संवाद - May 2022

संवाद - May 2022

 
 
 
 
 
अप्रैल INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
  मई 2022, अंक १२    | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
 
 
 
 
प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को मातृत्व दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ और ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।

जागृति मंच द्वारा १४ मई २०२२ समय ८:३० शाम, भारतीय समय (IST) यू.एस.ए. ११:०० AM (EST), १०:०० AM (CST), ८:०० AM (PST) हिंदी साहित्य की दशा एवं दिशा पर चर्चा की एक रोचक शृखला “भक्ति काव्य का उद्भव और स्वरूप” संपन्न हुई, जिसकी प्रस्तुती प्रख्यात आलोचक और चिंतक डॉ. करुणा शंकर उपाध्याय द्वारा की गई ।अगली कड़ी, 11 जून 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है| इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "भारतबोध और भक्ति साहित्य "।
इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।आप सभी से निवेदन है, कि आप सभी इस मासिक कार्यक्रम में सम्मिलित हो क्योंकि यह हमें अपनी मातृभाषा के इतिहास को जानने के लिए परम आवश्यक है।

आप सभी को विदित है, कोविड के प्रकोप के कारण हमारा वार्षिक कवि सम्मेलन पिछले दो वर्षों से सम्मेलन नहीं हो पाया था, वह कवि सम्मेलन इस वर्ष होने जा रहा हैं। यह बताते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है, कि हमारे कविगण भारत से आ रहे हैं - हास्य कवि दीपक गुप्ता जी, गीतकार अंकिता सिंह जी और व्यंगकार तेज प्रकाश शर्मा जी है। जिनकी काव्य गोष्ठियाँ 3 जून से 10 जुलाई २०२२ तक अमेरिका के विभिन्न शहरों में होंगी। ये कवि गोष्ठियाँ जब भी आपके शहर में आयोजित की जायें, कृपया आप सपरिवार इनका भरपूर आनंद लेने का कष्ट करें। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति आप सभी के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष सहयोग के लिए आभारी है।

Amazon के माध्यम से आप अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का समर्थन कीजिये। आप सभी को मालूम है अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति एक ग़ैर लाभकारी संस्था है, और जहाँ खरीदार अपनी पसन्द की वस्तुयें खरीदें उनसे निवेदन है कि वे दानशील (charitable) संस्था के रूप में smile.amazon.com के माध्यम से खरीद सकते हैं। कोई भी ख़रीदी करता है तो amazon.com उस आय का ०.५% अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति को दान करता है। आपके इस सहयोग के लिए अग्रिम धन्यवाद।

अंत में मैं सम्पादकीय समिति को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य पूर्ण तन-मन से कर रहे हैं। पूर्व में दी गई जानकारी के सन्दर्भ में कोई भी प्रश्न है, तो कृपया यहाँ सम्पर्क करें पूर्ण जानकारी के लिए hindi.org और कृपया इस ईमेल (anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से सम्पर्क करें और इस फ़ोन नम्बर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम 
 
 
 अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  -- जागृति वेबिनार:
 "भारतबोध और भक्ति साहित्य"--- 11 जून 2022 
 
 
जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 11 जून 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।

जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान प्रोफेसर नन्द किशोर पांडेय, शोध निदेशक, हिंदी विभाग, एवं अधिष्ठाता, कला संकाय, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "भारतबोध और भक्ति साहित्य "।

आइये उनसे सुनें: भक्तिकाल का साहित्य भारतीय समाज के विभिन्न आयामों, जैसे सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक आदि, को कैसे निरूपित करता है? निर्गुण और सगुण दोनों के सरस वर्ण से समाज को कैसे आकर्षित करता है ? कैसे भक्ति साहित्य के रचनाकारों ने, जाति भाषा और प्रांतों की सीमा लाँघ भारतीय समाज को समरस बनाया; उसे राष्ट्र-गौरव और सुरक्षा का संदेश दिया? क्या बिखरे समाज को भारत-बोध की समझ से जागृत करने का साहित्य ही भक्ति साहित्य है? आइये इन प्रश्नों के उत्तर जानें और चर्चा करें उस समय के हिंदी साहित्य के इस स्वर्ण-युग के विषय में ।

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति शनिवार, 11 जून 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।

सम्मिलित होने के लिए लिंक है: www.facebook.com/ihaamerica

शनिवार, 11 जून 2022; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST, UK: 4:00 PM

आशा है कि आप शनिवार, 11 जून 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिबद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है | पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं । स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है |"जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना।

यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
 
 
 
 
 
  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  -- अमेरिका के महानगरों में:
"हास्य के रंग गीत - ग़ज़ल के संग ", ३ जून से १० जुलाई, 2022  
 
 
 
जागृति रिपोर्ट  
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  --१४  मई, २०२२  

जागृति व्याख्यानमाला की चौथी कड़ी
14 मई 2022: भक्ति काल का उद्भव और स्वरुप 
 
 
 
 
 
प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी
 
 
 
 
वक्ता: डॉ. करुणा शंकर उपाध्याय 
 
 
 
 
 
जागृति व्याख्यानमाला की शुरुआत इसी वर्ष सरस्वती पूजा के दिन हुई थी। इस श्रृंखला की चौथी कड़ी 14 मई 2022 को जूम से आयोजित हुई। अमेरिका, भारत और अन्य देशों के दर्शक/श्रोता फेसबुक के माध्यम से इस कार्यक्रम से बड़ी संख्या में जुड़े थे। विषय था: "भक्तिकाल का उद्भव और स्वरुप"; और वक्ता थे हिंदी विभाग मुंबई, विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर और प्रख्यात आलोचक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय। कार्यक्रम के आरम्भ में जागृति के प्रमुख डॉ. राकेश कुमार ने अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति और 'जागृति' के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और समिति के ट्रस्टी सुरेंद्र नाथ तिवारी ने इस व्याख्यान-श्रृंखला की पिछली तीन कड़ियों की सक्षेप में विवेचना की। तत्पश्चात "जागृति" टीम की सदस्या सुश्री पूजा श्रीवास्तव ने डॉ. उपाध्याय का और देश -विदेश में फैले श्रोताओं/दर्शकों का स्वागत किया। पूजा जी ने प्रोफ़ेसर उपाध्याय का परिचय देते हुए बताया कि डॉ. करुणाशंकर उपाध्‍याय एक अनुभवी हिंदी आचार्य ही नहीं अपितु एक सिद्धहस्त लेखक और सम्पादक भी हैं। उनकी अनेकानेक रचनाएँ विभिन्न स्तरों पर प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: सर्जना की परख, आधुनिक हिंदी कविता में काव्यचिंतन, पाश्चात्य काव्यचिंतन, सृजन के अनछुए संदर्भ, मध्यकालीन कविता का पुनर्पाठ, आदि। कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित, डॉ. उपाध्याय एक उत्कृष्ट संपादक भी हैं और उन्होंने कोई एक दर्जन कृतियों का सम्पादन किया हैं।
अपने व्याख्यान में डॉ. उपाध्याय ने बताया कि हिंदी साहित्य के भक्तिकाल का युग आम तौर से १३५० से १६५० ईस्वी तक माना जाता है। गुण और परिमाण दोनों दृष्टियों से भक्तिकाल का साहित्य विपुल है, समृद्ध है और इसी कारण से भक्तिकाल को साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है। हिन्दी कविता की श्रेष्ठतम रचनाएँ इसी काल में हुई हैं। हालाँकि भक्तिकाल के उद्भव के विषय में विद्वानों में मतभेद है। यह मतभेद आचार्य रामचंद्र शुक्ल की स्थापना से प्रारम्भ होकर आजतक जारी है। आचार्य शुक्ल के अनुसार मुसलमान राज्य के स्थापित हो जाने के बाद। ..... "हिन्दू जनता के मन में गौरव, गर्व, और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया था। .."। इस निराशा और हताशा की स्थिति में, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, हिन्दू जनता को ईश्वर की शक्ति और करुणा में सहारा दिखा जो भक्तिकाव्य का आधार बना। अन्य विद्वानों जैसे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस मत का खंडन करते हुए कहा है कि अगर मुस्लिम राज्य न भी होता तो भी भक्तिकाल का साहित्य "बारह आने" ऐसा ही; यानी भक्तिकाल का उद्भव बहुत पहले हो चुका था और मुसलमानों के आधिपत्य का प्रभाव उस पर बहुत कम पड़ा। ग्रियर्सन ने भक्तिकाल की तुलना "बिजली का कौंध" से की है; आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इस बिजली के बादल कई सदियों से भारतीय जनमानस के आकाश में मंडरा रहे थे।

भक्तिकाल के उद्भव की इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि एक चर्चित धारणा यह है कि 'भक्ति द्रविड़ उपजी। ..." यानि भक्ति कविता का प्रारम्भ दक्षिण के अलवर भट्टों द्वारा हुआ जो शनैः शनैः उत्तर भारत में फैला। यह धारणा भी सही नहीं है। अलवर भट्टों के समय से बहुत पूर्व भक्ति-काव्य के कई प्राचीनतम उद्धरण मिलते हैं। ऋग्वेद में भक्ति, भागवत आदि शब्द मिलते हैं। वैदिक काल और उसके बाद के पौराणिक कालों में भक्ति की अवधारणा थी और समय के साथ-साथ पुष्ट हो रही थी। कृष्ण के समय में ही, वासुदेव धंर्म स्थापित था; भक्ति की भावना समृद्ध और लोकप्रिय थी। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि गुप्तकालीन राजाओं को भी "परम् भागवत" की संज्ञा दी जाती थी। डॉ. उपाध्याय के अनुसार, एक कारण नहीं बल्कि कालांतर में विविध कारणों और प्रेरक तत्वों से प्रभावित हो, ऋषियों द्वारा पुरस्कृत हो, भक्ति एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में उद्भूत हुई। इस साहित्यिक आंदोलन में पूरे भारत के भक्त कवि सहभागी थे। सिंध के रोहन दास और पंजाब के गुरु नानके देव से लेकर गुजरात के नरसिंह मेहता, महाराष्ट्र के नामदेव और एकनाथ, बंगाल के चैतन्य महाप्रभु, आसाम के शंकरदेव, दक्षिण के अलवर भट्ट, आदि ; और सूरदास, तुलसीदास, मल्लिक मुहम्मद जायसी तो थे ही। इस राष्ट्रीय समग्रता और सहभागिता के कारण ही भक्ति आंदोलन एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया।
भक्तिकाव्य के स्वरुप का वर्णन करते हुये प्रोफेसर उपाध्याय ने बताया कि भक्ति का काव्य उपर्युक्त राष्ट्रीय समग्रता के कारण किसी भाषा-विशेष या जाति-विशेष तक सीमित नहीं था। उसमे तुलसी जैसे विद्वान थे तो कबीर और रैदास जैसे कम तालीम पाए लोग भी थे। भक्ति साहित्य अन्यान्य भाषाओँ और बोलियों में लिखा गया और उसके रचनाकार समाज की हर जाति के लोग थे, केवल ब्राम्हण ही नहीं, केवल हिन्दू ही नहीं, जो आम धारणा है। उसमें जायसी और रसखान जैसे मुसलमान कवि भी हैं, रैदास, कबीर आदि भी उच्च जाति के न होते हुए भी प्रसिद्ध कवि हैं, ये भक्ति-काव्य की समग्रता और समरसता के ज्वलंत उदाहरण हैं। ऐसे कवियों की आजीविका अलग-अलग थी, अत: भक्ति की अंतर्धारा के ऊपर उनकी आजीविका का भी चित्रण उनके काव्य में मिलता है...जैसे कबीर की : "झीनी झीनी बीनी चदरिया..."। काव्य के विषय-वस्तुओं में भी जाति-बिरादरी का अलगाव हटाने की चैष्टा देखने को मिलती है। उदाहरणतः रामायण में शबरी, एक आदिवासी महिला, को 'भगवान" राम नवधा भक्ति का उपदेश देते दीखते हैं; कुछ उसी तरह जैसे गीता के "भगवान" कृष्ण क्षत्रिय (और पुरुष) अर्जुन को ज्ञान का उपदेश देते दीखते हैं, यह उदाहरण भीलनी शबरी को उसी पद पर प्रतिष्ठित करता है, जिस पर राजपुरुष अर्जुन हैं। इसके अतिरिक्त सीता-राधा-पद्मावती के माध्यम से, उन्हें पूज्य एवं आदरणीय बताकर, तुलसी, सूर, और जायसी जैसे कवियो ने नारी-जाति की प्रतिष्ठा को भी बढ़ावा दिया। पद्मावत की पद्मावती को जायसी ने ईश्वर की प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित किया है। ये तत्कालीन समाज में क्रन्तिकारी कदम थे।

प्रोफेसर उपाध्याय ने "कबिरा यह घर प्रेम का" या तुलसी का 'कीरति भूति भनिति भल सोइ, सुरसरि सम सबकर हित होइ’ या "रामहि केवल प्रेम पियारा..." आदि उदाहरणों द्वारा यह बताया कि भक्तिकाल का साहित्य मुख्यत: प्रेम का साहित्य है, लोकमंगल का साहित्य है। भक्तिकाल के कवियों ने प्रेम और लोकमंगल की प्राण-प्रतिष्ठा तो की है, पर शोषण, दुर्भिक्ष, सामंती व्यवस्था, बहुपत्नी प्रथा आदि सामाजिक बुराइयों को जम कर लताड़ा भी है; जैसे जायसी ने अलउद्दीन खिलजी की तुलना रावण से की है। तुलसी ने दुर्भिक्ष की विद्रूपता का जोरदार चित्रण करके सामंतों को चुनौती दी है:."खेती न किसान को, भिखारी को न भीख भला"। जब सरकार चलाने के लिए दंड का विधान प्रमुख था, तुलसी ने दंड को मात्र "जतिन्ह कर" में स्थान दे दिया, यानीं राम-राज्य जैसे सुराज में दंड, याने लाठी, केवल योगियों के हाथ में रहती है। यह स्पष्टवादिता, अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता, भी तकलीन समाज के लिए एक क्रन्तिकारी कदम थी। जब सम्राट के आधिपत्य से आम जनता भयभीत थी; भक्तिकाव्य के रचनाकारों ने सम्राट के दबाव से विचलित हुए बिना खुलकर उसकी आलोचना की जब भी आलोचना का अवसर आया। उदाहरणत: "संतन को का सीकरी से काम? आवत जात पनहिया टूटी, बिसर गयो हरिनाम।" या 'हम चाकर रघुनाथ के नर के मनसबदार..." यह निर्लिप्तता, यह साहस ही उदात्त संतत्व की निशानी है।

अपने वक्तव्य का समापन करते हुए डॉ. उपाध्याय ने बताया कि भक्तिकाल के काव्य में अभिव्यंजना पक्ष मुखर है; हर छंद-विधा में रचनाएँ की गई हैं। कविता के रस, रूप, छंद, अलंकार, सब का प्रयोग भक्तिकाव्य में प्रचुर हैं। उनके अनुसार भक्ति साहित्य कविता की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है। एक और बात जो ध्यान देने योग्य है वह है कि अधिक भक्त कवि यायावर थे, आपस में उनकी मुलाकात होती रहती थी। यह यायावरी वृत्ति कई कारणों से महत्वपूर्ण है साहित्यिक समग्रता के लिए। एक दूसरे से सीखना, दूसरे प्रान्त के विषय में जानना, वहाँ की प्राकृतिक सम्पदा-सौंदर्य और वहाँ के लोकजीवन की समझ, उसके दुःख सुख और उसकी चुनौतयों की समझ, आदि से साहित्य प्रचुर होता है, समाज के लिए, राष्ट्र के लिए अधिक उपयोगी होता है, मात्र एक रचनाकार की रचना होते हुए भी वह राष्ट्रीय साहित्य बन जाता है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. राकेश कुमार ने प्रोफ़ेसर उपाध्याय को उनके विद्वत्तापूर्ण एवं तर्क-सम्मत वक्तव्य के लिए धन्यवाद दिया और भविष्य में भी समिति से उनकी सहभागिता का अनुरोध किया। डॉ. राकेश कुमार ने विश्व भर में इस कार्यक्रम से जुड़े श्रोताओं का धन्यवाद-ज्ञापन किया और उनके सपरिवार मंगल की कामना की।

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शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट   
 
 
 " अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति --नये आजीवन सदस्य २०२० -२१ "   
 
 
 
अपनी  कविताएँ  --  ग़जल 
 
 
  " प्रिय प्रेम हमारा, सबसे न्यारा" 
 
 
 
 
 प्रिय प्रेम हमारा, सबसे न्यारा
 
प्रिय प्रेम हमारा ,सबसे न्यारा ।
करता अस्थिर हृदय तरंग धारा।।
विचलित नयन निहारे तुमको यूँ,
हर संग से संग तुम्हारा प्यारा।।
 
प्रेम दिया माता ने मुझको ।
खोया मैने पाने को तुझको।
चली संग तुम्हारे मै प्रियवर।
छोड़ दिया रोने को उसको।।
 
 
 
 
 द्वारा -श्रीमती सुमति श्रीवास्तव
 
 श्रीमती सुमति श्रीवास्तव जौनपुर, उत्तरप्रदेश से हैं। पेशे से अध्यापक है। आप बहुत से राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानीत हुई हैं।

 
                   ~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
आज तुम्हारे घर हूँ आई ।
बजती हृदय में इक शहनाई।।
छोड़ अपने सपनों की चादर,
मैने प्रेम की अलख जगाई ।।
 
 
साथ तुम्हारा सदा ही रहे।
सदा प्रेम की धार बहे।।
तुममे मै हूँ मुझमें तुम हो।
सब बस यही बात कहे।।
 
अंतकाल जब मेरे करीब हो।
मेरे कृशतन के तू समीप हो।
हो माँग मेरी सजी प्रियवर ,
प्रेम तेरा मेरा नसीब हो।।
*** 
 
 
  " ग़ज़ल - क्यों न काँपें फूस की ये बस्तियाँ "   
 
 
 
 
 द्वारा -श्री धर्मेन्द्र कुमार गुप्त
 
श्री धर्मेन्द्र कुमार गुप्त वाराणसी, उत्तर प्रदेश से हैं। इन्होने 1984 में प्रथम ग़ज़ल के प्रकाशन से साहित्यिक यात्रा प्रारम्भ की। राज्यों की प्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं ग़ज़ल, कविता, समीक्षा आदि प्रकाशित होती रहतीं हैं। आपको अनेक साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मान भी प्राप्त हुए है।
 
 
 
 
क्यों न काँपें फूस की ये बस्तियाँ
 
 
 क्यों न काँपें फूस की ये बस्तियाँ
 
 क्यों न काँपें फूस की ये बस्तियाँ
 तेज़ बारिश और तड़पती बिजलियाँ
 
 इक कसक-सी दिल में उठती है मेरे
 देखता हूँ जब गुलों पर तितलियाँ
 
दोस्त है कोई न कोई है रक़ीब
आ रही हैं शाम से क्यों हिचकियाँ
 
आज क्यों सहमी हुई -सी है नदी
क्यों किनारे पर ही हैं सब कश्तियाँ

उसको सपने में भी आती हैं नज़र
कुर्सियाँ बस कुर्सियाँ बस कुर्सियाँ

लिख रहा था ख़त में 'साहिल' सच उसे
काँपती जाती थीं मेरी उंगलियाँ
***
 
 
  " यह मानवता पर संकट है’" 
 
 
 
 
यह मानवता पर संकट है
 
 
 
 
द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
 
 श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है। मानवता पर आये संकट के लिये कवि के क्या विचार हैं ? पढ़िए।
 
 
यह मानवता पर संकट है
हा त्राहिमाम हा त्राहिमाम, हा त्राहिमाम की सुन पुकार।
क्रन्दन कर उठा हृदय कवि का, शिशुओं का सुनकर चीत्कार।।

ख़ाकीन कर दिया पतनों ने, दे दी पछाड़ उत्थानों को।।
आ रहा पसीना पथरीली, काँपती हुई चट्टानों को।

हिल उठे कलेजे शिखरों के, घाटियाँ सिकुड़ कर चीख उठीं।
मौतें हो उठीं मुखर मौनी, लाशों पर नर्तन सीख उठीं।।

आ गया ज्वार उन लहरों में, जो कभी आज तक उठीं न थीं।
गुँथ गईं युद्ध में वे कड़ियाँ, जो एक सूत में गठीं न थीं।।

लग रहा अधकटे रुण्डों की, कर उठी भैरवी खेती हो।
या मुण्डमाल के लिए पुनः, काली रण चण्डी चेती हो।।

या महाकाल की आँख खुली, तीसरी ध्वंस की बेला है।
या स्वयं कालभैरव ने आ जग को इस ओर धकेला है।।

धरती की छाती छेद उठे, धरती पर बने बनाए बम।
दहला दी दुनिया दहशत से, हो रही बमों की बम बम बम।।

टी वी की छाती से निकले, परिदृश्य दिखाई देते हैं।
कुछ सत्य और कुछ भ्रमकारी, सन्देश सुनाई देते हैं।।

इस ओर विवश यूक्रेन खड़ा, उस ओर रूस की दमदारी।
इस ओर गुरिल्ला वारों से, उस ओर दनादन बम्बारी।।

इस ओर कराहें दबी दबी, उस ओर गर्जना गर्वीली।
इस ओर आह तक पीली है, उस ओर वाह तक रौबीली।।

इस ओर चतुर्मुख धुआँ धुआँ, उस ओर फूटते फव्वारे।
इस ओर जी उठा ध्वंस राग, उस ओर नृत्य द्वारे द्वारे।।

इस ओर ध्वस्त हो गया सृजन, उस ओर अहम् है मस्तक पर।
इस ओर भुखमरी पेटों ‌पर, उस ओर दम्भ है दस्तक पर।।

इस ओर थम गई किलकारी, उस ओर ठहाकों का मिलना।
इस ओर झर चुके पारिजात, उस ओर पलाशों का खिलना।।

क्या नई भूख के प्यासों को, पानी न मिला पाताल तलक।
जो माँस चबा पी उठे खून‌, छोड़ी न नरों की खाल तलक।।

आखिर किसने जीवन्त देश, शमशान बना कर छोड़ दिया।
किसने मदमाते हाथी के, सामने हिरण को मोड़ दिया।।

किसके बल पर मृग पूत रहा, किसकी बातों में बहक उठा।
वे कहाँ गए हित के रक्षक, जिनके कारण तन दहक उठा।।

रो रही धरा रो रहा गगन, रो उठा नर्क का द्वार द्वार।
आँखों से झरने फूट पड़े, हा - हा खा - खा कर बार बार।।

रोको रोको यह महायुद्ध, यह महानाश का कारण है।
यह द्वन्द्व नहीं है बातों का, यह प्रलय भयंकर भीषण है।।

इसलिए कहूँगा मैं खुलकर, हर जीवन लेने वाले से।
तुम बड़े नहीं हो सकते हो, नव जीवन देने वाले से।।

जो हारेगा वह हार गया, जो जीतेगा वह भी हारा।
नुकसान सदा दोनों का है, तूने मारा मैंने मारा।।

जय विजय किसी की नहीं हुई, जो कहे समझ लो लम्पट है।
यह दानवता के मन की है , पर मानवता पर संकट है।।
***
 
 
अपनी कलम से 
 
 
"विरहा बुरहा मत कहो विरहा है सुल्तान" 
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. श्रीमती नीलम सिंह
 
 
 
 

डॉ. श्रीमती नीलम सिंह, सहायक प्रोफेसर (हिंदी), सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश।
 
 
 
"विरहा बुरहा मत कहो विरहा है सुल्तान"
कबीर दास जी कहते हैं कि - विरह एक सामान्य वस्तु है - ऐसा मत कहो वह तो शरीर का स्वामी हैं। जिस शरीर में विरह न हो वह शरीर मरघट के समान है।
दूसरे शब्दों में - विरह को बुरा मत कहो। विरह तुच्छ नहीं श्रेष्ठ है। जीवन का राजाधिराज है। जिस हृदय में विरह का संचार नहीं होता वह सदा शमशान के समान है अर्थात जिस व्यक्ति में विरह का भाव नहीं है, वह मृत समान है निर्जीव है। इसलिए विरह को बुरा कभी नहीं कहना चाहिए क्यों कि विरह जीवन का इष्ट है जीवन के लिए श्रेयस्कर है, जीवन का प्रेरक है जीवन का मार्ग निर्देशक है अत: विरह सुल्तान है।
“तुलनीय- विरहा विरहा आखिये, विरहा है सुलतानु।
फरीदा जिनु तनि विरह न उपजै, तो तणु जाणु मसाणु”।
--शेख फरीद
विरह प्रेम का तप्त स्वर्ण है। प्रेम विरह में तपकर ही शुद्ध एवं परिपक्व होता है। विरह प्रेम की कसौटी है। आत्मा का वास्तविक सम्बन्ध उस परमसत्ता से है। धीरे-धीरे उसके प्रति अनुराग का जागरण होता है। तब वह उसे पाने के लिए व्याकुल हो उठता है। अंश-अंशी से मिलने के लिए व्यग्र हो उठता है यही विरह की स्थिति है। विरह का अर्थ है -विशेष रूप से रहित होने की अनुभूति ।
प्रिय के सम्पर्क में बिताये गये क्षणों की याद मे प्रेमिका का उन्माद ग्रस्त या पागल होना स्वाभाविक है। वियोग बेल में यह गति और तेज हो जाती है। जब गली डगर या खुले आंगन में सुकुमार स्मृतियाँ बारात सजाकर छायी हों तब अंनत-अज्ञात छाया-पथ से प्रिय की छवि राशि अति मंद गति से उतर कर पुतलियों में बहने लगती है। जब एकांत शयनागार में गुनगुनाए गीत नये सत्य का उद्‌घाटन करते हुए कर्ण-कुहरों में गूँजने लगते हैं तो प्रिंय से बिछड़े जन को आशातीत आंनद का अनुभव होता है।

प्रेम का जादू भी गजब है। जो एक बार फंसा फिर उबरने का मौका न पाया। जब कबीर जैसा प्रभुता सम्पन्न सिपाही इस सिद्धति (accomplishment) कायल रहा हो औरों के बारे में क्या कहा जाय। कर कामल पाय, अल मस्त फकीर जनम-जनम के साथी से मिलने के लिए बेचैन था। अचानक कोई देवदूत उसे वालम की पाती दे गया फिर क्या, कबीर के चेहरे पर उल्लासी रंग छहर गया फूलों की वर्षा हुयी, बहारे आईं और धरती सजाकर धन्य हो गयी। कबीर का अविनासी प्रिय गजब है। जो छायाबल से माया को समाप्त कर तन मन पवित्र कर देता है --
“सखियों, हमहु भई बलगासी
आयो योवन विरह सतायो, जब मैं ज्ञान गली आठिलाती”॥

साईं से अलगाने पर दिमाग में अशान्ति और कलेजे में जलन पैदा हो जाती है। रात हो या दिन न नींद आती है न सुख मिलता, न तड़पन समाप्त होती न सांस लेने की फुरसत मिलती। पीर की यह कहानी किसी से कहीं भी नहीं जा सकती। यदि कहें भी तो सुनने वाला कौन है जो धैर्य पूर्वक सुनेगा, वह पीठ पीछे गहरा मजाक कर मुस्कुरा देगा। इससे अच्छा है कि दिल का दर्द दिल में ही पड़ा रह जाय। कबीर का विश्वास है कि प्रिय मिलन के विना वास्तविक सुख मिल पाना मुश्किल है। वही दर्द का कारण है और वही दवा देकर इस मर्ज से छुटकारा दिलायेगा।


“दिन नहि चैन रात नहि निदिया, कासे कहूँ दुख होय”॥

कबीर ने गली - गली दौड़ के और नदी नाले में नहाकर पाप छुड़ाने की जगह बिछड़े प्रिय को पाने के लिए साधना रत होने की सहज भूमिका पर जोर दिया है। सामान्यतः भक्त जनों के लिए अलौकिक विरह असाध्य हुआ करती है। प्रिय के वियोग में आत्मा हर क्षण व्याकुल रहती है वैसे ही जैसे नादान बच्चे से विछुड़कर कौञ्च पक्षी का ज़ोड़ा आकाश पाताल एक कर देता है। आत्मा महाज्योति के मूल्य और महत्व से परिचित है। अतः उसके हृदय में विरहजनित दुख उभरना स्वाभाविक है। राम से बिछुड़े प्राणियों को रात-दिन कभी भी किसी समय चैन नहीं मिलती। कबीर ने इस बेचैनी को परमपद पाने का प्रथम सोपान कहा है। जिसमें दर्द वरदाश्त करने की क्षमता नहीं रहती। वह राम के चरणों तक पहुँचने का अधिकारी नहीं होता -
 
“चकवी विछुरी रैनि की, आई मिली परभाति।
जे जन विछुरे राम से, ते दिन मिलें न राति।।
वासरि सुख ना, रैणि सुख ना, सुख सपने मांहि।
कबीर बिछुरिया रामसुं, ना सुख धूप न छाँह”।।

कवि कहता है कि प्रिय मिलन की व्याकुलता उसकी तड़पन संसार के किसी और विरह व्यापार से तुलनीय नहीं हो सकती। चकई का विरह प्रसिद्ध है पर वह भी तो रात की समाप्ति के बाद प्रिय के साथ आसानी से मिल जाती है। राम का विरह इतना आसान नहीं है। एक बार जो इस विरह की चपेट में आ जाता है वह कुछ ऐसा बेहाल हो जाता है कि कहकर प्रकाश करना कठिन है। उसे न दिन में न रात में न सपने में न जागरण में ने धूप में न छाँह में चैन मिलता है। वह प्रिय से कहती है कि हे प्रिय! या तो विरहिणी को मृत्यु दो या अपने छिपाव को मिटाकर मिलो। दिन-रात की तपन मुझसे अब नहीँ सही जाती---
"कै विरहिन को मीच दे, कै आपा दिखलाय।
आठ पहर का दाझना मोमन पै सहा न जाय।।"
 
विरह की गतिशीलता और भयानकता को व्यक्त करने के लिए कबीर ने उसकी उपमा सर्प से दी है। जब विरह विषधर शरीर को निवास केन्द्र बना लेता है तो उससे पिंड छुड़ा लेना कोई आसान कार्य नहीं रह जाता। अन्य सर्प मन्त्रों के वश में होते हैं किन्तु यह किसी मन्त्र के बंधन में आबद्ध नहीं किया जा सकता। हाँ इतना जरूर है कि जो एक बार इस अग्नि में जल लेता है। उसे फिर सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। वह जीवित रहते समाज से विमुख हो जाता है और हर क्षण प्रभु के पूजा - अराधना में लगाता रहता है। संसार उसे पागल कहता है। अवसर मिलने पर खरी खोटी भी सुनाता है मगर उसका दिमाग किसी तरफ नहीं जाता। जीवन के इस के ऊर्ध्व रूप को वहीं समझ सकता है जिसने दर्द को दुनिया से गुजरते हुए प्रभु की छाया का आभास पा लिया है। कपटी और पांखडी तो उस दर तक पहुँच ही नहीं पाते। वे माया के बाजार में विषय वासनाओं से चिपकर जीवन बिता देते हैं -

“विरह भुवंगम तन बसै ,मन्त्र न लागै कोई। राम वियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होई।।
विरह भुवगंग पैसि करि, किया कलेजै घाव। साधू अंग न मोडहिं, ज्यूँ भावै त्युं खाव”।।
विरह की आग भीतर ही भीतर सुलगती रहती है, जिसके भीतर यह सुलगती है, वह जानता है या जिसने यह आग लगाई है उसे पता हो सकता है---
“हिरदै भीतर दव वलै ,धुंवा न प्रगट होय। जागे लागी सो लखै की जिन लाई सोय”।।
 
विरह सारे शरीर में छा जाता है। वह पूर्ण रुपेण व्यक्तिगत होता है। इतनी व्यथा सहन करने पर भी विरही विरह को छोड़ना नहीं चाहता। सूर के शब्दों में---
"जरत पंतग दीप में जैसे औ फिरि फिरि लपटात" जैसे पतंग दीप में जलता है फिर भी उसमें बार - बार लिपटाता है वैसे ही प्रेम में विरह के कारण वेदना होती है फिर भी वह विरह को पाले रहता है उसे छोड़ता नहीं। विरह के द्वारा प्रेम का पोषण और विकास होता है। अंत में विरह प्रिय से मिलन कराकर ही शांत होता है। कबीर ने इस तथ्य का इस प्रकार वर्णन किया है--
“विरहा कहें कबीर सों तू जनि छाडै मोहि। पारब्रह्म के तेज में तहाँ ले राखौं तोहिं”।।
विरह कबीर से कहता है- "तू मेरा परित्याग मत कर जब तक पारव्रह्म की ज्योति का तुझे साक्षाकार नहीं करा देता तब तक तेरे साथ रहूँगा। दादू के शब्दों में--
“विरह जगावै दरद को दरद जगावै जीव।
जीव जगावे सुरति को पंच पुकारे पीव”।।
 
निष्कर्ष रुप में यह कहा जा सकता है कि कबीर का अपने प्रियतम के प्रेम पर अखण्ड विश्वास है। उसमे आत्म समर्पण का भाव प्रबल है। वह प्रेम अद्‌भुत हैं उसकी ज्योति अपूर्व है। दुःख और द्वंद से परे भ्रम और भ्रांति से अतीत यह एक रस प्रेम ही परम पुरुषार्थ है--
“गगन की गुफा तँह गैव का चांदना, उदय औ अस्त का नाम नाँही
दिवस औ रैन तहँ नेक नहि पाइये,
प्रेम परकास कै सिंधु माँही ।
सदा आनन्द दुख-द्वन्द्व व्यापै नही परनानंद भरपूर देखा”|
***
 
 
 " सतयुग से ही चली आ रही भारतीय खेल परम्परा" 
 
 
 
 
 द्वारा--डॉ उमेश प्रताप वत्स
 
 
डॉ. उमेश प्रताप वत्स, हिन्दी प्राध्यापक हैं। शिक्षा विभाग हरियाणा में एनसीसी ऑफिसर (कैप्टन) हैं। इन्होंने हिन्दी में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। कविता, कहानी, लघुकथा, बाल कविता, आलेख आदि लिखते हैं। ये यमुनानगर, हरियाणा से हैं।
 
 
 
 
खेल का जिक्र करते ही आनंद अथवा प्रतियोगिता का भाव मन में नाचने लगता है। वर्तमान में हजारों खेल संस्थाएं व सरकारी संस्थान खेलों को लोकप्रिय बनाने के लिए एवं खेलों के विकास हेतु सतत् प्रयासरत हैं, राज्य व केन्द्र सरकार खेलों की सुविधाओं हेतु भारी-भरकम बजट तय करते हैं यद्यपि विश्वभर में जो खेल हम आधुनिक युग में खेल रहे, उनका मूल भारत के सांस्कृतिक विरासत के गर्भ में अंकित है। प्राचीन परम्परागत खेलों को बढ़ावा देने के लिए तथा इन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए देश का सबसे बड़ा खेल संगठन क्रीड़ा भारती निरंतर प्रयास में लगा हुआ है। आजादी के 75 वें अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में क्रीड़ा भारती ने 75 करोड़ सूर्यनमस्कार करवाने का संकल्प लिया जो कि दस दिन के भीतर पूर्ण कर अपने दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। सूर्यनमस्कार योग का ही एक सुव्यवस्थित अंश है जिसका अभ्यास करने वाला कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ रह सकता है। परम्परागत खेलों की यदि बात की जाये तो योग सर्वाधिक प्राचीन विधा है जो कि आसनों के रूप में आज भी हमारी खेल प्रतियोगिताओं का हिस्सा है।

भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही योग का प्रारम्भ माना जाता है। बाद में कृष्ण, महावीर और बुद्ध ने इसे अपनी तरह से विस्तार दिया। इसके पश्चात पातंजलि ने इसे सुव्यवस्थित रूप दिया। इस रूप को ही आगे चलकर सिद्धपंथ, शैवपंथ, नाथपंथ, वैष्णव और शाक्त पंथियों ने अपने-अपने तरीके से विस्तार दिया। मानसिक, शारीरिक एवं अध्यात्म के रूप में लोग प्राचीन काल से ही इसका अभ्यास करते आ रहे हैं। अगस्त नामक सप्त‌ऋषि ने ही पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा कर यौगिक तरीके से जीवन जीने की संस्कृति को बढ़ावा दिया था। योग की उत्पत्ति सर्वप्रथम भारत में ही हुई थी इसके बाद यह दुनिया के अन्य देशों में लोकप्रिय हुआ। योग की बात होती है तो पतंजलि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि पतंजलि ही पहले और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर निकालकर एक सुव्यवस्थित रूप दिया था। योग भारत की प्राचीन परम्परा का एक अमूल्य उपहार है जो न केवल देश में बल्कि एशिया, मध्यपूर्व, उत्तरी अफ्रीका एवं दक्षिण अमेरिका सहित विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में फैला हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को सयुंक्त राष्ट्र महासभा में योग के महत्व पर प्रकाश डाला। इसके बाद 11 दिसम्बर 2014 को सयुंक्त राष्ट्र में 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। पहली बार 21 जून 2015 को यह दिवस मनाया गया। माना जाता है कि 21 जून वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है और योग भी मनुष्य की आयु को बढ़ाता है।

योग की तरह ही मल्लयुद्ध भी हमारा परम्परागत खेल रहा है, जिसे आधुनिक कुश्ती के रूप में जाना जाता है। भारत में कुश्ती प्राचीन काल से ही खेला जाता है। भारत में कुश्ती के प्रारंभिक रूप को 'मल्ल-युद्ध' (हाथों से मुकाबला) के रूप में जाना जाता था और इससे जुड़ी कई कहानियाँ रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन महाकाव्यों में मिल जाएंगी। वास्तव में महाभारत में पांच पांडव भाइयों में से दूसरे नंबर के पांडव पुत्र भीम को महाभारत में सबसे बलशाली व्यक्ति माना जाता था और वह एक कुशल पहलवान के रूप में मशहूर था। भीम व जरासंध का मल्लयुद्ध जगजाहिर है। आज के उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में कुश्ती का बड़े स्तर पर अभ्यास किया जाता था। अक्सर राजा और राजकुमार मनोरंजन के लिए कुश्ती प्रतियोगिताओं का आयोजन कराते थे। उत्तर भारत में देशी भाषाओं में कुश्ती कई नामों से जानी जाती थी- जैसे दंगल, पहलवानी, कुश्ती आदि । स्वदेशी कुश्ती के लिए मिट्टी के मैदान थे, जिन्हें अखाड़ों के रूप में जाना जाता था। ये यूरोपीय संस्करण में लोकप्रिय सॉफ्ट मैट के विपरीत था। पहलवान अखाड़े में दो-तीन किलो सरसों का तेल छिड़ककर, मिट्टी में हल्दी मिलाकर कई-कई बार कस्सी (फावला) से खोदते थे फिर धूप-बत्ती कर अभ्यास करते थे। अखाड़े की मिट्टी कीटाणु रहित हो जाती थी। जो कि निरोगी होती थी। उस वक्त भारत में कुश्ती को फिट रहने के तरीके के रूप में देखा जाता था और बलशाली व्यक्ति को अक्सर बहुत सम्मान दिया जाता था।

तीरंदाजी एशिया में, विशेष रूप से भारत में अत्यधिक विकसित थी। तीरंदाजी के लिए संस्कृत शब्द, धनुर्वेद, तीरंदाजी के अध्ययन को संदर्भित करता है। भारतीय पौराणिक कथाओं में, हमने पौराणिक योद्धाओं और यहां तक ​​​​कि शिव, विष्णु, राम, परशुराम, भीष्म, द्रोण, अर्जुन, कर्ण, अभिमन्यु, एकलव्य जैसे देवताओं और महावीरों की विभिन्न कहानियाँ सुनी हैं, जो अपने धनुर्विद्या कौशल के लिए जाने जाते थे। द्रुपद की बेटी द्रौपदी के स्वयंवर में पानी के थाल में अपने प्रतिबिंब को देखते हुए एक घूमती हुई मछली की आँख को बेंधने की प्रसिद्ध तीरंदाजी प्रतियोगिता महाभारत में चित्रित कई तीरंदाजी कौशलों में से एक थी। तीरंदाजी के खेल में, तीरंदाज एक विशेष दूरी से लक्ष्य को हिट करने के लिए तीर चलाने के लिए धनुष का उपयोग करता है। इसका उपयोग केवल प्राचीन काल में शिकार के लिए किया जाता था। ओलम्पिक खेल समारोह 1900 ई. पेरिस में ग्रीष्मकाल में तीरंदाजी को ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेल के रूप में अनुमोदित किया गया था।

भारतीय कबड्डी का इतिहास भी महाभारतकालीन युग से खेले जाने वाला खेल माना जाता है। इसकी पौराणिक मान्यता यह है कि महाभारत के युध्द के समय अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के लिए कौरवों ने सात महारथियों से सुसज्जित एक चक्रव्यूह की रचना की थी, जिसे अभिमन्यु भेदने में तो सफल हो गया लेकिन इससे बाहर नहीं निकल सका और वह वीरगति को प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि अभिमन्यु के चक्रव्यूह को भेदने का तरीका कबड्डी की तरह ही था और इसी कारण कबड्डी में खिलाडियों की संख्या भी सात-सात ही होती है। तब से ही गुरुकुलों में भी कबड्डी का खेल खेला जाने लगा है, इससे शिष्यों का भलीभांति व्यायाम भी हो जाता था। यद्यपि इतिहासकारों की माने तो भारतीय कबड्डी का इतिहास, कबड्डी की उत्पत्ति भारत के तमिलनाडु राज्य से हुई है क्योंकि कबड्डी तमिल शब्द ‘काईपीडी’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका मतलब होता है ‘हाथ थामे रहना’। तथापि वर्तमान समय की कबड्डी का श्रेय महाराष्ट्र को जाता है जिसने 1915 से 1920 के बीच कबड्डी के नियमों की प्रक्रिया शुरू की। यद्यपि कबड्डी ने विश्व-स्तर पर अपनी पहचान भारत द्वारा बर्लिन ओलंपिक्स-1936 में सहभागिता से प्राप्त की। वर्तमान समय में किसी भी खेल में विश्व में सर्वश्रेष्ठ टीम और प्रदर्शन की बात हो तो वो खेल कबड्डी ही है जिसका हर विश्व कप व एशियन गेम्स का स्वर्ण पुरुष एवं महिला दोनों वर्गों में भारत के ही नाम है|

इसी प्रकार भारतीय एथलेटिक्स का इतिहास वैदिक युग का है। जब भारतीय लोग विभिन्न ट्रैक और फील्ड स्पर्धाओं में हिस्सा लेते थे। समय के साथ, भारतीय एथलीटों ने भारत में आधुनिक समय की एथलेटिक्स स्पर्धाओं जैसे लंबी कूद, ऊंची कूद, चक्का फेंक, भाला फेंक, दूरी की दौड़ आदि खेलना शुरू कर दिया। हनुमान जी ने सीता की खोज में लंबी छलांग लगाकर समुद्र पार कर लंबी कूद का रिकार्ड बनाया तो राजकुमार लक्ष्मण जी को शक्ति लगने से मुर्छित होने पर संजीवनी बुटी हेतु पूरी पहाड़ उठा लाना भारोत्तोलन का सर्वाधिक प्राचीन उदाहरण है। तभी से अपने गाँव-देहात में लंबी छलांग लगाने व वजन उठाने की प्रतियोगिताएं प्रारंभ मानी जाती है।

तैराकी भी एक परम्परागत खेल है। राजमहलों में तरणताल निर्मित कराये जाते थे और गाँव के बच्चें तो पशुओं को नहलाने के साथ-साथ नदियों, तालाबों व झील आदि में तैरने की प्रतियोगिता आयोजित करते थे। कृष्ण की बाल लीला इसका सबसे सुंदर उदाहरण है जब ग्वालों के साथ खेलते-खेलते बॉल यमुना में गिर जाती है तो कृष्ण जी बॉल लाने के लिए यमुना में कूद जाते हैं और अहंकारी शेषनाग का मर्दन करते हैं। 2800 ईसा पूर्व के भारतीय महल मोहन जोदड़ो में एक स्विमिंग पूल है जिसका आकार 12 मीटर गुणा 7 मीटर है। जो संकेत करता है कि तैराकी भारत का प्राचीन खेल रहा है।

इसी प्रकार तलवारबाजी, रस्साकशी, ट्रैकिंग, शतरंज आदि हमारे प्राचीनकाल से जुडें हुये परम्परागत खेल है जो आज विश्वभर में खेले जाते हैं और ओलंपिक खेलों के लिए खिलाड़ी इन खेलों का अभ्यास करते हैं। जो स्वस्थ शरीर के साथ-साथ हमें मानसिक रूप से भी सशक्त बनाने का सर्वोत्तम माध्यम है।

***
 
 
बाल खंड (किड्स कार्नर)

" कठिन काम"
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 द्वारा:श्री पुष्पेश कुमार ‘पुष्प’ 
 
श्री पुष्पेश कुमार ‘पुष्प’ बाढ़, बिहार से हैं। विगत बीस वर्षों से साहित्य की सेवा में संलग्न हैं। कहानी, लघुकथा, लेख, बाल कहानी आदि लिखते हैं।
 
 
 
सुबह – सुबह दूध लाना लोगों की नजरों में सबसे कठिन काम माना जाता है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इसी बहाने सुबह का सैर हो जाता है। इसके विपरीत सुबह की नींद कुछ लोगों को कल्पना लोक की सैर कराती है, ऐसे में सुबह उठकर दूध लाना लोगों को कचोटता है; क्योंकि यह उनकी सुहाबनी नींद में खलल जो डालती है। न चाहते हुए भी लोगों को निद्रा देवी के आगोश से बाहर निकलना ही पड़ता है और दूध लाने खटाल जाना उनकी मजबूरी बन जाती है।

जो लोग अनमने ढंग से खटाल पर पहुँचते, वे दूध को कोसते हुए कहते ‌- “यदि दूध लाना नहीं होता, तो अभी चैन की नींद सो रहा होता। लानत पड़े ऐसे दूध को, जो नींद हराम कर दें।”

यह सुनते ही दूध वाला बोल पड़ा – “साहब ! आप तो आते हैं और कुछ समय बैठने के बाद दूध लेकर चाय – कॉफी का लुत्फ भी उठाते हैं। मैं तो चाहे कोई भी मौसम हो सुबह चार बजे उठकर अपने पशुओं को चारा – पानी देता हूँ, लेकिन कभी किसी को नहीं कोसता। मुझे भी इतनी सुबह उठने का मन नहीं करता, लेकिन आप लोगों की सेवा और कर्म को ही अपना धर्म मानता हूँ।”

यह सुनकर लोग निरुत्तर हो गये।
***
 
 
"शुभकामनाएं पाठकों की"
 
 
Re: Sub.: April 2022 - संवाद - International Hindi Association's Newsletter
Girendra Singh Bhadauria <prankavi@gmail.com>
Wed 5/25/2022 7:34 AM
बहुत बहुत बधाई आदरणीया एक उत्कृष्ट पत्रिका। समूचे सम्पादक मण्डल को हार्दिक धन्यवाद। आदरणीया सुशीला मोहनका जी प्रबंध संपादक को नमन।

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण"
"वृत्तायन" 957 स्कीम नं.51
इन्दौर, भारत
---
 

From: Shambhu Nath Tiwari <s.tiwariamu@gmail.com>
Date: Wed, May 25, 2022 at 10:26 AM
Subject: Re: जागृति वेबिनार: "भारतबोध और भक्ति साहित्य", 11 जून 2022

मान्यवर,
सादर नमस्कार!
आपकी संस्था की ओर से हिंदी साहित्य पर केंद्रित व्याख्यानों की अकादमिक श्रृंखला बहुत उत्साहवर्धक और ज्ञानवर्धक है। इस क्रम में मेरे मित्र और भक्तिकाल के अधिकारी विद्वान् प्रो. नंदकिशोर पांडेय का महत्वपूर्ण व्याख्यान बहुत प्रेरक और विद्वत्तापूर्ण होगा, ऐसा विश्वास है।
ऐसे आयोजन के लिए आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
प्रो. पांडेय जैसे कुशल वक्ता का चयन कर आपने विषय के साथ पूर्ण न्याय किया है। साधुवाद।
सद्भावी
शम्भुनाथ तिवारी
प्रोफ़ेसर
हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़ ( भारत)
---
 
 
 "संवाद" की कार्यकारिणी समिति
 
 
  प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका , OH , sushilam33@hotmail.com
. सहसंपादक - अलका खंडेलवाल, OH , alkakhandelwal62@gmail.com
. सहसंपादक - डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP , dr.archana2309@gmail.com
  डिज़ाइनर   – डॉ. शैल जैन, OH , shailj53@hotmail.com
  तकनीकी सलाहकार -- मनीष जैन , OH , maniff@gmail.com
 
 
 प्रबंध सम्पादक संदेश
 
 
 
 
प्रबंध सम्पादक
 
- सुशीला मोहनका
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्य एवं सदस्याओं को,
बुद्ध पूर्णिमा एवं मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी । ‘जागृति’ की पाँचवीं कड़ी शनिवार, ११ जून २०२२ को दिन में ११:०० बजे से अमेरिका में और ११ जून २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी । सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिए और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत सफल हो पायेगी। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि अपने यहाँ के हिन्दी प्रेमियों तक अ.हि.स. द्वारा १४ जून २०२२ को होनेवाले कार्यक्रम की सूचना दें। यह आपका पावन कर्तव्य और समय की माँग भी है।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है । सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
एक बात और साझा करना चाहती हूँ कि इस वर्ष अबतक आप सबको विश्वा २०२२ के जनवरी और अप्रैल अंक आप सबको मिल गये होंगे। कृपया पढ़कर अपनी प्रतिक्रियायें भेजिए।
अ.हि.स. की सभी स्थानीय समिति के अध्यक्ष -अध्यक्षाओं से विशेष आग्रह है कि अपनी -अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें साथ ही कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
आप सभी विशेष निवेदन है कि ‘संवाद’ का मई २०२२ का अंक अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें ।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
***
 
 
  "Disclaimer"    
 
 
 रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति -नीति से कोई संबंध नहीं है।    
 
 
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