावृत्ति करने को मन करता है।
आम्रपाली एक अपूर्व सुंदरी नर्तकी थी, जिसको प्राप्त करने की उत्कंठा में वैशाली नरेश मनुदेव ने उसके वर की हत्या करके उसे वैशाली की नगरवधु घोषित किया था। उसकी प्रेम-पिपासा में मगध-नरेश बिम्बिसार ने वैशाली पर आक्रमण किया और गुप्त रूप से उसके निवास स्थान में प्रवेश किया, किन्तु आम्रपाली को यह ज्ञात नहीं होने दिया कि वह मगध-नरेश हैं। कुछ समय तक बिम्बिसार और आम्रपाली ने परस्पर पति-पत्नी के रूप में जीवन व्यतीत किया। किन्तु जब आम्रपाली को बिम्बिसार के मगध-नरेश होने की वास्तविकता का परिचय मिला तो उसने उसकी भर्त्सना की। उसने बिम्बिसार को तत्काल ही वैशाली एवं मगध के युद्ध को स्थगित करने की घोषणा के लिए बाध्य किया, यद्यपि अकारण युद्ध विराम करने से बिम्बिसार की मानहानि हुयी। कुछ समय पश्चात् बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु ने अपने ही पिता को कारागार में डाल कर मगध पर स्वकीय शासन स्थापित किया। अलौकिक सुंदरी आम्रपाली की आसक्ति में और उसका प्रेम प्राप्त करने के लिए अजातशत्रु ने भी पुनः वैशाली पर आधिपत्य जमाया और इस प्रकार आम्रपाली का प्रेम प्राप्त किया। किन्तु वैशाली के आक्रमण-कर्ता, क्रूर अजातशत्रु के साथ आम्रपाली के इस घनिष्ट सम्बन्ध पर वैशाली के नगर वासियों ने कड़ा विरोध प्रगट किया और उसे कारावास का दंड दे दिया। अजातशत्रु ने प्रतिशोध-वश आक्रोश में आकर सम्पूर्ण वैशाली नगर को जला डाला। भाग्यवश आम्रपाली जीवित बच गयी। किन्तु अपने भस्मसात नगर की अस्तव्यस्त दशा देख कर उसने वैशाली नगर के विध्वंसकर्ता अजातशत्रु का परित्याग कर दिया। अंततः आम्रपाली का गौतम बुद्ध से परिचय हुआ और वह उनकी अनुयायी बन गयी। उसने अपना सर्वस्व धनधान्य एवं संपत्ति बौद्ध संघ को समर्पित कर दी और स्वयं एक भिक्षुणी बनकर सरल और सात्विक जीवन यापन करने लगी।
चित्रलेखा पाटलिपुत्र नगर की एक असाधारण सुंदरी तथा मोहिनी नर्तकी थी। वह विलास-प्रिय सामंत बीजगुप्त से प्रेम करती थी। उसने पाप-पुण्य विषयक एक शास्त्रार्थ-सम्बन्धी चुनौती में अपने शास्त्रीय ज्ञान और प्रतिभा द्वारा आत्माभिमानी एवं गर्वित तपोनिष्ट योगी कुमारगिरि को परास्त किया था तथा उस की साधना भंग करके उसे अपने प्रणय-पाश में बांध लिया था। कुमारगिरि एवं चित्रलेखा के अप्रत्याशित सान्निध्य से बीजगुप्त ने सन्दिग्ध तथा हतप्रभ होकर चित्रलेखा से संपर्क-समाप्ति का प्रयास किया ताकि चित्रलेखा स्वछन्द होकर अपने दाम्पत्य जीवन सम्बन्धी निर्णय ले सके। इधर चित्रलेखा को सन्देह हुआ कि बीजगुप्त एक अन्य सौम्य युवती यशोधरा से विवाह के लिए उद्यत है, जबकि वास्तव में बीजगुप्त कुमारी यशोधरा से विवाह नहीं करना चाहता था। उसने तो यशोधरा का विवाह अपने शिष्य शशांक से करवाने के लिए अपना सारा धन एवं ऐश्वर्य शशांक को दे दिया था और उन दोनों के परिणयन संस्कार के पश्चात् स्वयं सन्यास लेने के लिए तत्पर हो गया था। यह सुनकर चित्रलेखा ने कामासक्त कुमारगिरि को यह कह कर त्याग दिया कि उसकी प्रेम-पिपासा केवल एक वासना या मादकता है जो पार्थिव शरीर तक सीमित है और मादकता के साथ ही समाप्त हो जाती है। बीजगुप्त का प्रेम हृदय की अनुभूति है जो त्वचा के उस पार, संभवतः आत्मा तक, जाता है। तत्पश्चात् वह अपने प्रेमी बीजगुप्त से पुनर्मिलन की प्रार्थना करती है और उस के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर उसके साथ एक भिक्षुणी बनकर रहना स्वीकार करती है।
इन कथाओं में आम्रपाली एवं चित्रलेखा दोनों ही समर्थ तथा सशक्त महिलाएं थीं। हो सकता है कि उनकी सामाजिक स्वीकृति और मान्यता केवल 'समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं’ के विशेष उदहारण हों। किन्तु इतना तो स्पष्ट है कि समाज में विगत काल में भी स्त्री को प्रेम, प्रणय, परिणयन, सम्भोग, परित्याग एवं वियुक्ति अथवा सन्यास के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता होती थी और जनता में उनकी नाट्य, गायन, तथा वाद्य कला का भी समुचित आदर और मूल्य था। अब आप अपनी बताओ, मेरी अनुपस्थिति में समय कैसे व्यतीत करते रहे?”
“चंद्रकांता जी क्या बताऊँ, तुम्हारे प्रस्थान के तुरंत पश्चात् पता नहीं कैसे कल्पना-जगत में दिशा-भ्रम एवं भ्रांत सा भ्रमण करता हुआ भूतकाल में चला गया, जहाँ सप्त मार्च (तदनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की दशमी) को हमारा परिणयन संस्कार हो रहा था, पंडित जी ने मुझ को सप्तपदी का अनुवाद सुनाया था, जो मेरी दैनिकी में अब भी अंकित है। दो दिवस पश्चात् एक युगल-बृषभ-चालित लघु-स्यंदन में पटल खोल कर मैंने प्रवेश किया था और मुझे पीत वर्णीय दुकूल शाटिका में सिमटी हुयी एक सौम्य, प्रशांत, स्मित-शोभित प्रेम-प्रतिमा में अपना जीवन दृष्टिगोचर हुआ था, ज्योंही उसके तृषित से नयन उठे और मुखमण्डल पर अरुण अधर विकसे, अनायास ही मेरे मुख से निकल पड़ा था, 'यह पवित्र प्रणय-बंधन, अवश्य मंगलकारी होगा और चलेगा सुचारु रूप से। तुम्हारा सान्निध्य रहे, तुम सर्वदा सम्मुख रहो, बस अब इससे अधिक कुछ नहीं चाहिये मुझे '। पता नहीं कैसी कैसी कल्पनाएं आयी थीं मेरे मन में। एक क्षण में जैसे सब कुछ प्राप्त हो गया था।
तत्पश्चात् मेरी कल्पना मुझे उस स्थान पर ले गयी जहाँ का पञ्चमासीय ग्रामीण जीवन तुम्हारे विचार से सर्वोत्तम, अत्यधिक रोमांचकारी और चिरस्मर्णीय समय रहा था। प्रायः निद्रा देवी के अंक में जाने से पूर्व तुमको उन्हीं स्वर्णिम अहर्निश की स्मृति होती थी। जानती हो क्यों? कारण यह कि उस समय हम युवक-युवती थे, हमारा प्रथम-प्रथम परिचय हुआ था, यौवन था, कुछ उन्माद था ; कुछ मास के छोटे समय में एक-दूसरे को समझने में पूर्णतया व्यस्त थे। तुमको प्रकृति के निकटस्थ छोटे से घर में जहाँ जीवन सरल, निश्छल और साधारण था, जिसमें कृत्रिमता का आवरण नहीं के बराबर था, सुख शांति दिखती थी, आनंद था। उस समय हम बाह्य संसार के मनोरंजक स्थानों, साधनों, व्यसनों, और ऐश्वर्य से अपरिचित थे। प्रौद्योगिक-प्रगति द्वारा निर्मित सुख-सुवधाओं का न हमें आभास था और न उन तक हमारी पहुँच थी। यदि अब वहाँ जाकर ग्रामवासियों से प्रश्न करो तो यही उत्तर मिलेगा कि जो सुख नगर की चमचमाहट, सौंदर्य, धन-धान्य और वहाँ उपलब्ध विलासिता में है वह यहाँ कहाँ। यदि यहाँ सब कुछ होता तो आप सब ग्राम छोड़कर विदेश क्यों जाते। अब वह समय केवल एक सुखद स्मृति है।
चलते-चलते मेरी कल्पना की उड़ान मुझे मेरे उस कार्यस्थल पर ले आयी जहाँ मेरे पृष्ठ में रखी लव-सीट पर तुम यदाकदा दबे पाँव, धीरे धीरे द्वितीय मंज़िल पर ऊपर आकर एकदम शांत विराजमान हो जाती थी। कुछ क्षण बैठकर मधुर वाणी में मुझे आश्चर्य-चकित कर देती थी, ‘बस इसी प्रकार ध्यानमग्न होकर बैठा करना, अपने अध्ययन, पठन, और लेखन में व्यस्त रहना, सांसारिक चिंताओं से दूर, शांत मन से।’ बस अपनी सामर्थ्य के अनुसार वही करता रहा।
तम्हारे जाने के समय मैं सुदर्शन चक्र की नन्द-नंदन पढ़ रहा था। एक अध्याय में अप्सरा तिलोत्तमा का प्रसंग आया। बस, स्वर्ग की परियों की जीवन-चर्या का विश्लेषण करने लगा। सोचने लगा कि क्या विशेषता होती होगी इंद्रलोक की अप्सराओं में या वहाँ के मनोरंजनों में। नन्द-नंदन के अनुसार दैत्यराज बलि-पुत्र साहसिक एक समय संयोगवश पृथ्वीलोक में गंधमादनपुर आया और उसी समय दिव्य लोक की परम सुंदरी अप्सरा तिलोत्तमा भी वहाँ उपस्थित थी। दोनों का परिचय हुआ, प्रेम-प्रणय, अमोद-प्रमोद, हास-परिहास और मनोरंजन हुआ। उसी समय उसी स्थान पर महर्षि दुर्वासा ध्यानावस्थ तपस्या कर रहे थे। दैत्य साहसिक एवं तिलोत्तमा हास्य-विनोद में इतने खोये हुए थे कि उनको महर्षि की निकटस्थ उपस्थिति का अभास ही नहीं हुआ और वे उच्चस्वर में प्रणयक्रीड़ा तथा अशिष्ट अट्टहास करते रहे। तप में बाधा होने पर महर्षि ने क्रोधपूर्वक उनपर दृष्टिपात किया और असुर साहसिक को श्राप दिया कि तू गर्दभ की भांति कर्कश ध्वनि में उच्चस्वर से अभद्र एवं अरुचिकर शब्द बक रहा है, अतः इसी समय गधा बन जाएगा और तिलोत्तमा तुम अप्सरा होकर भूलोक में असुर के साथ वासना-युक्त क्रीड़ा करती हो, अतः आसुरी योनि में प्रविष्ट करोगी।
फिर मेनका के बहिष्कार का ध्यान आया। वालमीकि रामायण के अनुसार ऋषित्व की प्राप्ति के पश्चात् विश्वामित्र जी पुष्कर में कठिन तपस्या में लीन हो गए। उस समय परम सुंदरी अप्सरा मेनका स्वर्गलोक से पृथ्वी पर पुष्कर आई और स्नान के लिए उद्यत हुई। विश्वामित्र जी ने उस अवस्था में उस पर दृष्टिपात किया। वह पुष्कर जल में गगन मंडल में दामिनी की भांति सुशोभित हो रही थी। सुन्दर कटिप्रदेश वाली मेनका को देखकर विश्वामित्र मुनि प्रेमासक्त हो गए और उन्होंने उसे विनयपूर्वक अपने आश्रम में निवास के लिए आमंत्रित किया। इस प्रकार उनकी कठिन तपस्या भंग हो गयी। सुखपूर्ण लगभग दस वर्ष व्यतीत होने पर एक दिन अनायास ही मुनि को सूझा कि मेरे कामजनित मोह से मेरी दश वर्षीय तपस्या में भारी विघ्न उपस्थित हो गया है। वे लज्जित से हो गए और शोक सागर में डूब गए। रोषपूर्वक उनके मन में यह संदेह हुआ कि यह सब देवताओं का क्षड़यंत्र है। उन्होंने मेरे तप का अपहरण करने के लिए यह महान दुष्प्रयास किया है। पश्चाताप से दुखित मुनिवर को आतुर और चिंतित देख कर मेनका भयभीत हो गयी। भयार्त मेनका को देखकर विश्वामित्र जी ने उसका परित्याग कर दिया और मधुर वचनों द्वारा उसे मृत्युलोक से विदा किया। ‘भीतामप्सरसं दृष्ट्वा वेपंतीम् प्राञ्जलिं स्थिताम्, मैनकाम् मधुरैवाक्यैर्विसृज्य कुशिकात्मजः’। इस प्रकार मेनका अंतर्धान हो गयी और उसके प्रणय-काल की समाप्ति।
मेनका से वियुक्त होकर विश्वामित्र जी ने पुनः सहस्र वर्षों घोर तपस्या की। इस समय भी देवगण एवं इंद्र के मन में भारी संताप उत्पन्न हुआ और उन्होंने शुचिस्मिता परम सुंदरी अप्सरा रम्भा से मुनिवर को काम-मोह-समन्वित करके उनकी तपस्या से विचलित करने के लिए प्रेरित किया। स्वयं इंद्र ने कामदेव को लेकर उसके साथ चलने का आश्वासन दिया। इस प्रकार भयभीत तथा लज्जित सी रम्भा ने विश्वामित्र जी को मधुर संगीत, वाद्य एवं प्रेम-परिपूत कटाक्षपात तथा मधु-मत्त नृत्य द्वारा कामातुर करने का प्रयत्न किया। मुनिवर ने प्रसन्नचित से उस ओर दृष्टिपात किया जहाँ से वह मधुर ध्वनि आ रही थी और उनको अनुपम रूपवती रम्भा सम्मुख दिखाई पड़ी। उसके कामुक गीत और अप्रत्याशित दर्शन से मुनि के मन में संदेह हो गया और देवराज इंद्र का सारा कुचक्र समझ में आ गया। उन्होंने क्रोधसमाविष्ट होकर रम्भा को श्राप दिया 'रम्भे, काम एवं क्रोध पर विजय प्राप्ति में संलग्न विश्वामित्र को मार्गच्युत करने की चेष्टा के अपराध में तू दस सहस्र वर्षों तक पाषाण की प्रतिमा बन कर खड़ी रहेगी’। ’यन्मां लोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम्, दशवर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे’।
अंत में इंद्रलोक की प्रमुख अप्सरा उर्वशी का ध्यान आया। ऋग्वेद में पुरुरवा तथा उर्वशी के मिलन और विरह का संक्षिप्त विवरण है। कालिदास रचित ‘विक्रमोर्वशीयम’ में उर्वशी एक अप्सरा है जो स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आती है। एक समय हेमकुण्ठ पर्वत पर विचरण करते हुए केसी नामक असुर उसका बलपूर्वक अपहरण कर लेता है। उस समय पुरुरवा उसको छुड़ाते हैं और उनमें पारस्परिक प्रेम जागृत हो जाता है। अल्पकालिक प्रणय के पश्चात् वह अमरावती लौट जाती है जहाँ उसको अनुभूति होती है कि अमर्त्य अप्सराओं का मर्त्य मानव से प्रणय-बंधन एवं शारीरिक समागम असंभव है। स्वर्गलोक में विष्णु एवं लक्ष्मी संबंधी एक विलास-पूर्ण नृत्य-संगीत प्रदर्शन में अनायास ही उर्वशी के मुख से विष्णु के स्थान पर पुरुरवा का नाम निकल गया। इस पर क्रोधित होकर महर्षि भरत ने उर्वशी को शापित किया कि उसे मृत्युलोक में उसी मानव पुरुरवा के पास प्रस्थान करना होगा जिसका उसने नामोच्चरण किया है। जिस क्षण उसका मर्त्य प्रेमी उसके गर्भस्थित पुत्र पर दृष्टिपात करेगा, उसी क्षण उर्वशी लुप्त हो जाएगी और वह पुनः स्वर्गलोक में प्रवेश करेगी। महर्षि भरत के श्राप वश उर्वशी पुनः भूमि पर आयी और उसने पुरुरवा के संगम से एक पुत्र ‘आयु’ को जन्म दिया किन्तु जैसे ही पुरुरवा ने आयु पर दृष्टिपात किया उर्वशी अंतर्धान हो गयी। पुरुरवा ने राज्य त्याग कर अज्ञात वनवास ले लिया। इस प्रकार वैकुंठवासिनी उर्वशी एवं मर्त्यलोक वासी मानव पुरुरवा का संगम कभी स्थायी नहीं हो सका । दोनों विरह यातना में जलते रहे। इस बार भी फिर वही हुआ, पहले इन्द्रलोकवासिनी अप्सरा का भूलोक आगमन, मानव या असुर से समागम की चेष्टा और फिर परित्याग, वियोग अथवा भीषण श्राप। चलो, बहुत समय हो चुका, आओ अब मेरे साथ सदा की भांति शयन-शय्या के वामपार्श्व में तुम और दक्षिण पार्श्व में मैं विश्राम करता हूँ, फिर उठकर कुछ जलपान करेंगे।”
"अरे मितवा, मेरे मित्र, मेरे जीवन! अभी तक सुषुप्त स्तिथि में हो, जागृत अवस्था में आओ, उठो, तनिक सोचो, न तो मैं मृत्युलोक की चित्रलेखा अथवा आम्रपाली हूँ और न इंद्र-सभा की कोई विशेषाधिकार-प्राप्त अप्सरा। मैं एक साधारण स्वर्गवासी स्त्री हूँ। एक अदेह छाया हूँ , अस्पृश्य कल्पना हूँ, जिसे आप देही और स्पृश्य समझ कर, मुझ से पूर्ववत वार्ता कर रहे हो। आप भलीभांति जानते हो कि हम दिवंगत स्त्रियों का अपने भूलोकवासी भूतपूर्व जीवनसाथी तक से आलिंगन अथवा शारीरिक स्पर्श सर्वतः वर्जित एवं असंभव है। मुझे अब तत्काल भूतल त्याग कर बैकुंठधाम लौटना होगा; मुझे प्रस्थान करना होगा; अंतिम नमस्कार !"
“हा! हा ! हन्त ! हन्त ! हाय रे जीवन ! मैं अब तक स्वप्न देख रहा था। सचमुच, तुम तो कब से मुझे छोड़ कर जा चुकी हो ? चलो, भूरि-भूरि आभार प्रिये; कुछ क्षण तो मन भरमाया। कुछ घटिकाओं के लिए तो एक प्रेम-स्वर्ग दिखलाया। बहुत अनुगृहीत हूँ इस कृपालुता के लिए। बस उपालम्भ यह है कि तुम स्वयं तो सर्व-बंधन-विनिर्मुक्त हो गयी, परन्तु मुझ वियुक्त, विरही, वियोगी को भूलोक में विवश छोड़ गयी। संभवतः वैदिक ऋषि पुरुरवा का कथन सत्य ही है, ‘यदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः क्रतुर्भिर्न पृङ्क्ते, ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीलयो दंदशानाः’। जब देहधारी मनुष्य अमर्त्य स्त्रियों से स्पर्श, या संपर्क करने को उद्द्यत होता है तो वे अपना शरीर प्रगट नहीं करती अर्थात् अंतर्धान हो जाती हैं, जैसे दाँतों से लगाम दबाते हुए क्रीड़ाशील अश्व रथी को अपना शरीर नहीं देखने देते।’ मर्त्य मानव, स्मरण रहे, अप्सराओं या दिवंगतों की काल्पनिक अथवा स्वप्निल प्रतिछाया को प्रतिबंधित या स्पर्श करना असम्भव है”।
 
 
 
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प्रबंध सम्पादक
 
- सुशीला मोहनका 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी मानद सदस्यों का अभिवादन है।
आशा करती हूँ आप इस Covid-19 की सुनामी की इस तीसरी लहर में अपना एवं अपने परिवार का पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे एवं स्वस्थ्य रहें।
सभी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना: जिन स्थानीय समितियों में २०२२-२३ सत्र के लिए निर्वाचन या मनोनयन हो गये है, उन्हें बधाई है। उनसे निवेदन है कि पदाधिकारियों के नाम एवं अन्य विवरण सहित इसकी सूचना शीघ्र से शीघ्र भेजने का कष्ट करें। जिन स्थानीय समितियों में निर्वाचन या मनोनयन नही हुए हैं उनसे निवेदन है कि वे जल्दी से जल्दी अपने यहाँ निर्वाचन या मनोनयन करा कर पदाधिकारियों के नाम एवं अन्य विवरण भेजें। दिसम्बर  माह के प्रथम सप्ताह  में नाम आ जाने पर ही विश्वा के जनवरी २०२२ के अंक में प्रकाशित किये जा सकेंगें।
वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई के शौर्य की गाथायें सर्वविदित है। इस बार भारत में उन्हें राष्ट्रीय सम्मान दिया गया है। उनकी १९१ वीं पुन्य तिथी के अवसर पर अपनी ओर से और समिति की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ। इस अंक में उनके लिए प्राण निछावर करने वाली वीरांगना झलकारी बाई कि शौर्य कथा पढ़िए और आनन्द लीजिये ।
हिन्दी की सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. मन्नू भंडारी का ९० वर्ष की उम्र में १५ नवम्बर २०२१ को निधन हो गया। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से उनको भावभीनी विदाई के साथ-साथ हार्दिक श्रृद्धांजलि अर्पित है।
 अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २० वें अधिवेशन का विवरण संक्षेप में इस अंक में एवं दिसम्बर अंक में  देखें ।विशेष अनुरोध -अंक को  पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाओं को भेंजे। 
 
 
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