JUNE INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
जून 2026, अंक ५९
प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र । सम्पादक: डॉ. शैल जैन
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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हिंदी — हमारी पहचान, हमारी विरासत
प्रिय पाठकों,
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी सांस्कृतिक विरासत और हमारे जीवन-मूल्यों का जीवंत स्वरूप है। यह वह धागा है जो हमें अपने इतिहास, परंपराओं और भावनाओं से जोड़ता है। हिंदी में हमारी सोच, हमारे अनुभव और हमारी संवेदनाएँ सहज रूप से अभिव्यक्त होती हैं।
आज जब विश्व तेजी से एक वैश्विक शहर बनता जा रहा है, तब अपनी भाषा और संस्कृति को संजोकर रखना और भी महत्वपूर्ण हो गया है। हिंदी हमें न केवल अपनी जड़ों का बोध कराती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक धरोहर पहुँचाने का सशक्त माध्यम भी बनती है। विशेष रूप से विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए हिंदी अपनी मातृभूमि से भावनात्मक जुड़ाव का सेतु है।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का उद्देश्य केवल हिंदी का प्रचार-प्रसार करना ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी में हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम एवं गर्व की भावना जागृत करना भी है। यदि हम अपने घरों में हिंदी बोलें, बच्चों को हिंदी साहित्य, गीत, कहानियों और सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराएँ, तो हमारी यह अमूल्य विरासत आने वाले वर्षों तक सुरक्षित और समृद्ध बनी रहेगी। बचपन में आसानी से कई भाषाएँ सीखी जा सकती हैं । हमारी जरा सी कोशिश एक अच्छी शुरुआत कर सकती है ।
आइए, हम सभी मिलकर हिंदी को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाएँ और इसे विश्वभर में सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाने के प्रयासों में सहभागी बनें। आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।
विदेशों में रहकर भी हिन्दी हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है। भाषा केवल शब्द नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियों, संस्कारों और संस्कृति की वाहक है।
धन्यवाद,
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
संवाद संपादक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
ई मेल shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: +1 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- कार्यक्रम
'हास्य कविसम्मेलन आगे की सूचना तक स्थगित'
द्वारा : आलोक मिश्रा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, न्यासी समिति
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यह सूचित किया जाता है कि, हमारे निरंतर प्रयासों के बावजूद, वर्तमान अमेरिकी आव्रजन नीतियों के तहत वीज़ा प्रसंस्करण में देरी के कारण हमारे दो कवियों को अभी वीज़ा स्वीकृत नहीं मिली हैं। हमारे प्रतिनिधिमंडल के केवल एक सदस्य कवि को अब तक वीज़ा मंजूरी मिली है। इस स्थिति को देखते हुए, हम 10 जुलाई को दौरे की शुरुआत नहीं कर पाएँगे। अत: कविसम्मेलन को आगे की सूचना तक स्थगित कर दिया गया है।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तर पूर्व ओहायो शाखा का सहयोग
इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप, वार्षिक
स्थानीय संस्थाओं के साथ
रिचफील्ड, ओहायो, 6 - 24 जुलाई , 2026
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नमस्ते शैल जी
हमारी टीम यह घोषणा करते हुए अत्यंत उत्साहित है कि 2026 के लिए registration पहले ही पूर्ण हो चुका है और अब छात्रों की waiting list भी बन चुकी है। हम अभी भी volunteers और teachers की तलाश में हैं—यदि आप इच्छुक और सक्षम हों, तो कृपया संपर्क करें।
कृपया किरण खेतान जी के अनुरोध पर संलग्न Volunteer flyer देखें।
यदि आप समिति के लोगों से संपर्क कर रहे हैं, तो flyer पर दिए गए QR Codes कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त, volunteers के लिए registration form उपलब्ध है।
हमारी सहायता करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।
धन्यवाद
Mr. Lalit Sangtani, Admin/ Operations: 419-829-0223
e-mail: ihasummercamp@gmail.com
Mrs. Kiran Khaitan, Program Director: 330-622-1377
Mrs. Kanika Agarwalla, Co-Director: 862-754-0670
Mrs. Shalini Goyal, Co-Director: 440-590-5605
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अपनी कलम से
‘फादर्स डे’ और ‘मदर्स डे’
द्वारा: अजय खंडेलवाल, बरेली, भारत
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अजय खंडेलवाल एक बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति हैं जो यदाकदा शौकिया विभिन्न विषयों पर लिखते हैं। ये हिंदी में अपने विचारों को अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं। ये बरेली उत्तर प्रदेश में रहते हैं और पेशे से वित्तीय बाजार से जुड़े हुए हैं और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट में कार्यरत हैं।
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अभी हाल में हमने ‘मदर्स डे’ और ‘फादर्स डे’ मनाया। जिस तरह हम दशहरे को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में सांकेतिक तौर पर मानते हैं और अन्य त्यौहारों को भी प्रसंग के अनुसार मनाते हैं, उसी प्रकार अपने माता-पिता के साथ भावनात्मक और कर्तव्य निष्ठ जुड़ाव को हम इन दो दिनों के रूप में मनाते हैं।
माता-पिता और बेटे-बेटियों का रिश्ता जीवन पर्यंत एक नैसर्गिक जुड़ाव के साथ बन्धा होता है, जहाँ बचपन में बच्चों की निर्भरता प्राकृतिक रूप से माता-पिता पर होती है और माता पिता के जीवन के अंतिम पड़ाव में यह निर्भरता पलट जाती है और माँ-बाप अधिकांशतः बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं। इसी प्रकार जीवन की निरंतरता चलती रहती है।
यह चक्र हर कालखंड में एक अविरल धारा की तरह घूमता रहता है पीढ़ी दर पीढ़ी। पशु पक्षियों में भी इसी तरह की व्यवस्था है जो प्रकृति ने ही निर्मित की है। इससे यह स्थापित होता है की माता-पिता और बच्चों का एक विशेष प्रकार का संबंध होता है जिसकी किसी भी अन्य रिश्ते से तुलना नहीं की जा सकती ।
माँ-बाप और संतान कभी कर्मबंधन से कभी भावनात्मक जुड़ाव से और कभी भौतिक आवश्यकताओं से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। इस आलौकिक बंधन में कभी आपने सुना है, “मेरे माँ-बाप किसी विशेष मशहूर हस्ती की तरह क्यों नहीं है या फिर कि मेरा बेटा 6 फुट का होता तो कितना अच्छा होता या बेटी की आँखें कजरारी होती तो कितना अच्छा होता”। शत प्रतिशत उत्तर होगा - नहीं ।
यही एक रिश्ता है जिसमें जो जैसा है, उसका व्यक्तित्व जैसा भी है हम उसे उसी रूप में स्वीकार करते हैं और प्यार भी करते हैं। अन्य किसी भी इंसानी रिश्ते में ऐसा नहीं होता है, हमारे राग द्वेष निश्चित रूप से जुड़े होते हैं।
बच्चे के विकास और समय समय पर उनकी जरूरतों में माता और पिता दोनों का योगदान एक सामान है। एक की अपेक्षा दूसरे का ज्यादा है कहना गलत होगा। दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं, और दोनों मिलकर बच्चे के जीवन को एक आकार देते हैं और जीवन भर उसका मार्गदर्शन करते हैं।
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥
कबीरदास जी ने तो गुरु और शिष्य के सन्दर्भ में यह दोहा लिखा है मगर कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि एक बच्चे के जीवन में माता और पिता की भी कुछ इसी प्रकार की भूमिका होती है। माता और पिता साझेदारी में कुम्हार की तरह हैं और बच्चा घड़े के सामान है। पिता की भूमिका अपने बच्चे यानी घड़े को बाहर से गढ़ने की है यानी भावुक न होते हुए निर्भीकता और साहसपूर्वक जिन्दगी की सच्चाइयों से लड़ना सिखाने की है वहीँ माँ की भूमिका भावात्मक रूप से पीछे से सहारा देने की होती है। इस प्रकार दोनों मिलकर एक बच्चे के जीवन को आकार (गढ़ते) देते हैं। बच्चों के व्यस्क होने के बाद वैसे तो उनकी जिम्मेदारी ख़त्म हो जाती है परन्तु यह रिश्ता ही ऐसा है कि भले ही वे उनकी जिंदगियों से अलग हों पर फिर भी दिल से यह सिलसिला परोक्ष रूप से आजीवन चलता रहता है।
दोनों पीढ़ियों के जीवन में एक समय आता है जब उनकी भूमिकाएँ पलट (reverse) जाती हैं। बच्चों के अपने बच्चे (परिवार) हो जाते हैं और वे भी वही करते हैं जो उनके माता-पिता ने कभी उनके लिए किया था। फर्क सिर्फ इतना है कि अपने बच्चों के साथ अपने माता-पिता की भी देखभाल उसी तरह करने की जरूरत होती है। बच्चे अपने माता-पिता पर निर्भर होकर ही पैदा होते हैं और बड़े होते हैं। वे उन्हें सब कुछ सिखाते हैं — उनके पहले कदम उठाने से लेकर सफलता की सीढ़ी के शिखर तक पहुँचने तक। ठीक उसी तरह माता-पित्ता भी एक समय पर भौतिक और भावात्मक रूप से अपने बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं और शायद वे यह बताना या बच्चे खुद अपने जीवन की उलझनों के बीच भूल जाते हैं कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें भी साथ लेकर चलना है।
जीवन के आरम्भ से अंत को यदि हम एक चक्र के रूप में देखते हैं तो यह बहुत आवश्यक है कि उसके हर पल को सही प्रकार से जिया जाए तभी यह चक्र पूरा होगा। बच्चों को चाहिए जिस तरह माता-पिता बच्चे की बुनियादी जरूरतों के साथ पढ़ाई-लिखाई और पैरों पर खड़ा करते हैं वैसे ही माता-पिता की जीवन संध्या के समय उनकी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा कर, उनके जीवन चक्र को पूरा करें। माता-पिता बच्चों के जीवन चक्र के शुरूआती बिंदु होते हैं और वे यही चाहते हैं कि उनके बच्चे उनके जीवन-चक्र का अंतिम बिंदु बनें। जब हम ऐसा कर पायेंगे तभी हमारा दायरा भी परफेक्ट बनेगा और सच्चे मायने में ‘मदर्स डे’ और ‘फादर्स डे’ मना पायेंगे। अगर यह चक्र पीढ़ी दर पीढी आदर्श स्वरूप चलता रहे तो एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकेगा।
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अपनी कहानियाँ
"ईमानदारी"
द्वारा: पुष्पेश कुमार
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ये भारत के बाढ़ शहर, बिहार राज्य में रहते हैं और बैंक में कार्यरत हैं। हिंदी के प्रति इनकी सेवा युवा उम्र से ही शुरू हो गई।
विगत बीस वर्षों से स्वतंत्र लेखन करते हैं। कविता एवं कहानी लिखने का विशेष शौक है। देश के विशिष्ट पत्र पत्रिकाओं में 1000 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं ।
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ईमानदारी
विमल बाबू आज बहुत दिनों बाद अचानक बाजार में मिल गये। यह वही विमल बाबू थे , जो एक विभाग में अधिकारी थे और लोग उनकी ईमानदारी की कसमें खाते थे। विमल बाबू से मेरा अपनापन का संबंध था। मिलते ही गले से लगा लिया और बोले - "कैसे हो विपीन ! क्या हो रहा है ?"
मैं निराश स्वर में बोला - "बस! किसी प्रकार जिंदगी कट रही है । काम की तलाश में भटक रहा हूँ । आप चाहे तो मेरी भी डूबती नैय्या को पार लगा सकते हैं"
विमल बाबू उदास स्वर में बोले - "विपीन ! इस बेरोजगारी के दौर में मैं तुम्हारे लिए कुछ कर पाने में असमर्थ हूँ। मेरे वश में होता , तो मैं तुम्हें कहीं न कहीं काम पर जरूर लगा देता।"
मैंने कहा - "जब आपके वश में कुछ है ही नहीं ,तो कोई बात नहीं। लेकिन जब कभी मौका मिले,तो मुझे जरूर याद कीजिएगा। मैं आपका यह एहसान जीवन भर नहीं भूलूँगा । एक मौका देकर देखियेगा ।"
"हाँ-हाँ , जरूर ! जब भी मेरे यहाँ बहाली होगी। मैं तुम्हें ही उस पद पर बहाल करवाऊँगा। तुम निश्चिंत रहना।" विमल बाबू ने मेरी पीठ को थपथपाते हुए कहा। और मैं उनसे विदा लेकर बगल में ही सब्जी वाले से मोल भाव करने लगा। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति ने विमल बाबू को प्रणाम किया और बोला - "मुझे कामेश्वर बाबू ने भेजा है । उन्होंने बताया कि आपके विभाग में एक पद खाली है। यदि आप चाहेंगे तो मैं उस पद पर बहाल हो जाऊँगा ।"
विमल बाबू बोले - "हाँ , मेरे विभाग में एक पद पर बहाली होनी है । जब तुम्हें कामेश्वर बाबू ने भेजा है, तो तुम्हारा काम अवश्य होगा। पर उसकी कीमत चुकानी होगी ।"
वह व्यक्ति बोला - "ठीक है ! आप जितना कहेंगे मैं उतना देने को तैयार हूँ ।"
विमल बाबू मुस्कुराकर बोले - "कल अपने सारे प्रमाण -पत्र और आवेदन लेकर आना । तुम्हारा काम हो जाएगा।" और वे मुस्कुराकर आगे बढ़ गये ।
यह सुनकर मैं सोचने पर विवश हो गया कि यह वही विमल बाबू हैं , जो लोगों के लिए ईमानदारी की मिसाल हैं। पैसों के सामने इंसान की कोई अहमियत नहीं है। पैसों के सामने तो लोगों की सारी ईमानदारी धराशायी हो जाती है। और मैं ईमानदारी के बल पर नौकरी की तलाश कर रहा हूँ। यहाँ तो सिर्फ पैसे और पहुँच की ही पूछ होती है। ईमानदारी और विद्वाता की नहीं ।
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अपनी कवितायेँ
"धर्म जन्य विज्ञान"
द्वारा: अभिनव शुक्ल
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लोकप्रिय कवि एवं व्यंग्यकार अभिनव शुक्ल अपने गुदगुदाते घनाक्षरी छंदों, प्रभावशाली प्रस्तुति और तीक्ष्ण व्यंग्य के लिए हिन्दी काव्य मंचों पर विशिष्ट पहचान रखते हैं। सौ से अधिक प्रकाशनों, रेडियो-टीवी प्रसारणों, अंतर्राष्ट्रीय काव्य यात्राओं और साहित्यिक सम्मानाओं से समृद्ध, आज सैन एंटोनियो (टेक्सास) से विश्वभर के श्रोताओं तक अपनी कविताओं की सुगंध पहुँचा रहे हैं।
इन्होने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हास्य कवि सम्मेलन श्रृंखला मैं अमेरिका में आकर काव्यों की प्रस्तुति दी और सभी दर्शकों का मन प्रभावित किया है।
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धर्म जन्य विज्ञान
तारों नक्षत्रों से मन की गहराई तक,
वैदिक ऋचाओं से मानस चौपाई तक,
सत्य सनातन की अनुपम पहचान है,
ज्ञान जन्य धर्म, धर्म जन्य विज्ञान है|
मंथन के रत्नों से जग में उजियारे हैं,
गर्वीले सागर पर सेतु हमारे हैं,
वज्र बना अस्थियों से असुर संहारे हैं,
संजीवनी ला कर प्राण उबारे हैं,
युग युग की वाणी में अपना ही राग है,
युग-युग की वीणा पर अपना जयगान है।
बीज-अंक गणित भास्कराचार्य खोलते,
शून्य रत्न आर्यभट्ट सूर्य को टटोलते,
अणुओं की शक्ति को कणाद नित्य तोलते,
पाणिनी के व्याकरण में स्वर-स्वर हैं बोलते,
सुश्रुत चिकित्सा में, चरक आयुर्वेद में,
योगा पतञ्जलि का कितना महान है।
तारों नक्षत्रों से...
ज्योतित तरंगों में रमन के प्रभाव हैं,
रामानुजन के अनंत तक बहाव हैं,
शेखर की सीमा के चुम्बकी स्वभाव हैं,
जैव आनुवंशिकी में खुराना पड़ाव हैं,
साराभाई के कलाम गूँजे अंतरिक्ष में,
बोस ने दिखलाया वनस्पति में प्राण है|
तारों नक्षत्रों से...
प्रेरणामयी उज्ज्वल अपनी कहानी है,
विज्ञान संग अध्यात्म की रवानी है,
जिज्ञासा की लौ निरंतर जलानी है,
प्रण लेकर यह धारा आगे बढ़ानी है,
नव युग में नव शिखरों पर ध्वज फहराने को,
इतिहास से हमको लेना वरदान है।
तारों नक्षत्रों से...
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अपनी कवितायेँ
"बचपन और एक दिन"
द्वारा: सुशांत सुप्रिय
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हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार , कवि तथा साहित्यिक अनुवादक हैं । इनके नौ कथा-संग्रह, पाँच काव्य-संग्रह तथा विश्व की अनूदित कहानियों के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं ।इनकी कहानियाँ और कविताएँ पुरस्कृत हैं और कई राज्यों के स्कूल-कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में बच्चों को पढ़ाई जाती हैं ।कई भाषाओं में अनूदित इनकी रचनाओं पर कई विश्वविद्यालयों में शोधार्थी शोध-कार्य कर रहे हैं । इनकी कई कहानियों के नाट्य मंचन हुए हैंतथा इनकी एक कहानी “दुमदार जी की दुम “ पर फ़िल्म भी बन रही है । हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी व पंजाबी में भी लेखन व रचनाओं का प्रकाशन । साहित्य व संगीत के प्रति जुनून ।सुशांत सरकारी संस्थान , नई दिल्ली में अधिकारी हैं और इंदिरापुरम् , ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं ।
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1. बचपन
दशकों पहले एक बचपन था
बचपन उल्लसित, किलकता हुआ
सूरज, चाँद और सितारों के नीचे
एक मासूम उपस्थिति
बचपन चिड़िया का पंख था
बचपन आकाश में शान से उड़ती
रंगीन पतंगें थीं
बचपन माँ का दुलार था
बचपन पिता की गोद का प्यार था
समय के साथ
चिड़ियों के पंख कहीं खो गए
सभी पतंगें कट-फट गईं
माँ सितारों में जा छिपी
पिता सूर्य में समा गए
बचपन अब एक लुप्तप्राय जीव है
जो केवल स्मृति के अजायबघर में
पाया जाता है
वह एक खो गई उम्र है
जब क्षितिज संभावनाओं
से भरा था
2. एक दिन
मैंने कैलेंडर से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ
और अपने मन की करने लगा
एक दिन मैंने
कलाई-घड़ी से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ
और खुद में खो गया
एक दिन मैंने
बटुए से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ
और बाज़ार को अपने सपनों से
निष्कासित कर दिया
एक दिन मैंने
आईने से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ
और पूरे दिन उसकी शक्ल नहीं देखी
एक दिन
मैंने अपनी बनाईं
सारी हथकड़ियाँ तोड़ डालीं
अपनी बनाई सभी बेड़ियों से
आज़ाद हो कर जिया मैं
एक दिन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति से भावभीनी श्रद्धांजलि
स्वर्गीय डॉ. अनूप कपूर
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स्वर्गीय डॉ. अनूप कपूर
(1 जनवरी 1953 – 22 जून 2026)
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डॉ. अनूप कपूर अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य एवं नॉर्थ ईस्ट ओहायो शाखा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनूप कपूर के निधन का समाचार हम सभी के लिए अत्यंत दुःखद है।
डॉ. कपूर ने वर्ष 2011–2012 में नॉर्थ ईस्ट ओहायो शाखा के अध्यक्ष के रूप में उत्कृष्ट नेतृत्व प्रदान किया। उनके कार्यकाल में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का राष्ट्रीय अधिवेशन सफलतापूर्वक नॉर्थ ईस्ट ओहायो शाखा द्वारा आयोजित किया गया। वे हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति तथा सामुदायिक सेवा के प्रति सदैव समर्पित रहे। अपनी सेवायें उन्होंने एक्रोन संडे स्कूल और स्थानीय समर हेरिटेज कैम्प ( शुरू में स्टारटॉक कार्यक्रम ) में भी दिल से अर्पित की ।
वर्ष 2014 से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वे लगभग 12 वर्षों तक व्हीलचेयर पर रहे, किंतु उन्होंने कभी जीवन के प्रति अपना उत्साह, मुस्कान और सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं खोया। अपनी धर्मपत्नी अंजू जी के साथ वे स्वास्थ्य की सीमाओं के बावजूद यथासंभव अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे। विपरीत परिस्थितियों में भी हँसते-मुस्कुराते हुए जीवन जीने की उनकी अद्भुत क्षमता सभी के लिए प्रेरणास्रोत रही।
वे अपने पीछे पत्नी अंजू कपूर, पुत्र आशीष एवं आकाश, पुत्रवधुओं तथा अपने प्रिय पौत्र-पौत्रियों का स्नेहिल परिवार छोड़ गए हैं।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार डॉ. अनूप कपूर के स्नेह, विनम्रता, हास्यप्रिय स्वभाव और समर्पित सेवाओं को सदैव स्मरण रखेगा। उनके निधन से हिंदी परिवार ने एक समर्पित साथी और सच्चा मित्र खो दिया है।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवार को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
ॐ शांति।
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संवाद के सभी अंक, जून २०२१ से आरम्भ करके अभी तक
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के साइट पर ऑनलाइन उपलब्ध हैं।
All the Samwad editions, starting from June 2021 till current - are available online now.
https://hindi.org/samwad
द्वारा : डॉ. शैल जैन, ई-संवाद संपादक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
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पाठकों की अपनी हिंदी में लिखी कहानियाँ, लेख, कवितायें इत्यादि का
ई - संवाद पत्रिका में प्रकाशन के लिये स्वागत है।
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"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
1. रचनाओं में एक पक्षीय, कट्टरतावादी, अवैज्ञानिक, सांप्रदायिक, रंग- नस्लभेदी, अतार्किक
अन्धविश्वासी, अफवाही और प्रचारात्मक सामग्री से परहेज करें। सर्वसमावेशी और वैश्विक
मानवीय दृष्टि अपनाएँ।
2. रचना एरियल यूनीकोड MS या मंगल फॉण्ट में भेजें।
3. अपने बायोडाटा को word और pdf document में भेजें। अपने बायो डेटा में डाक का पता, ईमेल, फोन नंबर ज़रूर भेजें। हाँ, ये सूचनायें हमारी जानकारी के लिए ये आवश्यक हैं। ये समाचार पत्रिका में नहीं छापी जायेगी।
4. अपनी पासपोर्ट साइज़ तस्वीर अलग स्पष्ट पृष्ठभूमि में भेजें।
5. हम केवल उन रचनाओं को प्रकाशित करने की प्रक्रिया करते हैं जो केवल अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति को भेजी जाती हैं। रचना के साथ अप्रकाशित और मौलिक होने का प्रमाणपत्र भी संलग्न करें।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
हिंदी लेखन के लिए स्वयंसेवकों की आवश्यकता
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के विभिन्न प्रकाशनों के लिए हम हिंदी (और अंग्रेजी दोनों) में लेखन सेवाओं के लिए समर्पित स्वयंसेवकों की तलाश कर रहे हैं जो आकर्षक और सूचनात्मक लेख, कार्यक्रम सारांश और प्रचार सामग्री आदि तैयार करने में हमारी मदद कर सकें।
यह आपके लेखन कौशल को प्रदर्शित करने, हमारी समृद्ध संस्कृति को दर्शाने और हिंदी साहित्य के प्रति जुनून रखने वाले समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ने का एक अच्छा अवसर है। यदि आपको लेखन का शौक है और आप इस उद्देश्य के लिए अपना समय और प्रतिभा योगदान करने में रुचि रखते हैं, तो कृपया हमसे alok.iha@gmail.com पर ईमेल द्वारा संपर्क करें। साथ मिलकर, हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने और संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र
alok.iha@gmail.com
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – श्री आलोक मिश्र, NH, alok.iha@gmail.com
संपादक -- डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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