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JULY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
जुलाई 2022, अंक १४ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों ,
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को रथ यात्रा तथा गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि अभी Covid19 की बढ़ती महामारी से मानव समाज को सुरक्षित रखें।
हिंदी शिक्षण समिति ने हिन्दी भाषा के भविष्य को ध्यान मे रखते हुए अपने आप याने स्वयं हिंदी सीखने का बहुत ही आसान और रोचक विधि की खोज कर हिंदी को सीखना सरल कर दिया है। दिन-प्रतिदिन इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है, कृपया इस पाठ्यक्रम के माध्यम से अपने बच्चों को लाभान्वित करें और अधिक जानकारी के लिए info@hindi.Org पर सम्पर्क करें।
काव्य गोष्ठियों की श्रंखला 3 जून से 10 जुलाई २०२२ तक अमेरिका में बहुत ही हर्ष और उल्लास के साथ सम्पन्न हुई। अमेरिका के हिंदी भाषी परिजनों ने यहाँ आयोजित कवि गोष्ठियों का पूर्ण आनंद लिया।
जागृति का कार्यक्रम ९ जुलाई २०२२ को भक्तिकाल की सीमारेखा पर डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया।उन्होंने वेबिनार में आये प्रश्नों के उत्तर बड़ी अच्छी तरह दिये। यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं:- https://www.hindi.org/Jagriti.html
जागृति मंच के माध्यम से शनिवार,13 अगस्त 2022 को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान् प्रोफ़ेसर शंभुनाथ तिवारी, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "रीतिकाल : समाज और संस्कृति का कलात्मक संगम"। आप अपने प्रश्न jagriti.hindi.org पर पूछ सकते है।
आप सभी इस ईमेल (anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतरराष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- जल्दी आ रहा है ( COMING SOON )
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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| "जागृति वेबिनार: "रीतिकाल : समाज और संस्कृति का कलात्मक संगम", 13 अगस्त 2022 |
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 13 अगस्त 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान् प्रो. शंभुनाथ तिवारी, प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "रीतिकाल : समाज और संस्कृति का कलात्मक संगम"।
आइये, उनसे सुनें, रीतिकाल में हर तरह के साहित्य, जैसे भक्ति, वीरता आदि, की रचना हुई फिर भी उसे रीतिकाल क्यों कहते हैं? रीतिकाल में साहित्य का कौन पक्ष अधिक मुखर था: अनुभूति या अभिव्यक्ति ? रीतिकाल के साहित्य पर तत्कालीन समाज और शाषकों का क्या प्रभाव पड़ा, आदि।
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति शनिवार, 13 अगस्त 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
१) www.facebook.com/ihaamerica
२) https://youtu.be/6CME7imZPmU
शनिवार, 13 अगस्त 2022; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST, UK: 4:00 PM
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आशा है कि आप शनिवार, 13 अगस्त 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” जून २०२१ से प्रकाशन प्रारम्भ किया है।
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- अमेरिका के हूस्टन शहर में:
" हिंदी साहित्य महोत्सव ", ७ अगस्त , 2022 |
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, कविसम्मेलन रिपोर्ट
३ जून से १० जुलाई २०२२
"अमेरिका के महानगरों में " |
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आलोक मिश्र : संयोजक एवं प्रस्तुति,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के ट्रस्टी अध्यक्ष 2022-23.
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तेज नारायण शर्मा :
ग्वालियर के व्यंग्यकार एवं कविसम्मलेन संचालक |
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अमरीका की सबसे पुरानी और प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति प्रतिवर्ष भारत के तीन नामचीन कवियों को संयुक्त राज्य अमेरिका बुलाकर विभिन्न शहरों में प्रवासी भारतीयों के मनोरंजन हेतु कवि सम्मेलन कराती है, जिसका अन्तर्निहित उद्देश्य जनरंजन के अलावा हिंदी भाषा का उन्नयन, प्रसार और संवर्धन भी होता है। परन्तु विश्व स्तर पर कोविड-१९ महामारी के चलते इस चिरपरिचित वार्षिक हास्य कवि-सम्मेलन का आयोजन पिछले दो वर्षों से निलंबित था। दो साल के दुनियावी जद्दोजहद के बाद वैश्विक आवागमन के कड़े नियमों तथा प्रतिबंधों में शिथिलता आने पर जब ज़िन्दगी अपने आम रास्तों पर चहल कदमी करते शुरू हुई तब समिति ने तय किया कि ३ जून से १० जुलाई २०२२ की अवधि में उन्हीं कवियों को बुलाकर काव्य संगोष्ठियां करायी जायें जो कोविड की वजह से २०२० में नहीं आ सके थे।
इस तरह ठहराव में गतिशीलता आई और कविता के वाचिक उत्सव की अमेरिका के २१ महानगरों में तैयारियाँ प्रारम्भ हुईं। आंतरिक अवरोध भी कम नहीं थे। अंततोगत्वा प्रतीक्षित काव्य शृंखला का निर्बाध आयोजन हुआ जिसमें ग्वालियर के व्यंग्यकार श्री तेज नारायण शर्मा, फरीदाबाद के हास्य कवि श्री दीपक गुप्ता और गुरुग्राम की गीतकार सुश्री अंकिता सिंह ने अपनी प्रभावी भागीदारी दर्ज कराई। अमेरिका में तीनों कवियों का यह दूसरा आगमन था।
कविता केवल मनोरंजन ही नहीं करती बल्कि मानव मन को शांति और आनन्द भी देती है। कहते हैं अगर जीवन में हास्य न हो तो जीवन बोझिल सा हो जाता हैं। दो पल की हँसी दिन भर की बड़ी से बड़ी थकान भी उतार देती है। हास्य और व्यंग्य का एक अच्छा कवि न केवल हमें गुदगुदाता है बल्कि समाज़ में जो घटित हो रहा हैं, उस पर भी कहीं न कहीं हमें सोचने पर विवश भी कर देता हैं। हास्य और व्यंग्य की इसी विधा के एक नामी व्यंग्यकार हैं तेज नारायण शर्मा जो अपने खास अंदाज़ के कारण व्यंग्य सम्राट शरद जोशी जी की याद दिलाते हैं और देश ही नहीं विदेशों में भी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनके काव्य में राजनीति, समाज, मानवीय सम्बंधों के मिश्रण के साथ रोज़मर्रा के जीवन पर कटाक्ष देखा जा सकता है। साधारण रूप से हास्य को जगाने वाली कविताओं में समाज को सुधारने की बात भी छिपी होती है जो आम जीवन की विद्रूपताओं को सामने लाती हैं। ग्वालियर भारत के मशहूर व्यंग्यकार तेज नारायण शर्मा जी की हास्य कविताएं एक तरफ जहाँ हमें धीरे से गुदगुदाती है, वहीं समाज, मानव जीवन और रिश्ते एवं राजनीति पर उनके व्यंग्य कहीं न कहीं हमारा ध्यान भी आकृष्ट करते हैं और साथ ही हमें सोचने पर विवश भी करते हैं कि हम कैसे अपने समाज और राजनीति का पुनर्निर्माण कर सकते है। विधि स्नातक और पेशे से अधिवक्ता तेज नारायण जी ने १९९० से देश विदेश के बहुत से लोकप्रिय मंचों पर अपना काव्यपाठ किया हैं जिनमें प्रमुख हैं, लाल किले का कवि सम्मेलन, ठहाका, अट्ठहास, आदि। आपको काका हाथरसी हास्य रत्न सम्मान, अट्टहास सम्मान और पैगाम सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।
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| दीपक गुप्ता : फरीदाबाद, हरियाणा |
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कहा जाता है कि हरियाणा और हास्य एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। फरीदाबाद, हरियाणा के दीपक गुप्ता अभिव्यंजक हास्य और तेज़ तर्रार ठहाकों के लिए कविता के मंच का एक ऐसा ही उत्कृष्ट नाम है जो अपनी हास्य विपुलता के लिये जाना जाता है। दीपक जी अपनी प्रत्युत्तपन्मति द्वारा कविताओं में मधुर हास्य के कारण लोकप्रिय हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक होने के साथ-साथ दीपक जी भारत सरकार के अंतर्गत सांस्कृतिक मंत्रालय की गवर्निंग-बॉडी के सम्मानित सदस्य भी रह चुके हैं। आपने मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी किया है। आपकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, ‘सीपों में बंद मोती’, ‘रास्ते आवाज़ देते हैं’, ‘रोशनी बाँटता हूं’। कई राष्ट्रीय टीवी चैनेल्स पर आपने प्रस्तुति दी हैं जिनमें कि प्रमुख हैं SAB TV के ‘वाह वाह क्या बात है’ और NDTV पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘अर्ज़ किया है’। ख़बरदार ख़बरें, सूर्य समाचार, और वाह कवि जी वाह जैसे कार्यक्रमों का आपने कुशल संचालन भी किया हैं। साहित्यिक कृति पुरस्कार, संस्कृति समन्वय सम्मान, हास्य सम्राट रत्न जैसे अनेक सम्मानों से आप सम्मानित किए जा चुके हैं।
जितना मधुर कंठ, जितनी सुरीली आवाज़ उतनी ही भावपूर्ण प्रस्तुति व काव्य संचरण। अंकिता सिंह गया, बिहार में पैदा हुईं और ईश्वर ने उन्हें एक मधुर आवाज़ का उपहार दिया जिसे वह बहुत ही सहज ढंग से एक लयात्मक कविता के रूप में इस तरह प्रदर्शित करती हैं कि हर इंसान उन भावों से अपने को कहीं न कहीं जुड़ा हुआ महसूस करता है। राजस्थान विश्वविद्यालय से आपको स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया, बंगलौर विश्वविद्यालय में ये कम्प्यूटर साइंस विभाग में अध्यापन का कार्य करती रहीं परन्तु इन्होंने अपने दिल की आवाज़ सुनी और कविता, नाटक, चित्रकारी को चुना। इनके मधुर स्वर और श्रेष्ठ कविताओं ने थोड़े से समय में ही राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली। एक अभिजात युवा कवयित्री के रूप में आप अपनी एक अलग पहचान बना चुकी हैं। अपने रचनात्मक लेखन और भाव पूर्ण प्रस्तुति के कारण आपने बहुत ही थोड़े समय में देश-विदेश के लाखों कविता प्रेमियों के दिलों में एक विशेष स्थान बना लिया है। अंकिता जी को कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं जिनमें से ‘अंतर्नाद सम्मान’, ‘बिहार गौरव सम्मान’, ‘हिन्दी गौरव सम्मान’ उल्लेखनीय हैं।
फलतः ३ जून से १० जुलाई २०२२ के अंतराल में वाशिंगटन डीसी, रिचमण्ड, रायले, शार्लेट, नैश्विल, फ़ीनिक्स, लास एंजिलिस, रॉचेस्टर, न्यूयार्क, सैन होज़े, न्यूजर्सी, हैरिस्बर्ग, ह्यूस्टन, डेटन, क्लीवलैंड, कोलम्बस, बॉस्टन, लुईविल, इंडियानापोलिस, और शिकागो जैसे वैश्विक केन्द्रों पर एक लंबे समय से विलम्बित कविता का वाचिक उत्सव मनाया गया। इक्कीस कार्यक्रमों में से एक कार्यक्रम फिलाडेल्फिया किन्हीं कारणों से न हो सका परन्तु बाकी कार्यक्रम बेहद प्रभावशाली ढंग से सम्पन्न हुए। दो साल से अपने पसंदीदा कार्यक्रम के लिए प्रतीक्षारत भारतीय खेमा इस कदर आतुर था कि ठहाकों, तालियों, और वाहवाही का जो दौर वाशिंगटन से शुरू हुआ वह शिकागो तक बदस्तूर जारी रहा।
सभी कवियों ने अपनी काव्य प्रस्तुति का श्रेष्ठतम प्रदर्शन किया जिसे सुधी श्रोताओं ने खूब सराहा। कवियों ने व्यंग्य, हास्य और गीत की ऐसी त्रिवेणी बहाई कि जिसका रस कई दिनों तक अमेरिका वासियों के अंतर्मन में रहेगा। सैकड़ों श्रोताओं को जहाँ दीपक जी ने हास्यरस से लोट-पोट किया वहीं तेज जी ने अपने व्यंग्य बाणों से रोमांचित किया और अंकिता जी ने प्रेम के माधुर्य गीतों से भावविभोर किया। कवियों ने हास्य, व्यंग्य और प्रेम की कविताओं की निर्मल फुहार से ऐसा समां बांधा कि श्रोतागण कार्यक्रम की कसावट, गुणवत्ता, विचार, भाषा शिल्प, प्रस्तुति, स्वरसंधान और संस्कृति के लावण्य से न केवल मंत्रमुग्ध और आनंदित हुए बल्कि कार्यक्रमों की उत्कृष्टता के मुरीद हुए। इन सभी कार्यक्रमों का चुटीला संचालन तेज नारायण शर्मा ने प्रतिबद्धता के साथ किया। सभी कविसम्मेलनों का शुभारंभ अंकिता जी द्वारा सरस्वती वंदना से किया गया। इसके बाद सर्वप्रथम दीपक जी अपनी हास्य कविताओं से श्रोताओं को लोटपोट करते, तत्पश्चात् रस परिवर्तन करते हुए अंकिता जी काव्यपाठ करतीं। समापन स्वयं कविसम्मेलन संचालक तेज नारायण जी के व्यंग्य के ठहाकों से होता। न्यूयॉर्क में गण्यमान कवियों को राजकीय सम्मान-पत्र से भी सम्मानित किया गया।
हर शहर में आयोजकों द्वारा आमंत्रित कवियों के ठहरने, खाने-पीने, आवागमन संबंधी समुचित व्यवस्था की गई। इनमें सर्वश्री इन्द्रजीत शर्मा, डॉ० सुधा ओम ढींगरा, अर्चना पांडा, पूजा श्रीवास्तव, डॉ० शोभा खंडेलवाल, डॉ० हरिहर सिंह, डॉ० नरेन्द्र टंडन, डॉ० सतीश मलिक, डॉ० कल्पना शुक्ला, डॉ० राकेश कुमार, स्वपन धैर्यवान, चार्ली पटेल, मीरा कपूर, धरमपाल सिंह, संजीव जिंदल, बिपेन्द्र जिंदल, श्री गर्ग, रेखा भाटिया, आलोक मिश्रा (रो०), आलोक नंदा, अनिल गुप्ता, आशा चाँद, संजय खन्ना, संजय माथुर, दीप जी, प्रतीक जी, अभिनव जी, रश्मि जी, मंजू जी, नलिनी जी, अदिति जी, रागिनी जी, राज जी, सुधीर जी, हरीश जी, सुभाष जी और तुलसी भाई के अवदान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। स्थानीय कार्यक्रम वरिष्ठ हिंदीसेवी सर्वश्री डॉ० रविप्रकाश सिंह, सुरेंद्रनाथ तिवारी, तरुण सुरती, श्याम सुंदर शर्मा, डॉ० सतीश मिश्रा, डॉ० तरुण कोठारी, श्रीमती सुशीला मोहनका और श्रीमती सुषमा कौशिक की महनीय उपस्थिति में सम्पन्न हुए। हर शहर के आयोजकों ने मेहमान कवियों की अच्छी मेज़बानी की और उनको समयानुसार अपने क्षेत्रों का विशिष्ट भ्रमण कराया। अशोक खंडेलवाल जी द्वारा प्रदत्त नियाग्रा जलप्रपात का दौरा विशेष सराहनीय था। इस तरह सुखद स्मृतियों से ओतप्रोत इस बार की काव्य शृंखला अविस्मरणीय और लब्धिकारक रही।
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श्रोता गण कवि सम्मलेन का रस लेते
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जागृति रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति --९ जुलाई, 2022
जागृति व्याख्यानमाला की छठी कड़ी
9 जुलाई 2022: "भक्तिकाल की सीमारेखा" |
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| प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी |
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| वक्ता: प्रोफ़ेसर अंजनी कुमार श्रीवास्तव, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार |
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जागृति व्याख्यानमाला की छठी कड़ी-09 जुलाई 2022 को स्ट्रीमयार्ड (Streamyard) से वेबिनार के रूप में आयोजित हुई। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था "भक्तिकाल की सीमारेखा"। इस रोचक परिचर्चा के नेतृत्व के लिए समिति ने महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार के प्रोफेसर अंजनी कुमार श्रीवास्तव को आमंत्रित किया था। जागृति-मंच के प्रमुख डॉ. राकेश कुमार ने प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव का स्वागत करते हुए बताया कि डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव सम्प्रति अपने विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं। उनका शैक्षणिक/अध्यापकीय अनुभव कई विश्वविद्यालयों का है, जिसमें अंडमान/निकोबार द्वीप समूह के जवाहरलाल राजकीय महाविद्यालय, पोर्ट ब्लेयर तथा महात्मा गाँधी राजकीय महाविद्यालय, मायाबंदर शामिल हैं। डॉ. श्रीवास्तव राष्ट्रीय हिंदी अकादमी, अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के अध्यक्ष तथा भारतीय भाषा, प्रयाग के सदस्य हैं। उनके 20 से अधिक आलेख नया ज्ञानोदय, समयांतर, साहित्य अमृत, और अन्य महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों में प्रकाशित हैं। इनके प्रमुख आलेखों में हैं: भक्तिकाल: हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग, भक्तिकाल के उदय की मार्क्सवादी अवधारणा, श्रीमद्भगवद गीता और भक्ति का विकास, आदि।
प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव ने अपने व्याख्यान के प्रारम्भ में समिति और उसके जागृति-मंच द्वारा की जा रही इस व्याख्यान माला की सराहना की, और बताया कि अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय हिंदी सस्थाओं की गतिविधि अधिकांशतः भाषा और कुछ रचनात्मकता तक सीमित रहती है; पर समिति ने इस मंच द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास पर, जो साहित्य का मेरुदंड है, इस चर्चा-श्रृंखला का आयोजन कर एक अभिनव कार्य किया है। प्रोफेसर श्रीवास्तव ने बताया कि भक्तिकल एक महान सांस्कृतिक जागरण का, स्वत्व के जागरण का, समय था। उन्होने भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग बताते हुए, उस स्वर्णयुग के समापन, उसकी सीमा-रेखा के प्रति विद्वानों की पारंपरिक सोच का जोरदार खंडन किया। प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल की सीमारेखा संवत 1700 के आसपास तय की है, याने ई. सम्वत 1650 के आसपास। कोई दो सौ वर्षों बाद, ई.1857 में, भारत में एक नए जागरण की शुरुआत होती है जिसे हम साहित्य में नव-जागरण के नाम से जानते हैं। इन दो महान स्वत्व-परक जागरणों के बीच रीतिकाल का आना, जिसे सामंतवाद और विलासिता से जोड़ा जाता है, आश्चर्यजनक है। विचारणीय है कि क्या 1650 के बाद भक्ति का साहित्य नहीं लिखा जाता था, भक्ति की जो अजस्त्र धारा सदियों से भारत में प्रवहमान थी, वह एकदम अवरुद्ध हो गई थी, एकदम मौन हो गई थी? डॉ. श्रीवास्तव के मतानुसार यह सही नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध करने की चेष्टा की कि भक्ति साहित्य उस तथाकथित 'रीतिकाल' के समय में भी प्रचुर मात्रा में लिखा जाता रहा। इसी काल में कई महत्वपूर्ण भक्त कवियों ने अपना साहित्य रचा, जिसमें पलटू दास, मलूक दास, गुरुगोविन्द सिंह, महामति प्राणनाथ, गरीब दास, दया बाई, सहजोबाई, ब्रजवासी दास, नागरी दास आदि प्रमुख हैं और यही नहीं, इस काल में हर भक्त-सम्प्रदाय के कवियों ने अपना साहित्य रचा; जैसे, निम्बार्क संप्रदाय, सूफी सम्प्रदाय, वल्लभ सम्रदाय, आदि। इन भक्त-कवियों का साहित्य परिमाण की दृष्टि से भी रीतिकाल के कवियों की अपेक्षा अधिक कहा गया है। इसलिए यह कहना कि ई. 1650 के बाद भक्तिकाल समाप्त हो गया था, असंगत है।
रीतिकाल के आरम्भ और भक्तिकाल के अवसान के पीछे दो प्रमुख तर्क दिए जाते हैं: सामंतवाद की पुनर्प्रतिष्ठा तथा समाज के निम्न वर्ग द्वारा, सवर्णों द्वारा नहीं, भक्तिकाव्य की रचना। प्रोफेसर श्रीवास्तव ने इन दोनों का उदाहरण सहित, तर्क-सम्मत खंडन किया। समाजशास्त्री धूर्जटी प्रसाद मुखर्जी और प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडेय के मतानुसार ई: 1650 के बाद सामंतवाद की पुनर्प्रतिष्ठा हुई थी, अत: समाज में भक्ति का साहित्य शिथिल सा हो गया और रीति-साहित्य लिखा जाने लगा। प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव ने बताया कि यह सही नहीं है। उस काल में अंग्रेजों के साम्राज्य स्थापित करने तक, भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ थी, और हर समुदाय के लोग अपने-अपने व्यवसायों में उन्नति कर रहे थे, मात्र सामंत ही प्रमुख नहीं थे। उस समय शिक्षा, वाणिज्य, प्रौद्योगिकी आदि पर मात्र सामंतों का ही बोलबाला नहीं था, अपितु आम आदमी व्यापर को सुदृढ़ बना रहा था। उदारहरणतः, कृषि की उपज ब्रिटैन की अपेक्षा दुगुनी थी। डॉ. धर्मपाल का हवाला देते हुए उन्होंने बताया की धर्मपाल जी के दक्षिण भारत पर किये गए शोध से यह जाहिर होता है कि 92 प्रतिशत लोग शिक्षित थें, यहाँ तक कि बालिकाएं भी। मुग़ल साम्राज्य के पतन के बावजूद, उस समय हुगली, बनारस, मुर्शिदाबाद, होशंगाबाद आदि में बड़ी व्यापारिक मंडिया थीं, जिनमें व्यापर का चलन आम आदमी से होता था, सामंतों से नहीं। इतनी बड़ी मंडियाँ कि लंदन छोटे गांव जैसा लगता था। सूरत के बाजार में 1,60,00,000 व्यापारिक हिस्सेदारिया थीं, जिनमें यूरोपीय व्यापारी मात्र 20 लाख थे। भारत में तब जगनिक प्रणाली का अस्तित्व था, जिसमे कारीगरों को धन मुहैय्या करवा दिया जाता था ताकि वे अपने व्यापर, अपने कामकाज में निवेश कर सकें। उस समय भारत में कपड़ा बनाने, वर्क बनाने और इस्पात बनाने की प्रौद्योगिकी थी। अत: यह तर्क-सांगत नहीं है कि सामंतवाद की पुनर्प्रतिष्ठा हो रही थी जिसे भक्ति-साहित्य के अवसान लिए जिम्मेवार ठहराया जाता है।
जहाँ तक सवर्णों और सामंतों के वर्चस्व की बात है, वह बहस भी तर्क-संगत नहीं है। ऊपर के कवियों में, भक्तिकाव्य के रचनाकारों में हर वर्ण के कवि है, केवल निम्न वर्ण के ही नहीं। उसमें मुसलमान कवि हैं, ब्राह्मण कवि हैं, सूफी कवि हैं। यह सही है कि राजदरबारों में रीति काव्य लिखे जा रहे थे, पर राज दरबारों के बाहर प्रचुर मात्रा में, हर वर्ग के कवियों और सम्प्रदायों द्वारा भक्ति-साहित्य लिखा जा रहा था और इन कवियों का राजाओं सामंतों पर काफी प्रभाव था; जैसे समर्थ गुरु रामदास का शिवाजी पर, दरिया साहब का मीर कासिम पर। प्रभाव ऐसा कि भक्त कवि राजाओं की आलोचना से भी नहीं चूके। संत निपट निरंजन ने औरंगजेब से बेबाक स्वर में स्पष्ट कहा" "कहे निपट निरंजन, सुनो आलमगीर; धोबी का कुत्ता, न घर का, न घाट का"। इसी "रीतिकाल" में बेशुमार मठों की स्थापना हुई और बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण हुआ। तात्पर्य यह कि भक्ति आंदोलन तथाकथित रीतिकाल के समय में भी, केवल कवियों और रचनाओं के बाहुल्य के कारण ही नहीं, बल्कि समाज पर उसके प्रभाव के कारण भी अपने पूरे उठान पर था। प्रोफेसर श्रीवास्तव के अनुसार यही ईश्वर-भक्ति, स्वत्व-भक्ति में और आगे चलकर राष्ट्र-भक्ति में परिवर्तित होती दिखाई देती है।
प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य का समापन इस अनुरोध से किया कि इन सभी दृष्टांतों के आधार पर भक्तिकाल की पारम्परिक सीमा-रेखा, संवत 1700 पर, पुनर्विचार आवश्यक है।
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शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट
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अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति उत्तरपूर्व ओहायो शाखा, अमेरिका
द्वारा प्रायोजित, हास्य कवि सम्मेलन २०२२
कार्यक्रम १ जुलाई ,२०२२
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<<<< प्रस्तुति : तसनीम लोखंडवाला
>>>>श्रीमती किरण खेतान, अध्यक्षा: उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
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दीप प्रज्ज्वलन: श्री अजय चड्डा,
डॉ. शोभा खंडेलवाल, श्रीमती धूली राज, श्रीमती किरण खेतान एवं श्रीमती सुशीला मोहनका |
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भारत से आये कवि:
दीपक गुप्ता, तेज नारायण शर्मा एवं अंकिता सिंह |
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अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति उत्तरपूर्व ओहायो शाखा ने १ जुलाई २०२२ रिचफील्ड ओहायो के 'डेज़ इन' में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम कोविड १९ की वजह से दो साल के अंतराल के बाद हो पाया। कार्यक्रम में २०० से ज़्यादा लोग उपस्थित हुए। हाल के बाहर बरामदे में विगत २२ वर्षों के कार्यक्रमों की फोटो प्रदर्शनी कई बोर्ड में लगी हुई थी और दर्शकों को आकर्षित कर रही थी। भोजन एवं कार्यक्रम के बाद कवियों और दर्शकों ने फोटो प्रदर्शनी का आनन्द उठाया। अ.हि.स के चार्टर को भी अच्छी तरह से प्रदर्शनी में रखा गया था। शाम 6.30 बजे स्वादिष्ट रात्रिभोज के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ।
भारत के तीन आमंत्रित कवि तीन राज्यों से आये, आदरणीय श्री दीपक गुप्ता जी, हरियाणा; सुश्री अंकिता सिंह जी, दिल्ली एवं श्री तेज नारायण जी शर्मा, मध्य प्रदेश से इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए आये थे।
भोजन के बाद साढ़े छ: बजे कार्यक्रम की शुरुआत हुई। अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की निवर्तमान अध्यक्षा डॉ. शोभा खंडेलवाल एवं डॉ. तेज पारीक सूत्रधार थे। दोनों ने अतिथियों एवं कवियों का स्वागत किया तथा कवियों का परिचय देते हुए उनको मंच पर आमंत्रित किया।
श्री दीपक गुप्ता: मूल रूप से फ़रीदाबाद के निवासी, दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा करने के बाद व्यापार प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त की। श्री दीपक जी ने सार्वजनिक पदों पर रहते हुए वर्तमान में भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय में कार्य भार संभाला है। श्री दीपक गुप्ता जी, ना केवल छोटे पर्दे का जाना पहचाना नाम हैं अपितु विश्व भर में इनकी हास्य-कवि के रूप में विशिष्ट पहचान है। इन्हें कई सरकारी एवं ग़ैर सरकारी संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है।
सुश्री अंकिता सिंह: ये विश्व भर में अपने गीत और ग़ज़लों के कारण करोड़ों दिलों पर राज करती हैं। अंकिता जी वर्तमान कवयित्री कुल की उन चुनिंदा हस्तियों में से हैं, जिन्होंने सौम्यता और शालीनता से काव्य मंचों पर भाषा का मान बढ़ाया है।
श्री तेज नारायण शर्मा: आदरणीय तेज नारायण शर्मा एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि हैं। तानसेन की जन्मभूमि ग्वालियर में जन्मे तेज नारायण जी जीविका चलाने के लिए तो वकील हैं, परन्तु कवियों के समागम में इन्हें “बेचैन” नाम से जाना जाता है। उनकी ये बेचैनी उनकी विशिष्ट व्यंगात्मक शैली से रची कविताओं में कूट-कूट कर भरी हुई है। तेज नारायण जी ने विश्वभर में अनगिनत मंचों को गरिमा प्रदान की है। तेज नारायण जी बहुत सारी पुस्तकों के लेखक भी हैं तथा इनको प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
दीप प्रज्ज्वलन: अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती सुशीला मोहनका, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान, अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के तत्काल पूर्व अध्यक्ष श्री अजय चड्डा, स्वर्गीय डॉ. स्नेह राज जी, शाखा की अथक स्वयंसेविका का प्रतिनिधित्व (representative) उनकी सुपुत्री श्रीमती धूली राज एवं अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की निवर्तमान अध्यक्षा डॉ. शोभा खंडेलवाल के द्वारा किया गया। तत्पश्चात स्वर्गीय डॉ. स्नेह राज जी को मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।
इसके बाद श्रीमती विभा झलानी ने महाकवि गुलाब खंडेलवाल द्वारा रचित राग बहार पर आधारि “जीवन सफल करो” सरस्वती वंदना का गायन किया।
उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान जी ने सभी का स्वागत किया और इस कार्यक्रम के आयोजन एवं अपनी शाखा द्वारा हिंदी विकास के संदर्भ में किये प्रयासों के बारे में संक्षिप्त विवरण दिया। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति का उद्देश्य हिंदी को बढ़ावा देना, मजबूत करना और समृद्ध करना है। कवि सम्मेलन के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति हिन्दी-भाषा और भारतीय-संस्कृति के प्रचार-प्रसार के अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सार्थक भूमिका निभा रही है। ओहायो की अमेरिकी स्कूलों में हिंदी को दुसरी भाषा के रूप में बढ़ावा देने के लिए, उन्होंने दर्शकों से निवेदन(Appeal) किया कि इस विषय पर अपने विचार साझा करें, साथ ही इस शुभकार्य के लिए उन्होंने दर्शकों से निवेदन (Appeal) किया कि अपना बहुमूल्य समय दें एवं जनता-जनार्दन से आर्थिक सहयोग भी अपेक्षित है।
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती सुशीला मोहनका ने अपने आशीर्वचन में कहा की कविता में समाज को प्रभावित करने की महान शक्ति होती है। कवि अपनी कविता के माध्यम से समाज को सच-झूठ का ज्ञान देता है, बेहतर रास्ता दिखाता है और लोगों को जागरूक करने की क्षमता रखता है। आगे उन्होंने बताया कि आजीवन सदस्य किसी भी संस्था में नीव के पत्थर के सामान होते है इसलिये जैसे जैसे परिवार बढ़ें नये आजीवन सदस्यों का जुड़ना अतिआवश्यक है।
तत्पश्चात सूत्रधार तेज पारीख ने कवि तेज नारायण को मंच पर कवि सम्मेलन का शुभारंभ करने के लिए आमंत्रित किया। तेज नारायण जी ने दीपक गुप्ता को निमंत्रित किया।
श्री दीपक गुप्ता ने हिन्दी एवं हरियाणवी बोली के कविता-रूपी चुटकुलों एवं व्यंग भरे कविता-रूपी संवादों से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया। उनकी रचनाएँ आम आदमी एवं उसकी आम धारणा, पीड़ा, दैनिक दिनचर्या से प्रेरित है। जितना भी समय श्री दीपक गुप्ता मंच पर रहे सारा का सारा हॉल हँसी और तालियों से गूंजता रहा।
सुश्री अंकिता सिंह ने अपने गानों से श्रोताओं का मन मोह लिया। उनकी मधुर आवाज़ एवं कविताओं ने खासकर युवा श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया।
श्री तेज नारायण ने अपने हास्य से भरपूर रचनाओं से श्रोताओं का अत्यधिक मनोरंजन किया। उनकी हास्य-रस एवं राजनितिक-व्यंग्य से रची कविताओं ने सभी को सराबोर कर दिया। श्री तेज नारायण की कविताओं ने ना सिर्फ़ दिलों को पिघलाया बल्कि झँझोरा भी। रात के दस बजे तक तीनों कवियों ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया और मौजूद लोगों ने सभागार को हँसी और तालियों से गुंजायमान कर दिया।
कार्यक्रम के अंत में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा सुश्री ऋचा माथुर ने कवियों, समक्ष एवं परोक्ष रूप से कार्य करने वाले स्वयंसेवकों, सदस्यों, प्रायोजकों, भोजन के प्रबंधक सैफ़्रॉन पैच, डेज़ इन हॉल के प्रबंधक एवं कर्ता, टी. वी. एशिया एवं श्रोताओं को एवं धन्यवाद दिया।
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद कचौड़ी, मिष्ठान और चाय आदि की व्यवस्था थी। कार्यक्रम ४ घंटे से अधिक समय तक चला और लोगों ने भरपूर आनंद लिया। कार्यक्रम के अंत तक सभागार ठहाकों और तालियों की आवाज से गूँजता रहा।
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ग्रूप फोटो :उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के स्वयं सेवक, कार्यकारिणी समिति एवं कवियों की
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अपनी कलम से
" अमरनाथ यात्रा " |
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| द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स |
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साहित्यकार डॉ. उमेश प्रताप वत्स, हिन्दी प्राध्यापक हैं। शिक्षा विभाग हरियाणा में एनसीसी ऑफिसर (कैप्टन) भी हैं। इन्होंने हिन्दी में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। कविता, कहानी, लघुकथा, बाल कविता, आलेख आदि लिखते हैं। ये यमुनानगर, हरियाणा से हैं।
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बम बम भोले, बम बम भोले, जय शिव शंकर, हर हर महादेव के बहुत ही पवित्र, ऊर्जावान, आस्था से भरपूर इन जय घोष से गूंजित पूरा हिमालय प्रति वर्ष आषाढ़ मास में भक्ति में शक्ति के पवित्र सामंजस्यपूर्ण संबंध का साक्षी बनता है।
उत्तर से दक्षिण और अटक से कटक तक भगवान शिव शंकर के भक्त खान-पान, रहन-सहन, भाषा-क्षेत्र आदि सब भेद भुलाकर हिंदुओं के इस सर्वोत्तम पावन तीर्थ पर आकर एक हो जाते हैं। यहां एक ही भाव होता है कि भोले के भक्त सब भाई-भाई। यही भाव कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाता है और इसकी सुरक्षा के लिए कोई भी बलिदान देने को सदैव तत्पर रहता है।
जम्मू-कश्मीर में हिमालय की गोद में सुदूर स्थित एक पवित्र गुफा है। बर्फीले पहाड़ो से घिरी हुई ये गुफा हिंदुओं का सबसे पवित्र स्थल है। यहां पर हर वर्ष प्राकृतिक रूप से बर्फ के शिवलिंग का निर्माण होता है। गर्मियों के कुछ दिनों को छोड़कर यह गुफा हमेशा बर्फ से ढकी रहती है। सिर्फ इन्ही दिनों में लगभग दो मास के लिए यह गुफा तीर्थयात्रियों के दर्शनार्थ खुली रहती है। शिवलिंग के रूप में बर्फानी बाबा के दर्शन करने के लिए देश के सभी क्षेत्रों से लाखों भक्त यहां आते हैं। प्राकृतिक रूप से बर्फ से निर्मित इस शिवलिंग को बाबा बर्फानी के नाम से जाना जाता है।
पिछले दो वर्षों से कोरोना के चलते यह यात्रा नहीं हो रही थी। इस बार अमरनाथ यात्रा 30 जून से शुरु हो रही है जो कि 11 अगस्त रक्षाबंधन तक चलेगी। उल्लेखनीय है कि आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए भारत भर से लाखों लोग यहां आते हैं।
यात्रा के मुख्यतः दो मार्ग हैं। एक बालटाल से दूसरा पहलगाम से। बालटाल से गुफा की दूरी लगभग 14 किलोमीटर हैं जो कि सीधी उतराई और फिर संगम से सीधी कठिन चढ़ाई है अक्सर जो भक्त कम समय में यात्रा पूरी करना चाहते हैं वे इस मार्ग का चुनाव करते हैं क्योंकि इस मार्ग से यदि सुबह 6 बजे यात्रा प्रारंभ की जाये तो बाबा बर्फानी के दर्शन करके भक्तजन देर शाम तक दिन के दिन वापिस आ सकते हैं अथवा शाम को गुफा के पास ठहरकर सुबह वापिस आ सकते हैं। यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टि से भी संदिग्ध है। इसीलिए सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन रोमांच और जोखिम लेने का शौक रखने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है। रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।
जबकि पहलगाम के आगे चंदनबाड़ी से यात्रा प्रारंभ करके शाम तक पंचतरणी तक पंहुचा जा सकता है, जहां रात्रि विश्राम के पश्चात सुबह उठकर ही गुफा के लिए पुनः यात्रा प्रारंभ की जा सकती है। यद्यपि इस मार्ग में भरपूर प्राकृतिक रोमांच होने के कारण भक्त जनों को यात्रा की थकान महसूस नहीं होती। यह रास्ता काफी कठिन है, यहाँ पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत शेषनाग नाम की झील है। इस झील में झांककर यह भ्रम हो उठता है कि कहीं आसमान तो इस झील में नहीं उतर आया। यह झील करीब डेढ़ किलोमीटर लम्बाई में फैली है। किंवदंतियों के मुताबिक शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील के बाहर दर्शन देते हैं, लेकिन यह दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होते हैं। तीर्थयात्री यहाँ रात्रि विश्राम करते हैं। फिर गुफा के लिए आगे की 8 किलोमीटर पंचतरणी व पंचतरणी से पवित्र गुफा के लिए 8 किलोमीटर खड़ी चढ़ाई वाली कठिन यात्रा प्रारंभ होती है। यद्यपि अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुँचते ही यात्रा की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता पार्वती के कहने पर भगवान शिव अमर कथा सुनाने को तैयार हुए थे। इसके लिए उन्होंने एक ऐसी गुफा चुनी थी जहाँ कोई और इस कथा को न सुन सके।
अमरनाथ गुफा में पहुँचने के पहले शिवजी ने नंदी, चंद्रमा, शेषनाग और गणेशजी को अलग-अलग स्थानों पर छोड़ दिया था। भगवान शंकर जब अर्द्धांगिनी पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने सर्वप्रथम छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा। जो आज भी अनंतनाग शहर के नाम से विख्यात है। शिवशंकर ने नंदी को जिस स्थान पर छोड़ा उसे बैलगांव कहा जाता था जो कि बाद में उच्चारण बिगड़कर पहलगाम हो गया। माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा और अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर छोड़ दिया। गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था, जहाँ आज भी शेषनाग झील है। जब मैं 2010 में तीसरी बार अपने परिवार के साथ बाबा बर्फानी के दर्शनों के लिए अमरनाथ यात्रा पर गया तो आकाश छूते ऊँचे पर्वतों के बीच शेषनाग झील में मुझे बहुत विशाल शेषनाग होने की अनुभूति हुई तब मैं यात्रा के मुख्य मार्ग से अलग होकर लगभग डेढ़ किलोमीटर नीचे झील में गया और परिवार सहित किनारे पर स्नान भी किया है। तर्कशील लोगों को शायद इस बात पर संदेह रहेगा। खैर! शेषनाग के बाद भोले बाबा ने गणपति गणेश जी को भी रुकने का आदेश दिया, जो गणेश टॉप नाम से जाना जाता है। कुछ दूर आगे चलकर महादेव नटराज ने तांडव नृत्य किया जिससे जटा में विराज गंगा की पांच धाराएं वहां बहने लगी, जिसे आज भी पंचतरणी के नाम से जाना जाता है। तब सबको यथास्थान छोड़कर पार्वती के संग ऐसे स्थान की खोज करने के लिए चल दिये जहां प्राणीमात्र कोई न आ सके। वर्तमान गुफा ही वह पवित्र स्थान था जहां देवों के देव महादेव शंकर ने देवी पार्वती को अमर कथा सुनाई। ये सभी उल्लेखित स्थल अब भी अमरनाथ यात्रा के मार्ग में आते हैं।
यहाँ यह जनश्रुति भी प्रचलित है कि इसी गुफा में माता पार्वती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी। जिस आसन पर भगवान श्री शंकर बैठे थे उसके नीचे एक तोते का अण्डा पहले से ही था जो कि कालाग्नि को दिखाई नहीं दिया। इसके पश्चात् भगवान श्री शंकर नेत्र मूंद कर एकाग्रचित हो पार्वती जी को अमर कथा सुनाने लगे और पार्वती जी उनके हर वाक्य पर हुंकारा भरने लगीं। धीरे-धीरे पार्वती जी को नींद आने लगी। उसी समय उस अण्डे में से जीव प्रकट हुआ। श्री पार्वतीजी तब तक हूँकारा देते-देते सो चुकी थी। अब उनके स्थान पर तोता हूँकारा देने लगा। जब भगवान शंकर अमरकथा समाप्त कर चुके तो श्री पार्वतीजी की आँखे खुलीं। भगवान शंकर ने उनसे पूछा कि क्या-उन्होंने अमर कथा सुनी है ? श्री पार्वती ने उत्तर दिया कि पूरी अमर कथा नहीं सुनी। इस पर भगवान श्रीशंकर ने पूछा- “तब हुंकारा कौन देता था ? ”
पार्वती जी बोली –“मुझे नहीं मालूम ।”
तब भगवान श्री शंकर ने इधर-उधर देखा तो उनको एक तोता दिखाई दिया जो कि उनके देखते ही देखते उड़ गया। भगवान शंकर उठ कर पीछे दौड़े। वह तोता उड़ता-उड़ता तीनों लोकों में गया लेकिन उसको कहीं जगह नहीं मिली। श्री वेदव्यास की पत्नी अपने घर के द्वार पर बैठी जम्हाई ले रही थी, बस तोता उनके पेट में चला गया। वह उनके गर्भ में रह गया। ऐसा कहा जाता है कि ये बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र शुकदेव कहलाये। अमरकथा सुनने के कारण गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था। कहते हैं कि तोते के अतिरिक्त कबूतर-कबूतरी का जोड़ा भी यह अमरकथा सुनकर अमृत्व को प्राप्त हो गया।
कहते हैं कि गुफा में आज भी पवित्र मन वाले भाग्यशाली श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों को जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। भक्तजनों का उद्धार करने के लिए ही शिव और पार्वती अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए। जिनका आज भी प्राकृतिक रूप से निर्माण होता है।
यहाँ की प्रमुख विशेषता पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। यह अलग बात है कि हेलिकॉप्टर सुविधा के कारण एवं श्रद्धालुओं की अधिक भीड़ के चलते भी साइज का यह नियम खंडित हो जाता है। आश्चर्य की बात है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए।
कुछ विद्वानों का मत है कि अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गड़ेरिया को चला था। आज भी एक चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। वैसे भी यात्रा की व्यवस्था में सेना व अर्धसैनिक बलों के अतिरिक्त मुस्लिम युवकों का भी योगदान रहता है। हजारों मुस्लिम परिवारों के घर के चुल्हें इसी यात्रा के बल पर खचर, टेंट, गाइड, मजदूरी के माध्यम से वर्ष भर चलते हैं।
यद्यपि राजनैतिक कारणों एवं पाक पोषित आतंकी गुटों के चलते अमरनाथ यात्रा का विरोध भी किया जाता है और इसे अवरुद्ध करने के लिए यदा-कदा यात्रा पर घात लगाकर कायराना हमला भी किया जाता है। किंतु इस बार ऐसी मानसिकता के मंसूबों को नेस्तनाबूद करने के लिए चाक-चौबंद व्यवस्था की गई है। इस बार लंगर, चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि हिन्दुस्तान के हर क्षेत्र से आने वाले भक्तजन श्रद्धापूर्वक अपने भोले बाबा के दर्शन कर सकें।
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| द्वारा - श्री सूर्यकुमार पांडेय |
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श्री सूर्यकुमार पांडेय वरिष्ठ कवि, हास्यकार, व्यंग्यकार और लेखक तथा कविसम्मेलनों में भी लोकप्रिय हैं। कई कविताएँ सरकारी और गैर सरकारी पाठ्यपुस्तकों में शामिल हैं। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से अनेक बार पुरस्कृत सम्मानित। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के आयोजनों में संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के कविसम्मेलनों में प्रतिभागिता। इन्हें 2016 में अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के “अंतरराष्ट्रीय व्यंग्य शिरोमणि” से सम्मानित किया गया।
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अट्टहास तो दूर, एक उस स्मित के लिए तरसना।
ताने कसना सीख गए, हम भूल चुके हैं हँसना।
हंसी, ठिठोली और चुहल, जीवित समाज के लक्षण।
ये अवसाद विमोचक हैं, करते विषाद का भक्षण।
हा-हा, ही-ही, हे-हे, हो-हो, बात-बात पर ताली।
मुखड़े पर मुसकान नहीं, अब क्या होली-दीवाली।
निर्मल हास्य, ठहाके; जो देते थे कभी सुनाई।
लोगों का मानना कि उनको लील गई महंगाई।
व्यंग्य-विनोद विदा जीवन से, हास्य-बोध भी चंपत।
नव आभासी हंसी नित्य करती मिलती है स्वागत।
अंतर में दूरियां आ बसीं, मन में घृणा बसी है।
ढूंढ़ रहा हूं, कहां गई बचपन की मुक्त हंसी है?
यह तनाव का मौसम, झड़ते पात ठहाकों वाले।
प्राणों के पादप पर लिपटे, व्याल विषैले-काले।
कृत्रिम और औपचारिक हैं मिलन आपसी सारे।
नहीं सहजता और सरलता रहती साथ हमारे।
मिलना किसी व्यक्ति का हमसे, अब निःस्वार्थ न दर्शन।
अपने निर्मित दर्पण में सब खोज रहे आकर्षण।
निरुद्देश्य जो मिलने की रहती थी ललक, न बाकी।
एक विषैला गगन और हम विहग हुए एकाकी।
नयनों का हंसना, अधरों का हंसना, कहां गए अब।
गांवों का हंसना, शहरों का हंसना बिला गए सब।
हंसी प्रश्न करती है लेकिन अभियोजन के डर से-
थोड़ी सहमी और दबी-सी, नहीं निकलती घर से।
कहां कैद हो गई चुलबुली सात्विक खरी-मसखरी?
कहां गुप्त हो गई चुटकुलेबाजी, तंज, मिमिक्री।
'फन' पर बैठा आज नाग है अपने फन फैलाए।
हंसी दब गई है चीखों के नीचे, रंज छिपाए।
पीड़ा को मेटना सिखाती हंसी, धर्म यह उसका।
वह घुटकर मर जाएगी यदि अधर एक भी सिसका।
खुल कर हंसो, डरो मत, चाहे सम्मुख काल खड़ा हो।
उस पर हंसो कि जो समाज का शोषक हो, तगड़ा हो।
उस पर हंसो कि जिस पर खुश रखने की जिम्मेदारी।
उस पर हंसो कि छीनी जिसने सारी हंसी तुम्हारी।
बुक्का फाड़ हंसी तुम्हारी, सुनकर वह डरता है।
कैद करे किस तरह हास-परिहास, जुगत करता है।
उन पर हंसो कि जो हैं थोथे गाल बजाने वाले।
उन पर हंसो कि जो दुनिया में हुए रुलाने वाले।
हंसी एक हथियार, व्यंग्य की धारयुक्त यह असि है।
हंसी शस्त्र है, जिसमें परिवर्तन विकास की मसि है।
विस्मृत न हों हास्य रस, बतरस और चकल्लसबाजी।
गपबाजी, बतकही के मजे, प्राणवायु हैं ताजी।
हंसी बांधने का प्रयास जो करता, वह रोता है।
हंसना भूल गया समाज, वह शव समान होता है।
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द्वारा- श्री पुष्पेश कुमार
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श्री पुष्पेश कुमार ‘पुष्प’ बाढ़, बिहार से हैं। विगत बीस वर्षों से साहित्य की सेवा में संलग्न हैं। कहानी, लघुकथा, लेख, बाल कहानी आदि लिखते हैं।
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अनाथ बिरजू के साथ ईश्वर ने बड़ा क्रूर खेल-खेला था। बचपन में ही उसके माँ-बाप उसे अकेला छोड़ इस संसार से विदा हो गये। वही बिरजू का चेहरा इतना कुरूप था कि लोग उसे देखना भी पसंद नहीं करते थे। वह लोगों की नजरों में घृणा का पात्र था। लेकिन इन बातों को दरकिनार कर वह भी जीना चाहता था और जीवन में कुछ करने की चाह रखता था।
वह बचपन से ही दुखों को झेलता और लोगों की तानें सुनने के बावजूद काफी संघर्ष के बाद मैट्रिक पास कर गया था। अब उसे अपनी जिंदगी जीने की इच्छा जागी। उसके मन में भी एक अच्छी और सुंदर पत्नी पाने की लालसा जगाने लगी थी। लेकिन उसके जैसे कुरुप की इच्छा कैसे पूरी होती! न तो उसके पास धन था और न रुप। यही सोचकर उसने ‘निर्बल के बल राम’ के शरण में चला गया। वह रोज सुबह-शाम मंदिर में जाने लगा। इसी आस्था-भक्ति के बीच उसकी निगाह एक खूबसूरत युवती से जा टकराई। वह उसे गौर से देखता और वह युवती भी उसे गौर से देखती। इसी बीच उसने अपने मन की बात उसके सामने रख दी। युवती भी मुस्कुराकर अपनी सहमति दे दी।
एक दिन बिरजू ने उससे पूछा-“तुम्हारा नाम क्या है? ”
वह शरमाते हुए बोली- “हेली ! ”
“और तुम्हारा। ” हेली ने पूछा
“बिरजू।” वह बोला।
उसने पूछा- “मैं तो कुरुप हूँ , फिर तुमने मुझे पसंद क्यों की ? ”
हेली बोली–“तुम्हारी आँखों में मेरे लिए सच्चा प्यार झलकता था। मेरा इस दुनिया में है ही कौन ! हर कोई तो मुझे गंदी निगाहों से देखता था। उन आँखों में प्यार नही बल्कि वासना भूख नजर आती थी। लेकिन तुम्हारी आँखों में मेरे लिए सच्चा प्रेम झलकता था। प्यार सूरत से नहीं सीरत से की जाती है। ”
और वे दोनों एक दिन उसी मंदिर में शादी के बंधन में बंध गये। हेली उसकी जिंदगी में एक नई सुबह लेकर आयी थी। बिरजू को सरकारी नौकरी लग गयी।
उसने एक मोहल्ले में दो कमरों का मकान किराये पर ले लिया, लेकिन उस मोहल्ले के लोग उसके सुखी दांपत्य जीवन से ईर्ष्या करते थे। लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें किया करते थे। बिरजू लोगों की बातों से बेखबर अपनी प्यार भरी दुनिया में खोया रहता, किंतु उसे कहाँ पता था कि मोहल्ले के कुछ मनचले उसकी पत्नी के ऊपर अपनी गंदी निगाहें गड़ाये हुए हैं।
वह तो दिनभर अपने ऑफिस के काम में लगा रहता और शाम को आते ही कमरे में कैद हो जाता। एक दिन जब वह ऑफिस से लौटकर घर आया, तो दरवाजे पर दस्तक दिया। लेकिन उसके बार-बार दस्तक देने के बावजूद हेली ने दरवाजा नहीं खोला, तो वह किसी अनहोनी की आशंका से काँप गया। वह जोर – जोर दरवाजे पर धक्का देने लगा क्योंकि उसकी पत्नी हेली उसके बच्चे की माँ बनने वाली थी। यह देखकर आसपास के लोग भी इकट्ठा हो गये। लोगों ने जोर लगाकर दरवाजे को तोड़ दिया। भीतर का वीभत्स दृश्य देखकर वह हतप्रभ रह गया। सामने बिस्तर पर हेली की अस्त-व्यस्त अवस्था में लाश पड़ी थी। तभी किसी ने उसके मृत शरीर पर कपड़ा डाल दिया।
यह देखकर वह भयावह रुप से चीख उठा- “हाय रे, मार डाला मेरी हेली और मेरे अजन्मे बच्चे को ! मैंने क्या बिगाड़ा था किसी का जो मेरी हँसती-खेलती दुनिया उजाड़ दिया ? अरे निर्दयी जरा भी तरस न आया इस अजन्मे बच्चे पर ! वासना के भूखे भेड़ियों ने मेरी खुशियों की बगियाँ को उजाड़ दिया। ”
वह धड़ाम से जमीन पर गिर गया और यह सोचने पर विवश हो गया कि यह कैसा समाज है ? आसपास इतने लोगों के रहते दिन के उजाले में मेरी पत्नी हेली का बलात्कार और गर्भपात हुआ। वह कितना चीखी-चिल्लायी होगी, लेकिन कोई उसकी मदद के आगे नहीं आया। यह तो पूरा का पूरा समाज अंधा और बहरा है। एक अबला के साथ जुल्म होता रहा और लोग मौन धारण किये रहे। कितनी मतलबी है यह दुनिया। ईश्वर तूने ऐसा मतलबी संसार क्यों बनाया ? जहाँ किसी के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं रखता। मेरी खुशियाँ लोगों को रास क्यों नहीं आयी ? बचपन से लेकर आज तक दुखों को झेलने वाला बिरजू आकाश को निहारता शून्य में खो गया।
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बाल खंड (किड्स कार्नर)
" सदा सिखातीं ज्ञान किताब" |
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| सदा सिखातीं ज्ञान किताब |
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पुस्तक कहते, इन्हें किताब।
सदा सिखातीं ज्ञान किताब।।
बीता कल हो, वर्तमान हो
दुनिया हो या आसमान हो
सबके अक्षर - अक्षर गढ़तीं
हितकारी हैं शान किताब।।
खुशियों का संसार लिए हैं
मानव के उपहार लिए हैं
अंधकार अज्ञान मिटातीं,
सबका ही सम्मान किताब।।
फूलों - सी कोमल होती हैं
सागर से मोती देती हैं
बातें करतीं नई निराली,
कोयल का हैं गान किताब।।
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| द्वारा - डॉ. राकेश कुमार |
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डॉ. राकेश कुमार गुप्त सेवानिवृत्त अधिकारी उत्तर प्रदेश, इंटेलीजेंस विभाग हैं। वर्तमान में लेखन और समाज सेवा में लगे हैं। अभी निःशुल्क चिकित्सा योग, एक्युप्रेशर और आहार-विहार द्वारा समाज सेवा में लगे हैं।
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मित्र सभी की बनना चाहतीं
मन से पढ़ते सबको भातीं
हरी चूनरी धरती - सी यह,
झरनों - सी हैं तान किताब।।
इनमें है पूरा भूगोल
विज्ञानों में हैं अनमोल
सैर कराएँ सभी जगह की ,
आँखें होतीं, कान किताब।।
परियों की हैं गीत, कहानी
दादा, दादी कहते नानी
सभी पढ़ेंगे, सभी लिखेंगे,
हम सबकी हैं प्राण किताब।।
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| द्वारा - श्रीमती प्रतिभा नैथानी |
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श्रीमती प्रतिभा नैथानी, देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। भारतीय साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ-साथ कई अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में भी समय-समय पर लेख, कहानियाँ इत्यादि प्रकाशित होते रहते हैं। आप आकाशवाणी देहरादून में कार्यक्रम प्रस्तोता भी हैं।
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नन्हीं के गाँव में एक घर के आगे बड़ा-सा खलिहान था । शाम के समय उसके सारे संगी-साथी वहाँ जमा होकर खेलते थे। खलिहान वाले घर की लड़की भी उन बच्चों में शामिल थी। नाम था गंगा। गंगा उम्र में सब बच्चों से बड़ी थी। रिश्ते में वह किसी की बुआ लगती थी तो किसी की दीदी। लेकिन खेल में सारे बच्चे उसे गंगा कहकर ही बुलाते थे।
गंगा के घर में बहुत सारे लोग थे। उनमें बस एक ही ऐसी थी जो नन्ही के दिल में हर वक्त बैठी रहती - गंगा की अंधी बुआ। ज्यादा वृद्ध तो न थीं, लेकिन आंगन के एक कोने में लाचार सी बैठी रहने के कारण वृद्धा ही नजर आती। उस घर से आगे से गुजरने वाला लगभग हर व्यक्ति उन्हें आवाज देता हुआ जाता था। उनकी आवाज ज्यादातर औपचारिक ही हुआ करती थी, लेकिन बुआ आत्मीयता से प्रत्येक को जवाब देना नहीं भूलती थी। हालांकि उनका दिन गुजरने वालों की आहटें सुनते और हालचाल बताने में बीत जाता, मगर किसी से भी इत्मीनान से बात करने को वह तरस ही गई थीं ।
गंगा के परिवार से कोई उसे आवाज देता तो गंगा एक ही आवाज में भाग पड़ती। चाहे उस वक्त वह खेल में जीत ही क्यों न रही हो। बुआ की आवाज को वह प्रायः सुनकर भी अनसुनी कर देती। एक शाम बुआ गंगा की रट लगाए थी, मगर गंगा को खेल छोड़कर जाना गवारा न हुआ। उसकी जगह नन्ही उनके पास जाकर खड़ी हो गई। बुआ ने चौकन्नी हो कर इस नई आहट की तरफ गर्दन घुमा दी। बोली '-कौन ?' नन्ही अपना नाम बता कर चुप खड़ी रही। बुआ ने उसके सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेर दिया।
उस दिन से नन्ही रोज शाम कुछ देर के लिए आँगन में बैठी बुआ के आगे जाकर खड़ी हो जाती थी। ज्योतिहीन आँखों में रात-दिन का कोई फर्क तो नहीं होता, लेकिन नन्हीं के आने से शाम का पता उन्हें जरूर चल जाता था। बोलते-बतियाते बुआ जान गई कि उनकी यह छोटी हम दर्द रामेश्वरी की पोती और सोहन भाई की छोटी बेटी है जिसका घर गाँव में सबसे ऊपर था। नन्ही का हाथ पकड़कर जब वह पूछती कि सूरज डूब रहा है क्या तो नन्ही के यह पूछने के पहले कि आपको पता कैसे चला, बुआ खुद ही बता देती थी - 'अरे, मैं हमेशा से थोड़ी ना अंधी थी'। बुआ से पता चला कि कई बरस पहले जंगल में लकड़ी काटते समय एक ऊंचे पेड़ से गिरने के कारण उनके सिर पर लगी गहरी चोट ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली थी।
नन्ही अब बुआ की खाली और उदास दिनचर्या का ज़रूरी हिस्सा बन गई। हर शाम नन्ही से बात करते वह अपने चेहरे पर हाथ फिराकर अपनी उम्र का अंदाजा लगाना नहीं भूलती। एक जमाने से उन्हें अपने जीवित होने का बोध भी शायद जाता रहा था। घर के आँगन के कोने में मीठी नीम के छोटे-घने पेड़ के नीचे बिछी मैली, गंधाती, पुरानी दरी उनका स्थाई ठिकाना बन चुकी थी। हाथ पकड़कर उन्हें वहाँ तक पहुँचाने में घर के लोगों को उनके कारण होने वाले कष्टों का अहसास था। आँखें फूटीं तो कान जैसे और ज्यादा तेज हो गए उनके। बात-बात पर उनको कोसती घर के लोगों की फुसफुसाहट नश्तर की तरह उनके दिल में उतरती थी। उनकी काली आँखों में अब एक ही सपना बाकी रह गया था। जल्दी इस दुनिया से कूच कर जाने का सपना।
नन्हीं के आने के बाद बुआ को खुद अपनी जिंदगी में बदलाव महसूस होने लगा था। उनकी सोयी हुई कोमल भावनाएं करवट लेने लगी थीं। कभी उनके माथे पर उठा गूमड़ सहलाती नन्ही में उन्हें अपनी दिवंगत माँ नजर आती थी। कभी जंगल में शेर, भालू से उनकी मुलाकात के किस्सों पर नन्ही उनसे लिपट जाती तो अविवाहिता बुजुर्ग बुआ को अपनी गोद भर जाने का एहसास अंतस तक भिंगो देता था। घर से खाने-पीने की कुछ चीजें लाकर बुआ के मुँह में जबरदस्ती डालती नन्ही और अपनी रूखी-सूखी दो रोटियों में से एक रोटी नन्हीं के लिए बचा कर रखने वाली बुआ हमउम्र सहेलियों-सी जान पड़तीं। इस तरह नन्हीं और बुआ के बीच एक अनोखा, अनकहा रिश्ता आकार लेने लगा था।
कुछ महीनों बाद नन्हीं के दादा का पहला श्राद्ध पड़ा था। गाँव के अनेक लोग न्यौते गए, मगर उनमें से जिस एक गंगा की बुआ को बुलाने की दादी की बड़ी इच्छा थी, उनको बुलाकर लाने के लिए नन्ही का कोई भाई-बहन तैयार नही हुआ।नन्हीं ने कहा - 'मैं जाऊंगी दादी । मैं लेकर आऊंगी उन्हें।'
नन्ही छोटी थी। गाँव में सबसे ऊपर स्थित उनके घर तक के पथरीले रास्ते पर नेत्रहीन वृद्धा को नन्ही ला पाएगी, इसमें दादी को शक था। फिर भी नन्ही भाग कर गई। जमाने बाद पहली बार अपने आसन से हिलने का मौका मिला था बुआ को। घरवालों को बताए बिना ही वह जिस हाल में थी उसी हाल में नन्ही के साथ चल दी। बताने का कोई अर्थ भी तो नहीं था। नन्ही की छोटी हथेली पकड़कर वह उबड़-खाबड़ रास्ते पर धीरे-धीरे डग भरने लगीं। नन्ही तो रोज ही उस रास्ते से गुजरती थी। बुआ भी कभी-ना-कभी उससे गुजरी ही होंगी। लेकिन यह दौर और था। अपनी थकी देह से नन्ही की कोमल हथेली के सहारे नन्ही के घर तक पहुँचने में उन्हें लंबा वक्त लगा।
कई प्रकार की मौसमी सब्जियां, पहाड़ी ककड़ी का रायता, खीर, पूरी, दाल और मीठे चावल का स्वादिष्ट भोजन और अंत में ब्रह्म भोज की दक्षिणा। नन्ही की दादी ने गंगा की बुआ के स्नेह-सम्मान में कोई कमी ना रखी। कुछ घंटे के विश्राम और शाम की चाय के बाद बुआ को उनके घर पहुँचाने की जिम्मेदारी फिर नन्ही पर आन पड़ी। नन्ही ने फिर खुशी-खुशी उनका हाथ थामा। दोबारा उस रास्ते पर लौकी, तुरई, ककड़ी, कद्दू के सफेद, पीले, नारंगी फूलों को देखते-गिनते उस छोटा-से सफर ने गंगा की बुआ के खुरदरे हाथों पर सदा के लिए नन्ही की मुलायम हथेलियों का स्पर्श टांक दिया।
उसके बाद नन्हीं के पिता का स्थानांतरण गाँव से दूर किसी शहर में हो गया था। नये स्कूल में दाखिले के साथ नन्ही का पुराना नाम भी जैसे गांव में ही छूट गया । अब वह नमिता थी। गाँव में अरसे तक दोबारा जाना नहीं हुआ। पढ़ाई पूरी करने के बाद नन्हीं की शादी भी हुई। उसकी शादी में आए गाँव के लोग भी उसे नमिता नाम से ही पुकार रहे थे। उसे बेसाख़्ता याद आई गंगा की बुआ। शादी में वह शामिल होतीं तो उसे नन्ही कहने वाला कोई मिल जाता।
विवाह के लगभग दो साल बाद नमिता को गाँव से चचेरी बहन की शादी का निमंत्रण आया। नमिता गर्भवती थी। डॉक्टर के इतना लंबा सफर के लिए मना करने के बावजूद नमिता पति को मनाकर गाँव के लिए निकल पड़ी। पति को गंगा की बुआ के बारे में बताते हुए नमिता ने कहा - 'आप उनसे जरूर मिलना और अपनी तरफ से उनके हाथ में कुछ रुपए-पैसे भी रख देना।'
विवाह समारोह के बाद वापसी में वे दोनों गंगा की बुआ से मिलने गए। बहुत बूढ़ी हो चुकी थी। याददाश्त भी जाने लगी थी। मिलकर उन्हें नन्हीं की याद दिलाई। बुआ के बहुत मना करने के बाद भी कुछ पैसे उनके हाथ में रख दिये। बुआ का मन हुआ कि उन पैसों से बहुत सारी चीजें खरीदवा कर वे नन्हीं के लिए भिजवा दें। बरसों पहले उनके जीवन से चली गई नन्हीं को अपने सामने पाकर भी उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था शायद। बार-बार एक ही बात पूछती थी - 'नन्ही कैसी है ? मुझे याद करती है कि नहीं?' उसके पति द्वारा नन्ही के नमिता हो जाने की बात बताने पर भी बुआ को यकीन नहीं आया कि उनकी छोटी नन्ही कभी नमिता भी बन सकती है। बढ़ती उम्र का असर था। उन्होंने बहुत सारी दुआएं भेजीं नन्ही के लिए। नमिता को खुशी थी कि बुआ अभी जीवित हैं और उसे बहुत याद करती हैं।
कुछ बरस बाद नमिता को पता चला कि छोटे-से घर में नारायण बलि न करवानी पड़ जाए, इस भय से बुआ के आखिरी समय में घरवाले उन्हें आंगन से हटाकर गाँव के एक खंडहर में अकेली छोड़ आए थे। हड्डियों के दर्द से रोती-कलपती बुआ अपने सिर के बाल नोच-नोच कर मरीं।
हर बरस आश्विन माह में पड़ने वाले श्राद्ध पक्ष के लौकी, तुरई, कद्दू के रंग बिरंगी फूलों वाले मौसम में नमिता को गंगा की बुआ की याद आती है। तब भी जब पत्तलों में खीर, पूरी, सब्जी, रायता,कचौड़ी और मीठे चावलों का भोग पितरों के लिए रखा जाता है।
एक बार वह बेमौसम तब याद आई जब नमिता हॉस्पिटल में भर्ती थी। उसके गर्भाशय के ट्यूमर का ऑपरेशन होने वाला था। शल्य चिकित्सा के बाद शरीर की हालत उस नवजात शिशु-सी हो जाती है जिसे छोटी-छोटी बातों के लिए भी दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है। सब कुछ कितना कष्टप्रद! तब उसे शिद्दत से बुआ की व्यथा का एहसास हुआ था।
तीन दिन बाद आज़ नमिता पहली बार खड़ी होने की कोशिश कर रही थी तो लुढ़क गई। फिर जैसे किन्हीं हाथों ने उसे संभाल कर खड़ा कर दिया। गंगा की बुआ के खुरदरे हाथों का स्पर्श अपनी देह पर उसने बहुत साफ-साफ महसूस किया। वह समझ गई कि इस दुनिया से जाने के बाद बुआ को दिखाई भी देने लगा है और वे अपनों को पहचानने भी लगी हैं।
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| "भारत की १५वीं राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू का स्वागत " |
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महामहिम द्रौपदी मुर्मू भारत की
१५वीं राष्ट्रपति, भारत में सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचने वाली दूसरी महिला हैं।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की एवं सभी प्रवासी हिंदी प्रेमियों की ओर से हार्दिक बधाई एवं उनके कार्यकाल की सम्पूर्ण सफलता के लिए अग्रिम शुभकामना। |
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| भारत की ९४ साल की महिला एथलेटिक्स चैंपियन |
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| ९४ वर्षीय महिला भगवानी देवी डागर ने फिनलैंड में कल विश्व मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें उन्होंने एक स्वर्ण और दो कांस्य पदक जीते |
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| "संवाद" की कार्यकारिणी समिति |
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
. सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
. सहसंपादक – डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP, dr.archana2309@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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| प्रबंध सम्पादक |
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- सुशीला मोहनका
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्य एवं सदस्याओं को,
रथ यात्रा, बकरीद तथा गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और
वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
Covid-19 कारण विगत दो वर्षों से अ.हि.स. के द्वारा हास्य कवि सम्मेलनों के आयोजन भी नही
हो पा रहे थे। इस बार ३ जून से १० जुलाई २०२२ तक में अमेरिका में २० स्थानों पर कवि सम्मेलन हो गये हैं। आमंत्रित कवि गण अमेरिका यात्रा समाप्त कर भारत वापस लौट गये। आशा करती हूँ कि आप में से अधिकांश हिंदी प्रेमियों ने कार्यक्रम देखें होंगे, अपनी प्रतिक्रिया भेजने का कष्ट करें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी
है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी । ‘जागृति’ की सातवीं कड़ी शनिवार, १३ अगस्त २०२२ को दिन में ११:०० बजे (EST) से अमेरिका में और १३ अगस्त २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि
इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि अपने यहाँ के हिन्दी
प्रेमियों तक अ.हि.स. द्वारा १३ अगस्त २०२२ को होनेवाले कार्यक्रम की सूचना दें। यह आपका
पावन कर्तव्य और समय की माँग भी है।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया
गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं
को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य
प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
अ.हि.स. की सभी स्थानीय समिति के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं से विशेष आग्रह है कि अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़
दोनों रूपों में भेजें साथ ही कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित
की जा सके।
आप सभी विशेष निवेदन है कि ‘संवाद’ का जून २०२२ का अंक अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में
आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें। सहयोग की अपेक्षा के साथ,
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति -नीति से कोई संबंध नहीं है।
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