संवाद - June 2022

संवाद - June 2022

 
 
 
 
 
अप्रैल INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
  जून 2022, अंक १३     | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
 
 
 
 
प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि अभी Covid19 की बढ़ती महामारी से मानव समाज को सुरक्षित रखें।

हिंदी शिक्षण समिति ने हिन्दी भाषा के भविष्य को ध्यान में  रखते हुए अपने आप याने स्वयं हिंदी सीखने का बहुत ही आसान और रोचक विधि की खोज कर हिंदी को सीखना सरल कर दिया है।
दिन-प्रतिदिन इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है, कृपया इस पाठ्यक्रम के माध्यम से अपने बच्चों को लाभान्वित करें और अधिक जानकारी के लिए nfo@hindi.Org.पर सम्पर्क करें। आपकी सुविधा के लिए निचे हिंदी शिक्षण का flyer संलग्न कर रही हूँ।

जागृति मंच के माध्यम से ११ जून २०२२ डॉ. नन्द किशोर पाण्डेय जी द्वारा भारत बोध और भक्ति साहित्य की बहुत ही उत्तम व्याख्या की गई थी, आशा है आपने देखा होगा। यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं:- https://www.hindi.org/Jagriti.html जागृति का अगला कार्यक्रम ९ जुलाई २०२२ को भक्तिकाल की सीमारेखा पर डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव जी प्रकाश डालेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से भारत से तीन कवि आये हैं और 3 जून से 10 जुलाई तक अमेरिका में रहेंगे तथा विमिन्न शहरों में काव्य गोष्ठियाँ होंगी। जब भी आपके शहर में ये कवि गोष्ठी आयोजित की जाये तो कृपया इनका भरपूर आनंद लीजिएगा।

अंत में मैं सम्पादकीय समिति को हृदय से धन्यवाद देती हूँ ,जिनके प्रयास से निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं।

अगर कोई भी प्रश्न है, तो कृपया सम्पर्क करें hindi.org और कृपया इस ईमेल (anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से हम से सम्पर्क करें और इस फ़ोन नम्बर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।

सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर-राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- जल्दी आ रहा है ( COMING SOON )
 
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम 
 
 
 अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  -- जागृति वेबिनार:
 "भक्तिकाल की सीमारेखा”, शनिवार, 09 जुलाई 2022 
 
 
जागृति वेबिनार: "भक्तिकाल की सीमारेखा”, शनिवार, 09 जुलाई 2022
जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 09 जुलाई 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।

जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव,
सहआचार्य एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी (बिहार) हैं। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "भक्तिकाल की सीमारेखा"।

आइये उनसे सुनें कि भक्तिकाल की पारंपरिक सीमारेखा पर पुनर्विचार क्यों आवश्यक है। क्या हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल 1700 वि. सं. के आस-पास समाप्त हो जाता है या इसके बाद भी भक्ति की अजस्र धारा अपने पूरे वेग से प्रवाहित होती रहती है? जिसे हम रीतिकाल कहते हैं, क्या उस अवधि में भी भक्ति कविता का सृजन होता रहा? इस दौर में लोक और राजसत्ता दोनों पर कई सम्प्रदायों के संतों-भक्तों का कैसा प्रभाव है? आइये इन प्रश्नों के उत्तर जानें और चर्चा करें उस समय के हिंदी साहित्य के इस स्वर्णिम युग के एक नए युग में संक्रमण के विषय में।

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति शनिवार, 09 जुलाई 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।

सम्मिलित होने के लिए लिंक है: www.facebook.com/ihaamerica

शनिवार, 09 जुलाई 2022; 8:30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST, UK: 4:00 PM
  
 
 
 
आशा है कि आप शनिवार, 09 जुलाई 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे। यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध,1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा" और कवि-सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना।
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
सादर,
डॉ राकेश कुमार
प्रमुख – जागृति: हिन्दी साहित्य की दशा एवं दिशा पर चर्चाओं की एक रोचक शृंखला
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -इंडियाना शाखा, यूएसए
ईमेल:Jagriti@hindi.org, ihaindiana@gmail.com
Phone/व्हाट्सएप: +317-249-0419
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  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  -- अमेरिका के महानगरों में:
"हास्य के रंग गीत - ग़ज़ल के संग ", ३ जून से १० जुलाई, 2022  
 
 
 
जागृति रिपोर्ट  
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  --11 जून 2022 

जागृति व्याख्यानमाला की पाँचवी कड़ी
11 जून 2022: भारत बोध और भक्ति-साहित्य
 
 
 
 
 
प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी
 
 
 
 
वक्ता: प्रोफ़ेसर नंदकिशोर पांडेय, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर  
 
 
 
 
 जागृति व्याख्यानमाला की पाँचवी कड़ी 11 जून 2022 को जूम से आयोजित हुई। भारत की स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष में प्रारम्भ हुए अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के जागृति मंच की इस परिचर्चा को सम्बोधित किया राजस्थान विश्वविद्यालय के कला-संकाय के अधिष्ठाता और शोध निदेशक डॉ. नंदकिशोर पांडेय ने। और परिचर्चा का विषय था "भारत बोध और भक्ति साहित्य"; स्वतंत्रता के अमृत-महोत्सव के इस वर्ष के लिए बड़ा ही सामयिक विषय! सदा की तरह इस बार भी अमेरिका , भारत और अन्य देशों के दर्शक/श्रोता फेसबुक के माध्यम से इस कार्यक्रम से बड़ी संख्या में जुड़े थे। कार्यक्रम के आरम्भ में जागृति-मंच के प्रमुख डॉ. राकेश कुमार ने सक्षिप्त रूप से समिति और जागृति मंच का परिचय दिया, आज के आयोजन की रूपरेखा बताई और कार्यक्रम के संचालन के लिए "जागृति" टीम की सदस्या सुश्री पूजा श्रीवास्तव जी को बुलाया। पूजा जी ने प्रोफ़ेसर पांडेय का स्वागत करते हुए बताया कि डॉ. नंदकिशोर पांडेय जी हिंदी साहित्य के एक वरिष्ठ अध्यापक और अध्येता होने के अतिरिक्त उच्च-शिक्षा के कुशल प्रसाशक भी हैं। उन्होंने राजीवगांधी केंद्रीय विश्विद्यालय, अरुणाचल में विभागाध्यक्ष, तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, मानव-संसाधन मंत्रालय में निदेशक का पद सम्हाला है। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित है: जिनमें मुख्य दादूपंथ के शिखर संत, आधुनिक भारतीय कविता, संत साहित्य की समझ, आदि हैं। पूजा जी ने बताया कि प्रोफेसर पांडेय एक कुशल सम्पादक भी हैं, उन्होंने १७ से अधिक ग्रंथों, कोशों और पत्रिकाओं का सम्पादन किया है। पूजा जी ने विद्वान आचार्य का अभिवादन करते हुए उन्हें मंच पर आमंत्रित किया।
डॉ. पांडेय ने अपने व्याख्यान का प्रारम्भ "भारत बोध" की भावना को केंद्र में रखकर किया। उन्होंने बताया कि भक्ति साहित्य ने सामाजिक समरसता, और दर्शन, जाति, भाषा, प्रान्त आदि अलगाव से परे जाकर सम्पूर्ण भारत को जोड़ा, एक भारतीय एकता का बोध जाग्रत किया। अन्यान्य सम्प्रदायों और प्रांतों के संतों के साहित्य का उद्धरण देते हुए डॉ. पांडेय ने यह प्रमाणित करने की चेष्टा की कि भक्ति-साहित्य सारे अलगाव से ऊपर उठ कर सामाजिक-कल्याण का साहित्य है। हिंदी के भक्ति साहित्य का काल-खंड हालाँकि कोई ४ सौ वर्ष प्रचलित है, भक्ति साहित्य कई शताब्दियों पहले से, भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में लिखा जाता रहा। वस्तुतः भक्ति की चेतना वैदिक है। मनुष्य जाति अपने आरंभिक काल से ही अपने कल्याणकारी उपादानों, जैसे सूर्य, चन्द्रमा, धरती, नदियाँ, आदि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करती रही है। कृतज्ञता-ज्ञापन की वह संस्तुति ही भक्ति साहित्य है। भक्ति साहित्य की यह परम्परा हिंदी भक्ति साहित्य में आकर पूर्णतः पल्लवित्, पुष्पित, प्रस्फुटित, हुई। उनका कहना है कि हिंदी भक्ति साहित्य का काल केवल हिंदी ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य का स्वर्णयुग है। जागृति श्रृंखला की इसके पहले वाली कड़ी में भी उस कड़ी के विद्वान वक्ता ने भक्ति-साहित्य के प्रति ये भावनाएं व्यक्त की थीं:"हिन्दी कविता की श्रेष्ठतम रचनाएँ इसी काल में हुई हैं।"
 
यह सर्वविदित है कि दक्षिण के अलवर भटों ने भक्ति गायन को लोक-प्रतिष्ठित किया, उसे सामाजिक ढाँचा दिया। दक्षिण-भारत में उद्भूत इस भक्तिचेतना में उत्तर भारत की तरह जाति-पाँति, ऊंच-नीच, छूआछूत आदि का भेदभाव नहीं था। सम्पूर्ण रूप से सामाजिक चेतना थी। इसमें राम-कृष्ण का भी भेद नहीं था, यह वैष्णव चेतना थी। इसके पुरोधा समाज के हर वर्ग, सम्रदाय के लोग थे; ब्राह्मणों से लेकर तथा-कथित अन्त्यज जातियों तक के लोग। उसमें कुलशेखर जैसे राम-भक्त थे और हाण्डाल जैसी महिला संत थी और बाद में उस भक्तिचेतना को दक्षिण भारत के एक महान आचार्य, रामानुजाचार्य, ने दार्शनिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया; उसे विशिष्ट-अद्वैत धरातल पर स्थापित किया। उन्होंने स्वयं अन्त्यज जातियों के तीन गुरुओं से मन्त्र लिया और उसे समाज में फैलाया। रामानुजाचार्य समता के संत थे, इसीलिए रामानुजाचार्य की वर्तमान प्रतिमा समता की प्रतिमा कहलाती है। दक्षिण भारत के ही गुरु शंकराचार्य ने अद्वैत के सिद्धांत को प्रचारित किया। इस अद्वैत के सिद्धांत के साथ हिंदी साहित्य की निर्गुण चेतना जुडी। जिसे शंकराचार्य ने वेदांत की शब्दावली में वर्णित किया उसे उत्तर भारत के संत व्यावहारिकता के धरातल पर ले आये। समाज में जो धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर वाह्य-आचरणों की ओट में दुराचार फ़ैल रहा था उसे संतों ने भक्ति साहित्य के माध्यम से चुनौती दी। संतों ने सामाजिक दुराचारों का घोर विरोध अपनी वाणियों से किया। भारतीय समाज को उसके दर्शन उसकी महत्ती परम्परों की याद दिलाई। कबीर साहब, गुरु नानक देव जी, तुलसीदास जी आदि संतों के हवालों से उन्हीने बताया कि विदेशी आक्रमणों और सामाजिक उथल-पुथल के काल में भी संत भक्ति साहित्य के माध्यम से समाज में समरसता, एकता, दार्शनिक चेतना फैला रहे थे। उदाहरणत: मुस्लिम आक्रमणों और दमन-चक्रों के बीच गुरु नानकदेव जी ने कहा था: "जहा दीख तँह एक सद्गुरु दिया दिखाई, ज्योति निरंतर जाड़िये, नानक सहज सुहाई "।...'एक सदगुरु' ...मात्र एक सदगुरु; मुसलमानों के अलग, हिन्दुओं के अलग नहीं बस एक सद्गुरु! कबीर समस्त सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, समाज और राजाओं के तिरस्कार के बावजूद, सामाजिक उदात्त-चेतना को जाग्रत करने के लिए; सम्प्रदायों, धर्मों, पंथों के बाह्याडंबरों की आलोचना से नहीं चूके; देखिये:...“बहुत ही देखे पीर औलिया, पढे किताब पुराना।...उपजे उभय न ज्ञाना"
 
सामजिक रूढ़ियों की इन चुनैतियों के साथ-साथ संतों की वाणियों में साम्प्रदायिक सद्भावना भी कूटकूट कर भरी है। भारतीय एकता, भारत-बोध के लिए, सद्भावना की यह चेतना, उसकी अभिव्यक्ति, अनिवार्य है। पांडेय जी ने रहीम, रसखान, जायसी आदि मुसलमान मूल के कवियों का हवाला देते हए कहा उन सब के साहित्य में हिन्दू प्रतीकों के प्रति सद्भावना और हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति प्रगाढ़ भक्ति भरी है। अब्दुर्रहीम खानखाना ने, जो अकबर-सेनापति बैरम खान के पुत्र थे, गंगा की स्तुति में लिखा: "अच्युत चरण तरंगे, शिव शशि मालती माल, हर-ने बनायो सुरसरि, कीजों इंदौ भाल"। आम भारतीय को अगर यह न बताया जाय की इसके लेखक कौन थे, तो शायद उन्हें विश्वास न हो कि यह मुसलमान मूल के किसी कवि द्वारा लिखा गया है। इसी प्रकार रसखान की अत्यंत मधुर पंक्तियों: "काग के भाग कहा कहिये, हरी हाथ सो ले गयो माखन रोटी; खेलत खात फिरै अंगना, पग पैंजनी बाजत पीरि कछोटी" का उद्धरण देते हुए उन्होंने उस मुस्लिम महाकवि की प्रगाढ़ कृष्ण भक्ति की और इशारा किया। एक धर्म के अनुगामी होते हुए भी, अनेक धर्मों के देवताओं की उपासना---प्रगाढ़ उपासना--- कैसे की जाती है, यह भक्तिकाल के इन कवियों की उदात्त चेतना में परिलक्षित है, और यह भारतीय मनीषा के लिए एक उद्बोधन, एक गौरव-दीप, है।
 
केवल अन्यान्य धर्मों ही नहीं, अपितु अनेक सम्प्रदायों में, अलग-अलग क्षेत्रों के संतों में भी इस एकत्व की परकाष्ठा है। डॉ. पांडेय ने बताया कि गुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरुग्रन्थ साहब जी की वाणियों का सम्पादन किया। उसमें उनके सिख गुरुओं की वाणियों के अतिरिक्त भारत के अन्य संप्रदायों/प्रांतों के अनेकानेक संतों की वाणिया हैं, यथा महाराष्ट्र के नामदेव जी, पीपादास जी, धन्ना जी, आदि। पांडेय जी के अनुसार "भारत-बोध अर्जुनदेव जी की वाणी के भीतर से निकलता है..."। उन्होंने गुरु अर्जुनदेव जी की प्रसिद्ध पंक्तियों "तुम जलनिधि हम मौन तुम्हारे; तेरा नाम बूँद, हम चातक ...." के हवाले गुरु साहेब की अप्रतिम भक्ति की ओर इशारा करते हुए यह बताने की कोशिश की कि भक्ति की यही भावना उस समय के जाति-पाँति, प्रान्त, सम्प्रदाय से परे सभी संत कवियों की थी। उसी प्रकार गुरु तेगबहदुर जी ने 'हरि को नाम सदा सुखदाई।...." कहकर सभी संतों को हरि-नाम की प्रेरणा दी। महाराष्ट्र के महान संत नामदेव ने न केवल मराठी में अपनी भक्ति व्यक्त की, अपितु अपने भ्रमण के दौरान वे पंजाब एवं उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में गए और उन सब के साहित्य को अपनी वाणी से आप्लावित किया, प्रचुर किया, गौरवान्वित किया, एकांत के सूत्र में बाँधा। यह एकता ऐसी कि रैदास, तुलसीदास, कबीर, दादू सभी नामदेव जी की गति को चाहते हैं...भक्ति और एकता का यह अनुपम उदाहरण है। प्रोफ़ेसर पांडेय ने भक्ति के; जन्म से परिपक्वता तक की, दक्षिण से कर्नाटक, महाराष्ट्र होते हुए गुजरात तक की, यात्रा का बड़ा ही रोचक वर्णन प्रस्तुत किया, अनेक प्रांतों के संतों का उल्लेख किया जिनसे भक्तिकाल की आसमुद्रात-हिमालय सम्पूर्णता सिद्ध होती है। उन्होंने गुजरात के अनेकानेक संत कवियों के हवाले से 'भक्ति' साधना की गुजरात में पराकाष्ठा की तरह इशारा किया। तुलसी की कृष्ण-भक्ति कविताओं द्वारा, और सूरदास की राम-भक्ति वाणियों द्वारा भक्ति-साहित्य की समरसता साबित करने की चेष्टा की।

डॉ. पांडेय की तर्क-सम्मत और तथ्यात्मक परिचर्चा से; भक्ति-परम्परा के इतिहास, उसकी भारतीय-समग्रता-समरसता, उसकी उदात्त चेतना, उसके अनेकानेक संत और उसके मधुर साहित्य की जो झाँकी मिलती है; उससे भारतीय-संस्कृति की सम्पूर्णता का बोध होता है, भारत बोध होता है और भक्ति साहित्य दूध और पानी की तरह घुले मिले लगते हैं।
 
कार्यक्रम के अंत में राकेश कुमार जी ने प्रोफ़ेसर पांडेय को उनके तर्क-सम्मत एवं विद्वत्तापूर्ण वक्तव्य के लिए धन्यवाद दिया और भविष्य में भी समिति से उनकी सहभागिता का अनुरोध किया। डॉ. कुमार ने विश्व भर में इस कार्यक्रम से जुड़े श्रोताओं का धन्यवाद-ज्ञापन किया और बताया कि जागृति व्याख्यानमाला की अगली कड़ी ९ जुलाई को प्रस्तावित है, जिसका विषय होगा "भक्तिकाल की सीमा रेखा"।
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शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट   
 
 
 " अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, शॉर्लट, नार्थ कोरोलिना शाखा 
रिपोर्ट, कार्यक्रम 1 मई,2022

 
 
 
 
 
द्वारा- प्रिया भरद्वाज
 
श्रीमती प्रिया भरद्वाज, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की शॉर्लट, नार्थ कोरोलिना शाखा की प्रथम अध्यक्षा हैं|
 
 
१ मई २०२२ को हिंदू सेंटर शार्लट सिटी व्यू ड्राइव
 
 
 
 
 
भारतीय चाहे कहीं भी हों लेकिन उनका अपनी भाषा से प्रेम कभी कम नहीं होता। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का कार्यक्रम १ मई २०२२ को हिंदू सेंटर शार्लट सिटी व्यू ड्राइव ७४०० में १ बजे से लेकर ६:३० बजे तक सभी के सहयोग और आशीर्वाद से सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि आदरणीय बाल गुप्ता जी के द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।

भारतीय राष्ट्र गान नन्ही बालिका अमायरा द्वारा प्रस्तुत किया गया और अमेरिकी राष्ट्र्गान शचि और उनके सहायकों द्वारा प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात प्रिया भारद्वाज ने  सभी अतिथियों को सम्मानित किया। बाल गुप्ता जी और प्रमिला कौर जी के संदेश के बाद युवा समिति के द्वारा गणेश वंदना की गई।

तबला,वॉयलिन, ड्रम, गिटार एवं गीत  जिसपे उँगलियाँ चलाना तो सबके बस की बात नहीं पर पैर ज़रूर थिरकने लगते हैं, इसकी थाप से कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए आकर्षित आर्या का स्वागत किया गया। नन्ही ९ वर्षीय बालिका दिया ने गिटार की ध्वनि से लोगों को मंत्र- मुग्ध किया। ड्रम नन्ही ८ वर्षीय बालिका लीसा अमरावती द्वारा वन्दे मातरम् बजाया गया और पुनः सभागार तालियों से गूँजने लगा। वॉयलिन की झंकार से मेघना ने सभी को झंकृत कर दिया और तालियों के शोर से लोगों की ख़ुशी देखते बनती थी। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए हमारे बाल कलाकार "किआन" के देश भक्ति गीत "मेहंदी वाले हाथ" ने सभी दर्शकों को मंत्र मुग्धकर दिया और ज़ोर दार तालियों की ध्वनि सुनाई दी।
 
 
कवि गोष्ठी का शुभारम्भ प्रिया भरद्वाज ने किया पहली कविता “मातृभूमि से दूर हैं हम, फिर भी हिंदी में संलग्न है हम" पढ़ी और अगली हास्य कविता पढ़ी- “नारी है, सब पर भारी”। इसके पश्चात आदरणीय बाल गुप्ताजी की "देश भक्ति" की कविता सुनाई, दूसरी कविता पढ़ी “मेरी बीबी है ,वो"। इसके पश्चात साक्षी कुलश्रेष्ठ जी ने काव्य शृंखला में भक्ति रस की कविता “मेरे कान्हा” सुनाकर सभी के मन को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। अगली कविता में आशीष तिवारी जी ने कलयुग के कृष्ण का वर्णन करते हुए “कृष्णा  तुम्हें आना होगा" कविता सुनाई। अवनीश अवस्थी जी ने अपनी कविता में ज़िंदगी के उतार - चढ़ाव को बताते हुए “ना रुके कदम ,ना थके कदम” को सुनाया। प्रवीण तिवारी जी ने “आत्मा” शीर्षक कविता सुनाकर सभी को विचारों के समुद्र-दर्शन कराया। इसके पश्चात श्वेता गुप्ता जी ने अपने पिता पर स्वरचित कविता सुनाई। अगली कविता पति पत्नी के प्रेम पर आधारित थी। तोषी शर्मा चौरे जी ने प्रथम कविता “कृष्ण” और दूसरी कविता “प्रेम” सुनाई। तृप्ति तिवारी जी की कविता “चहुँ ओर रंग बिरंगे पुष्प खिले, आम्र तरु मंजीर बौराए।” के पश्चात् अशोक जी की प्रथम कविता “तरीक़ा हमने देखा सब कितने बदल गए हैं” सुनाई। इनकी दूसरी कविता इस काव्यशृंखला में “शिकायत” पढ़ी गई। प्रिया भारद्वाज जी ने अशोक पण्डित जी को कवि गोष्ठी का विधिवत समापन करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में हिंदी के लिए सुनहरे भविष्य के लिए कुछ पंक्तियाँ पढ़ी :- “प्रतीक्षा कर रहे थे, कि ये समय कब आए, यह सुनहरा समय लेकर आप आईं और बहार आई” कवि सम्मेलन का समापन करते हुए अशोक जी ने संदेश दिया कि इस प्रकार के कवि सम्मेलन से हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में सहायता मिलेगी। बाल गुप्ता जी ने कहा हर वर्ष यह कार्यक्रम हिंदू सेंटर द्वारा प्रिया भारद्वाज जी के लिए आयोजित किया जाएगा।

अंतिम कार्यक्रम नृत्य प्रस्तुति :- सुदेशना बसु सेन एक प्रसिद्ध एवं प्रशिक्षित भरतनाट्यम एवं कत्थक नृत्यांगना है। इन्होने 8 वर्ष की उम्र से ही नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी। ये “नृत्य पर्फोमिंग आर्ट" की संचालिका, प्रसिद्ध मॉडल एवं कोरियोग्राफर हैं। सुदेशना बसु सेन की कथक नृत्य, विष्णु वंदना, शिव वंदना एवं गुरु वंदना के द्वारा सभी दर्शकों को भावबिभोर कर दिया।साथ ही नृत्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति से सभी को अवगत कराया।
पाँचवा नृत्य पंडित बिरजु महाराज की प्रभु स्तुति की गई। छठा नृत्य सुदेशना बसु सेन द्वारा किया गया। तोषी शर्मा जी ने गरबा की मनमोहक प्रस्तुति की। हमारी श्रेष्ठ कोरियोग्राफर अमृता चौधरी के नृत्य छम-छम-छम और परम सुन्दरी ने सभी का मन मोह लिया।
भारत रत्न से सम्मानित महान गायिका सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हमारी कोरियोग्राफर तोषी शर्मा चोरे के समूह की प्रस्तुति देखकर सभी की आँखें नम हो गई। कोरियोग्राफर शीलू सिंघवी का नृत्य “मेरी रानी” प्रशंसनीय रहा। कोरियोग्राफर शची अवस्थी के बाल कलाकारों ने अपनी कला की अच्छी प्रस्तुती की। इसके पश्चात निधि पटेल द्वारा सुंदर प्रस्तुति की गई। हमारे बाल कलाकार अन्नया गुप्ता (भरतनाट्यम) एवं आशी आर्या (कथक) की प्रस्तुति प्रसंशनीय रही, दोनों बालिकाओं ने अति उत्तम कोटि का कथक नृत्य प्रदर्शित कर दर्शकों से तालियाँ बजवाईं।

समापन भाषण प्रिया भारद्वाज द्वारा : शाखा अध्यक्षा प्रिया भारद्वाज  ने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की तरफ से सभी आदरणीय अतिथियों, दर्शकों और स्वयंसेवकों को बहुत - बहुत धन्यवाद दिया। आज का यह कार्यक्रम आप सबके सहयोग से ही सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। यहाँ हर व्यक्ति समिति को मजबूत बनाए रखने में मदद करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दिए यह अपने आप में गर्व की बात है। आशा है कि भविष्य में भी आप सभी का पूर्ण सहयोग और स्नेह हमेशा मिलता रहेगा। सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य, गायन, वाद्ययंत्र, हस्तकला प्रदर्शनी, भोजन और भाषा का यह उत्सव सभी कार्य अच्छी तरह सम्पन्न हुए इसके लिए पुनः शार्लट वासियों को सहृदय धन्यवाद दिया।
[इस कार्यक्रम का प्रसारण Asia tv द्वारा किया गया था आप सभी फ़ेसबुक पर देख सकते हैं]
 
 
 
 
  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - भारत शाखा  हैदराबाद, आंध्र प्रदेश 

 समिति के सदस्यों-द्वारा डिजीटल लाइब्रेरी का अयोजन 
 
 
द्वारा- डॉ. सरोज बजाज एवं मुन्ना जगेटिया
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, भारत शाखा के हैदराबाद, आंध्र प्रदेश के सदस्यों की ओर से महिला दक्षता
समिति शैक्षिक संस्था (Educational Institutional) ने शिक्षा के क्षेत्र में एक कदम और बढ़ाते हुए
रविवार 24 अप्रैल 2022 को चंदा नगर स्थित एमडीएस सभागार में 700 से अधिक छात्राओं के लिए पूर्व ट्रस्टी स्वर्गीय रामावतार सराफ की स्मृति में “रामावतार सराफ डिजिटल पुस्तकालय” का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का शुभारंभ गणेश वंदना के साथ हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में हरियाणा के आदरणीय
राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय, हैदराबाद कला एवं संस्कृति फाउंडेशन के अध्यक्ष आईएएस विनोद के. अग्रवाल, एम.डी.एस शैक्षिक संस्था (Educational Institutional) के ट्रस्टी व उद्योगपति सज्जन कुमार
गोयंका उपस्थित थे। मुख्य अतिथि हरियाणा के आदरणीय राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने डिजिटल
पुस्तकालय का उद्घाटन किय। उन्होंने महिला दक्षता समिति की अध्यक्ष डॉ सरोज बजाज सहित समिति के सभी सदस्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि हम सभी डिजिटल युग में जी रहे हैं डिजिटलाइजेशन और टेक्नोलॉजी बच्चों की शिक्षा के लिए जरूरी है डिजिटल लाइब्रेरी से कम समय में अधिक ज्ञान बच्चे प्राप्त कर सकते हैं विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के लिए यह आवश्यक है। उन्होंने छात्राओं से
कहा कि वे शिक्षित होकर काम के लिए ना भटकते हुए दूसरों को रोजगार देने में सक्षम बने। महिलाएं आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक हर क्षेत्र में आगे हैं। डिजीटल लाइब्रेरी में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगभग 1000 प्रकार के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स एक क्लिक पर उपलब्ध होंगे। इससे इंटर,
नर्सिंग एवं अन्य छात्राओं को पढ़ाई में सुविधा होगी।
डिजीटल लाइब्रेरी शुभारंभ का समाचार तेलंगाना के प्रसिद्ध दैनिक पत्रिकाओं जैसे आंध्र ज्योति, इनाडु
हैदराबाद, वार्ता, साक्षी, दिशा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सदस्यों द्वारा समय-समय पर शैक्षणिक संस्था को आगे बढ़ाने के लिए
प्रयास किए जा रहे है।
 
 
 
बैठे हुये: डॉ. सरोज बजाज, श्री विनोद अग्रवाल आई.ए.एस, हरियाणा के माननीय राज्यपाल-
श्री बंडारू दत्तात्रेय, उद्योगपति सज्जन गोयनका.
खड़े हुये: श्रीमती अनुसूया, श्रीमती शीला सोन्थलिया, श्रीमती सुधा गोएल, श्रीमती मुन्ना जगेटिया,
श्रीमती अनुराधा, श्रीमती उषा मालपानी, श्रीमती शकुंतला नवांधार, श्रीमती जया बाहेती
.
 
 
अपनी  कविताएँ  --  ग़जल 
 
 
  " हिंद के माथे की बिंदी: हिंदी" 
 
 
 
 
 हिंद के माथे की बिंदी:हिंदी
 
मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं संस्कृत मां की कोख से जन्मी हूं।
मैं हर भाषा को सगी बहन मानती हूं।

मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं हिंदवासियों के रोम-रोम में बसी हूं।
मैं हिंद देश के कण-कण में व्याप्त हूं।

मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं शब्दों का अगाध और समृद्ध सागर हूं।
मैं साहित्य का अद्भुत भंडार हूं।

मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं हिंद की अभिव्यक्ति का सरलतम स्त्रोत हूं।
मैं हिंद के सुमधुर संगीत की सूरावली हूं।

मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं हिंद की गौरवमयी गाथा हूं।
मैं काल को जीतनेवाली कालजयी भाषा हूं।

 
 
 
 द्वारा - श्री समीर उपाध्याय
 
श्री समीर उपाध्याय गुजरात, भारत से हैं। पेशे से शिक्षक हैं। इनकी शिक्षा एम.ए.; एम.फिल्.(हिन्दी) है। इन्होने कई काव्य संग्रहों में साझा काम किया है। इनको कई सम्मान भी मिल चुके है। इनकी लेखनी का भविष्य उज्वल लग रहा है।
 
 

 
                   ~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
 
 
मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका हूं।
मैं हिंद की एकता की अनुपम परंपरा हूं।
 
मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं हिंद की स्वतंत्रता का शंखनाद हूं।
मैं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आधारशिला हूं।
 
मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं हिंद की आन, बान और शान का प्रतीक हूं।
मैं विभिन्न भाषारूपी नदियों में महानदी के समान हूं।
 
मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं हिंद के ग्यारह राज्यों की राजभाषा हूं।
मैं विश्व के दूसरे नंबर की बड़ी भाषा हूं।
 
मैं हिंदी हूं।
हिंद के माथे की बिंदी हूं।
मैं अपने आप में एक समर्थ भाषा हूं।
मैं विश्व-भाषा बनने की पूर्ण अधिकारिणी हूं।
***
 
 
 "कविता वर्तमान का दर्पण" 
 
 
 
 
 कविता वर्तमान का दर्पण
 
 
 
 
द्वारा - डॉ. सुनील त्रिपाठी
 
 डॉ. सुनील त्रिपाठी, निराला राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं। अभी ये उच्च श्रेणी शिक्षक, शिक्षा विभाग म.प्र. में हैं। पढ़ने-पढ़ाने के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन में प्रसारण भी करते है। स्वतन्त्र लेखक के साथ-साथ इनकी रचनाएँ दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। हिंदी दिवस(14 सितम्बर) पर विशेष लेख।
 
 
कविता वर्तमान का दर्पण, ये दिग्दर्शन करवाएगी।
कविता कल भी सुनी गयी थी, कविता कल भी सुनी जाएगी।।

वाल्मीकि के निष्ठुर मन को, कविता ने नवनीत बनाया।
पीड़ित हृदय हुआ तुलसी का,कविता ने घर-घर पहुँचाया।।
घनानंद की विरह वेदना, छंद सवैया लेकर उभरी।
खंजन नयन सूर के पद से, महक उठी कविता की बखरी।।
अंतर्मन की प्रखर चेतना, हरदम सत्पथ अपनाएगी।

श्रमसीकर की गंध समाहित, करके कविता बोल उठेगी।
कविता वही अमर होगी जो, पीड़ा का अनुवाद करेगी।।
नंदनवन, हिमगिर, रत्नाकर, झील, सरोवर, झरने, सरिता।
दुर्गम पथ, समतल पगडण्डी, नाना रूपक धरती कविता।।
कविता की मथनी, मन को मथ, भावों का मक्खन लाएगी।

कविता को पाने के हित में, अपने को खोना पड़ता है।
मीरा बनकर अंदर-अंदर, सुबक-सुबक रोना पड़ता है।।
और सुभद्रा बनकर, लक्ष्मीबाई मय हो जाना पड़ता।
दिनकर बनकर कुरुक्षेत्र में, कर्मयोग दिखलाना पड़ता।।
कविता दिव्य देशना करके, नभ में यशध्वज फहराएगी।

जब होगा चहुँदिश सन्नाटा होगा, उस पल भी कविता बोलेगी।
कविता पहले, अपने स्वर को, हृदय तराजू में तौलेगी।।
संघर्षों का दीपक लेकर, कविता हरदम तिमिर हटाये।
स्थिर होकर, लक्ष्य साधकर, कविता चलना हमें सिखाये।।
सच का उद्घाटन करने में, कविता कभी न भय खाएगी।
***
 
 
अपनी कहानियाँ  
 
 
"दुपहरी संध्या" 
 
 
 
 
द्वारा- श्री हरिप्रकाश राठी
 
 
 
 श्री हरिप्रकाश राठी जोधपुर, राजस्थान से हैं। इस कहानी में उन्होंने मानव की भावनाओं को भी बहुत ही अच्छी तरह अभिव्यक्ति दी है। इनकी रचना में मुहाबरों और लोकोक्तियों का सुंदर एवं उचित प्रयोग है।
 
 
 
 
ईश्वर चाहे नरक का वास दे पर किसी को ‘निन्यानवे के फेर’ में न उलझाए। गणित का अधिक ज्ञान कभी-कभी गर्दन का फंदा बन जाता है।

हर शास्त्र का सम्यक् ज्ञान ही उचित है। बचपन में बाबूजी को अंक-तालिका दिखाते वक्त मैं उनको जोर देकर बताता था कि बाबूजी, देखो! मेरे गणित में इतने अच्छे नम्बर आए हैं, इस विषय में मैं कक्षा में अव्वल हूँ। बालोचित अबोधता के साथ मैं उनकी ओर प्रशंसा के लिए तकता पर बाबूजी की दार्शनिक आंखें, चेहरे का गांभीर्य एवं मूक भाव मुझे विचलित कर देते। उनका मौन कुछ पल के लिए मुझे शक्तिहीन कर देता। तब अम्मा खफा होकर बिखरती, ‘‘थोड़ी तारीफ भी कर दिया करो, कोई जुबान थोड़े घिसती है।’’ बाबूजी चुपचाप वहाँ से सरक जाते। हाँ, अगर हिन्दी अथवा साहित्य के किसी विषय में अच्छे नम्बर आते तो वे अवश्य प्रशंसा करते। वे हमेशा यही कहते, ‘‘साहित्य एवं कला की गंगोत्री हृदय है लेकिन गणित का उद्गम दिमाग से है। देश एवं समाज को अच्छे हृदय चाहिए, अच्छे दिमाग नहीं। जैसे अच्छा तैराक अक्सर डूबता है, अच्छा गणितज्ञ कभी-कभी स्वयं गणित के फेर में फंस जाता है।” तब यह बात मुझे समझ नहीं आई थी लेकिन अब जब कि बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लिये मुझे एक वर्ष से ऊपर होने आया है, बाबूजी की बात अक्षरशः सत्य प्रतीत होने लगी है।

बाबूजी अक्सर कहते थे, जीवन में ज्ञान तीन तरह से आता है-उम्र से, अनुभव से एवं किताबों से। तीनों प्रकार के ज्ञान की अपनी सत्ता है, अपना महत्त्व है। कुछ ज्ञान सिर्फ उम्र से आता है, अनुभव एवं पुस्तकों से नहीं; तो कुछ ज्ञान सिर्फ अनुभव अथवा पुस्तकों से आता है, उम्र से नहीं। तीनों प्रकार के ज्ञान मिलकर ही जीवन को समग्र बनाते हैं एवं तीनों का अपना वजूद है। उम्र के पैंतालीस वर्ष एवं बैंक में नौकरी के पच्चीस वर्ष पूरे करने पर अब लगता है बाबूजी का विवेचन कितना सटीक था।


बैंक में वीआरएस अर्थात् ‘वोल्यूंटरी रिटायरमेंट स्कीम’ (स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति) का परिपत्र आया तो मैं बल्लियों उछल पड़ा। मेरे अंतःकरण में स्वाधीनता के अंकुर फूटने लगे, पंछी पिंजरे से बाहर आने को आतुर हो उठा। नौकरी और गुलामी में क्या अन्तर है? जैसे किसी ने आपकी प्रतिभा को कुछ रुपयों में कैद कर लिया हो? जहाँ आपके विवेकाधिकार के लिए कोई स्थान नहीं। बड़े बुजुर्ग ठीक ही कह गए हैं, नौकरी न कीजिए घास खोद खाइए, यहाँ वहाँ नहीं मिले तो थोड़ी दूर जाइए। आंखें मूंद कर उच्चाधिकारियों के निर्देशों का पालन करो, उनकी प्रशंसा व चाटुकारिता को जीवन का सिद्धान्त एवं शैली बनाओ तब तो ठीक है अन्यथा चार लाइन का स्थानान्तरण आदेश आपकी नींद हराम कर सकता है। फिर लम्बा मुंह एवं कृत्रिम मुस्कुराहट चेहरे पर लिये बॉस लोगों के इर्दगिर्द घूमना आपकी नियति बन जाती है। सेवक में सेवकाई का गुण ही देखा जाता है, सेवक अगर मालिक से गुण दिखाए तो आँखों से उतरते देर नहीं लगती।


गणित बचपन से ही तेज थी, मैंने तुरन्त हिसाब लगाया। पांच लाख पीएफ जमा चार लाख ग्रेच्युटी जमा एक लाख छुट्टियों के शेषों का भुगतान एवं समय पूर्व रिटायरमेंट लेने के लिए दस लाख रुपये अतिरिक्त एक्सग्रेशिया प्रतिपूर्ति रकम यानि करीब-करीब बीस लाख रुपये। दस प्रतिशत ब्याज दर से भी विनियोजन करो तो एक वर्ष का ब्याज बना दो लाख, अर्थात् वर्तमान ‘केरी होम’ तनख़्वाह से भी अधिक पगार यानि पांचों अंगुलियाँ घी में। लगा जैसे कारूँ का खजाना मिल गया, घर बैठे गंगा आ गई। भविष्य आठ वार नौ त्यौहार लगने लगा। और क्या चाहिए? क्या सरकार बेवकूफ हो गई है? यह तो अशर्फियों की लूट हुई। मन के घोड़े हवा से भी तेज दौड़ने लगे, कल्पना आकाश छूने लगी। यकायक मुझे लगा न जाने कितनी तकलीफों से अब मुक्ति मिलने वाली है। न तबादले का झमेला, न छुट्टियों का झमेला, न बॉस की डांट-फटकार, यह टारगेट पूरे नहीं हुए, वह टारगेट पूरे नहीं हुए, तुम्हारे यहाँ इतना स्टाफ है, क्या तुम्हें मैनेज करना नहीं आता, इतने स्टेटमेंट आने हैं, इतने प्रपोजल पैंडिंग हैं, इतने पत्रों का उत्तर नहीं आया? आखिर करते क्या हो? एक सप्ताह में क्लीयर कर देना नहीं तो ऐसा पदस्थापन दूंगा की सब छकड़ी भूल जाओगे।’’ घर आकर सारा गुस्सा बीबी पर निकालता, ‘‘तुम खाना क्या बनाती हो? कभी नमक कम तो कभी मिर्ची ज्यादा। सब गुड़ गोबर कर देती हो। दिन भर बैंक में पचो, शाम को ऐसे टुक्कड़ तोड़ो। इतनी पढ़ी-लिखी हो, कभी पाकशास्त्र का अध्ययन भी किया है? स्कूल में अध्यापक की नौकरी करती हो तो कोई तीर नहीं मार लिया, एक बार बैंक मैनेजरी करके देखो, कलेजा मुँह में आ जाएगा।’’

वह तुरन्त समझ जाती, आज बॉस की डांट पड़ी है। सीधे एक ही बात करती, ‘‘आज बॉस ने डांटा है क्या?’’ सत्य के पर्दाफाश होते ही मैं झुंझलाकर उसकी ओर देखता। तब मेरी आँखों में करुणा एवं याचना अधिक और क्रोध कम होता। पत्नी से अधिक पुरुष के व्यवहार को कौन समझ सकता है? मैं खिसिया कर रह जाता। मन ही मन सोचता बैंक मैनेजरी भी कोई नौकरी है? द्रौपदी की तरह सभी चीर हरण करते हैं। इधर पब्लिक पल्लु खींचती है, उधर यूनियन वाले। तिस पर टारगेट का चक्कर, स्टाफ की मारामारी एवं सुरसा के मुख की तरह दिन-ब-दिन बढ़ने वाला अंतहीन कार्य। अफसर बाबुओं का तो कुछ कर नहीं सकते, सारी खीझ हम पर निकालते हैं।

दुनिया में हर व्यक्ति अपने वर्तमान से विद्रोह करता है। विद्रोह का यह अंकुर अगर कोई सहारा पा जाए तो इंसान आगा-पीछा कुछ नहीं सोचता। मेरी तेज गणित ने इसे पूर्णतः लाभ का सौदा करार दिया। बलि का पशु सिर्फ हरी-हरी घास देखता है। गणित की नाव पर चढ़ा मैं स्वयं को अचल एवं संसार को मेरे इर्दगिर्द घूमते हुए देख रहा था। जैसी भावी होती है, वैसी ही बुद्धि बन जाती है।

मैंने तुरन्त ‘स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति’ हेतु आवेदन कर दिया एवं उस दिन की राह तकने लगा जब मुझे इतनी मोटी रकम मिलेगी। श्रीमतीजी की नौकरी ने मेरे आत्म विश्वास को हौसला दिया। कुछ भी हो एक तनख्वाह तो आएगी ही, फिर इतने झमेलों से मुक्ति। अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम। मैं मूँछों में मुस्कुराने लगा।

स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति का आवेदन भेजने के दिन घर लौटते समय बॉस मुझे रास्ते में दिखे पर आज मैंने उन्हें नमस्कार करना भी लाजमी नहीं समझा। उन्हें देखकर भी यूं तनकर चलता रहा जैसे ‘बहुत जुल्म सह लिया तुम्हारा। अब क्या उखाड़ लोगे? हमारे जैसे योग्य आदमी चले जाएंगे तो अपने करमों को रोओगे।’ जिस तरह पूर्ण चन्द्रमा को देखकर समुद्र उन्मत्त होकर उछलता है, आने वाली धन की गठरी की कल्पना से मेरा मन शिखर साहस को छू रहा था। रक्त की रवानी एवं इरादों का जोश देखने लायक था। आश्चर्य! उस दिन बॉस ने ही मुझे आवाज देकर बुलाया, गंभीर होकर बोले, ‘‘त्रिवेदी! यह क्या कर डाला तुमने? अभी तो तुम मात्र पैंतालीस वर्ष के हो? इस अवस्था में वानप्रस्थ? बाकी समय कैसे निकालोगे? बेकारी में जीवन कैसे कटेगा?’’ उनके उपदेश मेरे इरादों के चिकने घड़े पर नहीं ठहर पाए। गर्म लोहा ठण्डे लोहे से नहीं जुड़ता। मैंने झूठमूठ कहा, ‘‘सर! मेरे भाई के अच्छा कारोबार है, उसके साथ कोई काम कर लूंगा। काम करने वाले के लिए काम की क्या कमी! ऐसी स्कीम बार-बार नहीं आने वाली।’’ पहले बॉस से बात करने में जुबान अटक जाती थी पर आज मेरा वीरोचित शौर्य देखने लायक था। जुबान वीररस से पगी हुई थी। बॉस चुपचाप चले गए। मैंने मन ही मन उन्हें दनादन गालियाँ दी। अब डाँटना फोन पर? तेरी ऐसी कम तैसी? आँखें ऐसे तरेरता था जैसे हृदयहीन महाजन के तकाजे का दिन निकल गया हो। छुट्टी ऐसे देता था जैसे बाप की दुकान हो।


उस दिन मेरी बांछें खिल गई जब डाक विभाग का क्लर्क मेरे ‘स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति’ की स्वीकृति सूचना एवं सोलह लाख का चैक लेकर आया। रुपये चार लाख कम का चैक देखकर मैं सकपका गया। चार लाख टीडीएस (अग्रिम आयकर) के ऐसे काट लिए गए, जैसे किसी कसाई ने छुरा चलाया हो। मुझे मानो बिजली का झटका लगा। दूसरे दिन मेरे ऋणों की टोटल कर तीन लाख रुपये और काट लिए गए। खाते में मात्र तेरह लाख का जमा शेष लेकर मैं कार्यभार मुक्त हुआ। सारी गणित गड़बड़ा गई, तरबूज-सा मुंह पपीते की तरह लटक गया। विदाई के समय आँखों में पानी एवं गला रुँधा हुआ था। सभी यही सोच रहे थे कि मैं बैंक छोड़ने एवं उनसे बिछुड़ने से गमगीन हूँ पर मेरा हृदय जानता था सत्य क्या है। विधाता रूठ जाते हैं तब ऊंट चढे़ को कुत्ता काट जाता है। बैंक ने गुड़ में डालकर कड़वी गोली दे दी। सरकार ने उल्टे छुरे से मूंड लिया। आगे की कहानी और भी हृदय विदारक थी।

भेड़ पर ऊन कौन छोड़ता है? वर्षों बाद इतनी मोटी रकम घर आई थी, सभी रिश्तेदार मित्रों ने जमकर पार्टी ली। मैंने किसे छोड़ा था जो वो मुझे छोड़ते। मेरे ना-नुकर करने पर भी शहर की अच्छी होटल में मुझे पार्टी देनी पड़ी। इतने बिल का भुगतान मैंने पहले कभी नहीं किया। बिल कमीज की जेब में रखते वक्त लगा जैसे हृदय पर पत्थर रख रहा हूँ।

श्रीमतीजी वर्षों से गहनों का कहती थी, उन्होंने भी अपनी इच्छा इसी मौके पर पूरी की। इस मौके पर उसे मना करने का अर्थ संपूर्ण जीवन के सुख को धार पर रखने जैसा था। उसकी नौकरी ही अब मेरी जीवन आशा का आधार थी।

 
मकान कई वर्षों से मरम्मत मांग रहा था। रंग-रोगन की उतरती हुई पपड़ियाँ व चरमराते दरवाजे अपने करुण नेत्रों से मुझे कह रहे थे, त्रिवेदी साहब! वर्षों आपको सहारा एवं सुकून दिया है, आज हम भी आपकी कृपा के भिखारी हैं। एक लाख से ऊपर यहाँ भी शहीद हुए। साले साहब को कारोबार करने के लिए दो लाख देने पड़े, रकम पास हो तो मना कैसे करें ? वैसे भी जीवन अब उसकी बहन के आसरे था। पीछे कुल मिलाकर कोई सात लाख बचे उन्हें लेकर एफडीआर करवाने गया तब तक दो प्रतिशत ब्याज दर सरकार ने कम कर दी। मेरा खून सफेद हो गया। लगा जैसे गंजे सिर पर ओले पड़ रहे हों। यह मैंने कैसा निर्णय कर डाला? विधाता ने विपत्ति का बीज बो दिया। करम फिर गया, कुचाल समझ नहीं आई। अपने ही वृक्ष को अपनी कुल्हाड़ी से काट दिया। अपने ही हाथों मिट्टी खराब कर दी। अब छाती पर सांप लोटने लगे। पासा उल्टा पड़ गया। सरकार के पेट की दाढ़ी समझ नहीं आई, आमों की कमाई नींबुओं में गमा दी। मुहर्रमी सूरत लिए मैं घर लौटा।

घर पर खाली बैठना दस-पन्द्रह रोज तो अच्छा लगा पर बाद में बोरियत होने लगी। खाली कब तक बैठता, कार्य करना तो मानवी स्वभाव है, पर अब काम कहाँ था मित्रों के यहाँ जाते-जाते बोर हो गया, वो इशारे से टरका देते। कहाँ मैं उनकी आँख का अतिथि एवं दिल का मेहमान होता और कहाँ आज मूसलचंद-सी हालत थी। श्रीमतीजी कार्य करने को निकलती तो मन आत्मग्लानि से भर जाता। हृदय अपमान से पीड़ित हो उठता। अरे निर्लज्ज! बीवी कमाने जाती है और तू नाकारा बैठा है। रुग्ण नेत्रों से मैं उसे जाते हुए निहारता। बेटी के सम्बन्ध के लिए लोग आते, पूछते! अभी आप क्या करते हैं? मैं इस यक्ष प्रश्न का उत्तर कैसे देता? शर्म के मारे गड़ जाता। खाली बैठे देखकर श्रीमतीजी कई काम मेरे जिम्मे कर देती, ‘‘धोबी से कपड़े ले आना, शाम को शाकभाजी ले आना, नल खराब हो रहे हैं उन्हें ठीक करवा देना, बिजली के पंखे आवाज कर रहे हैं, इलेक्ट्रीशियन को दिखवा देना, रसोईगैस वाला आए तब सिलैण्डर ले लेना, बच्चों को बेकार टोकना मत आदि-आदि।’’ सुनकर कलेजे में कटार चलती, लोई उतर जाती। लगता जैसे नागिन फुफकार रही हो। मैं रुई की तरह माथा धुनने लगता। उसके ये अनुरोध मुझे बॉस के आदेशों से भी कठोर लगते। वहाँ आदेश कार्य कुशलता को पराकाष्ठा पर पहुँचाने की सारगर्भित भावना से भरे होते थे पर ये अनुरोध मेरी आत्मा को आहत करते हुए-से लगते। अकारण ही कुण्ठा मन में आश्रय लेने लगी, बिना कारण ही अब बच्चों और श्रीमतीजी को डांट देता। परिस्थितिजन्य श्रीमती का साहस भी अब द्विगुनित था, गाल फुलाकर कहती, ‘‘अब बैंक नहीं रहा तो बिना बात घर में मैनेजरी झाड़ते रहते हो।’’ उसका उत्तर नाविक के तीर की तरह सीधे अंतःस्तल पर लगता। मैं तिलमिला उठता। बच्चों को मैं अब उनकी स्वाधीनता पर अंकुश लगता, वो भी पंजे पैने करने लगे। धीरे-घीरे बच्चों से, श्रीमतीजी से झगड़ा होने लगा। शाम अब वह इंतजार नहीं होता जो पहले था। मोती का पानी उतर गया।

अब पुराने दिन याद आने लगे। कैसे बड़े-बड़े व्यापारी घर मिलने आते थे? कैसे बाबू लोग अवकाश-पत्र देकर निवेदन करते थे? कैसे बैंक में सभी ‘सर! सर!’ कहकर बुलाते थे। कैसे जगह-जगह चीफ गेस्ट बनकर जाता था। उन स्वप्निल दिनों को याद करके मैं बिलख उठता पर अब चिड़िया खेत चुग चुकी थी।

स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लिये अब एक वर्ष होने को आया। समय पहाड़ हो गया। दिन भर अपलक दीवारों को देखता, काठ के उल्लू की तरह तकता रहता। कर्महीन जीवन भी कोई जीवन है? जिस जीवन में आशा नहीं, तनाव नहीं, लाग नहीं, जिसकी श्वासों में कर्म का संगीत नहीं, वह जीवन मृत्यु से भी बदतर है। कर्महीन जीवन खुदा का अजाब है। बैंक ने फूलों की छड़ी से मार दिया। काश! मेरी गणित कमजोर होती तो भाग्य का यूं मर्सिया न पढ़ना पड़ता। पहाड़ से लौटकर आने वाली पक्षी की आवाज की तरह पिताजी के शब्द कानों में गूंजने लगे।

आज सुबह से टीवी देखते-देखते बोर हो गया। सर्दी के दिन थे, दुपहर तीन बजे बाहर आकर आराम कुर्सी पर बैठ गया। अधेड़ उम्र के आदमी की तरह सूर्यदेव आसमान को आधे से ऊपर पार कर चुके थे। तभी आसमान में आवारा घूमते हुए बादल का एक टुकड़ा सूर्य के आगे आया। प्रकाश एकाएक क्षीण हो गया। दुपहरी में संध्या-सी हो गई पर आज असमय संध्या का आना मुझे बहुत बुरा लगा। इस संध्या में न वो शीतलता थी न वो सुकून। न पक्षियों का वह कलरव था, न वो उल्लास जो कार्य समाप्त कर घर जाते मजदूर के चेहरे पर होता है। पेड़-पौधों में भी वो स्तब्धता, वो शांति नहीं थी। यह दुपहरी संध्या थी।

एकाएक पोस्टमैन ने घर का मुख्य द्वार खोलकर एक लिफाफा लाकर दिया। खोलकर पढ़ा तो आँखे चमक उठी-स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति स्कीम सुप्रीम कोर्ट ने अवैधानिक घोषित कर दी है। मैं उस सुबह को तकने लगा जब सूट-बूट पहनकर वापस बैंक निकलूंगा। ईश्वर की कृपा ने मेरा आत्माभिमान मुझे वापस लौटा दिया। खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन का आनन्द सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने में है। खिदमत से अजमत है।

दूसरे दिन बैंक जाने के लिए पत्नी ने जब हाथ में सूटकेस दिया तो मैं ऐसे ऑफिस की ओर चला जैसे कोई शेर पिंजरे से छूटकर वापस जंगल की तरफ जा रहा हो।
***
 
 
 
बाल खंड (किड्स कार्नर)

" बाल गीत"
 
 
 
 
 
  पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो
 
तुम मानव हो मानव बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।
मत भाग्य भरोसे बैठो तुम
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।।

तुम सूरज जैसे ही बनकर
कुछ नित्य उजाला फैलाओ।
तुम हवा सरीखे बह करके
श्वांस, श्वांस में भर जाओ।।

तुम नवाचार में ही पढ़कर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।
तुम मानव हो मानव बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।।

तुम अपनी नींव मजबूत करो
उज्ज्वल भविष्य बनाओ जी।
तुम खुशियाँ झोली में भरकर
सबमें ही रोज लुटाओ जी।

तुम देश , धर्म के ही बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।
तुम मानव हो मानव बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।


 
 
 
 द्वारा - डॉ. राकेश कुमार
 
 
डॉ. राकेश कुमार गुप्ता मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से हैं। योग एक्सपर्ट. सेवानिवृत्त अधिकारी इंटेलीजेंस विभाग, उत्तर प्रदेश से हैं। बाल साहित्य में विशेष रूचि रखते हैं।
 
 
                  ~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
तुम फूल सरीखे खिलकर ही
अब जीवन को महकाओ जी।
तुम समय कभी ना खोओ जी
तुम सबमें प्रेम बढ़ाओ जी।।
 
 तुम कनक सरीखे ही तपकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।
तुम मानव हो मानव बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।।

तुम अच्छे - अच्छे काम करो
यूँ जग में प्यारे नाम करो।
तुम बहो सदा सरिता बनकर
पूज्यों का सम्मान करो।

तुम लक्ष्य बनाओ यूँ प्रणकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।
तुम मानव हो मानव बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।।

तुम जीवन सफल बनाना जी
तुम कोयल जैसा गाना जी।
खुद हँसना और हँसाना जी
भूखों को सदा खिलाना जी।

तुम सदा बुराई से बचकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।
तुम मानव हो मानव बनकर
पुरुषार्थ करो, पुरुषार्थ करो।।

***
 
 
"कहानियाँ" 
 
 
 
 
 
  विश्वास
 
 
 
 
 द्वारा - डॉ उमेश प्रताप वत्स
 
 
साहित्यकार डॉ उमेश प्रताप वत्स, हिन्दी प्राध्यापक हैं। शिक्षा विभाग हरियाणा में एनसीसी ऑफिसर (कैप्टन) हैं। इन्होंने हिन्दी में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। कविता, कहानी, लघुकथा, बाल कविता, आलेख आदि लिखते हैं। ये यमुनानगर, हरियाणा से हैं।
 
 
                  ~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
 
 
 
 
कुर्सी संभालते ही जज की निगाहें जैसे ही मुजरिम की ओर पड़ी वह विस्मित हो देखते ही रह गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो व्यक्ति कटघरे में खड़ा है वह हिन्दू जनता को हिंसा के लिए भड़काने वाला कट्टरवादी हो सकता है। जज ने सुनवाई की तारीख आगे बढ़ा दी क्योंकि उसका मन यह मानने को तैयार ही नहीं था कि जिस व्यक्ति को वह अपना आदर्श मानती हैं, जिसके कारण वह जज की इस सम्मानित कुर्सी तक पहुँची है, जो बचपन से ही पिता की तरह मानवता व संस्कार की बातें सिखाता आया है, वह भड़काऊ कैसे हो सकता है?

सकीना को अभी तक याद है जब मास्टर जी ने ईद के दिन पाँच-छः बच्चों को अपने घरों से सेंविया लाने को कहा तथा अगले दिन सभी हिन्दू-मुस्लिम बच्चों के साथ बैठकर सेंविया खाई। मास्टर जी कहते थे कि 'ना कोई छोटा है ना बड़ा, ना ऊँच है ना नीच, ना हिन्दू और ना मुसलमान, जो इस देश की माटी से प्रेम करे बस वही है सच्चा इंसान।'

अगली तारीख आई, मुकदमा चला। जज साहिबा ने केस की जांच एस.आइ.ए. को सौंप दी। कुछ दिनों के बाद पुनः सुनवाई हुई। सकीना का विश्वास जीत गया, उसकी आँखों में आँसू थे किन्तु चेहरा मारे खुशी के गर्व से दमक रहा था।
***
 
 
"शुभकामनाएं पाठकों की"
 
 
1 , शेफाली चतुर्वेदी
नमस्कार, आदरणीय सुशीला जी
आशा है आप स्वस्थ व सानंद होंगीं। 'जागृति' मंच के तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति बहुत प्रशंसनीय कार्य कर रही है, इसके लिए आयोजन समिति को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
इस कार्य में यदि कोई मेरा सहयोग अपेक्षित हो तो मैं सहर्ष तैयार हूं।
सादर

सादर धन्यवाद
डॉ0 शेफाली चतुर्वेदी
एसोसिएट. प्रो. हिंदी विभाग,
आगरा कॉलेज, आगरा
9458661575
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2, धर्मेन्द्र गुप्त 
.Re: Sub.: May 2022- Samvaad - International Hindi Association
संवेदना अनुभूति
To:
बहुत सुंदर अंक है। आपका श्रम सार्थक है। हार्दिक साधुवाद।
Mr. Dharmendra Gupt
Varanasi, UP, India
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3.  गिरेन्द्रसिंह भदौरिया
Re: Sub.: May 2022- Samvaad - International Hindi Association
Girendra Singh Bhadauria <prankavi@gmail.com>

आदरणीया सुशीला मोहनका जी, नमस्कार
अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति अमेरिका के मेडिना से प्रकाशित होने वाली हिन्दी मासिक पत्रिका "संवाद" का मई 2022 का अंक पढ़ा बहुत अच्छा लगा। साहित्य की गम्भीर समझ को इंगित करती पत्रिका ने मुझे साधुवाद पत्र लिखने को विवश किया है।आपने मेरी रचना " यह मानवता पर संकट है " को भी इसमें प्रकाशित किया है। हिन्दी समिति परिवार सहित समूचे सम्पादक मण्डल का धन्यवाद। हार्दिक आभारी हूँ अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति।

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर
9424044284
665196070
Email: prankavi@gmail.com
***
 
 
 "संवाद" की कार्यकारिणी समिति
 
 
  प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका , OH , sushilam33@hotmail.com
. सहसंपादक - अलका खंडेलवाल, OH , alkakhandelwal62@gmail.com
. सहसंपादक - डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP , dr.archana2309@gmail.com
  डिज़ाइनर   – डॉ. शैल जैन, OH , shailj53@hotmail.com
  तकनीकी सलाहकार -- मनीष जैन , OH , maniff@gmail.com
 
 
 प्रबंध सम्पादक संदेश
 
 
 
 
प्रबंध सम्पादक
 
- सुशीला मोहनका
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्य एवं सदस्याओं को,
महाराणा प्रताप जयंती एवं विश्व योग दिवस की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और
वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
Covid-19 कारण विगत दो वर्षों से अ.हि.स. के द्वारा हास्य कविसम्मेलनों के आयोजन भी नही
हो पा रहे थे। इस बार ३ जून से १० जुलाई २०२२ तक में अमेरिका में २१ स्थानों पर कवि सम्मेलन हो रहे हैं। अमेरिका के सभी आजीवन सदस्य-सदस्यों से अनुरोध है कि आपके आस-पास जहाँ भी कवि सम्मेलन हो अपने बन्धु-बान्धवों के साथ इस कार्यक्रम में सम्मिलित होकर इसका आनंद उठायें। आशा करती हूँ कवि सम्मेलन का flyer आप तक अवश्य पहुँचा होगा। इस बार भारत
से तेज नारायण शर्मा, दीपक गुप्ता और अंकिता सिंह आ रही हैं। आपकी सुविधा के लिए flyer
निचे चिपका रही हूँ।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी
है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी । ‘जागृति’ की छठी कड़ी शनिवार, ९ जुलाई २०२२ को दिन में ११:०० बजे से अमेरिका में और ९
जुलाई २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिए और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के
लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि
अपने यहाँ के हिन्दी प्रेमियों तक अ.हि.स. द्वारा ९ जुलाई २०२२ को होनेवाले कार्यक्रम की सूचना
दें। यह आपका पावन कर्तव्य और समय की माँग भी है।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया
गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं
को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य
प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
***
 
 
  "Disclaimer"    
 
 
 रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति -नीति से कोई संबंध नहीं है।    
 
 
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