MAY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
मई 2026, अंक ५८
प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र । सम्पादक: डॉ. शैल जैन
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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हिंदी भाषा पर प्रेरणादायक उद्धरण
भारतेंदु हरिश्चंद्र (Bharatendu Harishchandra)
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥”
महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi)
“राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा होता है।”
रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)
“हिंदी केवल एक भाषा नहीं, यह भारत की आत्मा की आवाज़ है।”
मैथिलीशरण गुप्त (Maithili Sharan Gupt)
“हिंदी हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रमुख आधार है।”
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (Dr. A.P.J. Abdul Kalam)
“अपनी मातृभाषा में सोचने और सीखने से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।”
अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee)
“हिंदी ने भारत को एक सूत्र में बाँधनेका कार्य किया है।”
संपादकीय टिप्पणी (Editorial Note)
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारी भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति है।
International Hindi Association (अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति) का मूल उद्देश्य भी यही है कि हिंदी को वैश्विक स्तर पर सम्मान और नई पीढ़ी में अपनत्व मिले।
आज जब विश्व तेजी से डिजिटल और बहुभाषी हो रहा है, तब हिंदी को केवल बोलने तक सीमित न रखकर उसे सीखने, लिखने और सृजनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना आवश्यक है। उपर्युक्त महान विभूतियों के विचार हमें यह प्रेरणा देते हैं कि अपनी भाषा का सम्मान करना, अपनी जड़ों से जुड़े रहने के समान है।
हमारी संस्था निरंतर प्रयासरत है कि हिंदी भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण हो, और युवा पीढ़ी गर्व के साथ हिंदी को अपनाए। आइए, हम सभी मिलकर हिंदी को न केवल संजोएं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे और अधिक समृद्ध बनाएँ।
आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।
धन्यवाद
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
संपादक संवाद पत्रिका
ईमेल shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन 2026
द्वारा : आलोक मिश्रा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, न्यासी समिति
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सात सप्ताह का हास्य कवि सम्मेलन शुक्रवार, 10 जुलाई से प्रारंभ होकर रविवार, 23 अगस्त तक चलेगा। यह कार्यक्रम कविता और हास्य का सुंदर संगम होगा, जो श्रोताओं को भरपूर हँसी और आनंद प्रदान करेगा।
यदि आप अपने शहर में हास्य कवि सम्मेलन आयोजित करने में रुचि रखते हैं, तो कृपया जल्द हमसे संपर्क करें। यात्रा कार्यक्रम को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से हम आपकी प्राथमिकताओं का यथासंभव ध्यान रखेंगे। कृपया ध्यान दें कि कवियों की यात्रा को सहज और प्रभावी बनाने के लिए निकटवर्ती तीन शहरों को मिलाकर एक सप्ताहांत समूह बनाया जाएगा।
हमें आशा है कि आप 2026 के हास्य कवि सम्मेलन को भव्य सफलता बनाने में हमारे साथ जुड़ेंगे!
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कवियों के बारे में संक्षिप्त विवरण
संपत सरल
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के माणकसास गाँव में 8 अप्रैल 1962 को जन्मे संपत सरल भारत के सबसे सम्मानित समकालीन हिंदी व्यंग्यकारों में से एक हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर और बी.एड. की शिक्षा प्राप्त सरल जी की भाषा और अभिव्यक्ति पर जबरदस्त पकड़ है। वे हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लेखन करते हैं।
उनकी साहित्यिक कृतियों में 'एक मंज़िला मकान में लिफ्ट', 'निठल्ले बहुत बिजी हैं' और 'चाकी देख चुनाव की' (राजस्थानी काव्य) प्रमुख हैं। मंच पर उनकी उपस्थिति बौद्धिक तीक्ष्णता और सधे हुए प्रस्तुतीकरण के लिए जानी जाती है। उन्होंने शरद जोशी और के.पी. सक्सेना जैसे महान व्यंग्यकारों की परंपरा को आधुनिक संवेदनाओं के साथ आगे बढ़ाया है।
साहित्य के साथ-साथ उन्होंने 'हम हैं ना' और 'चक्कर पे चक्कर' जैसे टेलीविजन धारावाहिकों के लिए पटकथा व गीत भी लिखे हैं। वैश्विक स्तर पर वे कनाडा, रूस, जापान और यूएई सहित अनेक देशों में प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं। वर्ष 2025 में उन्हें प्रतिष्ठित 'काका हाथरसी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
चिराग जैन
नई दिल्ली में जन्मे चिराग जैन हिंदी के एक प्रखर कवि और लोकप्रिय परफोर्मर हैं। हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत चिराग को उनकी निष्पक्ष और मानवीय दृष्टि के लिए जाना जाता है।
वर्ष 2002 से काव्यमंचों पर सक्रिय चिराग ने अब तक 2,500 से अधिक कवि-सम्मेलनों में काव्य पाठ किया है। वे लालकिला कविसम्मेलन का संचालन करनेवाले सबसे कम उम्र के कवि हैं। टेलीविजन की दुनिया में 'वाह-वाह क्या बात है' और 'लपेटे में नेताजी' जैसे दर्जनों कार्यक्रमों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। वर्तमान में वे 'पुरुषोत्तम' नामक महाकाव्य की रचना और मंचन कर रहे हैं, जो रामायण का एक मनोवैज्ञानिक और आधुनिक चित्रण है।
'कोई यूँ ही नहीं चुभता', 'छूकर निकली है बेचैनी' और 'मन तो गोमुख है' समेत दर्जनों पुस्तकें उनके सृजन का प्रमाण हैं। उनकी 'गुल्लक' पाठ्यक्रम शृंखला विद्यालयों में टेक्स्ट बुक का काम कर रही है।
उन्होंने 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' नामक बॉलीवुड फिल्म में ब्रजभाषा के संवाद भी लिखे हैं। उन्हें 'काका हाथरसी हास्य रत्न' (2024), 'भाषादूत सम्मान' सरीखे लगभग दो दर्जन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्होंने IIIT वडोदरा जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का कुलगीत लिखा है। कोविड काल में उनके द्वारा चलाए गए मानवीय अभियान 'गिलहरी प्रयास' की भी बहुत सराहना हुई।
गोविन्द राठी
मध्य प्रदेश के अकोदिया मंडी (शाजापुर) में 7 अप्रैल 1967 को जन्मे गोविन्द राठी, हिंदी कवि सम्मेलन मंच के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर राठी जी ने वर्ष 2004 में अपनी काव्ययात्रा प्रारंभ की। वे कम शब्दों में मारक और अर्थपूर्ण व्यंग्य करने की कला में माहिर हैं।
उनकी कविताओं के माध्यम से वे पारिवारिक विसंगतियों, पति-पत्नी के रिश्तों, सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार करते हैं। पिछले दो दशक में उन्होंने 2,000 से अधिक लाइव प्रदर्शन किए हैं, जिनमें दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित 'गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन 2025' भी शामिल है। भारत के अलावा उन्होंने उज्बेकिस्तान, यूएई और नेपाल जैसे देशों में काव्यपाठ किया है।
उन्हें 'बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार' (2018), 'ब्रज शुक्ल घायल पुरस्कार' (2024), और सब टीवी द्वारा 'छुपा रुस्तम' (2012) जैसे सम्मानों से नवाजा जा चुका है। दूरदर्शन, ज़ी न्यूज़ और सब टीवी जैसे चैनलों पर उनकी सक्रिय उपस्थिति ने उन्हें सोशल मीडिया पीढ़ी के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय बना दिया है।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप, वार्षिक
स्थानीय संस्थाओं के साथ
रिचफील्ड, ओहायो, जुलाई 6 - 24 , 2026
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नमस्ते शैल जी
हमारी टीम यह घोषणा करते हुए अत्यंत उत्साहित है कि 2026 के लिए registration पहले ही पूर्ण हो चुका है और अब छात्रों की waiting list भी बन चुकी है। हम अभी भी volunteers और teachers की तलाश में हैं—यदि आप इच्छुक और सक्षम हों, तो कृपया संपर्क करें।
कृपया किरण खेतान जी के अनुरोध पर संलग्न Volunteer flyer देखें।
यदि आप समिति के लोगों से संपर्क कर रहे हैं, तो flyer पर दिए गए QR Codes कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त, volunteers के लिए registration form उपलब्ध है।
हमारी सहायता करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।
धन्यवाद
Mr. Lalit Sangtani, Admin/ Operations: 419-829-0223
e-mail: ihasummercamp@gmail.com
Mrs. Kiran Khaitan, Program Director: 330-622-1377
Mrs. Kanika Agarwalla, Co-Director: 862-754-0670
Mrs. Shalini Goyal, Co-Director: 440-590-5605
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा रिपोर्ट
बसंत हिंदी काव्य-संध्या- 25 अप्रैल , 2026
द्वारा: सुनीता द्विवेदी , उत्तरपूर्व ओहायो शाखा सदस्य
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*शब्दों और भावों में ढली एक मनभावन काव्य-संध्या*
उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की बसंत काव्य-गोष्ठी अत्यंत स्मरणीय रही।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के मंच पर ये कार्यक्रम डॉ. शोभा एवं आनंद खंडेलवाल के घर पर अप्रैल 25 को आयोजित था। कार्यक्रम दोपहर करीब 2 बजे से 5 बजे हुआ और फिर रात्रि भोजन। घर में आते ही आदरणीय महाकवि श्री गुलाब खंडेलवाल जी की स्मृति को नमन करते हुए, शब्दों के जो मोती पिरोए गए, वे लंबे समय तक मानस पटल पर रहेंगे।
अपने घर को केवल एक भवन नहीं, बल्कि एक जीवंत साहित्यिक केंद्र बना देना और अपनी आत्मीयता से सबको सराबोर कर देना - ये हमारे मेजबानों की उदारता और अद्भुत सादगी है। तन, मन और धन से किए गए इस आयोजन में उनकी जो ऊष्मा थी, उसने काव्य-रस के आनंद को अगणित आनंदमय कर दिया। डॉ. शोभा एवं आनंद खंडेलवाल को उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की कार्यकारिणी समिति एवं सभी उपस्थित लोगों की तरफ से बहुत बहुत धन्यवाद।
हमारे स्थानीय कवियों का यह समागम एक नई शुरुआत, नई पहल का प्रतीक है। 15 स्थानीय कवियों ने अपनी मौलिक कविताओं की प्रस्तुति दी । हर रचना में एक अपनापन था, एक सोच थी और एक जीवंतता थी जिसने दर्शकों को अभिभूत किया। अपनी मातृभाषा में लिपटे अपनेपन का अनुभव अमूल्य और अवर्णनीय है।
इस सुंदर आयोजन का हिस्सा बनकर मेरा मन कृतज्ञता से भरा हुआ है। ऐसे ही साहित्यिक उत्सव हमारे भीतर की संवेदनशीलता को जीवित रखते हैं। इस गरिमामयी गोष्ठी के सभी आयोजकों और सह-कवियों का हृदय से आभार।
गिरिश जी, नरेंद्र जी और अनुरागी अनुराग को कार्यक्रम आयोजन में पहल करने के लिए विशेष धन्यवाद। सभी प्रस्तुति कर्ताओं को इन अमूल्य पलों को छायाचित्रों और चलचित्रों में संजोने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। सभी उपस्थित गण इस जीवंत उत्सव का आनंद ले रहे थे।
यह कार्यक्रम संस्कृति, रचनात्मकता, सामुदायिक एकता के साथ-साथ अच्छी मेजबानी, सबों का मिश्रण था ।
अगली बसंत काव्य-गोष्ठी की प्रतीक्षा में!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - वाशिंगटन डी.सी. शाखा रिपोर्ट
होली उत्सव 19 अप्रैल 2026
द्वारा: चौधरी प्रताप सिंह, शाखा अध्यक्ष
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अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति (IHA) - वाशिंगटन डी.सी. शाखा द्वारा 19 अप्रैल 2026 को बाल्टीमोर में वार्षिक होली सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया।
इस रंगारंग कार्यक्रम में Johns Hopkins University के विद्यार्थियों, बाल्टीमोर समुदाय के सदस्यों तथा गुर्जर समिति के प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। पूरे वातावरण में रंग, उमंग और भारतीय संस्कृति की सुंदर झलक देखने को मिली तथा सभी ने मिलकर हर्षोल्लास के साथ होली उत्सव मनाया।
योजन को सफल बनाने में हिन्दी समिति के सक्रिय सदस्यों श्री धर्मेन्द्र कुमार एवं श्री सूरज कुमार शर्मा का विशेष योगदान रहा। उन्होंने अपने रेस्टोरेंट के माध्यम से सभी अतिथियों को आमंत्रित किया तथा होली समारोह हेतु दोपहर के भोजन (लंच) की निःशुल्क व्यवस्था कर भारतीय आतिथ्य एवं सेवा भावना का प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के अध्यक्ष चौधरी प्रताप सिंह तथा गुर्जर समिति के चेयरमैन श्री त्रिभुवन सिंह जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने आयोजन की सराहना करते हुए श्री धर्मेन्द्र कुमार एवं श्री सूरज कुमार शर्मा के प्रति आभार व्यक्त किया तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक योगदान के लिए शुभकामनाएँ दीं।
समारोह के चित्र एवं वीडियो शाखा द्वारा निचे संलंग्न हैं। मैंने चित्र एवं विडिओ अन्य शाखा पदाधिकारियों, बोर्ड सदस्यों तथा अन्य सहयोगियों के साथ साझा किए हैं, ताकि सभी सदस्य श्री धर्मेन्द्र कुमार एवं सहयोगियों के उत्साहवर्धन में सहभागी बन सकें। वास्तव में यह हम सभी के लिए गर्व और प्रसन्नता का विषय है कि हमारे सदस्य समाज एवं हिन्दी भाषा-संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
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स्थानीय कार्यक्रम
महाकवि गुलाब खंडेलवाल जी की 102वीं जयंती
क्लीवलैंड, अमेरिका की एक अविस्मरणीय गुलाबी सुगंध संध्या
शिव विष्णु मंदिर, पारमा, ओहायो १० अप्रैल, २०२६
द्वारा: डॉक्टर सुनीता द्विवेदी, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
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"कभी होंठों पे दिल की बेबसी लायी नहीं जाती,
कुछ ऐसी बात है जो कह के बतलायी नहीं जाती"
कुछ संध्याएँ शब्दों से नहीं, उनके बीच के अनुगूंज से बनती हैं। शुक्रवार, अप्रैल 10, 2026 को क्लीवलैंड में भी कुछ ऐसी ही सुहावनी संध्या रही।शब्द थे - पर केवल शब्द नहीं थे, स्वर थे - पर केवल ध्वनि नहीं थी और जो था… उसे किसी एक नाम में बाँधना संभव नहीं था।वो उत्सव था महाकवि गुलाब खंडेलवाल जी की 102 वीं जयंती का जहाँ वे केवल स्मरण में नहीं, बल्कि हर स्वर, हर विराम, हर स्मृति में उपस्थित थे और वो अनूठी संध्या धीरे-धीरे एक अनुभव बनती चली गई। इस वार्षिक कार्यक्रम का आयोजन श्री गुलाब खंडेलवाल के वरिस्ट पुत्र डॉ. आनंद खंडेलवाल और बहु डॉ. शोभा खंडेलवाल के मुख्य प्रयाश से और खंडेलवाल परिवार के अन्य सदस्यों के अकथ परिश्रम से होता है।
कहते हैं, गुलाब की पहचान उसके रंग से नहीं, उसकी सुगंध से होती है। रंग क्षणिक हो सकते हैं, पर सुगंध… स्मृति बनकर ठहर जाती है।गुलाब जी का काव्य भी कुछ ऐसा ही है, वो पंक्तियों में बंधा हुआ साहित्य नहीं, बल्कि एक ऐसी अनुभूति है, जो समय के साथ सूखती नहीं - बस रूप बदलती है।
उस शाम, क्लीवलैंड की मिट्टी में वही सुगंध फिर से जागी थी। अक्सर प्रवास में भाषा का स्वर धीमा पड़ जाता है।वो घर की दीवारों तक सीमित हो जाती है, त्यौहारों तक सिमट जाती है, या स्मृतियों में ठहर जाती है।पर कभी-कभी - कोई एक उपस्थिति उस भाषा को फिर से साँस दे देती है। गुलाब जी की उपस्थिति ऐसी ही रही है।
भारत से दूर, एक भिन्न भूगोल में, जहाँ जीवन की गति और प्राथमिकताएँ अलग हैं - वहाँ हिंदी केवल बोली नहीं गई, वो जीवंत हो उठी। क्लीवलैंड, इस दृष्टि से, केवल एक शहर नहीं - एक “गुलाब-भूमि” बन गया है। यह संध्या उसी जीवंत चेतना का उत्सव थी।
ग्रेटर क्लीवलैंड के शिव-विष्णु मंदिर का सभागार भरा हुआ था - पर केवल लोगों से नहीं, एक साझा अनुभव से।दर्शकों और प्रस्तुतकर्ताओं में विविध आयु के चेहरे थे - बालपन की सहज जिज्ञासा से लेकर अनुभव की शांत परिपक्वता तक - जैसे आठ से अस्सी तक की पूरी यात्रा एक ही छत के नीचे बैठी हो, और यह अनुभव केवल उस सभागार तक सीमित नहीं रहा। भारत और अन्य स्थानों से समय-सीमाओं को पार करते हुए, सैकड़ों मन इस सुगंध से जुड़ते चले गए - मानो एक ही क्षण, कई दिशाओं में एक साथ घटित हो रहा हो।
मंच पर प्रस्तुत गीत, ग़ज़ल, भक्तिगीत अपने-अपने सीमित रूपों में नहीं रहे, बल्कि कविता, स्वर बन गई, स्वर लय में ढल गया, और लय - एक मनभावन अनुभूति में। कहीं भक्ति थी, जो आत्मा को भीतर तक शांत कर रही थी, कहीं ग़ज़ल थी, जो दिल की अनकही परतों को खोल रही थी, और इन सबके बीच - एक अदृश्य सूत्र था, जो सबको जोड़ रहा था। वह सूत्र था - कवि की उपस्थिति।
महाकवि गुलाब खंडेलवाल - एक ऐसा नाम, जिसे केवल उनकी रचनाओं से नहीं, उनकी व्यापकता से समझना होगा जो देश, काल और परिस्थिति से परे रही। गीत… ग़ज़ल… रुबाई… सॉनेट…अभिव्यक्ति की कोई विधा उनसे अछूती नहीं रही, पर उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं थी कि उन्होंने कितना लिखा, बल्कि यह थी कि उन्होंने हर शब्द को जिया।
उनकी कविता में एक सहजता है, एक गहराई है, जो बोझिल नहीं होती और एक लय है, जो पाठक को नहीं, श्रोता को आमंत्रित करती है। इसी उत्कर्ष साहित्य के कारण उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।उन्हें “साहित्य वाचस्पति” जैसे प्रतिष्ठित अलंकरण प्राप्त हुए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर - उन्हें “कवि सम्राट” और “आज के तुलसीदास” की उपाधियों से विभूषित किया गया।कई विद्यार्थियों ने उनके साहित्य पर शोध-अध्ययन किया है और
--9 विद्यार्धियों को उनके शोध-पत्र पर PhD की उपाधि प्रदान की गई है।
इस संध्या का महत्वपूर्ण आयाम था उस सुगंध को सहेजने का प्रयास। पर सुगंध कहाँ अपने आप ठहरती है? उसे सहेजने वाले हाथ भी आवश्यक होते हैं वर्षों से खंडेलवाल परिवार अपने साथ एक समर्पित प्रयास लिए इस सुगंध को संवार रहा है और उसे नई पीढ़ियों तक पहुँचा रहा है।उनकी विरासत को संरक्षित और प्रसारित करने का कार्य महाकवि गुलाब खंडेलवाल फाउंडेशन समर्पित भाव से कर रहा है, जिसका उद्देश्य है:
“उनकी अमर कृतियों को संरक्षित करना…
हिंदी भाषा के अध्ययन और प्रसार को प्रोत्साहित करना…
और नई पीढ़ी के रचनाकारों को प्रेरित करना…”।
श्री निलेश कुलकर्णी और डॉ. विवेक खंडेलवाल के सुरों से “ऐ मानस कमल विहारिणी” (राग केदार, पुस्तक: सब कुछ कृष्णार्पणम्) के रूप में संध्या का प्रथम स्वर प्रस्फुटित हुआ और ऐसा प्रतीत हुआ मानो शब्दों से पहले ही वातावरण ने स्वयं को इस संध्या का समर्पित कर दिया हो। उसी भाव-धारा को आगे बढ़ाते हुए, गुलाब जी की प्रपौत्री विद्या खंडेलवाल के स्वर में “मैंने तेरी तान सुनी है” (पुस्तक: भक्ति गंगा) एक अंतरंग पुकार की तरह गूँजी जिसने ये सिद्ध कर दिया कि गुलाब जी की अनमोल साहित्यिक धरोहर सुरक्षित ही नहीं, अपितु उन्नतशील भी है।
यह इस धरोहर का संरक्षण नहीं - एक निरंतर साधना है। सुरों ने अब एक नया मोड़ लिया जब मोक्ष बाफना के स्वर में “जीवन फिर से भी यदि पाऊँ” ( पुस्तक: बिखरे फूल) गीत ने जैसे किसी स्मृति को फिर से छू लेने का साहस किया। इसी क्रम में शास्त्रीय संगीतज्ञ श्रीमती सुगता चटर्जी ने “अंतर से मत जाना” (पुस्तक: भक्ति गंगा) के माध्यम से भक्ति को केवल अभिव्यक्ति नहीं,आत्मीय निवेदन बना दिया।
गुलाब जी की लेखनी विभिन्न शैलियों और विधाओं में परिष्कृत थी। अगली ग़ज़ल प्रस्तुति गुलाब जी के घनिष्ठ मित्र श्री सुभाष अग्रवाल की थी जिन्होंने गुलाब जी के लगभग 20 गीतों को संगीतबद्ध किया है और इस कार्यक्रम से पिछले 25 से अधिक वर्षों से जुड़ें हैं। उनकी ग़ज़ल गायकी ने सारा वातावरण रूहानी कर दिया। ग़ज़ल का दौर आगे बढ़ाया इस कार्यक्रम की वरिष्ठतम और जीवन के अस्सी बसंत का आनंद लेने वालीं, शास्त्रीय संगीतज्ञ श्रीमती वंदना हरियाणी के स्वरों ने - “कभी होंठों पे दिल की बेबसी” (पुस्तक: हर सुबह एक ताज़ा गुलाब)। ये प्रस्तुति सिर्फ एक ग़ज़ल नहीं रही - मनुष्य के मार्मिक संवेदनाओं को सुरीले स्वर देकर उन्होंने इस ग़ज़ल को उस शाम का आत्म-वक्तव्य बना दिया।
ग़ज़ल को गीत का मोड़ देने आए संगीत प्रेमी श्री युगल चावला। उन्होंने “रत्ना! तू जीती, मैं हारा” (राग हंसध्वनि; पुस्तक: गीत रत्नावली) के माध्यम से तुलसीदास जी के भक्ति भाव के उस सूक्ष्म क्षण को जीवित कर दिया, जहाँ मानवीय प्रेम, ईश्वर की ओर मुड़ जाता है। प्रस्तुतियों ने ऐसा साहित्यिक वातावरण निर्मित किया कि लगा सभी लोग उस अद्भुत अनुभव में बह रहे हैं।
इस बहाव को गति देने आये युवा संगीतकार और कवि श्री अशेष परोब जिन्होंने “ऐसी तुम्हारी याद है” (पुस्तक: अनबिंधे मोती) गीत को संगीतबद्ध कर स्मृति की वो परत उजागर की जो कहे बिना ही बहुत कुछ कह जाती है। । उन्होंने उस गीत को जीवंत कर दिया जो तरुण गुलाब जी सन 1948 में लिखा था। अहिन्दी भाषी डॉक्टर किरण तमिरीसा ने इस साहित्यिक संध्या को भक्ति रस के गीत “प्रतीक्षा कब तक और करें” (राग भूपाली; पुस्तक: कागज़ की नाव) से और आभूषित कर दिया जहाँ प्रतीक्षा समय नहीं एक अनुभूति बन गई। संध्या के मध्य में डॉक्टर अदित आदित्यन जी ने गुलाब जी की देशप्रेम की कविता “मेरे भारत, मेरे स्वदेश” (पुस्तक: मेरे भारत, मेरे स्वदेश) को ओजपूर्ण स्वर के माध्यम से उस राष्ट्रभाव को हृदय और विचार के संगम से सुशोभित कर दिया और फिर एक ऐसा क्षण आया, जहाँ शब्दों से परे, स्मृति को सहेजने की बात हुई। वर्षों पूर्व, एक संवेदनशील दृष्टि ने इस साहित्यिक यात्रा को दृश्य रूप में संजोने का प्रयास किया था।
उसी शांत परंतु असाधारण योगदान के लिए इतिहासकार और वृत्तचित्राकार श्री माइल्स रीड को गुलाब खंडेलवाल फाउंडेशन ने ससम्मान अभिनंदित किया गया मानो सुगंध को समय से परे सुरक्षित रखने का एक प्रयास विनम्रतापूर्ण स्वीकार किया गया हो।
कार्यक्रम ने अपना रुख़ फिर से ग़ज़लों के सुकोमल संसार की ओर किया। श्री प्रत्युष रंजन ने अपने सुरीले कंठ से “ज़िंदगी फिर कोई पाते” (पुस्तक: गुलाब ग्रंथावली, तृतीय खंड) ग़ज़ल के माध्यम से जीवन को प्रश्न की तरह रखा और उत्तर श्रोताओं पर छोड़ दिया। डॉ. परेश कुलकर्णी की ग़ज़ल प्रस्तुति “कहनी है कोई बात मगर भूल रहे हैं” (पुस्तक: कुछ और गुलाब) में उन्होंने कवि की वो असमर्थता व्यक्त की जो सबसे गहरे भावों के साथ आती है। गुलाब ग्रंथावली की एक और ग़ज़ल “खुल के आओ तो कोई बात बने” (राग कामोद) डॉ. मितिलेश तामिरिसा ने बहुत ही सुंदरता से सुनाई और शास्त्रीय संगीत तथा रूहानी संवदेना का अद्भुत संतुलन रचा।
श्रीमती ज्योत्सना हैरिस ने इसी काव्य-ग्रंथावली से हृदय स्पंदित करने वाली पंखुड़ी, “जब तेरा दर करीब होता है, हाल दिल का अजीब होता है” बड़ी की आत्मीयता से प्रस्तुत की जिसने दर्शकों को आनंदित कर दिया। विभिन्न विधाओं और शैलियों में लिखी रचनाएँ गुलाब जी का कलम के महारथी होने का परिचायक है।इस गीत के लिए हारमोनियम पर श्री विश्वनाथ नारायण ने सँगत दी। श्री नारायण इस कार्यक्रम से उसके प्रारंभिक दिनों से जुड़े हुए हैं और इसकी अब तक की यात्रा के साक्षी हैं। इस मनभावन संध्या में गुलाबों की टोकरी सजी थी जिसका एक और गुलाब-गीत “आँखें भरी-भरी मेरी” (पुस्तक: कुछ और गुलाब) को संगीतबद्ध कर लेकर आये श्री वैद्यनाथ बी. राजन। इनकी मधुर गायकी से भावों की नमी मन में बसकर ठहर सी गई। यहाँ ये उल्लेखनीय है कि कई प्रस्तुतियों में गुलाबजी के पौत्र डॉ. विवेक खंडेलवाल ने गिटार के मधुर सुरों से अनेक प्रस्तुतियों को संवेदनात्मक विस्तार देने के साथ-साथ, तकनीकी व्यवस्था का दायित्व भी अत्यंत आत्मीयता से निभाया।
मनभावन सुर-लहरी की इस श्रृंखला की अगली प्रस्तुति गुरु-शिष्य की जोड़ी ने की। संगीत-शिरोमणि श्री विश्वनाथ नारायण और श्री नीलेश कुलकर्णी के युगल स्वरों ने “दिल में ये प्यार के वहम क्या है” (पुस्तक: गुलाब ग्रंथावली, तृतीय खंड) के माध्यम से शब्दों और श्रोताओं के बीच एक अनूठा संवाद स्थापित कर दिया। कार्यक्रम के समापन की ओर बढ़ते हुए, सभी स्वर एक बिंदु पर आकर ठहर गए जो भक्ति रस से ओतप्रोत था। श्री विश्वनाथ नारायण, श्री वैद्यनाथ बी. राजन और श्री नीलेश कुलकर्णी ने “सब कुछ कृष्णार्पणम्” के माध्यम से उस भक्ति-भाव को व्यक्त किया, जहाँ अभिव्यक्ति अंततः समर्पण में बदल जाती है।
कार्यक्रम के अंत में गुलाब फाउंडेशन की अध्यक्षा और गुलाब जी की पुत्रवधु - डॉक्टर शोभा खंडेलवाल ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में सभी का हृदय से आभार व्यक्त किया। उनके शब्दों में औपचारिकता नहीं, बल्कि संतोष और सभी के प्रति विनम्रता का भाव था। उन्होंने गुलाब जी की अपार साहित्यिक धरोहर को संवारने, और प्रसारित करने लिए उनकी वेबसाइट www.gulabkhandelwal.com के बारे में भी जानकारी दी।
कुछ संध्याएँ समाप्त नहीं होतीं, वे बस अपने शब्द समेट लेती है और फिर, बहुत देर तक, मन के किसी कोने में धीरे-धीरे बोलती रहती हैं। क्लीवलैंड की वह संध्या भी…शायद अब भी बोल रही है और गुलाबी सुरभि से सभी को मोहित कर रही है।
कार्यक्रम से लौटते दर्शकों के मन में एक विचार मंथन कर रहा था कि धरोहर की संरक्षित करने के साथ साथ उसे जीवंत रखना भी बहुत ही आवश्यक है। तभी गुलाब की वो मनमोहक सुरभि नए शब्दों, नए विचारों, नई सुगंध के साथ चहुँ ओर वितरित होगी, फिर कहीं सहेजी जाएगी, और सदैव जीवंत रहेगी।
इस कार्यक्रम संध्या का सुचारु ञ्चालन श्रीमती रश्मि चोपड़ा और डॉक्टर सुनीता द्विवेदी ने सफलतापूर्वक किया।
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अपनी कलम से
माँ को नमन - मनुष्य हो या पक्षी
द्वारा: डॉ. शैल जैन
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कुछ दिन पहले की बात है। मेरे घर की एक खिड़की पर अचानक मेरा ध्यान गया। वहाँ एक छोटा-सा चिड़िया का घोंसला बना हुआ था और उस पर एक नन्ही चिड़िया बड़ी शांति से बैठी थी। वह दृश्य इतना सुंदर और मन को छू लेने वाला था कि मैं कुछ देर तक वहीं खड़ी उसे देखती रह गई। ऐसा लगा मानो प्रकृति ने मेरे घर के एक कोने में अपना छोटा-सा संसार बसाया हो।
थोड़ी देर बाद वह चिड़िया उड़ गई। उत्सुकतावश मैंने धीरे से घोंसले में झाँका। अंदर चार छोटे-छोटे नीले अंडे रखे थे। उन्हें देखकर मेरे मन में एक अनोखी खुशी भर गई। वह घोंसला मेरे कमरे और रसोईघर के बीच की खिड़की पर था, इसलिए दिन में कई बार वहाँ से गुजरते समय मेरी नज़र हमेशा उस घोंसले पर चली जाती। हर बार मैं रुक कर उस माँ चिड़िया को देखती और सोचती कि वह कितनी सावधानी और प्रेम से अपने आने वाले बच्चों की रक्षा कर रही है।
मदर्स डे ( Mother’s Day) के दिन तो मेरे मन में उस छोटी-सी चिड़िया माँ के लिए विशेष भाव उमड़ पड़े। मैं मन-ही-मन उसे धन्यवाद दे रही थी। रात को जब मौसम ठंडा हो जाता, तब वह चिड़िया अपने पंख फैलाकर अंडों को ढक लेती, ताकि वे गर्म रहें। वह पूरी रात बिना हिले-डुले उनकी रक्षा करती। केवल भोजन लाने के लिए ही कुछ समय के लिए घोंसला छोड़ती और फिर तुरंत लौट आती।
उसे देखकर बार-बार यही विचार मन में आता कि “माँ तो बस माँ होती है।” चाहे वह इंसान हो या पक्षी, उसकी ममता, त्याग और समर्पण एक जैसे ही होते हैं। माँ अपने बच्चों की परवरिश करते समय अपनी सुविधा या थकान की चिंता नहीं करती। उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण केवल उसके बच्चे होते हैं।
कुछ दिनों बाद एक सुबह मैंने देखा कि अंडों से छोटे-छोटे चूजे निकल आए हैं। उनकी हल्की-हल्की चहचहाहट पूरे वातावरण में मिठास घोल रही थी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं सोच रही थी कि उस चिड़िया माँ को कितनी प्रसन्नता हो रही होगी! वह बार-बार उड़कर उनके लिए दाना लाती, अपने छोटे-छोटे बच्चों को खिलाती और हर समय उनके पास बैठी रहती।
उस दृश्य ने मुझे मानव जीवन की माँओं की याद दिला दी। एक माँ अपने बच्चे को इस दुनिया में लाने के लिए कितनी कठिन यात्रा से गुजरती है। नौ महीने तक उसे अपने गर्भ में रखकर उसका पालन करती है। बच्चे के जन्म के बाद भी उसकी रातों की नींद, उसका आराम, उसकी इच्छाएँ—सब कुछ बच्चों के लिए समर्पित हो जाता है। बच्चे की छोटी-सी तकलीफ भी माँ के हृदय को बेचैन कर देती है।
हम सभी के जीवन में माँ का स्थान सबसे ऊँचा होता है। बचपन में जब हम गिरते हैं, तो सबसे पहले “माँ” ही पुकारते हैं। हमारी खुशी में वह सबसे अधिक खुश होती है और हमारे दुख में सबसे अधिक दुखी। माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है। वह बदले में कुछ नहीं चाहती, केवल अपने बच्चों की मुस्कान देखना चाहती है।
आज के तेज़ भागते जीवन में हम कई बार अपनी माँ के त्याग और प्रेम को सामान्य मान लेते हैं। लेकिन प्रकृति के ये छोटे-छोटे दृश्य हमें रुककर सोचने पर मजबूर कर देते हैं। उस छोटी चिड़िया ने मुझे फिर से याद दिलाया कि मातृत्व केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि ईश्वर का सबसे सुंदर रूप है।
धीरे-धीरे वे छोटे चूजे बड़े होने लगे। एक दिन वे भी अपने पंख फैलाकर उड़ जाएँगे और अपना संसार बना लेंगे। लेकिन उनकी माँ हमेशा उन्हें उसी प्रेम से देखेगी, जैसे हर माँ अपने बच्चों को जीवनभर देखती है।
सचमुच, माँ का हृदय संसार का सबसे विशाल और सबसे कोमल स्थान होता है।सभी माँओं को मेरा सादर नमन।
उनके प्रेम, त्याग, धैर्य और अनंत ममता को प्रणाम।
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अपनी कवितायेँ
"शहर की गलियों में - नव-उदित शायर"
द्वारा: संजीव बंसल, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
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संजीव बंसल ने IIT Delhi से स्नातक किया और XLRI Jamshedpur से एमबीए किया। भारत में प्रारंभिक नौकरी Telco, जमशेदपुर में थी। 1990 में अमेरिका के न्यू जर्सी में
रहे। 2007 में सोलोन, ओहायो आये और वर्तमान में Howmet Aerospace के आईटी विभाग में कार्यरत हैं ।
हिंदी इनकी मातृभाषा और पहली भाषा है। इन्हें स्थानीय “Hindustani Mehfil” समूह में हिंदी कविता लिखने की प्रेरणा मिली और गत एक वर्ष से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा से जुड़े हैं । हिंदी कविता में मेरी वर्तमान रुचि इसे व्यक्तिगत बनाने में है। अपनी कविताएँ मित्रों, मित्रों के समूह, या अपनी रुचि—जो कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी है , उन पर लिखते हैं ।
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शहर की गलियों में - नव-उदित शायर
शहर की गलियों में, चाय की भाप के संग,
उभरते हैं कुछ शब्द—धीमे, मगर ढंग।
न मंच बड़ा, न रोशनी की भरमार,
फिर भी दिलों में बसते ये नव-उदित शायर हर बार।
किसी नुक्कड़ पर बैठा, डायरी में ख्वाब लिखे,
कोई मोबाइल पर टाइप करे, जज़्बातों के रुख़ सिखे।
न नाम अभी मशहूर, न तस्वीरें अख़बार में,
पर सच की खुशबू है उनके हर एक विचार में।
इनकी कविताओं में शहर की धड़कन है,
कभी माँ की ममता, कभी देश की धुन है।
कभी प्रेम की बारिश, कभी विरह की धूप,
हर पंक्ति में छुपा है जीवन का अनूप स्वरूप।
कहते नहीं ये ऊँची आवाज़ में अपनी बात,
फिर भी गूँज जाती है, दिलों में उनकी हर सौगात।
खामोशी को भी ये शब्दों में ढाल देते हैं,
छोटे-छोटे लफ़्ज़ों से कमाल कर देते हैं।
कल के यही चेहरे, बनेंगे नई पहचान,
आज के ये कवि ही, लिखेंगे आने वाला विधान।
स्थानीय मंचों से उड़ान भरते ये परिंदे,
कल आसमान लिखेंगे—अपने ही छंदों के धागे बुनते।
सलाम उन उभरते कवियों को,
जो सच को कविता में ढालते हैं,
जो भीड़ में भी अलग खड़े,
अपने शब्दों से दुनिया संभालते हैं।
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All the Samwad editions, starting from June 2021 till current - are available online now.
https://hindi.org/samwad
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