JULY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
जुलाई 2023, अंक २५ | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रजनों,
आप सभी को यह बताते हुए बहुत ही दुख का अनुभव हो रहा है कि सुशीला मोहनका जी के स्वर्गवास की सूचना से अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति में सभी स्तब्ध और शोकग्रस्त हो गये हैं। उन्होंने अमेरिका में हिंदी के लिए एक विशेष योगदान दिया, जिसे इतिहास कभी भी भूल नहीं सकता है। हिंदी जगत के साथ ही साथ वो एक उच्च कोटि की समाज सेविका भी थी।
अ.हि.स. का महा कविसम्मेलन कार्यक्रम २०२३ जुलाई १४ से अगस्त २७ तक हो रहा है। दो कवि और एक कवियित्री अमेरिका पहुँच गए हैं, सुदीप भोलाजी जबलपुर से हैं, गौरव शर्मा जी मुंबई से हैं एवं डॉ. सरिता जी, गाजियाबाद से हैं। यह कार्यक्रम अच्छी तरह प्रारंभ हो चुका है। यह ६ सप्ताह का कार्यक्रम है जिसमें आप सभी कवियों का आनंद ले सकेंगे। इसके साथ ही इंडिआनापोलिस में डॉ. वी, पी. सिंह भी कवि सम्मेलनों में सम्मिलित होंगे।
अ.हि.स. का द्विवार्षिक २१ वाँ अधिवेशन जुलाई २८/२९, इंडिआनापोलिस, कारमेल में होना निश्चित हुआ है। मैं आप सभी को समिति की ओर से आमंत्रित करती हूँ। आप सभी आकर और अपना समय देकर कार्यक्रम को सफल बनाएँ ,अधिवेशन की विस्तृत जानकारी आप राकेश कुमार जी से ईमेल द्वारा ihaindiana@gmail.com, वेबसाइट https://ihaindiana.org/ या टेलीफोन नम्बर (317) 730-4086 से प्राप्त कर सकते हैं।
आप सभी से मेरा सविनय निवेदन है, कि आप वेबसाइट में जाकर रजिस्टर करें और आर्थिक रूप से सहायता करें। आपके द्वारा की गई आर्थिक सहायता हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायक होगी। अधिवेशन को सफल बनाने में पूर्ण योगदान देगी।
अंत में मैं समिति, न्यासी समिति तथा सम्पादक समिति का और स्वयं सेवकों सहित सभी को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और विश्वा को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं, आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitagsinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे संपर्क कर सकते हैं’।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर-राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
(817)-319-2678
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति --अभी चल रहा कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति
“हास्य के रंग - गीत-गजल के संग”
अमेरिका के महानगरों में, 14 जुलाई - 27 अगस्त 2023
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कवियों का संछिप्त विवरण (Poets profile)
Dr. Sarita Sharma of Delhi, a former advisor to the Ministry of Culture and Chairperson of Bharatendu Natya Academy in U.P. government, is a veteran Hindi poetess of shringaar ras genre. She was born in Bhilai, Chhattisgarh and has a Ph.D. in Hindi literature. She is known for her deep meaningful and soulful poetry and its melodious spellbinding renditions. This extraordinary Hindi Poetess has been felicitated by the President of India, Shri Ramnath Kovind at a Rashtrapati Bhavan congregation. She has been embellished with the highest civilian award of Yash Bharti by the Uttar Pradesh Government, and with ‘Mahadevi Verma’ and ‘Nirala’ Samman. She has participated in many prominent literary events and national and international Kavi Sammelans and Mushairas, including in U.S, U.K, Canada, and Gulf countries in last three decades. She has also recited her compositions on various TV channels and at the prestigious Red Fort on several occasions. Spreading the message of love thru her brilliant poetry, Dr. Sarita Sharma has penned five books, titled ‘Peer Ke Saaton Samander’, ‘Nadi Gungunaati Rahi’, ‘Huaey Aakash Tum’, ‘Teri Meera Zaroor Ho Jaoon’, and ‘Chand, Muhabbat, aur Main’ in the form of Geet, Ghazal, and Muktak Collections. The influence of Brij and Awadhi is also seen in her creations. Her poem on 'female feticide' is included in textbooks.
Gaurav Sharma of Mumbai hails from Rajasthan. He is the son of renowned Hasya kavi Shyam Jwalamukhi, and one of the most popular young humorists in India with over 2600 performances to his credit. He is an exceptional performer and a maestro of humor who has entertained millions of people in India and abroad. Gaurav is known for his unique style of expressional comic rendered in his signature two liners. He sometimes uses the Marwari language for his humor. His poetry has a mixture of engaging humor and penetrating satire. When he takes the podium, the auditorium is filled with continuous laughter. Gaurav is not only a comic poet but also a youth icon. He has been associated with Johny Lever Live Shows since 2014. He is a winner of Laughter Challenge on Star TV, Comedy Ka King Kaun on SUB TV, and Hasya Kavi Muqabla on Zee TV. As a poet of distinction, Gaurav has been felicitated with numerous awards, including Saraswati Puraskar and Rajasthan Gaurav Puraskar. He has performed in over 38 countries, including multiple times in United Kingdom, Canada, and United States.
Sudeep ‘Bhola’ Soni, son of poet Sandeep Sapan, is a native of Jabalpur. He is a young talented poet who has established himself as a popular humorist. He is famous for his earthy wit and political satire and is celebrated for his entertaining melodies and parodies on social and political dissonance, including poems on Indian soldiers and martyrs, helpless farmers, and child labor. His creative writings and compositions have touched the hearts of poetry lovers across the globe via electronic and social media. With 200 episodes, and counting, he is a lead cast of ‘Lapete mey Neta Ji’ show on national TV. Sudeep Bhola is a commerce graduate from Durgawati University, and a skilled jewelry craftsman with a family jewelry business in its third generation. He has been felicitated with numerous awards and honors by many prestigious organizations and institutions. Sudeep Bhola has been invited to recite his poems from India's prestigious national Kavi Sammelan at Red Fort and Delhi Hindi Academy. He has enthralled audiences with his compositions in U.K, Ireland, Ethiopia, Kenya, Sri Lanka, Nepal, Oman, Qatar, and Hong Kong. This is his 3rd visit to the United States.
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१ वां द्विवार्षिक अधिवेशन
जुलाई 28-29, 2023 इंडिआना, अमेरिका में बहुत अच्छी तरह संपन्न हुआ।
विस्तृत समाचार अगले अंक में
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डॉ. राकेश कुमार
Dr. Rakesh Kumar
संयोजक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का 21वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन
Convener, International Hindi Association’s 21st Biennial Convention
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा, यूएसए
President, International Hindi Association-Indiana Chapter,
Email/ईमेल: ihaindiana@gmail.com
Phone/WhatsApp: +317-249-0419
Web: http://ihaindiana.org; http://www.hindi.org
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं में होने वाले कार्यक्रमों की रिपोर्ट
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - नार्थईस्ट ऑहियो शाखा
कवि सम्मलेन, अगस्त २५ , २०२३
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अपनी कलम से
"यात्रा वृत्तांत - रूद्रनाथ (एक अद्भुत, साहसिक यात्रा)"
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द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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यात्रा वृत्तांत - रूद्रनाथ (एक अद्भुत, साहसिक यात्रा)
आओ चलो मैं आज आपको हिमालय शिखर की लगभग 60 किलोमीटर की पदयात्रा पर ले चलता हूँ जो कि पाँच या छः दिनों में पूरी होती है। ट्रैकिंग का शौक रखने वालों के लिए यह बहुत ही अद्भुत, आकर्षक एवं साहसिक यात्रा है जो बाद में बहुत ही आन्नद के साथ समाप्त होती है।
आपको इस ट्रैकिंग में प्रकृति की सुंदरता, साहस, आकर्षण एवं दुर्गम जंगल के भय और आन्नद देने वाले मिले-जुले अनुभव देखने को मिलेंगे। आप बस अथवा निजी गाड़ी से रात्रि में हरिद्वार या ऋषिकेश आकर किसी होटल या धर्मशाला में विश्राम करो। सुबह शीघ्र ही इस साहसिक यात्रा के रूप में रूद्रनाथ की ट्रैकिंग के लिए निकलने की योजना बनानी चाहिए। ट्रैकिंग के लिए आवश्यक तैयारी कर चमोली के लिए अपने निजी वाहन से कूच करना बेहतर है क्योंकि आप कहीं भी रुककर प्राकृतिक दृश्यों का आन्नद उठा सकते हैं। पहाड़ी सड़कों से गंगा मैया एवं पर्वत श्रृंखलाओं के दर्शन करना बहुत ही रोमांचक अनुभव है। लगभग सांय छः बजे तक चमोली पहुँचा जा सकता है। चमोली से आवश्यक वस्तुएं खरीद लेनी चाहिए क्योंकि इसके बाद वस्तुएं जुटाने का अवसर मिलना बहुत मुश्किल है। चमोली से पीपल कोटि का रास्ता दो घंटे का है अर्थात् रात्रि आठ बजे तक पीपल कोटि पहुँचकर वहीं होटल में विश्राम करना चाहिए। सुबह स्नान-नाश्ते आदि से निपटकर आवश्यक सामान जैसे बरसाती, टॉर्च, दवाईयाँ, हल्के सूती कपडे़, स्वेटर आदि ट्रैकिंग बैग में लगाकर यहां अपना निजी वाहन छोड़कर हेलंग जाने हेतु बस लेनी चाहिए क्योंकि पीपल कोटि से आगे निजी वाहन में जाने का परिणाम घातक हो सकता है। हेलंग के लिए जोशीमठ वाली बस मिलती है जो कि जोशीमठ से दस किलोमीटर पहले पड़ता है। हेलंग में रमणीय पर्वतों की सुन्दरता देखते ही बनती है। यहाँ आपको अनुभव होगा कि आप मैदानी क्षेत्र से सपनों की दुनिया में बढ़ रहे हों। हेलंग से ल्यारी थैना के लिए टैक्सी बुक करानी पड़ती है क्योंकि आगे पहाड़ों की तंग पगडंडियों पर बस आदि बड़ी मोटर गाड़ी नहीं चल पाती। ल्यारी थैना तक टैक्सी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर बच्चों के खेल की तरह दौड़ती हुई आपका मन मोह लेगी। जहाँ एक ओर ऊँचे पहाडों के शिखर होंगे तो दूसरी ओर हजारों फुट गहरी खाई। ल्यारी थैना में मोटर गाड़ी का मार्ग समाप्त हो जाता है और आगे पैदल ही असंख्य पर्वत पार कर 15000 फुट ऊँचे शिखरों को कदमों से मापना होता है अर्थात् यहाँ से आपकी ट्रैकिंग प्रारंभ होती है।
ल्यारीथैना से बडगिण्डा गाँव की दो किलोमीटर की ट्रैकिंग साँप की तरह लहराती पगडंडियों पर चढ़ते हुए शुरु होती है। यहाँ बडगिण्डा में उत्तराखंड के पाँच बद्री में से एक "ध्यान बद्री नारायण" के पावन दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। डेढ़ किलोमीटर दूर कल्प गंगा को पार कर विशाल झरने के मनमोहक दृश्य को देखते हुए अत्यंत प्राचीन पवित्र कल्पेश्वर महादेव का स्थान आता है। यहाँ भगवान शंकर की जटाओं के दर्शन होते हैं जो कि महाभारत की कथा से जुड़ा बताया जाता है। यहाँ से अगला पडाव गाँव बाँसा की ओर है। दो किलोमीटर की सीधी चढ़ाई गाँव बाँसा तक लेकर जाती है। यहाँ आप निवेदन कर ऊर्वाश्रम में रुक सकते हैं। आश्रम के नाम पर एक मंदिर का शेड है जिसमें शिवलिंग स्थापित है और एक महात्मा जी की कुटिया जहाँ साथ निर्मल गंगाजल का बहता गदरा (पहाड़ी नाला) सुशोभित हो रहा है। यहाँ आपको दो-तीन यात्रियों को ठहरने के लिए छत तो मिल सकती है किंतु कपड़े व खाने की सामग्री आपकी अपनी होनी चाहिए। यदि संख्या तीन से ज्यादा है तो अपना टैंट लगाना पड़ेगा। ल्यारी थैना से यहाँ तक आठ किलोमीटर की ट्रैकिंग आपको सुविधाओं के अभाव में भी नींद के आगोश में ले जाएगी। यहाँ आपको चारों ओर अखरोट के जंगल मिलेंगे। सुबह जल्दी उठकर अखरोट के वृक्ष की दातुन आपको तरोताजा कर देगी। यहाँ से अगला पड़ाव है दुमुक गाँव। दो पहाड़ पार करके लगभग तेरह किलोमीटर में सात किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़नी होगी। ध्यान रखने की बात यह है कि पीट्ठू बैग अधिक भारी नहीं होना चाहिए तथा हाथ में स्टिक व पानी की बोतल साथ में अवश्य रखें। यहाँ पहाड़ों में यदा-कदा बारिश होती रहती है अतः आपको बारिश में ही अखरोट के जंगल की तीन किलोमीटर की चढ़ाई पूरी करनी होगी। यहाँ बीच-बीच में शीतल जलधारा मिलती रहेंगी जहां आप पहाड़ों का औषधियुक्त जल पीकर अपनी थकान उतार सकते हो। यहाँ से कलगोट के लिए दो किलोमीटर की कठिन चढ़ाई के बाद तीन किलोमीटर की सीधी उतराई है जो कि बारिश की फिसलन में थोड़ा मुश्किल हो जाती है। कलगोट गाँव में आपको ठहरने के लिए स्थान मिल जायेगा। यहाँ ग्रामवासी अपने घरों में ही यात्रियों के लिए एक-दो कमरा तैयार रखते हैं जो कि भोजन सहित बहुत ही उचित मूल्य पर उपलब्ध हो जाते हैं। यहाँ आपको पहाड़ी खाना ही मिलेगा जिसका अपना अलग ही महत्व है। कलगोट में ही नंदा देवी के प्राचीन मंदिर में दर्शन करने का सौभाग्य मिल जाता है जो कि यहाँ कि संस्कृति, सभ्यता व अध्यात्म के दर्शन कराता है। यहाँ रुकने के बाद आपको पाँच किलोमीटर दूर दुर्मुख गाँव के लिए कमर कसनी होगी। इस जंगली रास्ते में आपका सामना बिच्छू बूटी और पहाड़ी जोक से होगा। यह बूटी जहाँ छू जाये तो पीड़ित बुरी तरह बस खजाता ही रह जाता है और जहाँ-जहाँ हाथ लगाता है खुजली की समस्या बस फैलती ही जाती है। किन्तु अच्छी बात यह है कि जहाँ बिच्छू बूटी होती है वहीं पहाड़ी पालक भी होता है। पालक का पत्ता रगड़ने से खुजली दस सैकिंड में समाप्त हो जाती है। चलते हुए सावधानी ही बिच्छु बूटी से बचाती है। साढ़े तीन घंटे की निरंतर ट्रैकिंग आपको पहाड़ों की तलहटी में बसे दुर्मुख गाँव तक ले जाती है। यहाँ भी गाँव में रहने के लिए एक-दो लॉज बने हुए हैं। इन्हीं गाँव में गाइड के रूप में लड़के भी मिल जाते हैं।
रात्रिभोज और ठंड से बचने के लिए रजाई में घुसकर दिन-भर की खट्टी-मिठ्ठी यादों व अगले पड़ाव की योजना के साथ आप कब निद्रा में चले जाओगे, आपको थकान के कारण पता भी न चलेगा।
यहाँ से अगला पड़ाव और भी अधिक रोमांचक होगा क्योंकि पहाड़ों में बुग्याल की सुंदरता का अपना ही महत्व है। आपको बारह किलोमीटर दूर 'पनार बुग्याल' की ट्रैकिंग के लिए तैयार रहना होगा।
बुग्याल कई पर्वत शिखरों के मध्य एक विस्तृत भाग में सुन्दर घास, फूल एवं प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे फैला पड़ा होता है। इस बुग्याल को देखने के लिए अधिकतर यात्री गोपेश्वर से आने वाले मंडल और सगर के रास्ते आते हैं क्योंकि इन दोनों रास्ते से यह लगभग सोलह-सत्रह किलोमीटर पड़ता है। जबकि हेलंग के रास्ते से लगभग पैंतीस किलोमीटर पड़ता है। आगे दो किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब नीचे उतरोगे तो गंगा मैया में मिलने वाले गदरे के किनारे-किनारे चलते हुए चार किलोमीटर की थकावट कब छूमंतर हो जायेगी पता भी न चलेगा। फिर लगातार तीन किलोमीटर तक भयंकर जंगल के बीच खड़ी चढ़ाई मिलेगी।
जंगल की चढ़ाई के बाद एक छोटा सा बुग्याल आयेगा जहाँ आप कुछ विश्राम कर सकते हो।फिर यहाँ से नैना घाट को होते हुए 'तोली बुग्याल' पहुँच जाओगे। जो कि 'तोली ताल' के नाम से भी जाना जाता है। तोली बुग्याल तक आठ किलोमीटर की दुर्गम ट्रैकिंग की थकान बुग्याल के अपार सौंदर्य को निहारते ही गायब हो जाती है। इस बुग्याल पर इतना सुख मिलता है कि आगे जाने को मन ही नहीं करता। जंगलों के बीच बारिश के कारण पगडंडियों पर भूल-भुलैया हो जाता है और यहाँ नेटवर्क भी न के बराबर ही चलता है अतः घर से ही गूगलमैप रूट डाउनलोड करके लाना चाहिए। दो किलोमीटर की सीधी चढ़ाई के –बाद पनार बुग्याल की आभा आपके समक्ष हेगी। यहां आप पिछला सब भूल जाओगे, आप पनार बुग्याल की सुंदरता देखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगोगे। यहाँ यात्री मारे खुशी के किलकारियाँ मारने लगते हैं , जोर-जोर से चिल्लाने लगते हैं और उनकी आवाज पर्वत-घाटियों से टकराकर वापिस उन्हीं को सुनाई देती है जो रोमांच को ओर बढ़ा देती है। शायद इस खुशी में कहीं न कहीं मंजिल तक सफलता पूर्वक पहुँचने का संतोष भी छुपा होता है। पर्वतों के शिखर पर होने के कारण यहाँ ठंड से कंपकपी होने लगती है। यहाँ कुछ बक्करवाल झोपड़ीनुमा दुकानों में गर्म-गर्म कॉफी व मैगी का प्रबंध रखते हैं जो ठंड दूर करने के लिए बहुत बढ़िया रहता है। यहाँ ठहरने के लिए भी यही बक्करवाल अपनी दुकानों के साथ ही बड़ी झोपड़ी में औसत मूल्य में रजी-गद्दों की व्यवस्था करते हैं। यहां यात्रि बुग्याल की शोभा को अपने मन-मस्तिष्क में कैद कर भोजन आदि लेकर निद्रा में चले जाते हैं।
अगला पड़ाव पाँच किलोमीटर दूर पंचगंगा में होता है। पनार से पंचगंगा तक पाँच किलोमीटर का रास्ता बिना अधिक चढ़ाई-उतराई के सुखद सा है। चारों ओर सुन्दर नजारे देखने को मिलते हैं। यहाँ आपको लगता है कि आप पर्वत की रीढ़ पर चल रहे हैं। आपके दोनों ओर हजारों फीट गहरी खाई दिखाई देगी। पंचगंगा अर्थात् अलग-अलग पर्वतीय शिखरों से जल की पाँच धाराएं एक साथ होकर बहती है। यहाँ से मात्र तीन किलोमीटर दूर स्थित रूद्रनाथ जी का ध्यान करते ही यात्री रोमांच से भर जाते हैं। पनार से पंचगंगा होते हुए रूद्रनाथ तक जाने वाले रास्ते पहले की अपेक्षा अधिक सुगम, सुखद और रोमांच से भरे हुए मिलते हैं। आप लगभग डेढ़ घंटे में साढ़े तीन किलोमीटर की ट्रैकिंग के बाद रूद्रनाथ महादेव के पवित्र सिद्ध स्थान पहुँच जाते हो। यहाँ से 'चौ-खंभा' की बर्फ से ढकी दूध सी पिल्लरनुमा चारों चट्टानें यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर के अन्दर जाते ही इतना मन लगता है कि वापिस आने का मन ही नहीं करता।
रूद्रनाथ से वापसी के लिए यदि रूट बदलकर गोपेश्वर महादेव की ओर से उतराई की जाए तो आपको ओर बहुत सारी प्राकृतिक सुंदरता देखने का अवसर मिल जाता है। गोपेश्वर की ओर रास्ता छोटा भी है और सुखद भी। सबसे पहले डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई व तीन किलोमीटर की उतराई के बाद हंस बुग्याल आता है। इसके बाद लगभग छः किलोमीटर की लगातार उतराई के बाद कांठी बुग्याल आता है। जहां यात्री रूद्रनाथ से लगभग नौ घंटे की ट्रैकिंग कर शाम तक पहुंच पाते हैं। यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है कि शाम छः बजे से पहले-पहले जंगल से बाहर निकलना बहुत जरूरी है क्योंकि शाम को जंगली सुअरों व बघेरों का खतरा बढ़ जाता है। तीन किलोमीटर लगातार उतराई के बाद एक गदरा आता है। गदरा पार करने के बाद आपके सामने जो दृश्य होगा वह अभूतपूर्व सौंदर्य देखकर आपको लगेगा कि जैसे इन्द्रलोक में विचरण कर रहे हो। एक ओर विशालकाय ऊँचे पर्वत है तो दूसरी ओर पर्वतों के बीच लगभग 200 फुट ऊँचे से जल प्रपात झरना गिर रहा है जो लगभग 25-30 फुट चौड़ा होगा। इस झरने के साथ वो गुफा है जहाँ महर्षि अत्रि तपस्या किया करते थे। परन्तु वहां तक जाना बहुत दुष्कर कार्य है। पहले तो एक चट्टान पर लोहे की संकल (चेन) जो पहले से ही यहां बंधी हुई है, पकड़कर चट्टान पर चढ़ना होगा, फिर दो चट्टानों के मध्य बहुत ही संकरे मार्ग से साँप की तरह रेंगकर गुफा तक जाना होगा। थोड़ी सी असावधानी नीचे 150 फुट गहरी खाई में मौत के मुँह में पँहुचा सकती है और ढलान भी खाई की ओर ही है। अधिकतर यात्री नीचे से ही झरने का आन्नद लेते हैं। यहाँ से दो किलोमीटर दूर माता अनुसूया का मंदिर है, यह मंदिर एक व्यवस्थित गांव के बीच में है। यहाँ यात्री पुत्र होने की मनोकामना के लिए आते हैं और पूर्ण होने पर माथा टेकने परिवार सहित पहुँचते हैं।
यहाँ से ट्रैकिंग का अगला और अंतिम लक्ष्य चमोली जिले का गाँव मंडल है। गंगा के गदरे के साथ-साथ बना रास्ता अत्यंत ही मोहक है। साठ किलोमीटर की ट्रैकिंग यहाँ मंडल में पूरी होती है। यहाँ से गोपेश्वर के लिए टैक्सी मिल जाती है। बहुत ही प्राचीन मंदिर गोपेश्वर महादेव के दर्शन करने के बाद चमोली के लिए टैक्सी मिल जाती है। जहाँ से आप बस के द्वारा पीपल कोटी पहुँच जाते हैं जहाँ आपका निजी वाहन आपकी प्रतीक्षा कर रहा होता है।
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द्वारा -श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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देख सजनी देख ऊपर
देख सजनी देख ऊपर।।
इंजनों सी दड़दड़ाती, बम सरीखी गड़गड़ाती।
रेल जैसी धड़धड़ाती, फुलझड़ी सी तड़तड़ाती।।
पल्लवों को खड़खड़ाती,
पंछियों को फड़फड़ाती।
पड़पड़ाती पापड़ों सी
बोलती है कड़कड़ाती ।।
भागती तो भड़भड़ाती, बावरी सी बड़बड़ाती,
हड़बड़ाती, जड़बड़ाती, सरसराती थरथराती
आ रही है मेघमाला।
देख सजनी देख ऊपर।। और ऊपर और ऊपर।।
आ रही है मेघमाला।।
वह पुरन्दर की परी सी घेर अम्बर और अन्दर,
और अन्दर कर चुकी है श्यामसुन्दर से स्वयंवर।।
रिक्ष बन्दर सी कलन्दर खा चुकन्दर बन मुछन्दर।
हो धुरन्धर सींच अंजर और पंजर बाग बंजर।।
कर समुन्दर को दिगम्बर फिर बवण्डरसा उठाती,
बन्द बिरहिन का कलेजा खोल खंजर सा चलाती,
आ रही है मेघमाला।
देख सजनी देख ऊपर।।और ऊपर और ऊपर।।
आ रही है मेघमाला।।
भामिनीसी कामिनी सहगामिनी मृदुयामिनी सी।
वामिनी गजगामिनी ले दामिनी मनस्वामिनी सी।।
रागिनी घनवादिनी पंचाननी सौभागिनी सी।
जामुनी हंसासनी सी सावनी मधु चासनी सी ।।
जीवनी में घोलती संजीवनी सा रस बहाती,
तरजनी सी मटकनी कुछ कटखनी बातें बनाती,
आ रही है मेघमाला।
देख सजनी देख ऊपर।।और ऊपर और ऊपर।।
आ रही है मेघमाला।।
देख सजनी देख ऊपर।।
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द्वारा - श्रीमती सुमति श्रीवास्तव
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श्रीमती सुमति श्रीवास्तव जौनपुर, उत्तरप्रदेश से हैं। पेशे से अध्यापिका हैं। भारत की अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका एवं समाचार पत्रों में इनकी रचना प्रकाशित हुई है। ये बहुत से राष्ट्रीय सम्मान सेसम्मानित हुई हैं।
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आग जलाये (बिहारी छंद)
है आग लगी प्रेम में,संताप जलाये।
विश्वास जले रोष में, आलाप लगाये।।
काँटे उगते राह में, मुश्किल बढ़ाते।
है जान जिसे सौंप दी, फाँसी चढ़वाते।।
है फूल कहीं शूल से, दिल को दहलाते।
आहें कहती बात को, नैना शरमाते।।
भूले हर जज्बात को, ही मौन सुनाए।
जो टीस मिली मीत से, कैसे बतलाए।।
आराम मिले नैन को आकाश जब रोते।
आंसू गिरते आंख से, पानी बन खोते।।
पाषाण गले द्वेष से, प्रालेय बने हैं।।
ज्वाला भर इंसान का अस्तित्व जले हैं।।
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अपनी कहानियाँ
“नाम बड़े और दर्शन छोटे”
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द्वारा - श्रीमति सुषमा मुनीन्द्र
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श्रीमति सुषमा मुनीन्द्र ने दो उपन्यास तेरह कहानी संग्रह एवं तीन कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन हैं। इन्हें ‘मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी’ के अखिल भारतीय और प्रादेशिक पुरस्कार सहित लगभग 15 पुरस्कार प्राप्त है।
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नाम बड़े और दर्शन छोटे
सभापुर नगर भी आखिर बाजारवाद की लपेट में आ ही गया। बाजारवाद से जिसका जो नफा-नुकसान हुआ वह तो हुआ ही, सबसे अधिक क्षति हुई मुख्य पथ पर स्थित होटेल सर्वश्रेष्ठ और उसके ठीक बगल से लगे जय भवानी पान भंडार की। बहुत पहले जो समय था तब सभापुर ने समाजवाद नामक शब्द खूब सुना था। अब बाजारवाद जैसा भ्रम उपजाता शब्द चारों ओर दस्तक दे रहा है। एक वह समय था जब बाजारवाद ने दस्तक नहीं दी थी। सभापुर में दो-चार होटेल थे उनमें सर्वश्रेष्ठ को अच्छी ख्याति प्राप्त थी। इसकी बुकिंग सदा फुल रहती थी जिसका पूरा लाभ जय भवानी का मालिक सूबेदार लूटता था। सर्वश्रेष्ठ में ठहरे लोगों के लिये भर-भर तश्तरी पान जाते थे। सूबेदार ऐसा खूबसूरत बीड़ा बनाता था कि खाकर लोगों के चेहरे में सराहना साफ देखी जा सकती थी। सूबेदार महदेवा (गाँव) में रहता था। उसकी विधवा अम्मा अपने काम चलाऊ बरेज से पान की पत्तियॉं तोड़कर घर-घर, खासकर ब्राम्हण और ठाकुरों के यहाँ पहुंचाती थी। कुछ पैसा और इतना अन्न कबाड़ लेती थी जब उसकी और इकलौती संतान सूबेदार की गुजर हो जाये। शादी-ब्याह के मौसम में पान की मॉंग बढ़ जाती। अम्मा खुला पान (पान की पत्ती) पहुँचाती और सूबेदार अपने कुशल हाथों से बीड़ा बना कर शादी वाले घर को अपनी सेवा देता। उसके बनाये बीड़े की खूब सराहना होती। बड़ा हुआ तो ग्यारह किलोमीटर साइकिल चलाकर सभापुर खुला पान बेंचने आने लगा। वह जिस मार्ग से होकर बाजार पहुँचता उस मार्ग में सर्वश्रेष्ठ, एक विद्यालय और सर्किट हाउस पड़ता था। बाकी दूर-दूर तक सड़क और मैदान थे। बाजार में पान के खोखे देख कर सोचता-छोटी सी दुकान खोलकर पान बेंचे तो अच्छी आय हो सकती है। प्रारब्ध में सभापुर का दाना-ठिकाना लिखा था। अपनी मौज में एक दिन सर्वश्रेष्ठ में आया और मालिक को गज भर लम्बा प्रणाम कर अपनी सूझ-बूझ बताई -
‘‘आप कहें तो होटल के बगल में पान की दुकान लगा लूँ। होटल वाले को पान, तम्बाकू, चूना की खातिर दूर न जाना पड़ेगा।’’
वह जमीन होटेल मालिक की नहीं थी। बोला - ‘‘मुझसे क्यों पूँछते हो? जहाँ तुम्हारी मर्जी हो गुमटी लगा लो।’’
अपने धुर देहाती सीधेपन के कारण सूबेदार ने होटल मालिक की अनुमति को कृपा समझा ‘‘ठीक है हजूर। आपको हमसे कउनो परेसानी न होगी। जब आर्डर करेंगे हम होटल में पान पहुँचा देंगे।’’
‘‘ठीक है, ठीक है।’’
मालिक उपकार नहीं कर रहा था लेकिन सूबेदार उपकृत हो गया।
उस इलाके में एक मात्र पान की गुमटी होने के कारण जय भवानी पान भंडार बहुत उपयोगी साबित हुआ। होटल, स्कूल, सर्किट हाउस आने-जाने वाले तो पान खाते ही उस राह से गुजरने वाले कई लोग स्थायी ग्राहक बन गये। आय के आँकड़े अच्छे हों तो भाग्य बन जाता है। रूखी-सूखी सूरत वाले सूबेदार का विवाह दस बरिस छोटी, खूबसूरत तिली से हो गया। गौने पर आई मध्यम कद, भराव लेती देह, अच्छे स्वास्थ्य की कांति वाले ताजे-साँवले चेहरे वाली तिली को देखते ही सूबेदार घायल हो गया। तिली के चेहरे में ताजा बयार सी हॅंसी इतनी जचती कि महदेवा के फौज भर लड़के उसके देवर बनने को आतुर रहते जबकि तिली को सूबेदार फूटी ऑंख न भाया। वह उसे जब भी देखती धिक्कार से देखती। धिक्कार पर ध्यान न दे सूबेदार उसे लोलार (दुलार) से देखता। उसके लिये खुशबूदार बीड़ा बनाता - ‘‘तिली खाय लो। खाना खाने के बाद पान खाने से खून बढ़ता हय है।’’
‘‘हम पान नहीं खाते।’’ कह कर तिली दरअसल पान को नहीं सूबेदार को निरस्त करती थी। लेकिन हमारे देश में दाम्पत्य की काफी अहमियत है। कुछ दगाबाजों को छोड़ दें तो निरस्त करते-करते दम्पत्ति निबाह कर लेते हैं और बाल-बच्चेदार हो जाते हैं। निरस्त करते-करते तिली ने एक दिन खुशबूदार बीड़े को एप्रूव्ड कर दिया। एप्रूव्ड करने के पहले उसने खुद को खूब बार-बार प्रबोधा-पति अब न बदलेगा पर समझदारी से काम ले तो जिंदगी बदल सकती है। महदेवा से निकल कर सभापुर की रंगीनियाँ देखनी हैं तो सूबेदार के खुशबूदार बीड़े को हजम करना पड़ेगा। तिली ने सूबेदार को उसी लोलर से देखा जिस तरह सूबेदार उसे देखता था - ‘‘एतना अच्छा बीड़ा बनाते हो पै ओतनी बरक्कत नहीं हो रही है जेतनी मेहिनत करते हो।’’
‘‘कुछू परेशानी है?’’ ‘‘साइकिल से सभापुर आते-जाते दुबराय गये हो। महदेवा का काम अम्मा सम्भाले हैं। हम सभापुर में रहेंगे। जिन्नी और जंजे (बेटी-बेटा) को अच्छी पाठशाला में पढ़ाना हय। यहाँ दिन भर धूप में बागते हॅंय।’’
‘‘अम्मा अकेले कइसे रहेंगी?’’
‘‘जब इच्छा होयगी सभापुर आ जायेंगी। हमहूँ महदेवा आते-जाते रहेंगे। ए हो, पान की दुकान में रौनक शाम को होती हय। तुम दुकान जल्दी बंद कर महदेवा के लिये चल देते हो के अँधियारे में गइल (राह) न दिखेगी। अउर हमको चिंता लगी रहती हय अँधियारे में तुमको भूत-बयार परेसान न करें।’’
सूबेदार गदगद। जितनी सुंदर है, उतना सुन्दर सोचती भी है। ‘‘ठीक बात। होटेल मालिक कहते हैं जय भवानी जल्दी बंद कर देते हो। होटेल आने वाले लोग पान की मॉंग करते हैं।’’
तिली सभापुर क्या आई मानो बरक्कत लेकर आई। शाम को अच्छी संख्या में ग्राहक आते। दिन में विद्यालय के विद्यार्थी आते। सर्किट हाउस में जब कोई मंत्री आते उनसे मिलने आये लोग पान की तलब लिये जय भवानी चले आते। सूबेदार खुश था। सब कुछ सही वेव लेंथ पर जा रहा था। कोई खबर नहीं बाजारवाद जैसा एक ताकतवर शब्द है जो सभापुर को लपेटे में लेता जा रहा है। सूबेदार ने मानो अचानक देखा। बाजार का स्वरूप और संस्कार इतना बदल गया है कि सभापुर कुछ और ही हो गया है। चारों ओर निर्माण और रौनक। बाजार के रुख को पहचान कर उपभोक्ताओं को लुभाने के नानाविध तौर-तरीके। मानो रातों-रात आधुनिक सुविधाओं और पुख्ता प्रबंध वाले होटेल खड़े कर दिये गये हैं। दूर की बात न करें विद्यालय के पास अच्छी रौनक वाली दो पान की दुकान सज गई हैं। वहाँ पान, गुटखा से लेकर बीड़ी, सिगरेट, कोल्ड ड्रिंक, बिस्कुट, चाकलेट अधोषित रूप से ड्रग भी उपलब्ध है। आधुनिक होटेलों ने सर्वश्रेष्ठ की श्रेष्ठता गारद की, पान की दुकानों ने जय भवानी की बिक्री पर बट्टा लगाया। ग्राहक बॅंट गये। सर्वश्रेष्ठ में ठहरने वालों की संख्या भी अल्प हो गई। भर तश्तरी पान की माँग खत्म हो गई। पराभव ने सूबेदार से अधिक तिली को चिंतित कर दिया। सूबेदार की सूखी सूरत के कारण रातों का चैन, दिन का करार वैसे भी चैपट हो गया था। अब वह बेहतरी भी न रहेगी जिसकी उम्मीद में सभापुर चली आई है। अपने छोटे टी.वी. में विज्ञापन देख वह कितना ललकती है। विज्ञापन की वस्तुओं को समीप से देखने के लिये अक्सर दोपहर में बाजार जाती थी कि धीरे-धीरे एक-एक कर सारी वस्तुयें खरीद लेगी। दुकानों में तैनात लड़कियाँ (सेल्स गर्ल) मुस्कुरा कर स्वागत करतीं तब तो लगता इच्छित उत्पाद खरीद ही लें पर उचित पैसा न होता। तिली देखती बाजार में, दुकानों में कितनी भीड़ होती है। फिर जय भवानी पान भंडार में अकाल क्यों पड़ गया? सूबेदार सुंदर बीड़ा नहीं बनाता कि बीड़ा बनाते-बनाते थकने लगा है? तिली ने लोलार से सूबेदार को देखा -‘‘ए हो, अइसे न चलेगा। कइसे मकान का किराया देंगे, कइसे जिन्नी और जंजे की फीस देंगे, कइसे बीमार रहने वाली अम्मा की दवाई-ओसहा (औषधि) होगी ?’’ ‘‘का बतायें।’’
‘‘जय भवानी तोंहसे नहीं चल रही है। कहो त हम चलायें।’’
‘‘बेलकुल नहीं। पान-सिगरेट के दुकान मा चार गुंडा-बदमास आबत हैं।’’
‘‘हम पंडिताइन-ठकुराइन नहीं हैं के लाज मूँदे घर माँ बइठे रहेंगे। सभापुर नया जमाना वाला होइ गा हय। दुकान में सुंदर-सुंदर बिटिया सामान बेंच रही हैं। हम पान काहे नहीं बेंच सकते? ए हो एक से दुइ भले। तोंहारे रहते कोहू के मजाल नहीं जो हमको आँख उठा के देखेगा। जो देखेगा हम उसकी अइसन-तइसन कर देंगे।’’
सूबेदार सोच में डूब गया। तिली की सलाह उचित लग रही थी या तिली की मंशा को रद्द कर उसे खफा नहीं करना चाहता था ? कर ले मंशा पूरी। उकता कर चार दिन में वापस घर में बैठ जायेगी।
जय भवानी एक तरह से तिली को हस्तगत हो गई। सूबेदार नायब के पद पर। प्रत्येक व्यक्ति की अभिरुचि, प्रबंधन, कला कौशल भिन्न होता है। तिली को वे कारक, प्रभाव, घटक नहीं मिले जो व्यक्तित्व को परिष्कृत करते हैं लेकिन बाजार में टिके रहने की रक्षता उसमें थी। उसे बाजार के चमत्कार और तिलिस्म की समझ और संज्ञान नहीं था लेकिन अपनी खूबियों का एहसास था। जानती थी स्वस्थ चेहरे में ताजा बयार सी हॅंसी खूब खिलती है। उसने हॅंसी में खनक और मुद्राओं में चुहल भरी। ग्राहक को सबसे पहले ताजा बयार सी हॅंसी उपलब्ध कराती ‘‘का पेस करें साहेब ? कउन पान पसंद करते हैं? मीठी पत्ती, बॅंगला, महदेवा कि बनारसी ?’’
ग्राहक चकित हो जाते। पान जैसी छोटी दुकान अक्सर पुरुष चलाते हैं। जय भवानी को बाजारवाद से मेल करने जैसी आनंदी, छवि वाली स्त्री चला रही है।
‘‘चमन बहार डालकर मीठी पत्ती बनाओ।’’
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों की दीवानगी शीर्ष पर होती है। तिली की प्रफुल्ल छवि को देखकर जय भवानी आने लगे। तिली तत्पर हो जाती -
‘‘का लोगे हीरो?’’
‘‘हीरो तो एक ही है। हमारा सलमान खान’’
‘‘हमारे लिये आप सब हीरो हो। का पसंद करते हो? कउन गुटखा, कउन कोल्ड ड्रिंक, कउन चाकलेट? हम सब रखते हैं। सेवा का मउका दो।’’
‘‘सेवा का मौका तुम हमको दो।’’
‘‘अउर भी जो पसंद करो, हम मॅंगा लेंगे।’’
‘‘ड्रग रखो। वो दोनों पान वाले ड्रग रखते हैं। समझती हो न। नशा करने वाली गोलियाँ।’’
विद्यार्थी हॅंसते, शोर करते, आपस में अंग्रेजी में बोलते।अंग्रेजी न सूबेदार समझता न तिली पर तिली शीश झमकारते हॅंसते हुये ऐसी मुद्रा बनाये रखती जैसे समझ रही है। सूखा मुँह बनाये सूबेदार तिली को देखता। इस तरह हॅंसते हुये किसी के साथ दूर उड़ गई तो दाम्पत्य न बचेगा। विद्यार्थियों के जाते ही वह स्वामित्व पर उतर आता -
‘‘ऐतना बेभाव न हॅंसा कर तिली।’’
तिली, सूबेदार को लोलार से देखती ‘‘ऐ हो, बेभाव नहीं जय भवानी का भाव बनाने के लिये हॅंसते हॅंय। मस्त लड़िका हॅंय। अच्छी बिक्री भई।’’
लोगों को तिली की हॅंसी लुभाती और भ्रमित करती। ऐसा हॅंसती है जैसे हर किसी को दिल देने के लिये तैयार बैठी है। किस्से-कहानी बनने लगे। किस्से-कहानियों से बेखबर तिली ग्राहक देखते ही स्फूर्त हो जाती -
‘‘हुकुम करो साहेब।’’
‘‘तुम तो कुछ भी खिला दो। और हॉं दस पान बाँध दो। मंजी जी से मिलने के लिये हमारे साथ कई लोग सर्किट हाउस में जमा हैं।’’
तिली, सूबेदार को आदेश देती ‘‘ए हो, हरबी-हरबी (जल्दी) हाथ चलाओ। फस्स किलास बीड़ा बनाओ।’’
सूबेदार सुड़ौल बीड़ा बनाने में दत्त होता इधर तिली कतरी सुपाड़ी या चूना हथेली पर रख कर ग्राहक के सम्मुख फैला देती। शरीफ लोग शराफत से सुपारी, चूना लेते, मुक्त तबियत वाले हथेली पर ऊॅंगलियों को भरपूर दबाव डालते हुये लेते। तिली बुरा नहीं मानती। समझ गई है बाजार के लायक बने रहना है तो थोड़ी-बहुत माया दिखानी होगी। थोड़ी-बहुत मनमानी सहनी होगी। उत्पाद का प्रस्तुतीकरण, गुणवत्ता से अधिक जरूरी होता है। वस्तु छोटी हो या बड़ी, मामूली या मूल्यवान आजकल इतनी लुभावनी पैकिंग होती है कि खोलकर उत्पाद बाहर निकालने की इच्छा नहीं होती। सूबेदार, तिली के व्यवहार में पैंतरेबाजी देखता। बीड़ी के धुँयें के साथ क्रोध बाहर छोड़ता -
‘‘तिली, चार ठो गुंडा-बदमास आते हॅंय। इतना नक्सा न देखाया कर।’’
‘‘नक्सा नहीं देखाते हैं। अपना बिजनिस चमका रहे हैं।’’
कहकर वह सूबेदार को लाजवाब कर देती। सूबेदार वैसे भी उसके सम्मुख लाजवाब लगता था। तिली की सफाई सुन उसे तिली खरी मेहेरिया और वह खुद शक्की दिमाक वाला लगने लगता। तिली ठीक कहती है। नक्शा दिखाती है कि नहीं दिखाती है पर जय भवानी को बरक्कत दे रही है। बरक्कत हो रही है तो थोड़ी-बहुत अप्रिय वारदात यदि होती है तो सहना पड़ेगा। तिली ठीक मौके पर जय भवानी न सम्भालती तो वही दशा होती जो सर्वश्रेष्ठ की हो रही है। जब कभी एक-दो लोग ठहरते हें बाकी सन्नटा पड़ा रहता है। तिली के प्रताप से ग्राहकों की संख्या बढ़ी है बल्कि सर्किट हाउस वाले चैराहे पर ड्यूटी देने वाले यातायात पुलिस के जो सिपाही पान खाकर जेब से पैसा निकालना गुनाह समझते थे वे अब तिली को ईमानदारी से दाम देते हैं।
यातायात नियंत्रण करते हुये बोसीदा हुये सिपाही जय भवानी में इस तरह प्रसन्न होकर आते हैं जैसे सुस्ताने की मोहलत मिल गई है।
‘‘सीटी फुरफराते सुबह से खड़े हैं। अब जाकर मंत्री जी की सवारी निकली। मूतने तक नहीं जा सके। उधर मूतने जायें और इधर कुछ गड़बड़ी हो जाये तो मंत्री जी हमारी नौकरी ले लें।’’
तिली ने छोटे फ्रिज से शीतल पेय का कैन निकालते हुये कहा ‘‘हजूर, एक घड़ी सुस्ता लो। ठंडा पियो।’’
सिपाही ने तिली को भरपूर देखा, कैन थामते हुये उसके हाथ को भरपूर छुआ -
‘‘इस नौकरी में सुस्ताना गुनाह है।’’
‘‘हजूर आप लोगन की डियूटी बहुतय कड़ी हय। एतनौ पर जनता आप लोगन को गाली देती हय।’’
दिन भर का दाह कम करने के लिये सिपाही ने शीतल पेय कंठ में उतारा ‘‘लोगों को लगता है चालान काट कर हम सरकारी खजाना नहीं अपनी जेब भर रहे हैं।’’
तिली चालान का अर्थ न समझी लेकिन मस्त होकर हॅंसी ‘‘ठीक कहते हैं हजूर।’’
जय भवानी का कारोबार शाम को बढ़ जाता। उस पथ से आने-जाने वाले कई लोग नियमित ग्राहक बन गये हैं। ये नियमित ग्राहक दो-चार दिन न आयें तो तिली जिज्ञासा व्यक्त करती -
‘‘बड़े दिनों के बाद जय भवानी की सुध किये साहेब। कहौं बाहर गये रहे?’’
‘‘दफ्तर के काम से जाना पड़ा। बाबा जर्दा डाल कर पान बनाओ।’’
‘‘हाँ, हमें मालूम है आप बाबा जर्दा पसंद करते हैं। वहय बना रहे हैं। फुल मीठा पान मैडम की खातिर ले जाओ। खुश हो जायेंगी।’’
तिली जानती है साहब पत्नी को प्रसन्न करने हेतु पान न ले जायें उसकी उजली हॅंसी का मूल्य चुकाने के लिये ले ही जायेंगे।
‘‘मैडम, कभी खुश नहीं होतीं पर कह रही हो तो ले जाता हूँ।’’
बल्ब के लाल मद्धिम प्रकाश में आसीन तिली आनंद लोक की रचना करती जान पड़ती ‘‘आप जइसे दिल उदार लोग हैं तबहिन हम गरीबन को दाल-रोटी मिल रही है .......।’’
किसी के साथ छोटे बच्चे को देख तिली छोटा सा पान बना कर (बिल्कुल मुफ्त) अपने हाथ से बच्चे के मुँह में डाल देती -‘‘अउर का लोगे? कउन चाकलेट? कउन बिस्कुट? पापा जी का मुँह का देखते हो? चाकलेट पकड़ो। लो लल्ला।’’
लल्ला चाकलेट झपट लेता। लल्ला का पिता समझ लेता तिली ठग रही है पर ठगाई वाजिब सी लगती। चाकलेट और बिस्कुट का मूल्य चुकाते हुये वह तनिक अन्यमनस्क न होता। जय भवानी बंद कर तिली को साइकिल पर बैठाये घर जाते हुये सूबेदार जरूर अन्यमनस्क हो जाता -‘‘तिली, कोउ अपनी कम्पनी (सूबेदार पत्नी को कम्पनी कहता था) को खुश रखे, न रखे, तोंहसे मतलब?’’
‘‘जय भवानी से मतलब रखते हैं। तुमहीं बुरा लगता है तो अब किसी से नहीं कहेंगे कम्पनी के लिये फुल मीठा पान ले जाओ।’’
ये नियमित से संवाद हैं। तिली जानती है सूबेदार कल फिर आपत्ति करेगा लेकिन वह ग्राहकों को लुभाने का जतन नहीं छोड़ेगी। सूबेदार जानता है तिली हॅंसना नहीं छोड़ेगी लेकिन कहता है। कहता है लेकिन कठोर होकर नहीं, कहने भर को कहता है। बाकी बाजार की नियमावली को समझता है। जिनके पास पैसा है वे अपनी दुकान को नया आकार-प्रकार देकर उपभोक्ताओं को लुभा रहे हैं। जय भवानी में तिली की हॅंसी के अलावा कुछ नहीं है। हॅंसी का इस्तेमाल कर कितनी होशियारी से बिक्री कर रही है। थोड़ी-बहुत अप्रिय वारदात सहनी पड़ेगी। तिली ने आसंदी पूरी तरह सम्भाल ली।
सूबेदार माल लाने का काम करता है या सिर पर मुरेठा बाँधे एक ओर इस तरह बैठा रहता है मानो तिली की निगरानी कर रहा है। एक साथ कई ग्राहक आ जायें तब बीड़ा बनाने लगता है। लेकिन बीड़े को प्रस्तुत तिली ही करती है। कोई मन चला कह देता- ‘‘सूबेदार महाराज रिटायरों की तरह एक तरफ सुस्त क्येां बैठे रहते हो?’’ ‘‘हमारा जमाना गया। तिली का जमाना चल रहा है।’’
तिली की हॅंसी जोर पकड़ लेती ‘‘अरे रे रे, जमाना तो तोंहारा हय। हमारे रहते तोंहारा ही रहेगा।’’
तिली की हॅंसी के कई-कई अर्थ। लोग कयास लगाते-पान वाली का दिल हर किसी पर आ जाता है। यही कयास था सर्वश्रेष्ठ के मालिक के इकलौते पूत कोविद का। पाँच बहनों के बाद बड़े अरमान से जन्म लेकर अब वह जवान हो चला था। वह सर्वश्रेष्ठ में रुचि नहीं लेता था क्योंकि उसे डूबता हुआ ऐसा जहाज मानता था जिसका डूबना तय है। वह सर्वश्रेष्ठ नहीं आता था। राह भटक कर कभी आ जाता था। जय भवानी की उसने अब तक नोटिस न ली थी। वह तो चार मित्रों के साथ जय भवानी पान खाने पहुँचा और तिली नजरों में चढ़ गई। सचमुच ऐसा हॅंसती है मानो दिल देने को तैयार बैठी है। कोविद पहॅुच बनाने की चेष्टा करने लगा। तिली ने फटकार दिया। कोविद ने कई बार कोशिश की। कामयाबी नहीं मिली। वह परिताप बल्कि प्रतिशोध से भर गया। रणनीति बनाई और कई तरह से व्याख्या कर पिता को यह समझाया -
‘‘पापा, मैं अपनी गलती मानता हूँ। आवारागर्दी में समय खराब करता रहा। गलती आपकी भी रही। मेरे साथ जरा भी स्ट्रिक्ट नहीं हुये और मैंने पढ़ाई में ध्यान नहीं दिया। मेरे पास बड़ी डिग्री नहीं है जो अच्छा जाब मिलेगा। सर्वश्रेष्ठ को सम्भालना चाहता हूँ। वह मुझे डूबते जहाज की तरह लगता था। अब लगता है यह होटेल बहुत बड़ा एसेट है।’’ पिता ने मुदित होकर कोविद को देखा। सन्मति आ रही है। ‘‘ठीक कहते हो।’’
‘‘यहॉं कभी कोई आकर ठहर जाता है लेकिन शिकायत करता है रेस्टोरेन्ट न होने से खाने-पीने में दिक्कत होती है। मैं रेस्टोरेन्ट खोलने की योजना बनाना चाहता हूँ। रेस्टोरेन्ट ऐसा धंधा है जो प्राफिट ही देता है। फन एण्ड फूड लोगों को लुभाता है। मैं अभी छोटे लेवल पर शुरुआत करूँगा। जिस हिसाब से पैसा आता जायेगा हम उस तरह आगे प्लान करेंगे।’’
‘‘अचानक इतने समझदार कैसे हो गये?’’
‘‘सुनो तो पापा। जय भवानी को हटा कर उस जगह पर मैं पिज्जा हट खोलना चाहता हूँ। सभापुर के लोग चाइनीज आलू टिक्की, पेटीज से ऊब गये हैं। उन्हें नया चाहिये। पिज्जा डिमाण्ड में है।’’
‘‘जहाँ जय भवानी है वह हमारी जमीन नही है।’’
‘‘जानता हूँ लेकिन सूबेदार नहीं जानता। सोचता है हम उसे आसरा दे रहे हैं।’’
‘‘आसरा बना रहने दो।’’
‘‘डैड लोग परिवर्तन चाहते हैं। भोजन में जबर्दस्त बदलाव आ रहा है। गोल गप्पे में वोदका भरी जा रही है। मसालेदार केकडे़ को शक्तिवर्धक शीतल पेय में डुबोया जा रहा है। आइसक्रीम के साथ हरी मिर्च पेश की जा रही है। चाँकलेट को सेक्स अपील दी जा रही है। पापा, तुम इंटरनेट की बिल्कुल जानकारी नहीं रखते। देखो दुनिया कहॉं जा रही है। मैं इंटरनेट पर सर्च कर रहा हूँ। फन एण्ड फूड का ऐसा इंतजाम करूँगा कि लोगों की लाइन लगेगी।’’
‘‘इतना बड़ा होटेल है। जो करना है यहॉं करो। वह जमीन हमारी नहीं है।’’
‘‘हम नहीं तो किसी दिन कोई और उस जमीन पर कब्जा कर लेगा। ठीक बगल में कोई काम्पीटिटर खड़ा हो जायेगा।’’
‘‘लेकिन बेटा जब हम मंदी की मार झेल रहे हैं तब सूबेदार तो छोटी हैसियत वाला है। मेरी इज्जत करता है। तुम्हें बड़प्पन .....
‘‘पापा, आपको खबर नहीं लेकिन जमाना कितना बदल गया है। प्राचीन युग की नगर वधू संस्कृति पार्टी गर्ल तक पहुँच गई है ...... लड़के जिगोलो बन रहे हैं। पार्टियों में नाच-गाकर और भी बहुत कुछ कर लड़कियों - महिलाओं को इंटरटेन करते हैं। यंगस्टर्स को ग्लैमर चाहिये। थ्रिल, इन्नोवेशन, वेरियेशन चाहिये। लिकर, डांस, पार्टी, फन। लोगों के पास बहुत पैसा है। खींचना आना चाहिये। मैं जय भवानी को हटा कर पिज्जा हट डालने का प्लान कर रहा हूँ। आप मेरा काम देख कर शाबासी दोगे जिसे इतना लापरवाह समझते हो उस कोविद ने सर्वश्रेष्ठ को फिर से चमका दिया है।’’
‘‘सर्वश्रेष्ठ की तरक्की होनी चाहिये पर बेटा सूबेदार कहॉं जायेगा? गरीब की आह नहीं लेनी चाहिये।’’
‘‘कम आँन पापा। अब शुभ-लाभ का दौर नहीं है। लाभ-शुभ का है। अपना लाभ देखो, शुभ अपने-आप होगा।’’
........ उधर दिन भर के प्रज्वलन के बाद रवि रश्मियाँ मद्धिम हो रही थीं, इधर जय भवानी का अवसान हो रहा था। उधर देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आक्रमण तेज हो रहा था।\ इधर पेट के प्रबंध के लिये चलाई जा रही नामालूम सी दुकान औचित्य खो रही थी। लोगों ने सूबेदार की शिथिलता देखी, तिली का क्रंदन देखा। सदाबहार जगह को अस्तित्व विहीन होते देखा। देखा, चैंके लेकिन प्रश्न या आपत्ति किये बिना अपनी राह बढ़ गये। अब किसी के मामले में कोई नहीं बोलता। लोगों ने कुछ दिन जगह के खालीपन को महसूस किया। तिली की हॅंसी को याद किया। जल्दी ही ताम-झाम के साथ वहाँ पिज्जा हट निर्मित हो गया। पिज्जा के विविध रूप, विविध स्वाद। पिज्जा की वेराइटी की सूची में सबसे ऊपर लिखा था-दो पर एक फ्री। दो पर एक फ्री वाली स्क्रीम की ओर लोगों का ध्यान जाना स्वाभाविक था।
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"बाल विभाग ( किड्स कार्नर)"
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श्री विवेक चतुर्वेदी
श्री विवेक चतुर्वेदी मुक्तक, ग़ज़ल, गीत, कविता, नवगीत लिखने में रूचि रखते हैं| इन्होने एम.कॉम., एल एल. बी., बी. एड., बी. टी. सी. की शिक्षा ग्रान की है| इन्हें गुफ़्तगू संस्था प्रयागराज द्वारा "अक़बर इलाहाबादी स्मृति सम्मान" एवं "निराला स्मृति सम्मान" भी प्राप्त हुयें है|
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कुछ दोहे हिन्दी के नाम
जन्म भले ही ले कहीं अंग्रेज़ी का ज्ञान
पर हिन्दी की गोद में खेले हिन्दुस्तान।
इतना आकर्षक लगा हिन्दी का संवाद
हिन्दी में करने लगे हम भी तुमको याद।
मन को छूने की कला है हिन्दी के पास
तू भी तो महसूस कर हिन्दी का एहसास।
हिन्दी की लिपि देखती देवनागरी ख़्वाब
ख़्वाबों के पर तोलते गेंहूँ और ग़ुलाब।
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हिन्दी की मदयन्तिका मना रही है तीज
बो कर अपने प्यार में हरियाली के बीज।
हिन्दी का अक्षर धनुष और शब्द है बाण
उचित मात्रा के बिना हर अक्षर निष्प्राण।
हिन्दी भाषा की नदी मन का स्विमिंग-पूल
इसमें भी विज्ञान के खिलते हैं कुछ फूल।
वो तो फैलाने लगी तितली अपने पंख
वर्ना हिन्दी में यहाँ कौन बजाता शंख।
हिन्दी जैसे नाभि में कस्तूरी की गन्ध
फिर भी खाते हैं हिरण इसकी ही सौगन्ध।
देवनागरी में चखो लिपि के मीठे बेर
अंग्रेजी दुनिया पढ़े हिन्दी पढ़ते शेर।
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कहानियां - लघु कथा
"भिखारी कौन ?"
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डॉ. विद्या चौधरी,
डॉ. विद्या चौधरी, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की बिहार-झारखण्ड, भारत शाखा की वर्ष 2014-15 से संयोजिका हैं। इनकी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की पत्रिका “विश्वा” सहित विविध राष्ट्रीय जर्नल्स, पत्र-पत्रिकाओं में शोध-आलेख, लघुकथाएं, कविताएँ प्रकाशित हुई है। इसके अतिरिक्त अनेक पुरातात्विक, साहित्यिक, सामाजिक संस्थाओं से भी संबद्ध है।
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भिखारी कौन ?
वाराणसी जंक्शन पर यात्रियों की भारी भीड़ एक-दूसरे को दायें-बायें ठेलती-धकेलती अपनी-अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए भागती जा रही थी। प्लेटफार्म पर एक बेंच पर एक उम्रदराज मुसाफिर चुपचाप बैठा हुआ था। अच्छा खाता-पीता इंसान लग रहा था। बदन पर अच्छे लिबास भी पहने हुए था।
मुसाफिर के सामने से एक भिखारी गुजर रहा था। भिखारी ने सोंचा कि इस मुसाफिर के पास अच्छा खासा पैसा होगा, उसी से खाना खाने के लिए पैसे मांग लेता हूँ। भिखारी ने मुसाफिर के सामने हाथ फैलाये। मुसाफिर भिखारी को बेंच पर अपने बगल में बैठने का इशारा किया। भिखारी बैठ गया। फिर भिखारी से पूछा- " भाई! चाय पिओगे ?" उसी समय एक चाय वाला गुजर रहा था, हांक लगाते हुए - "गरम चाय! गरम चाय!" मुसाफिर ने चाय वाले को रोका। चाय वाले ने प्लास्टिक के दो कप में चाय दोनों के हाथ दे दिया। फिर चाय वाला पैसे के लिए खड़ा हो गया।
मुसाफिर ने भिखारी से पूछा - "भाई ! कुछ-न-कुछ तो आमदनी हुई होगी ?"
भिखारी निर्निमेश विस्मित भाव से मुसाफिर के चेहरे को देखते हुए खड़ा हो गया। चाय वाले को अपनी गुजरी से पाँच-पाँच रुपये का दो सिक्का निकाल कर दे दिया।
चलते-चलते भिखारी - "भीख में भीख .....!"
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प्रबंद्ध संपादक – संपादक मंडल sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
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सितम्बर अंक का प्रकाशन अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की पूर्व अध्यक्ष और प्रबंध संपादक स्वर्गीय श्रीमती सुशील मोहनका के श्रद्धांजलि में भेंट होगी । आप अपनी श्रद्धांजलि जल्द ही ईमेल पर भेजें
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