MARCH INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
मार्च 2024, अंक ३३ | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों और हिन्दी प्रेमी परिवारों का अभिवादन ।
होली का त्योहार प्रेम, उल्लास, भाईचारे और सद्भावना से जुड़ा है और मैं सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ ।
होली के अतिरिक्त मार्च महीने में पड़ने वाले पवित्र माह रमज़ान के शुभारंभ, विश्व महिला दिवस, महाशिवरात्रि, विश्व कविता दिवस, युगादि, गुडी पड़वा आदि सभी दिवसों की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ह्यूस्टन शाखा ने “होली के बोल ” मार्च महीने मे तथा न्यू जर्सी शाखा ने होली कार्यक्रम अप्रैल माह में आयोजित किये हैं । कुछ शाखाओं ने अन्य स्थानीय संस्थाओं के साथ जुड़ कर भी होली मनाई।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति 'हास्य कवि सम्मेलन' का कार्यक्रम अमेरिका के २२-२३ महानगरों में १२ अप्रैल २०२४ से २७ मई २०२४ के बीच आयोजित किया जा रहा है। आशा है, आप सभी अपने शहरों या आसपास के आयोजन स्थलों पर इसका आनंद लेंगे।
नये वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की विभिन्न शाखाओं की तरफ़ से अमेरिका में कई कार्यक्रम आयोजित किये जा रहें हैं । इससे हमारी समिति की दृश्यता बढ़ाने में मदद मिल रही है। मैं सभी शाखाओं को उनके प्रयासों के लिये धन्यवाद देती हूँ । कुछ कार्यक्रमों के विवरण और फोटो संवाद' में प्रकाशित हो गई हैं और मेरा विश्वास है कि आप उनका आनंद ले रहें हैं ।
कृपया अन्य सभी शाखा अध्यक्ष/ संयोजक भी अपने कार्यक्रमों के सचित्र विवरण भिजवाएं जिससे उन्हें भी पाठकों के साथ साझा किया जा सके ।
समिति की त्रैमासिक पत्रिका “विश्वा “ का अप्रैल 2024 अंक प्रकाशित हो गया है और शीघ्र ही अपने हाथों में होगा । इसके लिए संपादक रमेश जोशी, उनकी टीम, मुद्रक और प्रस्तोता अनुज्ञा बुक्स का धन्यवाद ।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के मिशन को आगे बढ़ाने के लिये सभी सदस्यों एवं पाठकों के विचारों एवं सुझावों का स्वागत है। हमारी समिति अभी “seal of biliteracy” पर काम कर रही है और यदि आप इसके लिए अपने शहर में काम करना चाहते हैं तो हम से संपर्क करें । आप किसी अन्य रूप में भी समिति की सहायता करना चाहते हैं तो भी आपका स्वागत है । ईमेल या कॉल द्वारा संपर्क करें ।
धन्यवाद
शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति २०२४-२५
ईमेल: shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन - 2024
अमेरिका के महानगरों में 12 अप्रैल से 27 मई तक
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कवियों का परिचय -- प्रतिवेदन : अनीता गुप्ता
कवि अरुण जैमिनी
अरुण जैमिनी एक ऐसा चर्चित नाम जो किसी पह्चान का मोहताज नहीं है। आपने अपनी अनोखी शैली और धमाकेदार प्रस्तुतिकरण की वजह से देश विदेश में अपार सफलता प्राप्त की है। आप नई दिल्ली भारत के निवासी है। आपने हंस राज कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा ग्रहण की है। आप हास्य कविताओं के साथ साथ चुटकुलों का भी बख़ूबी प्रयोग जानते हैं, जहाँ एक ओर हास्य कविताएँ श्रोताओं के आकर्षण का केन्द्र बनती है, वहीं आपके चुटकुले मन को भीतर तक गुदगुदा जाते हैं । आपने त्वरित हास्य के लिए चुटकुलों का प्रयोग चातुर्यता के साथ काव्य मंचो पर किया। आपकी सफलता आपकी विलक्षण प्रतिभा का उदाहरण है।
आप ने प्रस्तुतीकरण की योग्यता अपने पिता जेमिनी हरियाणवी जी, जो कि अपने समय के बहुचर्चित हास्य कवि थे, उनसे विरासत में पाई है। आपने पिछले तीन दशकों से भी ज़्यादा वर्षों से हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी प्रतिभा, कला कौशल और विशिष्ट प्रस्तुतिकरण का उत्तम प्रदर्शन दिया है। आपकी कविताओं के प्रस्तुतिकरण का हरियाणवी अंदाज़ काव्य मंचों पर एक ट्रेडमार्क सा बन गया है। वर्तमान में आप कवि सम्मेलन समिति के अध्यक्ष पद पर आसीन है।
आपकी प्रचलित प्रख्यात कृतियाँ १. फ़िलहाल इतना ही २. खून बोलता है ३. हास्य विज्ञान की शिखर कविताएँ
विभिन्न टेलिविज़न प्रस्तुतियां
१. वाह वाह क्या बात है २. कपिल शर्मा शो ३. छप्पर फाड़ के ४. लाफ़्टर चैम्पियन ५ .आज तक ६ . इंडिया न्यूज़ ७ . फूल झड़ी एक्सप्रे ८ . दूरदर्शन एवं अन्य चैनल
पुरस्कार एवं सम्मान
१. हरियाणा गौरव सम्मान २. काका हाथरसी सम्मान ३. ओम प्रकाश आदित्य सम्मान ४. मन हर ठहाका और अट्टहास सम्मान ५. नेपा और हिंदी गौरव सम्मान ६. शिखर सम्मान
आपने 18 से भी अधिक विदेशों की यात्रा की है जिनमें USA, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, हांगकांग, सिंगापुर, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और अन्य कई देशो में सफलतापूर्वक काव्य पाठ किया है।
कवि शम्भू शिखर
शम्भू शिखर यह हास्य और व्यंग्य जगत का बहुचर्चित नाम है। इस नाम की चर्चा केवल भारत में ही नहीं अपितु देश विदेश में भी ख़ूब धूम मचा रही है। शम्भू शिखर मधुबनी बिहार प्रदेश से आते हैं । आपने पॉलिटिकल साइंस में मोती लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त की है। आपने अपनी आजीविका की शुरुआत एक स्टैंडअप कॉमेडियन के रूप में ही स्टार प्लस TV के “द ग्रेट इंडियन लाफ़्टर” कार्यक्रम के माध्यम से की थी । शम्भू शिखर उस कार्यक्रम के सेमी फ़ाइनलिस्ट रहे और अपनी विशिष्ट प्रतिभा और पह्चान लोगों के दिलों में बनायी।
आप एक सफल लेखक भी है, जहाँ आपने अपनी क़लम से अनेक प्रचलित उपन्यासों को प्रसारित किया और पढ़ने वालों के दिलों को जीत लिया।आप हिन्दी साहित्य के जगत में लगभग दो दशकों से कवि सम्मेलनों और मुशायरों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। साधारण सहज और सरल भाषा की अभिव्यक्ति आप की अनोखी पह्चान है। कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दौरों पर आपने ख़ूब नाम कमाया है। दर्जनों विदेश यात्राओं में भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी को उच्चतम शिखर पर पहुँचा कर उसे गौरान्वित किया है।इनका ऐसा विश्वास है, कि दूसरों पर नहीं ख़ुद पर किया गया हास्य ही श्रेष्ठ हास्य होता है और श्रेष्ठ हास्य ही चेहरे पर मुस्कान और दिलों में ख़ुशी भर देता है।
आपकी उपन्यास कृतियाँ
१. और वैज्ञानिक लव २. सन्यासी योद्धा ३. सिलवटों की महक ४. बात पते की ५.चाँद पर प्लाट
६. आगामी रचना चीनी को जमा कर गन्ना बना दूँ
टेलीविज़न पर प्रस्तुतियाँ
टेलिविज़न की दुनिया में शम्भू शिखर ने अनेकों हाँ अगर अपने हास्य व्यंग्य की कविताओं द्वारा अपार ख्याति अर्जित की है १. वाह वाह क्या बात है( सब टीवी) २. ग्रेट इंडियन लाफ़्टर चैनल (स्टार वन टीवी) ३. लपेटे में नेताजी (न्यूज़ १८ टीवी) ४. इधर उधर और शिखर (रेडियो FM 94.3)
पुरस्कार और सम्मान
१. भारतेन्दु हरिश्चंद्र सम्मान २. पुष्कर सम्मान ३. साहित्य शिखर सम्मान ४. रोटरी क्लब से सम्मानित
कवयित्री मुमताज़ नसीम
मुमताज़ नसीम आकर्षक प्रतिभा की धनी उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर से ताल्लुक़ रखती है। मुमताज़ नसीम हिंदी और उर्दू मंचों पर बहुत ही लोकप्रिय और ख़ास नाम है। आपने उर्दू में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से प्राप्त की है। बेहतरीन प्रस्तुतीकरण का हुनर रखने वाली ऐसी कवयित्री और शायरा है, जिन्हें देश-विदेशों से हर वर्ग के श्रोताओं ने सराहा और लोकप्रिय बनाया है।
मुमताज़ नसीम ने काव्य मंचों और मुशायरों में अपने गीत गजलों के माध्यम से अपनी अलग से पहचान बनायी है। जन सामान्य को समझ आने वाली सरल ज़ुबान के दम पर लोगों के दिलों में जगह बनाने में क़ामयाब हुई है। मुमताज़ नसीम की आकर्षक प्रस्तुति पूरी महफ़िल को अपनी सुरीली आवाज़ और आकर्षक अंदाज़ से बाँध देती है, मोह लेती हैं।आप लगभग दो दशकों से अपनी ग़ज़ल, मुक्तक, नज़्म और गीत अंतरराष्ट्रीय काव्य मंचों पर पढ रही है ।
आपने अपनी कविताओं के संकलन की दो पुस्तकें प्रसारित की है। आप कई सामाजिक संस्थानों द्वारा जिगर अवार्ड के लिए सम्मानित की गई है।
विशेष TV प्रसारण
१. दूरदर्शन २. ऑल इंडिया रेडियो ३. एनडी टी वी इंडिया ४. सब TV ५. आज तक ६. सहारा समय ७. दबंग, महुआ और साधना TV पर प्रसारण
आपकी विदेश यात्राएँ
बेहरीन,पाकिस्तान, क़तर, यू ए इ, ओमान,इथोपिया एवं यू एस ए।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तर पूर्व ओहायो शाखा आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन, मई 3, 2024
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भारतीय वाणिज्य दूतावास, शिकागो द्वारा आयोजित विश्व हिंदी दिवस में
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा की भागीदारी
द्वारा : आदित्य शाही
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विश्व हिंदी दिवस २०२४ के उपलक्ष में हिंदी समन्वय समिति और भारतीय प्रधान कौंसलावास शिकागो के तत्वाधान में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्टी में विभिन्न प्रदेशों जैसे विश्कोंसिन, इल्लिनोई, ओहायो, मिशिगन, सेंट लुईस से हिंदी से जुड़े लोग सम्मिलित हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी एसोसिएशन-इंडियाना शाखा को भारत के महावाणिज्य दूतावास, शिकागो द्वारा भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। विश्व हिंदी दिवस का यह कार्यकम काफी सफल रहा
जहाँ पर बहुत सारे बच्चों ने गीत और कविताओं के माध्यम से अपने हिंदी ज्ञान का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम का आरम्भ कौंसल संजीव जी और राजदूत सोमनाथ घोष के अभिभाषण से हुआ तत्पश्चात शिखा जोशी ने एक देशभक्ति गीत अपने मधुर स्वर में गाकर सबका मन मोह लिया। कार्यक्रम में आगे प्रोफेसर मिथिलेश मिश्रा जी ने हिंदी परम्परिक ज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर एक व्याख्यान दिया जिसे लोगो का काफी ज्ञानवर्धन हुआ। तत्पश्चात विभिन प्रांतो में चल रहे हिंदी विद्यालयों जैसे बालोद्यान, हिंदी स्कूल ऑफ़ हिंदी, विस्कॉन्सिन, रूट्स टू हिंदी, हिंदी यूसए सेंट लुइस के बच्चो ने कविता और नाट्य प्रदर्शित किया।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति-इंडिआना शाखा की तरफ से अन्विता राजपूत ने हिंदी की एक सुन्दर कविता का पाठ किया। कार्यकम के मध्यांतर में इंडिआना शाखा की तरफ से कुमार अभिनव जी ने हवाईयन गिटार से एक देशभक्ति गीत बजा कर दर्शको को मंत्रमुग्ध कर दिया । कार्यकम के अंत में हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में सम्मिलित लोगो ने अपने अनुभव साझा किये जिसमें अंतराष्ट्रीय हिन्दी समिति की तरफ से आदित्य शाही ने इंडिआना में होने वाली सभी गतिविधयों से अवगत कराया और लोगो से समिति से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। राकेश मल्होत्रा, अलका शर्मा, अनुराग मिश्रराज, अवतंश कुमार, मयंक जैन ने भी अपने अपने अनुभव साझा किया और सभी ने उपस्थित अभिभावकों के द्वारा किया जा रहे प्रयासों की भी सराहना की ।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
द्वारा आयोजित विश्व हिंदी दिवस कार्यक्रम
जनवरी १४, २०२४
द्वारा : अनुराग गुप्ता, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा के सक्रिय सदस्य
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विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-उत्तर पूर्व ओहायो शाखा ने 'हिंदी दिवस' कार्यक्रम का सफल आयोजन 14 जनवरी 2024 को 'शिवा विष्णु मंदिर - क्लीवलैंड के प्रांगण में किया। इस कार्यक्रम के आयोजन का नेतृत्व अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा किरण खेतान के साथ वर्तमान अध्यक्ष अश्वनी भारद्वाज, उपाध्यक्ष डॉ. राकेश रंजन, सचिव डॉ. सोमनाथ रॉय और कोषाध्यक्ष अनुराग गुप्ता ने पूर्व कार्यसमिति के सहयोग से किया और क्लीवलैंड शहर में हिंदी भाषा का विस्तार और हिंदी प्रेमियों को जोड़ने के हरसंभव प्रयास के आश्वासन के साथ श्रोताओं का अभिवादन किया। डॉ. संजय चौधरी, अश्वनी भारद्वाज, श्वेता चारी, किरण खेतान, रेनू चड्ढा, सुधा कनोडिया और शैल जैन ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। कार्यक्रम का संचालन विभव अग्रवाल और वंदना भारद्वाज की अद्धभुत जुगलबंदी ने किया। सतीश गुप्ता ने समाज में हिंदी की व्यापकता और अनिवार्यता बढ़ाने का अनुरोध किया और शैल जैन जी (राष्ट्रीय अध्यक्षा अ.हि.स. 2024-25) ने उद्घाटन भाषण दिया जिसने सभी प्रतिभागियों और दर्शकों को प्रेरित और उत्साहित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत चन्द्रिका गोपाल जी की सरस्वती वंदना के साथ हुई। स्थानीय कवि अनुराग गुप्ता की प्रवासी दिवस और माँ के भावनात्मक रिश्ते पर लिखी कविता, और गायक प्रत्युष रंजन की खूबसूरत गायिकी ने कार्यक्रम को गति दी और ग़ज़ल गायक वैद्यनाथ रंजन, प्रेम भंडारी, भूमिका जैन, डॉ. आदित्यन, युगल चावला, मधु और उत्सव जी की ग़ज़लों और गीतों ने श्रोताओं को अपलक बांधे रखा। बच्चों आन्या और आरव की प्रार्थना , कार्यक्रम के अंत में संतोष खंडेलवाल और डॉ. तेज पारीक की राम पर लिखी रचनाओं ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कार्यक्रम में जोश भर दिया।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण यूट्यूब पर लाइव सफल प्रसारण था, जिसने अमेरिका और भारत के विभिन्न क्षेत्रों से भी दर्शकों को लाइव देखने के लिए आकर्षित किया। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों और श्रोताओं ने दक्षिण भारतीय व्यंजनों का भरपूर आनंद लिया। कार्यक्रम का समापन डॉ. प्रकाश चंद और हिंदी समिति की कार्यसमिति ने भारत और अमेरिका के राष्ट्र गान के साथ, और सभी प्रतिभागियों और सभी दर्शकों को धन्यवाद अर्पित करते हुए विधिवत तरीके से संपन्न किया।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- वाशिंगटन, डी. सी. शाखा
द्वारा गणतंत्र दिवस 2024 कार्यक्रम
प्रतिवेदन: चौधरी प्रताप सिंह, वाशिंगटन, डी. सी. शाखा के अध्यक्ष
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गणतंत्र दिवस के अवसर पर २८ जनवरी २०२४ को हिन्दू मन्दिर वाशिंगटन में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति वाशिंगटन के अध्यक्ष चौधरी प्रताप सिंह द्वारा व हिन्दू मन्दिर वाशिंगटन के बोर्ड मेम्बरों के सहयोग से हर वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर बच्चों के द्वारा कुछ देश भक्ति गीत व डांस प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। ईस साल कुछ संगीतकारों के द्वारा देश भक्ति गीत गाने वाले गायकों, कुछ विशिष्ट अतिथि, सीनियर रेज़िडेंट व्यक्तियों को सम्मानित ओर बच्चों को पुरस्कार वितरण किया गया । भारत के ध्वजारोहण के साथ राष्ट्रीय गीत ओर भारत माँ कीं आरती के साथ प्रोग्राम का समापन किया गया। ईस तरह हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए भारतीय समुदाय को जागरूक करने के प्रयास किये गये ।
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति - शार्लोट शाखा
विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर “हिन्दी महोत्सव कार्यक्रम”
फ़रवरी ३, २०२४
प्रतिवेदन : प्रिया भारद्वाज, अध्यक्षा, नोर्थ कैरलाइना, शार्लोट शाखा
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, शार्लोट शाखा ने विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर “हिन्दी महोत्सव कार्यक्रम” फ़रवरी ३, २०२४ को रखा। सभी स्थानीय स्वयं सेवकों के सहयोग और आशीर्वाद से प्रोग्राम सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। सभी ने हमें अपना अमूल्य समय निकालकर भावी भविष्य के लिए और हिंदी के प्रयास के लिए सहयोग दिया और इतनी कम समयावधि में प्रोग्राम को सफल बनाया और सबों की जितनी प्रसंशा की जाए वो कम है। कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलित के साथ हुआ जो मुख्य अतिथि आदरणीय बाल गुप्ता जी, सुरेंद्र जी,हेमंत भाई निमिष भट्ट और संजीवन जी के द्वारा किया गया।
“करते है तन मन से वंदन, जन गणमन की अभिलाषा का अभिनन्दन अपनी संस्कृति का,
आराधन अपनी भाषा का”। इसके पश्चात् भारतीय राष्ट्र गान नन्हे बालिकाओं और बालकों द्वारा प्रस्तुत किया गया और सभी के द्वारा सभागार तालियों से गुंजायमान हो गया। अमेरिकी
राष्ट्र्गान आशीष कुमार और उनके सहायकों द्वारा प्रस्तुत किया। सभी ने अपना सहयोग प्रदान कर दोनों राष्ट्रों को सम्मानित किया। इसके पश्चात् सभी आदरणीय अतिथियों का सम्मान किया गया और श्रीमती प्रिया भारद्वाज अध्यक्षा, नोर्थ कैरलाइना, शार्लोट शाखा द्वारा सबों को सम्बोधित किया गया । प्रिया जी ने इस विचार पर ज़ोर दिया, कि भाषा लाने का उद्देश्य मैत्री सम्बन्धों को बढ़ाना है। यहाँ सभी भाषाएँ अपने देश को गौरान्वित कर रही हैं, इसी प्रकार हिंदी भाषा को भी हमें आगे बढ़ाना चाहिए। इसके पश्चात् बाल गुप्ता जी ने अपना संदेश दिया।
कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए प्रथम प्रस्तुति सरस्वती वंदना आशी द्वारा प्रारम्भ की गई थी। मंत्रोच्चार के साथ युवा समिति के कार्यक्रम की शुरुआत हुई। तबला जिसपे उँगलियाँ चलाना तो सबके बस की बात नहीं पर उसकी आवाज़ से पैर ज़रूर थिरकने लगते हैं।तबले की थाप से कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए बच्चों ने अतिथियों का स्वागत किया गया और तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंजने लगा।
इसके पश्चात् कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ। प्रथम कविता बाल गुप्ता जी द्वारा ”देश छोड़ आए हम” द्वारा की गयी और खूब तालियाँ बजी। इसके पश्चात् अंजू जी की रिश्ते, पूर्णिमा जी की महिला के विषय पर ज्वलंत कविता और श्वेता जी की जिम्मेदारियों पर अति उत्तम कवितायें, आशीष तिवारी की हास्य पर आधारित कविता सुनकर सब हँसी में सराबोर हो गये। इसके पश्चात् प्रिया जी की कविता “आज हिन्द से दूर हैं हम” सुनकर सब हिन्द और हिन्दी सरिता में मंत्रमुग्ध हो गये। अशेष शाही ने संबंधों पर बहुत ही सुंदर कविता प्रस्तुत की, तृप्ति जी ने प्रकृति पर, प्रत्याशा बचपन पर, उमंग जी ने प्रेम भक्ति पर कविता, श्वेता थापक जी, साक्षी जी ने राम पर और प्रवीण जी ने भी बहुत सुंदर कविता प्रस्तुत की। सभी कविताएँ लोगों को मुग्ध कर रही थीं और तालियों के स्वर से सभागार गुंजायमान हो रहा था ।
इसके पश्चात् ’तोषी’ के बच्चों द्वारा नृत्यप्रस्तुति (गणेश वंदना)- एक दंत, वक्रतुण्ड, प्रथम पूज्य, श्री गणेश जी की वंदना छोटी-छोटी नौ दुर्गा द्वारा प्रस्तुत की गयी और घनघोर तालियों से स्वागत हुआ।
अनन्या ने मेड इन इण्डिया में हूला हूप के साथ बहुत ही उत्तम प्रस्तुति दी। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए साधना और उनके सहयोगी ने सभी दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया।
स्मिता पंचलंगिया घूमर नृत्य के माध्यम से भारतीय राजस्थानी संस्कृति से सभी को अवगत कराया।तोषी और झाँसी द्वारा -- एक दंत, वक्रतुण्ड, प्रथम पूज्य, श्री गणेश जी की वंदना की जिनका स्वागत तालियों द्वारा किया गया ।नेहा वर्मा, स्वाति मिश्रा और शिप्रा वर्मा ने चित्रकला का वर्कशॉप अति उत्तम तरीक़े से आयोजित किया । दर्शकों ने उसका भरपूर आनंद लिया।
फैशन शो का पूरा श्रेय चित्रा सिंह को जाता है।इनके साथ आशीमा जी, मधुमिता रघुवंशी और प्रत्याशा ने अपना पूर्ण सहयोग कर के फ़ैशन कार्यक्रम के द्वारा भव्य भारत के दर्शन करवाए।
दर्शक मंत्र मुग्ध होकर तालियाँ बजाते रहे जब तक फैशन शो ख़त्म नहीं हो गया।आशीष कुमार जी ने मधुर गीत की प्रस्तुति दी।
कार्यक्रम का समापन प्रिया भारद्वाज अध्यक्षा के संबोधन द्वारा किया गया और उन्होंने अंतिम पंक्ति में कहा कि आज की शाम एक और यादगार शाम हो गयी, सभी वॉलंटियर्स तृप्ति तिवारी, श्वेता गुप्ता, स्वाति मिश्रा, प्रवीण तिवारी, आलोक दवेसुप्रज्ञ मिश्रा, अपूर्वा चौपड़े, पायल जैन, अशिमा खन्ना जी, रीमा, चित्रा सिंह, शिप्रा वर्मा, कपिल वर्मा, अंशिका, प्रत्याशा जैन, चंद्रप्रभा सिह, अशेष शाही, नेहा वर्मा, श्वेता सोनी नीलावर, दीप्ति जी, मुस्कान नरूला, श्वेता सोनी, साधना मिश्रा , प्रदीप मिश्रा , अभिलाषा ठाकुर ,निधि नामदेव ,शारदा शुक्ला और अवनीश शुक्ला जी ने अपना विशेष योगदान देकर कार्यक्रम को सफल बनाया। उन्हों ने कहा कि अच्छे वॉलंटियर्स के कारण ही कार्यक्रम की सफलता सुनिश्चित होती है और सभी दर्शकों का भी सहृदय धन्यवाद किया।
सभी स्वयंसेवकों और प्रतिभागियों को अंत में ट्राफ़ी, मेडल्स और सर्टिफ़िकेट्स बाल गुप्ता जी, सुरेन्द्र टोपीवाला, हेमंत जी और प्रिया भारद्वाज द्वारा दिये गये। श्री बाल गुप्ता जी,शाखा उपाध्यक्ष ने कहा कि यहाँ रहकर भी हम हिन्दी भाषा के लिये योगदान दे पा रहे हैं और हम जल्द ही फिर मिलते हैं। इस कार्यक्रम की सूत्रधार श्रीमती प्रिया भारद्वाज अध्यक्षा नार्थ केरोलाइना, शार्लोट शाखा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति को धन्यवाद प्रेषित कर कार्यक्रम का समापन किया।
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अपनी कलम से
"भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी-- प्रेमा देवी"
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द्वारा - डॉ. अंजनी किशोर सहाय
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डॉ. अंजनी किशोर सहाय एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं, जो 2017 में टाटा स्टील लिमिटेड से एक वरिष्ठ मानव संसाधन अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। उन्हें हमेशा साहित्य से प्यार रहा है और लेखन के प्रति उनकी रुचि थी। सेवानिवृत्ति के बाद से, वह अनुसंधान और लेखन में शामिल रहे हैं।
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श्रीमती प्रेमा देवी
भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी
( १९०६ - १९७४ )
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भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी -- प्रेमा देवी
आज़ादी के तराने गाने वाले, प्रभात फेरी में झाल बजाने वाले, देश भक्ति की कवितायेँ लिखने वाले, नारे लगाने वाले, भीड़ के हिस्सा बनने वाले का दिल भी देश के लिए धड़कता था। उनके जज्बात भी देश प्रेम से भरे थे। घर के चारदीवारी में, परदे के पीछे छुप कर नेताओं की चर्चा सुनने वाली छोटी सी बालिका प्रेमा में भी गाँधी - नेहरू के किस्से सुन कर देश के लिए कुछ करने की इच्छा थी। कम उम्र में बिना मेट्रिक पास किये ही प्रेमा का विवाह कर दिया गया। कुशाग्र बुद्धि थी, कानून की बारीकियां, राजनीति की समझ और समाज पर पकड़ कम उम्र में ही सीख लिया था। परिवार शिक्षित था, खुश हाल पारिवारिक जीवन, मध्य वर्ग की इस किशोरी ने अनौपचारिक शिक्षा घर पर ही पायी।
मुंगेर शहर और मुंगेर जिला एक ही थे जिसमें मुंगेर, जमुई, लखीसराय, बेगूसराय और खगड़िया के वर्तमान जिले शामिल हैं। प्रेमा का विवाह मुंगेर के एक बहुत प्रसिद्ध कायस्थ परिवार में हुआ था, जिसके पितामह राधिका प्रसाद, भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के घनिष्ठ दोस्त थे। राधिका प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद औऱ श्री कृष्ण सिंह प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता के पूर्व छात्र थे जो देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में से एक था। प्रेमा को ससुराल में भी देशप्रेमी ही मिले।
हम जिस महिला की बात कर रहे हैं वह प्रेमा देवी थीं जिनका जन्म 1906 में हुआ था और उनका निधन 1974 में हुआ था।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए अहिंसक संघर्ष के समर्थन में एक बहुत ही विद्वान वकील राधिका प्रसाद ने कानून की प्रैक्टिस से हाथ धो लिया। वकालत की बजाय, उन्होंने राजा साहेब का कानूनी सलाहकार बनना चुना जो कॉलेज में उनके सहपाठी थे। उनके तीन बेटों में सबसे बड़े गोविंद प्रसाद एक बहुत प्रसिद्ध अंग्रेजी व्याकरणविद् थे जिन्होंने कटक के रावेनशॉ कॉलेज से स्नातक किया था। प्रेमा देवी की शादी गोविंद प्रसाद से हुई थी। दोनों पति-पत्नी विपरीत व्यक्तित्व के थे - गोविंद प्रसाद एक विद्वान व्यक्ति थे जिन्होंने जीवन भर संपन्न परिवार के बच्चों को अच्छी फीस ले कर पढ़ाया और गरीब परिवार के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाया। चालीस-पचास सदस्यों के संयुक्त परिवार में के कमाने वालों में से एक थे। दूसरी ओर, प्रेमा देवी एक बहिर्मुखी महिला थीं और अपने ससुर राधिका प्रसाद के समर्थन और प्रोत्साहन से परिवार की महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया करती थीं।
एक जमीनी स्तर की कार्यकर्ता से कद्दावर नेता के रूप में उभरीं। स्वतंत्रता समर में ताकतवर ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिए महिलाओं को एकजुट किया। उन्होंने अपनी दो बेटियों बिष्णु प्रिया और हेम प्रिया को भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में शामिल किया। अपनी सबसे बड़ी बेटी गौर प्रिया, जिनकी शादी एक रूढ़िवादी परिवार में हुई थी, उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से अलग रखा। इकलौता पुत्र गौर किशोर प्रसाद उस समय बहुत छोटे थे इसलिए उन्हें भी राजनीति से अलग ही रखा।
महात्मा गांधी ने 8 अगस्त, 1942 को ब्रिटिश शासन के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का आह्वान किया। तुरंत कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। छोटे नेताओं ने संघर्ष को आगे बढ़ाया।
एक तेजतर्रार नेता, प्रेमा देवी, ने अंग्रेजों के खिलाफ कई रैलियों का नेतृत्व किया था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुंगेर में एक बहुत बड़ी रैली का आयोजन किया गया था और महिला दल का नेतृत्व कोई और नहीं बल्कि प्रेमा देवी कर रही थीं। जिला मजिस्ट्रेट ने उनके नेतृत्व और बड़ी संख्या में अनुयायियों को देखते हुए राइफल की बट से उन पर शारीरिक हमला किया। उनकी दो किशोर बेटियों के साथ उन्हे गिरफ्तार किया गया और तुरंत जेल भेज दिया गया। 1944 तक अंग्रेजों द्वारा ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन को कुचल दिया गया था। फिर भी देश भक्ति की भावना जीवित थी। जेल से छूटने के बाद भी प्रेमा देवी ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। उन्होंने और उनके जैसे कई लोगों ने 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र भारत में नया सवेरा देखा।
प्रेमा देवी ने सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ख्याति प्राप्त नहीं की। जब स्वशासन का समय था। उन्होंने खुद को सामाजिक कार्य और सामुदायिक सेवा में डुबो दिया। एक नए राष्ट्र के निर्माण में उनके निरंतर काम के परिणामस्वरूप 1950 के दशक में मुंगेर नगर पालिका में अध्यक्ष के रूप में दो बार निर्वाचित हुई। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें उच्च जिम्मेदारियों के लिए चुना। 1962 से 1967 के बीच वह वर्तमान बेगूसराय जिले के एक निर्वाचन क्षेत्र बलिया से विधायक चुनी गयीं। बलिया उनके माता-पिता के गांव सन्हा के बहुत करीब है। वह अगला चुनाव हार गईं जब पूरा विपक्ष "कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ" के नारे के साथ एकजुट हो गया। इसके बाद खराब स्वास्थ्य ने उन्हें राजनीति की हलचल में लौटने से रोक दिया। हालाँकि मार्च, 1974 तक उन्होंने अपना सामाजिक कार्य जारी रखा। उन्होंने स्वेच्छापूर्वक बनारस में अपना शरीर त्याग कर दिया।
1950 के दशक में उन्होंने जिस ब्लाइंड स्कूल की शुरुआत की थी और उसे स्थापित किया था, वह 1980 के दशक की शुरुआत में भी अच्छी तरह से काम करता रहा और कई नेत्रहीन छात्रों को व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करता रहा। नेत्रहीन विद्यालय के कार्य को उनकी बड़ी पुत्री गौर प्रिया देवी ने आगे बढ़ाया। हालाँकि स्वयं बहुत शिक्षित नहीं थी, प्रेमा देवी महिला मुक्ति और शिक्षा को पूरी तरह से समर्थन करती थीं। उन्होंने 1930 के दशक की शुरुआत में लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरू किया था, जो मुंगेर में एक गर्ल्स हाई स्कूल के रूप में विकसित हुआ। प्रेमा देवी की विरासत को उनके बच्चों ने आगे बढ़ाया है और राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया है।
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"मद्धिम कुहरे की छटा चीर पूरब से आते रश्मिरथी"
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द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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मद्धिम कुहरे की छटा चीर पूरब से आते रश्मिरथी
मद्धिम कुहरे की छटा चीर पूरब से आते रश्मिरथी
उनके स्वागत में भर उड़ान आकाश भेदते कलरव से
खग वंश बेलि के उच्चारण जब अर्थ बदलने लगें और
बहुरंग तितलियाँ चटक-मटक आ फूल-फूल पर मँडराएँ
जब मौन तोड़ कोयलें गीत अमराई में गा उठें और
मधुकर के गुंजित राग उठें पड़कुलिया गमकाए ढोलक
जब झाँझ बजाएँ मैनाएं बज उठें मँजीरों सी फसलें
लग उठे तबलची सा बैठा कर उठे गुटुर गूँ हर कपोत
मोरनी मोर का नाच देख इतराने लगे बगीचे में
महुआ मदमाता हुआ कहे टेसू का लाल सुर्ख चेहरा
पी रहा धरा की हरियाली सर्वथा नवीना कली-कली
सुषमा बिखेरती हो कदली पियराई सरसों फूल बिछा
खेतों में अँगडाई लेती विटपों से लिपटीं लतिकाएँ
आलिंगन करतीं लगतीं हों, चुम्बन पर चुम्बन जड़तीं हों।
समझो द्वारे पर है बसन्त।।
जब सघन वनों के बीच-बीच गायों के गोबर से लीपे
आश्रम के आँगन-आँगन में घी सनी बनी हवि समिधा से
हो उठे हवन में सन्तों की आहुतियों से उठ रहा धुआँ
जब मन्द-मन्द ले उड़े पवन बिखराता जाए दिग्दिगन्त
उल्लासभरी तरुणाई पर छा उठे जोश नव यौवन का
खुशबू बिखेरती मलिकाएँ मुस्कातीं आतीं लगतीं हों,
जब रंग-बिरंगे फूलों की मदमाती झूमा-झटकी में
मचलीं हों कलियाँ खिलने को खिलखिला उठे सौन्दर्य स्वयं
हो उठे मनोहारी पीपल हर दृष्टि सुहानी सृष्टि देख
जागे विवेक हर लेख लेख कर उठे समीक्षा सौरभ की
धरती माता के गौरव की पतझड़ से उजड़े वन-वन में
समिधाएँ आने लगतीं हों शुचिताएँ छाने लगतीं हों,
अमराई की शाखाओं सी बहियाँ बौराईं लगतीं हों,
नदियाँ कृशकायी लगतीं हों, समझो द्वारे पर है बसन्त।।
कह उठे गगन हा रसा! रसा! हर वसन लगे जब कसा कसा
हो दिशा दिशा की एक दशा तन पर मादकता भरा नशा
वाणी अवाक् रह जाती हो बिन कहे अदा कह जाती हो
संकेत मुखर हो जाते हों अरमान शिखर हो जाते हों
हर ओर-छोर तक पोर-पोर बासन्ती रँग में बोर-बोर
सौन्दर्यलोक की वही दृष्टि रचने को आतुर नई सृष्टि
गाते हों किन्नर-किन्नरियाँ हर तरह अनूठी अलसातीं
आनन्द लुटातीं इठलातीं सम्मोहित करतीं बल्लरियाँ,
कल्पनातीत तरुणाई में लटका ललनाएँ झल्लरियाँ
जब दबा-दबा कर ओठों से सकुचाईं सीं बौराईं सीं
मदिराईं सीं भरमाईं सीं घर में आईं सीं लगती हों,
गलियाँ गदराईं लगतीं हों रक्तिमाहरित कोपलें उमग
विटपों पर कौतूहल करतीं कुछ मस्तातीं कुछ सुस्तातीं
उल्लास जगातीं बलखातीं सकुचातीं आईँ लगतीं हों,
समझो द्वारे पर है बसन्त।।
गुनगुनी धूप शीतल समीर मन मुदित किन्तु आधा अधीर
सुखदाई कुछ-कुछ दुखदाई पीताभ पल्लवों की लड़ियाँ
धरती पर गिरतीं झूम-झूम लावण्यमयी मिष्ठास प्रबल
होती हो कड़वी पर हलचल आकर्षण और विकर्षण की
बेलाएँ सजतीं लगतीं हों, खारीं लहराईं लगती हों
आलाप टिटहरी का सुनकर गा उठे पपीही पिया पिया
बिरहिनि के मन में उठे हूक हो उठे कलेजा टूक-टूक
गाती हो कोयल कूक-कूक चातक जाता हो चूक-चूक
विधवा-सधवा की छिड़े जंग उड़ चले कहीं चढ़ उठे रंग
चिकनी चिकनी हर देह एक बदलाव लिए जब मटक-मटक
चटकीले मटके सी फूली फूलों की डाली से बोले
रंगीन मिजाजी मंजरियाँ मरुथल में जैसे जल परियाँ
ओढ़े बासन्ती चूनरियाँ मदमाती आती कर्तरियां
बिन ब्याहीं युवती सुन्दरियाँ सामाजिक भय से डरीं-डरीं
प्रेमी से जाकर दूर खड़ीं उन्मन अलसाईं लगतीं हों
हारीं हरजाई लगतीं हों नतमुख शरमाईं लगतीं हों,
समझो द्वारे पर है बसन्त।।
जब हो निरभ्र आकाश और तारों से जड़ी हुई चूनर
ओढ़े बैठी हो नत रजनी टकटकी लगा कर कामदग्ध
कर उठे प्रतीक्षा शशि वर की आते निहारने लगे तभी
सौतिया डाह से भरी हुई चाँदनी कहे तू निकल! निकल
दोनों-दोनों को कुपित दृष्टि से घूर उठें हो विकल-विकल
पसरे सन्नाटे बोल उठें लज्जा मर्यादा छोड़-छाड़
कामातुर लगने लगें जीव ऋतुपति के रंगमहल से जब
टक्कर लेने की होड़ करे सूखड़ी झोपड़ी खड़ी-पड़ी
डायन की सुन्दरता रति को दे उठे चुनौती बार-बार
मदगन्ध सुहानी डोल उठे बहकी बयार रस घोल उठे
हो उठे मधुरतम हर आलम नर बोल उठे सजनी रजनी!
रजनी बोले बालम! बालम! हौले हौले शरमाती हो
जब प्रीति परस्पर गाती हो उद्दाम काम उन्मत्त प्रेम
दुर्दम्य ललक वासना भरी चहुंँ ओर दिखाई देती हो
मस्ती सी छाई लगती हो बस्ती बौराई लगती हो
जब ग़ज़ल रुबाई लगती हो
समझो द्वारे पर है बसन्त।।
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द्वारा - श्री मनीष कुमार सिंह
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श्री मनीष कुमार सिंह गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से हैं। करीब डेढ़ सौ कहानियॉं और दो दर्जन लघुकथाऍं लिखी हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं यथा-हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, पाखी, भाषा, पुस्तक वार्ता, दैनिक भास्कर, नयी दुनिया, नवनीत, शुभ तारिका, अक्षरपर्व, अक्षरा, लमही, परिकथा, शब्दयोग, साक्षात्कार इत्यादि में कहानियॉं और लघुकथाऍं प्रकाशित।
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विस्मृत
ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ चुकी थी। राघव के मन में मॉ की घर से चलते वक्त कही गयी बात अभी भी गूंज रही थी। बिशनपुरा वालों से सावधान रहना। सांप का काटा शायद जी जाए लेकिन उनके फन्दे से कोई नहीं बचा है। मन में घृणा और क्रोध का एक ज्वार आया। फिर स्वयं ही अपने को समझाने लगा। यहीं से जी जलाने से क्या लाभ। जब आमने-सामने होगें तो दो-दो हाथ कर लेगें। अपने क्रोध का तार्किक आधार उसे उचित प्रतीत हो रहा था। जब खेत-खलिहान में उनका भी बराबर का हिस्सा है तो बिशनपुरा वाले चाचा-चाची क्यों उनके हिस्से में भी खेती करवा कर हर साल अनाज उठवा रहे है।
कस्बे से उसका नाता टूटे कई दशक बीत चुके थे। मर्द और पंछी दाना-पानी की तलाश में जब तक घर से न निकले, गुजारा नहीं होता। गॉव में तो शायद बचपन में एकाध दफा गया होगा। पुश्तैनी खेत-खलिहान और मकान वहीं स्थित थे। मकान तो अब खण्डहर बनकर पुरातत्ववेत्ताओं के लिए रुचि का विषय बन चुका था। जमीन पर अभी भी खेती बँटाई द्धारा होती थी। कायदे से उसे भी अनाज का आधा मिलना चाहिए था। लेकिन रामू यानि उसके चाचा का सुपुत्र खुद पूरा हजम कर जाता। रामू को न तो नौकरी मिल पायी थी न ही कभी पहले खोली दूकान चली। किसी लायक नहीं था वह। ऊपर से उसकी सरकारी नौकरी पर वे लोग जलते थे। जब से राघव के प्रमोशन की खबर उन्हें मिली थी तब से बिशनपुरा वालों का हृदय किसी प्रेमी के हृदय की तरह निरन्तर जलता रहता था।
राघव की मॉ और चाची दोनों एक ही जिले की थीं। मॉ का गॉव चकिया था और वे बिशनपुरा की थीं। कस्बे में जहॉ उसका बचपन बीता, संयुक्त परिवार का अस्तित्व था। दादा-दादी तब जीवित और स्वस्थ थे। पिताजी और चाचा का परिवार साथ-साथ था। दोनों अविवाहित बुआ भी थीं। वैसे वे कुल चार भाई थे। बाकी दो अलग रहते थे। वह और श्याम तथा चाचाजी के दोनों बेटे मनहर और रामू इकठ्ठा खेलते और स्कूल जाते। वब सबसे बड़ा था। रामू सबसे छोटा। लोग उन सबको राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न पुकारते थे। कस्बे की जीवन-शैली अलग होती है। शांत, ज्यादा तड़क-भड़क और गति नहीं। पर्व-त्योहारों पर जरूर मेले का द्दश्य उपस्थित हो जाता।
शहर में अपना मकान लेना कितना कठिन है। नौकरी पेशा वालों के लिए लगभग असंभव। पहले की बात और थी। तब डबल इन्कम वाले दंपत्ति या एकल आय वाले भी किसी तरह प्रबंध कर लेते थे। अब दाम पहुँच से बाहर थे। जिसके पास ब्लैक का पैसा हो या पुरानी जायदाद,वही मकान-मालिक या फ्लैट का स्वामी हो सकता था। इसलिए गॉंव के खेत का बिकना और भी जरुरी था। शहर के अपने सीमित दायरे वाले परिचित जगत में से किसी ने राघव को बताया था कि अपने मूल-स्थान से खिसके तो वहॉं की किसी भी चीज में से तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला है। परिचित संभवत: भुक्तभोगी था। वह इस कथन की सच्चाई का अनुभव कर रहा था। सब कुछ नये सिरे से बनाने में कितना खर्च व मेहनत लगती है इसे वह जानता था। वे लोग निसंदेह भाग्यशाली होते हैं जिन्हें हर चीज या ज्यादातर बना-बनाया मिल जाता है। रामू भी ऐसे भाग्यवानों में ही था। और एक वह है। एक खीझ, गुस्से व निराशा जैसे मिले-जुले भाव उसके हृदय में उठे। चाची का बड़ा लड़का मनहर था लेकिन घर में चलती रामू की थी। कुछ साल पहले जब वह उन सबसे मिला था तो उसे भी ऐसा ही लगा। मनहर कोई हिंसक पागल नहीं था। साफ कपड़े पहनता था लेकिन घर में कोई आया हो तो उससे मिलने की बजाए रोटी-सब्जी थाली में लेकर एक तरफ जमीन पर बैठकर खाने लगता। न कोई बातचीत न सलीका। मॉ-बाप भी उसे धेले भर का महत्व नहीं देते थे। यह देखकर राघव को अफसोस हुआ। बचपन में ऐसा नहीं था।
कस्बे में पहॅुचकर उसने रिक्शा किया और चाची के यहॉ पहुचा। मरियल से खड़खड़ाते दरवाजे को पहचानने में उसे देरी नहीं हुई। बरसों से वैसे ही खड़ा था। खटखटाने पर कुछ पलों बाद सांकल खोलने की आवाज आयी। सामने एक बुढि़या खड़ी थी। पूरे श्वेत केश,झुर्रियों से पटा मुखड़ा। कमर झुकी हुई थी। किसी चित्रकार के लिए आदर्श मॉडल हो सकती थी। लेकिन वह पहचान गया कि यही चाची है। दस-बारह बरस बाद देख रहा है। परिवर्तन तो होगा ही।
''रघु!'' वे पहचान कर मुस्करायी। वह पॉंव छूने झुका। संस्कार नहीं भूला था। ''अंदर आ बेटा।'' उनकी आवाज में उल्लास था। बरामदे में पुरानी सी खटिया पर बैठकर वह सब कुछ निहारने लगा। जरुर वहॉं जीरो वॉट का बल्ब लगा होगा। बरसात में या रात-बिरात किसी को जरुरत पड़े तो ऑंगन से होकर जाना पड़ता था। बीचों बीच लगा हैंडपम्प। रसोई घर के बर्तन,चूल्हा और हॉंसे आती दाल-सब्जी इत्यादि की सौंधी खुशबू। सामने के कमरे में अन्धकार लेकिन दीवाल पर लगी घड़ी पहले वाली थी। उसने देख लिया। चाचा-चाची की जमाने भर पुरानी शादी के समय की तस्वीर को पहचान लिया। तब वे जवान थे। चाची गिलास में पानी और तश्तरी में लड़डू लेकर आयीं।
''पहले खाकर पानी पीना।'' वे भी खटिया के एक कोने में बैठ गयीं। वह न चाहते हुए भी आधा लड़डू खाकर पानी पीने लगा। घर में अभाव और बदहाली स्पष्ट दिख रही थी। उसने सोचा, दूसरे का हिस्सा खाने से कभी कोई बढ़ा है जो ये लोग बढ़ेगें।
''घर में सब लोग कैसे हैं?'' वे पूछ रही थीं। उसका ध्यान टूटा।
''सब ठीक हैं।'' जवाब संक्षेप में दिया।
निगाहें अभी भी घर को सर्च कर रही थीं। ''चाचाजी कहीं गए हैं क्या?'' उसने पूछा। औरत से क्या बात करनी। खामखाह...। उनके आने पर ही बात होगी।
''हॉं बेटा पास से अपने लिए दवा लेने गए हैं। आते होगें। तुम्हारे दोनों भाई दूकान पर हैं।'' उसे याद आया। उन लोगों ने एक विडियो गेम और गिफ्ट आइटम्स् की दूकान खोल रखी थी। दूकान किराए की थी। लोगों से राघव को पता चला था कि बेचारे खाने-कमाने भर भी नहीं निकाल पाते हैं।
''क्या परेशानी है चाचाजी को?'' वह वक्त काटने की गरज से पूछने लगा।
''यह कहो बेटा कि कौन सी परेशानी नहीं है। डॉक्टर हाई ब्लडप्रेशर बताते हैं। शुगर,बुढ़ापा न जाने क्या-क्या,'' वे उदास हो उठीं,''पास में गए हैं। थोड़ी देर में लौटते होगें।'' एक दीर्घ निश्वास के पश्चात् वे कहने लगीं,''एक दिन ये नींबू की झाड़ के पास खड़े थे। एक फल टपक कर उनके घुटने पर जा गिरा।'' वे ऑगन में लगे पेड़ की ओर इशारा कर रही थीं। ''ये खड़े-खड़े कॉपने लगे। हम सबने जब देखा तो पकड़ कर बिस्तर पर लिटाया। डॉक्टर कहते हैं इन्हें ज्यादा टेन्शन मत लेने दो।'' चाची सॉंस लेने के लिए रुकीं। ''घर की आमदनी कुछ खास नहीं है। मनहर के बारे में तुम्हें पता ही हैं। ज्यादा मेहनत मैं उससे नहीं कराती। रामू से जितना बन पड़ता है करता है। तुम्हारी तरह पढ़ाकू तो है नहीं कि अच्छी नौकरी ढूँढ़ ले।''
वह अफसोस में डूब गया। बेकार ही पूछा।
''तुम्हारा मनहर बात-बात पर नर्वस हो जाता है।'' वे कह रही थीं। ''घर की जिम्मेवारी से घबराता है। एक अकेला रामू बचा। वह कहॉं-कहॉं जाए...क्या करे।'' उसके सामने तस्वीर साफ होने लगी। लोग भी यही कहते थे। घर में बस मॉं और छोटे लड़के की चलती है। बाप और बड़े लड़के को कोई नहीं पूछता है।
दरवाजे पर आहट होने पर चाची बोली,''रामू आ गया।'' वही था।
''प्रणाम रघु भईया।'' वह पैर छूता हुआ बोला।
''खुश रहो।'' वह उसे देख रहा था। एक छरहरा,साफ रंग का युवक सामने था। कई बरस बाद वह उसे देख रहा था। सफेद कुर्ता-चूड़ीदार पैजामा पहने। ''बड़े स्मार्ट लग रहे हो।'' राघव ने टिप्पणी की।
''हॉ स्मार्ट तो बनना ही पड़ता है।'' वह आसमान की ओर देखता हुआ न जाने क्यों जरा व्यंग्य भरी वाणी मे बोला। राघव थोड़ा हैरान हुआ। इसमें व्यंग्य की क्या बात है?
बातचीत में बात खुली। खेत-खलिहान को लेकर रिश्तेदारों-पट्टीदारों से जो कड़वाहट मिली थी उससे उसका मन खट्टा हो गया था। वक्त के हिसाब से रामू के तेवर तीखे हो गए। पिताजी चार भाई थे। रामू के पिता सबसे गरीब। दो भाई साधन-सम्पन्न। वह मध्यम वर्ग में आता था। साधन-सम्पन्न लोगों ने सारे कागज व जानकारी अपने पास रखे थे। रामू ने पहल और हिम्मत करके कचहरी से मतलब की जानकारी निकाली। लेकिन वह अपने हिस्से के साथ-साथ राघव के पिता का हिस्सा भी खा रहा था। उसी के अनाज से परिवार चलता था। झगड़ा इसी बात का था। चलते वक्त मॉं ने कहा था-बिशनपुरा वालों पर कभी भरोसा मत करना।
रामू की वाणी में घुला ब्यंग्य उसे पसंद नहीं आया। लेकिन बात जारी रखने के लिहाज से उसने पूछा,''और सब कैसा चल रहा है?''
वह प्रयत्न करके मुस्कराता हुआ कहने लगा,''रघु भईया आपसे क्या छिपाना। घिसट रहा हूँ। नौकरी तो मिलने से रही।'' राघव को पता था। रामू और उसकी मॉं नौकरी के लिए दोनों प्रभावशाली चाचाओं के पास खूब गए थे। मदद नहीं मिली तो घर बैठकर उन्हें कोसने लगे।
''इधर गाड़ी चलाने की सोच रहा हूँ। अच्छी इन्कम है।'' रामू ने अपने भावी योजना की जानकारी दी। ''खुद क्यों नहीं चलाते?'' वह सामान्य भाव से बोला। लेकिन अर्न्तमन में व्यंग्य था। खाने का ठिकाना नहीं और ड्राइवर रखेगें।
चाची चाय बनाकर लायीं। ''चलो अन्दर वाले कमरे में बैठते हैं।'' वह अन्दर पलंग पर बैठा। एक बदरंग सी कवर वाली मेज पर एलबम में फोटो रखा था। वह पहचान गया। तस्वीर में वह था। घर के अहाते में घास पर बैठे चारों बच्चे थे। वह, मनहर, रामू और श्याम। रामू उसके कन्धे पर सर टिकाए हँस रहा था। सभी प्रसन्नचित थे।
बचपन में गर्मी के दिनों में लाइट जाने पर घर के मर्द बाहर चबूतरे पर खाट डाल कर सोते थे। बच्चे भी देखा-देखी वहीं सोते। रामू उसके साथ लेटने के लिए झगड़ा करता। उसकी मॉं अन्दर बुलाती रहतीं। कभी-कभार एकाध हाथ भी जमाती। लेकिन वह रो-धो कर उसी के साथ सोता। चलो जाने दो बच्चों और कुत्ते में कोई अन्तर नहीं होता है। अन्त में दादी कहतीं। करने दो इसे अपने मन की।
तस्वीर ब्लैक एण्ड व्हाइट थी। सत्तर के दशक की। अब इक्कीसवीं सदी चल रही है। सबसे बड़ा वह और सबसे छोटा रामू। उसने हाथ बढ़ाकर बिना कुछ कहे फोटो उठा ली। अपने नजदीक लाकर न जाने कौन सी चीज ढूढ़ने लगा। लॉन की घास श्वेत-श्याम तस्वीर में वैसी ही दिख रही थी। वह घास की गन्ध याद करने लगा। महानगर की फ्लैट संस्कृति में घास नहीं मिलती। गमलों में लोग ज्यादा से ज्यादा फूल-पौधे उगा सकते हैं। फुटबाल खेलते, गुल्ली-डंडा, क्रिकेट खेलते-लड़ते, टीम बनाते वह घास पर गिरकर वही एकाकार हो जाते थे। अपने फ्लैट के पीछे नगर-निगम की धूल-धूसरित पार्क में लड़कों को क्रिकेट खेलते देखकर उसके मन में विभिन्न प्रकार के भाव व स्मृतियॉं आती थीं। लेकिन इतनी गहनता शायद न आयी थी। वर्षो के अन्तराल ने हृदय में कैसे-कैसे विचित्र भाव भर दिए-संदेह, घृणा, विग्रह, घात-प्रतिघात, ईर्ष्या। वह गमगीन हो गया।
जाड़े में दोपहर में सभी बच्चे खूब खेलते। फिर शाम होने के ठीक पहले मॉ या चाची में से कोई सबको आवाज देकर बुलाता और स्वेटर पहना देता। बाद में वे खुद कपड़े पहनने लगे। पर एक समय था जब नहलाना-धुलाना और कपड़े पहनाना मॉं-दादी, चाची का काम होता था। अब सभी एक दूसरे से ऐसे अलग हो गए जैसे कभी जुड़े ही न हो। चाचाजी और मनहर आ गए थे। कृशकाय, समय से पूर्व अतिवृद्ध द्दष्टिगोचर होने वाले चाचा को भी उसने सप्रयास पहचान लिया। मनहर के बारे में ठीक सुना था। शर्मिंला, संकोची और कुछ-कुछ असंतुलित। प्रणाम-पाती करके चुपचाप एक कोने में जमीन पर बैठ गया।
चाचा ने कहा,''कहो रघु बेटा, हमें खेत से बेदखल करवाओगे या अपने भाईयों पर कुछ रहम करोगे?''
वह शांत रहा। इतने जटिल प्रश्न का जिसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो कोई सरल उत्तर संभव नहीं है। कुछ देर बाद कहा। ''चाचा दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है। मैं कौन होता हूँ किसी को बेदखल करने वाला। बस जरा हमारा भी ख्याल रखिए। हम भी कोई धन्ना सेठ नहीं। थोड़ा हमें भी दिलवा दीजिए।'' चाचा को यह उत्तर आशातीत लगा। वे राहत से मुस्कराए। ''नहीं बेटा किसी का धन हमसे भी खाते नहीं बनेगा।'' रामू रसोई से चाची के साथ खाने की थाली लाता दिखायी दिया। उसे लगा कि अभी जिद्द करेगा कि भईया के साथ ही खाऊगॉं।
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बाल विभाग (किड्स कार्नर )
अपनी कविताएँ / ग़जल
“सुबह ”
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रमाकान्त दायमा पेशे से अभिनेता हैं जो पिछले लगभग 25 वर्षों से हिन्दी सिनेमा, टीवी सीरीज, वेब सीरीज और विज्ञापन फ़िल्मों का जाना पहचाना नाम है। 80 के दशक में मंचीय कवि सम्मेलन के साथ साथ रेडियो और दूरदर्शन के युवा कार्यक्रमों में कवि सम्मेलन का हिस्सा रहे हैं। उनकी कविताएँ हिन्दी की प्रतिष्ठित, पत्रिकाओं में छपती रहतीं हैं। पिछले कुछ समय से” पाखी” पत्रिका में कुछ कविताएँ छपीं हैं।
व्यंग, सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के साथ साथ आध्यात्मिक अंग उनकी विशेषता है।
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सुबह
सुबह हो गई मामू
चल जाग ज़रा
उठ भाग ज़रा
देख चिड़िया कब से चहचहाए है
मुर्ग़ा बाँग दे दे कर, फिर से सोने को जाए है
रसोई की चहल-पहल
चाय की गर्मी
भरकर अपनी साँसों में
चल निकल मुसाफ़िर कामकर
अपने सपने जीने को
कल से जो फटी पड़ी है
मैली चादर सीने को
कुछ अपना कर, कुछ उसका कर
पर काम कर, तू काम कर
कुछ घर का कर, कुछ जग का कर
पर काम कर, तू काम कर
यही तेरा धर्म है
यही तेरा मर्म है
ना बैठ हाथ पर हाथ रख
कुछ हाथ चला, कुछ पैर चला
वरना पत्थर हो जाएगा
आलस में बैठे-बैठे ही,
तू नश्वर हो जाएगा
चल जाग ज़रा
उठ भाग ज़रा
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पाठकों की अपनी हिंदी में लिखी कहानियां, लेख, कवितायें इत्यादि का
ई -संवाद पत्रिका में प्रकाशन के लिये स्वागत है।
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"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
1.रचनाओं में एक पक्षीय, कट्टरतावादी, अवैज्ञानिक, सांप्रदायिक, रंग- नस्लभेदी, अतार्किक
अन्धविश्वासी, अफवाही और प्रचारात्मक सामग्री से परहेज करें। सर्वसमावेशी और वैश्विक
मानवीय दृष्टि अपनाएँ।
2.रचना एरियल यूनीकोड MS या मंगल फॉण्टमें भेजें।
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डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
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