मेरा पाकिस्तानी दोस्त
आज (11 फरवरी, 2024) जब पाकिस्तान में आम चुनाव की औपचारिकता पूरी हो रही है, मुझे अपने पाकिस्तानी मित्र ‘असलम’ की याद आनी स्वाभाविक है। जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है लगता नहीं उसकी शासन प्रणाली में किसी तरह का बदलाव आया है; शायद अपनी ‘विरासत’ को संभाल कर रखने का यही अर्थ उस मुल्क ने स्वीकार कर लिया है। बात बहुत पुरानी है, जुलाई 1985 की, मैं फ़्रांस सरकार का वजीफ़ा पाकर ‘बेजासों’ नामक शहर में अपने कुछ अन्य भारतीय मित्रों के साथ ‘फ्रेंच भाषा’ का ज्ञान प्राप्त कर रहा था।
एक दिन अपने ‘स्कूल’ के कैफ्टेरिया में बैठे हम भोजन कर रहे थे, तभी एक हिन्दुस्तानी सा दिखता चेहरा हमारे पास आया, “भाई जान अस्सलामालेकुम, मैं असलम बेग पाकिस्तान से, क्या आप लोग भी वहीं से हैं?” बाकी मित्र तो चुप हो गए, जवाब मैंने ही दिया, “वालेकुमसलाम, हम आपके पड़ोसी मुल्क हिंदुस्तान से हैं, फ़्रांस सरकार की ‘फेलोशिप’ पाकर इस मुल्क में तशरीफ़ लाये हैं।” खैर, उसने हाथ मिलाया और फिर पास के ही एक टेबुल पर अपने खाने की ट्रे लेकर बैठ गया। बस ऐसे ही परिचय हुआ असलम बेग से; बाहर निकलते कुछ मित्रों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई, “तुझे इतनी उदारता से मिलने की क्या जरूरत थी, है तो आखिर पाकिस्तानी ही।” मैंने बात को हँस कर टाल दिया, “मगर यहाँ, अपने देश से इतनी दूर, वह तो मुझे एक पड़ोसी सा ही लगा।”
कभी-कभी असलम से इसी तरह की मुलाकात कैफ्टेरिया में हो जाती, वह उसी शहर में स्थित विश्वविद्यालय में एक वर्ष का डिप्लोमा कर रहा था फ़ाईन आर्ट में। अपनी मित्र मण्डली में मैं ही एक था जिससे उसकी बातचीत ज्यादा हो जाती थी, बाकी तो उससे कटे-कटे ही रहते थे। समय के साथ अब हम भी ‘स्थानीय क्राउड’ से ज्यादा घुलने मिलने लगे थे; मुझे तो अलग-अलग मुल्कों से आए लोगों से मिलना, उनसे बातें करना, कुछ उनकी सुनना, कुछ अपनी सुनाना अच्छा लगता था। एक दिन हॉस्टल पहुँचते एक मित्र ने अपना क्रोध बड़े तीखे शब्दों में प्रगट किया, “यार तुम इस असलम के बच्चे से कैसे इतनी बातें करते हो, मैं तो जब भी बात करता हूँ उससे बहस ही हो जाती है” मैंने उसके आक्रोश को थोड़ा कम करने के लिए हंसते हुए कहा, “अच्छा, असलम के ‘अब्बू’ का नाम भी असलम ही है क्या?” सभी हँस पड़े, तब मैंने पूछा, “अच्छा यह बताओ तुम उससे किस तरह की बातें करते हो?”
वह जवाब के साथ एकदम तैयार था, “कश्मीर के बारे में, उससे बात करो तो वह कहता है कश्मीर तो पाकिस्तान का हिस्सा है, अब बताओ इसपर बहस होगी या नहीं। और उसकी हिमाकत तो देखो, कहता है कि पाकिस्तान हिंदुस्तान की अपेक्षा आर्थिक रूप से ज्यादा सशक्त है.” मैंने उसे थोड़ा शांत किया, “ पहली बात, तुम उससे कश्मीर पर बातचीत करते ही क्यों हो; क्या उस बहस से कश्मीर की स्थिति में कोई फर्क आ जायेगा, यदि वह बहस में जीत गया तो क्या हमारा कश्मीर पाकिस्तान में चला जायेगा या तुम बहस में उसपर हावी हो गए तो क्या उस तरफ का कश्मीर हमारी ओर आ जायेगा ? अरे ऐसी बात पर बहस ही बेमानी है, बातों के लिए बहुत से विषय हैं, हमारी साझी विरासत, हमारे सामाजिक तौर तरीके, उनके पुरखों की भावनाएं जो कुछ वर्ष पूर्व तक हमारे थे। बात ही करना हो तो ऐसे विषयों पर बात करो ना. इसके अलावा दूसरी बात जो तुमने कही, तो मेरे दोस्त असलम सही कह रहा था; आज की तारीख में पाकिस्तान हम से आर्थिक रूप से ज्यादा सम्पन्न है।” यह बात मित्र को बिल्कुल नहीं जँची, “क्या कह रहे हो तुम, हमारे विशाल देश के सामने पाकिस्तान की क्या औकात, देखो दो-दो लड़ाइयों में हमने उनका क्या हाल किया है, वर्ष 1965 और फिर 1971 के बाद भी तुम कहते हो कि वह मुल्क हम से आगे है।”
मैंने उसे शांत किया, “देखो सैन्य ताकत में हम बहुत मजबूत हैं मगर आर्थिक संपन्नता युद्ध में हुई विजय से नहीं मापी जा सकती; इसे मापने के कई पैमाने हैं उनमें एक है प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी: GDP – Gross domestic product), जो आज की तिथि (वर्ष 1985) में दोनों देशों का $370 है। मगर तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि 60 से 70 के दशक तक पाकिस्तान की अर्थ-व्यवस्था 6% की दर से बढ़ी और हमारी केवल 4% से; अतः इस मामले में असलम गलत नहीं है। देखो, मैं बिहारी हूँ, और सभी जानते हैं कम से कम राजनीति में ‘एक बिहारी सब पर भारी’; तो मेरे दोस्त जब मैं तुम से यह कह रहा हूँ तो समझ लो पूरी जिम्मेवारी के साथ। लगे हाथ मैं तुम्हें यह भी बता दूँ कि ऐसा क्यों है। तो ऐसा होने का मुख्य कारण है हमने अपनी अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह से बंद (Closed) रखा, वैश्विक व्यापार को हमने तरजीह नहीं दी; दूसरी तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका और तेल के धनी कई इस्लामी राष्ट्र जो पाकिस्तान के मित्र रहे हैं ने बड़ी उदारता पूर्वक उसे अनुदान/कर्ज दिया जिससे उसकी अर्थ व्यवस्था बढ़ी तो बड़ी तेजी से पर उसके दुष्परिणाम को वे सब समझ नहीं पाए हैं, वह उन्हें आगे झेलना होगा। पर अब हमारी अर्थ व्यवस्था भी उदार हो रही है, विदेशी निवेश की संभावना बढ़ रही है, जल्द ही हम पाकिस्तान को इस क्षेत्र में भी पीछे छोड़ देंगे। साथ ही मैं राजनीति को जितना समझता हूँ, उससे मुझे लगता हैं कि पाकिस्तान बहुत जल्द कर्ज (Debt) में डूबने वाला है, और फिर तो भगवान ही मालिक होंगे।” लगता है मैंने उस दिन जो पाकिस्तान के बारे में कहा आज सत्य हो रहा है।
वैसे बता दूं मेरा मित्र मूलतः दक्षिण भारत से आता था पर उसकी शिक्षा दिल्ली में हुई थी; शायद इसी कारण वह हिन्दी समझ सकता था, ठीक-ठीक बोल भी लेता था। मैंने अपनी बात को आगे बढाया, “उत्तर भारत के बाद दक्षिण में, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश में मुसलमानों की उपस्थिति बहुत मजबूत रही है, वहाँ की राजनीति में भी उनका काफी दखल रहा है, उनकी संस्कृति, उनका खान-पान हर क्षेत्र के मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं ने भी अपनाया है; ऐसे में तुम्हारे पास उससे बात करने के लिए ढेर सारे विषय हैं फिर कश्मीर ही क्यों। यार, यह विषय जिनके लिए है उन पर ही छोड़ दो।” मगर लगा वह मेरी बातों से संतुष्ट नहीं था।
एक शनिवार को मैं अपने कमरे में ही बैठा था तभी असलम आ गया, “भाई आज तुम से कुछ गुफ़्तगू करने की तमन्ना हुई तो चला आया, तुम्हें कोई दूसरा काम तो नहीं।” मैंने उसका स्वागत किया और थोड़ी देर में ही हम बातचीत में तल्लीन हो गए, “अच्छा असलम तुम्हारा खानदान भी तो हिंदुस्तान से ही गया था, वे लोग भारत के किस हिस्से से थे?” असलम ने बताया था कि उसके दादा जी मशरीक (पूर्व) उत्तर प्रदेश से थे, बटवारे के समय वे अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए और लाहौर जाकर बस गए; उसकी पैदाईस वहीं हुई थी। फिर उसी जगह उन्होंने अपना रेस्टोरेंट का कारोबार शुरू किया; उनके दो चचा जान भाइयों का परिवार अभी भी हिंदुस्तान में रहता है। “तुम कभी उनसे मिलने हमारे मुल्क नहीं आए ?” मेरे ऐसा पूछने पर उसने तल्ख सा जवाब दिया, “मैं क्यों जाने लगा, हाँ मेरे अब्बू 60 के दशक में दो बार किसी शादी में शरीक होने गए थे। फिर 70 के बाद तो तुम लोगों ने हमारे मुल्क का ही बटवारा करा दिया, फिर उन्होंने जाना छोड़ दिया।” तब मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरे भारतीय मित्र और असलम की सोच में कोई ज्यादा फर्क नहीं और इसलिए उनमें तकरार होना लाजिमी था। मैंने भी सोचा आज कुछ अप्रिय बात ही हो जाये, देखते हैं हमारी नयी-नयी दोस्ती कितना दबाव झेल पाती है।
“देख भाई असलम तेरे मुल्क पाकिस्तान में जनाब लियाकत अली के बाद पहली और आखिरी नेशनल असेंबली का साफ-सुथरा चुनाव 1970 में ही हुआ (याद रखिए, यह बातचीत हमारे बीच 1985 में हो रही थी); तुम्हें पता है 300 में किस पार्टी ने कितनी सीटें जीती थी? तो सुन ले मेरे दोस्त, शेख मुजीब, जो बंगाल से आते थे, ने 160 सीटें जीती और भुट्टो साहब की पार्टी को केवल 81 सीटें मिली थी। मगर जब सरकार बनाने की बात आई तो पाकिस्तान एक ‘बंगाली’ की सरपरस्ती के लिए तैयार नहीं था, शेख मुजीब को प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि तेरे मुल्क में कभी भी जुम्हूरियत की जड़ जम ही नहीं पाई थी। देख हमारे देश में श्रीमती इंदिरा गाँधी भी 1977 का चुनाव हार गयी थी, पर हारने के बाद उन्होंने शांतिपूर्वक सत्ता की बागडोर श्री मुरारजी देसाई को सौंप दी। तेरे यहाँ जीतने वाले को सदर बनाने की जगह मगरीब पाकिस्तान के शासकों ने अपने देश के ही लोगों पर अत्याचार शुरू कर दिए। अब तुम्ही बताओ मेरे भाई तुम्हारे मुल्क को हमने बाटा या तुम लोगों ने खुद तोड़ा?” मेरी बातों को सुनकर असलम चुप तो हो गया, फिर भी अपनी जिद न छोड़ी उसने, “मैं मानता हूँ कि हमारे लोगों ने बहुमत को नजरंदाज किया, पर इन बंगालियों को सरकार चलाने की सलाहियत कहां थी, उन्हें कब का तजर्बा था इस काम का? आजादी के बाद से ही यह काम पंजाब के लोग करते आ रहे थे, इसलिए इस पर उन्हीं का हक बनता था।” “यही तो मसला है, क्या तुमने स्कूल में कभी यह जुमला पढ़ा या सुना नहीं था, ‘जुम्हूरियत वह अहले हुकूमत है जिसमें इंसान को गिनते हैं तौला नहीं करते’’; यार यह बात तो हमारे यहाँ हिन्दी में लिखी किताब में भी लोकतन्त्र की कमजोरियों पर चर्चा करते हुए बताई जाती है।
यार, जुम्हूरियत में ‘नंबर गेम’’ ही चलता है; जिसके पास संख्या, उसकी सरकार. अच्छा यह बता असलम, 1947 से पहले किसे सियासत का तजर्बा था, उसके पहले तो सारे फैसले अंग्रेज़ लेते थे और हम भेड़-बकरियों की तरह हांक दिये जाते थे. फिर भी दोनों मुल्कों के सियासतदानों ने अपनी-अपनी सरकार चलायी न? देख भाई, सच्चाई तो यही है कि तेरे मुल्क के टूटने के लिए तुम सब ही जिम्मेवार हो। और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि तुम्हारे मुल्क की ‘तरक्की का इंजन (Growth engine)’ पूर्वी पाकिस्तान ही था; अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसी इलाके का उत्पाद पूरी दुनिया में जाता था और पाकिस्तान के लिए सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा अर्जित करता था। मगर मेरे भाई, पाकिस्तान की बजट का सबसे बड़ा भाग पश्चिमी पाकिस्तान और Vसेना पर ही खर्च किया जाता था, पूरब को तुम सभी ने भी एक उपनिवेश (Colony) ही समझा, जैसे अंग्रेजों के लिए हमारा अविभाजित भारत था। ऐसा कब तक चलता मेरे दोस्त, आज नहीं तो कल यह होना ही था; हमें क्यों दोष देता है यार।” “तुम कुछ भी कह लो, हमारा मुल्क टूटा तुम लोगों के कारण, तुम्हारी सरकार ने अपनी फौज को ‘मुक्ति वाहिनी’ के नाम से वहाँ उतार दिया और उनको सारे हथियार मुहैया करवाए।” “तुम्हारा मतलब है, जैसे 1947 में ‘पश्तून लड़ाकों’ के भेष में पाकिस्तानी फौज कश्मीर पर चढ़ बैठी थी? यार फिर भी एक बहुत बड़ा फर्क है; आज के बांगला देश की आवाम पर तुम्हारी सेना ने, या यूं कहो कि उस समय तक की उनकी अपनी सेना ने, जुल्म ढाये. यार मेरे, केवल मजहब के नाम पर जब मुल्क बनेगा तो यही होगा; पंजाबी और बंगाली तहजीब कितनी अलग है, अभी तू ने ही कहा था; फिर इनका साथ रहना तभी होगा मेरे दोस्त जब दोनों को एक दूसरे पर भरोसा हो, दोनों एक दूसरे का एहतेराम करें।”
मुझे लगा हमारी बहस बेकार है, अतः मैंने ही उसे खत्म किया, “छोड़ मेरे भाई, यह बहस बेमानी है, इससे कोई फायदा नहीं, चल तू अपने ‘कोर्स’ के बारे में बता; ‘फ़ाईन आर्ट’ पढ़ने के लिए इतनी दूर आने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता था।” असलम ने भी मेरी राय मान ली और फिर देर तक हम ‘फ़ाईन आर्ट’ के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत करते रहे। बाद में जब पेरिस आया तो मुझे अपने प्रश्न का जवाब खुद मिल गया; ‘आर्ट’ के किसी स्वरूप के अध्ययन के लिए फ़्रांस सबसे मुफीद जगह है। इसे यूरोप की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ ऐसे ही नहीं कहते; यदि कोई पेरिस में प्रतिदिन एक ‘म्यूजियम’ घूमे तो भी एक वर्ष, यानी 365 दिनों, में वह सारे संग्रहालयों का भ्रमण नहीं कर पाएगा।
खैर, असलम से मेरी मुलाक़ात होती ही रहती, और कहीं नहीं तो ‘कैफ्टेरिया’ में अवश्य मुलाक़ात हो जाती। अच्छी बात यह हुई कि उस दिन के गुफ्तगू के बाद भी हमारे रिश्ते में कोई खटास नहीं आई; हम वैसे ही दोस्त बने रहे। अचानक मैंने महसूस किया असलम बहुत दिनों से गायब है, मेरे पास उसकी खैरियत जानने का दूसरा कोई जरिया भी नहीं था, इस कारण भी मैं थोड़ा परेशान था। फिर एक दिन असलम ‘कैफ्टेरिया’ में मिला, मगर एक दूसरे ही अंदाज में; वह एक व्हील चेयर पर बैठ अपने किसी दोस्त के साथ लंच के लिए आया था। मैंने लगभग दौड़ते हुए असलम का स्वागत किया, उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया ताकि वह उठे और मेरे गले लग जाये, फिर एहसास हुआ ‘असलम खड़ा नहीं हो सकता’। उसकी भी आँखों में आँसू थे जो बहुत मुश्किल से वह रोक पाया, “देख न यार, कुछ दिन पहले पड़ोस के शहर में एक बहुत पुरानी हवेली में लगे हस्त-शिल्पों की नुमाइश देखने हमारा पूरा आर्ट स्कूल गया हुआ था, तभी एक कमरे की छत का बड़ा सा हिस्सा टूट कर नीचे आ गिरा और ‘लाटरी’ मेरे ही नाम निकल आई। मुझे तो संभलने का मौका भी नहीं मिला, होश आया तो मैंने खुद को अस्पताल के बेड पर पाया। डॉक्टर ने बताया मेरे रीढ़ की हड्डी में टूट हो गयी थी और मेरा काफी बड़ा आपरेशन हुआ था; जानते हो मैं तीन दिन बाद होश में आ सका। तब से मेरी हैसियत बढ़ गयी है, अब मैं पैदल नहीं इस स्वचालित राज-सिंहासन पर चलता हूँ।” ऐसा कहते हुए असलम का गला भर आया और मेरी आँखें, “यार असलम, इसमें काफी पैसे खर्च हुए होंगे और शायद आगे भी हो, कैसे इंतजाम होगा इसका?” असलम ने मुसकुराते हुए कहा, “सारा खर्च यूनिवर्सिटी देगी, इसकी कोई चिंता नहीं है यार। बस जिंदगी धक्के पर चल रही है, कोई न कोई दोस्त धक्के लगाने के लिए मिल ही जाता है, अपन बस सिंहासन पर बैठे चलते रहते हैं।” असलम की यही विशेषता काबिले तारीफ थी, जिंदगी में जो भी मिला उसे सर झुका कर बगैर किसी शिकायत के उसने स्वीकार किया था। आज मैंने उसी के साथ टेबुल पर खाना खाया, फिर उसे बस-स्टॉप भी ले गया; यहाँ बसों में स्वचालित लिफ्ट लगे होते हैं जो किसी ‘दिव्याङ’ को सावधानी पूर्वक बस में चढ़ा लेते हैं।
समय गुजरता रहा और तीन महीने बाद मैं भी पेरिस चला आया, कुछ दिनों तक हमारी बातचीत होती रही, फिर जल्द ही अपनी-अपनी व्यस्तता की भीड़ में हमारा रिश्ता कहीं खो गया। पर मेरे मन में आज भी असलम एक दोस्त और ‘पड़ोसी’ के रूप में रहता है; मेरी पहली विदेश यात्रा की जो खट्टी-मिट्ठी यादें हैं उनमें एक असलम का वजूद भी है।
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