संवाद - January 2022

संवाद - January 2022

 
 
 
 
 
INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
 जनवरी  2022, अंक  ८   | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
 
--अनीता सिंघल
सत्र २०२२-२०२३ की कार्यसमिति, न्यासी समिति का स्वागत और स्वयं सेवक समिति का आभार व्यक्त करती हूँ।
सत्र २०२०-२०२१ के अध्यक्ष श्री अजय चड्डा जी को बधाई देती हूँ, उनके कार्यकाल में अ.हि.स. की प्रगति सराहनीय रही है, वर्ष २०२०-२०२१ सत्र की पूरी कार्यकारिणी-समिति के कार्य प्रशंसनीय रहे है। इस सत्र में अ.हि.स. की मासिक ‘संवाद’ पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारम्भ हुआ है और वह प्रशंसनीय भी रही है।
इस वर्ष अ.हि.स. में कुछ नई शाखाएँ भी गठित हुई हैं। शाखाओं की गतिविधियाँ भी तीव्र हुई हैं। शाखाओं से आने वाले परिणाम भी अति उत्तम आ रहे हैं, आने वाले समय में समिति और भी नई शाखाएँ गठित करें ताकि हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य और विस्तार एवं सुचारु रूप से हो सके।
सभी के अथक प्रयासों व नेतृत्व में छात्रों को Hindi.org पर हिन्दी सीखने का लाभ प्राप्त होगा और हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में पंजीकृत करने और सीखने दोनों ही माध्यम की सुविधा दी जाएगी।
हिंदी शिक्षा का जो कार्य प्रारम्भ हुआ है, उसे और प्रचारित और प्रसारित किया जाएगा। युवकों को इस कार्य समिति में कार्य सौंपा जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ी को संस्कृति और विरासत से अवगत कराया जाए, अ.हि.स. को प्रगति के शिखर पर पहुँचाने का पूर्ण प्रयास करूँगी।
आगामी सत्र के लिए युवा-समिति के गठन की घोषणा करती हूँ और युवकों को इस कार्य समिति में कार्य सौंपा जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और विरासत से अवगत कराया जा सके। अ.हि.स. को प्रगति के शिखर पर पहुँचाने का पूर्ण प्रयास करूँगी।
आप सभी से पुनः मेरा सहृदय निवेदन है कि ओमिक्रोन वाइरस (Omicron Virus) की नई लहर आयी है और जिसका प्रकोप दिन-ब-दिन पूरी दुनिया में बढ़ रहा है। अपना और अपने परिवार वालों का विशेष ध्यान रखिये और उन्हें सुरक्षित रखिये। सामाजिक-दूरी और संयम बनाए रखें, यही मेरा अनुरोध है।
मैं अनिता सिंघल अपने दो वर्ष के निर्धारित कार्यकाल के उद्देश्य पूर्ती में आप सबका सहयोग और समर्थन की अपेक्षा रखती हूँ।
आप सभी का सहृदय धन्यवाद
अनिता सिंघल, राष्ट्रीय अध्यक्षा, २०२२-२३
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हूस्टन चैप्टर द्वारा आयोजित गीत एवं ग़ज़ल संध्या  "एक अहसास" फरवरी ११, शुक्रवार शाम  ९ :००  ( EST) 
 
 
रजिस्ट्रेशन एवं सम्मिलित होने के लिए लिंक --: https://www.eventbrite.com/e/247717528797
दिन एवं तारीख --  शुक्रवार, ११  फरवरी, २०२२,  ८:०० - ९:३०  बजे शाम ( CST)
फरवरी  १२, २०२२, ७:३० - ९:०० बजे सुबह भारत ( IST)
प्रोग्राम --- वर्चुअल  (virtual),  निशुल्क
रजिस्ट्रेशन -- कृपया लिंक से रजिस्टर करें 
 
 
 
 
 
 
 
  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  -- "जागृति " मंच, प्रथम चर्चा फरवरी ५, २०२२   
 
 
अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, हिंदी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, १९८० में स्थापित, एक वैश्विक हिंदी संस्थान है | समिति का पहला कवि-सम्मेलन माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की अध्यक्षता में १९८० में हुआ था और तबसे भारत और बाहर के कई गणमान्य व्यक्तियों ने समिति के कार्यक्रमों में उपस्थित होकर इसका मान बढ़ाया है ; जिसमे सर्वश्री शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, और कवि नीरज प्रमुख है | पिछले ४१ वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका " विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं |
स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है | "जागृति" हिंदी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिंदी के विश्व-प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिंदी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिंदी में साहित्य-सृजन के लिए अनुप्रेरित करना | इसके लिए समिति ने विद्वानों के वक्तव्यों और चर्चाओं की एक माहवारी वेबिनार शृंखला शुरू की है, जिसकी पहली कड़ी वसंत पंचमी २०२२, यानि ५ फरवरी २०२२, शनिवार को भारतीय समय से ९;३० बजे शाम को निश्चित की गयी है| इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा|
इस पहली कड़ी में विश्व-स्तरीय हिंदी विद्वान; डॉ. हनुमान प्रसाद शुक्ल; प्रो-वाइस-चांस्लर, महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, द्वारा 'अपनी हिंदी की पहचान" विषय पर वक्तव्य और चर्चाएं प्रायोजित हैं  और इसमें पूरे विश्व के श्रोताओं के  भाग लेने की सम्भावना है।  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति 5 फरवरी, 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।

सम्मिलित होने के लिए लिंक है: www.facebook.com/ihaamerica
शनिवार, 05 फरवरी, 2022, 9:30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
IN USA/Canada: 11:00AM EST, 10:00 AM CST , 9:00AM MST, 8:00AM PST
सादर ,
राकेश कुमार
जागृति टीम प्रमुख एवं अध्यक्ष, अंतराष्ट्रीय हिन्दी समिति - इंडिआना शाखा 
 
 
 
बाल खंड (किड्स कार्नर) 
 
 
 
 
 घर की उर्जा
 
भोगीलाल बहुत बड़े व्यापारी थे। कारोबार अच्छा-खासा चल रहा था। आलिशान मकान था। एक बहुत बड़ी बैठक और पांच शयनकक्ष।
परिवार में अस्सी वर्ष की वृद्ध माँ , पत्नी, दो जवान बेटे और एक बेटी। माँ गैरेज में पड़ी खटिया पर लेटी अपनी जिंदगी के बाकी दिन गिन  रही थी।
समय के बीतते कारोबार में मुनाफा कम होता गया। पत्नी की बिमारी के पीछे बहुत पैसे खर्च होने लगे। बिमारी पकड़ी नहीं जा रही थी। जवान बेटों की शादी की बात बन नहीं पा रही थी। कभी-कभी बाप-बेटे के बीच छोटे-मोटे झगड़े हो जाते थे।
भोगीलाल ने अपनी व्यथा मित्र चमनलाल को सुनाई। चमनलाल ने सलाह दी कि किसी अच्छे वास्तुशास्त्री को बताओ। शायद घर में कोई  वास्तुदोष हो।
 
 
 द्वारा -श्री समीर उपाध्याय
 
श्री समीर उपाध्याय गुजरात, भारत से हैं। पेशे से शिक्षक हैं। इनकी शिक्षा एम.ए.,बी.एड.,एम.फिल.(हिन्दी) है। इन्होने कई काव्य संग्रहों में साझा काम किया है। इनको कई सम्मान भी मिल चुके है। इनकी लेखनी का भविष्य उज्वल लग रहा है।
~*~*~*~*~*~
 

चमनलाल की सलाह मानकर उसने एक बहुत बड़े वास्तुशास्त्री को बुलाया। वास्तुशास्त्री ने पूरे घर के भीतर-बाहर चक्कर लगाया और बताया कि वैसे तो आपके मकान का प्लान वास्तु के अनुसार ही है।
आपके मकान में सिर्फ एक ही दोष है।
 भोगीलाल ने पूछा-"पंडितजी! बताइए कि इस दोष का निवारण कैसे किया जाए?"
वास्तुशास्त्री ने कहा-"आपके घर में उर्जा की कमी है।"
भोगीलाल ने पूछा-"उर्जा लाने के लिए क्या किया जाए? "वास्तुशास्त्री ने कहा- "ईश्वर सभी जगह नहीं पहुँच पाते। इसलिए उसने बनाई है माँ । माँ ईश्वर का साक्षात सदेह रूप है। आपने पत्थर की मूर्ति को पूजा-स्थान में स्थापित किया है, किन्तु साक्षात सदेह रूप ईश्वर को गैरेज में स्थान दिया है। माँ घर की उर्जा होती है। घर की उर्जा को आपने घर के बाहर रखा है। माँ घर की रोशनी होती है। अब आप ही बताइए कि माँ के बिना घर में उजाला कैसे होगा? आपको घर के प्लान को बदलने की या किसी विधि-विधान करने की जरूरत नहीं है। बस,घर की उर्जा को घर के भीतर स्थान दे दो। उनके आशीर्वाद से सारी आपदाएं अपने आप हल हो जाएगी।"
वास्तुशास्त्री को सुनकर भोगीलाल अवाक रह गए।
.
.
 
 
 
 
 नाजुक कली तू
 
नाजुक कली तू
कोमल किसलय की नाजुक कली तू
सुगंध बनकर मन में उतर रहीं हो।
आशा का दीप जो चमन में जली
फूल बन बागों में निखर रही हो।
खुशबू से महका तन के बगिया को
इस बंजर दिल पे मचल रहीं हो।
 
आँखों में लगाकर काली सूरमा तू
दिल के महलों पे विचल रहीं हो।
तिमिर भरी इस जीवन बगिया में
बन चाँदनी-सी तू बिखर रहीं हो।
तुझ चंचल कली से जब नजर मिली
चुराके दिल क्यों ऐसे कुचल रहीं हो।
 
बन मीठी स्वप्न इतना करीब आके
उमंग रतिकर दिल को मसल रही हो।
मन के बंजर बगिया सदाबहार करके
वादों  से ऐसे तू क्यों मुकर रहीं हो।
तू खुद को नूर के हवाले करके
अधरों पे सुधा बन पिघल रहीं हो।
मचले दिल अब संभलता नहीं है
 
 
द्वारा -प्रवेश कुमार सिन्हा
 
प्रवेश कुमार सिन्हा- नवादा, बिहार से हैं। छोटे से शहर सी निकल कर भी ये सम्पादन के साथ-साथ कविता, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में लिखते और छपते है।
~*~*~*~*~*~
एक नन्ही चिड़या
 
एक नन्ही चिड़या
खिड़की से
सुबह रोज आती है
मेरे कमरे में, कविताओं में
गाती है, चहकती है
मन को बहलाती है
और कभी वो
अचानक ही
फुर्ररर........से उड़ जाती है।
मैं सुबह जल्दी उठता हूँ
और खिड़की खोल
करता रहता हूँ
उसके आने की प्रतीक्षा
वो घोंसला बनाने को
सहेजती है
बिखरे एक-एक तिनके को
और हमें बताती है
तिनके का महत्व
जो कभी बेकार पड़े थे
आज बन पड़ी है आशियाना
जिसमें पल रही है
किसी की मुस्कान
ये चंचल नैनो से निहारती है
पर थोड़ी-सी आहट से ही
फुर्ररर........से उड़ जाती है।
मैं भी देखना चाहता हूँ
फुर्ररर.......से उड़ता
अपनी कविताओं को
उस चिड़िया की भाँति
जो किसी अंजान
भयंकर अनहोनी को भाफ
थोड़ी-सी आहट से ही
फुर्ररर........से उड़ जाती है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
  डॉ. अशोक लव
 
डॉ. अशोक लव नें दिल्ली विश्वविद्यालय और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की है। उन्होंने नेशनल म्यूजियम, नयी दिल्ली से ‘आर्ट एप्रीसियेशन’ कोर्स भी किया है। उनकी प्रथम रचना १९६३ में प्रकाशित हुई थी, उस समय वे स्कूल में पढ़ते थे। उन्होंने ३० वर्ष आध्यापन किया है। वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में कार्य करते है। उनकी साहित्यिक और शैक्षिक लगभग १५० पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। अभी ये अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की भारत शाखा के दिल्ली अन.सी.आर. शाखा के अध्यक्ष है।
उनकी दो कवितायेँ छोटे बच्चों के लिए नीचे दी जा रही है| 
 
 
 
 
.
 
 
 
 
 
शाखाओं के कार्यक्रम

    अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति --इंडियाना शाखा      
‘विश्व हिंदी दिवस’ पर एक सफल कवि सम्मेलन
 
 
 
 
द्वारा डॉ. कुमार अभिनव, उपाध्यक्ष, अ..हि.स.
इंडियाना शाखा
 
 
 
 
 
 
 
 
‘विश्व हिंदी दिवस’ 10 जनवरी 2022 के अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, इंडियाना शाखा ने एक आभासी कवि सम्मेलन का आयोजन किया । यह कार्यक्रम भारत की स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष को चिह्नित करने के लिए भी आयोजित किया गया था। आयोजन का नेतृत्व अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, इंडियाना शाखा के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार ने किया। वह कार्यक्रम के संयोजक और मेजबान भी थे। श्री अमित कुमार, कौंसल जनरल ऑफ़ इंडिया, शिकागो ने इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया और उद्घाटन भाषण दिया, जिससे सभी प्रतिभागियों और दर्शकों को प्रेरित और गौरवान्वित हुए ।
डॉ. राकेश ने प्रत्येक कवि का सुंदर दोहों से परिचय दिया और स्वागत किया जिससे कार्यक्रम का प्रवाह सुचारू रूप से चलने में सहायता मिली और दर्शकों को बांधे रखा। अधिकांश दर्शक शुरू से अंत तक बने रहे - लगभग 100  दर्शकों  ने कार्यक्रम का आनंद लिया।  कार्यक्रम को अब तक फेसबुक पर १८०० से ज्यादा बार देखा और सुना जा चुका है..  इसे YouTube पर भी पोस्ट किया गया है। इस ‘विश्व हिन्दी दिवस’ कवि सम्मेलन में दस कवियों और कवयत्रियों ने भाग लिया । उनके नाम हैं अर्चना पांडा, राकेश मल्होत्रा, दीप शाह, गौरी वर्मा, प्रिया भारद्वाज, श्वेता गुप्ता, संजीव श्रीवास्तव, स्मिता सिंह, राघवेंद्र भदौरिया और रमेश जोशी। एक के अलावा सभी कवि एवं कवित्री यूएसए से थे और सभी ने स्वरचित  कवितायेँ पढ़ी। सभी कवि अपने पेशेवर करियर में अग्रणी हैं और एक शौक के रूप में कविता लिखते हैं। उनकी कविताओं को सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी पेशेवर और सुप्रतिष्ठित कवियों से कम नहीं हैं।
कविताओं में शामिल विषय बचपन की यादों से लेकर माता-पिता की भूमिकाओं तक हिंदी की सुंदरता और हमारी भारतीय संस्कृति और विरासत की समृद्धि तक थे। सभी कविताओं ने दिल के तार खींचे और हमें भावुक कर दिया। हमारे अपने श्री राघवेंद्र की कुछ हल्की-फुल्की "हस्य-रस" कविताएँ भी थीं, जो अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, इंडियाना में सचिव के पद पर भी हैं। कुल मिलाकर, एक बेहद सफल आयोजन जिसे कार्यक्रम के दौरान और बाद में दर्शकों से शानदार प्रतिक्रिया मिली। कार्यक्रम के अंत में डॉ. राकेश कुमार ने कवि सम्मेलन के सभी दर्शकों, श्री अमित कुमार, कौंसल जनरल ऑफ़ इंडिया, शिकागो, श्री रंजीत सिंह, इंडियन कांसुलेट शिकागो और सभी प्रतिभागियों का पुनः हार्दिक अभिनन्दन करते हुए
 धन्यवाद दिया।
 
 
 
 
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तर पूर्वी शाखा में हुई गतिविधियों की रिपोर्ट २०२०-२०२१   
 
 
 
 
डॉ. शोभा खंडेलवाल
 
 
द्वारा- डॉ. शोभा खंडेलवाल, अ.हि.स. उ.पू.ओहियो शाखा, अध्यक्ष सत्र २०२०-२१
ये पेशे से डॉक्टर है और ओहायो के मेडाइना शहर में वरिष्ठ नागरिकों की चिकित्सा में संलग्न हैं । हिन्दी भाषा के प्रचार और प्रसार में इनकी विशेष रुचि है ।ये अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति से लगभग सैंतीस वर्षों  से जुड़ी हुई है।
 
                ~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
जनवरी 12, 2020 को हमारी पहली आमने-सामने की परिवर्तन कालिक बैठक (ट्रांजिशनल मीटिंग) हुई थी और इसी बैठक के साथ-साथ विश्व हिंदी दिवस भी मनाया गया। इसमें कवियों ने अपनी मूल रचना का पाठ किया तथा विश्व हिंदी दिवस के बारे में दर्शकों को बताया गया।
मार्च 2020 तक कोरोना का संक्रमण पूरे विश्व में फैल गया था और सब अपने -अपने घरों में कैद हो गए थे। इस COVID-19 के युग में, जब सामाजिक-दूरी को ही सामाजिक-निकटता मानी जाने लगी तब आभासी बैठकों का प्रारम्भ हुआ और वे सामाजिकरण का मुख्य केंद्र बन गयी। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अ.हि.स.) की उत्तर-पूर्व ओहियो शाखा के हिंदी साहित्य-प्रेमियों द्वारा एक सुरुचिपूर्ण काव्य-गोष्ठी की गयी। शनिवार, 25 अप्रैल, 2020 को ज़ूम माध्यम का उपयोग करते हुए, पहले आभासी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान, कवियों ने आभासी दर्शकों के सामने अपनी मूल रचना का पाठ किया, जो न केवल क्लवलैंड से, बल्कि सिनसिनाटी, न्यूयॉर्क और भारत जैसे दूर के स्थानों से भी शामिल हुए।
उत्तरपूर्व ओहायो समिति ने इंडिया फेस्टिवल यूएसए के कार्यक्रम में अगस्त 15, 2020 को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का प्रतिनिधित्व किया और समाज को इसके लक्ष्यों के बारे में बताया ।
हर वर्ष की भाँति, पिछले वर्ष भी अ. हि. स. की उत्तर-पूर्व शाखा ने २० सितम्बर, २०२० को हिंदी दिवस धूमधाम से मनाया। यह अभूतपूर्व था क्योंकि यह पहली बार ज़ूम और फेसबुक के आभासी मंच पर मनाया गया था। यह कार्यक्रम करीब शाम दो घंटे ३ से ५ बजे तक चला। इसमें ३०० से भी अधिक दर्शक आभासी मंच से जुड़े। इसमें कुछ अमेरिका के मिशिगन, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया, विस्कॉन्सिन और मास्स्चुसेट जैसे राज्यों से थे तो कुछ भारत और कनाडा से जुड़े थे। मंच का संचालन डॉ तेज पारीक, श्रीमती रेनू चड्डा और श्रीमती ऋचा माथुर ने किया।
इस शाखा ने डॉ. शोभा खंडेलवाल की अध्यक्षता में प्रथम बाल-दिवस का आभासी कार्यक्रम ८ नवम्बर, २०२० को शाम ४ से ५ बजे तक ज़ूम पर आयोजित किया। ९-१६ वर्ष के बच्चों ने ओन लाइन जेपरडी और रंगोली प्रतियोगिताओं में भाग लिया। जिन प्रतिभागियों ने प्रतियोगिताओं में भाग लिया उन्हें प्रमाण-पत्र और गिफ्टकार्ड दिए गये।
१० जनवरी, २०२१ को पहली बार इस समिति द्वारा आभासी ‘विश्व हिंदी दिवस’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ज़ूम के द्वारा लगभग 200 और फेसबुक के द्वारा 258 दर्शकों ने अमेरिका के वाशिंगटन डी.सी., न्यू जर्सी, कैलिफ़ोर्निया, मेसाचूसेट, कोलाराडो, एरिजोना, विस्कोंसन, वर्जीनिया, न्यू यॉर्क, पेंसल्वेनिया, इंडिआनापोलिस, फ्लोरिडा, नार्थ कैरोलिना, टेनेसी और ओहायो राज्यों के अलावा भारत, कनाडा और UK से भी भाग लिया। इस आयोजन का उद्देश्य युवा पीढ़ी में हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रति रूचि पैदा करना था। कार्यक्रम में हिंदी की विभिन्न विधाओं जैसे, गीत ग़ज़ल, लघु व्यंग रचना/प्रहसन में मुहावरों का प्रयोग, नृत्य आदि का समावेश था।
उत्तरपूर्व ओहायो शाखा ने इस वर्ष अ.हि.स. के २० वें द्विवार्षिक अंतरराष्ट्रीय हिंदी अधिवेशन के आतिथ्य का दायित्व लिया था, यह अधिवेशन ९ और १० अक्टूबर २०२१ को बड़ी अच्छी तरह सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन की संयोजिका श्रीमती किरण खेतान और सह संयोजिका श्रीमती रेणु चड्ढा और डॉ. शोभा खंडेलवाल थी। इसका मुख्य विषय था “Teaching and learning technique in Hindi As 2nd language” यह अधिवेशन अपने आप में अनूठा था क्योंकि पूरे अधिवेशन में यह अपने मुख्य विषय पर ही केंद्रित था। हिंदी को दूसरी भाषा के रूप प्र्स्तुत करने के लिये किरण खेतान के साथ रश्मि चोपड़ा और अलका खंडेलवाल भी बहुत ही अच्छी तरह काम करके अधिवेशन को और भी प्रभावशाली बना दिया। अधिवेशन का सांस्कृतिक कार्यक्रम भी अपने आप में अनुठा था । दुनिया के कोने-कोने से लोगो को जोड़ा गया। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विभिन्न स्थानीय शाखाओं ने इसमें भाग लिया। इसके लिए श्रीमती रेणु चड्ढा बधाई की पात्र हैं। ”हिंदी भाषा की यात्रा“ का अद्भुत कार्यक्रम समिति की वरिष्ठतम सदस्या डॉ स्नेह राज की कल्पना को रिचा माथुर और अलका खंडेलवाल ने अन्य लोगों के साथ मिलकर साकार किया। यहाँ पर अनंत माथुर, अशोक खंडेलवाल,डॉ. विवेक खंडेलवाल को विशेष धन्यवाद है जिन्होंने घंटों अपना समय लगाकर वीडियो एडिटिंग की और तभी यह हिंदी भाषा की यात्रा को आभासी रूप में हम देख पाए। इस नृत्य नाटिका में दर्शाया गया कि हिंदी की उत्पति हजारों वर्ष पहले कैसे हुई और अब इसका क्या रूप है।
कवि सम्मेलन में भारत से नौ कविगण जुड़े। डॉ प्रवीण शुक्ला के नेतृत्व में यह कार्यक्रम काफी सफल रहा। श्री आलोक मिश्रा जी के अथक परिश्रम का परिणाम था कि इतने सारे कवि भारत से ज़ूम पर जुड़े। सभी लोगों ने इसका भरपूर आनंद लिया और इसकी सराहना की। अधिवेशन का पूरा विवरण फोटो के साथ अ.हि.स. के मासिक ‘संवाद’ एवं त्रेमासिक ‘विश्वा’ में बहुत ही अच्छी तरह से प्रकाशित किया गया है।
८ नवम्बर २०२१  को एक आम बैठक की गयी और श्रीमती किरण खेतान को सर्वसम्मती से आगामी सत्र २०२२-२३ के लिए अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो समिति के में लिए अध्यक्ष मनोनीत किया गया ।
***
 
 
दो कविताएँ
 
 
 नव वर्ष की शुभकामनाएं 
 
 
 
 
 नव वर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं...
 
हो सुरमय धरती इस वर्ष !
नए प्रभात की नई रश्मियां
फैलाएं चहुँ ओर हर्ष !!

गीत सुरीला सब मिल गाएं,
आशा के नव दीप जलाएं,
हर मन के आंगन में गूंजे
एक ही स्वर, मिटे संघर्ष !!

मंगलमय हो सब का जीवन,
मधुर राग से रंजित कण-कण,
सुंदर सपने सच हों सारे,
संभव हो सब का उत्कर्ष !!
मंगल स्वरों के साथ...
 
 
डॉ. शिवानी मातनहेलिया,
 
डॉ. शिवानी मातनहेलिया, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद से संबद्ध कला व संस्कृति के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी हैं। इनमें संगीतज्ञ, कवियित्री, गीतकार, लेखिका, शोधार्थी, वक्ता, शिक्षिका और संगीत निर्देशक का अद्भुत समन्वय हैं। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "यश भारती" के अतिरिक्त शिवानी को संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए 25 से अधिक सम्मान दिए गए हैं।
 
~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
 
 
स्वागत आगत वर्ष तुम्हारा
 
स्वागत आगत वर्ष तुम्हारा, स्वागत आगत वर्ष ।
करें कामना सब को सुखकर हो यह नूतन वर्ष ।
कोई भ्रम, शंका हो तो भी बंद न हो संवाद ।
आपस में मिल-जुल सुलझा लें हो यदि कोई विवाद ।दुःख-पीड़ा आपस में बाँटें, बाँटें उत्सव-हर्ष ।

स्वागत आगत वर्ष तुम्हारा, स्वागत है नव वर्ष ।
सभी परिश्रम करें शक्ति भर, पर ना करें प्रमाद ।
जले होलिका, विश्वासों का बचा रहे प्रह्लाद ।
केवल कुछ का नहीं सभी का हो समुचित उत्कर्ष ।

स्वागत आगत वर्ष तुम्हारा, स्वागत है नव वर्ष ।
'स्वार्थ छोड़ कर्त्तव्य करे जो वो ही सबका राम' ।
यह आदर्श हमारा होवे, होंगे शुभ परिणाम ।
न्याय-जानकी अपहृत हो तो मिलें, करें संघर्ष ।
स्वागत आगत वर्ष तुम्हारा, स्वागत है नव वर्ष ।
 
 
श्री रमेश जोशी जी
 
श्री रमेश जोशी जी २००२ से भारत सरकार के केन्द्रीय विद्यालय संगठन से सेवानिवृत हैं। विगत २०-२१ वर्षों से अमरीका आते रहे हैं। तभी से उनका परिचय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए. के पदाधिकारियों से हुआ। पिछले ग्यारह वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए. की त्रैमासिक पत्रिका 'विश्वा' के प्रधान सम्पादक हैं। इनके कार्यभार संभालने के बाद से विश्वा का प्रकाशन लगातार यथासमय हो रहा है। किशोरावस्था से ही लेखन शुरू हुआ जो आज भी अनवरत जारी है। व्यंग्य विधा में २०-२५ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सत्र २०२२-२३ के लिए अ.हि.स. के निदेशक मंडल के सदस्य हैं।
 
~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
 
 
 चल, निकल पड़ करने फिर दिवाकर की परिक्रमा!
 
 
मत समझ कि होगी तेरी ये यात्रा सरल,
कभी मिलेंगे कंटीलें, बीहड़ मोड़, तो कहीं होंगे सुमधुर पल।
संग अपने रख मंज़िल पहुँचने के नेक इरादे,
ध्यान रहे, सभी मुसाफिर यहाँ हैं कठपुतली और प्यादे।
_चल, निकल पड़ करने फिर दिवाकर की परिक्रमा।_
देख! क्षण-भंगुर ज़िन्दगी कहीं फिसल न जाये जैसे हाथों से रेत,
सींचता चल राह में आए मानवता के लहलहाते खेत ।
राह में मिलेंगे कुछ आंसुओं के दरिया,
प्रीति से अपनी लगा देना पार उन दुखियारों की नैया ।
_चल, निकल पड़ करने फिर दिवाकर की परिक्रमा!_
पिछड़े, कमज़ोर, लाचार पथिकों की मत करना अनदेखी,
 
 
डॉ. सुनीता द्विवेदी
 
डॉ .सुनीता द्विवेदी, ‘श्याम’ ने संजय गाँधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संसथान (SGPGIMS), लखनऊ से प्रतिरक्षा विज्ञान (Immunology) में पीएचडी की उपाधि ग्रहण की है। इनको Big Data में बहुत रूचि है। इसलिए इन्होंने Health Informatics में MS भी किया है। ये अपने परिवार सहित पिछले कई वर्षों से सोलन, ओहायो में हैं। इन दिनों कोरोना की महामारी के कारण घर में रह कर अपने बचपन की लिखने की रूचि को संवार रही हैं।
                ~*~*~*~*~*~*~*~
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 न जाने कब पासा पलट जाए - ये है जीवन की चरखी ।
है हर प्राणी वसुधा के संसाधनों का समान अधिकारी,
क्यों फैलाता है दम्भ, लालच और द्वेष की महामारी ।
_चल, निकल पड़ करने फिर दिवाकर की परिक्रमा!_
समझना जीवन-यात्रा के मर्म को है ज़रूरी,
सजाता चल अपने पथ पर मीठे बोलों की फुलवारी ।
छोड़ ब्रह्माण्ड, इस सौर-मंडल में क्या है तेरा अस्तित्व!!
तराश ले अपने अंदर का कर्मठ व्यक्तित्व ।
_चल, निकल पड़ करने फिर दिवाकर की परिक्रमा!_
_शीश झुकाकर, ऐ पथिक, निकल पड़ करने फिर दिवाकर की परिक्रमा !
 
 
 
 
अपनी कलम से 
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. श्रीमती नीलम सिंह
 
 
डॉ. श्रीमती नीलम सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी), सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश।
 
 
"गोदान तक आकर प्रेमचन्द का यथावाद एक ठोस रूप ग्रहण कर लेता है" 
 
 
प्रेमचन्द के आगमन से हिन्दी उपन्यास में नया युग प्रारम्भ होता है। बल्कि यों कहा जाय कि वास्तविक अर्थों में उपन्यास युग आरम्भ होता है। उपन्यास साहित्य की सृष्टि जिस उद्देश्य को लेकर हुई थी उस उद्देश्य की पूर्ति प्रेमचन्द के पूर्व के उपन्यासों द्वारा नहीं हुयी। पश्चिम में उपन्यासों का जो विकास हो गया था उससे भी प्रेमचन्द के पहले के उपन्यासकार लाभान्वित नहीं हो सके थे। प्रेमचन्द ने पहली बार उपन्यास के मौलिक, क्षेत्र,स्वरुप और उद्देश्य को पहचाना। पहचाना ही नहीं उसे भव्य समृद्धि प्रदान की काफी ऊंचाई तक ले गये।
प्रेमचन्द आदर्शवादी थे या यथार्थवादी इस प्रश्न पर शुरू से ही विवाद है। लेकिन यह सच भी है कि प्रेमचन्द आदर्शवादी लेखक थे और अतीत तथा वर्तमान जीवन में से महान भव्य चरित्रों को चित्रित करते । वे जीवन की सामान्य बुराईयों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें जानकर छोडे देते। उनकी दृष्टि भी विशेष जीवन पर केन्द्रित रहती और जीवन में क्या होना चाहिए अपना उद्देश्य समझते जीवन में क्या है और क्या हो सकता है इससे उनका विशेष प्रयोजन नहीं होता। वरदान प्रतिज्ञा रंगभूमि सेवासदन, काव्यकल्प आदि सभी रचनाओं में इनका झुकाव आदर्शवाद की ओर अधिक रहा किन्तु समय के साथ प्रेमचन्द की मानसिकता व सोच में बदलाव आया और सत्य को पहचानने लगे कि उपन्यास सोद्देश्य होना चाहिए अर्थात उपन्यास या कोई भी साहित्यिक विधा मनोरंजन के लिए नहीं होती वरन वह मानव जीवन को शक्ति और सुन्दरता प्रदान करने वाली सोद्देश्य रचना होती है और यही सोदेश्यता इनके उपन्यासों की सफलता का रहस्य है। वे समय की नब्ज़ को पहचान कर उसके साथ-साथ चलते रहे। अन्त में उन्होंने युग चेतना के अनुरूप ही आदर्शों के आवरण को उतार फेंका था और जीवन तथा उसके पर्यावरणों को यथार्थ दृष्टियों से देखने लगे थे। इस दिशा परिवर्तन में ही प्रेमचंद की कला और जीवन दृष्टि का विकास हुआ है - गोदान और उससे भी आगे मंगलसूत्र उपन्यास तथा कफन जैसी अंतिम कहानियाँ इस बात की साफ गवाही दे रही हैं कि प्रेमचन्द ने पहला आदर्शवादी प्रभाव त्याग दिया है और सच्चा यथार्थवादी ढंग अपना लिया है।
गोदान में तो उन्होंने होरी के रूप में आदर्शों को स्पष्टत:भूमिसात होते हुए दिखाया है। यह प्रमाणित करने का सफल प्रयत्न किया है कि आज के बदलते हुए युग आयाम में कोई भी व्यक्ति आदर्शों को ओढ़कर या मात्र सम्भावित सत्यों का ढ़ीडोरा पीटकर जीवित नहीं रह सकता। आज मानव की नियति यथार्थ को पहचान कर चलने और जीने में ही है।
एक स्थान पर अपने सम्बन्ध में प्रेमचन्द जी ने कहा था कि---
“यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओ, हमारी विषमताओं और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है। मानव चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है हमको अपने चारों तरफ बुराई ही नजर आने लगती है।" पर चारो तरफ का परिवेश ही वैसा हो तो प्रेमचन्द भी उससे आंखे कैसे मूंद सकते हैं। अपनी अन्यतम सर्जना गोदान में निराशावादी होने के भय से वे समूचे ग्राम परिवेश और विशेषत: होरी के घिनौने यथार्थ से कहाँ आँखें मूंदे पाये हैं? क्या होरी अपने अच्छे बुरे समुचे परिवेश को लेकर हमारे सामने नहीं आया? निश्चय ही होरी और उसका परिवेश ऐसी दुर्बलताओं, विषमताओं और क्रूरताओं का एक नग्न चित्र हैं कि जो निराशाओं को जन्म दे सकता है। पर अंधेरी रात के बाद उज्जवल सूर्योदय के समान निराशा के सघन कुहासों को चीर कर ही आशा का प्रकाश जगमगा सकता है क्या इसी ओर वे हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहते? मेहता मालती की प्रक्रियाए भी क्या यही संकेत नहीं देती? होरी का करुण अवसान वास्तव में एक कारुणिक व्यवस्था का अवसान है, जिसके बाद एक नव्य या इच्छित व्यवस्था को जन्म लेना है। उसके जन्म के बिना कोई चारा ही नहीं यह बात प्रेमचन्द भी जानते थे और हम सब भी, अत:जिस व्यवस्था में होरी का अवसान हुआ वह तो गोदान का यथार्थ है जिस व्यवस्था को जन्म लेना है। उसे हम गोदान का आदर्श कह सकते हैं। हम सब का भी वही आदर्श हो सकता है।
प्रेमचन्द जी कहते हैं कि "उपन्यास में आदर्श अवश्य हो पर यथार्थ और स्वाभाविकता के प्रतिकूल न हो उसी तरह यथार्थवादी भी आदर्श को न भूले तो श्रेष्ठ है।" इसलिए डॉ. नगेन्द्र के विचार में प्रेमचन्द जी का व्यावहारिक आदर्शवादी होना ही वास्तव में उनका यथार्थोंन्मुख आदर्शवाद या आदर्शोंन्मुख यथार्थवाद है। रोमानी होना निश्चय ही मात्र कपोल कल्पित होना है और कोई भी विद्वान इनकी रचनाओं को मात्र कपोल काल्पेत नहीं कह सकता। उसमें एक युग की जीवन्त आहें कराहें और तड़पती चेतनाए हैं। उनसे उबरने लिए अनेकश: उन्होंने मार्ग भी सुझाए हैं वे मार्ग भी कोरे आदर्श नहीं व्यवहार हैं। अतः निश्चय ही प्रेमचन्दजी आदर्शोंमुख यथार्थवादी थे।
अब हम गोदान के सन्दर्भों में उनके आदर्शवाद एवं यथार्थवाद पर बिचार करेगें। उनके विचारकों के अनुसार गोदान में भी प्रेमचन्द में आदर्शोन्मुखता रही पर यहाँ वे आदशों के स्वरूप को पूर्ववर्ती उपन्यासों के समान प्रखरता प्रदान नहीं कर सके क्यों कि यहां उनके पात्रों की सृष्टि विशुद्व मानवीय आदर्शों से अनुप्राणित नहीं। इससे हम यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि गोदान में उनका दृष्टिकोण जीवन के यथार्थ को उभारने की ओर अधिक रहा है। यहाँ उन्होंने समस्त मानवीय आदर्शों को तो नहीं परम्परागत व्यवस्था दोष के कारण विगर्हित हो गये आदर्शों को स्पष्टत: खंडित होते हुए दिखाया है। होरी का विघटन निश्चय ही पथावरोधक व्यवस्था दोष से संयत पुराने किसान के आदर्शों का विघटन है। होरी का रूप आदर्श है। पर उपन्यासकार के अनुसार उन आदर्शों के पालन के कारण व्यवहार और यथार्थ जीवन में जो कुरुपतायें आती हैं वे अत्यधिक संघातक एवं सन्तापक हैं। अतः आज के परिवर्तित मूल्यों वाले युग में होरी के आदर्शों को पालकर कोई भी किसान अपनी इच्छाओं को पूर्ण होते नहीं देख सकता। इसलिए आज किसान के आदर्शों में जीवन के यथार्थ के अनुरूप आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। आदर्शों के विघटन के कारण ही गोदान में आदर्श के रूप में प्रखरता नहीं आ पाई वल्कि जीवन का घिनौना यथार्थ ही प्रखरता के साथ रुपायित हो पाया है ।
उपन्यास की अभिव्यक्ति पद्धति और मूल संवेद्य या उद्देश्य के आधार पर ही हम यहाँ आदर्श और यथार्थ का निर्णय कर सकते हैं। सबसे पहली और प्रमुख बात तो यह है कि गोदान में उपन्यासकार नें अपने पूर्ववर्ति अनेक उपन्यासों के समान किसी आदर्श की प्रतिष्ठापना नहीं की। यहाँ लेखक का युगीन सुधारवादी दृष्टिकोण भी कहीं दिखाई नहीं देता। लगता है कि उपन्यासकार ने वहाँ तक पहुँचते- पहुँचते पूर्णतया अनुभव कर लिया था कि गांधीवादी नीतियों से वर्तमान सन्दर्भों में कृषक संस्कृति का उद्धार सम्भव नहीं हो सकता, गांधीवाद उन्हे परिवेश जन्य अव्यवस्थित दयनीयता से नहीं उभार सकता । उसके लिए वस्तुनिष्ठ दृष्टियों को अपनाना अत्यावश्यक है। इसी कारण उनका कथा नायक होरी आदर्श पात्र न वनकर व्यक्तिगत और वर्गगत विशेषताओं और मान्यताओं का प्रतीक बनकर सामने आया है। उसके चित्रण में उपन्यासकार के महत्वपूर्ण आत्मचरितात्मक गुण एक तत्व भी विद्यमान है होरी के समग्र जीवन एवं चरित्र को विद्वान समीक्षकों ने इस एक सूत्र में बाँधने का प्रयत्न किया है कि "वह उत्पन्न हुआ कष्ट भोगता रहा और अंत में निरीह स्थिति में मर गया।" इससे यह ध्वनि निकलती है कि मान्य एवं परम्परागत जीवन के यथार्थ परिवेश में भारतीय किसान के आदर्शों और जीवन का, मरण का भी कोई महत्व नहीं है। किसान के प्रति यह नकारात्मक रुख आज तो नहीं अपितु उपन्यास के रचनाकाल के युग का एक जीवन्त यथार्थ है। इसी कारण गोदान में उसका करुण विगलित हृदय जीवन के यथार्थ को रूपायित करने के लिए प्रखरता के साथ प्रवाहित हुआ है कि उसमें आदर्श स्वतः ही बहकर विखर गये हैं।
कितनी दैयनीय एवं करुणोज्जवल स्थिति है एक किसान की। होरी गाय का पालन करने के लिए स्वभावत: ललायित होता है किसी भी प्रकार बेचारा गाय प्राप्त भी कर लेता है वह भी भोला को व्याह करने का आश्वासन देकर। इस प्रकार होरी गाय को अपने द्वारपर ले भी आता है पर वही उसकी आगामी समस्त आपदाओं का कारण बन जाती है। आपदाये सहकर भी वह गाय को रख नहीं पाता है। गाय पालन की ललक में उसका सारा परिवार भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। वह क्रमशः विघटित होते हुए मजदूर मात्र बन कर रह जाता है। रह जाता क्या रह भी नहीं पाता और जब मरता है तो उस समय उसके पास गोदान के लिए न तो गाय है और न बछिया और न पैसा। कितनी विडम्वना है कि जो व्यक्ति जीवन भर गाय के लिए तरसता रहा मरने के बाद न जाने कौन सी वैतरणी तरने के लिए सुतली कातकर प्राप्त किये गये बीस आने पैसे से ही उसका गोदान करा दिया जाता है। इससे बढ़कर कृषक जीवन और संस्कृति की विषादमयी स्थिति क्या होगी। इसी कारण उन्होंने होरी को चौड़े दिन के प्रकाश में चौराहे पर ही रहने दिया है ताकि मानवता केहीर-साधन के नारे लगाने वाले लोग आँखे खोलकर अपनी क्रियाओं की यथार्थ प्रक्रिया देख सकें।
उनकी कफन कहानी इसी यथार्थता के अन्तर्गत जाती है। वे कहते हैं- कि यह कैसी जीवन की विडम्बना है कि मनुष्य जब तक जीवित रहता है उसे न तो खाने के लिए सुलाभता से भोजन मिल पाते हैं और न वस्त्र और वही मनुष्य जब मर जाता है तो उसे नये वस्त्र और फल फूल से पूर्ण कर दिये जाते हैं। कफन कहानी जीवन की इसी यथार्थता को हमारे सामने लाती है।
गोदान में वैसे तो सर्वत्र यथार्थ रूप ही झलकते हैं यदि कही आदर्श है तो वह इस प्रकार है- मेहता को अपने अकृत्रिम स्वाभाविक जीवन के प्रति आकर्षण गोविन्दी का भारतीय आदर्शों से समन्वित नारी होना और मालती का पहले मधुमक्खी और तितली के समान दिखायी देना और बाद में ममता त्याग सेवा और परोपकारिता को ही जीवन की सार्थकता का बिंदु मान लेना आदि ! वास्तव में प्रेमचन्द जी के आदर्श का कोई मार्ग या रूप हो सकता है, है तो यही। पर वे यथार्थ को अधिक महत्व देना चाहते थे इसी कारण उनका यह रुप गोदान में प्रखरता के साथ उमर नहीं पाया।
इस उपन्यास में यथार्थवादी प्रवृत्ति मुखर पायी जाती है। प्रेमचन्द ने समाज की पंकिलता के यथार्थ चित्रण में कोई दुराव छिपाव की नीति नहीं अपनाई। वे सब प्रसंग और घटनाओं को यथातथ्य शैली में प्रस्तुत किये हैं। धनिया जो होरी की पत्नी है वह जीवन के यथार्थ के अधिक निकट है। वह अपने पति को बार-बार रोकती टोकती भी पर वह इस साध्वी के यथार्थ पहचानकर उसे ही अक्सर मारपीट कर चुप करा देता है। यह भी संस्कृति की एक यथार्थ नियति है। धनिया गांव के उन पंचों और उनके विधानों को जानती है जो दुर्बल को और अधिक दुर्बल बनाना चाहते हैं इसी कारण अपने परिवार और अस्तित्व की रक्षा के लिए पंचायत और विरादरी के ढकोसलों को तोड़ फेंकने को प्रेरणा देती है। पर वह सफल नहीं हो पाती। उसकी असफलता एक कटु यथार्थ है।
प्रेमचन्द जी का यथार्थ चित्रण उस समय पाठको के दिलों में एक टीस पैदा कर देता है जब होरी महाजनों के पंजों से अपनी जमीन की रक्षा करना चाहता है लेकिन रक्षा नहीं कर पाता इसके लिए वह अपने जान को भी लड़ा देता है तभी उस पर बेदखली का दावा हो जाता है और महाजन उसे अपनी कन्या बेचने के लिए मजबूर कर देते हैं तब अन्त में वह अभय दान करने के लिए तैयार हो जाता है।
प्रेमचन्द जी एक यथार्थवादी कलाकार थे। वे जीवन की सच्चाई आंकना चाहते थे, जीवन के भ्रमों का खण्डन करना चाहते थे। उपन्यासो के रचना क्रम में अन्तिम उपन्यास गोदान तक आते-आते यथार्थवाद को इसतरह विकसित किया जिस तरह एक ही साहित्यकार बहुत कम कर पाता है। अपने यथार्थवाद से उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य के लिए वह राजमार्ग बना दिया है, जिस पर नई पीढ़ी के लेखक निर्भय होकर आगे बढ़ सकते हैं। गोदान में जो कुछ भी है वह प्रत्यक्षत: व्यावहारिक और यथार्थ है। व्यवस्था दोष के कारण आदर्श की मृत्यु भी गोदान का अंतिम सत्य है।
***
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. अमित कुमार दीक्षित
 
 
डॉ. अमित कुमार दीक्षित, स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड (सेल) सीएमओ, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
 
 
 भारत का अमृत महोत्सव और नई प्रौद्योगिकी व हिंदी
 
 
भारत का अमृत महोत्सव का उद्देश्य India@2047 के लिए विज़न बनाना है जिसका आधार तकनीकी और वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक सामंजस्य को भी स्थापित करना है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि देश को आजाद हुए 75 वर्ष हो गए अर्थात इस वर्ष भारत की आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है लेकिन अब भी इसकी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हमने एक राष्ट्र-चिहन्, एक राष्ट्र – ध्वज, एक राष्ट्र गान और एक राष्ट्रीय प्रतीक को तो अपनाया, लेकिन हम हिंदी को राष्ट्रभाषा गौरव प्रदान नहीं कर सके। राष्ट्रभाषा वस्तुतः राष्ट्रीय जीवन का आदर्श होती है। हिंदी – राष्ट्रभाषा एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ की अधिकृत भाषा बनने के योग्य है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए हिंदी में विज्ञान – चिंतन आवश्यक है। हिंदी के विज्ञान – लेखन में सबसे बड़ी बाधा भाषिक स्वाभिमान की कमी है ।

किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए तीन वस्तुएं विशेष सम्मानीय व विशिष्ट होती हैं –
  • राष्ट्र-ध्वज, जिसमें देश का मान छिपा होता है ।
  • राष्ट्र संविधान, जो देश की शान का प्रतीक होता है ।
  • राष्ट्रभाषा, जो राष्ट्र की आन और वाणी का अभिमान होती है ।
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में डिजीटल मीडिया द्वारा हिंदी को अफ्रीका, मध्य-पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में एक चित्ताकर्षक ढ़ंग से लगातार पहुँचाया जा रहा है। धरती से 35000 फीट से भी अधिक ऊँचाई पर हिंदी की कमी का अनुभव होने लगा है। आस्ट्रियन एयरलाइन्स, स्विस एयरलाइन्स, एयर फ्रांस ने कहा है कि भारतीय यात्रियों की लगातार हो रही वृद्दि को दृष्टिगत रखते हुए, वे भारत की अपनी प्रत्येक उड़ान में कम से कम ऐसे दो क्रू को रखेंगे जो हिंदी बोलना जानते हों। भूमंडल पर हिंदी दौड़ रही है, तथा वायुमंडल में उड़ रही है, तथा राष्ट्रीय अस्मिता और आस्तित्व को पारदर्शी तौर पर विश्व के समक्ष सफलतापूर्वक रख रही हैं। आज हिंदी सूचना प्रौद्योगिकी की भाषा बन गई है। समाचार, पत्र-पत्रिकाएं आकाशवाणी, दूरदर्शन, फिल्म कंप्यूटर, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हिंदी का बहुत ही प्रचार – प्रसार किया है। वैश्विक ग्राम में अपना आस्तित्व बनाये रखने हेतु प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी। इस संबंध में प्रसाद जी की पंक्तियां उपर्युक्त प्रतीत होती है :-

"यह नीड़ मनोहर कृतियों का
यह विश्व एक रंगस्थल है
है परम्परा लग रही यहाँ

ठहरा जिसमें जितना बल है ।"
 
सन् 1965 में देवनागरी संबंधित एक आवश्यक साफ्टवेयर निर्मित किया गया। इसके बाद अनेक पैकेज आए। समर्पित साफ्टवेयर प्रोग्राम के अन्तर्गत हित में अत्युपयोगी, हिंदी में डाटा संसाधन का एक साफ्टवेयर आया जो द्विभाषी डाटाबेस प्रबंधन प्रणाली के नाम से जाना जाता है। डीम्बेस, लोटस साफ्टबेस क्लिपर फॉक्सप्रो तथा ओरेकल आदि रोमन लिपि के सभी साफ्टवेयर पैकेज में हिंदी कार्य किया जा सकता है। लिप्स प्रौद्योगिकी सी-डैक जिष्ठ ग्रुप पुणे के दूसरे चरण में हिंदी में विडियों प्रदर्शनार्थ एक साफ्टवेयर विकसित किया गया है। यूनिकोड तकनीक ने तो इस काम को और आसान किया है। टाइप करो रोमन अंग्रेजी में और प्राप्त करो देवनागरी हिंदी में, सचमुच नई प्रौद्योगिकी के नित नये आविष्कारों ने लोगों को आत्मनिर्भर बनाया है। आज इंटरनेट के साथ अन्य अनेक तकनीकी सूचना संजाल सोशल नेटवर्किंग साइट्स के रूप में बेजोड़ है। इन अत्याधुनिक साइट्स में हिंदी में अभिव्यक्ति की सारी सुविधा उपलब्ध है - ऑरकूट, फेसबुक, ट्वीटर, माई स्पेस, वाट्सअप, इंस्टाग्राम, ब्लॉग स्पॉट इत्यादि।
‘बिलगेट्स’ ने स्वीकारा है - ‘’नागरी की संगणकीय आवश्यकता हिंदी के विकास में परिणत होगी यह लगभग तय है।‘’
नई प्रौद्योगिकी व हिंदी नवीनतम ई-टूल्स
हिंदी टाइपिंग विकल्प
मशीन अनुवाद
कंठस्थ ( ट्रांसलेशन मेमोरी सिस्टम)
हिंदी ई - लर्निंग
अनुवाद ई - लर्निंग
ऑनलाइन ई – महाशब्दकोश
हिंदी स्कैनर
विंडोज 10 में नया फोनेटिक की - बोर्ड
ई - सरल हिंदी वाक्यकोश
ई - पत्रिका पुस्तकालय
ईकाई परिवर्तक
गूगल सीट में एक साथ कई भाषाओं में अनुवाद
कंप्यूटर पर ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग – बिना क्रोम ब्राउसर के

संख्या से शब्दों में परिवर्तक
हिंदी में बोलकर टाइप करें
कृतिदेव से यूनिकोड में परिवर्तक
एंड्रोएड फोन पर हिंदी में वॉइस टाइपिंग
हिंदी में ई-मेल आईडी (डाटामेल के द्वारा हिंदी में भी ई-मेल तैयारी की जा रही है जैसे – अमितकुमारदीक्षित@डाटामेल.भारत)
भारतीय भाषाओं में बातचीत का मुख्य प्लेटफॉर्म है कू
 
भारत का माइक्रोब्लॉगिंग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Koo (कू) भारतीय भाषाओं में बातचीत का प्रमुख मंच बन गया है। Koo (कू) के 1 करोड़ यूजर में से करीब 50 % (50 लाख) यूजर हिंदी में बातचीत करते हैं। Koo पर हिदीं पोस्ट की संख्या औसतन किसी भी माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर हिंदी पोस्ट की संख्या से लगभग दोगुनी है। इसके अलावा पिछले चार महीनों में Koo पर हिंदी उपयोगकर्ता की संख्या में 80 % वृद्दि हुई है। अनुमान है कि अगले 5-6 वर्षों में भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अरबों तक पहुंच सकती है।
‘राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी’ के अनुसार – ‘’ हिंदी का प्रश्न मेरे लिए देश की आजादी का प्रश्न है । हिंदी भाषा केवल एक राजभाषा नहीं है, वह संपूर्ण देश की संस्कृति के रूप में पल्लवित और पुष्पित भाषा है।‘’
हिंदी में ई - प्रौद्योगिकी के अमूल्य योगदान ने इनकी सार्थकता बढ़ा दी है। विज्ञान से जुड़ता हिंदी ज्ञान, पाठकों का अनवरत् अनुष्ठान ने हिंदी को अन्तर्राष्ट्रीय गौरव प्रदान किया है। विश्व के कई प्रमुख देशों में अब स्कूलों में भी हिंदी पढ़ाई जाने लगी है। इसकी सूची है – येल, पैन, लोयोला, शिकागो, वाशिंगटन, ड्यूक, आयोवा, ओरेगांन, कोरनेल इत्यादि। राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रय - विक्रय में विज्ञापन की प्रधान भूमिका होती है। विज्ञापन को देखकर उत्पादन को खरीदने के लिए उपभोक्ता उत्सुक हो जाता है। रेडियों दूरदर्शन टेलिविजन पर प्रसारित कार्यक्रम जन-जन तक पहुंचते है। तुर्की, अरब, मारिशस, मिश्र, लिबिया आदि देशों में हिंदी फिल्मों के प्रति लगाव उल्लेखनीय है। हम गर्व के साथ कह सकते है कि इस वर्ष सिर्फ भारत का अमृत महोत्सव नहीं बल्कि हिंदी का भी अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है इन 75 वर्षों में हिंदी ने तकनीकी और डिजीटल के क्षेत्र में जो स्थान प्राप्त किया है सचमुच वह सराहनीय है। हिंदी भाषा में विज्ञान और प्रौद्योगिकी से संबंधित विषयों की प्रसांगिकता आज अनिवार्य हो गयी है ।
‘’ घर में मातृभाषा, दफ़्तर में राजभाषा
हिन्द शब्द से बनी हिन्दी ही है हमारी राष्ट्रभाषा’’ ।।
***
 
 
 ब्रिटेन के दूसरे सबसे बड़े राष्ट्रीय सम्मान
"कमांडर ऑफ ब्रिटिश एंपायर" से सम्मानित
 
 
 
 
शालिनी खेमका
 
 
शालिनी खेमका,  इंग्लैंड में रह रहे सीतामढ़ी निवासी डॉ. शंकर खेमका की पुत्री सुश्री शालिनी खेमका जिन्हें ग्रेट ब्रिटेन के दूसरे सबसे बड़े राष्ट्रीय सम्मान "कमांडर ऑफ ब्रिटिश एंपायर" से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान भारत के पद्म विभूषण के समकक्ष है। शालिनी खेमका कोरोना काल में भी 213 बिलियन डालर का निवेश व 12 लाख नौकरियाँ सार्थक करने में सफल रही हैं। अ.हि.स. परिवार की ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
 
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  २०२२-२३ सत्र के पदाधिकारी एवं विवरण
 
 
न्यासी समिति/ Board of Trustees, IHA
श्री अलोक मिश्रा (NH) अध्यक्ष, न्यासी समिति , 2022
Mr. Alok Misra 603-681-9150 Alok
.Misra@hindi.org, chairman@hindi.org 
डॉ. सतीश मिश्रा (MD) उपाध्यक्ष, न्यासी समिति, 2020
Dr. Satish Misra 240-252-8244Satish.Misra@hindi.org 
श्री सुरेन्द्र नाथ तिवारी (NJ)
Mr. Surendra Nath Tiwari 862-400-3428 Surendra.Tiwari@hindi.org, 
डॉ. सतीश मल्लिक (NJ)
Dr. Satish Mullick 973-564-6320 Satish.Mullick@hindi.org ,
डॉ. तरुण सुरती (TN)
Dr. Tarun Surti 615-812-6164  Tarun.Surti@hindi.org, 
कार्य समिति / Executive Committee
अध्यक्षा, सुश्री अनीता सिंघल (TX)
President, Mrs. Anita Singhal, 817-319-2678   
Anita.Singhal@hindi.org, president@hindi.org
आगामी अध्यक्ष, डॉ. शैल जैन (OH)
President-elect, Dr. Shail Jain 330-421-7528  
Shail.jain@hindi.org, president.elect@hindi.org
सचिव, श्री संजीव अग्रवाल (GA)
Secretary, Mr. Sanjeev Agarwal  203-442-3120, Sanjeev.Agarwal@hindi.org,
कोषाध्यक्ष, सुश्री नीतू अग्रवाल (TX)
Treasurer, Mrs. Neetu Agarwal 214-235-5264
Neetu.Agarwal@hindi.org, treasurer@hindi.org
प्रबंध सम्पादक, सुश्री सुशीला मोहनका (OH)
Managing Editor, ‘Vishwa’ & ‘Samvaad’
Mrs. Sushila Mohanka  330-786-8351
Sushila.Mohanka@hindi.org, managing.editor@hindi.org,
निदेशक मंडल के सदस्य/ Directors
श्री शैलेंद्र गुप्ता (Canada) पूर्व-अध्यक्ष (रिक्त)
Mr. Shailendra K. Gupta  210-268-2693 Shailendra.Gupta@hindi.org
सुश्री अर्चना पंडा (CA)
Mrs. Archana Panda  408-307-6645 Archana.Panda@hindi.org
श्री अशोक मेहरोत्रा (TN)
Mr. Ashok Mehrotra 615-330-6104 Ashok.Mehrotra@hindi.org t
प्रोफेसर किशन मेहरोत्रा (NY)
Prof. Kishan Mehrotra 315-399-8774 Kishan.Mehrotra@hindi.org
श्री इंद्रजीत शर्मा (NY)
Mr. Inderjeet Sharma  917-273-9744 Inderjeet.Sharma@hindi.org
श्री रमेश जोशी (Bharat)
Mr. Ramesh Joshi 330-688-4927, 91-946-015-5700 Ramesh.Joshi@hindi.org
शाखा संयोजक , Chapter President USA 
अ.हि.स. की अमेरिका की शाखाओं के संयोजकों के नाम, फोन नम्बर और ईमेल विश्वा के क्रम के अनुसार हैं। कुछ शाखाओं के मनोनयन या निर्वाचन अभी नही हुए है या मेरे पास समाचार नही आया है। 
१. श्रीमती किरण खेतान
Mrs. Kiran Khaitan NE, OH 330-622-1377 kirankhaitan51@gmail.com
२. श्री अखिलेन्द्र कुमार
Mr. Akhilendra Kumar Dallas, TX 412-704-3195 akhil.kumar@hindi.org
३. श्री राजीव भवसार
Mr. Rajiv Bhavsar Houston, TX 281-217-7330 rajbhavsar0@gmail.com
४. श्री जसवीर जय सिंह
Mr. Jasbir Singh New York, NY 516-406-1227, 516-857-5297
humhindustaniusa@gmail.com
५. श्री अलोक नन्दा
Mr. Alok Nanda Nashville, TN 615-424-1205 aloknanda@yahoo.com
६. डॉ . हरि हर सिंह
Dr. Hari Har Singh Washington, DC 713-939-1838 harisomasingh11@gmail.com
७. डॉ. बबिता श्रीवास्तव
Dr. Babita Srivastava New Jersey, NJ 908-892-6133 srivastava.babita@yahoo.com
८. श्री विरेश सिंह
Mr. Viresh Singh Philadelphia, PA 484-425-7734 vireshsingh999@gmail.com
९. श्रीमती प्रिय भरद्वाज
Mrs. Priya Bhardwaj Charlotte, NC 919-995-2637 bharadwajpriya@gmail.com
१०. श्री विनय सिंह
Mr. Vinay Singh Milwaukee, WI 414-248-4728 vinaykrtsingh@yahoo.com
११. डॉ. राकेश कुमार
Dr. Rakesh Kumar Carmel, IN 317-730-4086 kumar@indy.rr.com
१२. डॉ. अरुणिमा वैष्णव
Dr. Arunima Vaishnav Englewood, CO 857-991-8836 arunima.bittu@yahoo.com

विश्वा जनवरी २०२२ के लिए - शाखा संयोजक, Chapter President India - Phone No.- Email
अ.हि.स. की अमेरिका की शाखाओं के संयोजकों के नाम, फोन नम्बर और ईमेल विश्वा क्रम से. कुछ  शाखाओं के मनोनयन या निर्वाचन अभी नही हुए है या मेरे पास समाचार नही आया है। 

१. श्रीमती मुन्ना जगेटिया
Mrs. Munna Jagetia A.P., Telangana 91-94901-89715 munnaop@gmail.com
२. डॉ. मनमोहन शुक्ला
Dr. Manmohan Shukla Prayagraj, UP 91-94502-39154 shukla.mm.147@gmail.com
३. डॉ. शोभारानी सिंह
Dr.Shobharani Singh Bihar, Jharkhand 91-99393-92605 drshobharani.vama@gmail.com
४. श्री अशोक लव
Mr. Ashok 'Lav' Delhi, NCR 91-99710-10063 kumar1641@gmail.com
५. डॉ. (प्रो.) यज्ञ प्रसाद तिवारी
Dr. (Prof.) Yagya P Tiwari Maharashtra 91-94258-70451 yagyaomprof@gmail.com
 
 
 
 
 
प्रबंध सम्पादक
 
- सुशीला मोहनका
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्यों का अभिवादन है,
यह वर्ष हम सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारत को स्वाधीन होने का ७५ वाँ वर्ष हैं, भारत सरकार ने इस वर्ष अमृत महोत्सव मनाने की धोषणा की है।
आप सभी को नये वर्ष की और मकर संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ। भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए यहाँ नयी फसल से नयी जौ और गेहूँ की बाली को अग्नी देव को मकर संक्रान्ति में समर्पित करने की परम्परा है। नया वर्ष आपके लिए, आपके परिवार के लिए, समाज के लिए और देश के लिए शुभ और मंगलमय हो।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) की इस बढ़ती हुई तीसरी लहर के प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
इस सत्र की विशेष सूचनायें :-
जनवरी २०२२ के इस मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान होने जा रहा है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला होगी जिसके माध्यम से युवावर्ग अपनी लेखनी में निखार ला सकेंगे। इस समिति के संयोजक डॉ. राकेश कुमार, इंडियाना के हैं। शनीवार ५ फरवरी २०२२ को यह कार्यक्रम प्रारम्भ होगा। सभी से नम्र निवेदन है कि इस पुनीत कार्य में अपनी भागीदारी निभाएं।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों को लाहोड़ी, पोंगल, बिहू, दही-चूड़ा, खिचड़ी, उत्तरायण तथा मकर संक्रान्ति आदि अनेक नामों से पूरे भारत में मनाये जाने वाले नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के लेखा-जोखा का वर्ष (Financial Year) भी जनवरी से दिसम्बर तक का होता है। जो भी स्थानीय समितियाँ अ.हि.स. का ‘कर कटौती पत्र’ (Tax Deduction Document) काम में लाती हैं, उनसे निवेदन है कि जितनी जल्दी हो सके अपनी समिति के हिसाब-किताब का लेखा-जोखा जल्दी से जल्दी पूरा कर के भिजवाएं। आपके यहाँ से हिसाब आने पर ही अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति अपना हिसाब पूरा कर पायेगी। सभी पाठकों  को धन्यवाद एवं नये वर्ष की शुभकामनायें।  
***
 
 
Donate
 
 
Support us while you shop at Amazon - 100% Free
Click here to learn more
 
Advertize with us - Extend your global reach
Click here to learn more
 
Facebook
YouTube
 
 
This email was sent to {{ contact.EMAIL }}
You received this email because you are registered with International Hindi Association
mail@hindi.org | www.hindi.org
 
 
 
SendinBlue
 
 
© 2020 International Hindi Association