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INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
मार्च 2022, अंक १० | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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| अध्यक्षीय संदेश |
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ। ईश्वर से मानव समाज के कल्याण की कामना करती हूँ।
“जागृति” एक नया आयाम है, जो हिंदी भाषा के इतिहास से सबको परिचित कराएगा और हिंदी को विश्व के हिंदी प्रेमियों को सही जानकारी दिलाने में सहायक होगा। “जागृति” में साहित्यकारों के द्वारा जो वार्ता और समीक्षा की गई है, वो अति ज्ञानप्रद है। “जागृति” कार्यक्रम की जानकारी फ़ेसबुक और ईमेल के माध्यम से भी भेजी जा रही है, कृपया आप सभी इस कार्यक्रम में सम्ममिलित होकर इसका लाभ उठायें। अ.हि.स. की ओर से “जागृति” के बैनर के नीचे किये जा रहे कार्यों की ह्रदय से प्रशंसा करती हूँ।
वर्तमान सत्र की नई न्यासी समिति, कार्य - समिति, निदेशक मण्डल के सदस्य एवं शाखा संयोजक सभी अच्छे तरीक़े से अपना कार्यभार सम्भाल रहे हैं, उन सभी को हृदय से आभार प्रगट करती हूँ।
सभी पाठकों से एक विशेष आग्रह - जो भी स्वयं-सेवक या संघ अपना समय दान देना चाहतें हैं या दे सकते है, कृपया इस ईमेल में (anitasinghal@gmail.com) भेजें या इस फ़ोन नम्बर (817-319-2678) पर बात कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- "जागृति " मंच, वेबिनार:
"आदिकाल से भक्तिकाल की यात्रा", शनिवार, 09 अप्रैल 2022 |
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जागृति वेबिनार निमंत्रण
अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं।
स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न "जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना। इसके लिए समिति ने विद्वानों के वक्तव्यों और चर्चाओं की एक माहवारी वेबिनार शृंखला शुरू की है, जिसकी तीसरी कड़ी, 09 अप्रैल 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।
तीसरी कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान, प्रोफेसर ओम प्रकाश सिंह, अध्यक्ष भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नयी दिल्ली। आइये उनसे "आदिकाल से भक्तिकाल की यात्रा" विषय पर वक्तव्य सुनें और चर्चा करें उस समय के हिंदी साहित्य के बारे में; आदिकाल का भक्तिकाल में परिवर्तन कैसे और क्यों? क्या भक्तिकाल की लहर दक्षिण भारत से ?, भक्तिकाल के पीछे मुख्य विचार क्या थे?, क्या थी इस यात्रा में साहित्य की मूल प्रेरणाएं और अवधारणाएं ?, इस यात्रा काल के मुख्य रचनाकार कौन थे? आदि।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति 09 अप्रैल 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
Please mark your calendar for an upcoming live and interactive webinar on
"Adikal Literature- From the Pages of History" on April 9, 2022,
तिथि --शनिवार, 09 अप्रैल 2022
समय --8:30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST; UK: 4:00 PM
विषय : "आदिकाल से भक्तिकाल की यात्रा"
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यदि आप हमारे इससे पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
1. “अपनी हिंदी की पहचान", फरवरी 5, 2022
2. "आदिकाल का साहित्य: इतिहास के पन्नों से", मार्च 12, 2022
धन्यवाद,
डॉ राकेश कुमार
प्रमुख - जागृति:हिन्दी साहित्य की दशा एवं दिशा पर चर्चाओं की एक रोचक शृंखला
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -इंडियाना शाखा, यूएसए
ईमेल:ihaindiana@gmail.com
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बाल खंड (किड्स कार्नर)
"नींव ज़िंदगी की " |
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| द्वारा: कीर्ति प्रकाश |
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कीर्ति प्रकाश, हिंदी को दिल से बेहद पसंद करती हैं। लेखन की कई विधा में पकड़ रखती हैं (कहानी, कविता, आलेख, ग़ज़ल, भाषण, स्क्रिप्ट राइटिंग, कॉपी राइटिंग आदि।
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"सदियों तक उन महलों के गुम्बदों की चमक फीकी नहीं पड़ती,
जिसके दीवारों की नींव धरा के अंतस में रखी जाती है"
जी हाँ, जिनकी नींव जितनी गहरायी में होती है, वो इमारत उतने ही अधिक सालों तक महफ़ूज़ रहते हैं।
इंसान का जीवन भी ऐसा ही है अगर एक युवा या बड़े होते बच्चों के जीवन में हमारे बुजुर्गों का साथ शामिल हो तो यक़ीनन जीवन की ऐसी बातेँ सीखी जा सकती है जो किसी किताब में या किसी थ्योरी से नहीं सीखी जा सकती है।
हमारे बुजुर्गों के पास जीवन का एक गहरा अनुभव है। उनके पास अनेक वर्षों का, जीवन के अनेक उतार चढ़ाव का अध्ययन है। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ अच्छा किया, कैसे किया, क्यूँ किया, क्या-क्या चैलेंजेज़ उन्होंने देखे और कैसे उन्हें पार किया, ये सब वो हमें बता सकते हैं। उनसे जो सीख हमे मिलती है वो केवल उपदेशात्मक या भाषण नहीं है, बल्कि प्रैक्टिकल जीवन पर आधारित होती है। ये अनुभव हमें आने वाले जीवन के अनेक बाधाओं को पार करने में, अनेक लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार सिद्ध होंगे। हमारे बड़े, हमारे बुजुर्ग तपती धूप में बरगद की छाँव की तरह हैं। सच है कि इनसे सिर्फ हमें मिलता ही है बदले में कुछ देना नहीं पड़ता सिवाय स्नेहरूपी जल के।
अगर देखा जाए तो किसी बुजुर्ग ने अपने जीवन में भले ही कुछ बड़ा हासिल ना भी किया हो, तो भी उनके पास से उनके अनुभव से आप ये ज़रूर सीख - समझ पायेंगे कि आख़िर क्या हुआ, क्या बाधाएं रही कि वो बड़ा मुकाम नहीं बना सके। वो आपको बताएँगे कि फिर समाज में इसके क्या-क्या परिणाम उन्होंने देखा। उनके वो अनुभव भी आपको सहायता करेंगे कि समय रहते, आपको वो ग़लती नहीं करनी है और समय रहते उसमें कैसे सुधार कर लेना है ताकि वही नाकामयाबी आपको ना देखनी, सहनी पड़े।
आप वैसे भी अगर गौर करें तो आप पायेंगे कि आपके बुजुर्ग आपके बड़े, आपके दादा-दादी, नाना-नानी के साथ जब आप होते हैं, वो अपने कोमल और स्नेहिल स्पर्श से इतना अभीभूत कर देते हैं कि उनके सामने आपके मन की गाँठें खुलने लगती है, जो आप किसी से नहीं कह पाते, वो आप उनसे साझा कर पाते हैं। अपना सुख-दुःख आप उनकी गोद में सर रखकर कह लेते हैं। कई बार अपनी खुशियाँ, अपने ग़म, अपनी टीस जो अपने दिल में लेकर चल रहे होते हैं, वो सहज भाव से उनके सामने रखकर आप ख़ुद को हल्का महसूस करते है।
कई बार युवा अपने माता-पिता को जो नहीं कह पाते, अपनी बात नहीं समझा पाते, वे बातें अपने ग्रैंडपेरेंट्स से बताने में उन्हें झिझक नही होती है। यह एक नैसर्गिक रिश्ता है जिसमें हम ज़्यादा खुले भी हैं और ज़्यादा सुरक्षित भी। कभी-कभी आपने पाया होगा कि जो बात सीधे तौर पर माँ या पापा से नहीं कह पाते वो आप दादा-दादी को कहकर अपनी बात उनके सामने रख पाते हैं और अगर बात अच्छी हुई तो उनके जरिए मान भी ली जाती है और ग़लत हुई तो बुजुर्ग आपको ज़्यादा सहज और दुलार से समझा देते हैं। अगर आपको जीवन में अपने ग्रैंडपेरेंट्स का साथ मिला है या उनके जैसा आपके जीवन में कोई है तो समझिए कि आपको जीवन की इस आपाधापी भरे रेगिस्तान में एक स्वच्छ सुन्दर मीठे जल का सरोवर प्राप्त है, जहाँ आप जीवन की इस तपन को उतार कर सुकून की साँस ले सकते हैं।
बुजुर्गों का सम्मान करके ही हम जीवन के अनमोल अनुभवों को उनसे प्राप्त कर सकते हैं। उनसे प्राप्त सीख, जीवन की ऐसी धरोहर होगी जिसमें आप अपने हिस्से का अनुभव जोड़कर अगली पीढ़ी को वसीयत कर पाएंगे। मत भूलें कि आज जो जीवन हमारा है, उसे अपने दिनरात देकर उन्होंने ही सहेजा है। हम अपने आप यहाँ नहीं पहुँचे , जहाँ हम हैं। आज हम स्वस्थ और सुरक्षित है, ख़ुश हैं तो उनके द्वारा की गई मेहनत और केयर का परिणाम है। हमें आज सुन्दर बनाने में उन्होंने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग हम पर समर्पित किया था। तो आज वक़्त है और हमारा धर्म है कि हम अपने बुजुर्गों को वही सुरक्षा वही सम्मान वही खुशियाँ दे जिसके वो हक़दार है जो उन्हीं की दी हुई दौलत हमारे पास है। अगर हम आज चूक गए तो कल आने वाली पीढ़ी से हम अपने लिए इसकी अपेक्षा रखने के अधिकारी नहीं होंगे। आइए संकल्प लें और वचनवद्ध हों कि हम अपने घर परिवार, अपने समाज के बुजुर्गों का बड़ों का सम्मान करें, उनके स्वास्थ्य का ख़्याल रखें, उन्हें उनकी अर्जित खुशियाँ वापस करें। बुजुर्गों का सम्मान, उनकी हिफाजत करना ठीक वैसे ही है जैसे मकान की नींव का मजबूत बने रहना।
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| प्रस्तुति : श्रीमती अलका खंडेलवाल |
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श्रीमती अलका खंडेलवाल जबसे भारत से आई हैं, अ.हि.स. से जुड़ीं हुई हैं। ये स्टार टॉक कार्यक्रम की प्रशिक्षित शिक्षिका हैं। २०१३ से हमेशा हिंदी समर कैंप में अपनी सेवायें अर्पित करती हैं। २०१९ से २०२१ के सत्र में ‘विश्वा’ की प्रूफ रीडिंग का काम भी किया हैं। अ.हि.स. की २०२०-२१ में उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की कोषाध्यक्ष का काम भी किया है, साथ ही २०२१ में अ.हि.स. के २०वें अधिवेशन की कोषाध्यक्ष भी रही हैं।
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होली भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में जाना जाने लगा है। रंगों से भरा होली का त्योहार, फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। मार्च का महीना जैसे होली की उत्तेजना को बढ़ा देता है। यह महीना सर्दी के तुरत बाद वसंत ऋतु के आगमन का आवाहन करता है। इस त्योहर में सभी की ऊर्जा देखते बनती है, होली पर सभी बहुत अधिक उत्साहित होते हैं। भारत में बच्चे हों या बड़े दोनों ही रंगों से भरी बाल्टी, पिचकारी और गुब्बारों से एक दूसरे पर रंग डालते हैं और जोर-जोर से “बुरा न मानो होली है!” कहते पूरे मोहल्ले में धूम मचाते दीखते हैं। पर होली के अवसर पर सबसे अधिक खुश होते हैं बच्चे। बड़े भी बच्चे बन जाते हैं और एक दूसरे को खूबी रंग लगाते हैं। बड़ों को गुलाल लगा उनका आशीर्वाद लेते हैं। होली का उत्सव अपने साथ सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है और वातावरण में बिखरे गुलाल की तरह इस ऊर्जा को चारों ओर बिखेर देता है। इस पर्व पर विभिन्न प्रदेशों में सबके घरों में अनेक प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं जैसे उत्तर प्रदेश में गुजिया, बिहार में पूआ प्रमुख है।
होली मनाने के पीछे कई कहानियाँ हैं – जिनमें एक कहानी राजा हिरण्यकश्यप की है। किसी जमाने में रण्यकश्यप नाम का एक राजा था, वह बहुत ही शक्तिशाली और अभिमानी था। यहाँ तक कि वह अपने को भगवान् समझता था। वह चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें, हिरण्यकश्यप के डर से सभी उसकी पूजा करते थे पर प्रहलाद उसका पुत्र होने के बावजूद भी ऐसा नहीं करते थे और वे विष्णु के उपासक थे और उनकी पूजा करते थे। हिरण्यकश्यप को यह बात पसन्द नहीं थी। उसने भक्त प्रहलाद को मारने के लिए कई प्रयास किये पर असफल रहा। उसके बाद हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वो प्रहलाद को अपने गोद में लेकर आग में बैठ जाए। आग में होलिका जल नहीं सकती थी क्योंकि उसे वरदान मिला हुआ था लेकिन वे चाहते थे कि उनका पुत्र प्रहलाद उस आग में जल कर भस्म हो जाये, पर जब होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी तब वो भगवान विष्णु के नाम का जाप कर रहे थे। उन्होंने अपने भक्त प्रहलाद को उस अग्नि में जलने से बचा लिया और होलिका आग में जला कर भस्म हो गयी। होली के दिन गाँवों और शहरों में होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है। होलिका दहन के दूसरे दिन सभी होली खेलते हैं।
यह भगवान की असीम शक्ति का प्रमाण तथा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। तब से लेकर अब तक हम इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखते हैं और होली का रंगों भरा त्यौहार मनाते हैं। ये त्यौहार भारतीयों का प्रमुख और प्रचलित त्यौहार है लेकिन फिर भी इस त्यौहार को हर जगह हर धर्म के लोग एक साथ मिलकर प्रेम से मनाते हैं।
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: जागृति रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- मार्च १२,२०२२
जागृति व्याख्यानमाला की दूसरी कड़ी:
"आदिकाल का साहित्य: इतिहास के पन्नों से" |
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| साहित्य को उर्ध्वमुखी होना चाहिए |
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"आदिकाल का साहित्य: इतिहास के पन्नों से"।
प्रोफ़ेसर डॉ. कैलाश नारायण तिवारी कुलपति "थावे संस्कृत विद्यापीठ, बिहार"
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जैसा आप को ज्ञात होगा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति ने स्वतंत्रता के इस अमृत-महोत्सव वर्ष में "जाग़ृति" नामक हिंदी साहित्य पर व्याख्यानों और चर्चाओं की एक मासिक श्रृंखला शुरू की है। इसका उद्देश्य हिंदी साहित्य के प्रति रूचि पैदा करना और साहित्य सृजन के लिए नए रचनाकारों को अनुप्रेरित करना है। इस व्याख्यानमाला की दूसरी कड़ी 12 मार्च 2022 को जूम से आयोजित हुई, जिसका शीर्षक था: "आदिकाल का साहित्य: इतिहास के पन्नों से"।
कार्यक्रम के आरम्भ में "जागृति" टीम की सदस्या सुश्री पूजा श्रीवास्तव ने इस विषय पर व्याख्यान और चर्चा के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर डॉ. कैलाश नारायण तिवारी को आमंत्रित किया। उन्होंने प्रोफ़ेसर तिवारी के विशद हिंदी-साहित्य-ज्ञान का उल्लेख करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। पूजा जी ने बताया कि प्रोफ़ेसर तिवारी लम्बे अरसे से हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े रहने के अतिरिक्त एक मौलिक चिंतक भी हैं, जिसका प्रभाव उनकी पुस्तकों, जैसे "बिरले दोस्त कबीर के" ; "कबीर, नंगा फकीर", में स्पष्ट देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त उनका कविता संग्रह "हटो, हटो, कुछ कहने दो" और दर्जनों शोध पत्र और अन्य आलेख प्रकाशित हैं; वे वर्तमान में थावे संस्कृत विद्यापीठ, बिहार “Thave Sanskrit Vidyapeeth, Bihar” के कुलपति हैं।
प्रोफेसर तिवारी ने अपने व्याख्यान का प्रारम्भ हिंदी साहित्य के काल-विभाजन से किया। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, और राहुल सांस्कृत्यायन के हवाले से बताया कि हिंदी साहित्य का आरम्भ कोई 1000 ईस्वी संवत से माना जाता है। इन विद्वानों ने साहित्य के इस इतिहास को मोटा-मोटी चार काल-खण्डों में बांटा है; आदिकाल या वीरगाथा काल 1000-1400 ईस्वी; भक्ति काल या मध्यकाल 1400-1700 ईस्वी, रीतिकाल 1700 से 1850 ईस्वी; और आधुनिक काल 1850 से अब तक। आदिकाल में जो साहित्य मिलता है उसकी भाषा अपभ्रंश, अवहट्ट और प्राकृत की मिश्रण है। रचनाकार इन भाषाओँ में अलग-अलग लिखते थे और कुछ साहित्य इन सबों के मिश्रण से उभरी हुई भाषा में भी था; जो यह आदिकाल की हिंदी थी। आदिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ थीं : धार्मिकता, वीरगाथा, श्रृंगार, सामजिक सरोकार और राजनैतिक प्रभाव। समाज में उस दौरान कई धर्म और सम्प्रदाय प्रचलित थे, जैसे शैव, वैष्णव, नाथपंथ, बौद्धधर्म। इन सम्प्रदायों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकारों का साहित्य पर प्रचुर प्रभाव देखने को मिलता है; और उस समय की हिंदी की भाषा भी इन सम्प्रदायों के साहित्य की भाषाओँ से प्रभावित है, और इनसे उभर कर बनी है। उस काल के साहित्य के अवलोकन से पता चलता है की साहित्य की मूल प्रेरणा सांस्कृतिक चिंतन थी। आदिकाल के साहित्य में निराशा का भाव कम देखने को मिलता है। विद्यापति के "धीरज राखो....." पद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि रचनाओं में आशा का स्वर ही मुखर था। भाषाओँ, सम्प्रदायों, और अलग अलग क्षेत्रों के होने के बावजूद, आदिकाल के हिंदी के साहित्य की अंतर्धारा एक है; शायद इसका कारण हमारी सांस्कृतिक एकता रही होगी।
साहित्य पर उस समय की राजनीति और इतिहास के प्रभाव का विवेचन करते हुए डॉ. तिवारी ने बताया कि सम्राट हर्षवर्द्धन के शासनकाल के पश्चात भारत छोटे-बड़े क्षेत्रीय रजवाड़ों में बंट गया था, जैसे पाल, प्रतिहार, चोल आदि राजबंश। साहित्यकार मुख्यतः इन राजाओं के आश्रित होते थे। अधिक साहित्यकार अपने राजाओं के व्यक्तिगत आचरण; उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे सौंदर्य और रोमांस, संयोग-वियोग, उनके विवाह-राज्याभिषेक आदि का वर्णन, प्रजा के साथ उनके सरोकार; उनकी दिनचर्या आदि विषयों पर ही लिखते रहे। एक मुख्य स्वर जो उस समय के साहित्य में उभरा है वह है इन राजाओं की वीरता-वर्णन का। ये राजा एक दूसरे से वैमनस्य या अन्य राज्यों पर अपना अधिकार जमाने के लिए लड़ा करते थे। उस जमाने के साहित्य में इन लड़ाइयों और आश्रयदाता राजाओं की वीरता की गाथाएं मुखर हैं। शायद यही कारण रहा होगा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस काल को वीरगाथा काल की संज्ञा देते हैं।
प्रोफेसर तिवारी ने इस बात पर जोर दिया कि उस काल का साहित्य उस काल की राष्ट्रीय स्थिति का सही चित्रण नहीं करता। राष्ट्र विदेशी आक्रांताओं द्वारा लूटा जा रहा था, निरंतर हार रहा था और रचनाकार अपने अपने छोटे राजाओं के जीत का डंका बजा रहे थे। यह दुर्भाग्य की बात है कि ये राजवंश एक दूसरे से लड़ते रहे, जबकि पूरा देश विदेशी आक्रांताओं से त्रस्त था। साहित्यकार भी केवल अपनी क्षेत्रीयता तक ही सिमट कर रह गए थे; किसी ने भी पूरे राष्ट्र की चिंता कर उन्हें एक जुट करने का, राष्ट्रहित में उनके पौरुष को ललकारने का, साहस नहीं किया। प्रोफेसर तिवारी के अनुसार यह उस जमाने के साहित्य की एक भूल थी जिससे आज के साहित्यकारों को सीखना चाहिए। साहित्य को किसी रानी की पैंजनी या किसी एक राजा के तलवार की चमक से लिपटने की बजाय राष्ट्रहित और राष्ट्र के भविष्य की चिंता करनी चाहिए, भविष्य के राष्ट्र-चिंतकों का आह्वान करना चाहिए। प्रोफेसर तिवारी के अनुसार साहित्य को उर्ध्वमुखी होना चाहिए, पूरे राष्ट्र के हित की सोचनी चाहिए, और वैसी ही रचनाएँ करनी चाहिए।
"उस काल में कौन कौन से प्रमुख रचनाकार थे और किस विधा की रचनाएँ लिखी गई?" प्रश्न के उत्तर में प्रोफ़ेसर तिवारी ने बताया कि मुख्यत: उस काल में काव्य लिखे गए और काव्य की आत्मा पर साहित्यकारों ने गहरे विवेचन किये; जैसे काव्य की आत्मा क्या है? छंद, अलंकार, रस, वक्रोक्ति? संस्कृत काव्यों की परम्पराओं का प्रभाव हिंदी के आदिकालीन काव्य पर है। कई विद्वानों ने सरहपा को आदिकाल का प्रथम कवि कहा है जिनकी रचना है "दूहाकोश" या "दोहाकोश"। सरहपा के अतिरिक्त उस काल के प्रमुख कवि है: चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो, जिसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य कहा जाता है) विद्यापति (कीर्तिलता, कीर्तिपताका आदि), जगनीक (आल्हा खंड, परमाल रासो), आमिर खुसरो (पहेलियाँ और मुकरियाँ) हेमचन्द्र (सिद्ध हेमचन्द्र), अब्दुल रहमान (सन्देश रासक), कण्हपा (गीतिका) आदि। उस काल की रचनाओं जैसे गाथा-सप्तशती, अनुरूप-शतक आदि का प्रभाव बाद के हिंदी साहित्य पर स्पष्ट देखा जाता है।
व्याख्यान के अंत में समिति के ट्रस्टी सुरेंद्र नाथ तिवारी ने प्रोफेसर तिवारी के विद्वत्तापूर्ण विवेचन के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने बताया की इस व्याख्यानमाला की अगली कड़ी 09 अप्रैल 2022, शनिवार को प्रायोजित है; जिसका विषय है: हिंदी साहित्य की " आदिकाल से भक्तिकाल की यात्रा"। "जागृति" के प्रमुख डॉ. राकेश कुमार ने श्रोताओं को अगली कड़ी के लिए आमंत्रित करते हुए, होली की शुभकामनायें दीं, और कार्यकर्म का समापन किया।
ध्यान दें: यह पूरा कार्यक्रम इस विडिओ पर देखा जा सकता है: https://youtu.be/bDdhypRgwIY
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शाखाओं के कार्यक्रम के रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- वाशिंगटन, डी.सी.शाखा
रिपोर्ट २०२०-२१ |
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| द्वारा-अध्यक्ष डॉ. हरी हर सिंह |
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मैं पिछले दो वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए सतत प्रयत्न कर रहा हूँ। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मैंने स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम कार्यान्वित करवाये। इन कार्यक्रमों में विभिन्न अवस्था एवं शैक्षिक योग्यता के नवयुवकों और नवयुवतियों ने भाग लिये। कार्यक्रमों का उद्देश्य हिन्दी पाठ-पाठन, लेख-लेखन, कविता पाठ, राष्ट्रीय गीत गायन एवं आपसी संवाद का रहा है। इन कार्यक्रमों में उत्तीर्ण हुए सहभागियों को उचित स्तर के प्रमाण पत्रों, तथा अन्य सहभागियों को सहभागिता के प्रमाण पत्रों द्वारा सम्मानित करते हुए उन्हें हिंदी भाषा में सतत आपसी संवद, पाठ-पाठन एवं लिखने के लिए प्रोत्साहित किया गया। सहभागियों के अभिभावकों ने इस तरह के कार्यक्रमों की प्रशंसा करते हुए अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की सराहना किया।
मैंने व्यक्तिगत एवं अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के निदेशक मंडल के सदस्य पद पर कार्य करते हुए पिछले वर्षों से इस दिशा में पूर्ण रूप से सहयोग दिया। अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के वर्तमान अध्यक्ष की अध्यक्षता में प्रति सप्ताह मीटिंग में भाग लिया और हिंदी को द्वितीय भाषा के रूप में शिक्षा देने के लिए कोर्स को विकसित करने में अपना योग दान दिया है।
शिक्षा के अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर हमारे सदस्यों ने कवि सम्मेलनों में भाग लिया, विशेषकर मुख्य कार्यक्रम, हिन्दी दिवस को मनाने और इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों को करने का रहा है। इसके साथ में हम लोगों ने बराबर आपसी बोलचाल एवं दिन प्रतिदिन के कार्यों में यथा संभव हिंदी भाषा को प्रयोग करने का प्रयत्न किया है।
अंततः मेरा समय वर्तमान शाखा के अध्यक्षता का इस वर्ष समाप्त हो रहा है। मैंने एवं हमारे कुछ और सदस्यों ने सतत प्रयत्न कर आगामी अध्यक्ष/अध्यक्षा का मनोनयन करने की भरपूर चेष्टा की है। इसमें हमें सफलता अभी तक नहीं मिली है। अतः मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप इस मनोनयन के लिए मेरी पूर्णरूप से सहायता करें। मैं ३१ दिसम्बर २०२१ के पश्चात अपने अध्यक्षता पद पर काम नहीं करना चाहता हूँ।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा
एक साहित्यिक संध्या साहित्य-रत्न डॉ. हरीश नवल के संग
मार्च ५ , २०२२ |
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प्रस्तुति - डॉ. सुनीता द्विवेदी, ओहायो
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पारम्परिक रूप में व्यंग्य शक्ति-विहीन व्यक्ति का शक्तिशाली व्यक्ति के विरुद्ध सशक्त शस्त्र है!
-मौली आयविंस
व्यंग्यकारों ने अपने व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर कटाक्ष प्रहार करते हुए सामाजिक उत्थान में अपना सदैव योगदान दिया है। व्यंग्य साहित्य की अभिन्न विधा है जो समाज का परिमार्जन करने में बहुत सहायक होती है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अ.हि.स.) की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा को हाल ही में सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, व्यंग्यकार, और पत्रकार डॉ. हरीश नवल जी के व्यंग्य पाठ को सुनने का सुअवसर प्राप्त हुआ। डॉ. नवल जी इन दिनों अमेरिका के प्रवास पर हैं और ये अ.हि.स. की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा का सौभाग्य रहा कि नवल जी ने आभासी पटल पर काव्य पाठ करने का निमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया। शनिवार, ५, मार्च २०२२ की संध्या एक यादगार संध्या बन गई जब कई दर्शक मंत्रमुग्ध हो आभासी पटल पर नवल जी के काव्य पाठ का आनंद उठा पाए। दर्शकों को इस दौरान उन्हें और करीब से जानने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ जब नवल जी ने अपने साहित्यिक जीवन के कई महत्वपूर्ण और रोचक घटनाओं को सभी के साथ साझा किया।
नवल जी स्थापित और सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। इतने सशक्त साहित्यकार का परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। इनकी 30 पुस्तकें, 9 सम्पादित पुस्तकें, और लगभग २००० रचनाएँ देश विदेश के पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं हैं। इन्होंने 50 देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में 41वर्ष प्राध्यापक रहे हैं। इनके हिंदी साहित्य के प्रति असीम योगदान पर लगभग १६ शोधार्थियों ने शोध कर पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की है। डॉ. नवल को युवा ज्ञानपीठ पुरस्कार और भारत सरकार का ‘गोबिंद बल्लभ पंत पुरस्कार सहित 12 राष्ट्रीय और 9 अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। वे इंडिया टुडे, एन डी टी वी, हिंद वार्ता आदि से संबद्धता रखते हैं। सही माने में कहें तो वे हिंदी भाषा के राजदूत हैं। आज की संध्या में उन्होंने अपने साहित्यिक-पुष्पों से कुछ पुष्प चुन सुनाये और सभी दर्शकों को आनंदित किया। नवल जी ने कहा कि हास्य निर्मल आनंददायक हो और व्यंग्य का अंत करुणा में हो - ऐसी हास्य और व्यंग्य में असमानता की सरल परिभाषा ने सभी के दिल को छू लिया।
हमारी संस्कृति में हर कार्य का शुभारम्भ प्रभु वंदना से होता है और डॉ. नवल ने काव्य-संध्या का प्रारम्भ भगवान-तुल्य माता-पिता के लिए लिखी बहुत ही भावुक रचना – ‘बड़े अजब थे, बड़े गजब थे बाबूजी और हुआ करती थी एक अम्मा’ पढ़ कर किया। इस कविता में बच्चों और परिवार के लिया माता-पिता का त्याग, स्नेह, समर्पण और संघर्ष के भावुक चित्रण ने सभी के नेत्रों को सजल कर दिया। फिर उन्होंने ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्जित करने से जुड़ा रोचक प्रसंग सुनाकर सभी को आनंदित कर दिया। उनकी अगली व्यंग्यात्मक रचना – ‘नंदा जी नंदा जी’ एक प्रासंगिक रचना है जो नेताओं और भ्रष्टाचार पर कटाक्ष प्रहार करते हुए इस दुखद सामाजिक व्यवस्था को खुल कर उजागर करती है। चिपके सत्ता के गलियारों में दानव अमृतपान कर रहे, देवता रह गए खारों में सुनाकर नवल जी ने एक बार फिर राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य कसा। काव्य संध्या के इस पड़ाव तक अपने काव्य सुमनों के वाचन से नवल जी ने सम्पूर्ण आभासी सदन में एक अनोखा समाँ बाँध दिया था।
नवल जी गद्य में व्यंग्य लिखने वाले महारथी हैं। इस विधा में उन्होंने एक नई शैली भी निर्मित की है- हाफ लाइनर जो वन लाइनर से थोड़ी छोटी होती है। अपनी अगली प्रस्तुति में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पर लिखा गांधीजी का चश्मा, हाफ लाइनर सुनाया। इस रचना में बहुत ही सरल शब्दों में नवल जी द्वारा गांधीवाद के ह्रास का चित्रण हर सुनने वाले के मानस पटल पर बहुत ही गहरी छाप छोड़ गया। कार्यक्रम को और गति देते हुए उन्होंने एक और दोगले समाज पर पुरजोर कटाक्ष करती व्यंग्यात्मक कविता - हम दोनों सुनाई और समस्त आभासी पटल की वाहवाही लूट ली। व्यंग्य अगर दर्शकों को सोचने के लिए विवश करे, उनके अंतरद्वंद को झकझोर दे, उनकी आँखों के सामने से धुंध हटा दे तो ये व्यंग्यकार की अप्रतिम कला है और ये अद्भुत कला दर्शकों ने नवल जी की अगली कविता – ‘अमेरिकन प्याले में ग्रीन टी’ में अनुभव की।
कार्यक्रम का प्रारम्भ अ.हि.स. उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा की अध्यक्ष श्रीमती किरण खेतान जी के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने विशेष अतिथि डॉ. हरीश नवल जी का पटल पर स्वागत किया। किरण जी विगत 40 वर्षों से हिंदी भाषा को जीवंत, और उन्नत बनाने में जुटी हुईं हैं। उनकी इस सेवा के लिए आने वाली पीढ़ियाँ सदैव उनकी ऋणी रहेंगी।
तद्पश्चात अ.हि.स. उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा की निवर्तमान अध्यक्ष डॉ. शोभा खंडेलवाल ने समिति के दो वर्षों के कार्यकाल की उपलब्धियों के बारे में सभी को अवगत कराया। कोरोना की महामारी के चलते विगत दो वर्ष चुनौतीपूर्ण रहे किन्तु उन्होंने इन विषम परिस्थितियों में भी अपना कार्यकाल सफल बनाया। उनके कुशल नेतृत्व में केवल कई आयोजन हुए, अ.हि.स. का २० वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन समिति के आतिथ्य में सफल आयोजन हुआ। इस अधिवेशन की सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि स्थानीय प्रशासन भी हिंदी प्रचार के लिए इसमें सम्मिलित हुआ। साथ ही उन्होंने अगली कार्यकारिणी समिति को अगले दिशा के बारे में उनके विचारों से अवगत कराया।
भारत से दूर हिंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में जुटीं इस शाखा की मातामही श्रीमती सुशीला मोहनका जी ने अपने आशीर्वचनों से कार्यक्रम को गति दी। उनकी ऊर्जा और हिंदी भाषा के प्रति समर्पित जीवन सभी के लिए अनुकरणीय है। सुशीला मोहनका ने बताया कि दिल्ली में अ.हि.स. की स्थानीय समिति के गठन में नवल जी का बहुत बड़ा योगदान है इनकी सहायता के बिना भारत की राजधानी दिल्ली में अ.हि.स. की स्थानीय समिति का गठन सम्भव नहीं था। उन्होंने हरीश जी से आग्रह किया कि जिस प्रकार अमेरिका में हमारी नयी पीढ़ी को हिन्दी और भारतीय संस्कृति की आवश्यकता है उसी प्रकार भारत में भी युवा पीढ़ी को आवश्यकता है। अ.हि.स. को इस काम में आपका सहयोग चाहिए। नवल जी ने अपना सहयोग देने का वादा किया ।
यह कार्यक्रम ऑनलाइन पटल, धारा यार्ड (stream yard) के माध्यम से सफलतापूर्वक यूट्यूब पर प्रसारित किया गया था, जिसके लिए अ.हि.स. उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा तकनीकी विशेषज्ञ और स्थापित शायर-कवि श्री नरेंदर सिंह “नदीम” जी की आभारी है। काव्य-संध्या का रोचक सञ्चालन वैज्ञानिक, उद्यमी और सशक्त कवि डॉ. तेज पारीक “तेज” ने किया। नवल जी के साथ उनके सजीव संवाद ने कार्यक्रम को अत्यंत आनंदमय बनाया जिसके कारण दर्शकों को नवल जी के विशाल व्यक्तित्व के बारे में जानने का भी अवसर सुलभ हो पाया। नवल जी का व्यक्तित्व निश्चय ही ओजपूर्ण है जो अ.हि.स. उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर गया।
कार्यक्रम का विधिवत समापन अ.हि.स. उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा की उपाध्यक्ष श्रीमती ऋचा माथुर ने विशेष अतिथि समेत सभी को धन्यवाद देकर किया। ये शाखा डॉ. हरीश नवल जी की इस स्वर्णिम संध्या के लिए सदैव उनकी आभारी रहेगी। इस प्रकार के कार्यक्रम तथा अन्य साहित्यिक गतिविधियों के द्वारा हिंदी भाषा के प्रचार, प्रसार के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने का संकल्प लिए अ.हि.स. की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा निरंतर अग्रसर होती रहेगी।
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गुलाब जयंती 2022 समारोह
उत्तरपूर्व ओहायो (२६ फरवरी , २०२२) |
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| स्वर्गीय श्री गुलाब खंडेलवाल |
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| द्वारा- डॉ. सुनीता द्विवेदी, ओहायो |
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किसी ने ठीक ही कहा है कि फूलों का राजा गुलाब है। अनेकों रंगों से समृद्ध ये गुलाब अपनी सुगंध से सभी को आकर्षित करता है। ऐसे ही एक गुलाब क्लीवलैंड शहर सहित समस्त विश्व के हिंदी साहित्य जगत में अपनी सुंदर लेखनी की सुरभि से समस्त साहित्य-प्रेमियों को मोहित कर रहा है। यहाँ बात हो रही है हिंदी साहित्य और काव्य जगत के शिरोमणि स्वर्गीय श्री गुलाब खंडेलवाल जी की जिनके ९८ वाँ जन्मदिन के उपलक्ष्य में हर वर्ष की तरह शनिवार, २६ फरवरी, २०२२ को गुलाब जयंती का आयोजन किया गया। इस आभासी कार्यक्रम को यूट्यूब पर प्रकाशित किया गया था जिसका सञ्चालन आदरणीय खंडेलवाल जी की पुत्रवधु डॉ. शोभा खंडेलवाल ने किया। गुलाब जी ने हिन्दी साहित्य को भक्ति-लेखन, महा-काव्य, गीत, ग़ज़ल, एकांकी एवं अनेक विधाओं से सुशोभित किया और प्रसिद्धि पाई। अमेरिका में क्लीवलैंड शहर को अपनी कर्मभूमि बना कर सही मायने में उन्होंने इस शहर का पुनः नामकरण गुलाबलैंड कर दिया - ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे हिंदी साहित्य की अपार विरासत अपने पीछे छोड़ कर गए हैं जिसकी सही साज-संभाल आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है। उनकी बहुमूल्य साहित्यिक निधि को खंडेलवाल परिवार और विशेषकर शोभा जी ने संजो कर रखा है जिसका समस्त संकलन https://gulabkhandelwal.com/en/ वेबसाइट पर पाठकों के लिए उपलब्ध है। इस वेबसाइट को और समृद्ध बनाने के लिए पाठकों की टिप्पणियों और सुझावों का स्वागत है।
गुलाब-जयंती के अवसर पर कई स्थापित और उभरते स्थानीय तथा प्रवासी कलाकारों तथा गुलाब जी के नाती- पोतियों ने उनके गीतों, कविताओं को प्रस्तुत कर इस उत्सव को उल्लासपूर्ण, सफल और यादगार बनाया। क्लीवलैंड के सुप्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गुरु श्री विश्वनाथ नारायण जी ने अपने सुरीले कंठ से सरस्वती वंदना - “जीवन सफल करो, करूँ आरती, माँ भारती चरण-चरण उतरो” गा कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। फिर श्रीमती सुगाता चटर्जी ने अपनी सुरीली आवाज़ में कितने जीवन कितनी बार पुस्तक से - “सातों सुर बोलेंगे, जब हम वीणा छोड़ यहीं पर तेरे संग हो लेंगे” गीत राग मिक्स भैरवी में गाया। भक्ति गंगा का “नहीं कभी भागूँगा जग से, सब कुछ सहन करूँगा” गीत १२ वर्षीय, संगीत के प्रति विलक्षण प्रतिभा के धनी कृष परीख ने स्वयं धुन तैयार कर सुनाया और सभी को आनंदित किया। गुलाब जी की पर-नतिनी आरोही गुप्ता जो भारत में रहती हैं, उन्हें संगीत में विशेष रूचि है और उन्होंने सब कुछ कृष्णार्पणम पुस्तक से “मैंने तेरी तान सुनी है” गीत पियानो पर स्वयं संगीतबद्ध कर अपनी सुरीली आवाज़ में सुनाया। गुलाब जी की पुस्तक नूपुर बंधे चरण का एक सुंदर गीत - “स्वर वसंत फूटे” को गुलाब जी की दो नतनियों - दिव्या गुप्ता और मुक्ता झालानी ने राग बहार में अपनी सुरीली आवाज़ में सुनाया। गौरतलब है कि दिव्या भारत में हैं और मुक्ता कैलिफ़ोर्निया में और इन दोनों का आभासी पटल में एक साथ गीत गाने का तालमेल अद्भुत और प्रशंसनीय रहा।
कार्यक्रम को गति देते हुए अगली प्रस्तुति खंडेलवाल परिवार के घनिष्ठ मित्र, और संगीत-प्रेमी श्री युगल चावला जी ने की। उन्होंने तिलक करे रघुबीर पुस्तक से “तेरी बिगड़ी कौन बनाए” गीत को सुनाकर सभी दर्शकों को मोहित कर दिया। श्री नारायण जी ने उन्हें हारमोनियम पर संगत दी। इसके बाद क्लीवलैंड-एक्रन की सुप्रसिद्ध और वरिष्ठतम शास्त्रीय संगीतकार श्रीमती वंदना हरियाणी जी ने पुस्तक - नहीं विराम लिया है से एक गीत, “नहीं विराम लिया है” अपने सुरीले स्वरों में सुनाया। महाकवि गुलाब खंडेलवाल जी ने अमेरिका में रहकर हिंदी सृजन और लेखन में अभूतपूर्व भूमिका निभाई। भारत से श्री दीपक पाण्डे ने गुलाब जी के बारे में अपने सुविचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि गुलाब जी के अथक प्रयासों और सृजनशील लेखनी के कारण सुदूर अमेरिका में हिंदी भाषा की समृद्ध परंपरा विद्यमान है।
अगली प्रस्तुति आदरणीय गुलाब जी के सुपुत्री और शास्त्रीय संगीतज्ञ श्रीमती विभा झालानी ने दी। उन्होंने पंखुड़ियाँ गुलाब की पुस्तक से राग गौड़ मल्हार में “हमारा प्यार जी उठता” गीत सुनाया। श्री नारायण जी ने उन्हें हारमोनियम पर संगत दी। विभा जी गुलाब जी की वेबसाइट के रख-रखाव की ज़िम्मेदारी भरपूर तरीके से निभा रहीं हैं। गुलाब जी ने लेखन की विभिन्न विधाओं में काव्य सृजन किये। हिंदी के आलावा, उनका उर्दू और अंग्रेजी भाषा पर भी विशिष्ट अधिकार था। जाने माने उर्दू शायर जनाब अतीक हैदर साहब ने गुलाब जी के सौ गुलाब खिले पुस्तक से दो ग़ज़लों (“दिया भी याद का”, “कभी सिर झुका कर चले गए”) को बहुत ही सुंदरता से सुनाया और गुलाब जी का स्मरण करवा दिया। गुलाब जी की एक और पुस्तक - ग़ज़ल गंगा और उसकी लहरें से एक और सुन्दर ग़ज़ल “साथ हरदम भी, बेनकाब नहीं” को श्री विश्वनाथ नारायण जी ने राग भैरवी में अपनी मधुर आवाज़ दी। कार्यक्रम की यथोचित और अंतिम प्रस्तुति गुलाब जी के नाती डॉ. विवेक खंडेलवाल ने सब कुछ कृष्णार्पणम के भजन “सहज हो प्रभु साधना हमारी” को गिटार पर बजा कर दी। इस भजन को श्री विश्वनाथ नारायण जी और श्रीमती विभा खंडेलवाल ने स्वर दिया और नारायण जी ने हारमोनियम पर संगत भी दी।
कार्यक्रम के सफल आयोजन पर डॉ. शोभा खंडेलवाल की माताश्री और हिंदी-साहित्य के प्रति समर्पित विदुषी श्रीमती सुशीला मोहनका ने सभी दर्शकों, कलाकारों और खंडेलवाल परिवार को धन्यवाद दिया। उन्होंने गुलाब जी के हिंदी प्रेम और हिंदी भाषा के प्रचार के प्रति अपने कर्त्तव्य के बारे में सभी को अवगत कराया। गुलाब जयंती 2022 एक रोचक, भावनात्मक और सफल आयोजन रहा जिसका श्रेय खंडेलवाल परिवार को जाता है। गुलाब जी के काव्य-संग्रह से कुछ अमर गीत इस आयोजन में गाए गए। ये काव्य सुमन गुलाब जी को सच्ची श्रद्धांजलि हैं। उनका नाम हिंदी साहित्य में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है जो आगे आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। कार्यक्रम का औपचारिक समापन डॉ. शोभा खंडेलवाल ने सभी के प्रति आभार प्रकट कर किया। कोरोना की महामारी के चलते चुनौतियों को सुंदर अवसर में बदलने की कला शोभाजी से सीखने लायक है। उन्होंने इन चुनौतिओं से भरे समय में भी गुलाब जयंती समारोह की परंपरा बनाये रखी। शोभा जी ने पुनः आभार प्रकट करते हुए सभी से प्रति वर्ष इस
कार्यक्रम से जुड़ने का अनुरोध भी किया।
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| डॉ. विवेक खंडेलवाल , श्रीमती विभा झालानी, श्री विश्वनाथ नारायण |
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| ♥️ हिंदी मेरी भाषा है ♥️ |
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अंग्रेज़ी का हम पर हो गया असर ।
हिंदी का मुश्किल हो गया सफ़र ।
देसी घी भी आजकल बटर हो गया ।
चाकू भी आजकल नाइफ़ हो गया ।
रसोई घर तो किचन हो गया ।
हिंदी राष्ट्रभाषा को क्या हो गया
छोटे बच्चे अब कीडोज हो गये ।
क्यों हम हिंदी में बेबस हो गए ।
हम हिंदी है,हिंदी का हमसबको हो अभिमान ।
सारी भाषाएँ हैं प्यारी, पर हिंदी हो हमारी जान।
हिंदी ही राज भाषा हमारी ।
हमारी राष्ट्रीयता का है प्रतीक ।
मैं हिंदी हूँ हिंदी भाषा है मुझे अज़ीज़
हिंदी ने मुझको ताक़त दी ।
आगे आने की चाहत दी।
हिंदी बहुत ही मीठी बोली ।
लगे कि इसमें शक्कर घोलीं ।
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| द्वारा -श्रीमती विम्मी जैन |
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श्रीमती विम्मी जैन विगत २५ वर्षों से ओहायो, अमेरिका में अपने परिवार के साथ रह रहीं हैं। बचपन से ही इन्हें हिंदी साहित्य से स्नेह रहा है और बहुत छोटी उम्र से कवितायेँ लिख रहीं हैं। इनकी अनूठी काव्य शैली सरल शब्दों में गहरे भावों को बहुत सुंदरता से पिरो देती है और सुनने वालों को मोहित कर देती है। इन्होंने कई स्थानीय काव्य गोष्ठियों में अपनी रचनाएँ सुना कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। कविता-लेखन के आलावा विम्मी जी का सुरों से भी गहरा संबंध है। वे बहुत सुरीला गातीं हैं और उन्हें नृत्य के प्रति भी लगाव है।
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है मेरी भाषा मेरा ईमान ।
यह भाषा ही मेरी पहचान ।
ऐसी मेरी प्यारी भाषा,मीठी और मन भावन भाषा ।
हर हिंदुस्तानी की शान भी हिंदी
और उसकी पहचान भी हिंदी ।
जन जन की भाषा है हिंदी ।
भारत की आशा है हिंदी ।
जिसने जोड़े रखा देश को
वहीं मज़बूत धागा है हिंदी ।
सारे जहाँ में फैले हिंदी, यह हम सब का अरमान
है ।
सारी भाषाएँ हैं प्यारी
पर हिंदी हमारी जान है, जान है ।
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| होली आई रे |
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ए री सखी! होली आई रे! आई रे! होली आई रे!
वसंत ऋतु में मौसम ने ली है अंगड़ाई रे!
पूर्णिमा की चाँदनी खिली है मस्तानी रे!
प्रकृति माँ ने हरियाली चादर है बिछाई रे!
डाली-डाली फूलों ने खुशबू है फैलाई रे!
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| द्वारा -श्री समीर उपाध्याय |
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श्री समीर उपाध्याय गुजरात, भारत से हैं। पेशे से शिक्षक हैं। इनकी शिक्षा एम.ए.,बी.एड.,एम.फिल.(हिन्दी) है। इन्होने कई काव्य संग्रहों में साझा काम किया है। इनको कई सम्मान भी मिल चुके है। इनकी लिखनी का भविष्य उज्वल है।
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ए री सखी! होली आई रे! आई रे! होली आई रे!
खेतों में गेहूँ की बालियाँ है इठलाई रे!
सरसों के पीले फूलों ने छटा है बिछाई रे!
अमीरस घोलकर कोयल ने कूक है सुनाई रे!
नैनों में सपने संजोकर मैं हो गई मतवाली रे!
ए री सखी! होली आई रे! आई रे! होली आई रे!
कदंब की डाल पर कान्हा ने बंसी है बजाई रे!
मैंने तो झनक-झनक पायलिया है छनकाई रे!
कान्हा ने जोर से पकड़ी है मेरी कलाई रे!
मैं तो लज्जा की मारी मंद-मंद मुस्काई रे!
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ए री सखी! होली आई रे! आई रे! होली आई रे!
रंग भरी-भरी कान्हा ने पिचकारी है उड़ाई रे!
मुठ्ठी भर-भर मुझ पर अबीर-गुलाल है उड़ाई रे!
कान्हा संग आँखियों से अखियां है मिलाई रे!
आज पिया संग मिलन की ऋतु है आई रे!
ए री सखी! होली आई रे! आई रे! होली आई रे!
कान्हा ने चंग, मृदंग और डफली है बजाई रे!
धमार राग में सूर की सरिता है बहाई रे!
मैंने कान्हा संग आज रासलीला है रचाई रे!
पिया मिलन की घड़ियाँ लगती है सुहानी रे!
ए री सखी! होली आई रे! आई रे! होली आई रे!
कान्हा ने प्याली भर-भर भांग है पिलाई रे!
मैंने तो पल भर में सुध-बुध है गंवाई रे!
कान्हा ने मुझ पर जादू की छड़ी है चलाई रे!
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| नारी के रूप |
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नारी तेरे रूप हजार, कैसा तुझ बिन ये संसार।
तू सृष्टि की रचयिता है, तू ही है जग का आधार।
नारी तेरे रूप हजार-नारी तेरे रूप हजार
तू हरिश्चन्द्र की तारा भी, भगवान राम की सीता भी।
तू अहल्या, तू शबरी, तू मन्दोदरी और कैकयी भी।
ममता के आँचल की यशोदा, कान्हा की राधा भी तू।
तू ही कुन्ती और पाँचाली, चीरहरण की साक्षी भी तू।
जहर का पान किया तूने, मीरा बनकर कान्हा की।
बेटा अपना कटवा डाला, बन पन्ना कुँवर की रक्षा की।
कभी पद्मिनी, दुर्गाबाई, कभी हाड़ारानी, जीजाबाई।
पुत्र बाँध लड़ी फिरंगी से, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई।
बिस्मिल, सुभाष, आजाद, भगत की, माता का गौरव भी तू।
भारत के रणबाँकुरों की, शक्ति और भक्ति भी तू।
तू ज्ञान की कल्पना चावला, उर्जा की स्रोत साक्षी मलिक है।
तू डॉक्टर और चीफ इंजीनियर, जहाज उड़ाती पायलट भी है।
तू चंदा की शीतलता, शोलों की अग्नि भी तू।
लज्जा का गहना पहने, क्षमा-संयम की मूरत तू।
तू कवि की कविता है, लेखक की लेखनी भी तू।
सदाचार की अनुभूति है, पश्चिम की आँधी भी तू।
तेरा रुप है लक्ष्मी का फिर, मर्यादा क्यों यह भुलादी।
नैतिक-मूल्यों की कीमत पर, क्यों चाहती है आजादी।
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| द्वारा - डॉ उमेश प्रताप |
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साहित्यकार डॉ उमेश प्रताप वत्स हिन्दी प्राध्यापक हैं। शिक्षा विभाग हरियाणा में एनसीसी ऑफिसर (कैप्टन) हैं। इन्होंने हिन्दी में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। कविता, कहानी, लघुकथा, बाल कविता, आलेख आदि लिखते हैं। ये यमुनानगर, हरियाणा से हैं।
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तेरे कारज पर निर्भर, परिवारों के स्तम्भ खड़े।
तू चाहे गिरादे इनको, वरना तूफाँ में भी अड़े।
तू सुनार है तू लौहार है, तू विश्वकर्मा और कुम्हार है।
माटी के कच्चे कुम्भों की, तू कर्णधार व सिपहसालार है।
तू भोग विलास की चीज नहीं, शीशों में जड़ी तस्वीर नहीं।
तेरे हाथ में भाग्य देश का, शयनकक्ष की तकदीर नहीं।
अबला नहीं तू सबला है, हाथों की कठपुतली नहीं।
बेचारी नहीं तू शक्ति है, कायरता की तू बलि नहीं।
भौतिकता की दौड़ में, तू बार-बार पथ से भटकी।
झूठी शान दिखाने को, मझधार में नैया अटकी।
तुझ पर जो भी कलंक लगे है, गंगा-जल से धो देना।
सत्य-धर्म की खेती पर, बीजों को फिर से बो देना।
तेरी सिञ्चन शक्ति से, लहरायेंगी मूल्यों की फसलें।
मानवता फिर जागृत होगी, जन-जन का भाग्य बदले।
भ्रमित मन को समझाकर, आगे कदम बढ़ा देना।
अपने सतीत्व की गरिमा से, फिर से इतिहास दोहरा।
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| द्वारा - डॉ. अर्चना श्रीवास्तव |
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डॉ. अर्चना श्रीवास्तव लखनऊ, भारत से हैं। पी. जी. महाविद्यालयों में १० वर्ष तक सहायक प्रोफेसर और १८ वर्षों तक प्राचार्य के पद पर प्रशासनिक कार्य किया है।
पत्रिका संपादन- ‘ग्राम्या’ वार्षिक पत्रिका का १० वर्षों तक व ‘आमुख’ वार्षिक पत्रिका का ७ वर्षों तक संपादन किया है। इनके लेख अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। ‘थाती’ नामक एक कहानी संग्रह प्रकाशित है। ‘आखों’ पर ६ कवितायेँ चित्र सहित नीचे दी जा रही है, इन कवितायों को देखकर प्रातः स्मरणीय महादेवी वर्मा की ‘यामा’ की याद आ रही है।
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बहुत देर तक बरसती रही आंखे।
जब फ़ुर्सत मिली, खुद से बात करने की। |
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द्वारा- डॉ श्री हरिप्रकाश राठी
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डॉ श्री हरिप्रकाश राठी जोधपुर , राजस्थान से हैं। इस कहानी में उन्होंने मनुष्य के साथ-साथ जानवरों और प्रकृति की भावनाओं को भी बहुत ही अच्छी तरह व्यक्त किया है|
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चाँद आसमान को दो-तिहाई से ऊपर पार कर थकी-सी जम्हाई ले रहा था।
चाँदनी की महीन चादर ओढ़े थार के टिब्बे मीलों पसरे पड़े थे। भोर का तारा अंधेरे दरवाजे के पीछे खड़ा बाहर निकलने का मौका तक रहा था। पूरा भैरवगढ़ गाँव, ढोर एवं पेड़-पौधे सभी निशादेवी की गोद में निश्चिंत पड़े थे।
तभी झाड़ पर बैठे कुछ बूढ़े मोरों ने जोर से कूक कर ढलती रात की सूचना दी। बुजुर्गों का अनुसरण करते हुए एक के बाद एक कई युवा मोर बोल उठे....पि.....आ.....ओ।
परदेस गये प्रियतम की विरहिणी की छाती में मानो कटार-सी लगी। घुटनों को ऊपर कर उसने तकिये को छाती से दबाया एवं मन ही मन मोरों को कोसा , कलमुंहे! यह भी कोई कूकने का समय है। क्या तुम्हें इतना भी होश नहीं कि अभी वो परदेस में हैं !
आशंकित नवब्याहे अल्हड़ युवकों ने अपनी प्रेयसियों को खींचकर अपने कठोर बाहुपाश में जकड़ लिया, न जाने कब इनकी नींद खुल जाये और घड़े उठाकर तालाब की ओर चलती बने। उनके विशाल नितंबों को अपने पाँव-पाश में बांधकर अधखुली आँखों से उन्होंने उनके पीन पयोधरों के मंगला दर्शन किये, फिर वहीं सर रखकर सो गये। यौवन लावण्य का सार है। प्रियतम की प्रेमभरी मुस्कान, रसमयी चितवन, रतनारे मादक नैन, भौहों के इशारे, कामातुर हाव-भाव एवं अमृत-सी मीठी वाणी ही प्रेमियों की सम्पत्ति है। भला कौन युवक इन्हें यूँ छोड़ देगा?
युवतियाँ कुछ देर चुपचाप उनके प्रेमपाश में बंधी रही वरन् और नजदीक होकर उनसे ऐसे लिपट गयी जैसे लतायें शाखाओं से चिपक जाती है। जब मर्द निश्चिंत हो गये तो एक-एक कर उनके बाहुपाश के नीचे से सरक कर चलती बनी। मूर्ख मर्द भला चतुर नारियों को कब पहचान पाये हैं ?
भंवरी के ब्याह को पन्द्रह दिन से ऊपर होने को आए। नई नौ दिन की। दस दिन बाद ही सास ने हिदायत दे दी थी, ‘अब गठिया के मारे मेरे पाँव नहीं चलते और तालाब भी ढाई कोस पर है। कल से तू ही पानी लाना।’ गत तीन रोज से लगातार वही पानी भरकर ला रही थी। वह तो भगवान का शुक्र है,उसके साथ ही ब्याह कर आई उसके गाँव की नाथी भी साथ पानी भरने जाती थी वरना अकेले इतना लम्बा रास्ता पार करते जान निकल जाये। नाथी से वह मन की बात तो कह सकती है।
भंवरी ने एक हाथ लम्बा घूंघट निकाला, सर पर ईडाणी रखी, फिर एक-एक कर तीन घड़े सर पर रखकर बाहर आई तो नाथी सामने ही खड़ी थी। उसी की तरह लंबा घूंघट निकाले एवं सर पर तीन घड़े रखे वह भंवरी का इंतजार कर रही थी। कल ही उसने नाथी को समझा दिया था,‘मेरा दरवाजा नहीं खटखटाना,बुढ़िया टोके बिना नहीं रहेगी,एक नाथी है जिसे घर की इतनी चिंता है और एक तू बेशरम मर्द को पकड़े पड़ी रहती है। ’
दोनों ने तालाब की राह ली।
अकाल का लगातार चौथा साल था। अब धरती भी फटने लगी थी। वनस्पति,पेड़-पौधे सभी ठूंठ खड़े ऐसे लगते थे मानो मात्र चन्द्र किरणें पीकर जीने वाले वैरागी हों। कितने ही ढोर मर गये थे एवं कितनों ही की हड्डियां निकल आयी थी। थनों से अब दूध की बजाय खून टपकता था। गाँव के बाहर पशुओं के कंकाल इस तरह बिखरे पड़े थे मानो यम गाँव में आ बसा हो। आषाढ़ पूरा होने को आया पर पानी की एक बूंद भी नहीं बरसी। किसान आँखें फाड़े बादलों को तकते रहते, पर मेह भरे मेघ न जाने कहाँ छुपे पड़े थे। गाँव वालों ने जो बन पड़ा,किया। पण्डितों से यज्ञ करवाये, भोपों से झाड़े लगवाये,देवी-देवताओं को बलि दी पर मेघ अब भी रूठे थे। वह तो ईश्वर का शुक्र है कि थार में रातें ठण्डी होती है वरना सूर्यदेव तो दिनभर आँखें फाड़े अंगारे बरसाने पर आमदा थे।
इस बार ज्योतिषियों ने मूसलाधार मेह की भविष्यवाणी की तो किसानों की पथरायी आँखें चमक उठी। आशा उत्साह की जननी है। सभी ने अपने खेत,हल-बैल तैयार कर लिये। सभी के हृदय से एक ही पुकार उठ रही थी,‘प्रभु! इस बार मेघ जम कर बरसे।’ बूढ़ी औरतें गीत गाकर मेघों को लुभाती ’ मेह बाबो आजा दूध रोटी खाजा’ यानि हे मेघ! हमारे गाँव से होकर गुजरो,तुम्हें खीर में भिगोकर रोटी खिलायेंगे।
भंवरी और नाथी सरपट तालाब की ओर चली जा रही थी। नववधुओं की रसभरी बातों में भला कौनसे रास्ते लम्बे होते हैं। दोनों एक-सी पौशाकें पहनी थी। दोनों का शृंगार भी एक-सा था। कमर पर कांचली,नीचे घाघरा,सर पर महीन ओढ़नी,पूरे हाथों को ढकता हुआ सफेद चूड़ा, माथे पर चांदी का बोर एवं पाँव में चांदी के कड़े। तेज श्वास के चलते दोनों के उद्दण्ड वक्ष कांचली में नहीं समाते थे। दोनों एक दूसरे को छेड़ती-इठलाती,हँसती-मुस्कुराती आगे बढ़ रही थी। पूरे रास्ते चांदनी बिछी थी। कहीं-कहीं मोड़ पर आवारा अंधेरा आँख चुराकर उन्हें देखने का प्रयास करता तो दोनों अपनी प्रथम दो अंगुलियों से घूंघट उठाकर रास्ता खोज लेती। युवतियों की अंग-कांति ही दिशाओं का अंधकार हर लेती। तब अंधेरा खिसियाकर रह जाता। दोनों की तेज चाल के साथ ऊपर नीचे होते वक्ष उनकी क्षीण कमर को भार के मारे विकल कर देते,अगर ऊँचे नितम्ब सहारा नहीं देते तो न जाने कमर की क्या दुर्गत होती ?
भंवरी नाथी से कुछ अधिक सयानी एवं चतुर थी। हँसकर नाथी से बोली,‘बापू ने मर्द तो बांका ढूंढा,पर गाँव ऐसा देखा कि पानी लाते-लाते कमर टूट जायेगी।’
‘हाँ! आधी कमर तो रात में टूट जाती है बाकी पानी लाते-लाते टूट जायेगी।’ नाथी ने ऊपर के होठ से नीचे का होठ काटकर शरारत की। उसकी रतनारी आँखों में पिया प्रेम की मदिरा के प्याले छलक रहे थे।
‘चल बावरी ! तुम्हें शरम नहीं आती ऐसी बातें करते हुए !’ भंवरी मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोली।
‘अरे, अब कौनसी शरम। शरम तो सारी मरद पी गया। यह तो वही बात हुई कि नटिनी बाँस पर चढ़कर घूंघट निकाले !’ नाथी ने यह कहकर अर्थपूर्ण आँखों से भंवरी की ओर देखा।
दोनों सखियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ी।
हँसते-हँसते भंवरी चीखी, ‘ऊई नाथी! मेरी कांचली खुल गयी। दोनों वहीं रुकी। अपने घड़े उतारे। नाथी ने कसकर भंवरी की काँचली को बांधा। घड़े उठाते-उठाते नाथी ने तीर डाल ही दिया, ‘काँचली रात अच्छी तरह से नहीं बांधी थी क्या ?’
‘क्या करूं, मेरा तो हाथ नहीं पहुंचता और उस अनाड़ी को बांधना नहीं आता।’ भंवरी की आँखों में लाल डोरे तैरने लगे थे।
दोनों एक बार फिर खिलखिलाकर हँस पड़ी।
रास्ता यूँ कट गया। सामने ही तालाब था। दोनों ने घड़े वहीं रखे, नीम से दातुन किया, अपने वस्त्र उतारे एवं पानी में नहाने लगी। तालाब पर अब भी चांदनी बिछी थी। भोर का अल्हड़ तारा इस दृश्य को चोर आंखों से कब तक देखता ? अंधेरे दरवाजे को खोलकर वह भी बाहर आ गया। कामातुर आँखों से कुछ देर उसने इस दृश्य को निहारा तो उसकी आँखों की चमक बढ गयी। आनन्द के उल्लास से वह और तेज चमकने लगा।
नाथी और भंवरी दोनों ने स्नान कर वस्त्र पहने। एक-एक कर तीनों घड़े पानी से भर कर सर पर रखे एवं वापस गाँव की राह ली। सर पर बढे़ भार से सारी रसभरी बातें विलुप्त हो गई। अब तो बस किसी तरह घर पहुंचें एवं बोझ उतारें। अब रास्ता लम्बा लगने लगा। कुछ दूर चले ही थे कि दोनों की श्वासें चढ़ने लगी। एकाएक भंवरी को याद आया कि गाँव पहुंचने का एक और रास्ता है। उस रास्ते से गाँव कुछ कोस भर कम पड़ता है लेकिन रास्ते में जंगल है। उसने नाथी को यह बात बतायी। नाथी भी बोझ के मारे बेहाल थी, छोटे रास्ते का लोभ संवरण नहीं कर पायी।
‘अब कौन सा जंगल पड़ा है। सब कुछ तो सूख गया है।’ नाथी हाँफते हुए बोली।
दोनों आज नये रास्ते पर चल पड़ी।
कोई आधा कोस चले होंगे कि सामने एक दृश्य देखकर भँवरी की चीख निकल गयी।
‘उई माँ! यहाँ तो हिरण-हिरणी मरे पड़े हैं। ये तो कृष्णसार मृग दिखते हैं !’
दोनों वहीं ठिठक गई।
पास में एक छोटा-सा गड्ढा था जिसमें पानी भरा पड़ा था।
नाथी गहरे सोच में पड़ गई। ये दोनों मरे कैसे ? विस्मय से उसने अपनी सखी भँवरी से यूँ पूछा,
खड्यो न दीखै पारधी,
ल्रग्यो न दीखै बाण।
मैं थनै पूछूं ऐ सखी,
किण विध तज्या पिराण।।
(अर्थात् न तो यहाँ आस-पास शिकारी दिखता है, न इनके बाण लगा है, प्यास से ये मर नहीं सकते, क्योंकि पानी पास में ही पड़ा है। फिर ये मरे कैसे?)
अपनी प्रिय सखी के मर्म भरे इस प्रश्न का चतुर भँवरी शीघ्र उत्तर ताड़ गयी। तब उसने उनके मरने की कहानी यूँ समझायी।
भाग-2
इसी जंगल में कृष्णसार जाति का एक हिरण एवं हिरणी का जोड़ा रहता था। दोनों के हृदय में एक दूसरे के प्रति अनन्य प्रेम था। हिरण का नाम कृष्णा एवं हिरणी का राधा था। दोनों हमेशा साथ-साथ रहते, एक साथ घास चरते और साथ ही पोखर पर पानी पीने जाते। कृष्णा कुछ पल भी इधर-उधर होता तो राधा विकल हो जाती। यही हाल कृष्णा का राधा के बिना होता। दोनों की जान एक दूसरे में बसती थी ।
दोनों एक दूसरे को हृदय से समर्पित थे। दोनों का अविचल और अटल-प्रेम जंगल भर में मशहूर था।
एक दिन चाँदनी रात में दोनों एक दूसरे से बतिया रहे थे। जंगल के पेड़-पौधों से छन-छन कर आ रही चाँदनी मानो अमृत कलश उँडेल रही थी। जंगल में बह रही ठंडी बयार दोनों के मन को ताज़गी से भर रही थी। प्रकृति ही जब काम-उद्दीपन पर तुली हो तो किसकी क्या बिसात ? काम मानो सारी मर्यादाओं का हरण करने पर आमादा था।
कृष्णा राधा को अपने सींगों से खुजाने लगा। प्रेम पुलकित राधा उस स्पर्श सुख का आनंद लेते हुए चुप बैठी थी। बहुत देर यूं ही मूक प्रेमालाप होता रहा। अंततः राधा संकोच-मिश्रित अभिलाषा से अपने प्रियतम को निहारने लगी। कृष्णा मानो उसके प्राण, मन और आत्मा का अपहरण कर रहा था। राधा की विकल दशा देख कृष्णा ने प्रेम-पगी आँखों से उसे निहारा। यूँ निहारते-निहारते ही दोनों विदेह हो गये। दोनों का प्रेम कब तुरिय तत्व को छू गया, पता ही नहीं चला। बाद में थके हारे दोनों ने तालाब में आकर जल-क्रीड़ा की।
अभी वे जल-क्रीड़ा कर बाहर आये ही थे कि दोनों घास में छुपे एक शेर को देखकर सहम गये। राधा डर के मारे थर-थर काँपने लगी। तभी शेर जोर से दहाड़ा। कृष्णा जानता था कि वह शेर के हाथ हरगिज नहीं आयेगा। उसे अपनी दौड़ पर पूरा भरोसा था पर राधा डर के मारे वहीं ठिठक गयी। उसके पाँव धरती से चिपक गये, इंद्रियाँ जड़वत् हो गयी। तभी शेर दहाड़ मारते हुए राधा की ओर बढ़ा। आज कृष्णा के प्रेम की परीक्षा थी। वह चाहता तो आराम से भाग कर अपनी जान बचा सकता था पर राधा को अकेले इस हालत में छोड़कर कैसे भाग सकता था ? आज उसने अपनी प्रेयसी के साथ ही मरने का निश्चय कर लिया। मैं मर्द हूँ, राधा की रक्षा मेरा धर्म है-पहले मैं मरूँगा। शेर के आगे बढ़ते ही कृष्णा ने साहस कर शेर के मुँह पर जोर से सींग मारे। संयोगवश एक सींग शेर की आँख में घुस गया। एक आँख फूटते ही शेर जोर से चीखा तभी राधा ने देखते-ही-देखते अपने सींग शेर की दूसरी आँख पर मारे। पलभर को मानो शेर अँधा हो गया। वह पंजा मारता तब तक दोनों भाग खड़े हुए।
दोनों तेजी से भागे जा रहे थे। जंगल में बहुत दूर पहाड़ी के नीचे एक छोटी-सी कंदरा थी। दोनों उसी में घुस गये। हाँफते-हाँफते दोनों की साँस फूल रही थी। निढाल होकर दोनों वहीं बैठ गये। साँस थमी तो राधा ने कहा, ‘आज तुम हिम्मत कर शेर की आँख में सींग नहीं मारते तो मैं मर ही जाती।’
‘ऐसा न बोल राधा! कृष्णा प्राण रहते तुम्हें पहले नहीं मरने देगा। वह जीवन ही क्या जिसमें राधा न हो। तुम्हारे बिना तुम्हारी याद में रोते-रोते मैं यूँ ही मर जाता। फिर तुमने भी तो अपने सींग मारकर मेरी जान बचायी है।’
‘तुम तो अकारण ही इतना यश देते हो। आज दूसरा मर्द होता तो भाग खड़ा होता। सब अपनी जान पहले बचाते हैं।’
‘मेरी जान तो तुम हो राधा ! मेरा तो श्वास-श्वास, रोम-रोम तुम्हारा है। भगवान करे पहले मैं मरूँ ताकि मुझे तुम्हारा विरह न देखना पड़े।’
उस दिन के पश्चात् दोनों का प्रेम दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा।
एक बार दोनों पहाड़ी की चोटी पर हरी घास चर रहे थे कि राधा को दूर एक चीता दिखा। उसने तुरन्त कृष्णा को इशारा किया, दोनों ने ऐसी दौड़ लगाई कि चीता जाने कहाँ छूट गया। उस रात दोनों उदास बैठे भगवान को कोस रहे थे। कृष्णा चुप्पी तोड़कर बोला, ‘भगवान ने हमारी जाति को यूँ मरने के लिए ही पैदा किया है क्या ? भगवान के घर भी कैसा अंधेर है ? हम किसी को नहीं मारते पर जिसे देखो हमारी जान के पीछे पड़ा रहता है। जंगल में कोई ऐसा जानवर नहीं जिसे हमारी तलाश न हो। कभी शेर तो कभी चीता, तो कभी दूसरे हिंसक जानवर, यहाँ तक कि आदमी भी धनुष-बाण अथवा बंदूक लिये हमें ढूँढता रहता है। यूँ डर-डर कर कब तक जियें। जंगल में निकलते हैं तो अगले पल का भी भरोसा नहीं होता।’
‘सही कहते हो कृष्णा! जंगल के सभी हिंसक प्राणी तो अपनी रक्षा कर लेते है पर हमें भगवान ने इतने तेज पंजे और बल नहीं दिया, अन्यथा हम भी अपनी रक्षा कर लेते। जंगल राज में अहिंसा का कोई मूल्य नहीं।’
‘यहाँ तो जो जितना हिंसक है, वह उतना ही जीता है।’ कृष्णा गहरी साँस भर कर बोला।
यूँ दुख बाँटते-बाँटते दोनों जाने कब सो गये।
साल-दर-साल बीतते गये। पिछले तीन वर्षों में जितनी गर्मी पड़ी उतनी तो कभी नहीं पड़ी। जंगल में एक-एक कर जानवर मर रहे थे। दुर्भिक्ष काल बनकर जंगल पर छाया हुआ था। पेड़ ठूंठ हो गये,घास ढूंढे नहीं मिलती। सारे पोखर सूख गये। जानवर दिन भर इधर-उधर तकते,बस जैसे-तैसे गुजर होता। सभी जानवर आदमियों की बस्ती के पास आकर चुपके से अपनी प्यास बुझाते।
इन्हीं दिनों एक बार कृष्णा और राधा प्यास के मारे बेहाल हो गए। जंगल छान मारा पर पानी कहाँ था। गाँवों की बस्तियों में जाते तो शिकारी मार देते। पर आज तो वैसे ही मरण था। हताश दोनों गाँव की ओर आए तो उन्हें एक छोटे गड्ढे में पानी दिखा। पानी इतना भर था कि दोनों में से एक अपनी प्यास बुझा सकता था।
दोनों गड्ढे के पास आकर ठिठक गये। आज फिर दोनों की प्रेम परीक्षा थी। राधा ने कृष्णा से कहा, ‘कृष्णा! यह पानी तुम पी लो, तुम सुबह से प्यासे हो।’
‘नहीं राधा! पहले तुम। जब तक तुम प्यासी हो, मैं पहले कैसे पी सकता हूँ !’
‘तुम्हें मेरी कसम है !’ राधा आग्रह भरी आँखों से देखकर बोली।
‘तुम्हें भी मेरी कसम है !’ कृष्णा ने उसी आग्रह से उत्तर दिया।
दोनों कई देर खड़े एक-दूसरे की मनुहार करते रहे। पानी के मारे होठ और अंतड़ियाँ सूख रही थी पर कोई भी पहले पानी पीने को तैयार नहीं था। प्राणों पर बन आयी थी, प्राणरक्षक पानी सामने था पर प्रेम के अधीन दोनों एक-दूसरे की मनुहार किये जा रहे थे। प्रेम की घड़ियाँ तो जीवन में कितनी ही बार आयी पर आज त्याग की घड़ी थी। त्याग की पराकाष्ठा ही तो प्रेम है। एक-दूसरे की मनुहार करते दोनों परम दिव्य भाव में स्थित हो गये।
भाग-3
तब चतुर भँवरी ने यह कहकर नाथी के मर्म भरे प्रश्न का उत्तर दिया -
जळ थोड़ो नेहो घणो,
लग्यो प्रीत रो बाण।
तूं पी तूं पी कैवतां,
दोनों तज्या पिराण।।’
अर्थात् जल कम था और नेह अधिक। दोनों ने तू पी.....तू पी कहते-कहते प्राण त्याग दिये।
कहानी कहते-सुनते बहुत समय हो चुका था। सूर्य अब ऊपर चढ़ आया था। दोनों गाँव में पहुँचकर अपनी-अपनी फूस की झोंपड़ियों में घुसीं।
भँवरी की सास की आँखों से अंगारे बरसने लगे थे। देखते ही बोली,‘अरे करमजली! घर में बूंद भर पानी नहीं हैं,तूने तो अपनी प्यास रास्ते में बुझा ली होगी। सास के मरने की राह देख रही थी क्या ?
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श्री रमेश जोशी जी २००२ से भारत सरकार के केन्द्रीय विद्यालय संगठन से सेवानिवृत हैं। विगत २०-२१ वर्षों से अमरीका आते रहे हैं। तभी से उनका परिचय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए. के पदाधिकारियों से हुआ। पिछले ग्यारह वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए. की त्रैमासिक पत्रिका 'विश्वा' के प्रधान सम्पादक हैं। इनके कार्यभार संभालने के बाद से विश्वा का प्रकाशन लगातार यथासमय हो रहा है। किशोरावस्था से ही लेखन शुरू हुआ जो आज भी अनवरत जारी है। व्यंग्य विधा में २०-२५ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सत्र २०२२-२३ के लिए अ.हि.स. के निदेशक मंडल के सदस्य हैं।
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जैसे ही तोताराम आया, हमने उसे कोई मौका नहीं दिया और कहा- तोताराम, दिनकर जी की कुछ पंक्तियाँ सुना।
बोला- सुना दे। यदि तेरी होती तो चाय के साथ नाश्ते के बिना नहीं सुनता. आजकल चुनावों का सीज़न है। कहीं भी चला जाऊँगा. उत्तर प्रदेश में तो अब सड़ा हुआ ही सही, पांच किलो अनाज के साथ ५०० रुपए भी मिल रहे हैं. 'यू. पी. में का बा' और 'यू.पी. में सब बा' के कविता युद्ध से चुनाव प्रचार हो रहा है, कहीं न कहीं तुकबंदी करके भी कमाई की जा सकती है।
हमने कहा-
शान्ति नहीं तब तक; जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो।
बोला- तो इस सत्य से किसे इनकार है। लेकिन कांग्रेस का ७० साल का किया हुआ बिगाड़ा एक दिन में थोड़े ही ठीक होगा। कोशिश तो कर रहे हैं। आज ही मोदी जी ने हैदराबाद के पास 'समता की मूर्ति' का उद्घाटन किया है।
हमने कहा- लेकिन वह तो एक हजार वर्ष पहले हुए संत रामानुजाचार्य की मूर्ति है जो छुआछूत और भेदभाव को नहीं मानते थे और कहते थे- यदि सब के सुख के लिए मुझे नरक में जाना पड़े तो मैं तैयार हूँ। समता कानून और सुशासन से आती है। हर समय हिन्दू मुसलमान, मंदिर मस्जिद करने से नहीं आती। क्या संविधान में न्याय, समता, सुरक्षा और मानवीय गरिमा का संकल्प नहीं है ? उसमें तो श्रद्धा है नहीं। सामान्य न्याय तक में खयानत। कोई मुसलमान अपनी योग्यता से संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में सफल हो जाए तो वह देशभक्तों को 'यूपीएससी जिहाद' लगने लग जाता है।
बोला- फिर भी मूर्तियों से प्रेरणा तो मिलती ही है।
हमने कहा- लेकिन इनके नामकरण तो देख। कितने अकलात्मक हैं। इससे बेहतर तो 'अ' से अनार और 'आ' से आम ही होते हैं। खाने को न मिले पर कम से कम कुछ सीखने को तो मिलता है। अरे, खुद में अक्ल नहीं तो दिल्ली में आज़ादी के बाद बने हुए स्मारकों से ही कुछ सीख लेते।
दिल्ली में गाँधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव, जगजीवन राम, चरण सिंह आदि के स्मारक है लेकिन कहीं कोई मूर्ति नहीं है। सब कुछ प्रतीकात्मक है। भाव वाचक संज्ञाएँ प्रतीकात्मक ही होती हैं। क्या एकता का भाव पटेल की मूर्ति की बजाय 'दो मिले हुए हाथों' या 'बंधी हुई मुट्ठी' से अधिक कलात्मक रूप से स्पष्ट नहीं होता ?
अमरीका में भी ट्विन टावर के स्मारक में कोई मूर्ति नहीं है। काले संगमरमर का एक गड्ढा सा है जिसके चारों ओर की दीवार पर सभी मृतकों के नाम लिखे है, चारों तरफ पेड़ हैं और उस गड्ढे में पानी का एक झरना सा निरंतर सब तरफ से गिरता रहता है। बहुत शालीन लगता है।
बोला- लेकिन नेहरू ने पटेल को उचित सम्मान नहीं दिया तो हमें तो उस राष्ट्रीय शर्म का कुछ इलाज़ करना ही था। जैसे नेहरू ने सुभाष को उचित स्थान नहीं दिया तो इंदिरा द्वारा बनवाए गए 'अमर जवान ज्योति' को 'समर स्मारक' में विलीन करवाने का एक न्यायपूर्ण राष्ट्रीय कार्य करना ही पड़ा।
हमने कहा- तो क्या पटेल की मूर्ति के बाद 'एकता' आ गई ? क्या रामानुजाचार्य की मूर्ति के बाद समता आ जायेगी और क्या सुभाष की मूर्ति से देश शौर्यवान हो जाएगा। अब तक तो 'एकता' के स्थान पर 'हिन्दू मुसलमान' हो रहा है, 'समता' के नाम पर गरीब का जीना मुश्किल हो रहा है और दो-चार लोगों की संपत्ति बढ़ रही है तथा शौर्य के नाम पर जय श्री राम बुलवाने के लिए लोगों की पिटाई की जा रही है। उधर मर्यादा पुरुषोत्तम राम मंदिर बन रहा है और इधर सभी मर्यादाओं का उल्लंघन हो रहा है।
बोला- देखो, सद्धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे होता है लेकिन पक्का होता है जैसे आदमी भूखे रहकर भी मन्दिर मस्जिद के लिए चंदा और जान दोनों देने के लिए तैयार हो जाता है। अब हम सभी सद्गुणों के विकास के लिए मूर्तियाँ लगावायेंगे जैसे एकता के लिए (पटेल), मर्यादा के लिए (राम) समता के लिए (रामानुजाचार्य) लगवाईं हैं।
हमने कहा- तो फिर हमारा सुझाव है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अमित शाह जी, विकास के लिए मोदी जी, करुणा के लिए योगी जी, सुव्यवस्था के लिए अजय टेनी, सामाजिक सद्भाव के लिए अनुराग ठाकुर, अल्पसंख्यक कल्याण के लिए यति नरसिंहानंद, गांधीवादी विचारधारा के प्रसार के लिए कालीचरण और प्रज्ञा ठाकुर की मूर्तियाँ लगवानी चाहियें।
बोला- यह सब तो मेरे हाथ में नहीं है। हाँ यदि 'संवाद' या 'चाय पर चर्चा' की कोई मूर्ति की बात हो अपनी 'बरामदा संसद' का नाम सुझाया जा सकता है।
हमने कहा- तोताराम, हम समता की मूर्ति के सन्दर्भ में एक बात कहना चाहते हैं। पता नहीं, लोग किस स्पिरिट में लेंगे लेकिन है सच। सोमनाथ मंदिर के शिलान्यास में नेहरू जी इसलिए नहीं गए कि हम हिन्दू राष्ट्र नहीं हैं लेकिन राजेंद्र बाबू गए। जब राम मंदिर का शिला पूजन हुआ तब मोदी जी थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख थे, योगी जी थे, आनंदी बेन पटेल थीं, अशोक सिंघल के बेटे थे लेकिन २ से २०० पहुँचाने वाले, राम-रथ के सूत्रधार अडवानी जी और पांच लाख का चंदा देने वाले, भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद नहीं थे ? और आज छुआछूत मिटाने, मंदिरों में सबके प्रवेश की वकालत करने वाले रामानुजाचार्य की मूर्ति के लोकार्पण पर भी रामनाथ जी को न बुलाने में किस समता का संकेत है ?
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| " मीराबाई की प्रासंगिकता और महात्मा गांधी" |
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द्वारा- डॉ कमल किशोर गोयनका
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डॉ कमल किशोर गोयनका हिंदी के जाने-माने विद्वान और लेखक को वर्ष 2014 के प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ के लिए चुना गया था। उन्हें इस पुरस्कार के लिए उनके शोध कार्य 'प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन' के लिए चुना गया है। व्यास सम्मान यह पुरस्कार ‘के.के. बिड़ला फाउंडेशन’ द्वारा स्थापित किया गया है। यह 1991 में शुरू किया गया था। महिला दिवस के विशेष अवसर पर यह लेख विशेष प्रासंगिक लग रहा है। मध्यकाल में राजस्थान के राज घराने से निकल कर ईश्वर भक्ति में लीन जन साधारण के बीच जाना यह अपने आप में बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था।
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मीराबाई की प्रासंगिकता और महात्मा गांधी
मीराबाई भक्ति काल की सर्वोत्कृष्ट भक्त कवयित्री थीं। भक्ति काल में गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, कबीर और जायसी जैसे महान कवि उत्पन्न हुए। इन महान कवियों में मीराबाई भी अपने वैशिष्ट्य के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, बल्कि यदि यह कहा जाए कि वे अपने प्रकार की अकेली कवयित्री हैं तो अतिशयोक्ति न होगी। वे केवल कवयित्री नहीं थें बल्कि ऐसी भक्त कवयित्री थीं जिनका उदाहरण मिलना दुर्लभ है। वे ऐसे समय में जन्मी थी जब देश में भक्ति आंदोलन चल रहा था और यदि ग्रियर्सन के शब्दों में कहें तो यह धार्मिक आंदोलन तब तक का सबसे विशालतम आंदोलन था जो बौद्ध आंदोलन से भी विशाल था, क्योंकि उसका प्रभाव आज तक विद्यमान है। ग्रियर्सन कहते हैं कि अब धर्म ज्ञान का नहीं बल्कि भावावेश का विषय था और हम यहाँ ऐसे रहस्यवाद और प्रेमोल्लास के देश में आते हैं और ऐसी आत्माओं का साक्षात्कार करते हैं जो काशी के दिग्गज पंडितों की जाति के नहीं थे। मीरा क्षत्रिय कुल में जन्मी थीं और राजरानी थीं और वे आरंभ से ही भगवान कृष्ण की उपासिका थीं। मीरा ने विवाह तो किया परंतु लौकिक पति को पति नहीं माना। उन्होंने ईश्वर-रुप कृष्ण को अपना वास्तविक पति मान कर अपना जीवन कृष्णमय बना लिया, लेकिन उन्होंने इस ईश्वरीय आलंबन को पति-पत्नी के मानवीय संबंधों में बाँधकर उसे लोक मानस के लिए सुलभ बना दिया। इस मानवीय संबंध ने भक्ति को नया आयाम और नया रूप दिया तथा धर्म की रहस्यवादिता एवं आध्यात्मिकता के स्थान पर भक्ति साधारण मनुष्य के जीवन का अंग बन गई। मीरा की काव्य साधना ने कृष्ण के अलौकिक एवं पारलौकिक अस्तित्व को जैसे समाप्त कर उन्हें मानवीय प्रेम की पूर्णता एवं रसनिष्ठा का प्रतीक बना दिया और प्रेम में आत्मोत्सर्ग, तन्मयता, तीव्रता, मिलन-वियोग की गहरी संवेदना का ऐसा रागात्मक संबंध उत्पन्न किया जिसने वेदना में आत्म परिष्कार एवं आत्मा-परमात्मा के एकल का मार्ग प्रशस्त किया।
मीरा का वैशिष्ट्य इतना ही नहीं है। मीरा ने पति की परंपरागत सत्ता एवं अधिकार को स्वीकार नहीं किया और न पति के देहांत के बाद सती होकर परंपरा को आगे बढ़ाया। उस युग के सामंती परिवेश तथा पुरुष प्रधान समाज में 'पति को परमेश्वर' मानने वाली हिंदू स्त्री का 'परमेश्वर को पति' मानने का अधिकार प्राप्त करना आसान नहीं था। यह एक प्रकार से राजनीतिक सामंतवाद तथा धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध मीरा के रूप में युग की नारी का मूक विद्रोह था। मीरा इस मूक विद्रोह के कारण 'कुलनाशी' कहलायी और उसे विष का प्याला भी पीना पड़ा, परंतु मीरा ने नारीत्व को जीवित रखा और सिद्ध कर दिया कि पति की सत्ता के बिना भी नारीत्व का अस्तित्व है। इस प्रकार मीरा ने नारी की स्वतंत्र सत्ता का उद्घोष करके भी उसे स्वकीया-प्रेम से जोड़ा तथा परमेश्वर पति के प्रति एकनिष्ठ प्रेम की साधना करके भारतीय नारी को परंपरागत मर्यादा और संयम में रखा। वास्तव में मीरा इष्ट देव के प्रति अनन्य भाव से स्वकीया-प्रेम की तन्मयता, घनीभूतता, वियोग में मिलन की कामना, संयम और मर्यादा आदि के कारण भारतीय नारी का जीवंत प्रतीक बन गयी।
मीरा के ऐसे ही रूप तथा भारतीय नारी की ऐसी ही विशेषताओं ने महात्मा गांधी की चेतना, संघर्ष तथा जीवन मूल्यों को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने स्वाधीनता संग्राम में मीरा के व्यक्तित्व तथा काव्य साधना का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने अपने जीवन काल में लगभग 50 बार अपने भाषणों, पत्रों, लेखों आदि में मीराबाई का स्मरण किया और उनकी किसी-न-किसी विशेषता का उल्लेख करके सिद्ध किया कि भारत की स्वतंत्रता तथा उसके विकास में उनका किस प्रकार उपयोग हो सकता है। महात्मा गांधी अपने समय के सबसे अधिक आधुनिक भारतीय थे और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से ही अंग्रेजों की दासता तथा उनके अत्याचारों के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत आकर असहयोग, सत्याग्रह सविनय अवज्ञा तथा अहिंसा से स्वराज्य के लिए संघर्ष आरंभ किया और इसके लिए उन्हें मध्य युग की कवयित्री मीराबाई अत्यंत उपयोगी लगीं और वे उनके जीवन और साहित्य का उपयोग इस राष्ट्रीय जागरण में बराबर करते रहे।
महात्मा गांधी ने सबसे पहले 22 जून 1907 को मीराबाई का उल्लेख करते हुए लिखा कि हमें मीराबाई जैसी हजारों स्त्रियों की आवश्यकता है जो भारत के आधे स्त्री समाज को शिक्षित और जाग्रत कर सके। ऐसी मीराबाई का परिचय अपनी एक ईसाई मित्र को देते हुए गांधी ने अपने 11 जून, 1917 के पत्र में लिखा, "दो- तीन शताब्दी पूर्व मीराबाई नामक एक महान रानी हुई है। उन्होंने अपने प्रिय व्यक्तियों और समस्त वैभव का त्याग करके परम प्रेम का जीवन बिताया। अंत में उनके पति उनके भक्त बन गए। हम अक्सर उनके रचे हुए कुछ सुंदर भजन आश्रम में गाते हैं। जब तुम आश्रम में आओगी तब उन गीतों को सुनोगी और किसी दिन गाओगी भी।" मीरा के इन सुंदर गीतों का कारण गांधी यह मानते थे कि वे मीरा के हृदय से निकले हैं तथा उनकी रचना गीत रचने की इच्छा या लोगों को खुश करने की इच्छा से नहीं हुई है। गांधी मीरा के जीवन से जुड़े चमत्कारों को उपेक्षणीय मानते हैं, क्योंकि उन्हें इस प्रकार के ईश्वरीय चमत्कारों में विश्वास नहीं है। उन्होंने इसी कारण ईसा मसीह से जुड़े चमत्कारों को भी अस्वीकार किया, लेकिन मीरा के जीवन की प्रमुख चीज की ओर ध्यान दिलाना नहीं भूलते और वे कहते हैं कि हमें जिस चीज को ध्यान में रखना है वह तो मीराबाई की पवित्रता है।
महात्मा गांधी मीरा की प्रेम की अद्भुत शक्ति से पूर्ण रूप से परिचित ही नहीं थे बल्कि वैसी प्रेमानुभूति तथा प्रेम की शक्ति अपने प्रेम में उत्पन्न करना चाहते थे। गांधी समझ चुके थे कि मीरा जैसी गहन एवं घनीभूत प्रेमानुभूति ही विश्व को बदल सकती है। गांधी 15 नवंबर 1917 को लिखे एक पत्र में कहते हैं कि मीरा को प्रेम की कटारी गहरी लगी थी। प्रेम की वैसी कटारी हमारे भी हाथ लगे और हममें उसे भोंकने का बल आ जाए तो हम दुनिया को हिला दे। प्रेम के अंतर में होते हुए भी मैं हर क्षण उसके अभाव का अनुभव करता रहा हूँ। गांधी मीरा के उस पद का कई बार उल्लेख करते हैं जिसमें मीरा कहती हैं कि कच्चे धागे से मुझे हरिजी ने बाँध लिया है। वे जिधर खींचते हैं मैं उधर ही मुड़ जाती हूँ। मुझे तो प्रेम की कटारी लगी है। गांधी इसी प्रेम के कच्चे धागे से मुसलमानों को बाँधने तथा गाय की रक्षा करना चाहते हैं एवं भारत माता के साथ अटूट संबंध में बंधने के लिए भी इसी प्रेम के कच्चे धागे का इस्तेमाल करते हैं। 30 जनवरी, 1921 को 'नवजीवन' में लिखते हैं कि मीरा ने जो कहा सो करके दिखा दिया। प्रेम का यही धागा प्रत्येक मुसलमान को बांधने और गाय की रक्षा के लिए काफी है। इसी प्रकार गांधी जब शिवप्रसाद गुप्त के आग्रह पर 'भारत माता मंदिर' का काशी में उद्घाटन करते हैं तो कहते हैं कि प्रेम की पुकार टाली नहीं जा सकती। मीरा के प्रेम का धागा कच्चा और कोमल था, लेकिन वह मजबूत था। ऐसा प्रेम लोगों को हजारों मील दूर से खींच लाता है। गांधी मीरा के इस प्रेम पद का अनुसरण युवावस्था से ही कर रहे थे और यही कारण है कि उन्होंने मीरा के प्रेम दर्शन को अपने जीवन का आधार बना लिया। वे मीरा और भारत माता को एक साथ स्मरण करते हुए कहते हैं कि मीराबाई कुशल कातने वाली न होती तो हरिजी के प्रेमपाश की धागे से सुंदर उपमा कैसे देतीं? भारत माता भी हमें वैसे ही धागे से बाँधकर गुलामी के बंधनों से मुक्त करना चाहती हैं। इस प्रकार महात्मा गांधी भारत माता में मीरा का रूप देख रहे हैं और उसे दासता से मुक्त करने के लिए मीरा की प्रेम शक्ति का उपयोग कर रहे हैं।
महात्मा गांधी अपने स्वराज्य आंदोलन को तर्कशील तथा शक्तिशाली बनाने के लिए मीराबाई का अनेक प्रकार से उपयोग करते हैं। गांधी भिन्न-भिन्न समय पर सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करते हैं और उनके औचित्य एवं विश्वसनीयता के लिए मीराबाई का वैसे ही उल्लेख करते हैं जैसे तुलसीदास अपनी बात का प्रमाण देने के लिए वेद का उल्लेख करते हैं। गांधी के शब्दों में मीराबाई महान सत्याग्रही थीं। वे दक्षिण अफ्रीका के अपने आंदोलन से ही मीरा की इस सत्याग्रही शक्ति से शक्ति प्राप्त कर रहे थे और मीरा के अपने सत्य के लिए निर्द्वन्द भाव से विषपान का बार-बार स्मरण करते हैं।
गांधी मीरा के पति से अपने सत्य के लिए असहयोग करने का समर्थन करते हुए कहते हैं कि हमारे धार्मिक ग्रंथ ऐसे असहयोग का समर्थन करते हैं। हमारी परंपरा में प्रहलाद ने अपने पिता से, विभीषण ने अपने क्रूर भाई से, मीरा ने अपने पति से असहयोग करके कुछ भी अनुचित नहीं किया। यह सच है कि अन्यायी एवं असत्य से असहकार एवं असहयोग तथा न्यायी एवं सत्य से सहकार एवं सहयोग की परंपरा हमारे यहाँ रही है। इस कारण हम प्रहलाद, विभीषण और मीरा तीनों की ही पूजा करते हैं। गांधी मीरा के जीवन के इस तथ्य का भी उद्घाटन करते हैं कि मीरा ने राणा के सभी कठोर दंड तथा विषपान भी निर्विकार भाव से स्वीकार किए और क्रोध एवं प्रतिकार जैसा कोई भाव उनके मन में उत्पन्न नहीं हुआ। गांधी इसका उपयोग अपने असहयोग आंदोलन के लिए करते हुए कहते हैं, "मीराबाई ने राणा कुंभा के साथ जो असहयोग किया उसमें द्वेष नहीं था। राणा कुंभा द्वारा दिए गए कठोर दंड उसने \प्रेमपूर्वक स्वीकार किए। हमारे असहयोग का मूल मंत्र भी प्रेम ही है। उसके बिना सब फीका, सब खाली है।" महादेव देसाई की गिरफ्तारी पर वे पुनः मीरा को याद करते हैं और लिखते हैं कि मेरा पूरा विश्वास है कि मीराबाई पर उनके पति द्वारा दी गई यातनाओं का कोई असर नहीं हुआ था। ईश्वर के प्रति प्रेम और उसके अमूल्य नाम का निरंतर स्मरण उन्हें नित्य प्रसन्न बनाए रखता था। गांधी मीरा के इसी एकनिष्ठ ईश्वर प्रेम की बार-बार सराहना करते हैं और वैसा ही प्रेम अपने सत्याग्रहियों के मन में उत्पन्न करना चाहते हैं। गांधी मीरा के एक पद की व्याख्या में कहते हैं कि मीरा जैसी भक्त नारी कह गई है कि प्रभु-भक्ति में जिसका मन लीन हो गया उसे दूसरी चीजें नीम के रस की तरह कड़वी और जुगनू के प्रकाश की तरह निस्तेज लगती है। गाँधी कहते हैं मीरा ने यह कर दिखाया कि चाहे राणा रूठे पर ईश्वर न रूठे। गांधी मीरा से यही शिक्षा लेते हैं और 6 दिसंबर 1944 को डायरी में लिखते हैं कि मीराबाई के जीवन से हम बड़ी बात यह सीखते हैं उसने भगवान के लिए अपना सब कुछ छोड़ दिया। गांधी मीरा के राजभोग को त्याग कर ईश्वर-प्रेम में नाचने की भूरि - भूरि प्रशंसा करते हैं और असहयोग आंदोलन में छात्रों से आग्रह करते हैं कि वे सरकारी स्कूलों के बहिष्कार में मीरा जैसे त्याग और बलिदान में आनंद की अनुभूति करें। गांधी मीरा की आत्मा को देश की युवा पीढ़ी के हृदय में उतार देना चाहते हैं।
महात्मा गांधी मीरा के विवाह, पति-पत्नी संबंध, स्त्री के अधिकार और उसकी अस्मिता के प्रश्न को भी उठाते हैं और इस तरह वे एक मध्ययुगीन भारतीय स्त्री को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयत्न करते हैं। गांधी विवाह की परिभाषा में कहते हैं कि विवाह शरीर द्वारा दो आत्माओं का मिलन होता है और इसमें परमेश्वर के प्रति प्रेम एवं भक्ति का भाव भी निहित रहता है। गांधी कहते हैं, "पति - पत्नी का प्रेम स्थूल वस्तु नहीं, उसके द्वारा आत्मा-परमात्मा के प्रेम की झाँकी दिखाई दे सकती है। यह प्रेम वासनागत प्रेम कभी नहीं हो सकता। विषय-सेवन तो पशु भी करता है - जहाँ शुद्ध प्रेम है वहाँ बल-प्रयोग के लिए गुंजाइश नहीं है और वे एक दूसरे का मन रख कर चलते हैं। इसलिए गांधी मानते हैं कि मीरा ने यह अपने आचरण से सिद्ध कर दिया कि पत्नी के रूप में उसका भी एक व्यक्तित्व है। गांधी की दृष्टि में मीरा एक 'सती स्त्री' थी और उसके लिए विवाह वासना को तृप्त करने का साधन नहीं था। गांधी के विचार में 'सतीत्व' का अर्थ है 'पवित्रता की पराकाष्ठा' और मीरा इसकी प्रतिमूर्ति थी। महात्मा गांधी पुरुष की निरंकुशता एवं एकाधिकार के विरुद्ध मीरा के विद्रोह को तर्कसंगत मानकर अपनी आधुनिकता के परिचय के साथ नारी के स्वतंत्र अस्तित्व का समर्थन करते हैं। गांधी लिखते हैं, "मीराबाई ने मार्ग दिखा दिया है। जब पत्नी अपने को गलती पर न समझे और जब उसका उद्देश्य अधिक ऊँचा हो, तब उसे पूरा अधिकार है कि वह अपने मन का रास्ता अख्तियार कर ले और नम्रता से परिणाम का सामना करे।" इस प्रकार गांधी मीराबाई के साथ है और उनके पति-विद्रोह तथा परंपरा-विद्रोह को औचित्यपूर्ण मानते हैं और मध्ययुगीन मीराबाई को आधुनिक सन्दर्भ में भी स्वीकृत और मान्य बना देते हैं।
अंत में महात्मा गांधी मीराबाई को भारत की एक 'महातेजस्विनी भक्त स्त्री', 'सत्याग्रहिणी', महान त्यागी एवं बलिदानी, 'सतीत्व' की प्रतीक, 'संत' भक्त नारी आदि मानते हैं और उसे अपने समय के संघर्ष के साथ सम्बद्ध करके उसे और भी प्रासंगिक बना देते हैं। गांधी का कौशल यह है कि वे मीराबाई की मध्ययुगीन भक्ति, प्रेम-दर्शन और नारी चेतना को आधुनिक भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए भी सर्वथा सार्थक और उपयोगी बना देते हैं और मीराबाई को सभी स्वतंत्रता प्रेमियों, अनाचारों का मूक विद्रोह करने वालों, ईश्वर प्रेम को सर्वोच्च मानने वालों तथा नारी के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करने वालों के लिए सहज-सुलभ बनाकर उनमें अपना प्रतिरूप खोजने का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। इस प्रकार मीराबाई भारत के स्वतंत्रता संग्राम का ही नहीं आधुनिक लोक मानस का भी अंग बन जाती है। महात्मा गांधी जब भी मीरा को याद करते हैं वे मीरामय में हो जाते हैं। वे आधुनिक भारत को भी मीरामय बनाना चाहते हैं। दूदा भाई की बेटी लक्ष्मी को वे 'मीराबाई' बनाना चाहते हैं और सरोजिनी नायडू को तो वे 'मीराबाई' कहते ही हैं। उनकी कामना है कि भारत में मीराबाई जैसी हजारों स्त्रियाँ हो जो स्त्री समाज का कायाकल्प कर दें, परंतु गांधी मीरा को प्रासंगिक बनाने के अलावा कोई दूसरी मीरा की सृष्टि नहीं कर पाए। यह गांधी की बड़ी असफलता थी।
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| "संवाद " की कार्यकारिणी समिति |
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका , OH , sushilam33@hotmail.com
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| प्रबंध सम्पादक |
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- सुशीला मोहनका
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्यों को,
होली की हार्दिक शुभकामना प्रेषित करती हूँ । भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग रीती-रिवाज के साथ मनायी जाती है। होली अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
इस सत्र की विशेष सूचनायें :-
जनवरी माह से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान
हुआ है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला प्रारम्भ की गयी है जिसके माध्यम से हिन्दी प्रेमी हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त कर सकेंगे । ‘जागृति’ की तीसरी कड़ी सनिवार, ९ अप्रैल, २०२२ को दिन में ११:०० बजे से अमेरिका में और ९ मार्च २०२२ को शाम ८ .३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगा। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये,सुनिए और गुनिये तभी “जागृति” स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत सफल हो पायेगी । अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि अपने यहाँ के हिन्दी प्रेमियों तक अ.हि.स. द्वारा ९ अप्रैल २०२२ को होनेवाले कार्यक्रम की सूचना दें। यह आपका पावन कर्तव्य और समय की माँग भी है।
इस बार सम्वाद में संपादक मंडल की व्यवस्था हुई है, जिनके नाम ऊपर लिखे हैं।अगर और कोई अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताये।
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति -नीति से कोई संबंध नहीं है।
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