JULY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
जुलाई 2025, अंक ४८ प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र। सम्पादक: डॉ. शैल जैन
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों एवं संवाद के पाठकों का अभिनन्दन।
अमेरिका स्वतंत्रता दिवस, मुहर्रम और गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ ।
२०२५ के ग्रीष्म काल का समय निकल रहा है । समय तीव्र गति से चलता रहता है और गर्मी की छुट्टियाँ भी आधी गुजर गई है । हमारी समिति की शाखाएँ और आउटरीच राज्य अपने शहरों में आगामी कार्यक्रमों की तैयारियों में जुट गए हैं । अगस्त में भारतीय स्वतंत्रता दिवस, सितंबर में हिंदी दिवस और आगे आने वाले त्योहारों, दिवाली और ईद के समारोह की तैयारियाँ सभी पर कार्य हो रहें हैं ।
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अ.हि.स.) की उत्तर पूर्व शाखा एवं नैशविल टेनेसी शाखा के हिंदी समर कैम्प शुरू हो गये हैं ।दोनों जगहों के कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह चल रहे हैं । कुछ फोटो क्लिपस जुलाई अंक में देखिये। विस्तृत समाचार अगले अंक में प्रकाशित होगा।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा ने स्थानीय कार्यक्रम में भागीदारी के साथ समर कैंप में सहयोग दिया। ये समर कैम्प तीन सप्ताह के लिए है और पिछले १० सालों से हो रहा है । इसमें ५ से १५ साल के बच्चे हैं । कुल ७० से ज़्यादा बच्चे ,१५-१८ Teachers और १५ स्वयं सेवक हैं ।मैं दिल से कार्यक्रम की संयोजक और निर्देशक किरण खेतान , सह निर्देशक शालिनी गोयल और कनिका अग्रवाला, सभी teachers और स्वयं सेवकों को दिल से धन्यवाद देती हूँ ।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की टेनेसी शाखा द्वारा पहली बार एक विशेष हिंदी समर कैंप का सफल आयोजन किया गया। इस कैंप में सभी आयु वर्ग के प्रतिभागियों में भाषा सीखने और अपनाने का अद्भुत उत्साह देखने को मिला। कुल 8 प्रतिभागियों ने इस समर कैंप में भाग लिया, जिनकी उम्र 5 वर्ष से लेकर 25 वर्ष तक थी।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विभिन्न शाखाओं एवं आउटरीच राज्यों में आगे आने वाले कार्यक्रमों की तैयारियाँ हो रही हैं । भारत के स्वतंत्रता दिवस और अन्य कई योजनाओं के लिए काम किए जा रहे हैं ।सभी शाखाओं के आयोजकों से अनुरोध है कि वे जल्द अपने कार्यक्रमों का समाचार एवं फोटो हमें साझा करें ताकि उन्हें संवाद में प्रकाशित किया जा सके।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विभिन्न शाखाओं एवं आउटरीच राज्यों में हिंदी दिवस की तैयारियाँ जोर शोर से हो रही है ।ईस वर्ष सभी एक साथ मिल कर युवकों को कार्यक्रम में ज़्यादा जोड़ने की कोशिश कर रहें हैं । कार्यक्रम अमेरिका के विभिन्न शहरों में सितंबर १ से ३० के बीच आयोजित किए जा रहें हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अ.हि.स.) का 22 वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन 2–3 मई, 2025 का विस्तृत समाचार और फोटो पिछले माह (जून) के संवाद में निकाला गया और मैं उम्मीद करती हूँ कि आप उन्हें देखें और पढ़े होंगे । कृपया अपने विचारों को हमसे साझा करें ।
आपके विचारों और आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतज़ार रहेगा ।
धन्यवाद,
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
ईमेल: president@hindi.org | shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: +1 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हिंदी दिवस 2025 समारोह
द्वारा : डॉ. शैल जैन, राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- ग्रीष्म (summer) कैंप
2025
उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
द्वारा : डॉ. शैल जैन, राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- ग्रीष्म (summer) कैंप
2025
नैशविल, टेनेसी शाखा
द्वारा : सीमा वर्मा, शाखा अध्यक्षा, नैशविल, टेनेसी
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हूस्टन रिपोर्ट
ह्यूस्टन में पार्कों, मंदिरों और शहर के चौराहों पर योग अभ्यास
द्वारा : स्वपन धैर्यवान (अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, न्यासी समिति )
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ह्यूस्टन में पार्कों, मंदिरों और शहर के चौराहों पर योग अभ्यास।
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए ह्यूस्टन में 30 से अधिक आउटडोर और इनडोर कार्यक्रम आयोजित किए गए।
ह्यूस्टन के लोग 11वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए उत्साह के साथ एकत्र हुए। उनके मैट पार्कों और मैदानों में पैचवर्क रजाई का रूप ले रहे थे क्योंकि शहर ने स्वास्थ्य, समुदाय और सांस्कृतिक जुड़ाव के दिन को अपनाया। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए ह्यूस्टन में 30 से अधिक आउटडोर और इनडोर कार्यक्रम आयोजित किए गए।
ह्यूस्टन मेट्रो में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2025 के समग्र समन्वयक शरद अमीन ने कहा कि मैं ह्यूस्टन मेट्रो क्षेत्र में भागीदारी देखकर बहुत खुश हूं। हम 21 जून, 2026 को एक स्थान पर भव्य अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आयोजित करने के लिए तैयार हैं। इसमें 1000 से अधिक योगी और योगिनियां भाग ले सकते हैं।
योग शिक्षा के लिए समर्पित एक गैर-लाभकारी संस्था SVYASA ह्यूस्टन ने शिक्षण सहायता की आवश्यकता वाले संगठनों को प्रमाणित प्रशिक्षक प्रदान किए।
SVYASA के कार्यकारी निदेशक विश्वरूपा एन ने कहा कि हम पिछले दिसंबर से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2025 की तैयारी कर रहे हैं। SVYASA ने सामुदायिक केंद्रों में कई कार्यक्रम आयोजित किए और 15 से अधिक कार्यक्रमों के लिए शिक्षक उपलब्ध कराए।
ग्रेटर ह्यूस्टन के हिंदुओं ने मीडिया आउटरीच प्रयासों का समर्थन किया। सभी कार्यक्रमों को भारत पटेल द्वारा समन्वित एक एकल फ्लायर में संकलित किया गया, जिससे उपस्थित लोगों को यह चुनने में मदद मिली कि उन्हें किस कार्यक्रम में भाग लेना है।
इंडिया हाउस
शुक्रवार शाम को इंडिया हाउस ने ह्यूस्टन में भारत के महावाणिज्य दूतावास और सामुदायिक संगठनों के साथ मिलकर एक उत्साहपूर्ण समारोह का आयोजन किया। सीजीआई डीसी मंजूनाथ ने कहा कि योग वास्तव में ह्यूस्टन के कई लोगों के लिए एक आंदोलन और जीवन शैली बन गया है। यह ग्रेटर ह्यूस्टन क्षेत्र में 11वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के लिए इस वर्ष आयोजित बड़ी संख्या में कार्यक्रमों में स्पष्ट है।
इंडिया हाउस योग सत्र का नेतृत्व पद्म भूषण पुरस्कार विजेता डॉ. डेविड फ्रॉली उर्फ पंडित वामदेव शास्त्री ने किया। उनका संदेश स्पष्ट था- योग केवल शारीरिक नहीं है; यह आंतरिक और बाहरी जीवन में सामंजस्य स्थापित करता है।
इंडिया हाउस के अध्यक्ष पंकज मालानी ने कहा कि योग दुनिया को भारत का एक शाश्वत उपहार है, एक गहन अभ्यास जो न केवल शरीर बल्कि मन और आत्मा का भी पोषण करता है। हमें याद रखना चाहिए कि योग केवल व्यायाम से कहीं अधिक है। यह समग्र स्वास्थ्य, सद्भाव और आंतरिक शांति की ओर एक मार्ग है।
शुगर लैंड
गैर-लाभकारी हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) ने कई योग सत्रों का आयोजन किया। इसमें शनिवार 21 जून की सुबह शुगर लैंड टाउन स्क्वायर में एक सत्र भी शामिल था। HSS और हिंदू युवा की युवा शाखाओं द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में इस वर्ष की वैश्विक थीम-'एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग' को दर्शाया गया।
सीजीआई डीसी मंजूनाथ, परिषद सदस्य संजय सिंघल और 100 से अधिक युवा स्वयंसेवकों सहित 250 से अधिक प्रतिभागी एकत्र हुए। सत्र का नेतृत्व प्रियांशु शेठ और विभोर निगम ने किया। सभी उपस्थित लोगों ने न केवल एक दिन के लिए बल्कि एक स्वस्थ स्वयं, एक एकजुट समुदाय और एक अधिक शांतिपूर्ण दुनिया में योगदान देने के लिए दैनिक जीवन के एक अभिन्न अंग के रूप में योग को अपनाने की शपथ ली।
एटर्नल गांधी संग्रहालय
एटर्नल गांधी संग्रहालय ने रविवार शाम को अपना पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह आयोजित किया। जब बारिश ने नियोजित बाहरी सेटिंग को बाधित किया तो योग सत्र को तुरंत घर के अंदर स्थानांतरित कर दिया गया।
सौमिल मालेक ने कहा कि हमारे आश्चर्य और खुशी के लिए किसी ने भी शिकायत नहीं की। उपस्थित लोगों ने बस अपनी जगह ढूंढ ली। सीढ़ियों पर, कोनों में, प्रदर्शनों के पास - संग्रहालय को अभ्यास के लिए एक शांतिपूर्ण अभयारण्य में बदल दिया। मनीष वानी ने कहा कि यह कार्यक्रम यूनियन इज क्रिएशन द्वारा आयोजित किया गया था और एचजीएच, ब्रह्मा कुमारीज और सीजीआई - ह्यूस्टन द्वारा प्रायोजित था।
बेटाउन
बेटाउन ने बेटाउन स्क्वायर में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया। मेयर चार्ल्स जॉनसन ने नगर परिषद में एक घोषणापत्र प्रस्तुत किया, जिसमें 21 जून, 2025 को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित किया गया। यह इस अभ्यास की सार्वभौमिक अपील और असंख्य लाभों को मान्यता देता है। बेटाउन के बंकिम शुक्ला ने कहा कि एक सफल योग दिवस ने हमारे शहर को सद्भाव में एकजुट किया।
नासा
नासा ने स्पेस सेंटर ह्यूस्टन में 11वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया। इसका आयोजन सीजीआई इंडिया द्वारा किया गया और आयुर्वेद योग के रस योग स्कूल द्वारा समर्थित किया गया। शटल और शटल वाहक विमान के नीचे आसन अभ्यास के लिए भीड़ एकत्र हुई। आयोजक क्रिस्टन वोलार्ड ने कहा कि इस कार्यक्रम में इस वर्ष की थीम है- एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग। यह व्यक्तिगत कल्याण और धरती के स्वास्थ्य के बीच संबंध को उजागर करता है।
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अंतर्राष्ट्रीय योग सत्र में उत्साह के साथ भाग लेते लोग। / Courtesy Photo
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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर एक यादगार तस्वीर। / Courtesy Photo
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अपनी कलम से
आलेख - वेषभूषा मानव के व्यक्तित्व का दर्पण है
द्वारा : उमेश प्रताप वत्स
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द्वारा - उमेश प्रताप वत्स
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उमेश प्रताप वत्स यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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वेषभूषा शब्द का ध्यान करते ही व्यक्ति की आँखों में विभिन्न रंगों से सराबोर एक ऐसा बाजार तैरने लगता है जो हजारों किस्म के रंग-बिरंगे वस्त्रों को अपने आंचल में समेटे हुये प्रत्येक आदमी को अपनी ओर लुभाने हेतु कमर कसकर सदैव तैयार खड़ा है। यद्यपि वस्त्रों का अविष्कार आवश्यकता के अनुरूप मौसमी सुरक्षा एवं तन ढकने के लिए ही हुआ था किंतु सभ्यता के विकास के साथ-साथ वस्त्रों के आकार-विकार में भी बदलाव होता रहा। पहले यह बदलाव दो-तीन पीढ़ी के बाद होता था फिर परिवर्तन की गति में तीव्रता आई और यह बदलाव हर एक पीढ़ी के बाद होने लगा और वर्तमान में तो एक ही पीढ़ी में हर दशक में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। पहरावा व्यक्तित्व के दर्शन के साथ-साथ किसी देश - समाज का भी दर्शन होता है। वह मौन रहकर ही व्यक्ति के समाज - संस्कृति की पूरी गाथा कह देता है। इतना अवश्य है कि पहले दिमाग में बिना जोर दिये ही वेशभूषा से प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व का आकलन हो जाता था अब यह कार्य इतना आसान नहीं है।
जैसे कहावत भी है कि -
कोस कोस पर बदले पानी और चार कोस पर वाणी
हर दशक में पहनावा बदले, यह सत्य सबने जानी.....
अर्थात्
हमारे देश भारत में हर एक कोस की दुरी पर पानी का स्वाद बदल जाता है और चार कोस पर भाषा यानि वाणी भी बदल जाती है तथा हर दशक में वेषभूषा में भी एक बड़ा बदलाव दिखलाई देने लगता है।
मुझे याद है जब हम छोटे-छोटे थे तो बच्चें और युवा रंगदार धारीदार पट्टू का पायजामा पहनते थे चाहे वो मजदूर किसान हो या नौकरी धंधा करने वाले तो 40-50 से अधिक आयु के लोग धोती पहनना शुरु कर देते थे फिर एक ही दशक के बाद धारीदार पट्टू का पायजामा सफेद रंग में बदलने लगा फिर एक दशक के बाद पायजामा का स्थान पतलून ने ले लिया। ग्रामीण परिवेश में गरीब लोग पायजामा पहनते थे और गांव से बाहर कामधंधा करने वाले अथवा पढ़ाई - नौकरी करने वाले पतलून डालते थे जिसका बाद में नाम प्रचलित हुआ पैंट। महिलायें घाघरा चोली व साड़ी से सलवार कमीज की ओर बढ़ने लगी। पैंट का फैलाव क्षेत्र बढ़ने लगा। वह दबे पांव झुग्गी-बस्ती तक दौड़ लगाने लगी। मध्यम वर्गीय परिवारों में पैंट के डिजाइन बदलने लगे। बीसवीं शताब्दी में पैंट के डिजाइन में काफी रोचक और चौंकाने वाले बदलाव हुए। ये बदलाव मात्र फैशन के कारण नहीं अपितु सामाजिक सोच, फिल्मों, तकनीक और आराम की जरूरतों से भी प्रेरित रहे हैं। 1970 के दशक में रंग बिरंगी बेल बॉटम का जमाना था। जो कि घुटनों से ऊपर तंग व घुटनों से नीचे फैली हुई रहती थी। इस काल पर बॉलीवुड के अमिताभ बच्चन व विनोद खन्ना की डिस्को संस्कृति का असर दिखाई देता था। 1980 के दशक में बैगी (ढीली) पैंट का प्रचलन हुआ। फिर 1990 के दशक में डेनिम का दबदबा रहा। स्ट्रेट फिट और बूटकट जीन्स-शर्ट और पैंट दोनों डेनिम के युवाओं में पहनावे की पहली पसंद थे। इसके साथ ही बोल्डनेसरिप्ड के नाम पर फटे जीन्स का चलन शुरू हुआ जो कि पुरानी पीढ़ी के लिए किसी हैरानी से कम न था। फैशन के चक्कर में अधिकतर युवा तो नई जींस पैंट लाकर ब्लेड से स्वयं ही काटने-फाड़ने लग जाते थे।
2000 के दशक में लो-वेस्ट जीन्स, कैप्री और कार्गो पैंट का दौर भी आया। बॉलीवुड एक्ट्रेस के कारण लो-वेस्ट ट्रेंड बहुत पॉपुलर हुआ। 2010 के दशक में सोशल मीडिया और सेल्फी कल्चर के कारण स्किनी जीन्स, स्लिम फिट पैंट कमर से टखने तक फिट होने लगी। अतः स्ट्रेचेबल फैब्रिक का चलन बढ़ने लगा। फैशनों के सभी दौर से गुजरते हुए 2020 के बाद आराम और आत्म-अभिव्यक्ति का समय देखने को मिला। कोविड की महामारी के बाद घर पर पहनने वाले आरामदायक ट्रैक पैंट और लाउंज पैंट ट्रेंड में आए। लूज फिटिंग , हाई-वेस्ट की वापसी हुई। अब पैंट डिज़ाइन पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए मिलते-जुलते हो गए हैं। वेषभूषा केवल एक पहनावा नहीं, बल्कि एक व्यक्तित्व का दर्पण बन चुकी है। जहाँ हर बदलाव, सोच और तकनीकी विकास के साथ कपड़ों की सोच भी बदलती गई है।प्राचीन भारत में कपास और ऊन द्वारा निर्मित वस्त्र ही प्रचलित थे। बाद में रेशम भी भारत में विकसित हुआ। चित्रों और शिलालेखों में देवी-देवताओं के वस्त्र भी उस युग के परिधान दर्शाते हैं।
क्षेत्रीय आधार पर वेशभूषा और उनका सांस्कृतिक महत्व देखने में आता है। ये वेशभूषा विभिन्न राज्यों की भौगोलिक स्थिति, जलवायु और संस्कृति के अनुसार भी अलग-अलग दिखाई देती हैं।
दक्षिण भारत में यदि कांजीवरम साड़ी और वेष्टी तथा कसूती की पारंपरिक कढ़ाई वाले परिधान पहनते हैं जो टोडा व नीलगिरी की जनजातीय शिल्पकला का सुंदर उदाहरण है तो पूर्वी भारत में मेखला-चादर जो हाथ से बुनी जाती है, पुरुष और महिला दोनों प्रयोग करते हैं तथा रंगीन ऊनी शॉल नागा जनजातीय पहचान और वीरता के प्रतीक है। उत्तर भारत में जहां पंजाब में सलवार-कमीज और फुलकारी दुपट्टा राज्य की समृद्धि को दर्शाता है वही हरियाणा, राजस्थान में घाघरा-चोली और साफा, जो लोगों को अपनी संस्कृति की ओर आकर्षित करते हैं। कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल में पश्मीना और अंगोरा ऊन से बने वस्त्र ढंड से सुरक्षा करते हैं तो जनजातीय पोशाक अपनी पोशाकों के माध्यम से प्रकृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता को दर्शाती हैं।
किसी भी क्षेत्र की वेषभूषा उसकी संस्कृति का द्योतक होती है। बदलते युग की आहट और समय की धारा में समायोजन का मार्ग प्रदर्शित करती है। इतना अवश्य है कि हमें अपने समाज, क्षेत्र व संस्कृति के अनुसार ही वेशभूषा अपनानी चाहिये। अब टाई लगाना यदि इंग्लैंड की विवशता है क्योंकि वहां माइनस डिग्री तापमान रहता है तो हम जून के झुलसा देने वाले महीने में यहां क्यों टाई लगाने का प्रयास करते हैं। केरल, तमिलनाडु आदि दक्षिण राज्यों में अधिक गर्मी होने के कारण यदि पुरुष वेष्टि (धोती) बाँधकर कार्यालय में जाते हैं तो हम उनकी नकल कैसे कर सकते हैं। यदि जर्मनी, फ्रांस में युवतियां एक गिट की निकर डालकर घूमती है तो हमारे समाज में यह अनुकूल नहीं बैठता तो ऐसी वेशभूषा से हमारी बहन-बेटियों को बचना चाहिए। अर्धनग्न प्रदर्शन, भड़काऊ पहनावा कभी भी प्रगति का संकेत नहीं हो सकता। अतः हमें मौसम व संस्कृति के अनुकूल ही वेशभूषा का प्रयोग करना चाहिए बाकी परिवर्तन सृष्टि का नियम है, मर्यादाओं में रहकर परिवर्तन को भी स्वीकार करना ही चाहिए।
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कवितायेँ / गजल
एक वर्षा गीत
द्वारा: श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में नर्मदा नदी के भेड़ा घाट पर प्रसिद्ध धुआँधार जल प्रपात है। कवि की दृष्टि में यह कैसा है पढ़िए।
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एक वर्षा गीत
नभ को निहार कहती सुनारि सखि! लगातार बरसे बदरा।
पहले फुहार फिर धारदार फिर धुआँधार बरसे बदरा।।
वय के किशोर चितचोर छोर पर घटाटोप बरसे बदरा।।
हिय को हिलोर जिय को विभोर कर सराबोर बरसे बदरा।।
मुँहजोर घोर घनघोर शोर कर नशाखोर वर से बदरा।
तब पोर-पोर तक में किलोर भर उठी जोर बरसे बदरा।।
किलकार मार शिशु सा पसार कर कलाकार बरसे बदरा।
ललकार मार तलवार धार बन अदाकार बरसे बदरा।।
नभ को निहार कहती --------।।
बम से भड़ाम गिरते धड़ाम करते प्रणाम बरसे बदरा।
लख ताम-झाम हँसते सकाम जब धरा-धाम बरसे बदरा।।
घनश्याम शाम मग में अनाम जिस घड़ी राम! बरसे बदरा।
सच खुले आम जग उठा काम ऐसे ललाम बरसे बदरा।।
फिर छोड़-छोड़ कर को मरोड़ तन को झँझोड़ बरसे बदरा।
अब जोड़-जोड़ दुखता करोड़ रस सा निचोड़ बरसे बदरा।।
पट को सुधार लट को सँवार तब धरा सार बरसे बदरा।
सरकार हारकर तार-तार कर गए छार बरसे बदरा।।
नभ को निहार कहती ------ ।।
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बाल विभाग (किड्स कार्नर )
अपनी कहानियाँ
राजा के खोए खजाने की खोज
द्वारा: प्रेरणा खेमका, सक्रिय सदस्य उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
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प्रेरणा खेमका क्लीवलैंड ओहायो में रहती है| अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्य होने के साथ-साथ सक्रीय सदस्य भी हैं|
पेशेवर रूप से यें “हेयरस्मैड्ट इंक” की सीईओ-संस्थापक हैं| इन्हें बच्चों की कहानी एवं कविता लिखने में अधिक रूचि हैं|
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नीलगांव एक छोटा, शांत और हरियाली से घिरा गांव था। स्कूल, मंदिर, पोखर — सब कुछ सीधा-सादा। पर इस सीधी सादी ज़िंदगी में जो हलचल पैदा करता था, वो था मोंटू।
मोंटू होशियार था लेकिन पढ़ाई से दूर, उसकी असली किताब थी — शरारतों का अनुभव। एक दिन, गर्मियों की दुपहरी में, बिजली चली गई, और दादी पुराने किस्सों की पोटली लेकर बैठ गईं।उनकी आवाज़ में रहस्य था:
"राजा वीरभद्र ने अंग्रेजों से बचाने के लिए अपना खजाना गांव में ही कहीं छुपा दिया था। जो उसे ढूंढेगा, उसे उस खजाने की असली परीक्षा से गुजरना होगा।"
मोंटू ने हँसते हुए कहा:
"दादी, ये सब किस्से पुराने ज़माने के हैं, अब कहाँ कोई खजाना!"
पर दादी ने रहस्यमय मुस्कान दी और कहा,
"असली खजाना उसी को मिलता है जो दिल और दिमाग दोनों से खोजे।"
पहला सुराग — परछाई वाला खेल
कहानी ने मोंटू का चैन छीन लिया। रात-भर सोचता रहा। अगले दिन वो सीधे गाँव के सबसे बूढ़े आदमी — पुराना हरिराम काका के पास गया।
काका ने बताया,
"राजा वीरभद्र की हवेली में एक पुरानी दीवार है, जिसके पीछे कुछ कागज़ छुपे थे। लेकिन दीवार गिर चुकी है, और जो बचा, वो धूल में मिल गया।"
मोंटू ने तय कर लिया — वो हवेली की धूल भी छान मारेगा।
और सच में, तीन दिन की खुदाई के बाद, एक पुराना लोहे का संदूक मिला। अंदर सिर्फ धुंधला कागज़ का टुकड़ा।
उस टुकड़े पर लिखा था:
"जहाँ सूरज की आख़िरी किरण ज़मीन पर पड़ती है, वहीं पहली परीक्षा शुरू होती है।"
अब दादी की कहानी और असली सुराग जुड़ने लगे थे।
सूरज की पहेली — बड़ का पेड़ नहीं, पुरानी मंदिर की सीढ़ी
मोंटू ने पहले सोचा बड़ का पेड़। लेकिन पिंकी ने एक बात गौर की —
"बड़ का पेड़ तो सबसे ऊँचा है, उस पर सूरज की किरणें जल्दी गायब होती हैं। असली जगह तो वो होगी जहाँ सबसे देर तक रोशनी टिकती हो!"
बबलू बोला —
"और वो है मंदिर की पुरानी सीढ़ियाँ। सूरज डूबने से पहले वहाँ की आखिरी ईंट तक चमक रहती है।"
तीनों शाम के समय मंदिर पहुँचे। सच में, सूरज की आखिरी किरण वहाँ की एक खास ईंट पर चमकी। उस ईंट के नीचे दबा था एक छोटा सा
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बाल विभाग (किड्स कार्नर )
अपनी कवितायेँ
रात की धूप
द्वारा: सौरभ सोनी
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सौरभ सोनी - प्रवासी भारतीय, उदयपुर (राजस्थान) जन्म। हिंदी के प्रति गहरी रूचि और कुछ लिखते रहने की इच्छा हिंदी से जोड़े रखती है। प्रयोग थिएटर ग्रुप न्यू जर्सी और नार्थ कैरोलिना साहित्य मंच पर सक्रिय भागीदारी।
सम्प्रति - स्विस बैंक में आईटी प्रोफ्रेशनल। USA के नॉर्थ कैरोलिना में निवास।
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रात की धूप
रात की धूप
सुबह की
कच्ची,
चुलबुली,
अधखिली सी धूप।
दोपहर की
कड़कती,
करकशी,
जवान सी धूप।
सांझ की
सुरमयी,
सुनहरी,
सजीली सी धूप।
रात की
अंधेरी,
सांवली,
डरावनी सी धूप?
नहीं!
वो धूप नहीं,
धूप के न होने का एहसास है।
एहसास उस खालीपन का,
जो धूप की चमक
ना होने से है।
या फिर...
धूप का साया?
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति एवं सभी हिंदी प्रेमियों की ओर से
भावभीनी एवं विनम्र श्रद्धांजलि
हास्य-व्यंग्य के शिखर कवि डॉ. सुरेन्द्र दुबे
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कवि डॉ. सुरेन्द्र दुबे
(8 जनवरी 1953 – 26 जून 2025)
जंगल साहित्य और समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति…
26 जून 2025 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रसिद्ध कवि, पद्मश्री सम्मानित डॉ. सुरेन्द्र दुबे जी का हृदयाघात के कारण निधन हो गया। वे 71 वर्ष के थे।डॉ. दुबे पेशे से आयुर्वेदाचार्य थे, लेकिन हिंदी काव्य-जगत में वे हास्य–व्यंग्य के शिखर पुरुष के रूप में पहचाने जाते थे। उनके लेखन की धार और मंच की भाषा में सहज हास्य का ऐसा सम्मिलन था, जो जनता के दिलों तक पहुँचता था।
उन्होंने अमेरिका, कनाडा, खाड़ी देशों और यूरोप तक हिंदी को मंचीय गरिमा दी। उनकी शैली में हास्य, व्यंग्य और सामाजिक चेतना का अद्भुत संतुलन था।
प्रमुख कृतियाँ:
मिथक मंथन
दो पाँव का आदमी
सवाल ही सवाल है
हँसी के इंजीनियर
बाबू टाइगर अभी ज़िंदा है
सम्मान:
पद्मश्री (भारत सरकार – 2010)
काका हाथरसी हास्य रत्न
हास्य शिरोमणि (वाशिंगटन डीसी)
छत्तीसगढ़ रत्न (उत्तर अमेरिका छत्तीसगढ़ संघ)
डॉ. दुबे की लेखनी से:
१. “बाबू टाइगर अभी ज़िंदा है”
“टेंशन में मत रहना, बाबू टाइगर अभी ज़िंदा है,
हर हरकत का जवाब होगा, ये इंकलाबी बंदा है!”
२. “हँसी के इंजीनियर”
“हँसी के इंजीनियर हैं, आँसुओं के आर्किटेक्ट,
दर्द में भी मुस्कराएँ, यही है हमारा प्रोजेक्ट!”
इनकी रचनाओं में सिर्फ हँसी नहीं, बल्कि समाज के गहरे प्रश्न, नेताओं की चालाकियाँ, आम आदमी की पीड़ा, और भारतीय संस्कृति की आत्मा झलकती थी।
डॉ. दुबे जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे कभी किसी को नीचा नहीं दिखाते थे — वे हँसाते थे, पर मर्यादा में रहकर सच भी कह जाते थे।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से हम डॉ. सुरेन्द्र दुबे जी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं। हिंदी भाषा, मंचीय काव्य और सामाजिक व्यंग्य के क्षेत्र में उनका योगदान अमूल्य है।
हम उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं और उनकी साहित्यिक विरासत को नमन करते हैं।
उनकी स्मृति हिंदी के हर मंच और हृदय में सदा जीवित रहेगी।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति एवं सभी हिंदी प्रेमियों की ओर से
भावभीनी एवं विनम्र श्रद्धांजलि
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ईश्वर चन्द्र हैर्रिस
(जुलाई 13, 1913 - जून 27, 2025)
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के उत्तर पूर्व ओहायो शाखा के सक्रिय सदस्य और सहयोगी।
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"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
1. रचनाओं में एक पक्षीय, कट्टरतावादी, अवैज्ञानिक, सांप्रदायिक, रंग- नस्लभेदी, अतार्किक
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
हिंदी लेखन के लिए स्वयंसेवकों की आवश्यकता
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प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र
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प्रबंद्ध संपादक – श्री आलोक मिश्र, NH, alok.iha@gmail.com
संपादक -- डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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