JANUARY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
जनवरी 2024, अंक ३१ | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों और हिन्दी प्रेमी परिवारों का अभिवादन है।
सभी को नये वर्ष की शुभकामनायें। जनवरी महीना हमें बहुत से खास दिनों और त्योहारों की यादें भी दिलाता है।भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए यहाँ नयी फसल से नयी जौ और गेहूँ की बाली को अग्नी देव को मकर संक्रान्ति में समर्पित करने की परम्परा है। नया वर्ष आपके लिए, आपके परिवार के लिए, समाज के लिए और देश के लिए शुभ और मंगलमय हो। सभी पाठकों को लोहड़ी, पोंगल, बिहू, दही-चूड़ा, खिचड़ी, उत्तरायण, मकर संक्रान्ति आदि अनेक नामों से पूरे भारत में मनाये जाने वाले नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।
भारत के “गणतंत्र दिवस” की सभी भारतीयों को बधाई ।
विश्व हिन्दी दिवस भी १० जनवरी को था और हमें भारत के साथ-साथ विश्व में अपनी भाषा के प्रति सचेत-सजग करता है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार की तरफ़ से इस अवसर पर अमेरिका में कई प्रोग्राम आयोजित किए गये थे।
इंडियाना शाखा द्वारा आयोजित हास्य कवि सम्मेलन कार्यक्रम जनवरी १४ को दिन में संपन्न हुआ। यह प्रोग्राम आभासी हुआ और अमेरिका एवं भारत से दर्शक जुड़े। प्रस्तुतिकर्ता ५ कवि भारत से थे। नार्थ ईस्ट ओहायो शाखा का प्रोग्राम जनवरी १४, रविवार की शाम में हुआ और ये इन पर्सन और ऑन लाइन का मिश्रण था। स्थानीय प्रतिभाओं के साथ-साथ विश्व के दूसरे जगहों से भी भागीदारी थी। ये प्रयास शाखा ने पहली बार किया और काफ़ी सफल रहा। डलास शाखा का प्रोग्राम जनवरी २७ को सफलता पूर्वक संपन्न हुआ।
सभी प्रोग्राम बहुत ही सफल रहे। विस्तृत समाचार जल्द ही प्रसारित होगा। मैं शाखाओं के स्वयं सेवकों को बहुत बहुत धन्यवाद देती हूँ। तकनीकी प्रयोग के लिये विशेष धन्यवाद , क्योंकि अलग देशों से लोग जुड़ सकें।
मैं अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी आजीवन सदस्यों, न्यासी समिति एवं ट्रस्टी का धन्यवाद करती हूँ कि आप सभी ने साल २०२४-२५ के लिये मुझे अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की अध्यक्षा बनने का और अपनी सेवा समिति को अर्पित करने का मौक़ा दिया। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के नये कार्यकारिणी समिति, ऑफिसरों और स्वयंसेवकों, सभी का स्वागत करती हूँ। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं,ऑफ़िसरों और स्वयं सेवकों का भी अभिनंदन है।
सभी के विचारों एवं सुझावों का स्वागत है। कृपया आप मुझे ईमेल या कॉल करें। अगर आप किसी तरह समिति की सहायता कर सकते हैं या करना चाहेंगें तो कृपया हमें बतायें ।
धन्यवाद,
शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्षा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति २०२४-२५
ईमेल: shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन - 2024
अमेरिका के महानगरों में 12 अप्रैल से 27 मई तक
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हूस्टन शाखा आगामी कार्यक्रम
फ़रवरी 16, 2024
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अपनी कलम से
"परदेश और अपने घर-आँगन में हिंदी"
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द्वारा - श्री बृजेन्द्र श्रीवास्तव
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बृजेन्द्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’ कानपुर, उत्तर प्रदेश से हैं। इन्होने एम.ए.; बी.एड.; यूजीसी नेट (हिंदी); आई.जी.डी.; एन.ए.सी.; पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा; एम.बी.ए. की शैक्षिक योग्यता प्राप्त की हैं। इन्हें गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, कविताएँ, हास्य-व्यंग्य और सम-सामयिक लेख लिखने का शौक है।
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परदेश और अपने घर-आँगन में हिंदी
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था- "भारत के युवक और युवतियाँ अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ खूब पढ़ें मगर मैं हरगिज़ यह नहीं चाहूँगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाए या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाए अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊँचे से ऊँचा चिंतन नहीं कर सकता।" वास्तव में आज उदार हृदय से,गाँधी जी के इस विचार पर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है। हिंदी भाषा, कुछ व्यक्तियों के मन के भावों को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि, यह भारतीय संस्कृति, सभ्यता, अस्मिता, एकता-अखंडता, प्रेम-स्नेह-भक्ति और भारतीय जनमानस के विचारों को अभिव्यक्त करने की भाषा है। हिंदी भाषा के अनेक शब्द वस्तु बोधक, विचार बोधक तथा भावबोधक हैं ये शब्द संस्कृति के भौतिक, वैचारिक तथा दार्शनिक-आध्यात्मिक तत्वों का परिचय देते हैं। इसलिए कहा गया है- "भारत की आत्मा को अगर जानना है तो हिंदी सीखना अनिवार्य है।"
विश्व-पटल पर बढ़ रही भारत की चमक-दमक, संस्कृति-सभ्यता के माध्यम से हिंदी का बोलबाला दुनिया में बढ़ रहा है| G-20 के महासम्मेलन का आयोजन भारत के दिल दिल्ली में सौन्दर्यपूर्ण तरीके से हुआ जहाँ दुनिया की महत्त्वपूर्ण हस्तियों ने भारत की संस्कृति-सभ्यता का लोहा माना। विश्व-ग्राम में बदल रहे सम्पूर्ण विश्व-जगत को आज भारतीय संस्कृति-सभ्यता, धर्म-योग, सुरक्षा, अर्थव्यस्था और बाजार की चमक ने सम्मोहित कर दिया है। भारतीय फिल्मों, कलाकारों, पेशेवर कामगारों, धार्मिक गुरुओं, समाज-सुधारकों, राजनेताओं को चाहने वालों की संख्या करोड़ों में है तथा इन मनीषियों ने हिंदी भाषा के माध्यम से वैश्विक परिदृश्य में भारत को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर किया है। विश्व में नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, यमन, युगांडा, सिंगापुर,न्यूजीलैंड, जर्मनी आदि; लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में हिंदी वृहद् रूप में बोली, समझी या पसंद की जाती है। विश्व के अनेकों विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में हिंदी भाषा और साहित्य को प्रमुख स्थान प्राप्त है।
हिंदी भाषा में साहित्य-सृजन की दीर्घ परंपरा है और इसकी सभी विधाएँ वैविध्यपूर्ण एवं समृद्ध हैं। सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, रसखान, जायसी, भारतेंदु, निराला, महादेवी, अज्ञेय, महावीर, जयशंकर, प्रेमचंद आदि ने अपनी कलम-कारी से इस भाषा के साहित्य को वैश्विक पटल पर स्थापित किया है तथा विश्व को साहित्यामृत का पान कराया है| "रामचरितमानस" के बिना हिन्दू जनमानस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। हिंदी भाषा पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भों, सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक विषमताओं तथा आर्थिक विनिमय की संवाहक है। हिंदी भाषा सरल-सहज दूसरी भाषा के शब्दों को अपने में समाहित करने वाली है। आधुनिक युग में हिंदी का तकनीक के क्षेत्र में भी वृहद् योगदान है| हिंदी भाषा में ई-मेल, ई-बुक, सन्देश लिखना हो या इंटरनेट और वेब जगत में कुछ खोजना, हिंदी भाषा में बोलकर कम्प्यूटर पर टंकण करना आदि सब कुछ उपलब्ध है। भारतीय जनसंचार जगत में हिंदी ही श्रेष्ठ भाषा है। भारत में आज भी मनोरंजन जगत में हिंदी का ही बोलबाला है। हिंदी फ़िल्में, आज भी वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषियों को जोड़ने का काम करती हैं तथा दूसरों को हिंदी भाषा सीखने की प्रेरणा देती हैं। भारत की संस्कृति, धर्म, ज्ञान-विज्ञान एवं भाषा सम्पूर्ण विश्व को विश्व-बंधुत्व का पाठ पढ़ाती है तथा उनको अपने में आत्मसात करती है।
विश्व की बड़ी-बड़ी महाशक्तियाँ, बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ, बुद्धिजीवी विचारक-चिन्तक, समाजसेवी, आज उभरती हुई महाशक्ति भारत का साथ पाने को बेक़रार हैं। भारत से राजनीतिक, व्यवसायी या आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने के लिए ये महाशक्तियाँ यहाँ की संस्कृति-सभ्यता, भाषा और क्षेत्र को महत्व दे रहीं हैं किन्तु, हिंदी की यह विडम्बना है कि वैश्विक स्तर पर सम्मान पाने पर भी, भारत की राजभाषा होने पर भी, भारत को एकता के सूत्र में पिरोने वाली भाषा होने पर भी, आज अपने देश में अपनों की ही उपेक्षा का शिकार है। हमारे देश के कुछ तथाकथित ज्यादा पढ़े-लिखे राजनीतिक-बुद्धिजीवी-समाजसुधारक समझे जाने वाले लोगों की “पाश्चात्य चरण-वंदना नीति” एवं “मत-विभाजन नीति” ही हिंदी की उपेक्षा का कारण है। क्या हमारे देश में किसी राजनेता /के द्वारा लाखों की भीड़ को अंग्रेजी भाषा में संबोधित/ कर पाना संभव है? क्या धार्मिक/ प्रवचन, पूजा-पाठ, खेत-खलिहान-पंचायत, बाजार-यातायात, गाँव-कस्बों-शहरों, गरीब-किसान-मजदूर या देश की अधिकांश आबादी जो अभी विकास से कोसों दूर है; क्या इन सबसे अंग्रेजी भाषा में सामंजस्य बिठा पाना संभव है? क्या देश की शिक्षा व्यवस्था, सरकारी तंत्र, न्यायालय, प्रतियोगी परीक्षाओं, कार्यालयों, बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, सूचनाओं आदि में अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व स्थापित कर राष्ट्रभाषा हिंदी और अंग्रेजी जानने वालों के बीच वर्ग-भेद और वैमनस्य का संबंध स्थापित नहीं किया जा रहा है? विश्व के बहुत से ऐसे राष्ट्र हैं जो अपनी राष्ट्रभाषा के माध्यम से ही विश्व को अपनी श्रेष्ठता का लोहा मनवा रहे हैं तो विश्व-गुरु होने का दंभ भरने वाले हम क्यों नहीं? विनोबा भावे ने कहा था, “मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्ज़त न हो, यह मैं नहीं सह सकता। “आखिर हम कब तक विदेशी दासता को सहते रहेंगे? आखिर कब हम वैचारिक रूप से स्वतंत्र होंगे? ‘बापू’ ने कहा था, “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है|” आखिर हम कब तक गूँगे बने रहेंगे? वास्तव में हिंदी का अपमान देश की सनातन संस्कृति का, देश के संविधान का तथा सम्पूर्ण भारतीय जनमानस का अपमान है। आखिर किसी विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता नहीं तो और क्या है?
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मात-पिता, मातृ-भूमि, मातृ-भाषा, जीवन नैया की मेरी खेवन हार है,
इनके चरणों में जीवन निछावर मेरा, यही उत्कर्ष का पहला प्यार है।
इनके आँचल में ही मै फूला-फला, मेरा जीवन तो इनका कर्जदार है,
इनकी सेवा जीवन भर करता रहू, ये ही चाहत मेरी बारम्बार है।।
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ऐ मेरे देश की माटी, तुझे मैं प्यार करता हूँ,
तेरी इज्जत हिफाज़त को, सदा सर माथे धरता हूँ ।
लगाकर जान की बाजी, करूँ रक्षा तेरी हरदम,
शहीदों की शहादत को, नमन सौ बार करता हूँ ।।
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द्वारा - डॉ. लक्ष्मीनारायण गुप्त
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डॉ. लक्ष्मीनारायण गुप्त, हर विषय पर सदैव अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए सक्रिय हैं। अ.हि.स. के पुराने आजीवन सदस्य हैं। रोचेस्टर, न्यू यॉर्क शाखा के अध्यक्ष रह चुके हैं।
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रद-विष्णु संवाद
बहुत दिनों के बाद नारद मुनि भगवान विष्णु से मिलने को बैकुन्ठ पधारे
शेष शय्या पर लेटे प्रभु ने नारद जी का स्वागत किया और पूछा
नारद, मृ्त्यु लोक का क्या समाचार लाए हो
नारद जी बोले, प्रभु समाचार नहीं किन्तु एक सवाल लाया हूँ
मानवों का प्रश्न है कि प्रभु आप मानवों को ऊपर उठाने में
इतनी देरी क्यों करते हो
जब उनके अंग इतने शिथिल हो जाते हैं
अस्थि पंजर ढीला हो जाता है
और सामर्थ्य की सर्वथा कमी हो जाती है
प्रभु बोले नारद इतने भोले क्यों बनते हो
तुम्हें पता है जब कभी कभी भले चंगे इन्सान को उठा लेता हूँ
तो लोग कहते हैं कि भगवान को ऐसी भी क्या जल्दी थी
कि अच्छे ख़ासे इन्सान को भरी जवानी में उठा लिया
तो मैं इंतज़ार करता हूँ कि मानव स्वयं ही कहे
कि अब बहुत हुआ भगवान मुझे उठा लो
और ऐसा कब होता है जब इन्सान के अंग शिथिल हो जाते हैं
अस्थिपंजर ढीला हो जाता है और उसका जीवन इतना दयनीय
हो जाता है कि मैं उस पर दया करके उसे उठा लेता हूँ
तुम जानते हो नारद, मानव मेरी सर्वोत्कृष्ट रचना है
वह बहुत हठी है, यह उसका सबसे बड़ा गुण है
और सबसे बड़ा दोष भी
वह महत्वाकांक्षी है और हठी होना उसकी
आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायक है
किन्तु वह इस गुण का दुरुपयोग भी करता है
और ग़रीबों पर अत्याचार भी करता है
इसलिए भी उसका उठाना आवश्यक हो जाता है
नारद यह मामला बहुत दुरूह है
फिर कभी इस पर विस्तृत वार्तालाप करेंगे
क्योंकि अब भोजन तैयार है
लक्ष्मी जी का बुलावा आरहा है
आप भी आमंत्रित हैं, पधारिए
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द्वारा - रेणु राजवंशी गुप्ता
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रेणु राजवंशी गुप्ता जी गत सैतीस वर्षों से अमेरिका में रहती है। अनेक कविता-संग्रह, कहानी-संग्रह एवं उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं| वर्तमान उपन्यास ‘संसारी-सन्यासी’ ने इनके समक्ष नवीन-पाठ एवं नवीन लक्ष्य को परिलक्षित किया है। गत सैतीस वर्षों से अमेरिका में रहती हैं।
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“मैं राम मंदिर हूँ”
मैं राम मंदिर हूँ,
मेरी एक कहानी है |
राम में मंदिर है,
मंदिर में राम हैं,
राम का मंदिर है |
जन - जन में राम हैं,
कण - कण में मंदिर है,
शाश्वत राम का वैश्विक मंदिर है |
मैं राम मंदिर हूँ,
मेरी एक कहानी है |
मेरे रज -कण पर बाल राम के चरण पड़े,
उनकी बाल लीलाओं के कितने यहाँ सुमन खिले |
मैंने देखी है प्रभु की बाल - मुस्कान,
उनके चंद्र -मुख का तेज कांतिमान |
चारों भाइयों का खेल परिहास देखा,
माता - पिता का मान मनुहार देखा |
मैं ही तो हूँ प्रभु राम के अवतरण का प्रथम साक्ष्य,
उनके धरा पर होने का प्रथम प्रमाण |
मैं राम मंदिर हूँ,
मेरी एक कहानी है |
अनगिनित वर्षों की है कहानी मेरी,
पुरानी बात नहीं करता,
पाँच सौ वर्षों की कथा सुनानी है |
मैंने कितने उतार चढ़ाव देखे,
कितने शीत ज्वार देखे,
मेरी संतान अवश हुई,
समय की पकड़ अबल हुई
लुटेरों ने मुझ पर वार किये ,
मेरे स्तम्भों पर कितने प्रहार किये |
शीर्ष पर मेरे मलबा डाला,
दीवारों को भी हिला डाला |
परन्तु नींव को मेरी न डिगा पाए,
यह तो राम जी की जननी - माटी है,
मैं राम मंदिर हूँ,
मेरी एक कहानी है |
मैं मूक चहुँ ओर देखता रहा,
परायों से अधिक अपनों की कायरता सहता रहा |
समय के बदलने की प्रतीक्षा में रत रहा,
जाग रहे स्वाभिमान को खोजता रहा |
कार सेवकों के आने की बाट मुझे जोहनी थी,
कोठारी बंधुओं की क़ुरबानी मुझे देखनी थी |
आज खड़ा हूँ मैं गौरवान्वित मुख से,
अपनों पर आत्माभिमान है |
मैं राम मंदिर हूँ,
मेरी एक कहानी है |
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"तन्वी शाह, प्रख्यात गायिका के साथ विशेष साक्षात्कार"
द्वारा : रिया गुलाटी
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रिया गुलाटी जी ने साइबर लॉ में और कॉर्पोरेट में डिप्लोमा किया है। इनके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं और वेबसाइटों में 70+ से अधिक प्रकाशन हुए हैं। ये आयरलैंड में स्थित कई धर्मार्थ संगठनों के लिए एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में स्वयंसेविका हैं। राष्ट्रीय स्तर की टाइक्वांडो खिलाड़ी भी रह चुकी हैं।
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बहुत ही कम समय में, तन्वी शाह का नाम भारतीय संगीत जगत के इतिहास में दर्ज हो गया। उन्होंने भारत ही नहीं अपितु दुनिया भर में पर्याप्त पहचान और सम्मान भी प्राप्त किया है। स्लमडॉग मिलियनेयर के “जय हो” गीत के लिए ग्रैमी पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय महिला ने न केवल अपने स्पेनिश गीतों के लिए बल्कि अन्य मधुर संगीत-निर्माण के लिए भी लाखों दिलों को जीता। तन्वी वास्तव में भारत का गौरव हैं। कलाप्रवीण व्यक्ति का साक्षात्कार मेरे लिए खुशी का क्षण रहा, जिसके अंश नीचे दिए गए हैं।
तन्वी शाह >>>>>>>>>>>>>>>>
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आपने संगीत को अपने कैरियर के रूप में क्यों चुना? आपका प्रेरणा स्त्रोत क्या है?
संगीत, बस अचानक हो गया क्योंकि संगीत में कुछ करने के लिए मैंने कभी सोचा नहीं था। प्रारंभ में, मैं एक फाइन आर्ट की छात्रा हुआ करती थी; संगीत को मैंने कभी नहीं चुना था। मैं कह सकती हूँ, संगीत ने मुझे चुना। मैं मूल रूप से एक डिजाइनर हूँ।
ऐसे बहुत से लोग हैं जिनसे मुझे प्रेरणा मिलती है। यहाँ, मैं विशेष रूप से फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का उल्लेख करूँगी क्योंकि मुझे लगता है कि वह इतने सिद्धांतवादी थे और जिस तरह से वे समर्पण, अनुशासन, दृढ़ संकल्प और समय की पाबंदी में विश्वास करते थे, वही मुझे भी लगता है कि हम सभी में ये चार गुण होने ही चाहिएं।
कैसे आपने संगीत की दुनिया में अपनी यात्रा की शुरूआत की? क्या कोई संघर्ष/बाधाएं थीं?
मेरी संगीत-यात्रा फिल्म “युवा” के मेरे पहले गीत, 'फना' से शुरू हुई, जिसमें संगीतकार रहमान साहब भी साथ थे। उस गाने के बाद मेरी ट्रेनिंग शुरू हुई। उससे पहले मैंने संगीत की कोई शिक्षा नहीं ली थी। मैं एक बाथरूम सिंगर हुआ करती थी।
संघर्ष और बाधाएं- हाँ, बहुत ! मुझे लगता है कि यदि आपके जीवन में संघर्ष/अवरोध नहीं हैं, तो आप कभी भी आगे नहीं बढ़ सकते। आपको सामना करना होगा, उठना होगा और फिर से चलना होगा, यही हमें एक बेहतर इंसान बनाता है। हमें इसके साथ लड़ने के बजाय प्रवाह के साथ जाना चाहिए। मुझे लगता है कि मैंने जो भी संघर्ष किया वह वास्तव में प्रेरणादायक था। यह एक सीख थी जिसे जानना मेरे लिए जरूरी था। बाधाएँ आपको समझदार बनाती हैं। फिल्म “युवा” के साथ संगीत का मेरा सफर शुरू हुआ और फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
संगीतकार होने के अलावा आप एक रचनात्मक डिजाइनर थीं, आपने अपने समय का प्रबंधन कैसे किया?
समय प्रबंधन एक ऐसी चीज है जो हम सभी को सीखना है। डिजाइनिंग और संगीत के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल नहीं था क्योंकि जब मैं किसी तरह के डूडल या डिजाइन कर रही होती थी, तो मेरे दिमाग में हमेशा एक धुन भी साथ-साथ चल रही होती थी, जो बहुत दिलचस्प थी। मैं बहुत भाग्यशाली रही हूँ क्योंकि संगीत और डिजाइन एक साथ चलते रहे। मुझे काम को संतुलित करना कभी मुश्किल नहीं लगा। समय प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण है- अगर आप कुछ करना चाहते हैं और उससे आपको खुशी मिलती है, तो आपको आगे बढ़कर इसे करना चाहिए। मेरे लिए, मैं डिजाइनिंग और अपने संगीत दोनों से बहुत खुश थी- इसके लिए जुनून था मुझे!
क्या आप भारतीय और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण की अपनी यादें साझा करना चाहेंगी?
खैर, मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित नहीं हूँ। 2003 तक तो मेरा संगीत प्रशिक्षण शुरू भी नहीं हुआ था। मैं अपने प्रोफेसर, श्री ऑगस्टीन पॉल से मिली, उन्होंने मुझे अपने साये में रखा और मैंने उनसे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहाँ से मैंने अपनी 8वीं ग्रेड की वोकल शिक्षा- ट्रिनिटी कॉलेज से पूरी की। मुझे बहुत अनुभव हुए। मैं चेन्नई में गाना बजानेवालों की एमएमए मंडली का हिस्सा थी और बहुत सारी अन्य गायक मंडलियों में भी शामिल रही जो बहुत अच्छा रहा क्योंकि मुझे सबके साथ मिलकर एक-साथ गाने के और नई चीजें सीखने के कई अवसर मिले। मैंने उन सभी पलों को संजोया क्योंकि उन्हीं पलों ने मुझे संवारा था। भारतीय शास्त्रीय संगीत में शिक्षा लेने के लिए मैंने हमेशा MyStoresपंडित जसराज, बेगम परवीन सुल्ताना जी, किशोरी अमोकर, आदि को सुना। मैं उनके YouTube वीडियो सुनती थी और उसके भारतीय हिस्से की नकल करने की कोशिश करती थी। तो, मैं कहूँगी कि कहीं न कहीं इसने वास्तव में मेरी मदद की- ये सभी यादें हैं जो कहीं न कहीं मेरे प्रशिक्षण से जुड़ी हैं।
व्यावसायिक रूप से आपके लिए ऐसा क्या है जिसे आप उपलब्धि मानती हैं?
मैं इसे कहीं भी चिन्हित नहीं करना चाहती, लेकिन निश्चित रूप से, ग्रैमी, बीएमआई अवार्ड, वर्ल्ड साउंडट्रैक अवार्ड, ऑस्कर- यह निश्चित रूप से व्यवसाय के लिए उपलब्धि रहे। इसके अलावा, मलेशिया में हमारा प्रदर्शन जो युवान शंकर राजा और मंच की पूर्णस्टेज मैकेनिक्स और सब के साथ एक बहुत बड़ा शो था और किसी कारणवश मैं मंच के नीचे से बाहर निकल कर आई थी–एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा था जैसे कोई जादुई करिश्मा हुआ है और मैं उड़ रही हूँ।
आपने स्वयं से कब कहा – मैंने जीत हासिल कर ली है?
ये मैंने कभी खुद से नहीं कहा और मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा कभी कह पाऊँगी क्योंकि एक कलाकार के रूप में, मैं हमेशा सीखती और आगे बढ़ती रहूँगी। तमाम प्रशंसाओं और प्राप्त उपलब्धियों के बावजूद ऐसा कोई पल नहीं होगा जब मैं ऐसा कहूँगी कि मैंने सब कुछ पा लिया है! मेरा मानना है कि अभी और भी बहुत कुछ करना बाकी है। मैंने अपने लिए मानदंड निर्धारित किए हैं- मैं किसी के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर रही हूं (एकमात्र व्यक्ति जिसके साथ मैं प्रतिस्पर्धा कर रही हूं वह मैं स्वयं हूं)। मैं भीड़भरी दौड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहती। ऐसा कई बार हुआ जब मुझे सुझाव मिले कि तुम्हे वही करना चाहिए जो अन्य लोग कर रहे हैं। मुझे क्षमा करें, मैं ऐसी नहीं हूँ। मुझे कोई जल्दी नहीं है और मैंने अपने जीवन को वास्तव में अच्छी तरह से संतुलित कर लिया है जो निश्चित रूप से मुझे खुश रखता है और मेरी आत्मा को संतुष्ट करता है- चाहे वह संगीत हो या डिजाइन। प्रतिदिन ऐसा लगता है कि मैं अपने आपसे और अपने काम से खुश हैं। मेरा मानना है कि भविष्य में मैं कुछ और हासिल कर सकती हूँ इसलिए मैं सपने देखना कभी बंद नहीं करूँगी।
आपने हिंदी, तमिल, तेलुगु, स्पेनिश, पुर्तगाली, एफ्रो-क्यूबन और अरबी भाषा में गाया है- गाने को मधुर और भावपूर्ण बनाने में क्या किसी भाषा की भूमिका रहती है?
भाषा कोई बाधा नहीं है- यदि आप कई भाषाओं में गाते हैं, तो उसमें विविधता दिखाई देती है। यह कहना थोड़ा अधिक दार्शनिक है कि संगीत एक ऐसी चीज है जो लोगों को एक साथ लाती है। यह एक ऐसी चीज है जो सकारात्मक है और जो आपको खुश रखती है। लोग “डेस्पासिटो” और साथ ही “कोलावेरीडी”को भी सुनते हैं– जिनका आपस में कोई मेल नहीं दिखता है। मुझे नहीं लगता कि भाषा कोई बाधा है और मैं बहुत खुश हूँ कि मुझे इन सभी भाषाओं में गाने का मौका मिला और मैं अलग-अलग भाषाओं में गाने में सक्षम हूँ (हालांकि मेरी पसंदीदा भाषा स्पेनिश है)। मुझे वास्तव में विभिन्न भाषाओं में गाना पसंद है और मुझे लगता है कि इनका मेल अच्छा है। जब मैं स्पेनिश या एफ्रो-क्यूबन या पुर्तगाली गीत गाती हूँ तो लोग प्रसन्न हो जाते हैं और कहते हैं: आप इतना कैसे जानती हैं? मैं अपने उच्चारण पर काम करती हूं- मैं वास्तव में इस पर कड़ी मेहनत करती हूँ। मुझे नहीं लगता कि भाषा एक बाधा है। संगीत एक कला है, इसलिए किसी भी राग में आप किसी भी तरह की भाषा का उपयोग कर सकते हैं।
आप अपने प्रशंसकों की यादों में कैसे बरकरार रहना चाहती हैं ?
विल्कुल सही प्रश्न, मैं चाहती हूँ कि लोग मुझे एक अच्छे इंसान के रूप में याद रखें, जिसने सभी को खुश किया, मुस्कान के लिए और हमारे द्वारा बनाए गए सुखद गीतों के लिए। मुझे खुशी होगी अगर वे मेरे द्वारा गाए गए गानों से खुश हों।
नवीन संगीतकारों को आप क्या सलाह देना चाहेंगी?
डरें मत। एक बार फिसलने पर उठने के कई रास्ते सामने होते हैं। संगीत की दुनिया अलग है, वापस गिरने के लिए हमेशा कुछ न कुछ होता है, बहुत प्रतिस्पर्धा है। अपना 200% डालें। आधे-अधूरे मन से कोई काम न करें। आप जो भी करें, हौसले से करें, खुद पर विश्वास करें। इसमें समय लग सकता है, लेकिन धीमी और स्थिर दौड़ जीत जाती है। कृपया इसके ग्लैमर वाले हिस्से के झाँसे में न आयें। मैंने इसके दोनों पहलू देखे हैं। भावना के साथ अंदर जाओ, अपना काम मन से करो, पुरस्कारों के लिए किसी भी तरह का भ्रम न पालो। उदाहरण के लिए: यदि आप अंदर जा रहे हैं और कोई गीत कर रहे हैं, तो यह सोचकर अंदर न जाएं कि मुझे यह पुरस्कार मिलने वाला है क्योंकि मुझे लगता है कि जब आप गीत में इतना प्रयास कर रहे हैं तो कुछ तो आपको मिलेगा बेशक आत्मसंतोष। बस प्रवाह के साथ जाओ और अपना काम करो। जरूर कुछ होगा (इससे कुछ अच्छा निकलेगा)। दिन के अंत में, आप जो कुछ भी करते हैं, उसमें से कुछ अच्छा आना होता है। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर होने वाली हर चीज पर विश्वास न करें क्योंकि यह एक अलग दुनिया है (यह एक नकली दुनिया है)। अपना जीवन जिएं, गहरी सांस लें- सांस लें, बाहर जाएं, जमीन पर टिके रहें और अच्छे काम करते रहें।
(Disclaimer: The English Version of the Interview has already been published written by Riya Gulati. )
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अपनी कहानियाँ
“एडवेंचर कैंप”
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द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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एडवेंचर कैंप
"धरा अरे सुनो! (पीछे की ओर से सहसा एक आवाज़ आई)
मैंने जैसे ही आवाज की ओर मुड़कर देखा तो बस देखता ही रह गया, एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ एक किशोरी थी जिसकी बड़ी-बड़ी आँखें, गोरा रंग, हवा में लहराते सुन्दर रेशमी बाल तथा गुलाब की पंखड़ियों से अधर यह एहसास करा रहे थे कि यह सामान्य से हटकर है। चेहरे पर उसकी मासूमियत व भोलेपन के कारण नजरें बस वहीं ठहर गई।
तभी मेरी तंद्रा को तोड़ते हुए वही भारी सी आवाज फिर गूँजी-
अरे भाई ! ये एडवेंचर कैंप का ट्रेनिंग सेंटर कहाँ है? मेरा ध्यान फिर से भंग हो गया था, परियों की दुनिया से जैसे मुझे किसी ने जमीन पर धक्का दे दिया हो, हड़बड़ाकर बोला- वहीं तो है वो सामने वाली पहाड़ी पर ...
इतना सुनते ही वे चल पड़े किन्तु मैं उन्हें तब तक देखता रहा जब तक वे आँखों से ओझल नहीं हो गये।
उस हुस्नपरी का एक भी बार पीछे मुड़कर न देखना मेरी हार की शुरुआत जैसी थी किन्तु उसका साया मेरे मन-मस्तिष्क में इस प्रकार से बस गया था जैसे शयनकक्ष में प्रियतम की तस्वीर लगी हो।
मैंने भी और छात्रों की तरह एडवेंचर कैंप में भाग लेने के लिए आज सुबह ही यहाँ पहुँचा था। हम सब कॉलेज की ओर से लड़के-लड़कियों की अलग-अलग आवास की व्यवस्था के अनुसार यहाँ पहाड़ी पर बने कैंपस में अपना सामान रखकर सारे दिन की थकावट उतारने के लिए सैर करने नीचे आ गये थे। जो विद्यार्थी किसी कारण कॉलेज बस में नहीं आ सके वो एक-एक करके पहुँच रहे थे। कल सुबह से ही एडवेंचर की ट्रेनिंग कक्षा शुरु होनी थी अतः ट्रेनिंग सेंटर के बाहर दिनचर्या लगा दी गई थी। सुबह से शाम तक दिनचर्या बहुत सख्त थी किंतु संध्याकाल के बाद किसी भी प्रतिभागी पर कोई बंधन नहीं था। यह हमारा व्यक्तिगत समय था। चाहे हम घूमें, चाहे नाचें , गाएँ या गप्पे मारे।
सुबह जल्दी उठकर दौड़-भाग करने की आदत थी किंतु यहाँ कैंप में दौड़ लगाते, नहात-धोते, ट्रेनिंग-कक्षा आदि में हर समय उस किशोरी का ही ख्याल मेरे मन में घूमता रहता। मानो वह तस्वीर की भाँति हर समय साये की तरह मेरे साथ रहने लगी। कई बार तो मैं स्वयं को झिंझोड़कर इस अजीब सी गिरफ्त से निकलने का प्रयास करता परन्तु कुछ ही क्षण पश्चात फिर उसी शून्य में जा ठहरता। यह सिलसिला मेरी दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा था। बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं को सम्भालता तो दिल मुझ पर भारी पड़ता और मैं फिर उसी धुन में मस्त हो जाता। कुछ दिन बाद शायद उसको भी यह लगने लगा कि मैं उस पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगा हूँ। दिन यूँ ही देखते व सोचते हुए गुजरने लगे।
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शिवालिक की पहाड़ियों की प्राकृतिक सुन्दरता, अक्तुबर मास के अतं की हल्की-हल्की सर्द हवा, कहीं धूप तो कहीं छाँव और ऊपर से यह अजीब सी भ्रामक चाहत जिसके बारे में मैं भी अनजान था, कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। प्रकृति का प्रेमी तो मैं बाल्यकाल से ही रहा था, जब मैंने अपना बचपन कश्मीर की वादियों में प्रकृति की गोद में ही जीया था।
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किन्तु अब तो यह और भी आकर्षित करने लगी, शायद प्रेम और प्रकृति का आपस में गहरा सम्बन्ध है। कई बार दिल में आता कि मैं अपने दिल में उठे तूफान को उसके सामने जाकर साफ-साफ कहकर शान्त कर दूँ किन्तु हिम्मत ही न जुटा पाता और यह मौन साधना यूँ ही चलती रही। फिर एकबार मन में आया कि उसे भी तो अहसास होना चाहिए कि मैं उसे चाहता हूँ और यह सोचकर एक दिन जहाँ वह पहाड़ी के ऊपर दूसरे छोर पर बने लड़कियों के लिए आरक्षित होस्टल में सहेलियों के साथ ठहरी हुई थी, ठीक उसके कमरे की खिड़की के सामने लगभग दो सौ हाथ दूर एक छोटे से मंदिर के समीप चट्टान पर बैठकर मैं बाँसुरी बजाने लगा, एक-एक कर मैंने कई पुराने फिल्मी गीत अपनी अंगुलियों से नचायें किन्तु फिर भी खिड़की नहीं खुली। इधर जैसे-जैसे दिन ढ़लने लगा तो हवा भी तेज होने लगी कब चार से छः बज गये पता ही न चला। कई बार मन में उदासी भी आयी कि क्यों मैं पागलों की भाँति यहाँ बैठकर व्यर्थ समय गवां रहा हूँ किन्तु आज दिल कतई हारने को तैयार नहीं था। हवा प्रचण्ड़ वेग से बहने लगी।
एक ओर तो मैं बाँसुरी बजा रहा था दूसरी ओर हवा के सर्द-थपेड़े मेरे कान में बाँसुरी बजा रहे थे। कई बार तो तेज हवा मेरे बाँसुरी के स्वरों को भी उड़ाकर ले जाती थी, फिर मैं हवा के विपरीत बाँसुरी थामकर स्वर निकालता और खिड़की पर एक टकी लगाए रहता। कुछ देर बाद खिड़की का एक पल्ला धीरे से एक इंच के लगभग खुला और कमरे के अन्दर कुछ हलचल सी भी नजर आई। बेशक पल्ला हवा से खुला हो किन्तु मुझे लगा था कि कोई मुझे देख रहा है, कोई क्यों वही, जिसे देख मेरा चैन खो गया था। मैंने उत्साहित होकर उच्च स्वर में मुरली की धुन निकालनी शुरु कर दी। परन्तु कोई प्रतिक्रिया न होने पर मन में निराशा स्वभाविक ही थी। अतः कई बार सोचा कि बहुत देर हो चुकी है शाम के सात बजे से भी अधिक समय हो चुका था, अपने कमरे में चलना चाहिए। अन्धेरा बढ़ता जा रहा था और हवा भी सर्द होती जा रही थी किन्तु मन तो आज निर्णायक बन बैठा था कि बिना दर्शन करे नहीं चाहे कितनी भी देर क्यों न हो जाये। गहराते अन्धकार तथा सर्द हवाओं के बीच बैठकर मुरली के माध्यम से दर्शन करने की इच्छा किसी साधना से कम न थी।
मैं स्वयं को किसी तपस्वी से कम नहीं मान रहा था। मैंने अपना प्रयास जारी रखा तथा पुनः एक पुराने हिन्दी नग्में की धुन उच्च स्वर में निकालनी शुरु ही की थी मेरी किस्मत जागी, जब खिड़की के दोनों पल्ले पूरी तरह खुल चुके थे और उसमे से तीन-चार चेहरे बाहर झाँकते दिखाई पड़े। शायद वे उसकी सहेली होगी। अन्ततः जीत मेरी जिद की हुई, मैंने कुछ क्षण के लिए अपने हाथों को विराम दिया और खिड़की में उस हुस्नपरी के चेहरे को ढ़ूढ़ने का प्रयास किया जिसकी प्रतीक्षा में चार बजे से यहाँ बैठा था, तभी गुलाब की तरह हंसता हुआ उसका चेहरा दिखाई पड़ा तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। कमरे में लाइट होने के कारण उन सबके चेहरे साफ-साफ दिखाई दे रहे थे किन्तु मेरी उन्हें शायद चाँद की मध्यम रोशनी में छाया ही दिखाई दे रही होगी। फिर जब तक खिड़की खुली रही मेरी ऊँगलियां मुरली पर थिरकती रही। खिड़की बन्द होने पर मैं अपने कमरे में आकर सो गया, खुली आँख से मधुर स्वपन की कल्पना करते-करते न जाने कब मुझे नींद आ गई।
अगले ही दिन पहली ही मुलाकात पानी के नल पर हुई, जहाँ हम सभी ट्रेनर अपनी-अपनी बाल्टियाँ लेकर अपनी बारी आने का इन्तजार करते थे। जैसे ही उसकी नजर मुझ पर पड़ी तुरन्त उसने आँखें झुका ली। उसके चेहरे पर एक अजीब सी हिचकिचाहट थी। फिर कभी क्लास में या शाम को घूमने जाते हुए या फिर नल पर मेरी नजर उससे चार होती तो वह एक दम नजरें झुका लेती। कई दिन तक यह सिलसिला चलता रहा। उसकी सहेलियों को भी यह मालूम हो गया कि मैं उसके पीछे कुछ ज्यादा ही दीवाना हो रहा हूँ।
एक दिन कैंप में बुखार होने के कारण वह दो दिन के लिए छुट्टी लेकर अपने घर चली गई। कैंप का नियम था कि आवश्यकता पड़ने पर कोई भी प्रतिभागी दो दिन के लिए अवकाश ले सकता था किंतु जब वह दो दिन पूरे होने पर भी कैंप में नहीं आई तो मन बहुत उदास हुआ। पता लगा कि तीसरे दिन कैंप में उसके पापा का फोन आया कि वह तेज बुखार से पीड़ित है तो कैंप में नहीं आ पायेगी। जब यह खबर उसकी सहेलियों के माध्यम से मुझे मिली तो मुझे लगा कि जैसे मेरा मन उसके दुःख के कारण तड़फ रहा हो, उससे मिलने को तरस रहा हो। मैं उससे मिलने के लिए बेचैन सा होने लगा। अगले दिन अवकाश लेकर मुझे भी घर जाना था तो उसकी सहेली मुझे बोली –
सुनिये!
मैंने कहा – बोलिए…
आप घर जा रहे है ना
जा तो रहा हूँ, बोलिए…
आप जाते हुए अम्बाला में शालू की तबीयत का पता करते हुए भी निकल जाना।
अन्धे को क्या चाहिए दो आँखें। मैं तो यही चाह रहा था कि कोई अवसर मिले कि मैं उसकी जीती जागती तस्वीर निकटता से देख सकूँ। मैंने अनजान से होते हुए कहा-
किन्तु मैं तो उसका घर नहीं जानता…
(कुछ लिखते हुए) ये लो घर का पता
(मेरी खुशी का ठिकाना न था, मैं सोच रहा था कि यहाँ तो वो सबके सामने बोलने की हिम्मत नहीं करती किन्तु घर तो खूब खुलकर बोलेगी और कुछ पूछेगी कुछ बतलाएगी।)
उसकी सहेली ने शालू का पता पकड़ाते हुए कहा- हां ये कुछ सामान भी है उसी को पकड़ा देना।
मैंने सामान और पता लिया तथा अपनी खुशी को सम्भालता हुआ घर के लिए रवाना हो गया।
जब मैं बस में बैठा तो नीचे उसकी सहेलियां खड़ी मुस्करा रही थी शायद वे मुझसे अर्थात् मेरे प्रेम से सहानुभूति रखती हो। तभी सामान देकर भेजा कि कोई दिक्कत न आए। मैं स्वयं को भाग्यशाली समझकर शालू के बारे में सोचने लगा। बस गंतव्य की ओर जिस गति से बढ़ी जा रही थी, उसी गति से मेरे मन में विचार कौन्धने लगे कि जब मैं उसके घर जाउंगा तो क्या कहकर उसका सामना करूँगा। यदि द्वार खोलने उसका भाई आया तो क्या कहूँगा और यदि पापा हुए तो क्या बोलूँगा कि मुझे किसने भेजा है और यदि स्वयं शालू आ गई तो…अरे बाप रे! क्या बोलूँगा कि मैं उसके घर पर क्या करने आया हूँ, मैं क्यों...किसने...कैसे...क्या कहूँगा? जब तक सारी बात बताने का प्रयास करूँगा तो हो सकता है कि वह पहले ही मुझ पर बिगड़ जाये। यह सोचकर घबराहट से शरीर के रोंगटे तन गये। मैं कुछ और सोचने का सिलसिला आगे बढ़ाता तब तक बस अम्बाला पहूँच गई। मैंने बिना देर किये रिक्शा ली और दिए गये पते पर पहूँच गया। पते के अनुसार जिस घर में मुझे दस्तक देनी थी वहां घर के सामने बने पार्क में वही अधेड़ उम्र का व्यक्ति चहलकदमी कर रहा था जिसके साथ पहली बार मैंने अपनी सपनों की राजकुमारी को देखा था। मुझे समझते देर न लगी कि यह उसके पापा है। मैंने हिम्मत करके आगे बढ़ते हुए प्रणाम किया तो उन्होंने आशीर्वाद दिया और गौर से मुझे देखने लगे। शायद वे मुझे पहचानने का प्रयास कर रहे थे फिर उन्होंने पूछ ही लिया-
किससे मिलना है बेटे?
पहला प्रश्न ही उलझाने वाला था। मैंने हिम्मत जुटाकर आने का कारण और अपना परिचय दिया तो वे बड़े आदर के साथ मुझे घर के अन्दर ले गये। उसकी छोटी बहन पानी लेकर आई और पापा उसे बुलाने चले गए शायद वह रसोई में खाना बना रही थी। कुछ ही देर में उसकी मम्मी कॉफी लेकर आये तथा बातचीत करने लगे। समय बढ़ता जा रहा था और मैं भी यही चाह रहा था कि समय यूँ ही बढ़ता जाये ताकि मुझे शालू के घर ही रुकने का अवसर मिले। मुझे लग रहा था कि कहीं मुझसे हालचाल पूछकर तथा सामान आदि लेकर शीघ्र ही चलता ना कर दें। सर्द ऋतु की हल्की-हल्की ठंडक अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। मेरा मन था कि जब शालू आएगी और मैं उसे राजी खुशी पूछकर जाने के लिए कहूँगा तो आगे बढ़कर मुझे कहे कि अब इतनी देर हो गई है, कहाँ जाओगे? यही ठहरो सुबह जाना। और मैं उसके हाथों बना खाना खा कर फिर उसके साथ ढ़ेरों बातें करूँ और अपनापन का रिश्ता बना लूँ। मैं सोच ही रहा था कि तभी रिलैक्श ड्रैस में शालू अन्दर आई। मुझे देखते ही सकपका गई। शायद उसने सोचा भी नहीं होगा कि कोई आने वाला व्यक्ति मैं हो सकता हूँ। वह भी इस वक्त, इतनी देर से। मैंने उसकी मनोदशा को भाँप कर हिम्मत करते हुए पूछा-
तबियत कैसी है अब?
अब तो ठीक हूँ।
क्या हो गया था?
वैसे ही बस।
आपकी सहेलियाँ बहुत परेशान है आपकी सहेत को लेकर।
नहीं ऐसी चिंता की तो कोई बात नहीं है।
फिर मैंने उसकी सहेलियों के द्वारा सामान व कुछ पुस्तकें उसके सुपुर्द की और चलने का अभिनय किया-
अच्छा जी! मैं चलता हूँ।
तभी उसके पापा बोले- नहीं बेटा अब रात को कहाँ जाओगे, खाना खाओ और आराम करो, सुबह चले जाना।
मैं तो यही चाहता था किन्तु उनको मेरी योजना का भान न हो अतः मैंने फिर कहा-
नहीं अंकल जी बस तो मिल ही जाएगी, मैं चला जाउँगा।
उसके पापा ने मेरा बैग पकड़ते हुए कहा-
कहाँ रात को परेशान होते फिरोगे, सुबह चले जाना, चलो बैग रखो और खाना खाकर आराम करो।
इस बार मैं भी चुप रह गया कि कहीं एक बार फिर कहने से ये भी बोल दे चलो तुम्हारी मर्जी। अतः मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा।
कुछ देर बाद उसकी छोटी बहन खाना लेकर आई। खाना खाकर अकंल के साथ सैर करते हुए कुछ इधर-उधर की बातें की और फिर मेरा बिस्तर लगा दिया गया। मैं सोच रहा था कि शायद खाना खाने के बाद वह मेरे पास अपनी सहेलियों के बहाने से जरूर आएगी किन्तु वह नहीं आई और मैं सारी रात अनिश्चतता की जिन्दगी के सपने देखते-देखते सो गया।
सुबह उठकर नहा धोकर नाश्ता पानी किया तो एक बार फिर शालू नहाकर आते हुए मेरे सामने थी। नहाने के बाद उसका चेहरा गुलाब की भाँति खिल उठा था और उसकी जुल्फों की लटाएं उसके गालों पर लटकी हुई फूल पर भंवरे सी मंडराती हुई प्रतीत हो रही थी, उसकी आँखों में गजब का आग्रह था मानो मुझे अपनी ओर बुला रही हो, उसके कंपकंपाते गुलाबी होठ जैसे कुछ कहने का असफल प्रयास कर रहे हो। मैं उसके इस निखरे हुए रूप सौदंर्य को जी भर कर देखना चाहता था परन्तु वह मुझे देखकर दो पल के लिए रुकी फिर कन्धे से अपना तोलिया सम्भालते हुए अपने कक्ष की ओर चली गई। वह तो चली गई किन्तु मैं तो जैसे जड़ हो गया था मैं अभी भी उसके सौन्दर्य के समुंद्र में गोते मार रहा था। तभी उसकी मम्मी बोली-
बेटे! लो, कॉफी ले लो…
हड़बड़ाते हुए हाँ ऑटी जी और मैं कॉफी पीने के बाद चलने की तैयारी करने लगा। उसके घर वालों से विदाई लेकर मैं बसस्टैण्ड़ आ गया। मैं यह सोचकर आया था कि क्लास में तो अन्य विद्यार्थियों के कारण वह दूरी बनाए रखती है अतः घर में तो खुलकर बातचीत कर सकेगी किन्तु उसने घर में भी कोई खास बातचीत न की। भारी मन से मैं अपने घर के लिए बस में बैठ गया। फिर मन में अनेक प्रश्न उठते रहे कि कहीं वह मुझसे जानबूझकर तो दूर नहीं रहती या फिर कहीं वह कहीं ओर तो… तभी प्यासा मन कह उठता नहीं-नहीं बेचारी शाँत स्वभाव की है इसलिए बात करने में झिझकती है।
अगले दिन जब मैं वापिस एडवेंचर कैंप में आया तो मुझे पता चला कि वह भी अपने पापा के साथ आई है। मैंने वहाँ पहाड़ों में स्थित देवी माँ के मंदिर में माँ से मन्नत माँगी थी कि जब वह ठीक होकर कैंप में आ जाएगी तो मैं पैदल ही सोलह किलो मीटर चलकर माता के दर्शन कर प्रसाद बांटूँगा और मैं अपने वायदे के अनुसार अपने दोस्त को लेकर माँ के दरबार में खड़ी चढ़ाई चढ़कर प्रसाद बाँटने गया।
सर्द ऋतु में शिवालिक की पहाड़ियों की सुन्दरता कुछ अलग ही छटा बिखेरती दिखाई देती थी। दिनभर की ट्रेनिंग के बाद शाम को दो-चार घण्टों के लिए सभी लड़के-लड़कियाँ टहलने के लिए समूह बनाकर पहाड़ियों की गोद में आन्नद के कुछ क्षण बटोरने जाते थे। जो खुले मन के लड़के-लड़की थे वे आपस में खूब मजाक व खुली बातें करते थे। मैं कभी भी किसी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। जब किसी के प्यार-व्यार के किस्से सुनते तो लगता कि ये सब पागल है जो बेकार की बातों में अपना समय व्यर्थ गंवाते है किन्तु अब अपने ऊपर बीती तो पता लगा कि ये ईश्क तो सभी का बुरा हाल करता है। कई बार पीछे मुड़कर देखता तो बड़ा आश्चर्य होता कि हम कहाँ खड़े है। किधर जा रहे है? कॉलेज से आए थे एडवेंचर कैंप में भाग लेने के लिए तथा ट्रैकिंग , रोपिंग , क्लाइबिंग, नदी पार करने आदि की ट्रेनिंग लेने के लिए किन्तु यहाँ तो कोई ओर ही ट्रेनिंग चल रही थी। कई बार मस्तिष्क को समझाने का असफल प्रयास किया किन्तु मस्तिष्त पर तो बेलगाम मन हावी हो जाता था, हाल ये था कि ज्यों जयों दवा की मर्ज बढ़ता गया।
प्रतिदिन सुबह उठते ही उसकी शाँत-सौम्य सूरत देखने की कसक रहती जो नल पर पानी भरते हुए पूरी हो जाती। फिर ट्रेनिंग में तथा शाम को घूमने के बहाने दिन में कई बार दर्शन हो जाते किन्तु मन की प्यास बढ़ती ही जाती मन करता कि बस उसके सामने ही बैठा रहूँ।
एक दिन हिम्मत करके मैं अपने दोस्त के साथ उससे दिल की बात करने उसके पास गया। लड़कियों की ठहरने की व्यवस्था तो अलग से थी किंतु भोजन की व्यवस्था सबकी एक ही स्थान पर थी। भोजन के समय हिम्मत करके जैसे ही हम उसकी टेबल के पास गये तो वह हमे अपने पास देखकर ठिठक सी गई। वह अपनी सहेली सूरज कौर को एक टक देखती रही।
उसकी सहेली बोली- आओ बैठो, बैठो ना…
नहीं नहीं बस! हम तो भोजन करके जा रहे थे बस यूँ ही….
सहेली ने फिर आग्रह किया शायद वह मुझसे थोड़ी बहुत सहानुभूति रखती थी किन्तु हमने फिर वहां रुकना ठीक न समझा और वापिस आ गए।
अवसर मिलते ही जब भी मैं शालू को अपने मन की बात कहने का प्रयास करता तभी उसकी सहेली उसके आस-पास मंडराने लगती। जब कभी अकेले मिल जाती तो मेरी बात करने की हिम्मत न होती तो कभी हिम्मत करता तो वह अनदेखा कर सीधी आगे निकल जाती। यूँ ही एक- एक दिन बीतता जा रहा था। कहते है कि ईश्क-मुश्क छुपाये नहीं छुपते अतः एक दिन उसकी सहेली बोली कि आप क्यों उसके चक्कर में अपना समय खराब कर रहे हो, वह किसी ओर से प्रेम करती है और वह लड़का एक बार यहाँ कैैंप में भी उससे मिलने आ चुका है। सहेली की बात सुनकर मुझे झटका सा लगा किंतु सच्चाई भी लगी क्योंकि उसने एक बार भी मुझसे बात करने की कोशिश नहीं की। मन में बहुत निराशा हुई कि मैं वैसे ही रात-दिन उसके नाम की माला जपता हूँ और वह कहीं ओर…किन्तु मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि वह मेरे सिवाय किसी और के बारे में सोचती भी हो। वह मुझे ही चाहती है, बात करने का क्या वह तो कोई भी किसी से कर सकता है। मेरा एक तरफा प्रेम मेरे सिर चढ़कर बोल रहा था।
शालू का चाहने वाला लड़का पम्मी एक बार फिर कैंप में उससे मिलने आया। कैंप के लड़कों द्वारा पूछने पर वह उनसे झगड़ने लगा। उसके साथ दो-तीन साथी ओर थे।वे कैंप इंस्ट्रक्टर के सामने ही कैंप के लड़कों से मार-पीट करने लगे। पम्मी के लिए मेरे दिल में शायद किसी कोने में नफरत पैदा हो चुकी थी। मुझे लगता था कि वह मेरे प्यार को मुझसे छिनना चाहता है,अतः मैं मन ही मन उससे ईर्ष्या करता था, अब अपनी भड़ास निकालने का मुझे अवसर मिला था तो मैं कैसे पीछे रहता, मैंने उसे पकड़कर लात-घूसों से उसकी जमकर ठुकाई शुरु कर दी तो उसके बाकि दोस्त भाग खड़े हुए। तभी ट्रेनिंग क्लास में खलबली सी मच गई। पानी लाओ-पानी लाओ, जल्दी पानी लाओ, इंस्ट्रक्टर ने जोर से कहा। मैं भी पम्मी को उसके हाल पर छोड़कर देखने भागा कि क्या हुआ जो बार-बार पानी मंगवाने की बात हो रही है। देखा तो कई सारी लड़कियों के बीच शालू बेहोश पड़ी थी। पूछने पर उसकी सहेली ने बताया कि पम्मी की पिटाई देखकर यह सहन न कर सकी और बेहोश हो गई। एक ने पीछे से कटाक्ष किया कि सहन भी कैसे करती प्रेमी की पिटाई जो हो रही थी। यह सुनकर मैं सन्न खड़ा रह गया, मेरी आँख पत्थर सी हो गई, मेरा रक्त संचार मानो बंद हो गया हो। प्रतिक्रिया सुनते ही मानो मेरा शरीर टूट सा गया हो। मेरी हालत उस मजदूर की भाँति थी जिसने सारा दिन मेहनत की हो किन्तु फिर भी उसे मजदूरी से वंचित रखा गया हो, मुझे लगा कि हंस की भाँति किसी ने मेरे पर काट दिए हो। मैं सोचता रहा कि जिसे मैंने देवी की तरह पूजा, जिसके प्यार में मैं रात-रातभर सो न सका, जिसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार रहता था, उसके दिल में कोई और है। यह कैसे हो सकता है, दिल ने कहा यह नहीं हो सकता,यह धोखा है, मुझे छला गया है परन्तु बुद्धि ने कहा- नहीं रे पगले! यह एक तरफा प्यार था, फिर यह रथ एक पहिए पर कितनी दूर चलता।
तभी एक साथी ने मुझसे कहा - चलो यार सभी चले गए। छुट्टी हो गई है, तुम अकेले यहाँ क्या कर रहे हो?
मेरी तंद्रा भंग हुई,मानो लम्बी निद्रा से जगा था। सभी विद्यार्थी जा चुके थे। दिल ने बुद्धि की बात स्वीकारी।
हाँ यह प्यार पवित्र तो था किन्तु यह एक तरफा था।
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"हिंदी अब अमेरिका के सरकारी स्कूलों में"
कैलिफ़ोर्निया के फ्रेमोंट यूनिफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट (FUSD) में
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कैलिफ़ोर्निया में अब पढ़ाई जाएगी हिंदी, सरकारी स्कूलों में वर्ल्ड लैंग्वेज के रूप में होगी शामिल
फ्रेमोंट यूनिफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट (FUSD) बोर्ड ने एक पायलेट प्रोग्राम शुरू करने के लिए 17 जनवरी को 4 -1 वोट से मतदान किया, जो अगस्त में शुरू होने वाले 2024 -2025 स्कूल वर्ष के लिये हॉनर मिडिल स्कूल एवं इरविंग्टन हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में हिंदी को शामिल करेगा।
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – संपादक मंडल sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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