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MARCH INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
मार्च 2023, अंक २२ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को होली, रंग पंचमी (महाराष्ट्र), अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, (८ मार्च २०२३) चैत्र नवरात्री एवं राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ और ईश्वर से आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करती हूँ।
जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की हिन्दी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है, जिसकी १२ मार्च २०२३ की कड़ी में शनिवार को वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया गया था, ‘जागृति’ शृंखला की इस कड़ी के वक्ता थे, प्रतिष्ठित हिन्दी आलोचक एवं साहित्यकार, प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल, हिंदी और आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय था "हिन्दी साहित्य के विभिन्न इतिहास और लेखन की चुनौतियाँ"।
हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा कोई सौ साल पहले लिखा गया था। क्या हिंदी साहित्य का यही एक मात्र इतिहास है? या और भी विद्वानों ने इतिहास लिखे हैं? कई लोग शुक्ल जी के इतिहास के तथ्यों से सहमत नहीं हैं? साथ ही, साहित्य का इतिहास लेखन एक चुनौती भरा काम है? क्या हैं ये चुनौतियाँ? इस कड़ी के विद्वान वक्ता, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर शिवप्रसाद शुक्ल ने इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया था। इतिहास की इस कड़ी ने जागृति के कार्यक्रम को बहुत ही रोचक और सफल बनाया है। आप सभी जागृति कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी के लिए इस वेबसाइट में जायें https://ihaindiana.org/ (https://ihaindiana.org/).
इस वर्ष १४ जुलाई २०२३ से लेकर २७ अगस्त २०२३ तक कवि सम्मेलन में दो कवि और एक कवियित्री भारत से आ रही हैं, सुदीप भोला, जबलपुर से, गौरव शर्मा जी मुंबई से डॉ॰ सरिता शर्मा, गाजियाबाद से हैं। ६ सप्ताह यह भ्रमण होगा, जिसमें जब भी कवि आपके शहर में आएँ, तो आप सभी इनकी कविताओं का आनंद अवश्य लें।
आप सभी को सूचित करते हुए परम हर्ष का अनुभव कर रही हूँ कि अ.हि.स. का द्विवार्षिक २१ वाँ अधिवेशन २८/२९ जुलाई २०२३ को Carmel, Indiana में होना निश्चित हुआ है। मैं आप सभी को समिति की ओर से आमंत्रित करती हूँ। आप सभी आकर और अपना समय देकर कार्यक्रम को सफल बनाएँ। अधिवेशन की विस्तृत जानकारी के लिए आप राकेश कुमार जी से इस ईमेल द्वारा ihaindiana@gmail.com (mail to:ihaindiana@gmail.com) और इस नम्बर द्वारा (317) 730-4086 जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आप सभी विस्तृत जानकारी के लिए इस वेबसाइट में जायें: https://ihaindiana.org/ (https://ihaindiana.org/).
मैं जागृति के सभी समिति सदस्यों की सराहना और आभार प्रकट करती हूँ। अंत में मैं समिति, न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति सहित सभी को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति
“हास्य के रंग - गीत-गजल के संग”
अमेरिका के महानगरों में, 21 जुलाई -27 अगस्त 2023
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कवियों का संछिप्त विवरण (Poets profile)
Dr. Sarita Sharma of Delhi, a former advisor to the Ministry of Culture and Chairperson of Bharatendu Natya Academy in U.P. government, is a veteran Hindi poetess of shringaar ras genre. She was born in Bhilai, Chhattisgarh and has a Ph.D. in Hindi literature. She is known for her deep meaningful and soulful poetry and its melodious spellbinding renditions. This extraordinary Hindi Poetess has been felicitated by the President of India, Shri Ramnath Kovind at a Rashtrapati Bhavan congregation. She has been embellished with the highest civilian award of Yash Bharti by the Uttar Pradesh Government, and with ‘Mahadevi Verma’ and ‘Nirala’ Samman. She has participated in many prominent literary events and national and international Kavi Sammelans and Mushairas, including in U.S, U.K, Canada, and Gulf countries in last three decades. She has also recited her compositions on various TV channels and at the prestigious Red Fort on several occasions. Spreading the message of love thru her brilliant poetry, Dr. Sarita Sharma has penned five books, titled ‘Peer Ke Saaton Samander’, ‘Nadi Gungunaati Rahi’, ‘Huaey Aakash Tum’, ‘Teri Meera Zaroor Ho Jaoon’, and ‘Chand, Muhabbat, aur Main’ in the form of Geet, Ghazal, and Muktak Collections. The influence of Brij and Awadhi is also seen in her creations. Her poem on 'female feticide' is included in textbooks.
Gaurav Sharma of Mumbai hails from Rajasthan. He is the son of renowned Hasya kavi Shyam Jwalamukhi, and one of the most popular young humorists in India with over 2600 performances to his credit. He is an exceptional performer and a maestro of humor who has entertained millions of people in India and abroad. Gaurav is known for his unique style of expressional comic rendered in his signature two liners. He sometimes uses the Marwari language for his humor. His poetry has a mixture of engaging humor and penetrating satire. When he takes the podium, the auditorium is filled with continuous laughter. Gaurav is not only a comic poet but also a youth icon. He has been associated with Johny Lever Live Shows since 2014. He is a winner of Laughter Challenge on Star TV, Comedy Ka King Kaun on SUB TV, and Hasya Kavi Muqabla on Zee TV. As a poet of distinction, Gaurav has been felicitated with numerous awards, including Saraswati Puraskar and Rajasthan Gaurav Puraskar. He has performed in over 38 countries, including multiple times in United Kingdom, Canada, and United States.
Sudeep ‘Bhola’ Soni, son of poet Sandeep Sapan, is a native of Jabalpur. He is a young talented poet who has established himself as a popular humorist. He is famous for his earthy wit and political satire and is celebrated for his entertaining melodies and parodies on social and political dissonance, including poems on Indian soldiers and martyrs, helpless farmers, and child labor. His creative writings and compositions have touched the hearts of poetry lovers across the globe via electronic and social media. With 200 episodes, and counting, he is a lead cast of ‘Lapete mey Neta Ji’ show on national TV. Sudeep Bhola is a commerce graduate from Durgawati University, and a skilled jewelry craftsman with a family jewelry business in its third generation. He has been felicitated with numerous awards and honors by many prestigious organizations and institutions. Sudeep Bhola has been invited to recite his poems from India's prestigious national Kavi Sammelan at Red Fort and Delhi Hindi Academy. He has enthralled audiences with his compositions in U.K, Ireland, Ethiopia, Kenya, Sri Lanka, Nepal, Oman, Qatar, and Hong Kong. This is his 3rd visit to the United States.
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -जागृति वेबिनार:
“भूमंडलीकरण के दौर में समकालीन हिंदी उपन्यास”
08 अप्रैल 2023
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की हिन्दी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 08 अप्रैल 2023, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की इस कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी शिक्षाविद,आलोचक एवं साहित्यकार, डॉ. अरुण होता, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय, बारासात, कोलकाता। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: " भूमंडलीकरण के दौर में समकालीन हिंदी उपन्यास "।
भूमंडलीकरण के दौर में प्रकाशित उपन्यासों का आयतन व्यापक है। बाज़ार-वाद, पूंजीवाद, आदि के प्रभाव से समाज में नई संवेदनायें जाग्रत हुई और उपन्यास को नये आयाम मिले। इस कड़ी में आइये प्रोफ़ेसर होता से सुनते हैं साहित्य के इस नये आयाम और रचना तथा रचनाकारों के विषय में।
समिति शनिवार, 08 अप्रैल 2023 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
1. https://www.facebook.com/events/522153266768829
2. www.facebook.com/ihaamerica
3. https://www.youtube.com/watch?v=6sT55t4EYNM
4. https://www.youtube.com/watch?v=yAzqBO9tYOE
शनिवार, 08 अप्रैल 2023, 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 8:00 AM PST
UK: 3:00 PM, Mainland Europe: 4:00 PM
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आशा है कि आप शनिवार, 08 अप्रैल 2023 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे, यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है | पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं | समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” जून 2021 से प्रकाशन प्रारम्भ किया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न “जागृति” की शुरुआत की है |"जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना|
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१ वां द्विवार्षिक अधिवेशन
जुलाई 28-30, 2023 इंडिआना, अमेरिका
विस्तृत समाचार - जल्द आ रहा है
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – रिपोर्ट “जागृति” व्याख्यानमाला की १२ वीं कड़ी
१४ जनवरी २०२३
“हिंदी साहित्य में यथार्थ”
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(प्रस्तुति: सुरेंद्र नाथ तिवारी)
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प्रवक्ता: डॉ. विनोद कुमार मिश्र
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““कलम के सिपाही अगर सो गए तो, वतन के सिपाही वतन बेच देंगें” या “जिंदगी को वे गढ़ेंगें जो शिलायें तोड़ते हैं” जैसी उद्वोधक पंक्तियों की गूँज सुनाई दी, "जागृति" द्वारा आयोजित १२ वीं कड़ी की परिचर्चा में। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की माहवारी व्याख्यानमाला की यह कड़ी १४ जनवरी २०२३ को स्ट्रीमयार्ड (Streamyard) से वेबिनार के रूप में आयोजित थी। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था : "हिंदी साहित्य में यथार्थ" और वक्ता थे प्रोफ़ेसर विनोद कुमार मिश्र; त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतल्ला के हिंदी विभागाध्यक्ष और विश्व हिंदी सचिवालय, मारीशस के पूर्व महासचिव। प्रोफ़ेसर मिश्र कई अकादमिक निकायों के सदस्य होने के अतिरिक्त एक कुशल प्रशासक भी हैं। वे एक विद्वान चिंतक और साहित्यिक हैं और तुलनात्मक हिंदी साहित्य के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं; जैसे "सहज साधक कबीर", "अज्ञेय के उपन्यासों में आधुनिकता का बोध", "साधना के निकष पर कबीर और तुलसी", आदि।
प्रोफ़ेसर मिश्र का कहना है कि हिंदी-साहित्य के छायावाद के कोमल, काल्पनिक, अंतर्मुखी धरातल के गर्भ में ही "यथार्थ" के ठोस-कठोर अंकुर भी छुपे थे। छायावादी निराला ने साहित्य की इस "अंतर्मुखता को तोड़ा और उसे जीवन से जोड़ा"। उसे कल्पना के कलेवर को हटाकर उन्होंने “इलाहबाद के पथ पर विधवा तोड़ती पत्थर” जैसी भौतिक -मांसल मानव-मूर्ति को साहित्य में उजागर किया। उनका कवि आधुनिकता की समग्र चेतना से निरंतर स्पंदित होता है। उन्होंने कविता को एक व्यापक फ़लक दिया, एक नया परिप्रेक्ष्य दिया। उनके अनुसार कविता की मुक्ति मनुष्य की मुक्ति है, वह साहित्य के माध्यम से मनुष्य को उसके बंधनों से छुड़ाने का प्रयास है; उसे काव्य के कोमल-वायव्य से हटाकर कठोर जमीनी यथार्थ को सोचने पर मजबूर करने का प्रयास है। उनकी "जूही" और "सरोज-स्मृति" जैसी कवितायेँ इस अनावरित-यथार्थ को साहित्य में प्रतिष्ठित करती हैं।
साहित्य का हर परिवर्तन समाज के परिवर्तन का द्योतक और कारक होता है। आजादी के बाद भारत के समाज में परिवर्तन की आँधियाँ हर स्तर पर चल रही थी, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक; हर स्तर पर। इन परिवर्तनों की गूँज साहित्य में भी मुखर थी। निराला के बाद के साहित्य में प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, नवगीत, नई कविता; साठोत्तरी कविता, आदि इन परिवर्तनों की द्योतक थीं। इन कई साहित्यिक धाराओं में हिंदी-साहित्य की सरिता बह निकली थी, जिसमें इन विभिन्न सामाजिक यथार्थों की तरंगें प्रखर ही नहीं, अपितु उग्र भी थीं। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, धूमिल, जगूड़ी, राजकमल चौधरी आदि इन धाराओं के अग्रणी कवियों में हैं। इनका साहित्य सामाजिक व्यवस्था के यथार्थ का प्रखर-अभिव्यक्ति बनकर उठा। नागार्जुन का उग्र रूप देखिये जब वे इमरजेंसी के दौरान इंदिरा जी को ललकारते हुए मंच से कहते हैं-
"इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको?
सत्ता के मद में भूल गई बाप को?"
और काव्य का यह नया-रौद्र-रूप एक मौसमी उबाल नहीं है, बल्कि तब से अब तक जीती-जागती, यथार्थ को प्रखरता से रूपायित करने की एक साहित्यिक चेष्टा है; एक "संघर्षपूर्ण, सार्थक, सुदीर्घ, रचना" की कई दशकों तक जीवित एक प्रतिष्ठित साहित्यिक परम्परा है। इन कविताओं का काव्य-मर्म सामाजिक परिवर्तनों से उद्भूत नयी चेतना, नयी दृष्टि, नए संकल्पों में निहित है। इसके तथ्य और शिल्प में वर्तमान समाज व्यवस्था से प्रताड़ित आक्रोशित व्यक्ति का मोह भंग है, जो सीधी-सपाट जमीनी भाषा में मुखरित है। वह आसमान से उतर कर जमीन के आदमी के भीतर की पीड़ा, तनाव, विवशता और अकेलेपन का दस्तावेज है। डॉ. मिश्र ने बताया कि इस बदलाव के बावजूद, आधुनिक कविता में यथार्थ की ये अभिव्यक्तियाँ अपने काव्य-गुण को अक्षुण्ण रखती हैं। इस काल के कवियों ने नये विम्ब, नये प्रतीक और नए शब्द संकेतों से अपने काव्य को समृद्ध किया है।
विद्वान प्रोफ़ेसर ने अपने व्याख्यान के दौरान आधुनिक कविता की उपर्युक्त धाराओं की उद्धरणों सहित विस्तृत और रोचक चर्चा की; और उनके उद्भव, उनके सामजिक प्रभाव और तत्कालीन रचनाकारों के विषय में विस्तारपूर्वक बताया। इस रोचक व्याख्यान का पूर्ण आनंद लेने के लिए पूरी प्रस्तुति इस लिंक पर देखें: http://hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं एवं अन्य कार्यक्रमो की रिपोर्ट
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – उत्तर पूर्व शाखा एवं शिव विष्णु मंदिर
द्वारा आयोजित ‘विश्व हिंदी दिवस’ 15 जनवरी, 2023
प्रेषित : श्रीमती अलका खंडेलवाल, उपसंपादक ‘संवाद’
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर पूर्व शाखा और शिव विष्णु मंदिर के संयुक्त प्रयासों द्वारा 15 जनवरी, 2023 को शिव विष्णु मंदिर, पारमा के भूतल सभागार में ‘विश्व हिंदी दिवस’ के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की सूत्रधार डॉ. शोभा खंडेलवाल और श्रीमती वंदना भारद्वाज ने अपना-अपना परिचय दे कर किया, साथ ही दोनों ने सभी का स्वागत करते हुए ‘विश्व हिंदी दिवस’ के बारे में बताया।
दीप प्रज्वलन: भारतीय परम्परा के अनुसार सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन किया गया। दीप प्रज्वलन में श्रीमती सुशीला मोहनका, अ.हि.स. की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्षा; श्रीमती किरण खेतान, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा; श्री सतश गुप्ता, मंदिर के कोषाध्यक्ष; श्रीमती विमल शरण, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के संस्थापक अध्यक्ष; श्रीमती रेनू चड्डा, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा; डॉ. शैल जैन, आगामी राष्ट्रीय अध्यक्षा और श्रीमती अलका खंडेलवाल, उपसंपादक ‘संवाद’ थीं।
सरस्वती वंदना: श्री पद्मनाभन रघुनाथन द्वारा सरस्वती वंदना ‘माता सरस्वती शारदा’ गाकर की गई।
अध्यक्षा के भाषण का सार: अ.हि.स. उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान ने दर्शकों,लेखकों, अध्यापकों एवं अन्य कार्यकर्ताओं सभी का विधिवत स्वागत किया। उन्होंने 'विश्व हिंदी दिवस' के महत्व के साथ-साथ हिन्दी भाषा के बारे में भी बताया। हिंदी भाषा वक्ताओं की ताकत है, लेखकों का अभिमान है। यह महज भाषा ही नही बल्कि, हम भारतीयों को एकता के सूत्र में भी पिरोती है। हमारी आन- बान- शान है। शायद हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जिसे हम जैसे बोलते है ठीक वैसे ही लिखते हैं और पढ़ते हैं। इसके हर शब्द में गंगा जैसी पावनता और गगन जैसी व्यापकता है। साथ ही उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के स्थानीय कलाकारों को अपनी-अपनी प्रतिभा दिखाने का भी अवसर मिल रहा है।
शिव विष्णु मंदिर के कोषाध्यक्ष श्री सतीश गुप्ता जी ने दर्शकों को सम्बोधित किया और हिंदी भाषा की महत्ता को बताते हुए कहा की यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी हिंदी बोले और भारतीय संस्कृति से जुड़े तो सिर्फ उन्हें हिंदी स्कूल में भेजना ही काफी नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है कि वे इसकी शुरुआत अपने घरों से ही करें। जरूरी नहीं की पूरा वार्तालाप ही हिंदी में की जाए, वार्तालाप में बीच-बीच में हिंदी शब्दों का प्रयोग भी बच्चों में हिंदी बोलने और समझने में मददगार साबित हो सकता है और हिंदी सीखने के प्रति उनमें रूचि जगा सकता है।
डॉ. उत्सव के. चतुर्वेदी जी ‘दुश्मन जोंपुरी’ को निमंत्रित किया गया। उन्होंने अपनी स्वरचित कविता ‘चिड़ियों को दाने’ का पाठ किया, उन्होंने बताया की कैसे आज का मनुष्य एक ओर तो जीव जंतुओं का हक़ छीन रहा है और दूसरी ओर जो उनके संरक्षण के लिए थोड़ा बहुत करता है उसमें अपने आपको बड़ा समझता है, अपनी वाहवाही करता है।
डॉ. अंजली निधान: ये पेशे से डॉक्टर है और कुछ समय पहले ही भारत से आईं हैं। इन्होने अपनी भारत की यादों को अमेरिका के ठन्डे, बर्फीले और उदासीन वातावरण के समकक्ष रख छोटी-छोटी बातों को याद किया और वे बातें कैसे मन को विचलित कर जाती हैं इसका विवरण अपनी कविता ‘परदेस में’ बखूबी किया।
श्रीमती बीना भान, ओहायो जो अभी-अभी भारत की यात्रा करके आई हैं। उन्होंने बनारस की सड़कों, गलियों, गंगा जी में नौका विहार, बनारसी साड़ी और खरीददारी का सजीव चित्रण अपनी कविता ‘बनारस यात्रा’ में किया। जिसे सुनकर दर्शक बनारस की सड़कों और खरीददारी में खो गए। वहीँ उन्होंने बुनकरों और कारीगरों की आर्थिक विडंबना का भी वर्णन किया। जो इतनी मेहनत कर सुन्दर विश्व विख्यात साड़ियों का सृजन करते हैं।
श्रीमती सुशीला मोहनका ने अपने स्नेही आशीर्वचनों से सभागार में बैठे सभी दर्शकों, कार्यकर्ताओं तथा कार्यक्रम में भाग लेने वालों को संबोधित करते हुये कहा कि हिन्दी और भारतीय संस्कृति को नई पौँध (Young Generation) में प्रस्थापित करने के लिये सभी को अपने-अपने परिवार में हिन्दी भाषा का प्रयोग बढ़ाना होगा तभी हमारी नयी पीढ़ी भली प्रकार से हिन्दी के शब्दों का सही अर्थ समझकर उसको काम में ला पायेगी। मेरे विचार में हिंदी मात्र एक भाषा ही नहीं, भारतीय संस्कृति की सबल समर्थ संवाहिका भी है। यह हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई है। सूर, तुलसी, मीरा आदि सभी कवियों ने धर्म के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को भी अपनी रचनाओं के द्वारा मुखरित किया है। हिंदी के अतिरिक्त शायद ही दुनिया में कोई ऐसी भाषा हो जो वहाँ की संस्कृति को उजागर करती हो। हम और आप सभी जानते है कि पैसा दो–चार–दस वर्षों में कमाया जा सकता है पर संस्कार और संस्कृति आने में पीढ़ियों का समय लगता है। हिन्दी भाषा हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई है। इस कार्य के लिए अभिभावकों को घर में आपस में हिंदी भाषा में बातें करनी होगी तभी बच्चे शुद्ध हिंदी बोल पायेंगे और समझ पायेंगे।
श्री युगल किशोर चावला, वेस्टलेक, ओहायो ने महाकवि गुलाब खंडेलवाल जी की एक किताब ‘गीत वृन्दावन’ में संग्रहित एक गीत ‘राधा हरि को देख न पाती’ गीत बड़े ही मनमोहक स्वर में सुनाया। आदरणीय महाकवि गुलाब खंडेलवाल जी की पहचान और शान विश्व में, पूरे हिन्दी जगत में है और हमेशा रहेंगे।
डॉ. अनूप कुमार ‘क्लीवलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी’ में शोध विभाग में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं। उन्होंने हिंदी भाषा के इतिहास के बारे में बहुमूल्य जानकारियाँ दी। उन्होंने बताया कि हिंदी राष्ट्र की भाषा है किसी विशिष्ट स्थान या क्षेत्र विशेष की नहीं हैं। यह जन समुदाय की भाषा है जो पूरे राष्ट्र को जोड़ती है। उन्होंने यह भी बताया कि हिंदी भाषा की उत्पत्ति का इतिहास भारतेंदु हरिश्चंद्र के काल से भी पहले जब संस्कृत भाषा में नाटक लिखे और किये जाते थे तब से है। उन नाटकों में जो गीत और गाने गाये जाते थे वे संस्कृत में न होकर अपभ्रंश में होते थे, यही अपभ्रंश भाषा आगे चलकर हिंदी कहलाई।
डॉ. तसनीम लोखंडवाला, ब्रोअड्सव्यू हाइट्स, ओहायो ने स्वरचित दो कविताये सुनायी। पहली कविता ‘उम्र का तकाज़ा’ थी जिसमें उन्होंने बताया कि वे अपनी बढ़ती उम्र से विचलित नहीं हैं बल्कि अपने जीवन के अनुभवों से अपने को समृद्ध और संतुष्ट पाती हैं। अपनी दूसरी कविता में उन्होंने अपनी माँ के प्रति अपनी अनुभूति का बहुत ही भावपूर्ण वर्णन किया है। यह कविता इतनी सजीव थी कि कविता की समाप्ति के बाद शोभा जी कहे बिना न रह पाईं कि ‘मैं तुम्हारी माँ से कभी मिली तो नहीं हूँ पर अब लगता है कि मैं उन्हें बहुत अच्छे से जानती हूँ।‘ ऐसी टिप्पणी किसी भी कवि के लिए बहुत महत्त्व रखती है। यह कविता उन्होंने अपनी माँ के जन्मदिन पर लिखी थी जो पिछले दिन ही था। कविता पाठ के समय वे भावुक हो गईं थीं।
इसके बाद श्री वैद्यनाथ राजन जी ने जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल ‘होश वालों को खबर क्या’ की कैरिओकी (karaoke) के साथ प्रस्तुति की जिसने श्रोतागणों को मन्त्र मुग्ध कर दिया।
श्री नरेंद्र सिंह ‘नदीम’, नार्थ रॉयलटन, ओहायो ने अपनी रचना ‘कलाम मोहब्बत का’ में संग्रहित कुछ शेरों की प्रस्तुति की।
श्री दीपक ‘मशाल’, कोलम्बस, ओहायो से आये थे ने स्वरचित कई कवितायेँ सुनाई ‘मैं दिया हूँ’ ‘चाँद था अपने जैसा’, ‘अपने जैसा ही कुछ किरदार निकला’ आदि। इनकी कविताओं में प्रकृति का सजीव चित्रण था, जो दर्शकों को पसंद आया।
श्रीमती शीला लाहोटी, नार्थ केंटन, ओहायो ने अपनी कविता ‘बचपन का वो ज़माना’ प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने अपने बचपन को याद किया तथा औरों को भी अपना बचपन याद कराया।
श्रोतागणों में से श्री अनुराग गुप्ता, सोलन, ओहायो भी उपरोक्त कवियों से प्रेरित हो अपने आपको रोक नहीं पाए और संचालक से आग्रह किया कि ‘वे भी कुछ सुनाना चाहते हैं’। स्वीकृति मिलने के पश्चात उन्होंने अपनी प्रस्तुति कर सभी को प्रफुल्लित कर दिया।
कार्यक्रम के बाद भी दर्शक रचनाकारों से मिलने के लिए आतुर थे। पुराने रचनाकार नयों को अपने समूह में आने के लिए आमंत्रित कर रहे थे। यह कार्यक्रम की सफलता का सूचक है कि श्रोतागण किस तरह कार्यक्रम से जुड़े हुए थे। कार्यक्रम की ख़ास बात यह थी कि मंजे हुए कवियों के साथ नए प्रतिभाशाली कवियों को भी मौक़ा दिया गया था। यह देखकर कौन कहेगा कि हिंदी का भविष्य खतरे में है? अमेरिका में इस छोटी सी सभा में कवियों और कवयित्रियों की भरमार और दर्शकों का मन्त्र मुग्ध हो दो घंटे तक पूरे उत्साह के साथ उन्हें सुनना लोगों में उनके हिंदी प्रेम को ही दर्शाता है।
अ.हि.स. की उत्तर पूर्वी शाखा के उपाध्यक्ष डॉ. प्रकाश सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कार्यकारिणी समिति के सदस्यों, सभी स्वयंसेवकों, मंदिर प्रबंधन, प्रतिभागियों, टीवी एशिया और दर्शकों को धन्यवाद दिया।
श्री अशोक खंडेलवाल ने मंच और कार्यक्रम की रीढ़ की हड्डी ध्वनि संचालन को बहुत ही सुचारू रूप से सम्भाला। कार्यक्रम में लगभग 150 लोग शामिल हुए थे। कार्यक्रम के अंत में सभी ने चाय के साथ अल्पाहार का आनंद उठाया। कार्यक्रम की सफलता अ.हि.स. उत्तर पूर्वी शाखा के सालों के प्रयासों और सालों साल बढ़ती लोकप्रियता की साक्षी है ।
(हमें दुःख है कि फ़रवरी अंक मे ये रिपोर्ट अधूरी छपी। पूरी रिपोर्ट मार्च में प्रकाशित है।)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – मेरठ, उत्तर प्रदेश शाखा, भारत
74 वाँ गणतंत्र दिवस, २६ जनवरी २०२३
द्वारा: उत्तर प्रदेश शाखा के उपाध्यक्ष, डॉ. रामगोपाल भारतीय
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74 वाँ गणतंत्र दिवस, २६ जनवरी २०२३ को श्रद्धा और उल्लासपूर्वक
मेरठ, उत्तर प्रदेश, भारत में मनाया
रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन RWA शीलकुंज, मेरठ, उत्तर प्रदेश, भारत के सदस्यों ने चिल्ड्रन पार्क, निकट आवास संख्या 146, शीलकुंज में देश का 74 वाँ गणतंत्र दिवस, २६ जनवरी २०२३ को श्रद्धा और उल्लासपूर्वक मनाया गया। ध्वजारोहण पूर्व आईएएस अधिकारी श्री एच. आर. एस. चौहान ने किया। इस अवसर पर अध्यक्ष श्री आर. पी. गुप्ता, श्री एच. आर. एस. चौहान, डॉ. अशोक बेंद्रे, श्री अशोक गोयल, श्रीमती उर्मिला अग्रवाल तथा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर प्रदेश शाखा के उपाध्यक्ष, डॉ. रामगोपाल भारतीय ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। बड़ी संख्या में सम्मानित निवासीगण उपस्थित रहे। प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। जय हिंद।
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अपनी कलम से
“बदरंग होती होली की परम्परा को आओ मिलकर संवारे!”
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द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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बदरंग होती होली की परम्परा को आओ मिलकर संवारे...!
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होली का त्योहार भारतवर्ष में अति प्राचीनकाल से मनाया जाता आ रहा है। इतिहास की दृष्टि से देखें तो यह वैदिक काल से मनाया जाता आ रहा है। चैत्र कृष्ण प्रतिप्रदा के दिन धरती पर प्रथम मानव मनु का जन्म हुआ था। इस कारण इसे मन्वादितिथि भी कहते हैं। इसी दिन कामदेव का पुनर्जन्म हुआ था। इन सभी खुशियों को व्यक्त करने के लिए रंगोत्सव मनाया जाता है। नरसिंह रूप में भगवान इसी दिन प्रकट हुए थे जिन्होंने प्रहलाद को बचाया था। यद्यपि दिवाली की भाँति होली पर्व के अवसर पर महीनों पहले सजावट का उत्साह, बाजार व घरों आदि में वैसी तैयारयाँ दिखाई नहीं देती तथापि होली का महत्व किसी भी अन्य त्यौहार से कम नहीं आँका जा सकता बल्कि इसका महत्व औरों से अधिक ही माना जाता है। बहुत ही कम खर्चीला त्यौहार है होली। न हजारों रुपये के पटाखे लाने पड़ते न बहुत ज्यादा साज-सजावट और फिर भी मस्ती सबसे अधिक।
भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्न-भिन्न ढंग से मनाया जाता है। उत्तर भारत में तो अपनी स्थानीय परम्पराओं से होली को और भी रंगीन बना दिया जाता है। विविधता में एकता के दर्शन वास्तव में यदि कहीं देखने हो तो होली पर्व पर दिखाई देते हैं। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु है। बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। न केवल देश से अपितु विदेश से भी लोग यहाँ होली में शामिल होने को आतुर रहते हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा देखते ही बनती है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। बैल गाड़ी दौड़, घुड़ दौड़, वजन उठाना, कबड्डी आदि होली के आकर्षण होते हैं। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश व उत्तरप्रदेश में होली के अवसर पर जगह-जगह कुश्ती के दंगल आयोजित करने की परम्परा है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होली में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया, जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।
हिंदुस्थान का सर्वाधिक प्राचीनतम त्यौहार है होली पर्व। दो दिवसीय यह त्यौहार पूरी मानवता एवं संस्कृति को अपने में समेटे हुए है। रंगों के इस त्यौहार में सब भेदभाव मिट जाते हैं। कौन छोटा कौन बड़ा, कौन गरीब कौन अमीर सब रंगों से सरोबार होकर एक हो जाते हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जबसे मानव सृष्टि है तभी से रंगों का यह त्यौहार भिन्न-भिन्न रूपों में मनाया जाता रहा है।
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के अहंकार में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग नही छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।
सबसे पहले होली के पहले दिन सार्वजनिक स्थान पर झंडा गाड़ कर विधिवत पूजन किया जाता है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। भरभोलिए गाय के गोबर से बनी ऐसी गोल तश्तरी सी होती हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए। लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के लोकगीत गाते हैं तथा नाचते हैं। छोटी-छोटी बातों पर रुष्ट होकर वर्षों बात न करने वालों को मनाने के लिए भी बहुत प्यारा है होली का त्यौहार।
भारतीय फिल्मों में भी अलग-अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे’ और 'नवरंग' के ‘आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार’, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।
प्राचीन काल में लोग चन्दन और गुलाल से ही होली खेलते थे। लेकिन आज गुलाल, प्राकृतिक रंगों के साथ-साथ रासायनिक रंगों का प्रचलन बढ़ गया है। ये रंग स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक हैं जो त्वचा के साथ-साथ आँखों पर भी बुरा असर करते हैं।
जहाँ एक ओर रसायनिक रंगों के कारण लोगों को शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ता है वहीं होली के दिन नशाखोरों ने भी इस पवित्र त्यौहार को बदरंग कर दिया है। कुछ लोग तो होली की प्रतीक्षा ही इसलिए करते हैं कि दोस्तों की धमाचौकड़ी के साथ बैठकर पैग से पैग टकराए जाएंगे। युवा पीढ़ी को रंगों से डर लगने लगा है, वे तनावग्रस्त, उदासीन, गंभीर व निरुत्साहित से दिखाई देते हैं। यदि कोई अपनापन दर्शाने के लिए इनको रंग लगा भी देता है तो ये लड़ने को तैयार हो जाते हैं। हम लोगों ने अपने-आप को बहुत ही संकीर्ण कर लिया है। रंगों से दूर रहने व साफ-सुथरे कपड़ों में रहने पर हम स्वयं को बहुत प्रतिष्ठित मान बैठे हैं। होली के दिन भी घर-परिवार, रिश्तेदारों, संबंधियों व मित्रों से दूर अलग-अलग होकर एकांत में बैठे रहना, समय व्यतीत करने के लिए फिल्में देखना अथवा गाड़ी उठाकर परिवार सहित शहर से दूर जहाँ गलती से भी कोई रंग लगाने वाला न मिल जाए वहाँ जाकर पिकनिक मनाना ही उनकी होली है। हम कहीं न कहीं अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को अपने परिवार के सदस्यों पर भी थोप रहे हैं। यदि वे खेलना भी चाहते हैं तो हम उनके मन में होली के प्रति इतनी नकारात्मकता भर देते हैं कि वे भविष्य में कभी भी इस पावन पर्व में शामिल नहीं हो पाते। जात-पात की बेड़ियों में जकड़े हम समरसता के इस पावन त्यौहार से तथा खेले जाने वाले रंगों से दूर ही रहते हैं।
हम जाने-अनजाने इस रंगों से सरोबार होली को बदरंग करने पर तुले हैं। सारी गलती न खेलने वाले की भी नहीं है। जो खूब खेलते हैं, उनके खेलने के तरीकों से भी लोगों में नकारात्मकता बढ़ती है। कॉलेज में लड़कियों की इच्छा के विरुध्द जबरन रंग लगाना, कोई अनजाना बीमार व्यक्ति गली से गुजर रहा है उस पर पानी की बाल्टी उड़ेल देना। संपर्कित परिवारों में काले तेल, पेंट, गोबर, कीचड़ आदि से होली खेलना आदि नकारात्मकता उत्पन्न करते हैं। आओ हम मिलकर इस नकारात्मक, बदरंग हो चुकी परंपरा को दुरुस्त करें। सकारात्मक ऊर्जा के साथ भिन्न-भिन्न आकर्षक रंगों के त्यौहार को संस्कार, शिष्टाचार, समरसता व आपसी भाईचारे के रंगों से सरोबार करें। मर्यादा में रहकर रंगों का प्रयोग करते हुए सामाजिक सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन करें। बुजुर्गों का सम्मान करते हुए, उनके चरणों में रंग लगाकर आशीर्वाद लेते हुए भावी पीढ़ी बच्चों को संस्कारवान शिक्षित करने के प्रयास करें। अनेक समितियों के स्वयंसेवकों ने ग्राम-बस्तियों में होली मिलन कार्यक्रम आयोजित करने की शुरुआत की है, जहाँ दिन में एक-दूसरे के घर जाकर होली खेलने के बाद शाम को नहा-धोकर परिवार सहित जाति-पाति से ऊपर उठकर एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होते हैं। महिलाओं-बच्चों के तथा युवाओं के अलग-अलग संस्कारित, मनोरंजक खेल होते हैं। ज्ञानवर्धक व मनोरंजक अन्ताक्षरी, प्रश्नोत्तरी होती है। फिर किसी वक्ता द्वारा होली के महत्व पर और सामाजिक समरसता पर प्रकाश डाला जाता है। तत्पश्चात सामूहिक भोजन होता है ताकि दिनभर के थके-हारे परिवारों को घर जाकर भोजन न बनाना पड़े। सबसे आनन्ददायक बात यह है कि यह सब सशुल्क होता है और कुछ कार्यकर्ता सारी व्यवस्था स्वयं करते हैं। हम समाज के लोग भी अच्छी बातों का कहीं से भी अनुकरण कर सकते हैं। कैसे हम इस पवित्र त्यौहार होली को विश्व का सर्वाधिक आकर्षक त्यौहार बनायें, कैसे अपना हर युवा, हर नागरिक खुशी से इस त्यौहार में शामिल हो, इस पर विचार करें, आओ बदरंग परम्परा को समाप्त करते हुए नई आशाओं के साथ इसे और अधिक पावन, आकर्षक बनायें ताकि हर जन कहें कि तनावपूर्ण जीवन में नई आशा की किरण है होली पर्व। नई स्फूर्ती, नवाचार, प्रेम, नवरस, नव जीवन की सार्थक आशाओं को पूर्णता की ओर ले जाने वाला समरसता से परिपूर्ण सबका अपना प्यारा त्यौहार है होली। हमें अपनी मर्यादाओं में रहकर उत्साह के साथ मस्त होकर इस त्यौहार का हिस्सा बनना चाहिए। विदेशियों को भी अपनी ओर आकर्षित करने वाला तथा व्यक्ति को कई दिनों तक तरो-ताजा रखने वाला अविस्मरणीय पावन पर्व है हमारा त्यौहार होली। हम इसे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए और अधिक अनुकरणीय बनायें।
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द्वारा - श्रीमती विमल शरण
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श्रीमती विमल शरण ओहायो, अमेरिका की निवासी हैं। ४ दशक पूर्व अपने पति डॉ. विश्व मोहन शरण के साथ पटना, बिहार से अमेरिका आई। इनकी विशेष रुचि बच्चों को भारतीय संस्कृति एवं हिंदी भाषा से अवगत कराने में रही है। अवसर मिलते ही हिंदी प्रेमियों को जोड़ा और एक साप्तहिक पाठशाला का श्री गणेश किया और बच्चों को भारतीय संस्कृति एवं हिंदी भाषा से अवगत कराने का काम प्रारंभ हो गया। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की जीवन सदस्या हैं। अ.हि.स. के उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की प्रथम अध्यक्ष रहीं हैं। समिति की सक्रिय एवं जिम्मेदार सदस्या हैं। हिन्दी में कविता लिखने में भी रूचि रखती हैं।
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आई आई होली आई
आई आई देखो, होली आई रे
आई आई देखो, होली आई रे
लेकर रंगों की बौछार,
लेकर गुलाल की फुहार,
आई होली आई रे।
आए बच्चे मस्ती में,
लेकर रंग भरी पिचकारी,
मस्ती में डाले रंगों की फुहार,
देखो होली आई रे।
लेकर रिश्तो की बहार, है रंग सबके हाथ
आई रिश्तो में नजदीकियाँ,
गई बक झक की वह दूरियाँ,
न शिकवा न शिकायत,
सबको रंग लगाओ रे,
सबको गले लगाओ रे,
आई होली आई रे।
है होली पकवानों की भी,
रही है बहार दही बड़ों की,
पुआ पूरी और कचौरी,
गुजिया की है बहार,
नए कपड़ों में सज धज के,
देखो बच्चे कैसे इठलाते,
होली आई रे।
गुलाल की आई अब बारी,
गले लगाते अकवारी लेते,
ना थकते हम हँसते हँसाते,
नया साल जो आया है,
रिश्तो का त्योहार लाया है,
हम खो गए सुध बुध,
इन रिश्तो की डोर में,
होली के रंगों ने मिलकर,
देखो क्या गजब ढाया है,
मनमुटाव की वह परते,
कैसे बह गई रंगों की रस में,
आई होली आई रे।
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द्वारा - डॉ. सुनील त्रिपाठी, निराला
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डॉ. सुनील त्रिपाठी, निराला राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं। अभी ये उच्च श्रेणी शिक्षक, शिक्षा विभाग म.प्र. में हैं। पढ़ने-पढ़ाने के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन में प्रसारण भी करते है। स्वतन्त्र लेखक के साथ-साथ इनकी रचनाएँ दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।
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मैं साजन की हो ली
होली रे, होली में हो ली, मैं साजन की हो ली।
हो ली तो फिर होली खेली, खेली होली होली।।
उड़त अबीर, गुलाल दुकूलन से छन-छन उर आबै।
नभ से प्रेम-पराग सुधाकर, रह रहके बरसाबै।।
हृदय अंकुरित साध आज, बैरी नैनन ने खोली।
बासंती रंग चढ़ौ सुनहरौ, रोमावलि मन भावैं।
कोयल, मोर, पपीहा बोलें, गीत प्रीति के गावैं।।
इंद्रधनुष अंखियन में चमकत, मन में सजे रंगोली।
मन भर मन को साधें, मन ना माने मन से बहके।
मन में मनसिज जागे, मनवा रे महुआ सा दहके।।
पुरबाई तरसाये, अंबुआ बौरे करें ठिठोली।
बैंदी, बेशर, किंकरि टूटी, पायल पग से बिछुड़ी।
मंजीरा मुश्किल में आये, पोरन-पोरन तिकड़ी।।
केशरिया रंग भयो शरम से, भींगी चुनरी-चोली।
फरिया उठी, खिसक गई अंगिया, पलक ढरक गये हौले।
काया भाई निढाल, आल तक के सब बंधन खोले।।
अधर रसायन भये, लगत बटमारे खूब तमोली।
पोरन-पोरन कसक, मसक से नस-नस ढीली पर गई।
सुध-बुध सिगरी बिगरी, मन में मदहोशी सी भर गई।।
बहकी-बहकी चाल, थरथराती-सी हो गई बोली।
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द्वारा - श्री श्यामल बिहारी महतो
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श्री श्यामल बिहारी महतो बोकारो, झारखंड, भारत से हैं। अभी ‘तारमी कोलियरी सीसीएल’ कार्मिक विभाग में कार्यरत हैं। इनकी भाषा में झारखण्ड की स्थानीय हिंदी स्पष्ट दिखाई देती है।
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कब तक
"पता नहीं इन मर्दों की अक्ल कब ठिकाने आएगी, कब तक वे अपनी पत्नियों को गुलाम समझते रहेंगे। युग बदलता रहा, लोगों की जरूरतें बदलती रही, लोग धरती से चाँद तक पहुँच गए, धरती पर जगह कम पड़ने लगी तो चाँद पर घर बनाने की सोचने लगे हैं। परन्तु पुरुष समाज की सोच नहीं बदली। वही आदिम सोच, वही आदिम हरकतें। वही आदिम एकाधिकार ! खुद तो दस दस औरतों के साथ कनेक्ट रहेंगे, संबंध रखेंगे, हाट-बाजार, सिनेमा-मॉल, घूमेंगे। लेकिन खुद की पत्नी गांव की देशी घी की तरह शुद्ध और पवित्र चाहिए..छि: छि...."
"क्या हुआ, यह सुबह-सुबह किसे कोसे जा रही हो..?"
"तुम्हें कोस रही हूँ, और किसे कोसूँगी, दूसरे को कोसने की क्या जरूरत पड़ी है मुझे, पत्नी की जासूसी करना-उसका पीछा करना यही तो काम रह गया है, तुम मर्दों का, खुद तो काम करेंगे नहीं। परन्तु कमाऊ पत्नियों का पीछा जरूर करेंगे” आँगन में झाड़ू लगा रही जयंती ने पति प्रमोद की ओर देखते हुए व्यंग वाण चला दी।
पेट हल्का करने बॉथरूम जा रहे पति का पाँव भारी हो गया। ठिठक कर रूक गया, उसका प्रेशर रूक गया और उसका चेहरा सफेद पड़ गया। हका! बका! लजातुर! अपनी ही पत्नी को- भावहीन की तरह देखने लगा, लगा नंगे-रंगे हाथ पत्नी के हाथों वह पकड़ा गया और उसकी पोल पट्टी खुल गई।
"क्या हुआ? मेरी बात सुनते ही सुबह की बेला में तुम्हारे चेहरे पर यह बारह काहे बज गया? लुगे-फटे हो जाओगे-जल्दी जाओ !"
झाड़ू लगा रही जयंती की नजरें, पति पर चिपक गई और प्रमोद पसीना-पसीना हो गया। यकायक उसकी धड़कने तेज हो गई थी।
"अरे, मैं तुम्हारी बात नहीं, मीरा के पति की बात कर रही हूँ, तुम टेंशन मत लो-जाओ, वरना तुम्हारा बीपी भी हाई हो जायेगा-सुनकर..!"
"अब तो पूरी बात सुने बिना, मेरा पख़ाना भी नहीं उतरेगा..!" प्रमोद ने छाती पर हाथ रखा, धड़कन की गति थोड़ी कम महसूस हुई !
"अरे, वो मीरा है न, शेखर कि पत्नी, सरहुल में जिनसे तुम्हें मिलवाया भी था..!" जयंती ने पति को बताया- " बैंक की नौकरी छोड़ दी, कल उसने नौकरी से रिजाइन दे दी। कल ही शाम को फोन कर इसकी सूचना देते हुए बतायी थी। देर तक हिचक-हिचक कर रोती रही थी, बेचारी..!"
"क्यों? ऐसा क्या हो गया, जो अच्छी भली सरकारी नौकरी छोड़ दी उसने..।" प्रमोद ने धीरे से पूछा था।
"शक !" जयंती ने पति पर नजरें गड़ा दी।
"कैसा शक..?" प्रमोद पिचपिचा उठा।
"पत्नी की चाल चलन-चरित्र पर शक...!" जयंती ने जोड़ा
"इस कारण कोई नौकरी छोड़ देगा, जरूर कोई विशेष बात होगी..।"
"हाँ, हाँ, विशेष बात ही थी...!" जयंती इस बार एक बारगी से चीख पड़ी थी "छः माह पहले वह फोन पर मुझे बता रही थी कि उसका पति पीठ पीछे उसकी जासूसी कर रहा है, छिप-छिप कर उसका पीछा कर रहा है। बैंक आकर किसी कोने में छिपकर बैठ जायेगा। मैं किधर जाती हूँ, कहाँ किसके पास अधिक देर बैठती हूँ, किसके साथ बैठकर चाय पीती हूँ और किसके साथ लंच! वह अवलोकन करता रहेगा और घर आने पर शाम को, शराब के नशे में खूब आं-खां, उल्टा-पुल्टा बकने लगेगा। एक रात तो हद कर दी उसने "कल मैनेजर की केबिन में घुस कर आधे घंटे तक क्या कर रही थी? मर्दों के बीच में बैठ हँस-हँस कर चाय पीने में बहुत मज़ा आता है? अपनी केबिन में तुम चाय नहीं पी सकती है-कमीनी! और गाली बक गया, वह इतने में ही नहीं रूका, मेरी चूल पकड़ जमीन पर पटक कर चढ़ गया, यह सब कुछ इतनी जल्दी हो गया कि मैं संभल भी नहीं पाई और उसकी गिरफ्त में आ गई। उस रात मैं सो नहीं पाई। सारी रात रोती रही, सोचती रही, अब नौकरी नहीं करुँगी, इस जिल्लत भरी जिन्दगी जीने से अच्छा है नौकरी ही छोड़ दूँगी। नौकरी करो, कमा कर पैसे लाओ और मर्द की मार भी खाओ, यह सब मुझसे नहीं होगा। पड़ोसन को देख पति लार टपकावे और पत्नी घूँघट से बाहर नहीं निकले। इस मानसिक विकलांग पुरुष के साथ रहना असंभव है! मैंने रात को ही दो बार रिजाइन लेटर लिखा परन्तु दोनों बार फाड़ देना पड़ा। सामने सो रहे दो साल के मासूम बेटे का चेहरा घूम जा रहा था। नौकरी छोड़ दूँगी तो इसके भविष्य का क्या होगा। पैसे के अभाव में न सही शिक्षा न सही परवरिश, आगे जाकर आवारा ही निकलेगा। पति की मार बोली सहते हुए बेटे के खातिर नौकरी कर रही हूँ। जीवन में अब कोई खुशी बची नहीं है। शरीर एक दम बेजान सा लगता है। बस ज़िन्दगी के साथ खुद को घसीट रही हूँ, तुम अपना ख्याल रखना...!"
सुन कर ही मेरा खून खोल उठा था- ऐसे पतियों के ऊपर खोलता गरम तेल उड़ेल देना चाहिए...!" जयंती ने कहा और फिर झाड़ू लगाने लगी।
प्रमोद का प्रेशर काफी बढ़ गया था। कूकर की तरह बार-बार सीटी बजने लगी तो बॉथरूम की तरफ दौड़ पड़ा। जयंती का यह रूप वह पहली बार देख रहा था।
"कहीं इसको शक तो नहीं हो गया? कहीं यह जान तो नहीं गयी कि उसका भी पीछा किया जा रहा है..? चाये गरम की तरह यह तेवर! आखिर बातों से किसकी ओर इशारा हो रहा है! अगर जान गई तो? वह कुछ कहेगी नहीं, सीधे-सीधे अपने दोनों पिल्लों को मेरे पीछे दौड़ा देगी और मैं उनके आगे भाग भी नहीं पाउँगा। फिर तीनों मिलकर मेरी जो दुर्गति करेंगे, कमीने दोनों बेटे भी पूरी तरह माँ पर गये हैं। कहते भी हैं शान से "हम तो माँ के बेटे हैं! मेरी मति मारी गई थी जो उस कमीने की बातों में आ गया, कम्बखत ने मुझे आग में कुदवा दिया- "भाभी पर नजर रखो, बड़ा बाबू और उसके संबंधों को लेकर आफिस में बड़ी गरमा गरम चर्चे हैं..!"
न मैं उसकी बातों में आता न आज पख़ाना रूम में इस तरह मुझे मुँह छुपा कर बैठना पड़ता। प्रमोद पख़ाना रूम में सोच रहा था..! उसके लिए पख़ाना रूम से महफूज दूसरी जगह और कोई हो नहीं सकती थी..! लेकिन कब तक? तालाब में किया गया गोबर देर तक छिपता नहीं, जिस दिन जयंती पीछा करने वाली बात जान जाएगी उसके बाद मेरा हस्र क्या होगा! यह सोच कर ही जी घबरा रहा है। फिर उसके करीब जाना तो दूर, दरवाजे से ही दुत्कार कर भगा देगी! ठीक कहा गया है, बुरे काम का बुरा नतीजा! अब भुगतो बेटा..!
प्रमोद रघु की बातों में आकर पिछले एक महीने से पत्नी का पीछा कर रहा था। कहूँ तो सीधे-सीधे वह पत्नी की जासूसी करने लगा था।
उसी का पति उसका पीछा कर रहा है, उसके पीठ पीछे उसकी जासूसी कर रहा है, यह जयंती को खबर न थी। बेखबर वह हर दिन अपने समय पर आफिस पहुँचती और अपने काम पर लग जाती थी। पहले वह अधुरे कामों को निपटाती फिर दूसरा कोई नया काम शुरू करती थी। राजेश बाबू जो उसका बॉस था, वह उसे जो भी काम सौंपता खुशी-खुशी पूरा करने में उसे बेहद सुकून मिलता था। आखिर आफिस में आज उसका जो रूतवा और हैसियत है सब राजेश बाबू की ही तो देन है।
“कभी टेंशन मत लेना, हमेशा पोजिटिव रहो, नकारात्मक सोच आदमी को नकारा बना देता है” राजेश बाबू उससे कहा करते।
वह भी काम से काम रखना, ज़रूरत से ज़्यादा किसी से कोई बात नहीं करना। बेमतलब की हँसी ठिठोली और आफिस की ललो-चप्पो वाली दुनिया से खुद को दूर रखना उसे अच्छा लगता था। यही कारण था कि आफिस में लोगों ने उसे शबाना आजमी की उपाधि दे रखी थी। जवाब में वह “जीवन धारा“ की रेखा बन जाती और साथी लोगों की निगाहें-नियत को मुस्कुराते हुए समझने की उपक्रम करते रहती थी।
उसका बाईस साल की नौकरी में कभी किसी ने उसे तनाव में नहीं देखा, जब भी देखा, चंचल चित्त और हँसते हुए देखा। जलनखोरों के लिए यह भी खोज का विषय बना हुआ था। अपनी पाँच फूट की चंचल काया और गजगामनी सी चाल चल कर जब वह आफिस पहुँचती तो बहुतों की आह निकल आतीं। वहीं उसे देख राजेश बाबू मंद-मंद मुस्कुरा उठते थे। उस मुस्कराहट के पीछे छिपे जयंती के लिए उनका प्यार को सिर्फ जयंती ही समझती थी। बाकी अपने सिर के बाल खुजलाते रहते थे। एक बात और भी, गहरी झील की तरह शांत उसकी जवानी पर अक्सर आफिस में बहस छिड़ जाती थी। उसकी जिंदादिली और जवानी आफिस में खाश राज बना हुआ था।
उधर जयंती को उसका पति हर रोज आफिस गेट के अंदर छोड़ वापस घर लौट जाता, फिर दोपहर छुट्टी के समय लेने चला आता था। जयंती की शादी हुए बाईस साल हो चुके थे। अठारह और चौदह साल के उनके दो बेटे थे। तब से लेकर आज तक काम पर आने जाने का उसका यही क्रम था। जीवन के कितने मौसम बीत गए, परन्तु उसके पति को न कोलियरी कैंटीन में चाय पीते कभी किसी ने देखा न बसंती होटल में घुघनी-चोप कभी खाते मिला। जयंती को आफिस गेट के अंदर उतार नाक के सीध-सीधे वापस घर चला जाता था, फिर ठीक दो बजे उसकी बाइक आफिस गेट के बाहर खड़ी नजर आती थी- न पाँच मिनट लेट न पाँच मिनट पहले, दो बजे मतलब दो बजे!
एक दिन अचानक से उसकी बाइक की दिशा में परिवर्तन हुआ, जयंती को आफिस गेट के अंदर छोड़ वापस घर लौट जाने वाली बाइक आज फिल्टर प्लांट की ओर मूड़ गई थी। अगले दिन से वही बाइक कभी कैंटीन के सामने खड़ी नजर आने लगी, तो कभी बसंती होटल के सामने, जो आदमी बसंती होटल में कभी कदम नहीं रखा था, वही आदमी उस होटल में घुघनी-चोप गपागप खाने लगा, मानो बरसों का भूखा हो। बसंती अंदर से बेहद खुश थी, उसे नया मालदार ग्राहक मिल गया था-"और कुछ खाने का विशेष मन करे तो फोन कर दीजियेगा, घर जैसा स्वाद मिलेगा..! यह हमारा नम्बर है,रख लीजिए..!" बसंती ने ब्लाउज के भीतर से एक कागज की चिट निकाल प्रमोद के हाथ थमा दी थी।
प्रमोद जयंती का पति है, यह बसंती को पता था। प्रमोद की बाइक की दिशा बदलना और खुद प्रमोद में यह बदलाव अचानक से नहीं हुआ था। अचानक कुछ होता भी नहीं है। हर नर के पीछे एक नारी और हर शक के पीछे एक बीमारी वाली बात थी।
सप्ताह दिन पहले की बात है, जयंती को आफिस छोड़ प्रमोद वापस घर लौट रहा था, हमेशा की तरह, तभी रास्ते में उसे रघु मिल गया। उसने इशारे से प्रमोद को रूकने को कहा, फिर पास जाकर पूछ बैठा-" आप जयंती का पति है न ...?"
"हाँ-हूँ पर तुम कौन है ?"
"मेरा नाम रघु है।"
"क्या बात है...?"
"भैया, भाभी पर नजर रखो, बड़ा बाबू राजेश और उसके संबंधों को लेकर आफिस में बड़ी गरमा- गरम चर्चे हैं....!"
"क्या बकते हो, सुबह-सुबह पी ली है क्या? होश में तो हो..?" प्रमोद ने रघु का कालर पकड़ लिया" मेरी पत्नी के बारे में ऐसी बात कहने की तुम्हें हिम्मत कैसे हुई...?"
रघु ने अपना कालर छुड़ाते हुए कहा "मैं तो होश में हूँ भैया, लेकिन जब सच्चाई जान लोगे तो तुम बेहोश हो जाओगे...!"
"अगर बात झूठ निकली, तो खोज कर पीटूँगा..।"
"जरूर पीटना, पर पहले अपनी पत्नी का पता करो..।"
इसी के साथ रघु खिसक गया था। आज वह बेहद खुश था। महीनों से मन में जो गुब्बार था, वो बहर निकल गया था। आज उसने उस बात का बदला ले लिया था। जिसे कंखोरी (काँख में होनेवाला फोड़ा) की तरह लिए घूम रहा था। एक दिन सुबह रघु ने जयंती से कह बैठा था "मैडम, कभी-कभी आप बहुत जल्दी आ जाती है, कोई विशेष काम रहता होगा...।"
आफिस में रघु की पत्नी के बारे सभी को पता था। वहीं रघु हर औरत में अपनी पत्नी का सा रूप देखने की तम्मना लिए घूमता था।
इसीलिए कभी-कभी उसे करार जवाब मिल जाता था "तुम अपनी औकात में रहो, और दूसरों की जासूसी करना छोड़, अपनी पत्नी की निगरानी करो-समझे तुम..।"
यह उसी तरह का ताना था, जैसा महाभारत के एक प्रसंग में द्रोपदी ने दुर्योधन से कहा था "अंधे का बेटा, अंधा ही होता है...!" बाकी महाभारत का पता है आपको। वहाँ शकुनि था, यहाँ रघु शकुनि बनना चाह रहा था।
प्रमोद सोच में पड़ गया था "यह आदमी ऐसा काहे कह कर चला गया! क्या है सच्चाई? प्रमोद सप्ताह दिन तक सोच में डूबा रहा। पर किसी नतीजे पर पहुँच नहीं सका। उसने रघु को तलाशा, पता चला, दो दिनों से वह काम पर ही नहीं आ रहा है। यह भी पता चला, रघु आफिस का चपरासी है, पियून, एक नम्बर का पियक्कड़ है। क्वाटर में रहता है। उसकी खुद की पत्नी उसके बस में नहीं है। कभी घास नहीं डालती है। गाँव में रहती थी, तब अपने सौतेले सगे दो देवरों को फांस रखी थी। रात को वह दोनों के बीच में सोती और रघु पीकर रात भर आंगन में लंगड़ा कुतुवा की भांति पड़ा रहता था। कुछ कहने पर पत्नी उसे देवरों से दौडा-दौड़ा कर पिटवाती थी। उसने कंपनी क्वाटर ले लिया। देवरों का संग तो छूटा, पर यहाँ भी एक ब्याव फ्रेंड रख ली, कमाई खाये पति का, अंगुठा चुसे पड़ोसी का।
उस दिन के बाद से ही प्रमोद कुछ उखड़ा-उखडा सा रहने लगा था। जयंती को आफिस में छोड़ वापस घर जाने का क्रम उसने तोड़ दिया था और आफिस कैंपस के बाहर, चाहरदीवारी से सटे कभी गुलमोहर तो कभी लिप्टस के पेड़ों पर बंदर की तरह चढ़ कर बैठ जाता और आफिस बरामदे की ओर बगुले की माफिक टकटकी लगाए छिप कर देखता रहता। पेड़ से देखने में जब असुविधा होने लगती तो किसी तरह उच्चक कर आफिस दीवार पर चढ़ जाता और वहीं से हनुमान की तरह वह सिर घूमा-फिरा कर इधर-उधर देखना शुरू कर देता था। उसके देखने का भाव किसी की टोह लेने जैसी होती और तब उसके चेहरे पर बैचैनी और उत्तेजना का मिला जुला भाव होता।
प्रमोद की हरकतें मनोरोग की तरह दिनों दिन गति पकड़ती जा रही थी। हरकतें भी हर दिन विचित्र- विचित्र तरह की करने लगा था। किसी दिन झाड़ियों के बीच से सांप की तरह रेंगता हुआ पेड़ों तक पहुँचता और फिर लपक कर किसी पेड़ पर चढ़ जाता और पहले की भांति टुकुर-टुकुर देखना शुरू कर देता। लोग कौतूहल से उसकी ओर देखते और हँसते हुए आगे निकल लेते। उसे भ्रम होता कोई उसे नहीं देख रहा है, उल्टे वह लोगों को अपनी ओर देखते हुए पाकर ख़ुद को डालियों में छिपाने की असफल कोशिश करने लगता था। उसकी यह हरकत लोगों को किसी पागल के लक्षण जान पड़ते थे
फिर धीरे धीरे उसकी हरकतों पर लोगों की नजरें जैसे उगने लगीं और वह चर्चा के केंद्र में आ गया था। इस कारण भी लोग अब उसे टोका-टाकी करना शुरू कर दिए थे। आफिस आ रहे करमचंद बाबू ने टोन कसते हुए एक दिन कहा था- "हर दिन बंदरों की तरह पेड़ों पर चढ़ कर क्या देखते हो? उम्र भी लड़कों वाली नहीं रही, किसी दिन कंपनी के सुरक्षा गार्ड बंदरों की भांति दौड़ाना शुरू न कर दे..!"
"तुम अपने काम से मतलब रखो न, कौन क्या कर रहा है उससे तुम्हारा क्या लेना देना है? अपना रास्ता नापो..!" एक बारगी वह झुंझला उठा था।
"क्या हुआ सर? मूड उखड़ा हुआ लग रहा है?" सामने से आ रहा सफाई मजदूर पूरनराम ने पूछा था। "अजीब सनकी पागल लगता है...!"
"कौन वो, जो पेड़ पर चढ़ा हुआ है? उसे मैं कभी-कभी कैंटीन की तरफ़ भी घूमते हुए देखता हूँ। एक दिन रघु के साथ बैठकर कैंटीन में चाय पीते देखा, परन्तु कभी खुश नहीं देखा, जाने क्या क्या सोचते रहता है..!"
"तब तो रघु जानता होगा इसे, कौन है यह..?"
"जानता तो होगा, पता लग जाएगा, कौन है..!"
संयोग से दूसरे दिन जब प्रमोद जंयती को आफिस में उतार कर वापस लौट रहा था तो वहीं गेट के सामने झाड़ू लगाते पूरनराम ने उसे देख लिया और जब वह चला गया तो लपक कर पूरनराम जयंती के सामने आकर पूछ बैठा- "जयंती मैम, वह आदमी जो आपको छोड़कर गया क्या आपका आदमी था ?"
"हाँ, क्यों..?"
“अगर यह जयंती मैम का पति है तो फिर वो औरत कौन थी, जो उस दिन इस आदमी के हाथ पे हाथ धरे मेघदूत सिनेमा हॉल के अंदर हँसते हुए जा रही थी..?
“क्या हुआ? किस सोच में पड़ गया तू?”
"नहीं, कुछ नहीं हुआ मैम, एक आदमी कितने रंग बदल सकता है, वही सोच रहा था, इसी से मिलता जुलता एक आदमी है, जो पिछले कुछ दिनों से वह उधर बाहर के सामने वाले पेड़ों पर चढ़ कर आफिस बरामदे की ओर ताकता रहता है, कल करमचंद बाबू ने टोका तो उससे लड़ बैठा। मैं समझा वही था ..।" सिनेमा हॉल वाली बात उसने छिपा ली!
"अरे, नहीं यह मेरा पति है, वह ऐसा क्यों करेगा, कोई दूसरा होगा..!" जयंती ने यह बात पूरनराम से बड़ी सफाई से कह तो दी, लेकिन खुद किसी गहरी सोच में पड़ गई थी। अगर वह प्रमोद ही है तो वो ऐसा क्यों कर रहा है अथवा उसे ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई? यह जान लेना जयंती के लिए अति आवश्यक हो गया।
पूरनराम वाली बात का उसने प्रमोद से चर्चा तक नहीं किया और मन ही मन एक योजना बना डाली "भेद जानो" योजना।
उधर महीना दिन माथा खपाने के बाद भी प्रमोद को जब कोई सुराग हाथ नहीं लगा तो धैर्य खो बैठा और एक दिन आफिस में ही धावा बोल दिया। बीस बाइस साल से जयंती को लाने और ले जाने का काम वह किसी योगी की तरह करता आ रहा था परन्तु पत्नी की कुटिया अर्थात आफिस में उसने कभी कदम नहीं रखा था। उस दिन अचानक आधा घंटा पूर्व अपने आफिस में पति को आया देख जयंती एक दम से चौंक उठी थी। उस घड़ी राजेश बाबू के साथ वह किसी जरूरी काम में लगी हुई थी। आश्चर्यजनक रूप से मुँह से निकल पड़ा" क्या हुआ, इस तरह अचानक से..?"
"एक जरूरी काम से मुझे एक जगह जाना है, सोचा तुम्हें घर छोड़ता जाऊँ.!"
जयंती ने राजेश बाबू की ओर देखा। राजेश बाबू बोल पड़े "ठीक है, कोई जरूरी काम होगा, तुम जाओ यह काम हम कल पूरा कर लेंगे..।"
जयंती अपना हैंडबैग उठाई और आफिस से निकल गई।
इस बात को बीते अभी महज़ दो दिन ही हुआ था। तीसरे दिन साढ़े दस बजे प्रमोद फिर आफिस में आ धमकता तब जयंती और राजेश बाबू दोनों चाय पी रहे थे और थोड़ी दूर पर मंजू बाई भी बैठी चाय पी रही थी। मंजू टाइम रेडेट मजदूर थी। आफिस में चाय पानी पीलाने का काम वही करती थी।
"बैंक से फोन आया था, तुम्हारा आधार और पेन कार्ड का जिरोक्स पेपर माँग रहा है..।" प्रमोद ने बताया।
"अभी अप्रैल माह में ही केवाईसी जमा किया है न..?" जयंती को बैंक वालों की यह ज्यादती अच्छी नहीं लगी थी।
"कुछ काम होगा, यहाँ है, तो दे दो, जमा कर आयेगा..।" राजेश बाबू आज फिर बीच में बोल पड़ा।
जयंती ने प्रमोद को पेपर दे दिया। वह चला गया। मंजू भी बगल वाले आफिस में चली गई तो जयंती बोल पड़ी" मुझे लगता है यह हमारा पीछा कर रहा है..।"
"डॉन्ट वरी! मुझे लगता है यह किसी बड़ी दुविधा में पड़ गया है। अच्छा होगा, यह अपने में कन्फर्म हो ले, किसी उलझन में न रहे।"
पति प्रमोद का यह बदला हुआ रूप जंयती को अखर गया। मन उसका अवसाद से भर गया। सर झुकाए ही उसने राजेश बाबू से कहा “सर, यह कैसी हमारी जिंदगी है, अपनी मर्ज़ी से जी नहीं सकते, अपनी मर्ज़ी से किसी के साथ हँस बोल नहीं सकते! शादी न करो तो समाज ऊंगली उठाता है। सैंकड़ों सवाल हमारे चरित्र पर उठने लगते हैं। शादी करो तो पुरुष स्त्री देह पर अपना आधिपत्य-सम्पत्ति समझने लगता है। आखिर औरत करे तो क्या करे? पैरों की यह बेड़ियाँ और लकवा ग्रस्त इस सोच को कब तक औरतें सहन करती रहेंगी, आखिर कब तक..?”
“डॉन्ट वरी! चिंता मत करो, बदलाव का यह दौर है, एक दिन वक्त भी तुम्हारा होगा और मर्जी भी तुम्हारी चलेगी, वो दिन दूर नहीं है, खुद पर अटल रहो”। राजेश बाबू ने बड़े प्यार से उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा था।
आक्सर आदमी उस जगह धोखा खाता है जहाँ विश्वास उसका डगमगाता है। प्रमोद को जयंती और राजेश बाबू को लेकर का कोई प्रमाण नहीं मिला था, जिस कारण वह अपना धैर्य खो बैठा था। तब एक रात उसने जयंती पर सीधे हमला कर दिया" तुम उस जगह से ट्रांसफर ले लो, राजेश बाबू के साथ तुम्हारा काम करना मुझे अच्छा नहीं लगता है। टेबुल के नीचे पैर पर पैर फँसा कर कोई काम करता है भला.! दीवार की भी आंखें होती है...!"
”और कुछ?" जयंती अपने उमड़ते जज्बातों को जबरन रोकते हुए कहा "उसके साथ मैं बाईस वर्ष से काम कर रही हूँ। तुम्हारे मन में इस तरह का ख्याल कभी नहीं आया। जब वह मेरे प्रमोशन को लेकर एरिया आफिसर से हाथापाई पर उतर आए थे तब तो तुमने उसे "तुम्हारा बड़ा बाबू मर्द आदमी है" कहा था फिर मेरे एस एल पी को लेकर वह पीओ से लड़ बैठे और मुझे एस एल पी भी दिलाया तब तुमने, उसे सुपरमैन नहीं कहा था, उसी की वजह से आज तक आफिस में मेरी तरफ आँख उठाकर देखने की किसी को कभी हिम्मत नहीं हुई और तुम कहते हो मैं उनके साथ काम करना छोड़ दूँ, कभी नहीं, कभी नहीं।" अंततः जयंती चीख ही पड़ी थी "एक इज्जत भरी जिन्दगी जी रही हूँ। उनके साथ रह कर, एक रूतवा मिला है, जो उन्हीं की देन है और तुम चाहते हो मैं उसे मिट्टी में मिला दूँ। तुम्हारी बेबुनियाद शक का शिकार हो जाऊँ..?" जयंती ने करवट बदल ली। उसके मुँह से नागीन सी फुफकार आने लगी थी। प्रमोद काठ की तरह खड़ा का खड़ा रह गया। थोड़ी ही देर में उसने अपने पैरों में कंपन महसूस की और दम घुटने सा लगा उसका। वह कमरे से बाहर निकल गया। पर जयंती टस से मस नहीं हुई..! प्रमोद अभी तक पख़ाना रूम से बाहर नहीं निकला था, यह देख जयंती ने जोर से आवाज़ लगाई "अरे, पख़ाना रूम में ही सो कर रात की नींद पूरी कर रहा है क्या? समय का कुछ पता भी है, पक्का एक घंटा हो गया घुसे!"
आँगन की दीवार पर लगी आईने के सामने अपनी नहाई शरीर को निहारते खड़ी, खुले बालों पर जयंती कंघी चला रही थी और पति प्रमोद को कनखियों से देख़े भी जा रही थी। उसकी नहायी-तराशा सा बदन और कमर तक लहराते काले काले बाल किसी को भी नींद की गोली खाने को मजबूर कर सकती थी। कोई भी अपना होश खो बैठता। आज भी वह दो बेटों की माँ नहीं बल्कि दूर से डिम्पल कपाड़िया लगती थी।
"सॉरी जयंती!" सामने आकर प्रमोद बोला" तुम सही थी, मैं ग़लत साबित हो गया..!"
"मुझे मालूम है..।"
"मैं पिछले एक डेढ़ महीने से तुम्हारा पीछा कर रहा था..।"
"मालूम है मुझे।"
"मैं रघु चपरासी के बहकावे में आ गया था..।"
"अच्छी तरह मालूम है, अचानक दो बार आफिस आया हम दोनों को रंगे हाथों पकड़ने के लिए, राइट..।"
"मैं बेहद शर्मिंदा हूँ..!" प्रमोद पछाड़ खाये पहलवान की तरह खड़ा हो गया था" जब तुम्हें सब कुछ मालूम हो चुका था तो कभी विरोध क्यों नही किया..?"
“विरोध गलत नीतियों का किया जाता है, परन्तु जिसकी सोच ही गलत हो, जिन्हें अपनी पत्नी पर भरोसा न हो, जो गैर स्त्री के साथ सिनेमा हॉल में जाता हो, वैसे नियत वाले आदमी का विरोध क्या करना, उससे छुटकारा पा लेना ही बेहतर है। फिर तुम तो खुद एक बड़ा भ्रमित आदमी हो। मैं खुद भी चकित और हैरान हूँ! इतने सालों से तुम्हारे साथ विस्तर साझा करती रही और तुम्हें जान न पाई! अब जब तुम्हारी असलियत सामने आ चुका है, तब तुम्हारे इस शकीपन के चक्कर में मैं अपना जीने का अंदाज़ क्यों बदल लूँ!”
"तुम कितनी अच्छी हो जयंती- डार्लिंग ! हमें माफी दे दो..!"
"डॉन्ट टच मी, दूर रहो, यह हक अब तुम खो चुका है।" जयंती ने प्रमोद को झिड़क दी "बाईस साल के हमारे गाढ़े प्यार को तुमने गंदे नाले में बहा दिया।" जयंती का पति छिप-छिप कर उसका पीछा कर रहा है "इस शब्द ने मुझे अपने ही आफिस में रूसवा करा दिया, बदनाम करा दिया! डेढ़ महीने से आफिस के आस पास तुमने जो तमाशा किया, लोगों ने आँखें फ़ाड़ फ़ाड़ के देखा हैं तुम्हें, वो क्या कम है? “जयंती ने कहना जारी रखा "तुम जैसे मर्दों से कोई औरत माँ तो बन सकती है परंतु एक इज्जत और मान सम्मान की जिन्दगी कभी नहीं जी सकती हैं। अब तुम मेरी एक बात सुनो "मैं मीरा नहीं, जयंती हूँ और अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीने का सलीका जान चुकी हूँ। वैसे मीरा ने भी नौकरी से रिजाइन नहीं दी है, वह तीन माह के मातृत्व अवकाश पर हैं, मीरा माँ बनने वाली है! ऐसे निकम्मे मर्दों के आगे हम कामकाजी महिलाओं ने घुटने टेकना छोड़ दिए हैं। हमें अपनी जिन्दगी कैसे जीनी है, वो तरीका हमें समझ में आ चुका है। हर बार पत्नियाँ ही अग्नि परीक्षा क्यों दें? पुरूष क्यों नहीं देता? आखिर एक जिस्म के लिए औरतें कब तक पुरुष यातनाएं सहेंगी! आखिर कब तक..!”
"बाबू जी आप! माँ का पीछा कर रहे थे? अपनी ही पत्नी की जासूसी करने लगे थे। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन आपका यह रूप भी देखना पड़ेगा..!”
आवाज ने दोनों को चौंकाया! देखा, बड़ा बेटा बगल के कमरे के दरवाजे की ओट में छिप कर जाने कब से उनकी बातें सुन रहा था।
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“बाल खंड (किड्स कार्नर)”
“होली का त्योहार”
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द्वारा - डॉ. राकेश कुमार गुप्ता
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डॉ. राकेश कुमार गुप्ता (डॉ राकेश चक्र), मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से हैं। योग एक्सपर्ट. सेवानिवृत्त अधिकारी इंटेलीजेंस विभाग, उत्तर प्रदेश से हैं। बाल साहित्य में विशेष रूचि रखते हैं।
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होली का त्योहार!!
नई उमंगें भर रहा, होली का त्योहार।
बाँछें बच्चों की खिलीं , मन में रंग फुहार।।
गुझिया, पापड़ बन गए, बने कई पकवान।
रसगुल्ला, चमचम बनीं, सजीं नई दूकान।।
मनभावन पिचकारियाँ, मन में भरें तरंग।
रंगों में सब रँग रहे, करें खेल हुड़दंग।।
भर गुब्बारे मारते, नन्हें - मुन्ने बाल।
लगे निशाना प्रेम का, पीटें हँस - हँस ताल।।
कोई गालों पर मले- रंग, अबीर, गुलाल।
प्रेम, प्रीत में सब रँगे, प्यारे बाल गुपाल।।
तन - मन भीगा रँग गए , सब ही प्रियतम मीत।
रँगों के त्योहार में, हुई सभी की जीत।।
गले मिले सब प्रेम से, मलते प्रेम गुलाल।
मुख जोकर से सज गए, होली हुई कमाल।।
गुझिया, रसगुल्ला उड़े , खाई पूड़ी खीर।
खुशियों में सब रम गए , बन गए आज अमीर।।
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डॉ. उत्सव चतुर्वेदी "दुश्मन" जौनपुरी ने भारत से भौतिक शास्त्र में पी. एच. डी. की डिग्री प्राप्त की है। सर्न जेनेवा स्विट्ज़रलैंड की प्रयोगशाला में १४ साल तक भू वास किया है, उसके बाद फिलिप्स और जी. ई. में कार्यरत थे। सम्प्रति अमेरिका की एक अन्य कंपनी में कार्यरत है, क्लीवलैंड, ओहायो अमेरिका में है। वैज्ञानिक होते हुए साहित्य में रूचि रखते हैं, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य हैं। इनके विचार में “शेर हथियार हैं, हालत बदलने के लिए” और अब पर्यावरण को बचाना इनके शेष जीवन का लक्ष्य है।
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१ - चिड़ियों के दाने!
ये जो चिड़ियों को दाने दे रहा हूँ, उन्हीं का हक़ है, उनको दे रहा हूँ!
उन्हीं के खेत से हमने चुगा था, उन्हें थोड़ा सा वापस दे रहा हूँ!
करूँ चिड़ियों के बच्चे की फिकर क्योँ, मैं अपनी नस्ल को क्या दे रहा हूँ?
नहीं बच्चों को कोई छत अता की, जो थी, वो चाक कर के दे रहा हूँ!
जहाँ को हर तरफ बर्बाद करके, खला में करवटें अब ले रहा हूँ!
नहीं सुधारूँगा "दुश्मन" मैं कभी भी, अभी दर्शे तरक्की ले रहा हूँ!
२ - गांधी की कुटिया!
गांधी की कुटिया के आगे गायों ने रम्भाया है,
और पेड़ पर चिड़ियों ने भी अपना नीड़ बनाया है!
नदियों, झीलों ने क़ुदरत का नया रूप दिखलाया है,
दूर की पर्वतमाला ने भी अपना शीश उठाया है!
नहीं शोर, हम सुन सकते हैं जो मैना ने गाया है,
वैष्णोदेवी का वाहन माँ के दर्शन को आया है!
कलयुग में त्रेता की झाँकी कौन हमें दिखलाया है?
कौन इशारे करके माँ के कदमों में ले आया है!
आओ ये संकेत समझ लें, अपनी सीमा पहचानें,
मानवता की आयु बढ़ाने सूक्ष्म प्रलय ये आया है!
“दुश्मन” थोड़ा कष्ट उठा लें, कम से कम उपभोग करें,
रखें ख़ज़ाने भरे जो उसने, हमें अता फ़रमाया है!!
३ - वैज्ञानिकों से ख़िताब!
या तो उठो और नक्षत्रों की गति क़ाबू में कर लो,
या तो शीश नवा क़ुदरत को पेड़ों के नीचे आओ!
बहुत किया बर्बाद धरा को, उसके सुन्दर आँचल को,
स्वप्न दिखाना छोड़ जमीं के कड़े धरातल पर आओ!
ऐसा न हो वैज्ञानिक दुश्मन समाज के कहलायें,
ज्ञान, ज्ञान तक ही रखो, व्यापार न उससे पनपाओ!
तुमने हवा दिया लालच को, दम्भ, महत्वाकांक्षा दी,
मानव धर्म नष्ट कर डाला, अब तो ज़रा संभल जाओ!
लाखों हुये करोना में बलि, कौन इसे ले आया है?
मानवता है छोटा बच्चा, उसे शस्त्र मत पकड़ाओ!
“दुश्मन” वो क़ानून बनायें, जिससे कुछ उपभोग रुके,
है विकास ही नाश अन्तत: महामन्त्र ये सिखलाओ!!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - संवाद पत्रिका को शुभकामनाएं
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Re: Sub.: February 2023 -
संवाद - International Hindi Association's Newsletter
संवाद का अंक मिला। बहुत सामयिक सार्थक और संग्रणीय सामग्री है पत्रिका में। संपादक मंडल को हार्दिक बधाई। सभी लेख रोचक और स्तरीय हैं। विविध विषयों पर लिखे लेख अति सुंदर बन पड़े हैं।संत रविदास जयंती पर हुए कार्यक्रम का समाचार संवाद में देने के लिए भी आपका धन्यवाद।
सफलता की अनंत शुभ कामनाएँ।
भवदीय
डॉ. रामगोपाल भारतीय, उपाध्यक्ष
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर प्रदेश, भारत शाखा
मीरुत, उत्तर प्रदेश, भारत
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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सुशीला मोहनका
(प्रबंध सम्पादक)
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होली, रंग पंचमी (महाराष्ट्र की होली), अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2023, चैत्र नवरात्री, उगादी तथा गुडी पडवा (महाराष्ट्र का नया वर्ष). गणगौर एवं रामनवमी की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि आप Covid-19 की SARS-CoV-2 के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवायें एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी। जागृति’ की पंद्रहवीं कड़ी शनिवार, ८ अप्रैल २०२३ को दिन में ११:०० बजे (EST) से अमेरिका में और ८ अप्रैल २०२३ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
जनवरी, २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन: इस बार इंडिआना, अमेरिका में २८ से २९ जुलाई २०२३ तक होने जा रहा है, इस अधिवेशन का मूल विषय: ‘अगली पीढ़ी के लिए हिंदी शिक्षा’ (Hindi Education for the Next Generation) है। इस अवसर पर एक सुन्दर स्मारिका भी प्रकाशित होने जा रही है। शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं से विशेष अनुरोध है कि अपनी-अपनी शाखा कि संक्षिप्त रिपोर्ट स्मारिका के लिए तैयार करने का कष्ट करें। सभी आजीवन सदस्यों से विशेष आग्रह है कि अधिवेशन के विषय के अनुरूप आप अपना लेख तैयार कर के एक माह के अन्दर (up to 30 Apr. 2023) भेजने का कष्ट करें। इस अवसार पर पुस्तकों का विमोचन भी किया जाएगा। पुस्तकों के लेखको से विशेष अनुरोध है कि इस सुविधा का लाभ उठायें।
अ.हि.स. के पदाधिकारियों के लिए एक विशेष सूचना: अधिवेशन के प्रारंभ होने के पहले (२८ जुलाई २०२३ को दिन में) और अधिवेशन की समाप्ति के बाद दूसरे दिन सुबह (३० जुलाई २०२३) अ.हि.स. के बोर्ड की बैठक होने की परम्परा है, समय निश्चित होने पर सभी को सूचना दी जाएगी|
शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं: आपसे एक विशेष निवेदन है कि आप अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें समय से प्रकाशित किया जा सके। जिन स्थानीय समितियों ने अग्रिम सूचना भेजी है उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें तथा कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
‘संवाद’ फरवरी २०२३ का अंक पढ़कर जिन्होंने प्रतिक्रया भेजी हैं उनको धन्यवाद। आप सभी से विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का मार्च २०२३ का अंक भी अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने से सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
सुशीला मोहनका
sushilam33@hotmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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