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INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
फरवरी 2022, अंक ९ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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| अध्यक्षीय संदेश |
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प्रिय मित्रों,
अंतर्रष्ट्रिय हिंदी समिति की ओर से हम आप सभी के परिवार के लिये कल्याण की कामना करते हैं । धीरे-धीरे कोरोना महामारी की गति धीमी लग रही है । मैं विश्व कल्याण की कामना करती हूँ।
२०२२-२०२३ की नई न्यासी समिति ,कार्य-समिति, निर्देशक मण्डल के अन्य सदस्य एवं शाखा संयोजक सभी कार्य-भार सम्भालने के लिए उत्सुक हैं। मैं उनका सहृदय स्वागत करती हूँ और उनसे पूर्ण सहयोग की अपेक्षा रखती हूँ।
मैं अनिता सिंघल समिति की अध्यक्षा, आप सभी पाठकों से नम्र निवेदन करती हूँ कि जो भी स्वयं-सेवक या संघ अपना समय दे सकते है, कृपया मेरे ई-मेल में भेज दें या मेरे फ़ोन नम्बर पर मुझसे सम्पर्क करें ।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर-राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
(anitasinghal@gmail.com)
(817-319-2678)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति ---- उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा मार्च ५ , शनिवार शाम ८.०० से ९ :०० ( EST)
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सम्मिलित होने के लिए you tube लिंक -
दिन एवं तारीख -- मार्च ५ , शनिवार शाम ८.०० से ९ :०० ( EST)
मार्च ६ , २०२२, ६ :३० - ७;:३० बजे सुबह भारत ( IST)
प्रोग्राम --- वर्चुअल (virtual), निशुल्
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| अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- "जागृति " मंच, द्वितीय चर्चा मार्च १२, २०२२ |
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जागृति वेबिनार निमंत्रण
अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है |पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका " विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं |
स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है |"जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना | इसके लिए समिति ने विद्वानों के वक्तव्यों और चर्चाओं की एक माहवारी वेबिनार शृंखला शुरू की है, जिसकी दूसरी कड़ी, 12 मार्च 2022, शनिवार को भारतीय समय से 9:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है| इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।
दूसरी कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान; डा: कैलाश नारायण तिवारी, सेवा निवृत प्रोफेसर; दिल्ली विश्वविद्यालय| आइये उनसे "आदिकाल का साहित्य: इतिहास के पन्नों से" विषय पर वक्तव्य सुनें और चर्चा करें उस समय के हिंदी साहित्य के बारे में, उस काल को आदिकाल क्यों कहते हैं; उसके विषय में कई विवाद हैं, क्या और क्यों कौन थे, उस समय के साहित्यिक और क्या था उनका साहित्य? क्या थी उस काल के साहित्य की मूल प्रेरणाएं और अवधारणाएं? आदि !
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति 12 मार्च 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
Please mark your calendar for an upcoming live and interactive webinar on
"Adikal Literature- From the Pages of History" on March 12, 2022,
Saturday at 11:00 AM EST and 9:30 PM India time.
विषय : "आदिकाल का साहित्य: इतिहास के पन्नो से".
तिथि और समय : 1 2 मार्च 2 0 2 2 , शनिवार, ११:०० बजे सुबह (EST )
१२ मार्च 2022, शनिवार, ९ : ३० बजे शाम (भारत समय)
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यदि आप हमारे पहले वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
जागृति श्रृंखला का पहला वेबिनार : अपनी हिंदी की पहचान, फरवरी 5, 2022
https://www.hindi.org/Jagriti.html
आशा है कि आप 12 मार्च के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
धन्यवाद,
डॉ राकेश कुमार
प्रमुख - जागृति:हिन्दी साहित्य की दशा एवं दिशा पर चर्चाओं की एक रोचक शृंखला
अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -इंडियाना शाखा, यूएसए
ईमेल:ihaindiana@gmail.com
Phone/व्हाट्सएप: +317-249-0419
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| डॉ. अशोक लव |
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डॉ. अशोक लव नें दिल्ली विश्वविद्यालय और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की है। उन्होंने नेशनल म्यूजियम, नयी दिल्ली से ‘आर्ट एप्रीसियेशन’ कोर्स भी किया है। उनकी प्रथम रचना १९६३ में प्रकाशित हुई थी, उस समय वे स्कूल में पढ़ते थे। उन्होंने ३० वर्ष आध्यापन किया है। वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में कार्य करते है। उनकी साहित्यिक और शैक्षिक लगभग १५० पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। अभी ये अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की भारत शाखा के दिल्ली अन.सी.आर. शाखा के अध्यक्ष है।
उनकी दो लघुकथाएँ छोटे बच्चों के लिए नीचे दी जा रही है|
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दो लघुकथाएँ
१) लघुकथा- पापा तो पापा होते हैं
मानवी दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। लॉकडाउन के पैंतीसवें दिन उसका धैर्य बिखरने-बिखरने को हो गया था। वह सारी स्थिति समझ रही थी। उसने हठ करना छोड़ दिया था अन्यथा प्रत्येक शनिवार वह हठ करके मम्मी-पापा को डिनर के लिए बाहर ले जाने पर विवश कर देती थी।
उसने भाँति-भाँति की फ़रमाइशें बंद कर दी थीं। वह जानती थी मॉल बंद थे, बाज़ार बंद थे। अब मित्रों के साथ वीडियो-चैटिंग कर लेती थी। उसकी कक्षाएँ ऑनलाइन होती थीं। वह अपने गानों की वीडियो बनाती थी। पेंटिंग करती थी। वह लॉकडाउन का समय व्यतीत करना सीख गई थी।
छह वर्ष की मानवी और कितना धैर्य रखती ! उसने पापा को कहा-"पापा, आज मैं आपके साथ दूध लेने जाऊँगी। मैं मास्क लगा लूँगी।" वह इसके आगे कुछ कहती परंतु उसका गला रुँध गया था। उसकी आँखों में आँसू तैरने लगे थे।
"अरे, हमारी मानवी तो बहादुर बच्ची है। हम अभी एकसाथ दूध लेने चलेंगे। मदर डेयरी से चॉकलेट और आइसक्रीम भी लेंगे।"पापा ने उसे गले लगाते हुए कहा।
पापा ने अपने आँसू रोक रखे थे क्योंकि वे पापा जो थे।
२) लघुकथा - बेचारा जगदीश
वृद्धा पत्नी पति को धमकाते हुए कह रही थी-" शुभम दूध लाने नहीं जाएगा।"
वृद्ध जगदीश समझा रहा था-" टीवी पर बार-बार चेतावनी दी जा रही है, बार-बार समझाया जा रहा है, साठ वर्ष से अधिक के वरिष्ठ नागरिक घर से बाहर न निकलें। मैं तो सत्तर के हो गया हूँ।"
नारायणी कहने लगी-" आपको कोरोना ने संक्रमित कर दिया तो क्या अंतर पड़ेगा ? अब और जीकर कौन से काम करने हैं? शुभम का तो पूरा जीवन पड़ा है। छोटे-छोटे बच्चे हैं। यह सामान की लिस्ट पड़ी है। उधर थैले पड़े हैं। अलमारी में रुपए रखे हैं।"
जगदीश ने मास्क लगाया और थैले उठाकर सामान लाने चल पड़ा।
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जागृति रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- फरवरी २०२२ "हिंदी आज की संस्कृत है |"
समिति के हिंदी-साहित्य-केंद्रित- "जागृति" - प्रयास का शुभारम्भ |
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स्वतंत्रता के इस अमृत-महोत्सव वर्ष में समिति के हिंदी-साहित्य-केंद्रित प्रयास "जाग़ृति " का शुभारम्भ वसंत -पंचमी के शुभ अवसर पर ५ फरवरी २०२२ को ज़ूम पर हुआ | कार्यक्रम का संचालन समिति की इंडिआना शाखा के अध्यक्ष और इस प्रयास के प्रमुख डा: राकेश कुमार ने किया | कार्यक्रम के आरम्भ में समिति के न्यासी-मण्डल के सदस्य सुरेंद्र नाथ तिवारी ने "जागृति" के उद्देश्यों पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए बताया कि "जागृति" हिंदी साहित्य के सृजन और संबर्द्धन का प्रयास है; यह विद्वानों के वक्तव्यों और चर्चाओं की एक माहवारी श्रृंखला है जिसका उद्देश्य हिंदी साहित्य के प्रति रूचि पैदा करना और साहित्य सृजन के लिए नए रचनाकारों को अनुप्रेरित करना है | उन्होंने श्रृंखला की इस प्रारम्भिक कड़ी के विद्वान वक्ता ,अंतरराष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय, बर्धा, भारत के प्रति-कुलपति प्रोफ़ेसर हनुमानप्रसाद शुक्ल, का स्वागत करते हुए बताया कि प्रोफ़ेसर शुक्ल हिंदी के शैक्षणिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक सरोकारों के अन्यतम अध्येता हैं, आचार्य हैं | कार्यक्रम की शुरुआत, इंडिआना शाखा की छात्रा आन्या श्रीवास्तव के "वीणा-वादिनी वर दे " के सुमधुर गायन से हुई |
श्रृंखला की इस पहली कड़ी "अपनी हिंदी की पहचान", विषय पर बोलते हुए , प्रो: शुक्ल ने बताया कि कई हजार वर्षों की विरासत और परम्परा अपने में समेटे हिंदी एक सशक्त भाषा है | वह हमारी आजादी की भाषा है, लोक-अनुभव और हमारी समग्रता की चेतना से वेष्टित वह भारत की दृढ़ सांस्कृतिक भूमि पर अवस्थित है | हमारा समाज कई पूर्वाग्रहों के कारण अपनी भाषा की इस अहमियत को नकारता रहा है | हमें इन पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना कहिहए, हमें हिंदी पर गर्व होना चाहिए |
भाषा की संरचना पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भाषा माँ होती है ; उसमे एक ममत्व होता है, उससे एक भौतिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक जुड़ाव होता है | भाषा चाहे संस्कृत हो , हिंदी हो या अन्य कोई भी, उसे कोई बनाता नहीं वह स्वत:-स्फूर्त होती है - वह बनती है अपनी संतानों के पुरुषार्थ से | लम्बे समय तक जो लोक अनुभव और लोक-संस्कृति उसमे पकती है, उससे वह परिमार्जित होती है और सतत उपयोगी होती जाती है | भाषा का प्रचार प्रसार इस बात से होता है कि उसके बोलने वाले अपने जीवन-व्यापर में उसका कितना उपयोग करते हैं | इस प्रचार-प्रसार में दायित्व केवल भाषा का नहीं अपितु उसकी संतानों का भी है |
हिंदी की पहचान को रेखांकित करते हुए उन्होंने भारत की भाषाई एकता पर जोर दिया | अन्य भाषाओँ और हिंदी के सरोकार की बात करते हुए उन्होंने पीपल के पत्ते के रूपक के माध्यम से बताया कि जैसे पीपल के पत्ते की मुख्य नाड़ी, अपनी सहकारी छोटी छोटी धमनियों से पोषण पाती है और उन्हें पोषण देती है , उसी प्रकार हिंदी भी अन्य भाषाओँ से सहकार पाकर, उनके सांस्कृतिक और लोक-जीवन से पोषण पाती है और बदले में उन्हें पोषित करती है, और इस तरह हमारा भारत-रूपक यह पीपल का पत्ता अपनी समग्रता में पुष्ट होता रहता है | मधुमक्खी के छत्ते के एक अन्य रूपक के माध्यम से प्रोफेसर शुक्ल ने बताया कि जैसे मधुमक्खियां भांति- भांति के अनगिनत फूलों से रस लेकर मधु के छत्ते में आती हैं, और उन रसों के परिमार्जन से एक अमृत-तत्व, मधु, की सृष्टि होती है, उसी तरह भारत की नाना भाषाओँ और बोलियों का सांस्कृतिक रस लिए हिंदी वह अमृत-तत्व है | उसमें उन सहकारी फूलों के रसों से अलगाव नहीं अपितु एक समरसता है; एक दृढ सांस्कृतिक जुड़ाव है|
प्रोफ़ेसर शुक्ल ने बंगाल के केशवचन्द्र सेन, अवध के जायसी और तुलसीदास, मिथिला के विद्यापति, गुरुनानक देव, राजस्थान की मीरा बाई, और दक्षिण भारत के रचनाकारों के कोई हजार वर्षों के साहित्य के हवाले से बताया की अगर गौर से देखा जाय तो भाषाई विविधता के बावजूद इन सबके साहित्य में एक सांस्कृतिक अंतर्धारा है; जिससे हिंदी पुष्पित-पल्ल्वित होती रही है | भारत की आत्मा हिंदी में बोलती है; उसका प्राण-तत्व समग्र भारत से आता है | उनका कहना था कि जैसे पुरातन काल में भारतीय की सामूहिक संस्कृति की वाहिका संस्कृत थी; उसी तरह आज उस समग्रता की वाहिका हिंदी है | हिंदी आज की संस्कृत है |
वक्तवय के समापन पर हुई चर्चाओं में कई प्रश्न पूछे गए, जिसे 'जागृति' टीम की सदस्या सुश्री गौरी वर्मा जी ने पटल पर रखा | एक प्रश्न के उत्तर में प्रोफ़ेसर शुक्ल ने इस बात पर जोर दिया कि उत्तर भारत में दक्क्षिण की भाषाओँ की शिक्षा अवश्य होनी चाहिए; यह हमारा सामान्य कर्तव्य नहीं अपितु राष्ट्रीय कर्तव्य है | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि हिंदी के संवर्द्धन और पुष्टि के लिए संस्कृत और अन्य भाषाओँ ली शब्दावलियों के उपयोग का प्रावधान है | इसके लिए यह आवश्यक है कि हिंदी वालों को अन्य भाषाओँ का ज्ञान हो |
कार्यक्रम के अंत में "जागृति" के प्रमुख डा; राकेश कुमार ने प्रोफ़ेसर शुक्ल को इस आरम्भिक विद्वत्तापूर्ण उद्बोधन के लिए धन्यवाद दिया | साथ ही विश्व के कई कोनों में फैले दर्शकों और श्रोताओं को भी धन्यवाद ज्ञापित किया | यह कार्यक्रम, विश्व में फैले दर्शकों के अलावा, अंतरराष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के सभी परिसरों में भी प्रसारित होता रहा था | अनुमानत: एक हजार से अधिक दर्शकों-श्रोताओं ने इस कार्यक्रम को देखा, सुना | डा: राकेश कुमार ने बताया कि श्रृंखला की आगामी कड़ी का विषय है " हिंदी-साहित्य का आदिकाल- इतिहास के पन्नों से " जो १२ मार्च २०२२ को प्रायोजित है |
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शाखाओं के कार्यक्रम के रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा
साहित्यिक संध्या, विश्व-हिंदी दिवस, जनवरी २०२२ |
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डॉ. तस्नीम लोखंडवाला
लेखन और प्रस्तुति
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डॉ. सुनीता द्विवेदी
अनुवाद
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‘अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा ने ‘विश्व हिंदी दिवस’ के उपलक्ष्य में रविवार, २३ जनवरी २०२२ को ज़ूम के माध्यम से आभासी ‘साहित्यिक-संध्या’ का आयोजन किया था। इस साहित्यिक संध्या का कुशल सञ्चालन श्रीमती रश्मि चोपड़ा और डॉ. सुनीता द्विवेदी ने किया था। इस कार्यक्रम में स्थानीय कवियों के आलावा भारत के तीन सुप्रसिद्ध साहित्यकारों और कवियों ने भी अपनी मौलिक रचनाओं का वाचन कर कार्यक्रम को रोचक और सफल बनाया।
शाखा-प्रमुख डॉ. शोभा खंडेलवाल जी ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। तत्पश्चात, शाखा की मातामही आदरणीय श्रीमती सुशीला मोहनका जी के आशीर्वचनों से साहित्यिक संध्या प्रारम्भ हुई। इस कार्यक्रम में प्रस्तुतियों की सुंदर शुरुआत भारत से आये प्रतिष्ठित कहानीकार माननीय डॉ. श्री अशोक लव जी की बहुत ही मार्मिक लघु-कथा - “भगवान सुनते हैं”, से हुई। इस कहानी में उन्होंने कोविड की महामारी के चलते श्रमिक-पलायन और अनजान लोगों की दया और उदारता का बहुत ही सजीव और मार्मिक चित्रण कर सभी सुनने वालों को भावुक कर दिया। भारत से आये सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, व्यंग्यकार और पत्रकार माननीय डॉ. श्री हरीश नवल जी ने अपने अद्भुत काव्य से श्री कृष्ण और कर्ण (स्वयं) के बीच के अंतर्द्वंद को बहुत ही सुंदर और तर्कनीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। ऎसे जटिल विषय पर इतने सुंदर काव्य की रचना डॉ. नवल जी और उनके समरूप साहित्यकारों को ही सुलभ है। उनकी दूसरी काव्य रचना - “अग्नि साक्षी” में उन्होंने एक बार फिर शब्दों के मायाजाल से अग्नि के विभिन्न स्वरूपों के चित्रण से सभी का मन मोह लिया। सुप्रसिद्ध कवयित्री और साहित्यकार, लखनऊ-निवासी डॉ. श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव जी की अनूठी और रोचक, आँखों पर छायाचित्र-प्रस्तुति ने आभासी-प्रांगण को मंत्रमुग्ध कर दिया। छायाचित्रों के माध्यम से उन्होंने “आँखों” द्वारा विभिन्न अभिव्यक्तियों को छंदों में बाँध कर अपने काव्य-पांडित्य से सभी को प्रभावित कर दिया। सचेतन “ख़ारी स्याही में भीगे शब्दों का काफिला” सभी दर्शकों को इस सरिता में बहा ले गया। आंखों और पलकों के आपसी स्नेह से ओतप्रोत उनकी दूसरी रचना से सभी को मंत्रमुग्ध कर एक बार फिर अपने असीम साहित्यिक कौशल और उत्कृष्ट दृष्टिकोण का परिचय दिया।
विश्व-प्रसिद्ध और माननीय कवियों और साहित्यकारों की उत्कृष्ट रचनाओं को सुन आभासी-सभागृह के दर्शक पूर्णतः मंत्रमुग्ध हो चुके थे। कार्यक्रम को गति देने सूत्रधारों ने स्थानीय कवियों को अपनी मौलिक रचनाओं के पाठन हेतु आमंत्रित किया। क्लीवलैंड की वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती विमल शरण जी ने सदैव की तरह, दिल को छूने वाली, शब्दों से अलंकृत काव्य रचना “अमेरिका में पहला हिमपात - प्रथम अनुभव” प्रस्तुत की। बर्फ से ढंकी सृष्टि में कहीं दिखाई दी हरियाली के माध्यम से जीवन के सकारात्मक मर्म को उन्होंने बहुत ही कुशलता से कविता का रूप दे दिया। अगली प्रस्तुति में डॉ. तस्नीम लोखंडवाला जी ने “एक योजक चिन्ह हूँ मैं” शीर्षक कविता से प्रवासी-भारतीयों की मनःस्थिति को अत्यंत कुशलतापूर्वक रची, अनोखी कविता के रूप में प्रस्तुत कर सदन में उपस्थित प्रत्येक हृदय में स्पंदन उत्पन्न कर दिया। श्रीमती रेणु चढ्ढा जी ने अपने अनुपम, भावपूर्ण कविता - “तन हारा, मन जीता”, से सभी दर्शकों को न सिर्फ मोहित किया, अपितु अपनी अलंकृत रचना के माध्यम से सशक्त लेखनी का भी परिचय दिया। उनकी पंक्ति, “गीली मिट्टी कलश बनाये” इस बात का उत्कृष्ट प्रमाण है। श्रीमती विम्मी जैन जी ने “हिंदी मेरी भाषा” शीर्षक वाली रोचक कविता के माध्यम से मातृभाषा हिंदी के प्रति अपने प्रेम और गर्व का मनोहरी चित्रण प्रस्तुत कर ‘विश्व हिंदी दिवस’ के आयोजन को अपनी काव्यांजलि के उपहार से साकार बना दिया। श्रीमती वंदना भरद्वाज जी अक्सर अपनी तीखी कलम से सामाजिक कुरीतियों पर काव्यात्मक प्रहार करतीं हैं। इस बार उन्होंने एक अलग विषय पर बहुत सुंदर काव्य-गद्य प्रस्तुत कर समस्त सुनने वालों को अपनी जन्मभूमि में बीते बचपन की मधुर स्मृतियों और सरल ज़िंदगी की सैर करवा दी। उनकी कविता - “ये मेरी ज़िन्दगी” इस सरल जीवन से अनभिज्ञ युवा पीढ़ी के लिए एक अनमोल उपहार है। पर्यावरण-प्रिय और माननीय कवि एवं शायर डॉ. उत्सव चतुर्वेदी जी ने अपनी कटाक्ष रचना - “चिड़ियों के दाने” के माध्यम से मानव द्वारा पर्यावरण के विनाश का विवरण सुना सभी दर्शकों को आत्मग्लानि का बोध कराया। उनकी पंक्ति, “उनका (चिड़ियों का) हक उन्हीं को दे रहा हूँ” मन-मस्तिष्क पर तीखा प्रहार करती है और “रेत में सिर छुपाये शुतुरमुर्ग” की उपमा को साकार करती है। इस संध्या की अंतिम रचना डॉ. सुनीता द्विवेदी की थी। अपनी कविता - “पादुका” के माध्यम से उन्होंने एक स्त्री के जीवन को दर्शाया जो समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है, समाज के प्रहार सहती है, अपना पक्ष कहने का अवसर ढूंढती रहती है लेकिन दोगले समाज पर मुस्कुरा कर अंततः मौन ही रह जाती है।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा की अध्यक्षा महोदया श्रीमती किरण खेतान जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया । उन्होंने सभी माननीय अतिथियों, और कवियों को इस कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए बधाई दी और धन्यवाद प्रकट किया। आभासी पटल से जुड़े सभी दर्शकों को भी साभार धन्यवाद दिया। अंत में, इस कार्यक्रम के निर्बाध सञ्चालन हेतु श्रीमती प्रेरणा खेमका जी, श्रीमती अलका खंडेलवाल जी, श्री अशोक खंडेलवाल जी, श्री अजय चढ्ढा जी, श्री पवन खेतान जी, डॉ. शोभा खंडेलवाल जी तथा अन्य आयोजकों, व तकनीकी टीम के सदस्यों के प्रति धन्यवाद प्रकट किया।
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हिंदी भाषण प्रतियोगिता - विद्या विकास विद्यालय,
एकता मंदिर, डलास, टेक्सास (२३ जनवरी, २०२२) |
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द्वारा- वंदना सिरोटिया
हिंदी भाषा संचालिका |
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| विजेताओं को ट्रॉफी और प्रमाण पत्र, सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र |
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भारत में सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं में से एक भाषा हिंदी है।हिंदी भाषा को 14 सितंबर, 1949 को राष्ट्रीय भाषा के रूप में अपनाया गया था। भारतीय संस्कृति, सभ्यता और हिंदी भाषा के प्रति हमारा रुझाव अतुल्नीय है। ऐसे तो हम भारत की मिट्टी से सात समुन्दर पार हैं, पर हमारा प्रयास यही है कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय भाषा और उसकी संस्कृति की जड़ों से जुड़ी रहें। इसके लिए हम अपने बच्चों को रविवार के दिन यह ज्ञान अर्जित करने के लिए ‘विद्या विकास विद्यालय’ भेजते हैं।
विद्या विकास विद्यालय, डलास-फोर्टवॉर्थ टेम्पल (एकता मंदिर) में हर रविवार को भारतीय संस्कृति एवं कई भारतीय भाषाएँ सिखाई जाती हैं। उनमें से एक भाषा हिंदी है। हिंदी भाषा सिखाने के लिया हम विभिन्न प्रकार की शिक्षण की विधियाँ उपयोग करते हैं, जैसे कि कहानियाँ, कविताएँ, खेल,परियोजनाएँ (प्रोजेक्ट्स), वार्षिक समारोह, एवं भाषण प्रतियोगिता आदि आयोजित करते हैं।
हम प्रतिवर्ष व्यक्तिगत रूप से याने आमने-सामने इस प्रतियोगिता का आयोजन करते थे, लेकिन इस वर्ष हम महामारी की वज़ह से आभासी रूप से पढ़ा रहे हैं। इसलिए हमने भाषण प्रतियोगिता को भी आभासी रूप से ही करने का निश्चय किया, हमारे लिए यह कोई साधारण कार्य नहीं था। यह प्रतियोगिता २३ जनवरी, २०२२ को आयोजित की गई। भाषण प्रतियोगिता न केवल हमारे छात्रों को हिंदी बोलने के लिए एक महान मंच प्रदान करती है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में भी मदद करती है।
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यह हमारे छात्रों के लिए एक अनूठा अनुभव था। इसमें छात्रों ने विस्तृत श्रृंखला से विषयों का चयन किया जैसे कि आध्यात्मिकता, स्वास्थ्य, पर्यावरण, आत्म-प्रेरणा, भारतीय त्योहारों, भारत यात्रा, पारिवारिक मूल्य और परंपराओं आदि। इसमें लगभग १२० बच्चों ने भाग लिया, जिनकी उम्र सीमा ५ वर्ष से १७ वर्ष की थी। सभी छात्रों ने बड़े उत्साह और ऊर्जा के साथ भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया। ये भाषण बहुत ही प्रेरणादायी, विचारोत्तेजक और अद्भुत थे। हम सभी छात्रों की रचनात्मकता और उनके पुरुषार्थ से आश्चर्यचकित थे।
इन छात्रों का मूल्यांकन करना हमारे निर्णायकदल के कन्धों पर एक बड़ी जिम्मेदारी थी। इन छात्रों का मूल्यांकन रूब्रिक पर किया गया था, जिसमें परिचय, शब्दावली, वाक्य संरचना, भावना के अनुसार स्वर सामंजस्य (वॉइस मॉड्यूलेशन), प्रस्तुतिकरण, निष्कर्ष और समय प्रबंधन शामिल थे।
सभी विजेताओं को ट्रॉफी और प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया, और सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किये गये । पुरस्कार वितरण अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की अध्यक्षा श्रीमती अनीता सिंघल और विद्या विकास विद्यालय के संचालक श्री अभिषेक बंसल ने किया। मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानती हूं कि प्रत्येक प्रतिभागी अपने आप में एक विजेता था। इस प्रतियोगिता का लक्ष्य केवल विजयी होना नहीं था, अपितु यह प्रतियोगिता थी, खुद को तैयार करने और दर्शकों के सामने बोलने का साहस रखने के बारे में। यह प्रतियोगिता हर छात्र की स्वयं के साथ थी और हर बार अपने आप से बेहतर होना, यह अपने आप में ही बहुत ही आनंदमयी अनुभव रहा ।
इस आयोजन की सफलता माता-पिता, शिक्षकों और निर्णायकदल के सहयोग के बिना असंभव थी। मैं इन सभी का आभार प्रकट करती हूँ। हमारे छात्रों द्वारा भाषण प्रतियोगिता के लिए अविश्वसनीय प्रयास और यह अनमोल पल हिंदी के फेसबुक पेज पर उपलब्ध हैं: https://www.facebook.com/VidyaVikasHindi/
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हिंदुस्तानी हूँ मैं,
इक योजक चिन्ह के साथ |
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हिंदुस्तानी हूँ मैं, इक योजक चिन्ह के साथ
अमरीकन भी हूँ मैं, इक योजक चिन्ह के साथ
इंग्लिस्तानि के लिए कभी अनोखी
कभी निम्न, कभी हल्की,
निश्चय ही अलग
हिंदुस्तानी के लिए कभी विदेशी,
कभी सफल, कभी प्रवासी,
निश्चय ही अलग
दोनों की आँखें यह कहती
भाषा हमारी बोल लेती अच्छी
मगर तुम हमारे जैसी नहीं
निश्चय ही अलग
हिन्दी अंग्रेज़ी में कविता लिख लेती
दोनो ही मातृभूमि के ग़ीत गाती
दिल से हो ज़रूर देशप्रेमी
निश्चय ही अलग
पहनावे में दिखती अदला-बदली
विचारों और मूल्य से हमेशा भिन्न सी
निष्ठा से भले ही हरी भरी
तुम निश्चय ही अलग
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| डॉ. तसनीम लोखंडवाला |
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द्वारा - डॉ. तसनीम लोखंडवाला उत्तरपूर्वि ओहायो में अपने पति और दो बेटियों के साथ रहती हैं। क्लीवलैंड सिटी में पिछले २६ साल से, पब्लिक स्कूल में मनोवैज्ञानिक (स्कूल सायकॉलिजस्ट) का काम कर रही हैं। पिछले 20 सालों से क्लीवलैंड सटेट यूनिवर्सिटी और केंट स्टेट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की सहेयक प्रोफ़ेसर भी रही हैं।
हिंदुस्तान में उदयपुर, राजस्थान से इन्होंने ‘नैदानिक मनोविज्ञान’ (clinical psychology) में पीएचडी की है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्य हैं और हिंदी के प्रति ख़ास अनुरूचि रखती हैं। बचपन से ही उदयपुर में संस्कृत और हिंदी को पढ़ा और समझा हैं और उर्दू को सुना और समझा है। हिंदी और उर्दू में कविता लिखनी हाल ही में शुरू की हैं।
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हिंदुस्तानियों के लिए अमरीकी
दोनों दुनिया में बस गयी
एक सुविधानुसार प्रतीक सी,
निश्चय ही अलग
कभी इधर, कभी उधर फिसलती
हिंडोले की तरह आगे पीछे डोलती
एक त्रिशंकु की तरह
ना धरती में, ना आसमान की
निश्चय ही अलग
पूर्व धारणा से ग्रसित, सज़ा मिली जो बिन सुनी
धोबी के गधे की जैसी
ना घर की ना घाट की
निश्चय ही अलग
अपनी असहजता पर अक्सर हँसी का मुखौटा लगाती
दो अलग किनारों के बीच झूझती
मेरी पहचान, मीम,
सिर्फ़ एक योजक चिन्ह सी
निश्चय ही अलग
अमरीकन हूँ मैं, पर योजक चिन्ह के साथ
हिंदुस्तानी भी हूँ मैं, इक योजक चिन्ह के साथ
नोट : "मीम" इनका तख़ल्लुस है जिसका मतलब अरबी में “माँ”, हीब्रू में “सब जानने वाली”, “आदमी” और “कौन” है।
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| संभालो मेरे दोस्तों |
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मैं अकेला हूं,
ना कोई मेरा है ना कोई अपना है,
ना कोई दोस्त है ना कोई बहन है,
मैं अकेला हूं इस साहित्यिक संसार में,
सिर्फ यहाँ झूठों का अंबार है सिर्फ,
कहते हैं अपना और भूल जाते हैं गैराना समझ कर ,
सिर्फ दोस्ती, रिश्ता काम से काम का,
बहन हो या मित्रता सिर्फ काम से काम है,
ना व्यवहार, ना अपनापन सिर्फ मतलब का,
आजकल रिश्तों में लोग सिर्फ फायदा देखते हैं,
फायदे के लिए मरते हैं, अपनापन, प्यार,
ये तो मर चुका है इस नास्तिक दुनिया मे, आपस्वार्थ दुनिया में,
ना किसी के पास समय है ना किसी के पास दिल,
आज किसी से सच बोलो तो खुद बुरा बन जाओगे,
भले उनको बुरे लोग पसंद है लेकिन आप बुरा बन जाओगे,
ये जो दुनिया है, फैशन, दिखावट, झूठ के पीछे भागती है,
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| द्वारा - रूपेश कुमार |
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द्वारा - रूपेश कुमार एक युवा साहित्यकार एवं छात्र हैं, बिहार के छोटे से शह चैनपुर से हैं|
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भले इनका लोग गलत तरीके से उपयोग कर ले ,
समझती कहाँ है ये पागलपन दुनिया, क्योंकि ,
यहाँ सच्चे को तिरस्कार किया जाता है और,
झूठों को इज़्ज़त दिया जाता है ,
इस कलियुगी, भ्रष्टाचारी, नर्क ,
रिश्तों का नाजायज संबंध बनाने वाली ,
दोस्ती के नाम पर धोखेबाजी ,
सहायता के नाम पर गलत फ़ायदा उठाने वाली ,
प्यार के नाम पर धोखा देने वाली ,
काम के नाम पर इज़्ज़त लूटने वाली ,
साहित्य,शायरी के नाम पर गलत करने वाली ,
राजनीति के पीछे बुरी नज़र वाली ,
यही है आज कल की दुनिया ,
अगर ना संभालो तो कुए मे गिर जाओगे ,
या खुद को इस दुनिया में अपनी ,
इज़्ज़त, नाम, ख्याति सड़कों पर लूटा दोगे ,
सिर्फ अकेले अपने नाम के पीछे ,
सरेआम बाजार में बदनाम हो जाओगे ,
सम्भल जाओ ये दुनिया वालों ,
वर्ना इज़्ज़त सरेआम बाजार में बिक जायेगी ,
संभालो ये दुनिया वालों, इज़्ज़त ना ख़रीदी जाती ,
सौहरत ना बेची जाती, संभालो मेरे प्यारे दोस्तों, बहनों ,
ये एक सच्चे दोस्त की पुकार है ,
सायल की दिल की आवाज़ है ।
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आते जाते उनकी
इति को अथ पर देखा है |
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आते जाते उनकी इति को अथ पर देखा है
जिनके मुख पर धाय खोल कर छाती कभी खड़ी थी।
पैदा होते ही चाँदी की चम्मच रही पड़ी थी।।
बरसी तो दिन रात खजानों से
थम नहीं रही थी।
जिनकी धन सम्पदा कुबेरों से कम नहीं रही थी।
उनको मैंने भीख माँगते पथ पर देखा है।
जूठी पड़ी पत्तलों पर जंगली श्वान लड़ते हैं।
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| द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया |
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम. ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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उनमें एक निवाले को शिशु लगा जान भिड़ते हैं।।
भीख मांँगते तन ढँकने तक के न वसन मिल पाए।
वही आज अपने श्रम के बल पर ऐसे इतराए।।
भिखमंगों को राजमहल के रथ पर देखा है।
इतराते बलखाते चलते गुर्राते गर्राते।
जग को पग की धूल समझते धरती को थर्राते।।
बड़े बड़े शूरमा शरण में चरण चूमते देखे।
जिनकी रक्षा में रक्षक से काल घूमते देखे।।
आते जाते उनकी इति को अथ पर देखा है।
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द्वारा- डॉ. मनीषकुमार मिश्रा
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डॉ. मनीषकुमार मिश्रा जी अभी के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय (मुंबई विद्यापीठ से सम्बद्ध) कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र में सहायक आचार्य हिन्दी विभाग में 14 सितंबर 2010 से कार्यरत हैं।
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"स्मृतियाँ"
स्मृतियाँ भी कितनी अजीब होती हैं। कभी भी किसी भी कोने से चुपचाप चली आती हैं, बिना पूछे। फ़िर पूछना क्यों ? वो लौट रही होती हैं, वहीं जहाँ वे आज भी सांस ले रही होती हैं। सिर्फ़ दिखाई नहीं पड़ती। वे लौटती हैं दराज में रखी फटी हुई किसी तस्वीर से, आलमारी में रखे पीले स्वैटर से या कि अदरक वाली एक प्याली चाय के स्वाद से। वे कहीं से भी आ सकती हैं, क्योंकि उन्हें सारे ठिकाने पता हैं। यहाँ तक कि मेरी कमीज़ की टूटी हुई बटन भी उनके आने जाने का एक मुकम्मल रास्ता है। वक्त को लगता है कि वह सबको ठिकाने लगा सकता है, लेकिन ये वक्त से परे हैं। इनकी खोह में वक्त के कुछ लम्हें हमेशा बने रहते हैं। ये वक्त के साथ बीत नहीं जाते, बल्कि लौट आते हैं बीते हुए समय की धरोहर बनकर। वे आती हैं तो बहुत शोर होता है, बाहर नहीं अंदर। बहुत कुछ बार बार टूटकर बिखरता है। बहुत कुछ जुड़ता भी है। बेचैनी,घुटन,पीड़ा और सुकून का अजीब सा अनुभव। वे आती हैं तो निचोड़ लेती हैं। कभी सूखे जख्मों को कुरेद कुरेद के हरा कर देती हैं तो कभी हरे जख्मों को अपने स्पर्श मात्र से सुखा देती हैं। वे सालती हैं, सहलाती हैं और फ़िर कहीं खो जाती हैं। ये जीवन के कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों का आलिंगन करती हैं। अक्सर मेरे पास होती हैं जब मैं खुद को खुद के करीब महसूस करता हूँ। ये बीते हुए वक्त की थाती हैं। होने न होने के बीच की कहानी हैं। वे कहानियां जो मुझे अपने से जोड़े हुए हैं। आज कल मैं इन कहानियों का इकलौता श्रोता हूँ। जिसे यह भ्रम बराबर रहा कि उसने इन कहानियों को लिखा है। जबकि यह एक भ्रम मात्र था। मैंने तो बस इनके परिवेश को जिया है, जी रहा हूं। जीने की अदम्य लालसा के साथ।
आप सोच रहे होंगे कि इन स्मृतियों की कहानियों में कौन है ? अरे, बहुत से लोग हैं। लोगों ही नहीं, बहुत से सपने भी हैं। कुछ वे जो टूटकर बिखर गए तो कुछ वे भी जो पूरे हुए। बीते हुए कल की मानों पूरी फ़िल्म यहाँ पड़ी है। यहाँ बचपन है, जवानी है, वादे - इरादे, प्यार - इकरार, रूठना- मनाना , धोखा - फरेब सब है। यहाँ वह लड़की भी है जो मुझे कई सालों पहले छोड़कर जा चुकी है। जाते समय वह कितना रोई !! उसने कहा था कि वह अब कभी वह लौटकर नहीं आयेगी। कितनी झूठी थी वह। इतने सालों से यहीं तो है, मेरे पास ही। आज भी एकदम वैसे ही रूठती है, रोती है और रुलाती भी है। कहती है कि उसे चिड़िया होना है और उड़ के दूर जाना है।
मैं पूछता हूँ – कहाँ ?
वह कहती है – दूर, बहुत दूर।
बहुत दूर मतलब कहाँ ? – मैंने फ़िर पूछा।
तुम्हें क्यों बताऊँ ? तुम वहाँ भी आकार मुझे तंग करोगे। नहीं बताऊँगी जाओ ? सर मत खाओ मेरा। जो कहती हूँ वो तो करते नहीं, सिर्फ़ सर खाते हो। जाओ, नहीं बोलती तुमसे। - मुँह दूसरी तरफ़ फेरकर वह हँसते हुए कहती।
ऐसी ही न जाने कितनी ही बिना सर पैर की बातें। ऐसी बातों का तो जैसे उसके पास ख़ज़ाना है। पिछली बार जब मिली तो पीले रंग की साड़ी में थी। मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर बोली - मैं चाहती हूँ कि मेरी साड़ी का यह पीला रंग हमारी हथेली पर उतर आए और एकदम पक्का होकर वहीं ठहर जाए। फ़िर हम अपनी इन्हीं हथेलियों पर फ़ूल उगाएंगें। उन फूलों के बीच ही एक छोटा सा घर होगा। उस घर के आस पास बहुत सुंदर बगीचा होगा। जहाँ सुबह शाम खूब सारी चिड़िया आयेगी। वो ख़ूब शोर मचाऊँगी। गाना गायेंगी। रंग बिखेरेंगी। मैं उनसे दोस्ती करूँगी, उनके साथ गाना गाऊँगी और एक दिन वो चिड़िया के साथ ही कहीं दूर, बहुत दूर उड़ जाऊँगी। तब क्या तुम मुझे याद करोगे ?
मैंने कहा – तुम कैसे उड़ोगी ? तुम क्या चिड़िया हो ?
नहीं, लेकिन तुम एकदम बुद्धू हो। सच बताओ, तुम मुझे याद करोगे की नहीं ? – इतना कहते हुए वो मेरा कालर खीच लेती और अपनी नुकीली नाक मेरी नाक से भिड़ा देती। उसकी तेज़ और गर्म साँसे मैं एकदम करीब से महसूस करता। आज़ भी करता हूँ इतने सालों बाद भी। तब जब कि कभी न लौटने के लिए वह जा चुकी है। अपनी यादों के रंग मेरी हथेली पर और सासों की गर्मी मेरे अंदर छोडकर वह जा चुकी है कहीं दूर, बहुत दूर। लेकिन इतना सब कुछ छोडकर गई है कि इन्हीं के बहाने आती रहती है स्मृतियों की सुंदर कड़ी के रूप में। उसका आना प्यार के लौट आने जैसा होता है।
आज उसका वह सवाल रुला देता है। कभी कभी लगता है कि उसे पुकार लूँ। उसे मना लूँ, हमेशा तो मना लेता था। उसे मनाने में मुझे महारत हासिल है। मगर मैं उसकी साड़ी के पीले चटक रंग को हमारी हथेलियों पर कैसे उतारता ? मेरी हथेलियों से तो सबकुछ बिछल जाता है। न जाने क्यों इनसे ख़ून भी रिसता रहता है। बनारस में जो औघड़ अस्सी घाट पर मिला था, वह कहता था कि मेरे हांथ में मेरे सपनों का ही ख़ून लगा है। मैं सिर्फ़ साधन बन सकता हूं साध्य नहीं। वह यह भी कहता था कि मैं मनुष्य होने की सारी पीड़ाओं को भोगता रहूंगा। मैं इन पीड़ाओं का ही सम्राट बनूंगा और भी बहुत कुछ वह बताता बशर्ते मैं उसकी चिलम के लिए सौ रुपए देता तब। उस समय सौ रुपए अधिक मूल्यवान लगे सो नहीं दिए। साथ आये मित्र अनूप ने भी धीरे से कहा था - "सर घाट के ई गजेडी भंगेडीन के चक्कर में मत पड़िए। ई सब बकचोदई हम खूब देखले बाड़ी। चला निकल चला।" अनुप की बात मानकर मैं वहां से निकल तो आया था लेकिन वो औघड़ मेरी स्मृतियों में बसा रहा। जब कभी भी बहुत परेशान रहता हूँ तो वह जाने कैसे मेरी मनःस्थिति को भांप लेता है। आकार कहता है - " का रे, सर भोसडो के, तोहसी कहिले रहिले कि चिलम भरा दा। भरा द मालिक, भरा द। लेकिन तू , एडियाइ के चल गइला । अब भोगी के, भोगा बच्चा भोगा। जा मजा करा। अबई ता बहुत कुछ बाक़ी बा, देखत राहिला। हमनी के साथे देखल जाईल ..."
वो इसी तरह न जाने क्या बकता रहता है। गरियाता रहता है। उससे इस तरह अपमानित होकर जब भी उसके पास से लौटना चाहता हूं तो वह फ़िर टोकते हुए कहता है - " रुका महराज। तनी तोहार गोड़वा माथे लगा लेई।" इतना कहकर वह मेरी तरफ़ बढ़ता है और मैं मारे डर के भाग खड़ा होता हूं। ऐसा बार बार होता है। पिछली बार तो ग़ज़ब ही हुआ। मैं सुबह की अलसायी नींद में था कि लगा मोबाईल की रिंग बज रही है। मोबाईल कान से लगाते ही इन्हीं महराज की आवाज़ आयी –
" अब सूता जिन। बाउ जौनपुर खातिर बस न पकड़इ के है। सूते सूते त बस पकड़ाई ना। पहिली बस छोड़ के दुसरकी से ज़इहा, हमार आदेश है। जा उठा जा ...।"
मैं हड़बड़ा के उठ बैठा। मोबाईल पर नज़र गई तो वह स्विच ऑफ। ठीक भी था, मैं सोते समय मोबाईल रात को स्विच ऑफ ही रखता था। फ़िर फ़ोन किसका आया था ? जल्द ही बात समझ में आई। मैंने स्वप्न देखा था। लेकिन सुबह की पहली बस तो मुझे जौनपुर की पकड़नी ही थी। मैं फटाफट तैयार होकर नगवा चुंगी से लंका गेट पहुँचा और वहां से कैंट बस डीपो के लिए सौ रुपए में रिजर्व आटो रिक्शा लिया। सर्दियों के दिन थे, मेरी बस भी लगी हुई थी। बस पूरी खाली थी, इक्का दुक्का सवारी आ जा रही थी।
मैं कंडेक्टर के ठीक पीछे की सीट पर जाकर बैठ गया। इतने में चायवाले ने आवाज दी। मैंने चाय वाले को बैठे बैठे ही आवाज़ लगाई और पैंट की जेब में पांच का सिक्का टटोलने लगा। उसने खिड़की से ही एक कुल्लहड़ चाय मेरी तरफ़ बढ़ाया और मैंने पांच का सिक्का उसकी तरफ़। अभी पहली चुस्की ही ली कि बस की खिड़की से एक साधू महाराज बोले - चाहिया पिला द मालिक, भोलेबाबा का आदेश है।" मैं उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिया। सुबह ठंड थी। वह सिर्फ़ एक रामनामी ओढ़े था। अपनी जेब से दस का नोट उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए मैंने कहा - " बाबा की जय। ओनकर आदेश के टाली ? ल महराज, जा चहिया पी ला।" उसने मेरे हांथ से नोट ली और बस अड्डे पर ही कहीं मेरी नज़रों से ओझल हो गया। मैंने भी अपनी चाय खतम की और कुलल्हड़ बाहर फ़ेकने ही वाला था कि सामने प्रधानमंत्री मोदी जी का स्वच्छता अभियान वाला बैनर दिखाई पड़ा। अतः स्वच्छ भारत अभियान को मज़बूती देते हुए बस से नीचे उतरे और चाय के स्टाल पर रखे डब्बे में कुलल्हड़ को डालकर वापस अपनी सीट पर आकार बैठ गये।
बस चलने में अभी काफ़ी वक्त था। मैं ने भी मुंह पर रुमाल डाला और खिड़की की तरफ टेक देकर सोने की कोशिश करने लगा, वैसे भी आज नींद पूरी नहीं हुई थी। मेरी आंख कब लग गई पता ही नहीं। अचानक बस घरघराने लगी तो आँख खुल गई। देखा बस लगभग भर गई थी और चलने को तैयार। इतने में खिड़की से बाहर देखता हूँ कि वही साधू खड़ा है जो मुझसे बाबा विश्वनाथ के नाम पर चाय के लिए दस रूपए लेकर गया था। वह एक टक मुझे देख रहा था। उसका इस तरह देखना थोड़ा अजीब लगा। मैंने उसे अनदेखा किया लेकिन वह मुझे ही घूरे जा रहा था।
\अचानक वह मेरी खिड़की के पास आ गया और बोला -" त बाबा के आदेश ना मनबा ?" मैं हतप्रभ । थोड़ा डर भी लगा लेकिन अपने डर को छुपाते हुए मैंने कहा - " महराज तोहका दस रूपिया दिहली न चाय खातिर ? का भ, कुछ और कुछ चाही ?"
वह एकदम चुप। बस मुझे घूरे जा रहा था कि बस चल पड़ी। वह पीछे से चिल्लाया -" बाबा सबेरे फ़ोन पर का कहिले रहें ?" मुझे काटो तो खून नहीं। फ़ोन वाली बात इसे कैसे पता चली। फ़िर फोन तो स्विच ऑफ था। वह तो स्वप्न था। फ़िर स्वप्न में तो उस अघोरी की आवाज़ थी। वह पहली नहीं दूसरी बस से जाने को कह रहा था। तो क्या यह सब किसी के आदेश से हो रहा था ? फ़िर ये सब इस बस अड्डे वाले साधू को कैसे पता ? उस ठंडी में भी मैं पसीने से भीग गया। जाने वो कौन सा डर या आंतरिक प्रेरणा थी कि मैं अचानक उठा और बस से रेलवे पुलिया के बहुत पहले ही उतर गया। कुछ मिनट पैदल चलने के बाद जब मैं वापस बस अड्डे पहुंचा तो वह साधू कहीं नज़र नहीं आया। कितनी अजीब बात थी कि मेरे स्वप्न की बात जिसका कि अभी किसी से जिक्र भी न हुआ वह इस अंजान साधू को कैसे पता चली होगी ? आख़िर ये हो कौन सकता है ? इन सब सवालों से माथा भन्ना गया था।
मैंने पूरे बस अड्डे का चक्कर लगाया लेकिन वह साधू जाने कहाँ चला गया था। एक दो चाय वालों से भी पूछा तो पता चला वह यहाँ का नहीं था, मुसाफ़िर जान पड़ता था। अगली बस सुल्तानपुर की लगी थी सो मैं उसमें जाकर बैठ गया। अजीब सा डर और बेचैनी हो रही थी। नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी। बस लगभग आधे घण्टे बाद वहाँ से छूटी तो जान में जान आई। ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था। क्या यह कोई ईश्वरीय कृपा थी ? लेकिन ईश्वर को कृपा करनी होगी तो अपने परम भक्तों पर करेंगे, साधकों पर करेंगे। मेरे जैस गिरे हुए और ... जाने दीजिये अपना चरित्र चित्रण काहें करें। कहने का अर्थ इतना ही कि हम कहीं से भी उनकी कृपा के लायक नहीं थे।
.तभी याद आया कि अम्मा ने पाँच सौ रुपये दिये थे संकट मोचन जी को चढ़ाने को, हम भूल गये। तो क्या पाँच सौ के नुकसान के ख़ातिर हनुमान जी इसतरह हमारे पीछे पड़ जायेंगे ? इतनी तगड़ी बनियागिरी ? और इतने दिनों से हम जो चढ़ाते रहे हैं उसका क्या ? आप का पैसा पैसा है और हमारा ढेला है ? फ़िर आप का काहे का पैसा ? वह पैसा मेरी अम्मा का था, अम्मा का पैसा मतलब हमारा पैसा। अब तो बिलकुल नहीं चढ़ाएँगे जाओ। बल्कि उसी पैसे से रविदास गेट पर चाची की कचौड़ी खायेंगे, पहलवान की लस्सी पियेंगे और केशव भईया का पान मुँह में दबाकर नगवा चुंगी की तरफ़ खिसक लेंगे। तुम्हारी तरफ़ देखेंगे भी नहीं। जाओ जो करना है कर लो। दुर्गाकुंड जाते समय भी तोहरी ओरी ताकब ना। और जब हिसाब ही होगा तो इस पाँच सौ का ही क्यों, दो साल में हम जितना चढ़ाये हैं सब का होगा। यही सब ऊल जलूल सोचते सोचते चला जा रहा था।
बस अभी बाबतपुर से थोड़ा आगे ही बढ़ी थी कि देखता हूँ बाईं तरफ काफ़ी भीड़ लगी है। लोग सड़क के बीचों बीच खड़े हैं। एक दो पुलिस की गाड़ियां और एंबुलेंस भी दिखाई पड़ी। कोई एक्सिडेंट हुआ था। बस दांईं तरफ ही दबा के ड्राईवर ने खड़ी कर दी। आगे रास्ता लोगों की भीड़ से जाम हो गया था। पुलिस रोड़ खाली करने का प्रयास कर रही थी। खिड़की से बाहर झांकते हुए मैंने एक बुज़ुर्ग से पूछा - "का भईल दादा ?"
मेरी बात सुनकर वे बुजुर्ग खिड़की के करीब आ गये। “ रोडवेज़ की बस रही, जौनपुर वाली। पलट गइल है। मजे क मनई मराल बाटें। डागदर- पुलिस सब लाग हैं।’’ यह सुनते ही मैं सन्न हो गया। जौनपुर वाली पहली बस पलट चुकी थी। कई लोग मारे गये थे। तो क्या मुझे इस संभावित ऐक्सीडेंट से कोई बचा रहा था ? क्या इसीलिए उस अघोरी ने फोन पर पहली बस छोडने का आदेश दिया था ? क्या इसीलिए बस अड्डे पर वह साधू मुझे सचेत करने आया था ? मुझे काटो तो ख़ून नहीं। मैंने तुरंत संकट मोचन जी को याद किया और अम्मा के पाँच सौ के साथ अपने भी पाँच सौ चढ़ाने का संकल्प लिया। वैसे भी अम्मा कहती है कि देवी देवता से हंसी मज़ाक ठीक नहीं।
इस घटना के बाद से वह अघोरी, मेरी आस्था का प्रतीक हो गया। न जाने कैसे मेरी मनःस्थिति को भांप कर वह आता रहता है गाहे बगाहे। उसको आते हुए सालों हो गये। बनारस छूट गया , उसी बनारस के मणिकर्णिका घाट पर अम्मा भी छूट गयी। लेकिन यह अघोरी मुझे नहीं छोडता। उसका सब ठीक है बस ससुरा गरियाता बहुत है। एक बार हम उससे पूछे कि,"महराज, के भेज देला तोहका हमरे खातिर ? काहें भाग भाग के चल आवला ? हम का तोहका लड्डू पेड़ा खियाइला ? कि तोहका भाँग- गाँजा पियाइला ? बोला ? "
मेरे प्रश्न पर उसकी त्योरियां चढ़ गई। अपनी आंखें नचाकर शरारत के लहज़े में बोला - " तोर अम्मा !! हमार कपार खा जाली। ओकर मुँह देख के आवइ के पड़ेला। उ भक्तिन है, ओकर सुनइ के पड़ेला।"
इतना कहकर वह या तो गायब हो जाता है या फ़िर एकदम चुप। ख़ैर जब से उसने अम्मा वाली बात बताई तभी से वह मेरी स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा हो गया। उस लड़की के बाद यह अघोरी ही है जो किसी न किसी बहाने आता रहता है। गरियाएगा, ज्ञान पेलेगा और चला जायेगा। कभी कभी आदेश भी देता है, वो भी एक दम सख़्त लहज़े में। मैं उसका आदेश उस बस वाली घटना के बाद चुपचाप मान लेता हूं। फ़िर उसके आदेशों में अम्मा का आदेश छुपा होता है, यह वह बता चुका था। लेकिन बस वाली घटना तो अम्मा की मृत्यु के पहले की है। तब उसे कौन भेजता था ? एक बार सोचा कि पूछू लेकिन कौन उसके मुँह लगे। अड़ियल सांड है ससुर। कुछ भी हो उसने मेरी जान बचाई थी, उसका एहसान है।
अम्मा !!! अम्मा भी तो अब यहीं मिलती है। पिछले तीन सालों से अम्मा कहीं और नहीं मिली। मेरी हर तकलीफ़ को वह जानती है। लेकिन अपनी तकलीफें कहां कभी कहीं उसने ? हार्ट सर्जरी के बाद लगा था कि अम्मा अब ठीक हो जायेगी। एकदम ठीक भी तो लगती थी। उस दिन रात को खाने के बाद कितनी बातें की उसने। बल्कि मैंने ही कहा था कि, " अम्मा अब सो जा। ढेर जिन बोला कर।" अम्मा फ़िर चुपचाप सो गई थी। ऐसी सोई कि फ़िर नहीं उठी। हम सब रोए। अस्पताल ले गए। लेकिन अम्मा चुप हो गई थी। उसकी चुप्पी इतनी ख़राब पहले कभी नहीं लगी।
अम्मा के जाने के बाद घर, घर नहीं रहा। उदासी की एक और मोटी परत अंतर्मन में चढ़ गई। "अम्मा" यह शब्द भी मेरे व्यक्तिगत भाषाई प्रक्षेत्र से गायब हो गया। अम्मा की हम उम्र किसी महिला को "अम्मा" कहने का अवसर यदा कदा मिल जाता है तो मन गीला हो जाता है। फ़िर यह गीला मन, मुझे मेरी अम्मा की स्मृतियों में गूंथ लेता है । मैं ऐसे अवसरों की ताक में रहता हूं कि किसी तरह "अम्मा" यह शब्द मेरी जबान से निकले। कई बार अकेले में भी "अम्मा" बोलने की कोशिश की, लेकिन पता नहीं क्यों आवाज़ ही नहीं निकली। गला रुँध जाता है और बस बहुत रोना आता है। रोते हुए धड़कन बढ़ जाती है और मैं विचलित हो जाता हूं। ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है और कब तक होगा पता नहीं। इधर तीन सालों में, मेरी स्मृतियों में सबसे अधिक अम्मा ही रही हैं। अम्मा, अघोरी और वो पीली साड़ीवाली लड़की। मेरी स्मृतियों में इनका एक छत्र राज है।
कभी कभी तो यह सोच के डर भी लगता है कि ये सब यहीं एक साथ रहते हैं तो एक दूसरे से भी मिलते होंगे ? अघोरी ने तो कहा भी था कि उसे अम्मा ने ही भेजा था। पता नहीं सच की झूठ। एक बार मन तो हुआ कि अम्मा से पूछ लूं कि क्या वह किसी अघोरी साधू को जानती हैं जो बनारस के घाटों पर घूमता रहता है ? लेकिन हिम्मत नहीं हुई। फ़िर अम्मा को सब बताना पड़ेगा। वो बसवाली बात से तो वह कितनी चिंतित होगी ? नहीं उसे कुछ नहीं बताना ही ठीक होगा।
डर तो मुझे इस बात का भी लगता था कि अगर अम्मा, अघोरी और वो पीली साड़ीवाली लड़की ये लोग आपस में मिलते होंगे तब तो उस पीली साड़ी वाली लड़की ने अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से अम्मा को भी मोहित कर लिया होगा। अपनी भोली सूरत के साथ जब रो रो कर उसने मेरी शिकायत की होगी तो मां को कितना धक्का लगा होगा। इस बात को लेकर कई रोज़ परेशान रहा। फ़िर नौबत साइकेट्रिस्ट के पास जाने की आ गई। लेकिन उसने समझाया कि ऐसा नहीं हो सकता जब तक कि मैं स्वयं ऐसा ना चाहुँ। चेतन, अवचेतन पता नहीं उसने क्या क्या खूब समझाया था। मैं तो बस इतने से खुश था कि वे लोग एक साथ तब तक नहीं मिलेंगे, जब तक मैं नहीं चाहूँगा।
अब मैं भला क्यों ऐसा चाहूँगा ? मैं कोई पागल हूँ जो उनको मिलाकर अपनी मुसीबत बढ़ाऊं ? वो लोग अलग अलग ही ठीक हैं। तीनों एक से बढ़कर एक वीर हैं। इतने साल हो गए इन सभी से वहीं, अपनी स्मृतियों में ही मिलते हुए। अभी पता नहीं कितने साल ये सब ऐसे ही चलता रहेगा। पता नहीं उस पीली साड़ीवाली लड़की की स्मृतियों में अब मेरी कोई जगह है भी या नहीं पर अम्मा मुझे ज़रूर याद करती होगी। उस अघोरी को भी बार बार मेरी मदद को अम्मा भेजती ही रहेगी। वो जरा भी ना नुकुर करेगा तो अम्मा उसका सब भूत उतार देंगी।
बस, उस पीली साड़ीवाली लड़की की थोड़ी चिंता होती है। कहीं सच में वह पगली किसी चिड़िया के साथ बहुत दूर ना उड़ जाए और मैं उसे यह बता भी न सकूं कि उसे कितना याद करता हूँ। अब अगली बार जब मिलेगी तो उसे समझाऊंगा कि वह ऐसा ना करे। यह जानते हुए भी कि वह नहीं मानेगी। अब उसे कैसे समझाऊं कि मेरे हांथ में मेरे सपनों का ही ख़ून लगा है। अघोरी कहता है कि इनसे ख़ून भी टपकता है। लेकिन वो भी तो जिद्दी है। कोई बात नहीं मानेगी। उस अघोरी को तो दौड़ा दौड़ाकर मारेगी। लेकिन क्या सच में अब वह कभी लौटकर नहीं आयेगी ? उसने कहा तो यही था। देखो .... क्या पता किसी चिड़िया की तरह एक दिन अचानक लौट भी आये।
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द्वारा- प्रिया भरद्वाज ,
अ. हि. स. की शॉर्लट,
नार्थ कैरोलिना शाखा की
अध्यक्षा
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बसंत - पंचमी
बसंत-पंचमी हिंदी पंचांग के अनुसार माघ महीने की शुक्ल पक्ष पंचमी तिथी को मनाया जाता हैं। इसी दिन से वसंत ऋतू का प्रारम्भ होती हैं और पतझड़ का मौसम खत्म होकर हरियाली का प्रारम्भ हो जाती हैं। श्रिस्टी के प्राकृतिक रूप में भी बदलाव महसूस होने लगता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार इस वर्ष यह दिवस फरवरी माह की ५ तारिख को मनाया गया। देवी सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणा-वादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसंत-पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार बसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है। कवि देव ने बसंत ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है कि रूप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति झूम उठती है,पेड़ उसके लिए नव- पल्लव का पालना डालते हैं ,फूल वस्त्र पहनाते हैं पवन झूला झुलाता है।
उपनिषदों की कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान् शिव की आज्ञा से भगवान् ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य की योनि की रचना की, लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने हथेली में लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान् श्री विष्णु की स्तुति करनी आरम्भ की। ब्रह्मा जी की स्तुति को सुन कर भगवान् विष्णु तत्काल ही उनके सम्मुख प्रकट हो गए और उनकी समस्या जानकर भगवान् विष्णु ने आदि-शक्ति माँ दुर्गा का आव्हान किया। विष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण भगवती दुर्गा वहाँ तुरत ही प्रकट हो गयीं, तब ब्रह्मा एवं विष्णु जी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया। ब्रह्मा जी तथा विष्णु जी की बातों को सुनने के बाद उसी क्षण आदि-शक्ति दुर्गा माता के शरीर से श्वेत रंग का एक भारी तेज उत्पन्न हुआ जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था, जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में वर मुद्रा थे। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, जिससे संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी "सरस्वती" कहा। तत्पश्चात आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रह्मा जी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई, ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं, पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं, उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति श्री दुर्गा सब देवताओं के देखते- देखते अन्तर्ध्यान गयीं, इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।
पूजा विधि: बसंत-पंचमी के दिन प्रातः काल स्नानादि करके पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा के स्थान पर सफाई करके चौका लगाए। इस पर माँ सरस्वती की चौकी रखकर पीले वस्त्र बिछाना चाहिए। चौकी पर माँ सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर रखनी चाहिए। देवी जी को श्वेत व पीले पुष्प, चंदन, पीले वस्त्र, हल्दी लगे पीले अक्षत और प्रसाद के रूप में बूंदी, चावल या लड्डू अर्पित करें। स्कंद पुराण के अनुसार श्वेत वस्त्र, चंदन, श्वेत पुष्प आदि से सरस्वती माँ का पूजन करें।
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यदि चाहे तो बसंत-पंचमी के दिन व्रत रख सकते हैं, व्रत रखने वाले मनुष्य को निराहार रहकर व्रत का पालन करना चाहिए, और व्रत कथा सुननी चाहिए। विधिपूर्वक कलश की स्थापना करके गणेश जी , सूर्यदेव, भगवान विष्णु तथा महादेव जी की पूजा करनी चाहिये। बसंत-पंचमी हमारे आनन्द के अतिरेक का प्रतीक है।
भारत के - स्वर्णिम इतिहास में बसंत-पंचमी के दिन ही शौर्य, त्याग, आत्मबलिदान की एक घटना ई. 1192 में हुई थी। इतिहास साक्षी है कि यह दिन हमें "हिन्दशिरोमणि महाराज पृथ्वीराज चौहान" की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी इस्लामिक आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया, पर जब सत्रहवीं बार वे पराजित हुए, तो मोहम्मद गौरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ बंदी बनाकर काबुल, अफगानिस्तान ले गया और वहाँ उनकी आंखें निकाल ली। पृथ्वीराज का राजकवि चन्द बरदाई पृथ्वीराज से मिलने के लिए काबुल पहुंचें। वहाँ कैद खाने में पृथ्वीराज की दयनीय हालत देखकर चंद्रवरदाई के हृदय को गहरा आघात लगा और उसने गौरी से बदला लेने की योजना बनाई। राजकवि चंद्रवरदाई ने सुल्तान मुहम्मद गौरी को बताया कि हमारे राजा एक प्रतापी सम्राट हैं और इन्हें शब्दभेदी बाण चलाना आता है यदि आप चाहें तो इनके शब्दभेदी बाण से लोहे के सात तवे बेधने का प्रदर्शन आप स्वयं भी देख सकते हैं। इस पर गौरी तैयार हो गया और उसके राज्य में सभी प्रमुख सभासदों को इस कार्यक्रम को देखने हेतु आमंत्रित किया।
पृथ्वीराज चौहान और चंद्रवरदाई ने पहले ही इस पूरे कार्यक्रम की गुप्त मंत्रणा कर ली थी कि पृथ्वीराज को क्या करना है। निश्चित तिथि को दरबार लगा और गौरी एक ऊंचे स्थान पर अपने मंत्रियों के साथ बैठ गया। चंद्रवरदाई के निर्देशानुसार लोहे के सात बड़े-बड़े तवे निश्चित दिशा और दूरी पर लगवाए गए। पृथ्वीराज चौहान की आँखे निकाल दी गई थी, वे अंधे थे, अतः उनको कैद एवं बेड़ियों से आजाद कर निश्चित स्थान पर बैठाया गया और उनके हाथों में धनुष बाण थमाया गया। इसके बाद चंद्रवरदाई ने पृथ्वीराज की वीर गाथाओं का गुणगान करते हुए बिरूदावली गाई तथा गौरी के बैठने के स्थान को इस प्रकार संकेत में पृथ्वीराज को अवगत करवाया-
‘‘चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।’’
(अर्थात् चार बांस, चैबीस गज और आठ अंगुल जितनी दूरी के ऊपर सुल्तान बैठा है, इसलिए चौहान चूकना नहीं, अपने लक्ष्य को हासिल करो।) इस संदेश से पृथ्वीराज को गौरी की वास्तविक दूरी का आंकलन हो गया। तब चंद्रवरदाई ने गौरी से कहा कि ‘पृथ्वीराज आपके बंदी हैं, इसलिए आपके आदेश के बाद ही वे अपनी शब्द भेदी बाण चलाने के गुण का प्रदर्शन करेंगे’। ज्यों ही गौरी ने पृथ्वीराज को प्रदर्शन की आज्ञा का आदेश दिया, पृथ्वीराज को गौरी की दिशा मालूम हो गई और उन्होंने तुरन्त बिना एक पल की भी देरी किये अपने एक ही बाण से गौरी को मार गिराया।
गौरी अपने आसन से नीचे गिरा और उसके प्राण पंखेरू उड़ गए। चारों और भगदड़ और हा-हाकार मच गया, इस बीच पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार एक-दूसरे को कटार मार कर अपने प्राण त्याग दिये।
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| बधाई - डॉ. मनोज चौधरी एवं उनके दोनों सहयोगियों को |
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डॉ. मनोज चौधरी एवं उनके दोनों सहयोगियों को बहुत-बहुत बधाई
ग्लास एसोसिएशनों (सीजीए) और आईसीओएम-ग्लास के समुदाय के साथ ग्लास पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग (आईसीजी) ने हाल ही में 2022 के ग्लास के संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय वर्ष के लिए आवेदन किया और 18 मई 2021 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक ने अपनी औपचारिक मंजूरी दे दी! अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य डॉ. मनोज चौधरी को अ.हि.स. की ओर से बहुत-बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकमानायें।
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बधाई- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
वर्ल्डस ग्रेटेस्ट रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज कराने के लिये |
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डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी, उदयपुर ने सबसे ज़्यादा अकादमिक प्रमाणपत्र
अर्जित कर वर्ल्डस ग्रेटेस्ट रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज कराया
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| अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति. के आजीवन सदस्य की प्रतिक्रियायें |
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Wed 12/29/2021 11:24 PM
प्रिय मित्रों,
आशा करता हूँ कि आप सभी सपरिवार कुशल हैं ।
शुभकामना करता हूँ कि नया वर्ष आप सब के लिए मंगलमय हो , आप स्वस्थ रहें, सुखी रहें।
ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मानव समाज को कोरोना, climate change जैसी विकट समस्याओं से सामूहिक रूप से निपटने की सुबुद्धि और क्षमता दें।
शुभेच्छु,
मनोज चौधरी
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On Jun 2, 2021, at 7:32 PM
आदरणीया सुशीला जी,
ईमेल के लिये बहुत धन्यवाद। मैं सपरिवार कुशल हूँ । आशा है आप, समिति के सभी सदस्य, आप सब भी परिवार सहित स्वस्थ और कुशल हैं। बहुत खुश हूँ कि आप सबसे सम्पर्क बना और अ.हि.स. परिवार से पुनः संबंधित हुआ । अ.हि.स. के डेटाबेस में मेरा विवरण बिल्कुल सही है। संयोग की बात है कि कुछ दिन पहले अकस्मात ‘विश्वा’ याद आ गई और बन्धु सुरेंद्र जी को मैंने ईमेल भेजा ।
मैथिली में लिखता हूँ ताकि मातृ भाषा से जुड़ा रहूँ। हिन्दी में भी कभी– कभार लिखता था। स्कूल-कॉलेज की पत्रिकाओं में छिटपुट कुछ प्रकाशन भी हैं । ‘विश्वा’ में भी मैथिली से परिचय के रूप में मेरा एक निबंध छपा था। लेकिन हिन्दी में लिखने का अभ्यास छूट गया है। अब व्याकरण की किसी किताब से परामर्श लेने की जरूरत पड़ जाती है !
आपसे फ़ोन पर बात कर बहुत खुशी होगी|
भवदीय,
मनोज चौधरी
Dr. Manoj K. Choudhary, P.E., F.S.G.T., F. Am. Cer. Soc.
President, MKC Innovations, LLC.
Adjunct Prof. Materials Science & Engineering, The Ohio State University
President, International Commission on Glass (2015-2018)
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| अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की तरफ से भावभीनी श्रधांजलि |
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भावभीनी श्रधांजलि
द्वारा – संध्या अगरवाल
"लता जी का शरीर पूरा हो गया। कल सरस्वती पूजा थी, आज माँ विदा हो रही हैं।
लगता है जैसे माँ सरस्वती इस बार अपनी सबसे प्रिय पुत्री को ले जाने ही स्वयं आयी थीं।
मृत्यु सदैव शोक का विषय नहीं होती। मृत्यु जीवन की पूर्णता है। लता जी का जीवन जितना सुन्दर रहा है, उनकी मृत्यु भी उतनी ही सुन्दर हुई है।
93 वर्ष का इतना सुन्दर और धार्मिक जीवन विरलों को ही प्राप्त होता है। लगभग पाँच पीढ़ियों ने उन्हें मंत्रमुग्ध हो कर सुना है, और हृदय से सम्मान दिया है।
उनके पिता ने जब अपने अंतिम समय में घर की बागडोर उनके हाथों में थमाई थी, तब उस तेरह वर्ष की नन्ही जान के कंधे पर छोटे-छोटे चार बहन-भाइयों के पालन की जिम्मेवारी थी। लता जी ने अपना समस्त जीवन उन चारों को ही समर्पित कर दिया। और आज जब वे गयी हैं तो उनका परिवार भारत के सबसे सम्मानित प्रतिष्ठित परिवारों में से एक है। किसी भी व्यक्ति का जीवन इससे अधिक सफल क्या होगा?
भारत पिछले अस्सी वर्षों से लता जी के गीतों के साथ जी रहा है। हर्ष में, विषाद में, ईश्वर भक्ति में, राष्ट्र भक्ति में, प्रेम में, परिहास में... हर भाव में लता जी का स्वर हमारा स्वर बना है।
लता जी गाना गाते समय चप्पल नहीं पहनती थीं। गाना उनके लिए ईश्वर की पूजा करने जैसा ही था। कोई उनके घर जाता तो उसे अपने माता-पिता की तस्वीर और घर में बना अपने आराध्य का मन्दिर दिखातीं थीं। बस इन्ही तीन चीजों को विश्व को दिखाने लायक समझा था उन्होंने। सोच कर देखिये, कैसा दार्शनिक भाव है यह... इन तीन के अतिरिक्त सचमुच और कुछ महत्वपूर्ण नहीं होता संसार में। सब आते-जाते रहने वाली चीजें हैं।
कितना अद्भुत संयोग है कि अपने लगभग सत्तर वर्ष के गायन कैरियर में लगभग 36 भाषाओं में हर रस/भाव के 50 हजार से भी अधिक गीत गाने वाली लता जी ने अपना पहले और अंतिम हिन्दी फिल्मी गीत के रूप में भगवान भजन ही गाया है। 'ज्योति कलश छलके' से 'दाता सुन ले' तक कि यात्रा का सौंदर्य यही है कि लता जी न कभी अपने कर्तव्य से डिगीं न अपने धर्म से! इस महान यात्रा के पूर्ण होने पर हमारा रोम-रोम आपको प्रणाम करता है लता जी।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की तरफ से हमारे आजीवन सदस्य
डॉ० महेंद्र टंडन को श्रधांजलि |
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डॉ. महेंद्र टंडन अ. हि. स..के आजीवन सदस्य एवं उत्तर पूर्व शाखा के पूर्व अध्यक्ष भी थे।
जनवरी २०२२ को गोलोकवासी हो गये। अ. हि. स. परिवार की और से श्रधांजलि।
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| प्रबंध सम्पादक |
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- सुशीला मोहनका
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्यों का अभिवादन है,
यह वर्ष हम सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारत को स्वाधीन होने का ७५ वाँ वर्ष हैं, भारत सरकार ने इस वर्ष अमृत महोत्सव मनाने की धोषणा की है।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) की इस बढ़ती हुई तीसरी लहर के प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
इस सत्र की विशेष सूचनायें :-
जनवरी २०२२ के मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान
हुआ है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला प्रारम्भ की गयी है जिसके माध्यम से युवावर्ग अपनी लेखनी में निखार ला सकेंगे। इस समिति के संयोजक डॉ. राकेश कुमार, इंडियाना शाखा के अध्यक्ष हैं। ‘जागृति’ की दूसरी कड़ी १२ मार्च २०२२ को दिन में ११:०० बजे से अमेरिका में और १२ मार्च २०२२ को शाम ९.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगा। सभी से नम्र निवेदन है कि इस पुनीत कार्य में अपनी भागीदारी निभाएं। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि अपने यहाँ के हिन्दी प्रेमियों तक अ.हि.स. द्वारा १२ मार्च २०२२ को होनेवाले कार्यक्रम की सूचना दें। यह आपका पावन कर्तव्य और समय की माँग भी है।
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