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FEBRUARY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
फरवरी 2023, अंक २१ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।
आप सभी को यह बताते हुए बहुत ही हर्ष हो रहा है, कि अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के द्वारा २१ जुलाई से २७ अगस्त २०२३ तक कवि सम्मेलन होने जा रहा है।भारत से दो कवि और एक कवियित्री आ रही हैं। जबलपुर से श्री सुदीप भोला, मुंबई से श्री गौरव शर्मा हैं साथ ही गाजियाबाद से डॉ॰ सरिता हैं। इस प्रकार ६ सप्ताह तक अमेरिका में कवि-सम्मेलन होंगे जब कविगण आपके शहर में आएँ, आप सभी इनकी कविताओं का आनंद अवश्य लें।
आप सभी को बड़े हर्ष के साथ सूचित करती हूँ कि अ.हि.स. के द्विवार्षिक २१ वें अधिवेशन २८ से २९ जुलाई २०२३ को Indianapolis (IN) में होना निश्चित हुआ है। इस अधिवेशन की Theme: ‘Hindi Education for the Next Generation’ है। मैं आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से आमंत्रित करती हूँ। आप सभी आकर, अपना समय देकर कार्यक्रम को सफल बनाएँ। अधिवेशन की विस्तृत जानकारी के लिए आप डॉ. राकेश कुमार से इस ईमेल द्वारा ihaindiana@gmail.com और इस नम्बर द्वारा (317) 730-4086 जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आप सभी विस्तृत जानकारी के लिए इस वेबसाइट में जायें https://ihaindiana.org/
जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की हिन्दी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी, शनिवार, ११ मार्च 2023 को भारतीय समय के अनुसार 8:30 बजे शाम निश्चित की गयी है| इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
अंत में मैं अ.हि.स. की न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति सहित सभी पदाधिकारियों को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” (मासिक ई-पत्रिका) और त्रैमासिक पत्रिका ‘विश्वा’ को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने कार्य कर रहे हैं।
आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल anitagsinghal@gmail.com के माध्यम सेहमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
आदर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, राष्ट्रीय अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति
"हास्य के रंग - गीत-गजल के संग "
अमेरिका के महानगरों में, 21 जुलाई -27 अगस्त 2023
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कवियों का संछिप्त विवरण (Poets profile)
Dr. Sarita Sharma of Delhi, a former advisor to the Ministry of Culture and Chairperson of Bharatendu Natya Academy in U.P. government, is a veteran Hindi poetess of shringaar ras genre. She was born in Bhilai, Chhattisgarh and has a Ph.D. in Hindi literature. She is known for her deep meaningful and soulful poetry and its melodious spellbinding renditions. This extraordinary Hindi Poetess has been felicitated by the President of India, Shri Ramnath Kovind at a Rashtrapati Bhavan congregation. She has been embellished with the highest civilian award of Yash Bharti by the Uttar Pradesh Government, and with ‘Mahadevi Verma’ and ‘Nirala’ Samman. She has participated in many prominent literary events and national and international Kavi Sammelans and Mushairas, including in U.S, U.K, Canada, and Gulf countries in last three decades. She has also recited her compositions on various TV channels and at the prestigious Red Fort on several occasions. Spreading the message of love thru her brilliant poetry, Dr. Sarita Sharma has penned five books, titled ‘Peer Ke Saaton Samander’, ‘Nadi Gungunaati Rahi’, ‘Huaey Aakash Tum’, ‘Teri Meera Zaroor Ho Jaoon’, and ‘Chand, Muhabbat, aur Main’ in the form of Geet, Ghazal, and Muktak Collections. The influence of Brij and Awadhi is also seen in her creations. Her poem on 'female feticide' is included in textbooks.
Gaurav Sharma of Mumbai hails from Rajasthan. He is the son of renowned Hasya kavi Shyam Jwalamukhi, and one of the most popular young humorists in India with over 2600 performances to his credit. He is an exceptional performer and a maestro of humor who has entertained millions of people in India and abroad. Gaurav is known for his unique style of expressional comic rendered in his signature two liners. He sometimes uses the Marwari language for his humor. His poetry has a mixture of engaging humor and penetrating satire. When he takes the podium, the auditorium is filled with continuous laughter. Gaurav is not only a comic poet but also a youth icon. He has been associated with Johny Lever Live Shows since 2014. He is a winner of Laughter Challenge on Star TV, Comedy Ka King Kaun on SUB TV, and Hasya Kavi Muqabla on Zee TV. As a poet of distinction, Gaurav has been felicitated with numerous awards, including Saraswati Puraskar and Rajasthan Gaurav Puraskar. He has performed in over 38 countries, including multiple times in United Kingdom, Canada, and United States.
Sudeep ‘Bhola’ Soni, son of poet Sandeep Sapan, is a native of Jabalpur. He is a young talented poet who has established himself as a popular humorist. He is famous for his earthy wit and political satire and is celebrated for his entertaining melodies and parodies on social and political dissonance, including poems on Indian soldiers and martyrs, helpless farmers, and child labor. His creative writings and compositions have touched the hearts of poetry lovers across the globe via electronic and social media. With 200 episodes, and counting, he is a lead cast of ‘Lapete mey Neta Ji’ show on national TV. Sudeep Bhola is a commerce graduate from Durgawati University, and a skilled jewelry craftsman with a family jewelry business in its third generation. He has been felicitated with numerous awards and honors by many prestigious organizations and institutions. Sudeep Bhola has been invited to recite his poems from India's prestigious national Kavi Sammelan at Red Fort and Delhi Hindi Academy. He has enthralled audiences with his compositions in U.K, Ireland, Ethiopia, Kenya, Sri Lanka, Nepal, Oman, Qatar, and Hong Kong. This is his 3rd visit to the United States.
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जागृति वेबिनार
“हिन्दी साहित्य के विभिन्न इतिहास और लेखन की चुनौतियाँ”
11 मार्च 2023
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की हिन्दी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 11 मार्च 2023, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
जागृति श्रृंखला की इस कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी आलोचक एवं साहित्यकार, प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल, हिंदी और आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: " हिन्दी साहित्य के विभिन्न इतिहास और लेखन की चुनौतियाँ "।
हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लगभग सौ साल पहले लिखा गया था। क्या हिंदी साहित्य का यही एक मात्र इतिहास है? या और भी विद्वानों ने इतिहास लिखे हैं? कई विद्वान शुक्ल जी के इतिहास के तथ्यों से सहमत भी नहीं हैं? साथ ही, साहित्य का इतिहास लेखन एक चुनौती भरा काम है ? क्या हैं ये चुनौतियाँ? आइये इस कड़ी के विद्वान वक्ता, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर शिवप्रसाद शुक्ल से इन प्रश्नों का उत्तर जानने की कोशिश करते हैं।
समिति शनिवार, 11 मार्च 2023 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
https://www.facebook.com/events/647917287336923
www.facebook.com/ihaamerica
https://www.youtube.com/watch?v=5pxLBS4O0_A
https://www.youtube.com/watch?v=qJ74LA5nt0U
शनिवार, 11 मार्च 2023; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 10:00 AM EST, 9:00 AM CST, 8:00 AM MST, 7:00 AM PST
UK: 4:00 PM, Mainland Europe: 5:00 PM
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आशा है कि आप शनिवार, 11 मार्च 2023 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है । पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं । समिति ने एक डिजिटल मासिक ई-पत्रिका “संवाद” जून 2021 से प्रकाशन प्रारम्भ किया गया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है । "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य है हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना।
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१ वां द्विवार्षिक अधिवेशन
जुलाई 28 -30,2023 इंडिआना, अमेरिका
विस्तृत समाचार - जल्द आ रहा है
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – जागृति व्याख्यानमाला की रिपोर्ट
दसवीं कड़ी--१२ नवम्बर २०२२
“आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी विमर्श”
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(प्रस्तुति: सुरेंद्र नाथ तिवारी)
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प्रवक्ता: डॉ. कंचन शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल
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“आचार्य शुक्ल और दूसरे साहित्यिक इतिहासकारों ने स्त्री रचनाकारों को वह स्थान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था।" यह कहना था प्रोफ़ेसर कंचन शर्मा का। डॉ. कंचन शर्मा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की माहवारी व्याख्यानमाला "जागृति" की १०वीं कड़ी में बोल रही थीं। व्याख्यानमाला की यह कड़ी १२ नवम्बर २०२२ को
स्ट्रीमयार्ड (Streamyard) से वेबिनार के रूप में आयोजित थी। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था:
"आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी विमर्श"। डॉ. शर्मा मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल में हिंदी की असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। उनका शोध स्त्री-विमर्श पर केंद्रित है। अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त डॉ. शर्मा एक सिद्धहस्त और पुरस्कृत लेखिका भी हैं जिनकी कई पुस्तकें प्रकशित हैं।
डॉ. शर्मा ने स्त्री-विमर्श के दो पहलुओं पर अपनी बात रखी: हिंदी के साहित्यिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य में स्त्री-विमर्श और आधुनिक हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श का रचनात्मक स्वरुप। हिंदी के साहित्यिक इतिहास का लेखन विदेशियों, जैसे ग्रियर्सन, आदि ने प्रारम्भ किया। उनकी रचनाओं में उपनिवेशवाद भरा पड़ा है। वैसी मानसिकता में स्त्री-विमर्श को प्रश्रय मिलना कठिन था। पर हमारे अपने शीर्ष के विद्वान, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी --जिनकी पुस्तक "हिंदी साहित्य का इतिहास" एक प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है --- स्त्री रचनाकारों को हासिये पर रखा।
डॉ. शर्मा ने आचार्य शुक्ल की पुस्तक के कई उद्धरणों द्वारा बताया कि, हालाँकि आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक बेशुमार महिला रचनाकार हुईं हैं पर आचार्य शुक्ल ने अपनी पूरी पुस्तक में केवल पाँच का जिक्र किया है, वह भी संक्षेप में; और प्रोफ़ेसर शर्मा के अनुसार उन्हें भी शुक्ल जी ने पूरी प्रतिष्ठा नहीं दी है। वे पाँच हैं: अंडाल, मीराबाई, बंगमहिला, महादेवी वर्मा, और सुभद्रा कुमारी चौहान। हालाँकि कई प्रसिद्ध लेखिकायें और कवयित्रियाँ इस लम्बे दौर में हुई हैं; जैसे कश्मीर की लल्लू दद्दी, कश्मीर की ही 'लास्ट पोएट क्वीन आफ कश्मीर' कही जाने वाली हब्बा खातून, अरनिवास, मौएल्ला, अक्क महादेवी, जनाबाई दासी, शीला भट्टरिको, रोहा, भारती मिश्र, ताजबेगम, आदि। पर आचार्य शुक्ल के इतिहास में इनमें से किसी का नाम नहीं है। शुक्ल जी ने अपनी इस प्रसिद्ध पुस्तक में स्वयं लिखा है की "किसी देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब होता है। " प्रोफ़ेसर शर्मा ने कहा कि ऐसा लगता है कि शुक्ल जी ने इन महिला भक्तिनों और उनकी रचनाओं को जनता की पूर्ण "चित्तवृत्ति" की अभिव्यक्ति नहीं समझा और उन्हें हासिये पर रखा या उनकी पूरी अनदेखी की। प्रोफ़ेसर शर्मा का कहना है कि बाद के भी साहित्य के इतिहास के रचनाकारों की भी कमोबेश यही स्थिति रही है। आधुनिक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में इस विषय पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि उसमें केवल स्त्री विमर्श ही हाशिए पर नहीं है, अपितु समाज के दूसरे कई महत्वपूर्ण आयाम भी हासिये पर ही स्थान पा सके हैं जैसे दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि। साहित्य की विकास यात्रा में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थितियाँ उसके जन्म और कलेवर को प्रभावित करती हैं। विमर्श के विषय भी इन स्थितियों से घुले मिले हैं; अत: साहित्य पर इन विमर्शों के पस्थितिजन्य प्रभाव को अवश्य रेखांकित करना चाहिए। प्रोफ़ेसर शर्मा के अनुसार आज का साहित्य-इतिहास लेखक भी इन विभिन्न विमर्शों को इतिहास में उचित स्थान नहीं दे पाया है। कुछ नामचीन रचनाकारों को छोड़कर, अनेक रचनाकार अभी भी साहित्यिक इतिहास में स्थान नहीं पाए सके हैं, हासिये पर ही सिमट कर रह गए हैं।
डॉ. शर्मा ने इस बात की पुरजोर वकालत की है कि इन विमर्शों पर खुलकर बात होनी चाहिए और साहित्य के इतिहासकारों को प्रयत्नपूर्वक छिपे हुए मणिरत्नों को खोजक़र उन्हें साहित्य के इतहास में उचित स्थान देना चाहिए।
प्रोफ़ेसर शर्मा का वक्तव्य अनेकानेक उद्धरणों तथा उदाहरणों के कारण अत्यंत प्रभावशाली रहा; कुछ इसे शायद विवादास्पद भी समझें। इस रोचक व्याख्यान का पूर्ण आनंद लेने के लिए पूरी प्रस्तुति इस लिंक पर देखें: http://hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – “जागृति” व्याख्यानमाला की ११ वीं कड़ी,
१० दिसम्बर २०२२
“समकालीन हिंदी साहित्य: प्रवृत्तियाँ व् प्रमुख कृतियाँ”
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(प्रस्तुति: सुरेंद्र नाथ तिवारी)
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प्रवक्ता: डॉ. अनामिका, प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की माहवारी व्याख्यानमाला "जागृति" की ११ वीं कड़ी १० दिसम्बर २०२२ को स्ट्रीमयार्ड (Streamyard) १०० से वेबिनार के रूप में आयोजित थी। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था : "समकालीन हिंदी साहित्य: प्रवृत्तियाँ व् प्रमुख कृतियाँ " और वक्ता थीं; दिल्ली विश्वविद्यालय की विदुषी आचार्या डॉ. अनामिका। अनामिका जी दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर हैं। वे साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हिंदी की प्रख्यात लेखिका हैं, विभिन्न भाषाओँ का ज्ञान रखने के कारण वे साहित्य को समग्रता से समझने वाली एक विदुषी आचार्या हैं, और एक ओर ख्यातिलब्ध कवयित्री हैं। उन्होंने अपने व्याख्यान में समकालीन साहित्य और साहित्यिकों का एक बड़े ही विशद, उद्धहरणों (quotes) से भरे और विद्वत्तापूर्ण परिदृश्य को रेखांकित किया; जो बड़ा ही रोचक और ज्ञान-वर्धक था।
व्याख्यान के प्रारम्भ में उन्होंने समिति के इस 'उर्ध्वबाहु' प्रयास (जागृति) की सराहना करते हुए कहा कि समकालीन साहित्य भी एक उर्ध्वबाहु प्रयास है जो सारी दीवारें गफलंगाने (messing around) की कोशिश कर रहा है, कुछ साझे सपने उकेरने की चेष्टा कर रहा है। उनका कहना था कि समकाल का साहित्य आगे की ओर बढ़ना तो चाहता है, पर उसकी चूल पीछे की और भी खिंच रही है। कालिदास को याद करते हुए डॉ. अनामिका ने एक बड़ी ही रोचक उपमा दी- उन्होंने बताया कि जब राजा दुष्यंत शकुन्तला को वन में छोड़ अपना रथ आगे दौड़ा रहे थे तो रथ तो आगे जा रहा था पर उसकी पताका पीछे की ओर फहर रही थी। कुछ वही स्थिति समकालीन साहित्य की है । हम आगे जाना तो चाहते हैं पर कुछ पीछे है जो वैसा ही रहना चाहता है -- अतीत का शेषांश समेटने की एक वाध्यता सी रहती है --- तो बदलता क्या है ? बदलता है अंदाजे-बयां, कहने की शैली ।
द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके बाद भारत के विभाजन की त्रासदी झेलता हुआ हिंदी-समाज कई माजिक,आर्थिक,और सांस्कृतिक चुनौतियों से गुजरा है, वह आज 'विस्थापितों" का समाज हो गया है। इस सामाजिक स्थिति का जनमानस पर, उसकी प्रवित्तियों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इन त्रासदियों, परिवर्तनों, और तद्जनित चुनौतियों के कारण समाज में कई नई प्रवृतियाँ जन्मी हैं, कई नए मनोभाव मुखर हुये हैं; जैसे हताशा, क्रोध, निराशा, बंधनों से बाहर निकलने की व्याकुलता; और ये प्रवृत्तियाँ समकालीन साहित्यिक कृतियों में उभरकर, बड़े ही स्पष्ट रूप से, सामने आती हैं। ये नई प्रवृत्तियाँ समकलीन हिंदी साहित्य की विषय-वस्तु हैं, उसकी आत्मा है; पर इन प्रवृत्तियों को बयाँ करने का ढंग भी -- कहने की शैली भी-- बदली है, जैसे कविताओं से छंद गायब हैं और समाज की विद्रूपता, जो अभी तक शब्दों की घूँघट के पीछे छुपी रहती थी, समकालीन साहित्य में बेझिझक खुलकर सामने आ गई है । सड़क का आम आदमी समकालीन रचनाओं का नायक बन गया है।समकालीन साहित्य का कथ्य और शिल्प दोनों कुछ नया-नया सा है ।
विदुषी आचार्या ने हिंदी साहित्य की कई समकालीन कृतियों के हवाले से इस कथ्य और शिल्प के बदलाव के स्पष्टीकरण की चेष्टा की है । उन्होंने स्वतंत्रता से लेकर अभी तक के काल-खंडों --- १९४७ से लेकर १९६० तक, ६० से ९० के दशक तक, और ९० से अभी तक--- के,और उन अलग अलग कालखंडों में प्रवृतियों के बदलाव की और साहित्य पर उनकी छाप की चर्चा की है। यशपाल का "झूठा -सच' , श्रीलाल शुक्ल की "राग दरबारी", रही मासूम रजा का "आधा गाँव", कृष्णा सोबती का "जिंदगीनामा", राजेंद्र यादव का "उखड़े हुए लोग", फणीश्वर नाथ रेणु का "मैला आँचल", आदि अलग-अलग कालखंडों की रचनाएँ होते हुए भी समाज की इस बेकली को दर्शाती है। इसी तरह मैत्रेयी पुष्पा, चित्र मुद्गल, हरि सुमन, और अनेक रचनाकारों का साहित्य भी इन समकालीन प्रवृत्तियों और शैली का दर्पण है। प्रगतिवादी कवियों, जैसे ऋतुराज, संजीव सिंह, विमलचंद्र पांडेय, आदि ने-- और न जाने कितनों ने--- अपने समकालीन साहित्य में मानवीय सवेदनाओं और शारीरिक दुःख-सुख की माँसलता को भी अपनी कविताओं में समेटा है। अनामिका जी ने समकालीन साहित्य की स्थापनाओं को उजागर करने के लिए "खाँसी' कविता और केदार नाथ सिंह की एक प्यारी कविता का एक अंश पढ़ा, जो अपने स्थानबोध, कालबोध के कारण समकालीन साहित्य को समृद्ध करता है ।
विदुषी आचार्या ने अपने व्याख्यान के दौरान समकलीन साहित्य की प्रवृत्तियों और रचनाओं का एक व्यापक पटल श्रोताओं के समक्ष रक्खा, जो अपने प्रसार और गहराई के कारण न केवल ज्ञानवर्धक था, अपितु अत्यंत रोचक भी । इस रोचक व्याख्यान का पूर्ण आनंद लेने के लिए पूरी प्रस्तुति इस लिंक पर देखें: http://hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं एवं अन्य कार्यक्रमो की रिपोर्ट
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“12वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की एक झलक, फिजी देश में
द्वारा - डॉ. राकेश कुमार (अ.हि.स. की इंडिआना शाखा अध्यक्ष)
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“ "12वें विश्व हिन्दी सम्मेलन” की कुछ झलकियाँ
“12वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन” भारत सरकार और फिजी सरकार द्वारा संयुक्त रूप 15 से 17 फरवरी, 2023 तक नाडी, फिजी में आयोजित किया गया। मैं भारतीय महावाणिज्य दूतावास के कौंसल जनरल श्री सोमनाथ घोष जी का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया। इस सम्मेलन में मैंने हिंदी भाषा के विभिन्न पहलुओं से संबंधित सत्रों में भाग लिया, हिंदी के विशेषज्ञों और विद्वानों के साथ बातचीत की और माननीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर जी, राज्य गृह मंत्री, श्री अजय कुमार मिश्रा जी; राज्य विदेश मंत्री श्री मुरलीधरन जी के प्रेरक भाषणों से लाभान्वित हुआ।
“विश्व हिंदी सम्मेलन” एक वैश्विक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य हिंदी भाषा का प्रचार और प्रसार करना है, यह आयोजन अक्सर उन देशों में आयोजित किया जाता है जहाँ हिंदी बोलने वालों की अच्छी खासी संख्या है। फिजी ने इस सम्मलेन की मेजबानी की क्योंकि यह दुनिया में देशी हिंदी बोलने वालों की सबसे बड़ी आबादी में से एक है। फिजी भारत के बाहर एकमात्र देश है जो हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देता है।
नीचे सम्मेलन से सम्बंधित कुछ मुख्य बातें और मेरा अपना अवलोकन:
१- इस सम्मेलन में 31 से अधिक देशों के लगभग 1,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें दुनिया भर के विद्वान और विशेषज्ञ शामिल थे, जिन्होंने हिंदी भाषा से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा की।
२ - विदेश मंत्री श्री एस. जयशंकर के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल में विदेश और संसदीय मामलों के राज्य मंत्री श्री वी. मुरलीधरन; गृह राज्य मंत्री, श्री अजय कुमार मिश्रा; संसद के सदस्य; और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। विदेश मंत्री श्री एस.जयशंकर ने 12वें विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन किया। उदघाटन के दौरान फिजी के राष्ट्रपति श्री रातू विलेम मावलीली काटोनिव्रे भी मौजूद थे और उन्होंने कहा कि फोरम भारत के साथ फिजी के ऐतिहासिक और विशेष संबंधों की स्थायी ताकत का जश्न मनाने का एक अनूठा अवसर प्रस्तुत करता है। इस अवसर पर श्री जयशंकर ने फिजी के राष्ट्रपति रातू के साथ एक डाक टिकट जारी किया और इस कार्यक्रम में छह पुस्तकों का विमोचन किया गया ।
३ - श्री जयशंकर ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि “विश्व हिन्दी सम्मेलन” जैसे आयोजनों में स्वाभाविक है कि हमारा ध्यान हिन्दी भाषा के विभिन्न पहलुओं, उसके वैश्विक उपयोग और प्रसार पर होना चाहिए। हम फिजी, प्रशांत क्षेत्र और गिरमिटिया देशों में हिंदी की स्थिति जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे। उन्होंने कहा कि पश्चिमी भाषाओं और परंपराओं की नकल करने का युग खत्म हो गया है। वह युग जब हम प्रगति और आधुनिकता की तुलना पश्चिमीकरण से करने लगे थे। कई ऐसी भाषाएँ और परम्पराएँ जो औपनिवेशिक काल के दौरान दबा दी गई थीं, फिर से वैश्विक मंच पर अपनी आवाज उठा रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में यह आवश्यक है कि दुनिया को सभी संस्कृतियों और समाजों के बारे में पता होना चाहिए।
४ - फिजी सरकार का उच्चतम स्तर पर प्रतिनिधित्व किया गया, जिसमें अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ राष्ट्रपति रातू विलीमे काटोनिवेरे, प्रधानमंत्री सित्विनी राबुका और सभी तीन उप प्रधानमंत्रियों की उपस्थिति थी।
५ - श्री जयशंकर ने प्रधानमंत्री रबूका को आश्वस्त किया है कि भारत फ़िजी के साथ साँस्कृतिक संबंधों को और मजबूती देने के लिए कदम उठाएगा। श्री जयशंकर ने बताया कि प्रधानमंत्री रबूका ने दोनों देशों के बीच दोस्ती की तुलना के लिए सत्तर के दशक में आई बॉलीवुड की बेहद लोकप्रिय फ़िल्म ‘शोले’ का ज़िक्र किया। विदेश मंत्री के अनुसार, प्रधानमंत्री रबूका ने उन्हें बताया कि ‘शोले’ उनकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म है और उसका गाना ‘ये दोस्ती, हम नहीं तोड़ेंगे …. ’ उन्हें विशेष रूप से प्रिय है।
६ - सम्मेलन का मुख्य विषय "हिन्दी-पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम मेधा तक" था, जिस पर एक पूर्ण सत्र में चर्चा की गयी। दस पारंपरिकअन्य शैक्षणिक सत्र हिंदी भाषा से संबंधित विविध उप-विषयों पर आयोजित किए गए। दस सत्रों में शामिल है (1) गिरमिटिया देशों में हिंदी; (2) फिजी और प्रशांत क्षेत्र में हिंदी; (3) सूचना प्रौद्योगिकी एवं 21वीं सदी की हिंदी; (4) मीडिया और हिंदी की विश्व धारणा; (5) भारतीय ज्ञान, परंपरा और हिंदी की वैश्विक सामग्री; (6) भाषाई समन्वय और हिंदी अनुवाद; (7) हिंदी सिनेमा के विभिन्न रूप: वैश्विक परिप्रेक्ष्य; (8) विश्व बाजार और हिंदी; (9) बदलते परिदृश्य में हिंदी साहित्य; (10) देश-विदेश में हिंदी शिक्षण: चुनौतियाँ और समाधान ।
७ - मुझे सूचना प्रौद्योगिकी और 21वीं सदी की हिंदी विषयक सत्र में बोलने का अवसर मिला। अपने वक्तव्य में मैंने सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिंदी भाषा के शिक्षण -प्रशिक्षण पर जोर दिया और यह भी बताया कि कृतिम मेधा का उपयोग अगली पीढ़ी को हिन्दी सीखने में बहुत ही सार्थक सिद्ध होगी।
८ - सम्मेलन के दौरान दक्षिण और उत्तर पूर्व भारत से भागीदारी पर विशेष जोर दिया गया। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सम्मेलन के दौरान भारत से कुल 12 हिंदी विद्वानों और विदेश से 19 विद्वानों के साथ-साथ भारत और विदेश से 2-2 संस्थानों को सम्मान के लिए चुना गया।
९ - समापन समारोह के अन्य मुख्य आकर्षणों में फिजी के उप प्रधानमंत्री बिमान प्रसाद द्वारा हिंदी में दिया गया भाषण था, जिसमें फिजी द्वारा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए उठाए जा रहे कदमों पर प्रकाश डाला गया और फिजी की संसद में हिंदी में भाषण देने की अनुमति भी शामिल थी। सम्मेलन के अंत में जारी प्रतिवेदन में कहा गया कि 15 फरवरी से 17 फरवरी तक प्रशांत क्षेत्र के फिजी देश के नांदी नगर में आयोजित हुआ “12वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन” सफल रहा। इसमें कहा गया कि “12वें विश्व हिंदी सम्मेलन” में सम्मिलित भारत और फिजी सहित विश्व के अन्य देशों के सभी प्रतिनिधियों का यह समवेत मत है कि कृत्रिम मेधा (एआई) जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियाँ का हिंदी के माध्यम से प्रयोग करके भारतीय ज्ञान एवं पारंपरिक प्रणालियों को विश्व की बहुत बड़ी जनसंख्या तक पहुँचाया जा सकता है।
१० - प्रतिवेदन में कहा गया कि प्रतिस्पर्धा एवं प्रतियोगिता पर आधारित विश्व की व्यवस्था को सहकार, समावेशन और सह-अस्तित्व पर आधारित वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करने में हिंदी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रतिवेदन के अनुसार, “12वें विश्व हिंदी सम्मेलन” का स्पष्ट मत यह भी है कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (पूरी पृथ्वी ही परिवार है) और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ (सभी प्राणी सुखी रहें) के आधार पर अंतरराष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वैश्विक बाजार का निर्माण किया जा सकता है। इस सत्र में कहा गया कि इस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ाने तथा हिंदी शिक्षण में आधुनिक प्रणालियों एवं संसाधनों का प्रभावशाली तरीके से उपयोग किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
११ - सम्मेलन में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) और फिजियन सरकार द्वारा विशेष सांस्कृतिक प्रदर्शन का आयोजन भी देखा गया। फिजी में गिरमिटियों की कहानी पर सम्मेलन के दौरान एक विशेष प्रदर्शनी आयोजित की गई।
१२ - इस सम्मेलन ने मुझे कुछ शिक्षकों से मिलने और हिंदी शिक्षा के प्रति उनके दृष्टिकोण को सीखने का एक बहुमूल्य अवसर प्रदान किया, विशेष रूप से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मिडिल से लेकर हाई स्कूल तक। मैं महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति प्रो. रजनीश शुक्ला से मिला। यहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदी पाठ्यक्रमों की मान्यता कैसे प्राप्त की जाए, इस पर हमारी बहुत अच्छी चर्चा हुई।
१३ - मुझे ICCR के महानिदेशक श्री कुमार तुहिन जी से मिलने का भी अवसर मिला, और मैंने मिडवेस्ट में हिंदी को बढ़ावा देने के हमारे चल रहे प्रयासों और जुलाई में IHA के आगामी हिंदी सम्मेलन के बारे में संक्षेप में बताया। मैंने आईसीसीआर के माध्यम से हमारे हिंदी सम्मेलन के लिए श्री मनोज मुंतशिर को आमंत्रित करने के हमारे अनुरोध का उल्लेख किया और उन्होंने कहा कि “वह इस पर गौर करेंगे”, और सुझाव दिया कि “मैं इस अनुरोध को भारतीय वाणिज्य दूतावास, शिकागो के माध्यम से भेजूँ”।
१४ - सत्रों के दृष्टिकोण से, आयोजक उच्च मानक को पूरा करने में विफल रहे। मॉडरेटर और सत्रों के समय को लेकर कुछ भ्रम था। सत्र प्रस्तुतिकरण और संचार बेहतर हो सकता था।
१५ - इस सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए श्री जयशंकर ने कहा कि हमें इस सम्मेलन को एक बार भारत में और एक बार विदेश में आयोजित करना चाहिए ताकि सभी हिंदी प्रेमियों और भाषा को बढ़ावा देने के इच्छुक लोगों को एक अवसर मिल सके। उन्होनें कहा, हमारा लक्ष्य है कि हिंदी को वैश्विक भाषा कैसे बनाया जाए और कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए समय और सहयोग के लिए फिजी सरकार का आभार व्यक्त किया। श्री जयशंकर ने कहा, "आईसीसीआर के प्रयासों के कारण, लगभग 31 देशों के बुद्धिजीवी हमारे साथ मौजूद हैं। हमें इसके प्रयासों को पहचानना होगा।" कुल मिलाकर, यह नेटवर्क बनाने और हिंदी सीखने और विस्तार करने के लिए एक अच्छा हिंदी सम्मेलन था।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शॉर्लट शाखा, उत्तरी कैरोलिना
“हिंदी महोत्सव (विश्व हिंदी दिवस)”
द्वारा-श्रीमती प्रिया भरद्वाज (अध्यक्षा- शॉर्लट, उत्तरी कैरोलिना)
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हिंदी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा है, यह आप और हम सभी जानते हैं। ‘विश्व हिंदी दिवस’ हिंदी भाषा को विश्व में सम्मानित करने के लिए मनाया जाता है। ‘विश्व हिंदी दिवस’ का कार्यक्रम शॉर्लट, उत्तरी कैरोलिना के ‘हिन्दू सेन्टर विहार’ के सभागार में हुआ। समिति की अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज के संयोजन एवं संचालन में ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के परिप्रेक्ष्य (perspective) में सभी के सहयोग और प्रेम से सफलतापूर्वक १५ जनवरी, २०२३ को अपराह्न ३:०० बजे से प्रारम्भ होकर शाम ७:०० बजे तक यह कार्यक्रम हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से किया गया। आदरणीय बाल गुप्ता, श्री हेमंत अमी, श्री निमिष भट्ट, श्री अशोक पण्डित एवं श्री रवि पटेल के द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया।
तत्पश्चात शॉर्लट, उत्तरी कैरोलिना समिति की अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज ने ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के महत्व पर प्रकाश डाला और बताया कि ‘विश्व हिन्दी दिवस’ की शुरुआत १० जनवरी, १९७५ को नागपुर अधिवेशन में तत्कालीन भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की अध्यक्षता में की गई और तभी से ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाया जा रहा है।
कार्यक्रम की शुरुआत में बच्चों द्वारा भारतीय एवं अमेरिका का राष्ट्रगान किया गया। इसके बाद ही हमारे नन्हे कलाकारों ने अपनी-अपनी कला को बहुत ही अच्छी तरह प्रदर्शित किया श्रियान ने गिटार बजाया, अभिमन्यु ने भाषण दिया, आकर्षित ने तबला वादन किया, आशी ने भरतनाट्यम का अच्छा प्रदर्शन किया, शौर्य ने वायलिन बजाया एवं कत्थक की शानदार प्रस्तुति की। सभी कलाकारों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम के अगले पड़ाव में अमृता चौधरी ने अपने नृत्य द्वारा प्रथमपूज्य गणेश को पुष्पांजलि अर्पित की। हमारे अन्य कोरियोग्राफर श्रीमती स्वाति अग्रवाल के बच्चों द्वारा ‘हिन्दी भाषा है राष्ट्र भाषा’ एवं ‘देशभक्ति’ पर बहुत ही शानदार नृत्य की प्रस्तुति देकर सभी का मन मोह लिया। श्री राकेश अरोरा ने देशभक्ति से ओतप्रोत गीत ‘होठों पर सच्चाई रहती है’ ने सभी श्रोताओं के मन में देशभक्ति की भावना जागृत कर दी। हमारी अन्य कोरियोग्राफर श्रीमती साधना मिश्रा ‘ताल से ताल मिला’ के नृत्य को देखकर दर्शकों का मन मयूर नाच उठे।
जानी मानी कोरियोग्राफर श्रीमती सुदेशना बसु सेन द्वारा ‘वन्दे मातरम्’, ‘ढोल बाजे’ एवं ‘कदम-कदम’ देखकर संपूर्ण परिसर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ गूँज उठा। कार्यक्रम के अगले पायदान पर पुन: सुश्री अमृता चौधरी के नृत्य ‘केसरिया’, ’रंगीली साड़ी’ और ‘देसी गर्ल’ ने सभी दर्शकों को बाँधे रखा।
बच्चों के बौद्धिक विकास और हिन्दी भाषा के प्रति लगाव विकसित करने के लिए वर्कशाप (कार्यशाला) का आयोजन श्रीमती पाम बत्रा के मार्गदर्शन में किया गया। श्रीमती नेहा वर्मा के मार्गदर्शन में पेटिंग वर्कशाप (कार्यशाला) का आयोजन किया गया, जिसमें सभी बच्चों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। श्री करमत बत्रा, नेहा, मानसी की आर्ट गैलरी ने सभी का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया।
कार्यक्रम के मध्य में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें हमारे सभी स्थानीय कवियों ने भाग लिया। उनमें मुख्यतः श्री बाल गुप्ता ने ‘देशभक्ति’ के गीत सुनाये, श्रीमती अंजू अग्रवाल ने ‘माँ’ पर कविता पढ़ी, श्रीमती अंजलि कौल ने ‘पिता’ पर अपनी कविता सुनाई, श्रीमती श्वेता गुप्ता ने ‘परिवर्तन’ पर अपनी भावनाएँ गाकर बताई, श्री प्रवीण तिवारी ने ‘इंसान’ पर अपने भाव व्यक्त किये, श्री अशोक पंडित ने ‘बचपन की याद’ को साझा किया, श्रीमती रितु वर्मा ने भी अपने ‘बचपन की याद’ को ताजा किया , श्रीमती तृप्ति तिवारी ने ‘हिन्दी भाषा’ पर कविता पढ़ी, श्रीमती श्वेता स्थापक ने ‘पिता’ पर कविता पढ़ी एवं श्रीमती प्रत्यासा ने ‘हिन्दी’ भाषा पर कविता सुनाई और सारा परिसर "वाह-वाह" के शब्दों से गूंज उठा।
कार्यक्रम का समापन अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति, शॉर्लट, नॉर्थ केरोलिना की अध्यक्षा श्रीमती प्रिया भारद्वाज के धन्यवाद ज्ञापन द्वारा हुआ। उन्होंने सभी कलाकारों को धन्यवाद दिया, साथ ही जिन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में तन-मन-धन से अपना सहयोग दिया उनको भी धन्यवाद दिया। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी सदस्यों को उनके सहयोग के लिये साधुवाद और सभी दर्शकों के प्रति आभार प्रकट किया। साथ ही श्री अफसान फारूख, श्रीमती अभिलाषा ठाकुर, श्रीमती मधुमिता रघुवंशी, श्री जितेन्द्र रघुवंशी, श्रीमती मुसकान, श्री राम आर्या, श्रीमती रजनी आर, श्रीमती रीना मोखा, श्रीमती सचिन महाजन, श्रीमती प्रियंका हरिनखेड़े, श्री सुरेन्द्र हरिनखेड़े, श्री सुप्रज्ञ मिश्रा, श्रीमती स्वाति मिश्रा, श्रीमती शची अवस्थी के योगदान को भी सराहा।
इस बार के कार्यक्रम में कोइ निबंधन (Registration) शुल्क नही था। कार्यक्रम के दौरान समिति के द्वारा सभी के लिए समुचित भोजन की व्यवस्थता की गई थी। हिंदी महोत्सव के कार्यक्रम को मीडिया में एक ही दिन ३ बार प्रसारित किया गया था।
‘हम सब का अभिमान है हिंदी, भारत देश की शान है हिंदी’।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – उत्तर पूर्व शाखा एवं शिव विष्णु मंदिर
द्वारा आयोजित ‘विश्व हिंदी दिवस’ 15 जनवरी, 2023
द्वारा-प्रेषित : श्रीमती अलका खंडेलवाल, उपसंपादक ‘संवाद’
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर पूर्व शाखा और शिव विष्णु मंदिर के संयुक्त प्रयासों द्वारा 15 जनवरी, 2023 को शिव विष्णु मंदिर, पारमा के भूतल सभागार में ‘विश्व हिंदी दिवस’ के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की सूत्रधार डॉ. शोभा खंडेलवाल और श्रीमती वंदना भारद्वाज ने अपना-अपना परिचय दे कर किया, साथ ही दोनों ने सभी का स्वागत करते हुए ‘विश्व हिंदी दिवस’ के बारे में बताया।
दीप प्रज्वलन: भारतीय परम्परा के अनुसार सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन किया गया। दीप प्रज्वलन में श्रीमती सुशीला मोहनका, अ.हि.स. की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्षा; श्रीमती किरण खेतान, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा; श्री सतश गुप्ता, मंदिर के कोषाध्यक्ष; श्रीमती विमल शरण, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के संस्थापक अध्यक्ष; श्रीमती रेनू चड्डा, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा; डॉ. शैल जैन, आगामी राष्ट्रीय अध्यक्षा और श्रीमती अलका खंडेलवाल, उपसंपादक ‘संवाद’ थीं।
सरस्वती वंदना: श्री पद्मनाभन रघुनाथन द्वारा सरस्वती वंदना ‘माता सरस्वती शारदा’ गाकर की गई।
अध्यक्षा के भाषण का सार - अ.हि.स. उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की वर्तमान अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान ने दर्शकों,लेखकों, अध्यापकों एवं अन्य कार्यकर्ताओं सभी का विधिवत स्वागत किया। उन्होंने 'विश्व हिंदी दिवस' के महत्व के साथ-साथ हिन्दी भाषा के बारे में भी बताया। हिंदी भाषा वक्ताओं की ताकत है, लेखकों का अभिमान है। यह महज भाषा ही नही बल्कि, हम भारतीयों को एकता के सूत्र में भी पिरोती है। हमारी आन- बान- शान है। शायद हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जिसे हम जैसे बोलते है ठीक वैसे ही लिखते हैं और पढ़ते हैं। इसके हर शब्द में गंगा जैसी पावनता और गगन जैसी व्यापकता है। साथ ही उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के स्थानीय कलाकारों को अपनी-अपनी प्रतिभा दिखाने का भी अवसर मिल रहा है।
शिव विष्णु मंदिर के कोषाध्यक्ष श्री सतीश गुप्ता जी ने दर्शकों को सम्बोधित किया और हिंदी भाषा की महत्ता को बताते हुए कहा की यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी हिंदी बोले और भारतीय संस्कृति से जुड़े तो सिर्फ उन्हें हिंदी स्कूल में भेजना ही काफी नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है कि वे इसकी शुरुआत अपने घरों से ही करें। जरूरी नहीं की पूरा वार्तालाप ही हिंदी में की जाए, वार्तालाप में बीच-बीच में हिंदी शब्दों का प्रयोग भी बच्चों में हिंदी बोलने और समझने में मददगार साबित हो सकता है और हिंदी सीखने के प्रति उनमें रूचि जगा सकता है।
डॉ. उत्सव के. चतुर्वेदी जी ‘दुश्मन जोंपुरी’ को निमंत्रित किया गया। उन्होंने अपनी स्वरचित कविता ‘चिड़ियों को दाने’ का पाठ किया, उन्होंने बताया की कैसे आज का मनुष्य एक ओर तो जीव जंतुओं का हक़ छीन रहा है और दूसरी ओर जो उनके संरक्षण के लिए थोड़ा बहुत करता है उसमें अपने आपको बड़ा समझता है, अपनी वाहवाही करता है।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – डैलस, टेक्सास शाखा
“विश्व हिन्दी दिवस’, रविवार, ५ फ़रवरी २०२३”
द्वारा : राष्ट्रीय अध्यक्षा अनिता सिंघल, डैलस, टेक्सास
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रविवार, ५ फ़रवरी २०२३ को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की डैलस, टेक्सास शाखा ने ‘विश्व हिन्दी दिवस’ का कार्यक्रम बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डैलस, टेक्सास शाखा के अध्यक्ष श्री अखिल कुमार ने की थी। यह कायर्क्रम ‘Residence Inn, Plano m, Texas’ में दिन में २:०० से ४:०० बजे तक हुआ। लगभग ४०-५० लोग सभागार में थे।
इसके बाद कविता का दौर प्रारम्भ हुआ। श्रीमती बीणा शर्मा, डैलस ने बसंत के मौसम पर स्वरबद्ध कविता सुनाई। डॉ. नंदलाल सिंह ने एक “जिज्ञासा” ग्रुप बनाया है, उसी के आधार पर प्रेमचंद जी के जीवन एवं उनकी संगिनी की रोचक चर्चा की। राष्ट्रीय अध्यक्षा अनिता सिंघल ने नववर्ष पर अपनी कविता सुनाकर सबका मन मोह लिया। श्री देव प्रकाश सिंह, डैलस ने अपना जीवन-दर्शन गीतविधा में सुनाया। डॉ. धीरेन ने पंचवटी के साथ तुलसीदास और रहीमदास जी का स्मरण किया। श्री जयंत चौधरी, मुरफी ने, “ढोल गंवार शूद्र पशु….” पर विस्तृत जानकारी दी। डॉ. नरेन्द्र मोंगा, डैलस ने अपने पिताजी के आदर्शों को याद करते हुए अपनी पत्नी के साथ मधुर गीत गाया। श्रीमती गौरी वर्मा, डैलस ने अमृतलालनागर पर अपने विचार व्यक्त किए। अंत में अध्यक्ष अखिल कुमार ने विवाह भोज पर हँसाते हुए कार्यक्रम का समापन किया। डैलस, टेक्सास शाखा की पूर्व अध्यक्षा- श्रीमती निशी भाटिया ने इस समारोह में स्वादिष्ट भोजन का आयोजन अपने चुटकुलों के साथ किया।
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खड़े हैं: कृष्णा भास्कर, अखिल कुमार, आकाश वर्मा, डॉ. सुभाष सिंघल, पंकज कुमार, सुनील मैनी, डॉ. नरेन्द्र मोंगा, मोती अगरवाल, राकेश शर्मा, डॉ. नन्दलाल सिंह.
बैठे हैं: शीतल कुमार, परम अगरवाल, चंदर मोंगा, अनीता सिंघल, गौरी वर्मा, निशि भाटिया, ज्योति भाटिया, शीला सिंह, बीना शर्मा, मोना भास्कर.
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-- शाखा उत्तर प्रदेश, भारत
संत शिरोमणि गुरु रविदास जयंती पर विचार एवं काव्य गोष्ठी, कैलाशपुरी, मेरठ, उत्तर प्रदेश, भारत
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द्वारा - डॉ. रामगोपाल भारतीय,
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डॉ. रामगोपाल भारतीय, उपाध्यक्ष
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तर प्रदेश, भारत
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मास्टर सुंदरलाल स्मृति न्यास, मेरठ’ के सौजन्य से संत शिरोमणि कवि गुरु रविदास जयंती के शुभ अवसर पर संस्था के प्रधान कार्यालय 35/1 कैलाशपुरी, मेरठ में एक विचार गोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता मेरठ के वरिष्ठ कवि श्री जय प्रकाश शर्मा जेपी ने की और कार्यक्रम के संरक्षक बने प्रोफेसर वेद प्रकाश बटुक, जबकि संचालन गजल कार डॉ. रामगोपाल भारतीय ने किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. आर के भटनागर ने माँ वाणी के चित्र पर पुष्प अर्पण किए और सभी रचनाकारों का फूलमाला पहनाकर स्वागत किया।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए अधिवक्ता और क्रांतिकारी कवि जनवादी लेखक संघ से जुड़े श्री मुनेश त्यागी ने देश की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा की भारत का संविधान संत रविदास जी की विचारधारा को समाहित करता है परंतु आज कुछ लोग संविधान का सम्मान नहीं कर रहे, जबकि आज देश को सांप्रदायिक सद्भाव भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता की सबसे अधिक आवश्यकता है। उन्होंने एक कविता भी प्रस्तुत की:
“तिरंगा ओढ़कर लूट रहे पूरे भारत को
तिरंगा ओढ़े इन लुटेरों को सलाम कैसे करूँ,
इन्होंने वादे तोड़े नारे तोड़े विश्वास तोड़ा
सब कुछ तोड़ने वालों को, सलाम कैसे करूँ?”
इसके बाद पत्रकार कवि और समीक्षक श्री शाहिद चौधरी, शाहिद ने अमर शायर गालिब के बारे में एक रोचक आलेख पढ़ा जिसमें गालिब के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को बखूबी दर्शाया गया। कार्यक्रम के इस क्रम में आर्य समाज से जुड़े कवि श्री धर्मपाल सिंह आर्य ने भी धर्म और समाज पर अपने विचार रखे और एक सुंदर गीत प्रस्तुत किया जिसमें भारतीय संस्कृति का गुणगान किया गया था।
“देश बचाया गुरु रविदास ने जय बोलो।
हमको सोते आन जगाया जय बोलो।।
मुस्लिम काल में हम पर बड़े-बड़े अत्याचार हुए।
पीड़ित हिंदू बाल वृद्ध नर नार हुए।
जो भटक गए थे मार्ग पुन:सन्मार्ग दिखाया जय बोलो।
गुरुवर रविदास ने देश बचाया जय बोलो”।।
इसके बाद संचालन कर रहे डॉक्टर रामगोपाल भारतीय ने एक मुक्तक और गजल से श्रोताओं को देश के वर्तमान हालात से जोड़ा उनकी पंक्तियाँ थी :
“हमको तुम्हारे हाथ के काँटे कुबूल थे
लेकिन तुम्हारे सब के सब वादे फिजूल थे
तुमने गुलाब कहके जो गुंचा हमें दिया
देखा जो हमने गौर से कागज के फूल थे”
कविता के क्रम में साहित्य भूषण पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ गजलकार श्री किशन स्वरूप ने अपनी गजलों से समा बाँध दिया। इसके बाद कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री जयप्रकाश जेपी ने रचनाकार, कविता और श्रोता का संबंध स्थापित करते हुए अपनी बात कही। उन्होंने एक कविता भी प्रस्तुत की जिसके शब्द इस प्रकार थे।
“आँखों की जमीं बंजर बना ली,
पुतलियों में पत्थर उगाने के लिए
दुनिया के लिए इतना ही काफी था
मुझे पागल बताने के लिए”
कार्यक्रम के अंत में विशिष्ट अतिथि पूर्व कमिशनर डॉ. आर के भटनागर ने अपने विचार प्रकट करते हुए रविदास को एक महान कवि और समाज सुधारक बताया। उन्होंने कहा कि कवि युग दृष्टा होता है और आज हमें देश को एक सूत्र में जोड़ने वाले साहित्य और साहित्यकार की जरूरत है। कार्यक्रम के संरक्षक प्रोफेसर वेद प्रकाश वटुक ने अपनी बहुचर्चित रचना से कार्यक्रम का समापन किया।
“मुहब्ब्त का खुला पैगाम देता हूँ जमाने को
जो फिर मासूम बच्चों के लबों पर कुछ हँसी ला दे
जो मजलूमों के आँसू पौछकर दिल को तस्सली दे
धधकती आग नफरत की मुहब्ब्त से बुझाने को”
उनकी इस रचना पर बहुत देर तक श्रोताओं की तालियाँ बजती रही। अंत में आयोजक प्रोफेसर बटुक ने सभी कवियों का धन्यवाद और आभार प्रकट किया।
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अपनी कलम से
“शहीद...!”
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द्वारा - श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव
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श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय”, औरंगाबाद- महाराष्ट्र से हैं। लेखन के साथ-साथ शोध कार्य में अध्ययनरत हैं।
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“माँ, मुझे सेना में भर्ती होना है। देशसेवा करनी है। देश के लिए जीना है, देश के खातिर मरना भी!”
“बेटा, करण सेना में भर्ती होने के लिए तुझे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी” ।
“करूँगा। एन.सी.सी. में मैं सेना भर्ती के खातिर ही शामिल हुआ था। अब बारहवीं कक्षा पास भी हुआ हूँ। सिर्फ सेना भर्ती विज्ञापन की राह देख रहा हूँ”। इतने में पिताजी ने आवाज दिया-"करण, केंद्र सरकार ने 14 जून, 2022 को घोषणा की है। तुने न्यूज देखी क्या?"
"काम के वजह से नहीं देख पाया। कौन-सी घोषणा पिताजी?"
"अग्निपथ योजना। थल सेना, नौ सेना, वायु सेना आदि में भर्ती। इसमें जिनका चयन होगा, उन्हें अग्निवीर नाम से पहचाना जाएगा।"
"अग्निपथ योजना यानी क्या पिताजी?"
"सेना में चार वर्ष सेवा। वह भी नान कमीशन पद पर।"
"पिताजी, मैं नहीं समझा।"
"केंद्र सरकार हर वर्ष सेना में युवाओं की भर्ती करेगी, सिर्फ चार वर्ष के लिए। लड़कों की उम्र सत्रह वर्ष से लेकर तेईस वर्ष तक रहेगी। भर्ती हुए जवानों में से चार वर्ष के पश्चात पच्चीस प्रतिशत वीर ही आगे सेवा में शामिल किए जायेंगे।"
"चार वर्ष के पश्चात उन पचहत्तर प्रतिशत जवानों का क्या? वे क्या करेंगे। उनकी पढ़ने की उम्र भी चली जाएगी। वे बेरोजगार होंगे पिताजी।"
"केंद्र सरकार कह रही है कि हम उन्हें चार वर्ष में कुल मिलाकर ग्यारह लाख इकहत्तर हजार रूपए दे रहे हैं। उन पैसों से वे कुछ भी कर सकते हैं। इतना ही नहीं बल्कि किसी की सेवा करते समय मृत्यु होती है तो उन्हें चौवालीस लाख रूपए मिलने वाले हैं। साथ ही कोई व्यक्ति सौ प्रतिशत अपाहिज हुआ, तो उन्हें सरकार चौवालीस लाख रुपए देने वाली है।"
"पिताजी, युवा वर्ग सिर्फ पैसों के लिए सेना में नहीं आते। उन्हें देश सेवा करनी होती है। यह सेना भर्ती मतलब, अन्याय है। उसके खिलाफ हम युवा आवाज उठाएंगे।"
देखते-देखते हिन्दुस्तान में अग्निपथ योजना के विरोध में अंदोलन शुरू हुए। विद्रोही रूप उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, असम आदि राज्य में देखने मिला किन्तु केंद्र सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। वह अपने मत पर अड़ी रही। न टस हुए न मस हुए क्योंकि उन्हें किसी को पेंशन अन्य सुविधाएँ देने की जरूरत नहीं थी।
"पिताजी, पूरे हिन्दुस्तान से अग्निपथ योजना का विरोध हुआ, तब भी केंद्र सरकार ने निर्णय नहीं बदला।"
"हाँ। उन्हें मालूम है, भारत में बेरोजगारी है। शायद इसी सोच का फायदा उठाया होगा।"
"आपका मतलब सेना भर्ती में युवा बेरोजगारी के कारण जा रहे हैं।"
"मेरे कहने का मतलब यह नहीं था बेटा। हर व्यक्ति के दिल में देश प्रेम है। साथ ही बेरोजगारी।"
"पिताजी, कारण कोई भी हो, मैं सेना में जाऊँगा ही। सेवा चाहे कितनी भी क्यों न हो।"
"ठीक है, तुम्हारी इच्छा। लेकिन तैयारी अच्छी कर क्योंकि अकेले महाराष्ट्र से अस्सी हजार युवाओं ने फार्म भरे हैं।"
"मैं मरना पसंद करूँगा, हारना नहीं।"
"तेरी मेहनत पर मुझे विश्वास है। तेरा चयन निश्चित रूप में होगा।"
फार्म भर दिया। सुविधा न होने के बाद भी मेहनत जारी रही, दिन कैसे गुजर गए, पता नहीं चला। एक दिन पोस्ट मास्टर पत्र लेकर घर आए। नामदेव ने लिफाफा खोलकर देखा और कहा- "बेटा, करण तेरा पत्र आया है।"
"किस का है?"
"सेना भर्ती के संदर्भ में है शायद।"
"दिखाइए पिताजी।"
"क्या है बेटा?"
"सेना भर्ती की ग्राउंड तिथि।"
"कब है ग्राउंड?"
"18 अगस्त, 2022 को। लेकिन एक दिन पहले बुलाया है।"
"कहाँ?"
"औरंगाबाद, महाराष्ट्र।"
"सब साहित्य लेकर जाना।"
"हाँ। गाँव से अर्जुन भी है साथ।"
17 अगस्त को सुबह-सुबह दोनों औरंगाबाद के लिए रवाना हुए। दोपहर शहर पहूँचे। मैदान में सभी ओर लड़के ही दिख रहे थे। सभी की भागदौड़ चल रही थी। हर कोई खुद के काम में व्यस्त था। करण ने भीड़ में से एक लड़के को पूछा- "भाई, हमारी रहने की व्यवस्था कहाँ है?"
लड़के ने कहा-"भाई, मैं कल सुबह आया हूँ। रोड़ पर सोकर रात गुजारी है। खाने-पीने का मत पूछो। यह अलग समस्या है।" यह सुनकर अर्जुन चिंतित हुआ। उसी समय करण ने नजदीक के कर्मचारी से पूछा- "सर, जीरोक्स की दुकान कहाँ है?"
"नजदीक नहीं है। सामने वाले घर में किराना दुकान है। उन्होंने कुछ ही दिन पहले जीरोक्स मशीन लाई है। वहाँ जाओ।"
"काका, जीरोक्स चाहिये।" करण ने कहा।
"एक जीरोक्स दस रूपए। वह भी सामने वाला पेज। पीछे वाले साईट के अलग पैसे।"
"काका, बाहर एक पेज आगे-पीछे से दो रुपए जीरोक्स है।"
"वही से लाओ।"
"दीजिए काका। गलती हुई बहस की आपसे।"
"काका, पानी की बाटल ...."
"पचास रूपए।"
"दीजिए। जल्द जाना है।"
सब काम निपटाते-निपटाते शाम हुई। करण, अर्जुन को रात रास्ते पर निकालनी पड़ी, खाने को कुछ नहीं था। सिर्फ पानी था। दिन भर कागजाद की पड़ताल हुई। रात को रनिंग के लिए बुलाया। रात के बारह बजे कर्मचारी ने नाम पुकारा-"करण नामदेव पवार।" हाजिर है तो सामने आये। “आये” कहकर
करण सामने आया। वह कल से भूखा था। पानी पर था। रनिंग शुरू हुई। वह बहुत तेजी से भागा।
मंजिल नजदीक थी किंतु वह रास्ते में चक्कर आने से गिर पड़ा। उसकी मृत्यु हुई। यह देखकर अर्जुन बहुत रोने लगा। सुबह-सुबह लाश विठ्ठलवाडी गाँव (तहसील- कन्नड, जिला-औरंगाबाद, महाराष्ट्र) में भेजी गई। गाँव में अंबूलस जाने के पश्चात कई लोग दौड़कर आए, उनमें नामदेव भी था। गाड़ी में करण की लाश देखकर वह बहुत रोने लगा। अर्जुन ने उन्हें सब बातें विस्तार से बताई। नामदेव कहने लगा- "मेरा बच्चा मरा नहीं, अव्यवस्था का शिकार बना। उसका सपना अधूरा रहा , मुझे दुख है। यह सिर्फ महाराष्ट्र का उदाहरण। ऐसे कई करण हिन्दुस्तान में शहीद हुए और होते रहेंगे । इसे जिम्मेदार कौन....?"
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द्वारा - श्री विवेक चतुर्वेदी
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श्री विवेक चतुर्वेदी बदायूँ, उत्तर प्रदेश से हैं।
बेसिक शिक्षा विभाग में अध्यापक हैं।
लिखने का शौख रखते हैं ।
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१. ग़ज़ल-
सुन बनारसी पान की बातें हिन्दी में
लाल होंट पर ज्ञान की बातें हिन्दी में
चौपाटी से बोल किसी भी भाषा में
पर गंगा - स्नान की बातें हिन्दी में
अपने क्षेत्र की बोली ही कुछ ऐसी है
जौ करता है धान की बातें हिन्दी में
तुमसे तो अंग्रेजी बोल भी सकता हूँ
किन्तु तुम्हारे ध्यान की बातें हिन्दी में
दीवारों से कान लगा के सुनती है
दुनिया हिन्दुस्तान की बातें हिन्दी में
***
२. ग़ज़ल
अर्जित करके ज्ञान देश में हिन्दी का
तू भी कर उत्थान देश में हिन्दी का
प्रेम जिसे होता है हिन्दी भाषा से
वो रखता है ध्यान देश में हिन्दी का
धूप देखने को हर अक्षर आतुर है
खोलो रोशनदान देश में हिन्दी का
टूटी - फूटी अंग्रेजी यदि बोलोगे
तो होगा नुक़सान देश में हिन्दी का
देश पढ़ेगा हिन्दी के अख़बारों को
भाव बता उस्मान देश में हिन्दी का
मौन उगाता है भाषा की मिट्टी से
सोने जैसा धान देश में हिन्दी का
पहले तो भाषा का परिसीमन बदलो
फिर तुम चुनो प्रधान देश में हिन्दी का
हिन्दी को ही सदा प्राथमिकता देगा
हर अच्छा विद्वान देश में हिन्दी का
देवनागरी लिपि का है अनुरोध यही
हो ऊँचा स्थान देश में हिन्दी का
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द्वारा - डॉ. मंजु रुस्तगी
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डॉ. मंजु रुस्तगी चेन्नई, तमिल नाडू से हैं। इन्होंने एम. ए.,एम. फिल., पीएच. डी.(हिंदी) और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया हुआ है। वे ‘वलियाम्मल कॉलेज फॉर वीमेन, अन्नानगर ईस्ट’, चेन्नई में हिंदी विभागाध्यक्ष से सेवानिवृत हुई हैं।
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*काँपता अक्स सूर्य का*
भीतर मेरे बसा स्मृतियों का गाँव
जो रहता हरदम हरा-भरा--
अपेक्षाओं की पहाड़ी तलहटी में
कुँवारे सपनों का कब्रिस्तान जहाँ
पगडंडियाँ बंद आँखों की
अक्सर ले जाती वहाँ....
अरमानों के धूल-धूसरित घर
टिके हैं अब भी जहाँ।
हटा देना चाहती हूँ धूल,
मकड़-जाल सभी
भित्ति पर पड़े रक्तरंजित
सपनों के दाग सभी
पर कहाँ....
निशक्त हो जाती हूँ मैं,
उसी मकड़जाल में
फिर से उलझ जाती मैं।
लेकिन हारती नहीं...
बढ़ जाती हूँ ओर आगे
भरती हूँ एक अंजुलि
उम्मीद भरे तालाब से
दिखता है जिसमें काँपता अक्स सूर्य का
पीकर दीप्त हो जाती हूँ
छूटने लगता है सब पीछे--
वो धूल से अटे मकान
वो टूटा-फूटा कब्रिस्तान।
बस दीखता है उजला सा आसमान
उड़ जाती हूँ पंख बिना असीम गगन में
मुस्कानों के पंछियों को भरकर अपने अंक में
कर्तव्य की पगडंडी से वापस लौट आती हूँ
फिर से अपेक्षाओं से भरे
नए दिन का प्रारंभ करने।
***
*औरतें अब बोलने लगी हैं *
औरतें अब बोलने लगी हैं
परंपराओं की गिरहें खोलने लगी हैं
जी हाँ, औरतें अब बोलने लगी हैं
कहती नहीं है सारा बाहर,
कुछ भीतर भी रख लेती हैं
थोड़ी ही सही, परतें खोलने लगी हैं
औरतें अब .....
आसमां की ऊंचाइयाँ नापने लगी हैं,
हौंसलों से अपने
पंखों को आजकल तोलने लगी हैं
औरतें अब......
जानती हैं बेपर्दगी से मिलेंगी गालियाँ,
न बजेंगी तालियाँ
फिर भी बेफिक्र, बेपरवाह डोलने लगी हैं
औरतें अब......
उठे कोई हाथ या पड़े कहीं लात,
गुडमुड हो बैठती नहीं,करती प्रतिघात
हाथ-पैरों का वजन तोलने लगी हैं
औरतें अब......
करती हैं सर्वस्व समर्पित,
खुद के लिए भी थोड़ा अर्पित
रंग अपनी पसंद के घोलने लगी हैं
औरतें अब......
नहीं रहना चाहती सीता,अहिल्या सी गौण,
न यशोधरा, रत्ना सी मौन,
परिवर्तन के सुरों में डोलने लगी हैं
औरतें अब.....
त्रास दोयम का अब न सहेंगी,
अश्रुधार में अब न बहेंगी
अपनी इयत्ता को टटोलने लगी हैं
औरतें अब......
आँकने लगी हैं खुद की जगह,
समाज में अपने होने की वजह
वर्जनाएँ तमाम तोड़ने लगी हैं
औरतें अब .....
रास्ता चाहे कठिन हो कितना
बढ़ते जाना नहीं है रुकना
कदम लक्ष्य की ओर मोड़ने लगी हैं
औरतें अब बोलने लगी हैं
अर्गलाएँ सभी खोलने लगी हैं
औरतें अब बोलने लगी हैं
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अपनी कहानियां
“कुलीन लोग”
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द्वारा - प्रो० अनिल कुमार
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प्रो० अनिल कुमार, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार से 2016 में प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष के रूप में अवकाश प्राप्त हैं। विज्ञान के विद्यार्थी होते हुई भी हिंदी से लगाव है और हमेशा कार्यरत हैं। ~*~*~*~*~*~*~*~
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आज बात करेंगे गैल्वेस्टन की जो पता नहीं कब और कैसे मेरा निवास-स्थल बन गया। संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सास राज्य में यह एक छोटा सा पर महत्वपूर्ण शहर है जो मेक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico) के किनारे बसा हुआ है; अमेरिका के (आबादी के दृष्टिकोण से) चौथे सबसे बड़े नगर ह्यूस्टन का यह एक उप-नगर ही होता यदि समंदर का एक पतला हिस्सा, गैल्वेस्टन की खाड़ी, इसे मुख्य भूमि से अलग न कर रहा होता। ह्यूस्टन, जो इस स्थान से सुपर-हाइवे से जुड़ा है, की तरह यह भी एक बड़ा औद्योगिक नगर है; साथ ही अपेक्षाकृत शांत समंदर के किनारे अपना दूसरा घर बनाने की इच्छा लिए धनाढ्य लोगों ने इसकी आबादी बड़ी तेजी से बढ़ा दी. मगर समंदर का क्या भरोसा, कब उसमें छुपा बड़वानल रौद्र रूप धारण कर ले कुछ ऐसा ही हुआ था वर्ष 1900 में जब 8 सितंबर को अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean) में उठा एक भयानक (दर्जा 4 वाला) चक्रवात (Hurricane) मेक्सिको की खाड़ी से होता टेक्सास आ धमका था और उसने इस शहर को उजाड़ कर रख दिया था। यहाँ के पुराने निवासी (उन्होंने अपने पूर्वजों से सुना था) कहते हैं कि इस चक्रवात में लगभग बारह हजार लोग काल के गाल में समा गए, यद्यपि सरकारी आंकड़ों में मृतकों की संख्या मात्र आठ हजार बताई गयी थी। खैर, शहर इस हादसे से धीरे-धीरे उबरा; नगर-पंचायत द्वारा मुख्य-मार्ग के समानान्तर दस किलोमीटर लंबी और पाँच मीटर ऊँची दीवार बनाई गयी जिससे भविष्य में आने वाली आपदा से नागरिकों को सुरक्षित रखा जा सके। इसी कारण 1961 में आने वाले चक्रवात और उससे उत्पन्न बाढ़ से शहर की बहुत हद तक सुरक्षा हो सकी पर प्राकृतिक आपदाओं का क्या; सितंबर 2008 में आए आईक (Ike) नामक चक्रवात ने एक बार पुनः ह्यूस्टन सहित गैल्वेस्टन में भारी तबाही मचाई, घर और व्यापार का बेहिसाब नुकसान हुआ फिर भी जिंदगी रुकती कहाँ है?
चंद शब्द और गैल्वेस्टन के बारे में; यह एक महत्वपूर्ण बन्दरगाह होने के साथ ढेर सारे व्यवसायों का केंद्र रहा है। यहाँ पोतों की मरम्मत, तेल रिफ़ाइनरी, आयात-निर्यात जैसे कार्य बड़े पैमाने पर सम्पन्न होते हैं; फिर यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है। मेरा जुड़ाव इस शहर से टेक्सास विश्वविद्यालय के मेडिकल स्कूल के माध्यम से हुआ जहाँ मैं रेडिएसन भौतिकी (radiation physics) विभाग में एक वरीय प्रोफेसर-सह-प्रधान परामर्शदाता के तौर पर कार्यरत हूँ। टेक्सास विश्वविद्यालय से भौतिकी में पी.एच.डी. और रेडिएसन भौतिकी में पोस्ट-डाक करने के पश्चात मुझे इस संस्थान में नौकरी मिली; अच्छा वेतन, समंदर किनारे एक खूबसूरत से शहर में खुद का घर, और संस्थान की बेहतरीन कार्य-संस्कृति, सबों ने कुछ ऐसा प्रभाव डाला कि मैं यहीं का हो कर रह गया। अब आपको एक स्वयं झेली हुए त्रासदी के बारे में बतलाना चाहूँगा जिसकी थोड़ी सी चर्चा मैंने ऊपर की है. 28 अगस्त 2008 को अफ्रीका के पश्चिमी तट पर एक विक्षोभ उठा जिसने अटलांटिक में प्रवेश करते एक उष्णकटिबंधीय तूफान (tropical storm) का स्वरूप धारण कर लिया। इसी के साथ विभिन्न स्थानों पर लगे मौसम रेडार सक्रिय हो गए; और प्रारम्भ हुआ इसकी प्रगति को ट्रैक करना और तदनुसार सम्पूर्ण क्षेत्र के निवासियों को चेतावनी देना। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि यह तूफान अपने भीतर तबाही बटोरे धीरे-धीरे आगे बढ़ता जा रहा था; जब यह समंदर के ऊपर होता अपेक्षाकृत गर्म पानी इसकी शक्ति बढ़ाता, भूमि पर आते तबाही मचाता पर साथ ही अपनी ताकत भी खोता। अटलांटिक में बढ़ते हुए 7 सितंबर को यह बहामाज (Bahamas) द्वीप समूह आ पहुँचा; उस समय तूफान में हवा की गति लगभग 200 किलोमीटर प्रति घंटे थी। फिर क्यूबा पार कर यह आ पहुंचा कैरिबियन सागर; अर्थात अब यह निश्चित तौर पर टेक्सास की सीमाओं पर दस्तक देने जा रहा था। हाँ, इतना अवश्य हुआ कि क्यूबा पर देर तक टिके रहने के कारण इसकी शक्ति थोड़ी कमजोर हुई, फिर भी यह श्रेणी 2 का चक्रवात बना रहा। अंत में 13 सितंबर को प्रातः 7 बजे गैल्वेस्टन के उत्तर-पूर्व किनारे से चक्रवात आईक आ टकराया; इसे तूफानों की भाषा में लैंडफॉल कहते हैं, सबसे ज्यादा तबाही उसी स्थान पर होती है। लैंडफॉल के पूर्व 12 तारीख की सुबह से ही तूफानी हवाओं का चलना प्रारम्भ हो गया, स्पष्ट दिख रहा था कि गैल्वेस्टन की सुरक्षा दीवार शहर को तबाह होने से नहीं बचा पाएगी। स्वाभाविक था, लोग अपने-अपने घरों से सपरिवार निकल भागने लगे; एक बार चक्रवात आ पहुँचा तो कोई कुछ नहीं कर पाएगा। जिनके घर द्वीप में समंदर किनारे थे या उसके काफी करीब, वे सबसे पहले पलायन करते दिखे क्योंकि तूफान से सबसे ज्यादा असुरक्षित वही थे। मेरा मकान भीतर की तरफ था, किनारे से लगभग चार सौ मीटर अंदर, अतः मेरी कतार (row) वाले थोड़े निश्चिंत थे, जो उनकी गलतफहमी ही थी। हमारे क्षेत्र के जिन निवासियों ने आगत समस्या का सही आकलन कर लिया था वे सब दोपहर को ही घर छोड़ निकल गये। नगर की गलियाँ सायरन बजाती गाड़ियों से पट चूकी थीं, सब रात होने के पहले यहाँ से दूर, बहुत दूर, चला जाना चाहते थे। पर मेरी स्थिति कुछ दूसरी थी, मेरे पास खोने को कुछ भी नहीं था, अपने एकाकी जीवन से भी मैं ऊब चूका था। यदि अपने मुल्क से इतनी दूर आकर ही मरना बदा हो तो मैं “मरनों भला विदेश में जहाँ न आपन कोय...” को चरितार्थ करना चाहता था। वैसे भी कौन बैठा है मेरे पीछे रोने वाला, अतः मैं तो लोगों का भागना देख रहा था और सच कहूँ तो उसका आनंद भी उठा रहा था; एक क्षण के लिए लगा मैं कहीं अपना मानसिक संतुलन तो नहीं खो रहा। पर नहीं, ऐसा भी नहीं कि मैं आत्महत्या के लिए उद्यत था, मैंने पहले से ही अपने फ्रीज़ को पानी, कोल्ड ड्रिंक, रेडी टू कूक जैसी चीजों से भर लिया था। मुझे यह भी पता था कि थोड़ी देर में बिजली कट जाएगी, अतः मोमबत्तियाँ, सलाइयाँ भी अच्छी संख्या में स्टोर कर लिया था, फिर मेरे पास गैस चूल्हा तो था ही। अर्थात मैं आत्महत्या पर उतारू नहीं था पर मौत का तांडव देखने के लिए पूरी तरह से तैयार था. दो दिन पहले काँच की सभी खिड़कियों पर बाहर से प्लाई बोर्ड लगाकर उन्हें भी सुरक्षित कर लिया था।
13 के प्रातः काल से ही प्रति क्षण निकट पहुँचती तूफान की आवाज़ लोगों का हिम्मत पस्त कर रही थी, लगता कोई दानव गर्जन कर रहा हो। लगभग 7 बजे डी डे आ पहुँचा; अत्यधिक कम दाब और 180 किलोमीटर की रफ्तार के साथ चक्रवात आईक ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया, हर तरफ चीख पुकार मच गयी। यह सब-कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को संभलने का मौका भी नहीं मिला, समंदर का पानी हमारी गलियों में ऐसे बहने लगा मानो हम किसी तीव्र वेग से प्रवाहित नदी के मध्य डूबते-उतराते नाव पर सवार हों। लहरें कई-कई मीटर ऊँची उठ रही थीं, जो ढीठ लोग अभी भी घरों के बाहर चहलकदमी कर रहे थे, पानी की दीवार को आता देख जान बचाने के लिए भागते दिखे, मगर समंदर उन्हें काल बना खदेड़ रहा था। जिनके सामने कुछ ऊँचे स्थान दिखे और वे उसपर चढ़ने में सफल हो सके उनकी जिंदगी तो बच गयी, शेष को पानी की दीवार ने ज़मींदोज़ कर दिया। वे बेचारे हाथ पाँव मार रहे थे पर यह तो काल का सीधा प्रहार था; सबसे खतरनाक बात यह थी कि पानी जब लौटता तो जमीन पर पड़े लोगों को अपने साथ खींचता चला जाता। चक्रवात की विभीषिका को ऐसे समझा जा सकता है कि ताण्डव करते इस तूफान के शांत होने के बाद लगभग डेढ़ सौ मृतकों से नगर की गलियाँ पट चुकी थी। मुझ जैसे कुछ अन्य नागरिक भी थे जो घर छोड़ने को तैयार नहीं थे; सब खिड़की, दरवाजे बंद कर अपने घरों में दुबके पड़े थे। बिजली, टेलीफोन सब ठप्प, एक दूसरे की खैरियत भी नहीं पूछ सकते थे। मुझे सबसे ज्यादा चिंता अपने बगलगीर प्रेमा दीदी की थी; मेरी तरह वे भी अकेली रहती थी, उनके दोनों बच्चे कैलिफोर्निया के दो शहरों में कार्यरत थे। लगभग 4 बजे संध्या का समय रहा होगा जब मैंने अपना दरवाजा पीटे जाने की आवाज़ सुनी, साथ ही एक कमजोर सी बचाओ, बचाओ की पुकार भी. दिन का समय था, अतः हिम्मत बटोर कर मैंने अपना दरवाजा खोला; देखा सामने एक 21-22 वर्ष की नवयुवती अर्द्ध-बेहोशी की स्थिति में किसी तरह दीवार के सहारे खड़ी थी। निकट से देखा तो स्पष्ट हुआ, वह भारतीय मूल की ही लड़की थी जो काल के गाल से स्वयं को किसी तरह बचाती यहाँ तक पहुँच पायी थी। मुझे देख पूरी ताकत बटोर उसने बमुश्किल बचाओ ... की गुहार लगाई और वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी। बड़ी कठिनाई से मैंने उसे उठाया– अब उतनी ताकत भी तो नहीं रह गयी थी शरीर में - और भीतर हाल में एक सोफा पर लाकर उसे किसी तरह बस लिटा पाया। उसे गौर से देखा तो लगा वह पानी में काफी वक्त गुजार चुकी थी और यदि जल्द कुछ न किया गया तो उसकी जान भी जा सकती थी; सबसे पहले तो उसके कपड़े बदलने की आवश्यकता थी। एक सयानी लड़की, मैं कैसे यह काम कर पाता; तभी दिमाग में प्रेमा दीदी का अक्स उभरा और तुरत मैं उनके घर की ओर भागा। दीदी अपनी खिड़की के सामने खड़ी थी और मुझे दौड़ कर आते देख उन्होंने तुरत दरवाजा खोला, ”क्या हुआ सुजय, क्यों बदहवास सा भागा आ रहा है तू?” 10 मीटर की दौड़ में ही मेरा दम फूलने लगा था, “जल्दी चलो दीदी, एक देशी लड़की किसी तरह अपनी जान बचा कर मेरे घर तक पहुँची है, उसे सहायता न पहुँचाई गयी तो शायद ही बचे।” बिना कुछ पूछे दीदी ने बाहरी दरवाजे को लॉक किया और लगभग दौड़ते हुए मेरे घर पहुँची। मैंने उनसे कहा, “दीदी सबसे पहले इसके कपड़े बदलने होंगे, इन कपड़ों में यदि इसे छोड़ दिया गया तो यह ठंढ से ही मर जाएगी।” उनकी मौन स्वीकृति मिलते मैंने प्रेमा दीदी की सहायता से उसे बाथरूम तक पहुंचाया, मेरे पास जो लूँगी और कुर्ता था, उसे दीदी को सौंपा और दरवाजे को बाहर से खींच दिया। थोड़ी देर बाद दीदी उसे सहारा देकर बाहर ले आई, वह कुछ होश में आ चुकी थी। उसे हमने एक शय्या पर तकियों के सहारे बैठा दिया, संयोग से यह पलंग हाल के फायर प्लेस के पास ही था। बिजली तो थी नहीं पर वहाँ रखे लकड़ियों की सहायता से मैंने फायर प्लेस में आग सुलगाई, गर्मी मिलने से थोड़ी देर में वह पूरी तरह होश में आ गयी। उसने चारों तरफ देखा, शायद यह समझने का प्रयास कर रही थी कि वह है कहाँ, फिर सामने दो हिंदुस्तानी चेहरे देखकर थोड़ा आश्वस्त लगी। इधर मैंने गैस जलाकर उसके लिए रेडीमेड सूप तैयार किया; थोड़ी सूप पीकर उसके शरीर को ताकत और गर्मी दोनों मिली; अब हम भी निश्चिंत थे कि फिलहाल खतरा टल चूका था। फिर मैंने ही बातचीत का सिलसिला शुरू किया, “तुम यहाँ की तो नहीं लगती, इस तूफानी मौसम में आई कहाँ से और ऐसे वक्त आने का प्रयोजन क्या है?”
बेहद कमजोर आवाज में उसने जवाब दिया, “मेरा नाम स्वाति है, मैं जुलाई महीने के अंत में दिल्ली से ह्यूस्टन आई, राइस विश्वविद्यालय में कम्प्यूटर साइन्स में एम० एस० करने हेतु; इस कोर्स के लिए मैं पूर्ण छात्रवृति के साथ चुनी गयी थी। आने के बाद मैं विश्वविद्यालय के ग्रैजुएट हाउस में रह रही थी, कल शाम अपने कुछ सहपाठियों के साथ गैल्वेस्टन घूमने आई और समंदर किनारे एक मित्र के बड़े से बंगले पर रात गुजारने के इरादे से हम रूक गए; इरादा चक्रवात को निकट से देखने का था।”
“कितने मूर्ख थे तुम सब, पिछले सप्ताह से ही इस चक्रवात के आने की संभावना की सूचना लगातार प्रसारित हो रही थी, फिर भी तुम सबों ने यहाँ आने का निर्णय लिया और ठहरे भी तो समंदर किनारे? तुम्हारे दूसरे मित्र कहाँ हैं?”
“मुझे कुछ नहीं पता, मैं तो बस सामुद्रिक तूफान को करीब से देखने के लोभ में बिना किसी को बताए प्रातः 6 बजे ही घर से बाहर निकल आई और इसी गली के मुहाने पर खड़ी समुद्र में उठती ऊँची लहरों को देखने लगी; मेरे लिए तो यह पहला अनुभव था। तभी एक दैत्याकार लहर भयंकर वेग से किनारे की तरफ आती दिखी और मैं अपनी जान बचाने के लिए चिल्लाती हुई इसी गली में भागी। मुश्किल से मैं पाँच कदम दौड़ी होगी कि पानी की एक दीवार मुझे रौंदती हुई अपने साथ बहा ले गयी। फिर मुझे कुछ याद नहीं, पता नहीं कब तक मैं जमीन पर पड़ी रही, जब थोड़ा होश आया तो जो घर सामने दिखा मैं उसी की ओर पूरी ताकत से दौड़ पड़ी; आगे की बात तो आप मुझ से बेहतर जानते हैं।”
“प्रेमा दीदी, यह जिस बंगले की बात कर रही है वह तो लैंडफॉल के वक्त ही पूरी तरह नष्ट हो चुका होगा, उसमें किसी के बचने की कोई संभावना भी नहीं है। लड़की, तू बड़ी भाग्यवान है जो अब तक जिंदा है, सुबह तो तू आत्महत्या करने ही निकल पड़ी थी, पर भाग्य यदि साथ हो तो जहर भी अमृत का काम कर जाता है।” अपने मित्रों के मरने की संभावना सुनकर वह रोने लगी, “क्या बाहर जाकर मैं पता कर सकती हूँ कि वे सब कैसे हैं।”
प्रेमा दीदी ने उसे डांटते हुए कहा, “चक्रवात की विभीषिका का अंदाजा है तुझे? अभी खतरा पूरी तरह से टला नहीं है, तू बस चुपचाप बैठी रह और सही समय का इंतजार कर। अगर कुछ करना ही है तो ईश्वर को धन्यवाद कर। खाएगी कुछ?”
सहमति में उसने केवल अपना सर हिलाया; मेरे मना करने के बावजूद प्रेमा दीदी ही उठी और गैस पर उसके लिए कुछ खाने का इंतजाम करने लगी। वह लड़की चारों तरफ चौकन्ना होकर देखने लगी, अचानक उसकी नजर मेरे “वर्किंग टेबुल” पर पड़ी; लगा वह सोते से जग गयी हो। वह टेबुल की तरफ तेजी से दौड़ी और वहाँ रखी सरिता की तस्वीर को अपने हाथ में उठा लिया, “यह तो मेरी ममा की तस्वीर है, देखिये मैं एकदम इसी की तरह दिखती हूँ न?”
ऐसा कहते हुए उसने सरिता के फ्रेम किए गए फोटो को अपने चेहरे के बगल में रखा। सचमुच वह उसकी प्रतिछवि लग रही थी; देर से वह मेरे सामने बैठी थी पर मेरा ध्यान तो इस तरफ गया ही नहीं था, अर्थात स्वाति सरिता की बेटी थी। इस संयोग ने मुझे जैसे ट्रांस (trance) में डाल दिया; भला हो प्रेमा दीदी का जो उसी वक्त प्लेट में रेडी टू कूक जैसी कोई चीज तैयार कर रसोई से बाहर निकली। उसी क्षण स्वाति ने भी अपना प्रश्न दुहराया,
“आपके पास मेरी ममा की तस्वीर कैसे आई; ओ माइ गॉड, आप कहीं सुजय अंकल तो नहीं?”
“हाँ, मैं सुजय हूँ, पर तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”
“सच-सच बताइएगा अंकल – आपको मेरी ममा की कसम – क्या आप मेरे पापा हो?”
“पागल हो गयी है लड़की, अपनी माँ के चरित्र पर लांछन लगाते तुझे शर्म नहीं आती? हाँ, सरिता मेरी करीबी मित्र थी, हम एक साथ पढ़े अवश्य, एक ही मुहल्ले में रहते भी थे; बस इससे ज्यादा और कुछ नहीं।”
“इससे ज्यादा कुछ नहीं? मैं जानती हूँ, आप लोग केवल मित्र नहीं थे, आप दोनों डरपोक प्रेमी-प्रेमिका थे, इतनी हिम्मत ही नहीं जुटा पाये कि मेरे हिटलर एवं तथाकथित कुलीन नाना के सामने अपनी बात रखते; और इसमें ज्यादा दोषी आप थे अंकल क्योंकि ऐसे मामले में लड़के, या अब कहूँ तो पुरुष, को ही आगे आना होता है। नाना को छोड़िए, आप तो मेरी ममा से भी अपने दिल की बात नहीं कह पाये। वह बेचारी इंतजार ही करती रही, कैसे इंसान थे आप अंकल?
इतने वर्षों बाद इस तरह सरिता मेरी जिंदगी में फिर से प्रवेश करेगी, यह तो मैंने सोचा भी नहीं था। मैं तो अपने “मूक प्यार” को पूरी तरह से भूला चुका था, पर इस चक्रवात ने उसे फिर से मेरे समक्ष ला खड़ा कर दिया। प्रेमा दीदी तो मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं पहली बार उनके सामने आया था, उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनका राखी भाई अपने दिल में इतना बड़ा राज छिपाए बैठा था। उनकी चुभती आँखों ने मुझे बोलने को मजबूर कर दिया, “हाँ यह सही है कि हम दोनों एक दूसरे के काफी करीब थे, हम एक ही समुदाय से भी आते थे, जो तुम्हारे कुलीन नाना के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी सरिता की शादी के लिए, पर हमारे बीच एक बहुत चौड़ी और गहरी खाई थी; दो परिवारों के आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में अंतर की खाई। मैं कहाँ एक सामान्य नौकरी पेशा बैंक क्लर्क का पुत्र और तुम्हारी माँ कहाँ एक मुख्य अभियंता की बेटी; ऊपर से तुम्हारे नाना के अभिजात तौर तरीके। मैं कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाया कि अपने दिल की बात सरिता से कहता, यद्यपि मुझे उसकी आँखों में अपने लिए प्यार और सम्मान स्पष्ट दिखता ..”
बीच में दीदी बोल पड़ी, “तू निरा बुद्धू ही रह गया, पहले भी था, आज भी है और कल भी रहेगा; स्वयं को दीन-हीन समझना शालीनता नहीं मूर्खता है। तू अपने जीवन का सबसे मजबूत पक्ष कैसे भूल गया; तेरी असाधारण शैक्षिक क्षमता अपने में कुलीनता और संपन्नता दोनों समेटे हुए थी, जिसे आज नहीं तो कल समाज के सामने उजागर होना ही था।”
“पर दीदी, मेरे सामने एक ऐसा इंसान खड़ा था जो श्रेष्ठता-मनोग्रन्थि (superiority complex) का शिकार था; उसे कल पर विश्वास नहीं था, उसे तो ऐसा दामाद चाहिए था जिसकी तात्कालिक हैसियत उसके स्वयं की हैसियत से ऊपर हो। फिर भी एम.एस-सी. में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के बाद जब मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय में व्याख्याता की नौकरी मिली तो मैं सरिता के पिता के पास गया उसका हाथ मांगने, पर उन्हें आई.ए.एस. से नीचे कुछ भी मंजूर नहीं था, भले सामने वाला हाई स्कूल से विश्वविद्यालयों तक की सारी परीक्षाओं में रेकॉर्ड नंबर के साथ अव्वल आया हो। बेचारी सरिता उनके पीछे सर झुकाये आँखों में आँसू लिए खड़ी रही, उसे तो बोलने की भी इजाजत नहीं थी”
मेरी बातों को सुनते पता नहीं स्वाति में कहाँ से इतनी ताकत आ गयी कि वह लगभग चिल्लाते हुए बोल पड़ी, “कमाल है अंकल, आज भी आप का मेरी ममा के प्रति प्यार वैसे ही बरकरार है, तभी तो न केवल अपनी गलती पर सफाई दे रहे हैं बल्कि मेरी माँ की गलती का भी बचाव कर रहे हैं। मुझे जब सारी बातों की जानकारी हुई तो मैंने ममा से कहा था, “तुम भी बराबर की दोषी हो, यदि तुम उनकी भावनाओं को समझती थी और उनसे इत्तफाक भी रखती थी तो तुमने पहल क्यों नहीं की, क्या ऐसा करने से तुम्हारी प्रतिष्ठा कम हो जाती।”
उसकी बातें सुनकर प्रेमा दीदी अपने को रोक नहीं पायी, “बहुत जबान चला रही है तू लड़की, मत भूल कि सुजय, तेरी ममा और मैं भी, जिस पीढ़ी से आते हैं वह तेरी पीढ़ी से बिलकुल अलग थी, तुम सबों की तरह हमारी सोच का केंद्र विंदु “स्वयं” न होकर परिवार हुआ करता था...”
“हाँ आंटी, चाहे सबों का, यहाँ तक कि आने वाली संतति का भी, भविष्य क्यों नहीं दाव पर लग जाये? आपको पता है, झूठी शान के लिए मेरे नाना ने सब कुछ जानते हुए ममा की शादी कुमार करुण से कर दी, एक ऐसा इंसान जिसमें करुणा की जगह केवल दंभ भरा था - कुलीन परिवार का होने का दंभ, बड़े ओहदे पर पहुँच जाने का दंभ; और पता नहीं क्या, क्या, बड़ी लंबी फेहरिस्त थी उसके अहंकारों की। आज अंकल और आपकी जगह यदि मेरा तथाकथित पिता यहाँ होता तो मुझ जैसी लड़की सड़क पर पड़े-पड़े दम तोड़ देती मगर वह “कुलीन” कुछ नहीं करता।”
बोलते हुए उसका चेहरा तमतमा उठा, स्पष्ट था उसके मन में पिता के प्रति काफी आक्रोश भरा था। एक तरफ तो मुझे इस बात का संतोष था कि अनजाने में ही सही मैंने सरिता की बेटी की जान बचाई थी, पर उसका आक्रोश और उसमें छुपा उसकी माँ का दर्द मुझे बेचैन कर गया। प्रेमा दीदी अभी भी मेरी तरफ एकटक देख रही थी; उनकी आँखें मुझ से जो प्रश्न पूछ रही थी मैं उसे समझ रहा था, और उन्हें पूछने का हक भी था। मेरे एकाकी जीवन में वह मेरी सबसे प्रिय मित्र थी, मेरी प्यारी “राखी बहन”। कैसे भूल सकता हूँ मैं 12 नवम्बर 1996 का वह मनहूस दिन जब “चरखी दादरी” के आसमान में हुई भीषण विमान दुर्घटना ने मेरे माता-पिता के साथ मेरी छोटी बहन को भी मुझ से सदा के लिए छीन लिया। तब प्रेमा दीदी ने ही मुझे सहारा दिया था और कहा था, “तू कभी स्वयं को अकेला मत समझना, आज से मैं तेरी ‘राखी बहन’ हो गयी; मैं तेरी छोटी बहन की क्षतिपूर्ति तो नहीं कर सकती पर तेरी यह दीदी सदा तेरा ख्याल रखेगी।”
आज मेरी जिंदगी के वे पन्ने जिन पर धूल जम चूके थे, यूं अचानक दीदी के सामने खुल जाएंगे मैंने कभी सोचा नहीं था। इसी के साथ याद आ गया “चरखी दादरी” का दुखद प्रकरण। गैल्वेस्टन में नौकरी मिलने से ठीक पूर्व मैं अपने बचाए पैसे लेकर हिंदुस्तान गया और एक सज्जन परिवार के उदीयमान इंजीनियर से अपनी छोटी बहन की शादी सम्पन्न कराई। उस वक्त सरिता के बारे में मेरी बहन ने इतना ही बताया था कि “सरिता दीदी का पति उसके साथ सही व्यवहार नहीं करता, एक बच्ची भी हुई उन्हें पर वह दाम्पत्य-बंधन में बंध कर रहने में विश्वास नहीं रखता था। सरिता के पिता भी अवकाश प्राप्त कर चुके थे और अपनी एकमात्र पुत्री के दुख से बेहद दुखी थे; अक्सर अपनी गलतियों की चर्चा करते हुए रो पड़ते थे, मगर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया ...।” बहन की शादी सम्पन्न होने के तुरत बाद मैं वापस लौट आया क्योंकि मुझे गैल्वेस्टन के मेडिकल स्कूल से नौकरी का प्रस्ताव मिल चूका था; सब कुछ उम्मीद से बेहतर चल रहा था। दिल्ली से सटे नोएडा में मैंने एक अपार्टमेंट भी ले लिया था जहाँ मेरे माता-पिता रह रहे थे, बहन शादी के कुछ ही समय पश्चात अपने पति के पास कजाकिस्तान चली गयी; मेरे बहनोई वहाँ एक तेल अन्वेषन (oil exploration) के अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में अच्छे ओहदे पर कार्यरत थे। उस दिन मेरी बहन माँ-बाबू जी को लेकर अपने पति के पास जा रही थी, तत्पश्चात उन्हें अमेरिका आना था, पर प्रकृति को शायद हमारी खुशी मंजूर नहीं थी। हरियाणा के आकाश में हुए उस भयानक दुर्घटना ने सब कुछ नष्ट कर दिया और मैं पूरी तरह अकेला हो गया; पहले तो सोचता था कुछ दिनों की नौकरी के बाद वापस हिंदुस्तान लौट जाऊँगा। पर उस दुर्घटना के बाद लौटने का इरादा त्याग मैं यहीं का होकर रह गया। उसका असर यह भी हुआ कि रेडिएसन लैब में काम करने के बावजूद मैंने न कभी आवश्यक सावधानियाँ बरती, न हिदायतों का ख्याल रखा; लगता अब किसके लिए जीना। विभाग में मेरे काम करने की कोई समय-सीमा नहीं थी, अक्सर पूरी रात मैं लैब में ही बिताता; इन सारी बातों का असर तो होना ही था। समय के साथ मेरा स्वास्थ्य गिरता गया और अंत में पता चला कि मैं ‘कैंसर का उपचार खोजते-खोजते स्वयं उस बीमारी का मरीज बन चुका हूँ।’ सरिता न मिली तो शादी के बारे में सोचने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई, बस मैं और मेरा काम – यही मेरी जिंदगी बन गयी। मगर आज की प्राकृतिक आपदा ने तो जैसे सब कुछ बदल दिया, मैं किंकर्तव्यविमूढ़ अपनी कुर्सी से चिपका सोचता रहा – क्या मेरी परेशानियों का कभी कोई अंत भी है? थोड़ी देर की चुप्पी के बाद दीदी ने ही पूछा, “अच्छा यह बता लड़की, तू ने सुजय से पितृत्व से जुड़ा प्रश्न क्यों किया? जब तू अपनी ममा से इतनी खुली है तो यह माना जा ही सकता है कि तेरी ममा ने तुझे सारी जानकारियाँ दी होगी, फिर इस प्रश्न का औचित्य?”
“सुजय अंकल तो अमेरिका चले आए अपनी जिम्मेदारियों को अनदेखा कर, मगर मेरी ममा को तो सबों की गलतियों का परिणाम झेलना पड़ा। चलो, उसे अपना प्रेम नहीं मिल सका, पति का प्यार ही मिल जाता तो उसका दर्द कुछ कम हो जाता। मगर वह बेचारी उससे भी वंचित रही; पति के दुर्व्यवहार और उपेक्षा ने उसे ऐसा मजबूर किया कि अपना ज़्यादातर समय अपने पिता के घर ही गुजारती, उनकी देखभाल तो एक बहाना भर था। वहाँ भी मेरा पिता जब मर्जी होती पहुँच जाता और माँ को नाना के समक्ष ही भला बुरा कहता। एक दिन मेरा धैर्य जवाब दे गया और मैंने लगभग चीखते हुए कहा, “पापा, आप माँ के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, आप में थोड़ी सी भी मानवता बची है या नहीं?” इतना सुनते उसने अपना आपा खो दिया, “तू मुझे पापा मत बोल, मैं तेरा पापा नहीं हूँ; जा अपनी माँ के पूर्व प्रेमी सुजय के पास, वही तेरा असली बाप है।” सोचिए आंटी, एक सयानी होती बेटी के सामने क्या कोई इंसान ऐसी बातें कर सकता है, मगर वह इंसान था ही कहाँ। माँ और नाना तो चुप रहे, मगर मेरे अंदर की चंडी बाहर आ गयी; सामने पड़े एक डंडे को हाथ में ले मैंने उसपर आक्रमण कर दिया और उस बुजदिल ने वहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी। दूसरे दिन उसने माँ के पास तलाक का कागज भेजवा दिया जिसपर ममा ने बिना विलंब हस्ताक्षर किए और पत्रवाहक के हाथों ही वापस कर दिया। आज जब मैंने अपनी ममा की तस्वीर टेबुल पर देखी तो सुजय अंकल को ममा की सारी तकलीफ़ों का जिम्मेदार मानते हुए मैंने वह सब कुछ कह दिया जो मुझे नहीं कहना चाहिए था – मुझे खेद है, कृपया आप दोनों मुझे क्षमा कर दें।”
मैंने सर पर हाथ फेर कर उसे आश्वस्त किया कि मुझे कोई शिकायत नहीं है; प्रेमा दीदी को थोड़ा वक्त लगा सामान्य होने में। अंधेरा घिरने लगा था और उसी के साथ चक्रवात का शोर भी घटने लगा था, फिर भी बाहर निकलना अभी सुरक्षित नहीं था। रात के खाने की कुछ व्यवस्था तो करनी ही थी; प्रेमा दीदी के मना करने के बावजूद मैं इस इंतजाम में लग गया और वे व्यस्त हो गईं स्वाति से बातचीत करने में; आखिर अपने राखी भाई की हरकतों का बचाव भी तो करना था उन्हें। मैंने जल्दी में गैस ग्रील पर पिज्जा बनाया, यह सबसे आसान और सुविधाजनक कार्य था; फिर हम तीनों खाने के टेबुल पर कागज के प्लेट, पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक के साथ बैठ गए। खाने के साथ हम गप्पें भी लड़ा रहे थे, स्वाति अपनी गलती के लिए खेद व्यक्त कर रही थी; इस बीच दीदी उसे मेरी पूरी रामकहानी सुना चुकी थी। अचानक स्वाति ने प्रेमा दीदी को लक्ष्य कर कुछ ऐसा कहा कि हम सभी चौंक गए, “आंटी, आज से लगभग 22 वर्ष पूर्व जो कार्य मुकम्मल न हो सका उसे पूरा करने का समय अब आ चूका है; माँ-बाप तो अपनी बेटी की शादी करते ही हैं, इस बार उल्टी गंगा बहेगी और एक बेटी अपनी माँ की शादी उस इंसान से कराएगी जिससे होना चाहिए था।”
मैंने लगभग चीखते हुए कहा, “पागल हो गयी है क्या, तू अब कोई टीनएजर नहीं रह गयी है जो हमारी जिंदगी को एक फिल्मी पटकथा में बदलने की सोच बैठी; ऐसी बातें बॉलीवुड-सिनेमा में होती है वास्तविक जीवन में नहीं।”
मेरी बातों को अनसुना करते हुए दीदी बोल पड़ी, “क्या गलत है सुजय; कितनी सही बात कही है स्वाति ने। मुझे तो लगता है नियति को भी यही मंजूर है अन्यथा इतने संयोग नहीं बनते कि सरिता की बेटी इस प्राकृतिक आपदा में तेरे ही घर पहुँच जाती। मैं पूरी तरह से इसका समर्थन करती हूँ और यह मत भूल कि पूरी दुनिया में एक मैं ही तेरी सगी बची हूँ जिसे इस मामले में अंतिम फैसला लेने का अधिकार है, या तेरे लिए मैं मात्र राखी बहन बन कर रह जाऊँगी?”
“ऐसा मत कहो दीदी, तुम्हारे सिवा मेरा है ही कौन, मगर सोचो मैं और सरिता दोनों 50 के ऊपर जा चुके हैं; फिर यह लड़की भले न जानती हो पर तुम तो मेरे स्वास्थ्य के बारे में सब कुछ जानती हो, मेरे भीतर कैंसर तीसरी अवस्था में पहुँच चुका है, शायद मेटास्टेसिस भी दूर नहीं जब यह शरीर के अन्य अंगों तक फैलने लगे; मेरे जीने के दिन उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। दीदी, शायद ईश्वर ने हमें एक दूजे के लिए बनाया ही नहीं, फिर तुम सबों का यह प्रयास एक अनधिकार चेष्टा ही बनकर रह जाएगा। अब तो बेचारी के सुख के दिन आने वाले हैं, स्वाति की पढ़ाई पूरी होते उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी और अपनी माँ को वह सब कुछ दे पाएगी जिससे वह अब तक वंचित रही। मुझ संग अब बंध कर उसे वैधव्य के अभिशाप के अतिरिक्त और क्या मिलेगा?”
“हैलो अंकल, जब आप रात्रि भोज की व्यवस्था में मशगूल थे तभी प्रेमा आंटी ने मुझे सारी बातें बता दी थी। आप लोगों के समय की ही एक फिल्म थी आनंद, उसका एक संवाद भूल गए आप... जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए ... और फिर जानता कौन है कल क्या होगा। मेरे अमेरिका आने के पहले जब ममा ने अपने यातना भरे दांपत्य से रिश्ता तोड़ लिया तो हम आपकी ढेर सारी बातें करते; हम दोस्त जो बन चूके थे। आप ने बचपन से ही जो संघर्ष किया, सारी बाधाओं को पार करते हुए जितनी शैक्षिक उपलब्धियाँ हासिल की सब माँ सुनाती और यही कहती “...सुजय तय कर ले तो उसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं है, ऐसी है उसकी इच्छा शक्ति...” और यह संबंध ममा-पापा - सॉरी, अभी अंकल ही कहती हूँ – एक बार फिर से दोनों में जीने की लालसा पैदा कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं। फिर क्या कर लेगा कैंसर, है न आंटी जी?”
“बिलकुल सही कहा तू ने; कहाँ थी इतने दिनों तक, तुझे तो पहले आना चाहिए था।”
मेरी बातों के साथ मेरी उपस्थिति को भी पूरी तरह से नजरंदाज करते हुए ‘आंटी और स्वाति’ ऐसे बातें कर रहे थे जैसे दो अभिभावक अपने बच्चे का भविष्य तय कर रहे हों, और मैं वहाँ होते हुए भी उनकी बातें सुन नहीं पा रहा था क्योंकि मैं अपने कॉलेज के दिनों की यादों में खो गया था। अंत में दीदी ने अपना आखिरी फैसला सुनाया, “कल या परसों, जैसे मौसम सामान्य होता है तू ह्यूस्टन लौटेगी, अपनी ममा से बात करेगी, उसके लिए वीसा और हवाई यात्रा के टिकट का इंतजाम करेगी; इसमें कोई परेशानी महसूस हो तो मुझे बताएगी, बस काम तमाम।”
मैं कुछ बोलने को उद्यत हुआ तो प्रेमा दीदी ने डांटते हुए कहा, “चुप, इतना भी नहीं जानता कि जिनकी शादी की बात हो रही हो उन्हें कुछ बोलने की इजाजत नहीं होती, यह काम अभिभावकों का है और वह हम कर रहे हैं और आगे भी करेंगे। अब आगे कोई बात नहीं, तू बेटी और बाप, सॉरी अभी के लिए मेरा मतलब है बेटी और अंकल, यहाँ अपने-अपने बिछावन पर सो जाओ और मैं चली अपने घर; शुभ रात्रि।”
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“बाल खंड (किड्स कार्नर )”
२. कवितायेँ
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द्वारा - श्री अनुराग गुप्ता
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श्री अनुराग गुप्ता भरतपुर, राजस्थान से हैं। इन्होने जयपुर से इंजीनियरिंग की पढाई की। २०१६ में कैलिफ़ोर्निया, अमेरिका आये। अभी क्लीवलैंड, ओहायो में कार्यरत हैं। कविता लिखना इन्हें प्रिय है, नृत्य का भी शौख रखते हैं। ~*~*~*~*~*~*~*~
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१.हिंद से मैं और हिंदी से हिंदुस्तान!!
चल लिख दूँ तुझे अनुरागी स्याही से,
हिंद से मैं और हिंदी से हिंदुस्तान !!
सारी भाषाओं का एक ही प्रयाग,
और अनुराग भरा उन्मादी राग,
जैसे फूलों और भँवरों से लिपटा पराग,
सूरज की रोशनी सा बहता ये चराग,
अंधकार को चीरके आसमाँ में करता सुराग!
लेकिन मुझे नहीं किसी से भी विराग!
चल लिख दूँ तुझे अनुरागी स्याही से,
हिंद से मैं और हिंदी से हिंदुस्तान!!
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२. जबसे मेरे रूपये की सेटिंग, डॉलर से हो गई!
वो कचौरी और जलेबी वाली लाइफ डोनट सी हो गई,
जबसे मेरे रूपये की सेटिंग, डॉलर से हो गई!
वो अदरक वाली चाय की चुस्की, और बगल वाली गली की दुकान,
स्टारबक्स और वॉलमार्ट हो गई,
जबसे मेरे आलू पराठे की सेटिंग, मैक्सिकन बरिटो से हो गई!
वो दिन भर बाइक, बेफिक्री का दौर, और लोकल सिटी वाली शॉपिंग,
लॉन्ग ड्राइव और मॉल हो गई,
जबसे मेरी फ्रीडम वाली लाइफ, वर्क फ्रॉम होम और स्टार्टअप हो गई!
वो छत पे शाम, पतंग की डोर, और गली क्रिकेट सा शोर,
नेटफ्लिक्स और एक्सबॉक्स हो गई,
जबसे मेरे दाल बाटी की सेटिंग, सबवे और टैको से हो गईं!
वो चाट के ठेले, बर्फ के गोले, मेरे शहर के नज़ारे और झूले,
डाउनटाउन पब्स और डिज्नी लैंड हो गईं,
जबसे मेरे राजमा चावल की सेटिंग चिपोटले से हो गईं!
अनुराग है मुझे, भुलाना मत मुझे,
मेरे घर का पता वही पुराना होगा,
अनुराग है मुझे, भरोसा है मुझे,
जब मेरा भारत डिजिटल होगा,
अनुराग है मुझे, उम्मीद है मुझे,
जब तक्षशिला, नालंदा भी वहीं होगा,
अनुराग है मुझे, अभिमान है मुझे
जब मेरा भारत, विश्व गुरु होगा,
वो कचौरी और जलेबी वाली लाइफ डोनट सी हो गई,
जबसे मेरे रूपये की सेटिंग डॉलर से हो गई!!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - आजीवन सदस्य डॉ. विद्या चौधरी को हार्दिक बधाई
महामहिम उप राष्ट्रपति सम्माननीय नन्दबहादुर, नेपाल के द्वारा सम्मानित
“मधानी महोत्सव-मधेश प्रदेश, नेपाल के पतौरा गाँव में”
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पटना, बिहार की डॉ. विद्या चौधरी, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्या, को बज्जिका भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए सम्मानित किया गया,
फ़रवरी २०२३
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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सुशीला मोहनका
(प्रबंध सम्पादक)
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गुरु रविदास जयंती एवं महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवायें एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी।‘जागृति’ की तेरहवीं कड़ी शनिवार, ११ मार्च २०२३ को दिन में १०:०० बजे (EST) से अमेरिका में और ११ मार्च २०२३ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी ‘जागृति’ में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
जनवरी, २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २१वाँ द्विवार्षिक अधिवेशन: इस बार इंडिआना, अमेरिका में २८ से ३० जुलाई २०२३ तक होने जा रहा है, इस अधिवेशन का मूल विषय: ‘Hindi Education for the Next Generation’ है। इस अवसर पर एक सुन्दर स्मारिका भी प्रकाशित होने जा रही है। शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं से विशेष अनुरोध है कि अपनी-अपनी शाखा की संक्षिप्त रिपोर्ट स्मारिका के लिए तैयार करने का कष्ट करें। सभी आजीवन सदस्यों से विशेष आग्रह है कि अधिवेशन के विषय के अनुरूप आप अपना लेख तैयार कर के एक माह के अन्दर (upto 31st Mar. 2023) भेजने का कष्ट करें। इस अवसर पर पुस्तकों का विमोचन भी किया जाएगा। जो भी पुस्तकों के लेखक है उनसे विशेष अनुरोध है कि इस सुविधा का लाभ उठायें।
शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं: १० जनवरी, २०२३ को सारे विश्व में ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाया गया है, आशा करती हूँ की अ.हि.स. की कई स्थानीय समितियों ने ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाया होगा। अगर आपकी समिति ने कार्यक्रम किया है और उसकी रिपोर्ट भेज दी है तो बधाई और भेज रहे हैं तो मेरी अग्रिम बधाई स्वीकार करें। किसी विशेष कारणवश नही भेज पाए है तो जल्दी से जल्दी भेजने का कष्ट करें।
आपसे एक विशेष निवेदन है कि आप अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें समय से प्रकाशित किया जा सके। जिन स्थानीय समितियों ने अग्रिम सूचना भेजी है उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें तथा कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
‘संवाद’ जनवरी २०२३ का अंक पढ़कर जिन्होंने प्रतिक्रया भेजी हैं उनको धन्यवाद। आप सभी से विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का फ़रवरी २०२३ का अंक भी अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने से सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
सुशीला मोहनका
sushilam33@hotmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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