JUNE INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
जून 2023, अंक २४ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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यह अंक प्रकाशन में जाते-जाते 29 जून 2023 को 90 वर्ष की आयु में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान प्रबंध संपादक श्रीमती सुशील मोहनका के सार्थक भौतिक जीवन का अवसान हुआ। समिति और समाज की अपूरणीय क्षति। अंतिम सांस तक कर्तव्यरत यह अंक उनकी अंतिम संपादकीय भेंट है।
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से और ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।
आप सब श्रोता गणों को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २१ वें द्विवार्षिक हिंदी अधिवेशन कार्यक्रम में सादर आमंत्रित करती हूँ, यह अधिवेशन अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, इंडियाना शाखा द्वारा कार्मिल, इण्डियाना पोलिस में जुलाई २८-२९ को आयोजित किया जा रहा रहा है, इस कार्यक्रम के अधिवेशन का मूल विषय ‘अगली पीढ़ी के लिए हिंदी शिक्षा है’। आप सभी गणमान्य जनों से निवेदन है कि कार्यक्रम में सम्मिलित होकर कार्यक्रम को सफल बनायें’।
इण्डियाना शाखा के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार के नेतृत्व में सभी कर्मठ स्वयं सेवकों, कलाकारों तथा वक्ताओं का बहुत आभार। आपके द्वारा की गई आर्थिक सहायता हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक होगी और अधिवेशन को सफल बनाने में पूर्ण योगदान देगी’।
इस वर्ष हम २०२३ जुलाई १४ से लेकर अगस्त २७ तक कवि सम्मेलन में दो कवियों और एक कवियित्री को भारत से बुला रहे हैं, सुदीप भोला जी जबलपुर से हैं और गौरव शर्मा जी मुंबई से हैं साथ ही डॉ. सरिता जी गाजियाबाद से हैं’। ६ सप्ताह का भ्रमण होगा, जिसमें सभी कवि आपके शहर में आएँ, तो आप सभी इनकी कविताओं का आनंद अवश्य लें।
अंत में मैं समिति, न्यासी समिति तथा सम्पादक समिति का और स्वयं सेवकों सहित सभी को सहृदय धन्यवाद देती हूँ ,जो निर्धारित समय पर “संवाद” और विश्वा को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं, आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे संपर्क कर सकते हैं’।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर-राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
(817)-319-2678
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति
“हास्य के रंग - गीत-गजल के संग”
अमेरिका के महानगरों में, 14 जुलाई - 27 अगस्त 2023
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कवियों का संछिप्त विवरण (Poets profile)
Dr. Sarita Sharma of Delhi, a former advisor to the Ministry of Culture and Chairperson of Bharatendu Natya Academy in U.P. government, is a veteran Hindi poetess of shringaar ras genre. She was born in Bhilai, Chhattisgarh and has a Ph.D. in Hindi literature. She is known for her deep meaningful and soulful poetry and its melodious spellbinding renditions. This extraordinary Hindi Poetess has been felicitated by the President of India, Shri Ramnath Kovind at a Rashtrapati Bhavan congregation. She has been embellished with the highest civilian award of Yash Bharti by the Uttar Pradesh Government, and with ‘Mahadevi Verma’ and ‘Nirala’ Samman. She has participated in many prominent literary events and national and international Kavi Sammelans and Mushairas, including in U.S, U.K, Canada, and Gulf countries in last three decades. She has also recited her compositions on various TV channels and at the prestigious Red Fort on several occasions. Spreading the message of love thru her brilliant poetry, Dr. Sarita Sharma has penned five books, titled ‘Peer Ke Saaton Samander’, ‘Nadi Gungunaati Rahi’, ‘Huaey Aakash Tum’, ‘Teri Meera Zaroor Ho Jaoon’, and ‘Chand, Muhabbat, aur Main’ in the form of Geet, Ghazal, and Muktak Collections. The influence of Brij and Awadhi is also seen in her creations. Her poem on 'female feticide' is included in textbooks.
Gaurav Sharma of Mumbai hails from Rajasthan. He is the son of renowned Hasya kavi Shyam Jwalamukhi, and one of the most popular young humorists in India with over 2600 performances to his credit. He is an exceptional performer and a maestro of humor who has entertained millions of people in India and abroad. Gaurav is known for his unique style of expressional comic rendered in his signature two liners. He sometimes uses the Marwari language for his humor. His poetry has a mixture of engaging humor and penetrating satire. When he takes the podium, the auditorium is filled with continuous laughter. Gaurav is not only a comic poet but also a youth icon. He has been associated with Johny Lever Live Shows since 2014. He is a winner of Laughter Challenge on Star TV, Comedy Ka King Kaun on SUB TV, and Hasya Kavi Muqabla on Zee TV. As a poet of distinction, Gaurav has been felicitated with numerous awards, including Saraswati Puraskar and Rajasthan Gaurav Puraskar. He has performed in over 38 countries, including multiple times in United Kingdom, Canada, and United States.
Sudeep ‘Bhola’ Soni, son of poet Sandeep Sapan, is a native of Jabalpur. He is a young talented poet who has established himself as a popular humorist. He is famous for his earthy wit and political satire and is celebrated for his entertaining melodies and parodies on social and political dissonance, including poems on Indian soldiers and martyrs, helpless farmers, and child labor. His creative writings and compositions have touched the hearts of poetry lovers across the globe via electronic and social media. With 200 episodes, and counting, he is a lead cast of ‘Lapete mey Neta Ji’ show on national TV. Sudeep Bhola is a commerce graduate from Durgawati University, and a skilled jewelry craftsman with a family jewelry business in its third generation. He has been felicitated with numerous awards and honors by many prestigious organizations and institutions. Sudeep Bhola has been invited to recite his poems from India's prestigious national Kavi Sammelan at Red Fort and Delhi Hindi Academy. He has enthralled audiences with his compositions in U.K, Ireland, Ethiopia, Kenya, Sri Lanka, Nepal, Oman, Qatar, and Hong Kong. This is his 3rd visit to the United States.
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१ वां द्विवार्षिक अधिवेशन
जुलाई 28-30, 2023 इंडिआना, अमेरिका
विस्तृत समाचार
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Invitation: International Hindi Association’s
21st Biennial Convention 2023, Carmel, Indiana
A friendly reminder
The International Hindi Association (IHA) is holding its 21st biennial in-person convention this year from Friday, July 28th to Saturday, July 29th, 2023, in Carmel, Indiana, USA. The Convention theme is “Hindi Education for the Next Generation.” On behalf of the International Hindi Association in collaboration with Consul General of India, Chicago, and Hindi Samanvay Samiti Chicago, we would like to invite you, your family and friends to attend and participate in this convention.
Please follow the links below for convention registration and hotel booking.
1. Hindi Convention Registration
2. Book Your Hotel (Click Here): IHA Special lodging rates for overnight stay at Holiday Inn, Carmel.
Address: 251 Pennsylvania Parkway, Carmel, IN - 46280
3. For Kavi Sammelan Tickets only:
4. Donation for advertisement/sponsorship:
- Donation/payment by Zelle: Zelle to: ihaindiana@gmail.com
- Donation/Payment by Check:
Please make your check payable to "International Hindi Association'', and mail it to:
- International Hindi Association
10740 English Oaks Dr.
Carmel, IN 46032
- Donation/Payment by Credit Card/PayPal:
https://www.paypal.com/donate/?hosted_button_id=AT2WJFWT84DYQ
Note: All donations are tax deductible (TAX ID 58-1988753)
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We look forward to your participation. Please do not hesitate to contact us if you have any questions.
Regards,
डॉ. राकेश कुमार
Dr. Rakesh Kumar
संयोजक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का 21वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन
Convener, International Hindi Association’s 21st Biennial Convention
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा, यूएसए
President, International Hindi Association-Indiana Chapter,
Email/ईमेल: ihaindiana@gmail.com
Phone/WhatsApp: +317-249-0419
Web: http://ihaindiana.org; http://www.hindi.org
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं में होने वाले कार्यक्रमों की रिपोर्ट
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - नार्थईस्ट ऑहियो शाखा
इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप
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"अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा के पदाधिकारी व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के ऐतिहासिक स्वागत समारोह में शामिल"
द्वारा- डॉ. कुमार अभिनव, सचिव, अं. हि. स.-इंडियाना शाखा
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा के पदाधिकारी - डॉ. राकेश कुमार, विद्या सिंह, डॉ. कुमार अभिनव, डॉ. देवव्रत सिंह ने भारत गणराज्य के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में 22 जून, 2023 को व्हाइट हाउस में आयोजित "आगमन समारोह" में भाग लिया।
इस ऐतिहासिक अवसर पर भाग लेने के लिए राष्ट्रपति और प्रथम महिला डॉ. बिडेन के प्रतिष्ठित निमंत्रण की सिफारिश और सहायता भारत के महावाणिज्य दूत, शिकागो - श्री सोमनाथ घोष और वाणिज्य दूतावास, पीआईसी - श्री रणजीत सिंह द्वारा की गई थी। हमें यह सम्मान और अवसर देने के लिए हम श्री घोष और श्री सिंह के आभारी हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति और भारत के प्रधान मंत्री की प्रतीक्षा करते हुए व्हाइट हाउस परिसर में प्रवेश करना और व्हाइट हाउस, वाशिंगटन स्मारक, लिंकन मेमोरियल के दृश्यों का आनंद लेते हुए साउथ लॉन गार्डन में घूमना अविश्वसनीय रूप से एक रोमांचक अनुभव था। हमने विभिन्न सशस्त्र बलों के कर्मियों के साथ भी बातचीत की और उनके साथ तस्वीरें लीं। तैयारी और कार्रवाई में पूर्ण धूमधाम और दृश्य देखना बहुत अच्छा लगा। लगभग 5,000 की उपस्थिति के साथ, हमारा मानना है कि यह किसी भी विश्व नेता के "आगमन समारोह" के लिए सबसे बड़ी उपस्थिति थी। इसने हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व महसूस कराया, कि भारत के प्रधान मंत्री को ऐसा सम्मान दिया गया है।
सैन्य बैंड के प्रदर्शन के बाद, भारतीय मूल के एक प्रसिद्ध वायलिन वादक और पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के छात्रों के एक गायन समूह - "पेन मसाला ग्रुप" का प्रदर्शन हुआ। फिर वह क्षण आ गया जिसका हम इंतजार कर रहे थे - राष्ट्रपति और डॉ. बिडेन पीएम मोदी के साथ मंच पर पहुंचे। राष्ट्रपति सबसे पहले बोले - हर दो या तीन पंक्तियों के बाद उनके भाषण का हिंदी में अनुवाद किया जा रहा था। व्हाइट हाउस और आसपास के क्षेत्र में हिंदी की धूम सुनना रोमांचकारी था। जब प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को बोलने के लिए पेश किया गया तो उत्साह चरम पर पहुंच गया। और उनका भाषण - हिंदी में - व्हाइट हाउस के चारों ओर शेर की राजसी दहाड़ की तरह गूँज उठा। दोनों भाषणों का जोर लोकतंत्र के महत्व और सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच दोस्ती पर था।
यह दिन और यात्रा इतिहास का हिस्सा होगी और हम इसे जीवन भर याद रखेंगे। भारतीय अमेरिकी होने के नाते यह गर्व का दिन था।
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अपनी कलम से
"किताबों की महिमा"
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द्वारा - डॉ नन्दकिशोर साह
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डॉ नन्दकिशोर साह, पूर्वी चम्पारण, बिहार से हैं।अभी जिला मिशन प्रबंधक (एसएम एंड सीबी), उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन में कार्यरत हैं। समसामयिक मुद्दों पर लेखन में रुचि रखते हैं।
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किताबों की महिमा
किताबों की दुनिया अनन्त है। वे कभी आपको निराश नहीं करतीं। हर पुस्तक आपसे संवाद स्थापित करती है, बातें करती हैं, बीते जमाने की, दुनिया की, इंसानों की, आज की, कल की, एक-एक पल की। वे किसी न किसी रूप में आपके ज़हन का हिस्सा बन जाती हैं और आपके व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं। मन में स्थाई भाव पैदा करती है जो कभी खत्म नहीं होता। किताबें मित्रों में सबसे शांत, बुद्धिमान और शिक्षकों में सबसे धैर्यवान हैं। एक किताब से ईमानदार मित्र कोई नहीं हो सकता और वह भी वैसा दोस्त जो कभी न लड़े, न नाराज़ हो। पुस्तकें हमारी सबसे बड़ी मित्र हैं। हमें हमेशा अच्छी पुस्तकों को अपने जीवन में स्थान देना चाहिए। पुस्तक हमारी प्रेरणा स्रोत हैं। महात्मा गाँधी भी भगवद गीता को पढ़कर प्रेरणा लेते थे। किताबें हमारे सोचने समझने की शक्ति को बढ़ाती हैं।
किताबों से सबसे पहला परिचय स्कूल में होता है और फिर ताउम्र यह परिचय इतना गहरा होता जाता है कि किताबें ही सबसे अच्छी दोस्त बन जाती हैं। दुनिया कितनी भी बदल क्यों न जाए, इन किताबों की दुनिया हमेशा ही बरकरार रहेगी। बचपन के दोस्त जैसा होता है। जैसे-जैसे आपको किताबें भाने लगती है उतना ही वे आपके ज्ञान, शिक्षा और क्षमता के संवर्धन में सक्रिय हो जाती हैं। किताबें ही है जिसे पढ़कर हम डाक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, प्रोफेसर, वकील, लेखक या किसी कार्य से जुड़ अपना और समाज का दायित्व सँभालते हैं। किताबें आपके व्यावसायिक, प्रशासनिक, कानूनी और सभी तरह की जानकारियाँ समेटे सदैव आपकी मदद को हाज़िर रहती हैं।
आजकल तो हम हर तरफ उपकरणों से घिरे हैं। सबको चलाने के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है। चार्ज खत्म होने पर ये उपकरण बन्द हो जाते हैं किंतु किताबों की चार्जिंग कभी खत्म नहीं होती है बल्कि आपके दिमाग को सीधा चार्ज करती है। किताबें ज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत होती हैं। जीवन जीने के संदर्भ में आपकी दोस्ती इन किताबों से हो गई तो समझ लीजिए कि इनके जरिए आप काफी कुछ सीख सकते हैं। किताबें ज्ञान का अद्भुत स्रोत होती है और इनके माध्यम से आप दुनिया के उन हिस्सों की संस्कृतियों का दर्शन समझ पाते हैं, जहाँ आप पहुँच न पाए हो। कई बार तो यह जिंदगी की दिशा और दशा भी तय कर देती हैं। सोच को बदल कर रख देती हैं। यह कभी भी आपको अकेला नहीं छोड़ती हैं। साथ ही बदले में यह हमेशा कुछ नहीं चाहती हैं। किताबें सोच को विस्तार देती हैं। कन्फिडेन्स बढ़ाती हैं। किताबें ही हैं जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विचारों और विचारकों से हमारा अनमोल परिचय करवाती हैं। इन किताबों के जरिए आप पन्नों के माध्यम से अनंत यात्रा करते रहते हैं। इसलिए जरूरी है कि किताबों से दोस्ती करें। उन्हें पढ़ें और ऐसी संस्कृति को बढ़ावा दें।
हमें प्रतिदिन किताब पढ़ने की आदत डालनी चाहिए। आज किताबें पिज्जा, बर्गर के मूल्य पर उपलब्ध हैं। अतः किताबें खरीदें एवं पढ़ें। पुस्तक ज्ञान का सागर होती हैं और इन्हें पढ़ने के बाद आपको कभी हीरा तो कभी मोती जैसे जवाहरात प्राप्त होते हैं। कई बार ये हमारे विषय होते हैं जैसे की विज्ञान, गणित, उपन्यास, साहित्य, आदि। आवश्यकतानुसार आप कोई भी विषय चुन सकते हैं। जरुरी नहीं की ये आपके पाठ्यक्रम से संबंधित हों, कई बार लोग अपने ज्ञान को बढ़ाने हेतु विभिन्न पुस्तकें पढ़ते हैं।
किताबें बहुमूल्य होती हैं, ज्ञान का भंडार होती हैं। किताबें तमाम शंकाओं का तथ्यात्मक समाधान करती हैं लेकिन गूगल के दौर में किताबों के प्रति हमारा लगाव, हमारी रुचि कम होती जा रही है। बच्चों के लिए पढ़ाई जरूरी भी है और मजबूरी भी, लेकिन उनके साथ-साथ हर उम्र के लोगों के लिए पढ़ना आवश्यक है। किताबें पढ़ने से किसी चीज को याद रखने की क्षमता विकसित होती है। किताबें पढ़ने से एकाग्रता बढ़ती है क्योंकि जब आप पढ़ रहे होते हैं तो आपका ध्यान एक ही तरफ केंद्रित होता है। पढ़ने के दौरान आपके सामने कई शब्द आते हैं जो आपके दिमाग में इकट्ठा हो जाते हैं और आपके अपनी भाषा का हिस्सा बन जाते हैं। रीडिंग आपको एक बेहतर कम्युनिकेटर बनाती है। आप जितना ज्यादा पढ़ेंगे, आपका शब्द भंडार भी उतना ही समृद्ध होगा। किताबें पढ़ने से कल्पनाशीलता और सोच का दायरा बढ़ता है। विविध रूपों में किताबें मनुष्य और साहित्य की रचनात्मकता को बढ़ाने का काम करती हैं। राष्ट्रीय, समसामयिकी, वर्तमान परिवेश में विभिन्न क्षेत्रों में हो रही गतिविधियों को किताबें प्रदर्शित करती हैं। इसलिए समय बचाकर हमें किताबों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
मनुष्य जीवन में पुस्तकें अहम भूमिका का निर्वाह करती हैं। दुनिया की किसी भी चीज के बारे में जानकारी पुस्तकों में होती है। वर्तमान इंटरनेट युग में पुस्तकों का उपयोग कम हुआ है लेकिन महत्व अभी भी उतना ही है। पुस्तक बचपन से हमारी मित्र होती है। स्कूल की पढाई से लेकर कॉलेज तक किताबों से हमारा मित्रता का रिश्ता होता है। क, ख, ग से लेकर अल्फा बीटा तक कि पढ़ाई हम पुस्तकों के माध्यम से करते हैं। पुस्तक से हमारे मन का अंधकार दूर होता है। स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान के बारे में जानकारी पुस्तक के जरिये ही दी जाती है।
पुस्तक ज्ञान के साधन के साथ-साथ मनोरंजन का भी माध्यम होती हैं। कुछ पुस्तकें आपको हँसा सकती हैं, तो वहीं कुछ अपनी रोचक कहानियों के साथ आपको रुला भी सकती हैं। जैसे की दुनिया में अलग-अलग क्षेत्र होते हैं, वैसे ही पुस्तकें भी होती हैं। जैसे की डॉक्टरों के लिये अलग किताबें होती हैं और इंजीनियरिंग के लिये अलग। आप चाहे जिस क्षेत्र में भी जाएँ, वे पुस्तकें ही हैं जो आपके सच्चे साथी के रूप में हर जगह काम आयेंगी।
पुस्तकों को व्यक्ति का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है। वे ज्ञान और जानकारी की एक संग्रह हैं, यह ठीक ही कहा गया है, “एक पुस्तक से वफादार कोई दोस्त नहीं है”। किताब हमें बहुत कुछ देती हैं लेकिन बदले में यह कुछ नहीं माँगती हैं। एक अच्छी किताब हमारे मूड को तुरंत उभार सकती है और हम पर गहरा असर छोड़ सकती है।
किताबें मानव जाति के लिए एक आशीर्वाद है। हम भाग्यशाली हैं कि बड़ी संख्या में विद्वानों ने पुस्तकों के माध्यम से अपने ज्ञान और जानकारी को साझा किया है। दुनिया भर में लाखों किताबें प्रकाशित हुई हैं। पुस्तकें हमारे जीवन में बहुत महत्व रखती हैं। एक अच्छी किताब हमारे जीवन को बेहतर बना सकती है। पुस्तकों के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर जाने का आभासी अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। इतिहास की किताबें हमें अपनी जड़ों के करीब ले जाती हैं। विभिन्न देशों के इतिहास अलग-अलग युगों के लेखकों द्वारा विभिन्न पुस्तकों में अंतर्निहित हैं।
पुस्तकें व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एक व्यक्ति जो नियमित रूप से किताबें पढ़ता है, उसके पास एक अच्छा व्यक्तित्व होता है। पुस्तकें हमारे ज्ञान को बढ़ाती हैं, हमारी दृष्टि का विस्तार करती हैं और विभिन्न दृष्टिकोणों से चीजों को देखने की क्षमता प्रदान करती हैं, हमारी रचनात्मक शक्ति को बढ़ाती हैं और बहुत कुछ करती हैं। किताबें हमारे लिए सबसे अच्छे दोस्त की तरह होती हैं, जो हमारे लिए परवाह करती है और हमें पूरे दिल से जीवन में अच्छा करते देखना चाहती हैं। एक अच्छे दोस्त की तरह, किताबें हमें कभी नहीं छोड़ती हैं। किताबें पढ़ने की आदत विकसित करने वाला व्यक्ति कभी अकेलापन या ऊब महसूस नहीं कर सकता है। यदि आपके पास करने के लिए कुछ नहीं है, तो आप एक पुस्तक निकाल सकते हैं और पढ़ सकते हैं।
किताबें पढ़ने से कई फायदे मिलते हैं। यही कारण है कि बच्चों को कम उम्र से पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया जाता है। काल्पनिक पुस्तकें हमें कई पात्रों से परिचित कराती हैं और विभिन्न स्थितियों को सामने रखती हैं। इन पुस्तकों को पढ़ते समय हमें विभिन्न प्रकार की काल्पनिक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। वे हमें अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरीकों से निपटने की बुद्धि देती हैं। पढ़ना हमें एक काल्पनिक दुनिया में ले जाता है और हमारी रचनात्मकता को बढ़ाने में मदद करता है। जितनी अधिक पुस्तकें हम देखते और पढ़ते हैं, उतने अधिक शब्द पढ़ते हैं और इससे हमारी शब्दावली में सुधार होता है।
किताबें पढ़ने से कई लाभ मिलते हैं। यह हमें आश्वस्त करती है, हमारी शब्दकोष में सुधार करती है, हमारे पढ़ने और लेखन कौशल को बढ़ाती है, हमें जीवन के बारे में एक नया दृष्टिकोण देती है, ज्ञान को बढ़ाती है, हमें बुद्धिमान बनाती है और हमारे समग्र व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। एक व्यक्ति जो अच्छी तरह से पढ़ता है, वह समृद्ध होता है। एक पुस्तक कभी आपको धोखा नहीं देती और सदैव आपके ज्ञान को बढ़ाती ही है। हम ताउम्र उनसे सीखते हैं और विरासत के रूप में उन्हें सहेज के भी रखते हैं। पुस्तक हमारे जीवन का आधार होती हैं और हर व्यक्ति को जीवन के किसी न किसी मोड़ पर इनको साथी अवश्य बनाना पड़ता है जिनके रहते जीवन को एक सही दिशा मिलती है। कभी-कभी तो ये हमारे पक्के दोस्त भी होते हैं, जो हमें वर्णमाला से लेकर जीवन के कठिन सवालों तक के जवाब बड़े आसानी से दे देते हैं।
पुस्तकें बच्चों से लेकर बड़ो तक सब के लिये महत्त्वपूर्ण होती हैं। बच्चे अपनी प्रारंभिक शिक्षा पुस्तकों के माध्यम से लेते हैं, तो वही बुजुर्ग उसे अपने मनोरंजन के साधन के रूप में या धार्मिक कार्यों की पूर्ति हेतु करते है अर्थात वे हर क्षेत्र और उम्र में जरूरी होती हैं। आज कल पुस्तक कई प्रकार के मिलने लगी हैं, जैसा कि ऑनलाइन और ऑफ़लाइन। वे पुस्तक जिन्हें आप अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर पढ़ सकते हैं, वे ऑनलाइन वाली होती हैं। ये बहुत ही बेहतरीन होती हैं और इनको आप आराम से अपने फोन या लैपटॉप में पढ़ सकते हैं। इनको कहीं भी ले जाना बड़ा आसान होता है और फटने और कीड़े लगने से सुरक्षित भी रखा जा सकता है। दूसरी होते है मुद्रित या ऑफलाइन, ऐसी पुस्तक जो हम अपने स्कूलों और घरों में अक्सर देखते हैं। जो कागज की बनी होती हैं। इनके भी अपने फायदे हैं जैसा कि कभी कोई निशान लगाना हुआ तो लोग पढ़ते-पढ़ते इनपर निशान भी लगा लेते हैं और कुछ लिख भी सकते हैं। कई लोग इन्हें पढ़ना पसंद करते हैं तो कुछ ऑनलाइन पुस्तकों को। जमाना चाहे जो भी हो, पुस्तकें सदैव जरुरी रही हैं और रहेंगी। यह आपको सदैव कुछ नया ही सिखाती है।
पुस्तक आपका साथ कभी नहीं छोड़ती, कई बार आपने स्वयं को अकेला पाया होगा और कभी-कभी ऐसे स्थिति में हमारे परम मित्र भी साथ नहीं होते, लेकिन पुस्तक सदैव आपके साथ होती हैं। कभी वे अपनी मजेदार कहानियों के माध्यम से आपको गुदगुदाती हैं तो कभी कथानायक की पीड़ा आपके आँखों में आँसू ला देती है। वे उत्कृष्ट भी हैं जब सलाह लेने की बात आती है। वे हमारे जीवन को अधिक अर्थ देने में मदद करती हैं। बदले में बिना कुछ माँगें हमेशा किताबें हमारी तरफ से रहती हैं।
अब आप ऑनलाइन भी पुस्तक पढ़ सकते हैं, चाहे वो बच्चों का पंचतंत्र की कहानियाँ हो या अरस्तु का नाट्य शास्त्र। सब कुछ ऑनलाइन मिल जाते हैं और आप आराम से पढ़ सकते हैं। इनकी खासियत यह होती है कि ये खराब नहीं होते और इन्हें आसानी से अपने फ़ोन में भी सुरक्षित रखा जा सकता है। इन्हें आप अपने साथ कही भी ले जा सकते हैं और इनका आनंद उठा सकते हैं। किताबें हमेशा आपके बचाव के लिए होती हैं, जैसे एक सबसे अच्छे दोस्त से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस तरह की स्थिति में हैं। किताबें न केवल बोरियत को मारती हैं बल्कि हमारे ज्ञान और रचनात्मकता को भी बढ़ाती हैं।
हमारे इतिहास में कई महापुरुष रहे हैं और उनके वक्तव्य और ज्ञान भरी बातों को हम आसानी से पुस्तकों में पढ़ सकते हैं। जैसा कि गाँधी जी, जो भले आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी विचारधारा अभी भी जिन्दा है। पुराने काल में लोग मौखिक ज्ञान लिया करते थे और सबसे पहले पत्तों पर लिखा गया। धीरे-धीरे कागज में परिवर्तित हो गया। पहले हस्तलिखित रूप में उपलब्ध थे, और धीरे-धीरे प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद पुस्तकों का मुद्रण किया जाने लगा। पुस्तक के आविष्कार के बाद लोग पुस्तकों के माध्यम से ज्ञान का हस्तांतरण एक युग से दूसरे युग में करने लगे। पुस्तकों के आविष्कार के कारण ही हम अपने इतिहास को जान पाए। शायद शब्द कम पड़ जाए लेकिन उनकी उपयोगिता कम नहीं होगी। पुस्तकों का उपयोग हम ज्ञान के संग्रहण के लिये करते हैं। सन् 1440 में फ्रांस में प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे पूरे विश्व में इसका प्रचलन हो गया। इसके बाद पुस्तकों का मुद्रित माध्यम समाज में उपलब्ध होने लगा। 1455 में पहली पुस्तक छपी जो की बाइबिल थी।
सदियों से लाखों किताबें लिखी और प्रकाशित की गई हैं। मनुष्य ने प्राचीन काल से लिखना शुरू किया और यह एक प्रथा है जो उसने आधुनिक युग में भी नहीं छोड़ी है। कई अनुभवी लेखकों ने विभिन्न विषयों पर कई पुस्तकों को लिखा है। काल्पनिक और गैर-काल्पनिक दोनों तरह की किताबें विज्ञान, ज्योतिष, फैशन, सौंदर्य, जीवन शैली, इतिहास, संस्कृति, दर्शन और प्रौद्योगिकी सहित विभिन्न शैलियों पर लिखी गई हैं। यात्रा, प्रौद्योगिकी, पौराणिक कथाओं, खगोल विज्ञान, फैशन, विज्ञान, साहित्य, इतिहास सहित विभिन्न विषयों पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। विभिन्न क्षेत्रों के प्रत्येक और हर पहलू को अलग-अलग पुस्तकों द्वारा छुआ गया है। इन्हें ज्ञान के खजाने के रूप में जाना जाता है। जितनी गहराई में आप किताबों में ढूंढते हैं, उतना ही अधिक खजाना आपको मिल जाएगा। एक ऐसा खजाना जो हमेशा के लिए आपके पास रहेगा। इन पुस्तकों में विभिन्न विषयों के बारे में ज्ञान है और यह पाठकों को मंत्रमुग्ध कर रही हैं। किताब पढ़ने की आदत उन सबसे अच्छी आदतों में से एक है, जिसे कोई व्यक्ति अपना सकता है। समझदार बनने के लिए विभिन्न प्रकार की पुस्तकों को पढ़ने की अत्यधिक अनुशंसा की जाती है।
किताबें हमेशा हमारे भले के लिए होती हैं। इन्हें आसानी से चलते-फिरते ले जाया जा सकता है और बस कहीं भी पढ़ा जा सकता है। किताबें न केवल बोरियत को मारने और अकेलेपन की भावना से बचने में मदद करती हैं बल्कि ज्ञान भी प्रदान करती हैं। एक व्यक्ति जो विभिन्न प्रकार की पुस्तकों को पढ़ता है और नियमित रूप से पढ़ने के लिए प्रेरित करता है, वह अच्छी तरह से सीखता है। वह सांसारिक बुद्धिमान होता है। वह विभिन्न स्थितियों को उन लोगों की तुलना में बेहतर ढंग से संभाल सकता है जो पढ़ने में आनाकानी करते हैं। किताबें पढ़ना आत्मविश्वास लाता है और यह उसके व्यक्तित्व में प्रतिबिंबित होता है। लोग ऐसे व्यक्ति को आदर से देखते हैं जो अच्छी तरह से पढ़ा हुआ है।
किताबों की महिमा अपार है। कहा जाता है कि जब एक लाइब्रेरी खुलती है तो एक जेल बंद हो जाती है। यानी कि किताबें आपको अपराधिक गतिविधियों की ओर जाने से रोकती हैं। जरूरत पड़ने पर गवाही देती है। इतना ही नहीं आपको सच बोलने के लिए मजबूर करती है। किताबों पर समाज का अटूट विश्वास है वरना गीता / कुरान पर हाथ रखकर कसम खाने से लोग नहीं घबराते। इंटरनेट युग के कारण किताबों की महत्व कम नहीं हुआ है। यह सर्व सुलभ हो गया है। जब आप गूगल में विषय ढूंढते हैं तो पीडीएफ के रूप में वहाँ भी किताबें ही मिलती हैं। आज महँगाई के दौर में कपड़े, जूते, पीजे महंगे हुए हैं। किताबें तो आज भी चाय समोसे के मूल्य पर मिल जायेंगी ।
जब आप घर बनवाते हैं तो शौचालय, रसोई, पूजा घर निश्चित रूप से बनवाते हैं तो एक कमरा पुस्तकालय का भी बनवाइये। बच्चों को पाठ्य पुस्तकों के अलावे मनोरंजक, प्रदायक कहानी की किताबें भी खरीद कर दीजिए। इससे बच्चों के अंदर किताब से लगाव बढ़ेगा। अपने सपनों को साकार करेगा। लोग जन्म लेते और मरते हैं, मगर किताबों की कभी मौत नहीं होती। आप कितनी ही तरतीब से किताबों को खत्म करने की कोशिश करें किंतु इसकी हमेशा गुंजाइश रहती है कि एक प्रति जिंदा बच जाए और किसी दूरदराज की लाइब्रेरी के सेल्फ में सुरक्षित पड़ी रहे।
आज एक बड़ी विडंबना ही है कि युवा पीढ़ी मोबाइल में मस्त है और किताबें उनकी इंतजार कर रही हैं। युवाओं को अधिक से अधिक किताब की खरीदारी करनी चाहिए। इससे लेखकों और प्रकाशकों का मनोबल बढ़ेगा। साथ ही नई पीढ़ी को नई दिशा मिलेगी। यह जीवन की बाधाओं को दूर करने का मार्ग दिखाती है। किताबें पढ़ने से बुद्धि का विकास होता है। साथ ही आपकी रूचि और नज़रिया विकसित होता है। खुद को बेहतर बनाने और अपडेट करते रहने के लिए किताबें बहुत अच्छा माध्यम है। आप इसे अपनी आदत बनाने की कोशिश करें। किताब पढ़ने के लिए रोजाना एक नियमित समय निर्धारित करें और उस निर्धारित समय पर प्रतिदिन कोई न कोई किताब जरूर पढ़ें।
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द्वारा -श्रीमती वीना (भान) अरोड़ा
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श्रीमती वीना (भान) अरोड़ा भारत से आकर कई दशकों से सपरिवार एक्रोन, ओहायो में रहती हैं। ये सेवानिवृत्त कर लेखाकार (Tax Accountant) हैं। हिंदी कविता लिखना उनका जुनून है। ज्यादातर अपनी मातृभूमि की यात्रा के दौरान भारत के अपने अनुभवों के बारे में लिखती हैं। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की सक्रिय कार्यकर्ता हैं। अ.हि.स. की आजीवन सदस्या हैं।
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बनारस
एक निजी नाव पर सवार हुए, गंगा की लहरों से खेलें।
बनारस की पावन भूमि पर, हरदम ही चलते थे मेले।।
चलती नाव से भव्य घाटों के, दर्शन होते जाते थे।
हर घाट के छुपे इतिहास को, मल्लाह दुहराते जाते थे।।
नीचे नाव से टकराती लहरें, पावन गंगा बहती थी।
ऊपर आकाश पे चन्द्र छटा, पानी को चमकाती थी।।
पत्तों के दोनों में हमने, कुछ पुष्प व दीप सजाये थे।
प्रज्वलित कर उन दीपों को, गंगा के जल में लहराये थे।।
अन्य दीप कतारों से मिलकर, वो टिम-टिम कर के जाते थे।
गंगा के वक्षस्थल पर वो, अद्धभुत दृश्य बनाते थे।।
फिर आँखों से ओझल हो कर, गंगा में ही छुप जाते थे।
गंगा के अंतर मन को, रोशन कर के खो जाते थे।।
एक निजी नाव पर सवार हुए, गंगा की लहरों से खेलें।
बनारस की पावन भूमि पर, हरदम ही चलते थे मेले।।
टैक्सी वाले थे चतुर बड़े, साड़ी शॉप में ले जाते थे।
साड़ी हम ख़रीदे तो, वो भी कमीशन पाते थे।।
हमारी शौपिंग के सदके, उनके घर भी चल जाते थे।
पर बनारस की साड़ी का क्या कहना, हर साड़ी मन को भाई थी।।
कितने कारीगरों ने मेहनत कर, अपने हाथों से बनाई थी।
पर दुकानदार उन साड़ी पर, भारी रकम कमाते थे।।
मैले कपड़ो में बैठे कारीगर, बस मिनिमम वेज ही पाते थे।
हमने भी साड़ी शौपिंग कर डाली, चून्गें में सूट भी आयें हैं।।
बनारस ट्रिप की याद गार, संदूकों में भर ले आयें हैं।
एक निजी नाव पर सवार हुए, गंगा की लहरों से खेलें।
बनारस की पावन भूमि पर, हरदम ही चलते थे मेले।।
बनारस की सड़कों, गलियों का क्या कहना, हर तरह का ट्रैफिक चलता था।
मोटर गाड़ी, पैदल यात्री, स्कूटर रिक्शा, सब अपनी धुन में चलता था।।
कोई को कोई की फिकर नही, सब अपनी रफ़्तार से जाते थे।
पैदल यात्री कुछ हम जैसे, दाँया बाँया करते रह जाते थे।।
पूं पूं , पी पी, का शोर घना, कानों में ढोल बजता था।
साथ में शिव मंदिर में, घंटा बजता जाता था।।
कीर्तन या ओम नमः शिवाय, घोष साथ मे आता था।
एक निजी नाव पर सवार हुए, गंगा की लहरों से खेलें।
बनारस की पावन भूमि पर, हरदम ही चलते थे मेले।।
काशी विश्वनाथ के दर्शन कर, जीवन को सफल बनाया था।
बरसों का संचित मनोरथ, जो चाहा था वो पाया था।।
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द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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ग्रीष्म
टपक रहा है ताप सूर्य का, धरती आग उगलती है।
लपट फैंकती हवा मचलती, पोखर तप्त उबलती है।।
दिन मे आँच रात में अधबुझ, दोपहरी अंगारों सी।
अर्द्ध रात अज्ञारी जैसी, सुबह शाम अखबारों सी।।
सिगड़ी जैसा दहक रहा घर, देहरी धू धू जलती है।
गरमी फैंक रही है गरमी, तपती सड़क पिघलती है।।
सीना सिकुड़ गया नदियों का, नहरें नंगीं खड़ीं दिखीं।
-कुए बावड़ी हुए बावरे, झीलें बेसुध पड़ी दिखीं।।
तपन घुटन में हौकन ज्वाला, बाग बाग में लगी हुई।
बदली बनकर बरस रही है, आग आग में लगी हुई।।
जीभ निकाले श्वान हाँफते, बेबस व्याकुल लगते हैं।
जीव जन्तु प्यासे पशु पक्षी, जग के आकुल लगते हैं।।
हरे खेत हो गए मरुस्थल, पर्वत रेगिस्तान हुए।
सारे विटप बिना छाया के, जलते हुए मकान हुए।।
एसी कूलर अंखे पंखे, डुलें वीजने नरमी से।
बिगड़ रहे हैं सुधर रहे हैं, जूझ रहे हैं गरमी से।।
जिनके सुधरे एसी फ्रीजर, कूलर पानी आता है।
उनके घर में जेठ मास में, जड़काला आ जाता है।।
इस पर भी यदि बिजली माता, चली गईं तो मरना है।
धार लगाकर चुए पसीना तन बन जाता झरना है।।
आस पास के बोरिंग सूखे, सरकारी नल चले गए।
लम्बी लगी कतार अन्त में, नहीं मिला जल छले गए।।
करवट बदल रहा है मौसम, मन सूना पनघट क्यों है।
चलो चलें गर्मी में देखें, मरघट पर जमघट क्यों है।।
मन बेचैन हृदय घायल सा, उठा बैठ में अड़चन है।
साँस खंजरी सी बजती हैं, धक धक करती धड़कन है।।
जीने मरने की नौबत है, प्यासों की अकुलाहट है।
घर भर है हलकान सुबह से, मौसम में गरमाहट है।।
खौल रहा है पेट "प्राण" का, शरबत चाहत करता है।
मगर सुगर हो गयी घूँट भी, तन को आहत करता है।।
जय हो धरमी ताई की, जय हो करमी भाई की।
जय बेशरमी बाई की भी, जय हो गरमी माई की।।
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द्वारा - श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव
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श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय”, औरंगाबाद- महाराष्ट्र से हैं। लेखन के साथ-साथ शोध कार्य में अध्ययनरत हैं।
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चौख़ट
कई दिनों से दिल की बात कहनी थी। कैसे बताऊँ, समझ नहीं आ रहा। आज किसी भी हालात में बताऊँगा, तभी दिल को सुकून मिलेगा। वह सिग्नल पर दिखाई दी। इसके पहले कई बार दिखी थी। उसे पहली बार भी वहीं देखा। देखते ही मैं प्रेम में डूब गया। मेरे बारे में उसके क्या विचार है पता नहीं। उसे देखने हर दिन यहाँ आता, किन्तु बोलने की हिम्मत अभी तक नहीं हुई। सामने खड़ी है नज़रों के, उतने में सिग्नल छूटा। पीछे से गाड़ियों के हॉर्न बज रहे थे। मुझे सुनाई या दिखाई नहीं दिया, उसके बिना। ट्राफिक पुलिस ने गाड़ी साइड में लगाने का इशारा किया। कुछ समय बाद गुस्से में कहा, “आपको नियम समझ नहीं आता।”
- “सर, मुझ से गलती हो गई, मैं फाइन भरने को तैयार हूँ।”
- “जल्दी फाइन भरो। यहाँ से रफा-दफा हो।”
दिल में इच्छा न होकर भी गाड़ी शुरू की। उसकी तरफ देखकर धीरे-धीरे गाड़ी चला रहा था। गाड़ी की तरफ वह आती दिखाई दी। मैंने गाड़ी खड़ी की। गाड़ी में बैठा रहा। उसने गाड़ी का शीशा खटखटाया। मैंने दरवाजे का शीशा नीचे किया, बाद में नीचे उतरा। उसकी तरफ देखता रहा। वह बोले जा रही थी, मैं सिर्फ सुनता रहा।
उसने जोर से कहा, “मैं आपको बहुत दिनों से देखती हूँ। आप अनेक बार सिग्नल छूटने के पश्चात भी वहीं खड़े रहते हैं। आपसे पुलिस वाला किस तरह बातें करता है, यह मैंने सुना, देखा। आप संस्कारी व्यक्ति दिखते हैं, दुबारा ऐसा मत करो।”
मैं देखता ही रहा। कुछ समय बाद मैंने कहा, “जी, दूबारा गलती नहीं होगी। जोरों से सांस ली और कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा था, लेकिन कह नहीं पाया।”
उसने कहा, “आप को कुछ कहना है।”
- “जी। कैसे बताऊं, समझ नहीं आ रहा।”
- “जो दिल में है, बता दो। मुझे बुरा नहीं लगेगा। आदत पड़ी है सुनने की।”
- “खुशी, मुझे आप से प्रेम है।”
- “आप क्या कह रहे हैं, पता है आप को। होश में हैं आप।”
- “हाँ। मैं होश में हूँ। मुझे कई दिनों से दिल की बात बतानी थी। मैं डर के मारे नहीं बता पाया। मुझे समाज, परिवार का डर नहीं था, आप को कैसा लगेगा इस बात का डर था।”
- “स्वराज, मैं आप से प्रेम नहीं करती।”
- “क्यों? मुझ में कमियाँ हैं, होगी भी! हर मनुष्य में कुछ कमियाँ रहती हैं। मैं आपको पसंद नहीं हूँ, तो आप को भुलाने की कोशिश करूँगा।”
- “ऐसा कुछ नहीं। आप को कोई भी लड़की पसंद करेगी। आप में कई अच्छे गुण हैं। मैं ही आपके लायक नहीं हूँ।”
- “मुझे आप पसंद हैं। मैं आपसे विवाह करना चाहता हूँ। सोचने के लिए समय चाहिए, तो आप लीजिए। मुझे आपके हाँ का इंतजार रहेगा।”
- “स्वराज, मैं हिजड़ा, छक्का, किन्नर, नपुंसक, थर्ड जेंडर, तृतीय पंथी आदि नामों से प्रसिद्ध हूँ। मुझे मेरे परिवार ने नहीं स्वीकारा, तो समाज, आपका परिवार कैसे स्वीकार करेगा।”
- “खुशी, आप कौन हो? यह मुझे मायने नहीं रखता। आप मुझे पसंद है। मैं तुम्हें दिल से चाहता हूँ। मैं आपके बिना नहीं जी सकता।”
- “मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ।”
- “मुझे कोई दिक्कत नहीं। मैं आपको पढ़ाऊँगा। मेरी माँ समाजसेविका है। हमारे रिश्तें को स्वीकार करेगी। माँ भी तृतीय पंथियों के लिए निरंतर कार्य करती आई है।”
- “मुझे अभी से डर लग रहा है कि आपकी माँ ने शादी को अनुमति नहीं दी तो।”
- “मैं माँ, परिवार को मनाऊँगा। मैं आपके साथ हूँ। रही बात समाज की, इससे मुझे कोई मतलब नहीं।”
- “आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर रहें हो, मैं भाग्यशाली हूँ। आप मेरे लिए इतना कर रहें हैं, मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैं तैयार हूँ शादी के लिए। किन्तु मेरा साथ कभी मत छोड़ना। साथ छोड़ा तो, मैं जी नहीं सकूँगी, पूरी तरह टूटकर बिखर जाऊँगी।”
- “साथ कभी नहीं छोडूँगा।”
- “स्वराज, तृतीय पंथियों के बुरे हालात है। उनका जीवन नरक बना है। समाज बुरी नजरों से देखता है उनकी तरफ। वे जीकर भी, मरे हुए हैं। वेश्या से भी बत्तर ज़िंदगी है उनकी। मैंने भी बहुत वेदना सही है। लोग क्या-क्या कहते हैं और क्या-क्या करते हैं, मुझे मालूम है। मैं बयाँ भी नहीं कर सकती। हम सिगनल, रेल में शौक से खड़े नहीं रहते, हमारी मजबूरी है। “उन्हें कोई काम पर रखता नहीं। रख भी लिया, तो शोषण ही करता, शारीरिक और मानसिक। मैं उनके के लिए कार्य करना चाहती हूँ।”
- “तुम्हारा साथ निरंतर दूँगा। मैं भी उनके अधिकार के लिए संघर्ष करता रहूँगा।”
- “स्वराज, अभी तक तृतीय पंथियों के लिए कई कानून, बिल पास हुए, किन्तु कोई फायदा नहीं। अप्रैल, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर को तीसरे लिंग के रूप में पहचान दी। किन्नर को जन्म प्रमाणपत्र, राशनकार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस आदि में तीसरे लिंग के तौर पर पहचान हासिल करने का अधिकार मिला। विवाह करना, तलाक देना, संतान को गोद लेना आदि अधिकार प्राप्त हुए। कुछ वर्ष पश्चात यानी 2016 में “ट्रांसजेंडर पर्सन्स” बिल पास हुआ। जिससे उन्हें शिक्षा, सामाजिक, आर्थिक आदि क्षेत्र में खुलकर जीने का अधिकार मिला। कालांतर से यानी 2019 में “ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम” बना। इससे तृतीय पंथी के अधिकार का संरक्षण होने वाला था। इन तीनों घटना पर प्रकाश डालने के पश्चात समझ आता है कि तृतीय पंथियों की समस्या कम नहीं हुई,बढ़ी है।”
- “खुशी, आप सही कह रही हैं, कानून सिर्फ कागज़ पर है, अस्तित्व में नहीं। कानून का अमल हो, इसलिए हम संघर्ष करते रहेंगे।”
- “स्वराज, तृतीय लिंग को सही मायने में मान्यता ही नहीं मिली। बस, रेल, विमान आदि में सफ़र करने के लिए आरक्षित सीट करने की सुविधा उपलब्ध रहती हैं, उसमें थर्ड जेंडर पर्याय ही नहीं। इन उदाहरण से उनका अस्तित्व समझ आता हैं।”
- “सही है खुशी। मैंने भी थर्ड जेंडर के संदर्भ में जानकारी हासिल की है। उनकी दयनीय अवस्था है। भारत में वर्ष 2009 में लगभग थर्ड जेंडर वर्ग की संख्या पाँच लाख थी, यह मैंने एक रिपोर्ट में पढ़ा है। उन्हें न्याय दिलाना ही हमारा मकसद हैं। बहुत समय बीता; हम रास्ते पर खड़े हैं। गहन विषय पर चर्चा हुई। अच्छा लगा। चलता हूँ, माँ राह देखती होगी। माँ को सब बताता हूँ, हमारे संदर्भ में। कुछ ही दिनों में माँ आप से मिलने आयेगी।”
खुशी प्रसन्न थी। मन ही मन हँसते घर जा रही थी। स्वराज की माँ कब आएगी। मैं उनकी अच्छी बहू बनूँगी। परिवार में घुल मिलकर रहूँगी। स्वराज को शिकायत करने का मौका नहीं दूँगी। इन सपनों में खुशी घूलमिल गयी। घर कब आया पता भी नहीं चला। हर दिन स्वराज घुल माँ का इंतजार करती। बहुत दिन गुजरे, स्वराज की माँ नहीं आई। स्वराज भी दिखाई नहीं दिया। ख़ुशी ख़ुद को ही समझाती, होंगे कुछ काम में।
एक दिन सुबह-सुबह बस्ती में एक महिला माँ आई। नाम, घर का पता पूछने लगी। मैं दूर से सब देख रही थी। वह घर की तरफ आती दिखाई दी। मैंने ख़ुद को ठीक ठाक किया। बैल बजी। मैंने दरवाजा खोला। तो सामने महिला दिखाई दी। मैंने नमस्कार किया। अंदर बुलाया। चाय पानी की। कुछ समय बाद खुशी ने पूछा, “आपका नाम! क्या काम है?”
“महिला ने कहा, “मैं स्वराज की माँ।”
“ओह! आप, नमस्कार माँ जी।” खुशी ने प्यार से कहा।
- “आप क्या करती है?”
- “स्वराज ने बताया नहीं।”
- “बताया। तेरे मुँह से सुनना है।”
- “मैं ग्रेजुएट हूँ। लेकिन....”
- “लेकिन क्या? बताओ।”
- “मैं किन्नर हूँ।”
- “तेरी मेरे बेटे से शादी...यह सोच भी कैसे सकती हो।”
- “हम दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। साथ रहना चाहते है।”
- “यह कभी संभव नहीं।”
- “आखिर क्यों माँ जी?”
- “हम ठहरे बड़े खानदान के, तू है की….”
- “इसमें मेरा क्या कसूर। आप तो तृतीय पंथियों के लिए कार्य करती हैं और विचार ऐसे।”
- “विचार, कार्य छोड़ दो। मैं क्या कहती हूँ, गौर से सूनो। मेरे बेटे के ज़िंदगी से दूर जाने के लिए तूझे क्या चाहिए?”
- “माँ जी, मुझे स्वराज चाहिए और कुछ नहीं।”
- “उसे छोड़कर, कुछ भी!”
- “माँ जी, आप जैसे कहेगी, वैसे मैं रहूँगी। मुझे आपके बेटे से अलग मत कीजिए। मैं उसके बिना जी नहीं सकती।”
- “तू सब कुछ करेगी, मेरे परिवार और उसके लिए। लेकिन मेरे बेटे को पिता होने का सुख कभी नहीं दे सकती।”
यह सुनकर खुशी कुछ देर नि:शब्द रही। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। सिर्फ स्वराज की माँ की तरफ देखती रही और बेहोश हो गई, घर में सन्नाटा छा गया, जैसे घर में कोई मरा हो। कुछ देर बाद स्वराज की माँ चली गई।
माँ शादी की अनुमति देगी या नहीं, यह सवाल स्वराज को सता रहा था। घर पर अकेला था वह, चिंता में डूबा। इतने में घर के बाहर गाड़ी की आवाज आई। वह जाग गया। खिड़की से बाहर देखा, तो माँ की गाड़ी दिखाई दी। कुछ समय बाद माँ ने बैल बजाई। स्वराज ने जल्दी से दरवाजा खोला। माँ कुछ भी न बोलकर हॉल में जाकर बैठ गई। चेहरे पर गुस्सा था। स्वराज ने कहा, “माँ पानी ।”
- “कोई जरूरत नहीं।”
-“माँ, आप शान्त हो जाइए। मुझसे कोई गलती हुई?”
-“तुम से नहीं, मुझ से हुई, संस्कार देने में।”
-“माँ क्या हुआ? साफ-साफ बताईए।”
-“तुझे लड़की नहीं मिली, प्रेम करने को।”
-“माँ, मुझे पता था, आप ऐसे ही बोलेंगी कारणवश बताया नहीं था मैंने।”
-“स्वराज, दूसरी लड़की से शादी कर।”
-“नहीं! मैं उसी से शादी करूँगा। अन्यथा किसी से नहीं।”
-“परिवार की इज्जत मिट्टी में मिलानी है तुझे, यही ठान लिया है न।”
-“ माँ, तुझे जो समझना है समझ। मैं कोई गलत कार्य नहीं कर रहा।”
-“तुझे शादी उसी से करनी है, तो घर से निकल जा। कभी चेहरा मत दिखाना मुझे। मेरी मृत्यु हो जाएगी, तब भी मत आना।”
-“माँ, ख़ुद का ख्याल रखना। हो सके तो मुझे माफ़ करना क्योंकि मैं तुम्हारी नज़र में गुन्हेंगार हूँ।”
स्वराज घर से निकल पड़ा, खुशी के बस्ती की तरफ, पैदल। समय रात का था। दो बजे घर पहुँचा, दरवाजा खटखटाया, देर से दरवाजा खुला। सामने स्वराज को देखकर खुशी घबरा गई। उसे लगा कि स्वराज माँ से झगड़ा करके ही आया है। उन्हें अंदर लिया, पानी दिया। कुछ समय के पश्चात खुशी ने पूछा, “क्या हुआ? इतनी रात आप...”
-“खुशी, मैंने जो सोचा था वैसे कुछ नहीं हुआ। माँ ने शादी को नकारा। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ, इसी वजह से, मैं माँ का घर छोड़कर आया हूँ।”
- “यह आपने अच्छा नहीं किया। माँ के दिल को आपको दु:खाना नहीं चाहिए था।”
- “मेरे पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था। मैं घर छोड़कर आया हूँ, माँ के प्यार को नहीं। सब ठीक ठाक होने के पश्चात घर बोलेंगी। खुशी, आपकी अनुमति हो, तो हम कल कोर्ट मॅरेज करेंगे।”
- “जो आपको सही लगे।”
दोस्तों की सहायता से शादी हुई। ज़िंदगी की नई शुरुआत की। किराए के घर में रहने लगे। कुछ वर्ष बाद स्वराज डाक्टर बना। दूसरों के अस्पताल में जॉब करने लगा। खुशी ने भी आगे की पढ़ाई जारी रखी। कालांतर से बैंक में शाखा प्रमुख पद पर विराजमान हुई। काम से समय निकालकर तृतीय पंथियों के लिए निरंतर कार्य करती रही। कार्य में स्वराज भी सहयोग देता रहा। देखते-देखते दोनों ने बहुत प्रगति की। स्वराज ने ख़ुद का अस्पताल बनाया। खुशी ने तृतीय पंथियों के लिए “समानता ट्रस्ट” नामक संस्था की स्थापना की। वहाँ कई तृतीय पंथी रहने लगे। जिन्हें कोई स्वीकार नहीं करता, उन्हें समानता ट्रस्ट स्वीकारता था। छूट्टी के दिन खुशी वहीं रहती।
खुशी के शादी को दस वर्ष हुए थे। घर में संतान न होने से खुशी दुःखी रहने लगी। किसी को बता भी नहीं पाती। एक दिन स्वराज से हिम्मत करके कहने लगी, “ज़िंदगी में संतान आवश्यक है। आपको कभी नहीं लगा, संतान हो।”
- “खुशी, समाज में अनेक महिलायें है, जो बच्चें को जन्म नहीं दे सकती। तू दुःखी क्यों होती है। तेरे शरीर रचना ही ऐसी है। तू जन्मता: संतान देने में असमर्थ हैं, इसमें तु म्हारा क्या दोष। हम अनाथालय से संतान लायेंगे, वह भी लड़की। माता-पिता का दायित्व निभायें गे।”
-“आप बहुत समझदार है। साथ ही परिवर्तन वादी भी! मैं समाज की चौख़ट में कैद थी। मेरी जैसी अनेक हैं। कई परंपरा ने गुलाम बनाया था मुझे, अंधश्रद्धा के नाम पर। आपने सामाजिक चौख़ट तोड़कर, मुझ से शादी की। ख़ुद के पैरों पर मुझे खड़ा किया। व्यक्तित्व को पहचान दिलाई। आज मैं जो कुछ हूँ, आपके कारण।”
खुशी, मुझे जो अच्छा लगा, मैंने किया। मुझसे पहले भी कई लोगों ने तृतीय पंथियों से विवाह किया है, इसमें नया कुछ नहीं। यह समय की माँग है। समाज की मानसिकता बदलनी चाहिए। मुझे आप जैसे कई व्यक्तियों का सहारा बनना है। उन्हें काबिल बनाना है। भले ही समाज की मानसिकता न बदले, मैं निरंतर कार्य करूँगा।
भविष्य में तृतीय पंथियों को समाज में मान-सम्मान मिलेगा। उन्हें उनके अधिकार मिलेंगे। तृतीय पंथियों को संविधान ने अधिकार देने के बावजूद भी समाज अधिकार क्यों नहीं दे रहा। इसके जिम्मेदार कौन है? और ऐसा क्यों हो रहा हैं...?
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"बाल विभाग ( किड्स कार्नर)"
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"छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक"
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स
डॉ. उमेश प्रताप वत्स, यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक
देश भर में 1674 से हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मराठा साम्राज्य छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक दिवस का उत्सव मनाया जाता है। जिस बादशाहत में सामान्य व्यक्ति तो क्या राजा अथवा सेनापति जब अपनी आवाज नहीं उठा सकता था तब उस महा अत्याचारी, क्रूर व निर्दयी शासक औरंगजेब के शासनकाल में मराठा शाहजी भोंसले व माता जीजाऊ के सपूत शिवाजी ने न केवल औरंगजेब की नाक में दम कर दिया अपितु रायपुर, बीजापुर सहित सभी रियासतों को विजय करते हुए दिल्ली के मुहाने पहुँच गया था। सोलहवीं सदी में महाराष्ट्र के दक्षिण में बसे बीजापुर राज्य के मुस्लिम शासक आदिल शाह व बेगम हुजूर के जुल्मों से मराठवाड़ा में जब भय का वातावरण बना हुआ था तब शिवा ने मराठों के साथ-साथ, वंचित श्रेणी के युवाओं को साथ लेकर ऐसी सेना तैयार की जिसने न कभी पीछे हठना सीखा और न हारना ही। छापामार युद्ध की कला में प्रवीण शिवा के नेतृत्व में इस सेना ने रायपुर रियासत से हिंदू साम्राज्य की स्थापना तक का सफर तय किया।
भारत के इस महान योद्धा, महान रणनीतिकार, समरसता के पैरोकार, कुशल-बुद्धि, प्रबुद्ध सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित वीर सपूत एवं भारतवर्ष के महानायक शिवाजी महाराज का जन्म शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई की कोख से 19 फरवरी, 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवनेरी का दुर्ग पुणे से उत्तर दिशा में जुन्नार नगर के पास था। उनका बचपन राजा राम, गोपाल, संतों तथा रामायण, महाभारत की वीरांगना कहानियों और सत्संग में बीता। वह सभी कलाओ में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी। उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे। शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओं को समझने लगे थे। राजमाता जिजाऊ धार्मिक स्वभाव वाली, भारतीय परम्पराओं की पोषक एक वीरांगना नारी थीं। जीजाबाई ने शिवा का लालन-पालन भगवान राम, कृष्ण की भक्ति, शक्ति, मर्यादा, संस्कार, आज्ञापालन, लीलाएँ एवं शौर्य गाथाएँ सुनाकर, समझाकर तथा वीर हनुमान के बल, भक्ति, अर्जुन व भारतीय वीरात्माओं की कथाएँ सुना कर और शिक्षा देकर किया। बचपन से ही शिवाजी महाभारत के विदुर, आचार्य चाणक्य, चंद्रगुप्त आदि वीर महापुरुषों से बहुत प्रभावित थे।
शिवाजी की वीरता, उनकी देशभक्ति और स्वराज्य के लिए उन्होने जो संघर्ष किया था, वह सब देश के युवाओं के लिए सदैव प्रेरणादायी रहा हैं। सोलहवीं सदी में महाराष्ट्र के दक्षिण में बसे बीजापुर राज्य के मुस्लिम शासक आदिल शाह व बेगम हुजूर के जुल्मों से मराठवाड़ा में त्राहि-त्राहि मची थी तब दूसरी ओर शिवा युवावस्था में आते ही शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले जीतने लगे। पुरंदर और तोरण के किलों पर अधिकार जमाते ही उनके नाम और काम का डंका मराठवाड़ा व आस-पास के क्षेत्रों में बजने लगा। युद्ध लड़ते-लड़ते वीर शिवाजी ने तोर्ण, चाकन, कोंडाना, ठाणे, कल्याण और भिवंडी जैसे किलों को मुल्ला अहमद से जीत कर मराठा साम्राज्य में शामिल कर लिया। इस गतिविधि से आदिल शाह के साम्राज्य में हडकंप मच गया। शिवाजी की शक्ति को देख कर आदिल खान घबराने लगा। उसने शिवाजी को रोकने के लिए शाह जी भोंसले को बंदी बना लिया। शिवाजी ने तुरंत युद्ध न करके पहले अपनी सेना को मज़बूत किया और देशमुखों को अपने साथ जोड़ा। शिवाजी ने कुछ ही महीनों में एक विशाल सेना तैयार कर ली थी। इस सेना को दो अलग-अलग गुटों में बाँटा गया था। सेना में घुड़सवार दल और थल सेना मौजूद थी। घुड़सवार दल की सेना की कमान नेताजी पालकर के हाथों में थी तो थल सेना का नेतृत्व यशोजी कल्क के पास था। उस समय शिवाजी के साम्राज्य के अंतर्गत 40 किले आते थे। शिवाजी ने बहुत ही कूटनीतिक तरीके से अपने पिताजी को मुक्त करा लिया।
धीरे-धीरे पूरे दक्षिण में धूम मचने के साथ यह खबर आगरा और दिल्ली तक पहुँच गई। वीर शिवाजी का नाम सुनते ही अत्याचारी यवन और उनके सभी शासक भयभीत होकर बगलें झाँकने लगे।
जब शिवाजी अपने पिता शाहजी से मिलने के लिए बीजापुर गए तो वहाँ की कुत्सित राजनीति के कारण उन्हें काफी विरोध झेलना पड़ता है। तब वे आदिल शाह के सैनिकों को धूल चटाकर अपनी धमक की आहट से आदिलशाह को चुनौती देते हैं। शाहजी अपने बेटे की वीरता को परखने के साथ ही शिवाजी को स्वराज का काम सौंपते हैं। स्वराज के उद्देश्य को पूरा करने के लिए उनकी माँ जीजाबाई सिर्फ माँ ही नहीं एक गुरु के रूप में सदैव छाया की भाँति शिवाजी के साथ रहती है। जिन्होंने शिवा को न सिर्फ वीर योद्धा बनाया अपितु उनके अंदर स्वराज की लगन पैदा की। बाल्यकाल से ही हिंदवी स्वराज्य अर्थात् "श्रीं" यानी की भगवान की इच्छा से स्थापन हुआ "हिंदूओं का अपना राज्य" (स्वराज्य) की इच्छा के बीज शिवा के तरुण हृदय में स्फुरण होने लगे थे। जिसका मूल उद्देश्य भारतवर्ष को हर प्रकार के विधर्मी विदेशी सैन्य व राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करना था जो भारतवर्ष में हिन्दूत्व के विनाश पर तुले हुए थे। हिंदवी साम्राज्य के प्रणेता छत्रपति शिवाजी महाराज हैं। शिवाजी महाराज ने रायरेश्वर के मंदिर में अपनी उंगली काट कर अपने खून से शिवलिंग पर रक्ताभिषेक कर हिन्दवी स्वराज्य की शपथ ली थी। स्वराज को नारा बना कर छत्रपति शिवाजी महाराज ने संपूर्ण भारतवर्ष को एकत्रित करने का प्रयास किया। अफगनों, मुगलों, पुर्तगालियों और अन्य विधर्मी विदेशी मूल के शासकों द्वारा भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में शासन के विरुद्ध ही स्वराज का अभियान चलाया जा रहा था क्योंकि वे भारतीय जनता, विशेषतया हिन्दुओं पर अत्याचार करते थे, उनके धर्म केन्द्रों को नष्ट किया करते थे और उनका जबरन धर्म-परिवर्तन किया करते थे। शिवजी महाराज ने 1674 में मराठा साम्राज्य की नींव रखी और कई वर्षों तक औरंगजेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। उन्होंने 1674 तक उन सभी क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया जो पुरन्दर की सन्धि के अंतर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी 6 जून 1674 को शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक समारोह रायगढ़ किले में संपन्न हुआ।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने 340 साल पहले स्वराज्य, स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेश के पुनरुत्थान के लिए जो कार्य किया, उसकी तुलना नहीं हो सकती। उनका राज्याभिषेक एक व्यक्ति को राजसिंहासन पर बैठाने तक सीमित नहीं था। शिवाजी महाराज एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक सोच थे, वे एक विचार थे, वे एक युगप्रवर्तन के शिल्पकार थे। आज भी राजनैतिक क्षेत्र में उनके विचार बहुत ही तर्कसंगत दिखाई देते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति वर्ष मई में शुरु होने वाले तृतीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग के समापन समारोह में छत्रपति शिवाजी महाराज के विचारों, त्याग, समर्पण व समरसता को प्रेरणा का स्रोत माना गया। जिसप्रकार छत्रपति शिवाजी ने राष्ट्रभक्त मुस्लिम सैनिकों को साथ लेकर विदेशी आक्रांताओं को भागने पर विवश कर स्वराज्य व हिंदू साम्राज्य की स्थापना की, उसी तरह वर्तमान में भी हिंदू राष्ट्र की कल्पना कोई अतिश्योक्ति नहीं है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री जी जब कहते हैं कि अब समय आ गया है कि अपना हिंदू राष्ट्र का निर्माण हो तो उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मुस्लिम समुदाय को यहाँ से बाहर निकाल दिया जायेगा। अपितु मुस्लिम समुदाय सहित अन्य सभी समुदायों को हिंदू संस्कृति के अनुसार स्वयं को ढालना होगा। सभी की पूजा पद्धति अलग-अलग हो सकती है किंतु विचार एक हो, संस्कृति एक हो, राष्ट्र के प्रति निष्ठा एक हो तभी हिन्दुस्तान विश्व में परम वैभव पर स्थापित हो सकेगा।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति से भावपूर्ण श्रद्धांजलि
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भारत के पूर्वी ओडिशा राज्य में तीन ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने से 280+ लोगों की मृत्यु हो गई और हजारों लोग घायल हो गए (२ जून २०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से जिन्होंने अपनी जान गँवाई उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि और उनके शोक संतप्त परिवारों के प्रति हार्दिक संवेदना। साथ ही घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता है।
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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सुशीला मोहनका
(प्रबंध सम्पादक)
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रथ यात्रा की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ। आशा करती हूँ कि आप सभी Covid-19 की SARS-CoV-2 के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवायें एवं स्वस्थ्य रहें।
जनवरी, २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन: इस बार कारमेल, इंडिआना, अमेरिका में २८ से २९ जुलाई २०२३ तक होने जा रहा है, इस अधिवेशन का मूल विषय: ‘अगली पीढ़ी के लिए हिंदी शिक्षा’ (Hindi Education for the Next Generation) है।
अमेरिका एवं भारत के सभी शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं : आप सभी से निवेदन है कि आप अपने यहाँ एक अधिवेशन समिति का गठन करें और अधिक से अधिक संख्या में अधिवेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज करायें और अधिवेशन के कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी निभायें। आप सभी जानतें है कि किसी भी कार्यक्रम को करने के लिए अर्थ की आवश्यकता होती है, यह विषय भी अधिवेशन समिति में रखने का कष्ट कीजिएगा।
‘संवाद’ मई २०२३ का अंक पढ़कर जिन्होंने प्रतिक्रया भेजी हैं उनको धन्यवाद। आप सभी से विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का जून २०२३ का अंक भी अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने से सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निःसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
सुशीला मोहनका
sushilam33@hotmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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