DECEMBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
दिसम्बर 2023, अंक ३० | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ और ईश्वर से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करते हैं कि आप और आपका परिवार स्वास्थ्य रहें। मैं अध्यक्षा श्रीमती डॉक्टर शैल जैन को हार्दिक शुभकामनायें देती हूँ कि नववर्ष से अपना कार्य सुचारू रूप से पूर्ण सफलता के साथ करे।
पिछले दो वर्षों में आप सभी के समर्थन, स्नेह और आशीर्वाद से मैंने पूर्ण निष्ठा के साथ अपनी सेवायें प्रदान की हैं और आने वाले समय में भी अपनी सेवाएँ प्रदान करती रहूँगी। मैं नयी समिति, न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति, और स्वयं सेवक सहित सभी को शुभकामनाएँ देती हूँ कि आप सभी समिति के कार्य को शिखर तक ले जाए। २०२२ में हमने जागृति कार्यक्रम चालू किया था, जिसमें सुरेन्द्र नाथ तिवारी जी, श्रीमती पूजा और राकेश कुमार जी ने बड़े ही अच्छे ढंग से कार्यक्रम को सफलता पूर्वक पूर्ण किया।
उत्तरी कैरोलिना की अध्यक्ष श्रीमती प्रिया भारद्वाज द्वारा स्थापित युवा समिति का कार्य बहुत ही सफ़लता पूर्वक चल रहा है।इनके सारे कार्यक्रमों युवाओं को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं।
२०२३ अ.हि.स. का द्विवार्षिक अधिवेशन इंडियाना में बहुत सफल रहा और राकेश जी ने अधिवेशन का संचालन युवाओं से कराया जो कि बहुत ही सराहनीय रहा। राकेश जी और उनकी कार्यसमिति को बहुत-बहुत आभार देती हूँ।
हमारा ऑनलाइन हिन्दी का शिक्षा का कार्यक्रम है, उसका सभी छात्रों ने बहुत लाभ उठाया और इस ऑनलाइन के कार्यक्रम को बहुत ही परिश्रम कर पूर्वावाध्यक्ष अजय चड्ढा और उनकी कार्यसमिति ने बनाया था, उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद।
आलोक मिश्रा जी और स्वप्न धैर्यवान जी हर वर्ष काफ़ी समय और परिश्रम निकालकर टैक्स का कार्य करते हैं, वह बहुत ही सराहनीय है और हमारी हिन्दी समिति और से बहुत-बहुत आभार व्यक्त करती हूँ।
अंत में मैं समिति, न्यासी समिति और सम्पादकीय समिति और स्वयं सेवक सहित सभी को सहृदय धन्यवाद देती हूँ, जो निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप इस ईमेल: anitagsinghal@gmail.com के माध्यम से और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -अध्यक्षा
(२०२२-२०२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
आभासी हास्य कवि सम्मेलन - विश्व हिन्दी दिवस उत्सव
रविवार, 14 जनवरी, 2024
इंडियाना शाखा द्वारा आयोजित
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कृपया 14 जनवरी, 2024 के आभासी हास्य कवि सम्मेलन के लिए अपना कैलेंडर चिह्नित करें।
विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ तब से ही इस दिन को 'विश्व हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
रविवार, 14 जनवरी, 2024
USA/Canada: 11:00 -12:30 AM EST; 10:00 - 11:30 AM CST; 08:00 - 09:30 AM PST
India: 09:30-10:30 PM IST
कृपया हास्य कवि सम्मेलन का आनंद लेने के लिए नीचे दिए गए किसी एक लिंक पर क्लिक करें।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
https://fb.me/e/16qDfAlrI
https://www.facebook.com/indyiha
https://www.youtube.com/watch?v=NV4N6LPhDhw
https://www.youtube.com/watch?v=ERdygO4fkmY
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया 317-249-0419 या ihaindiana@gmail.com पर संपर्क करें।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तरपूर्व ओहियो शाखा आगामी कार्यक्रम
विश्व हिन्दी दिवस उत्सव
रविवार, 14 जनवरी, 2024 ( 4.00 PM -7.00 PM )
शिव विष्णु टेम्पल , क्लीवलैंड, ओहियो
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Dear friends
International Hindi Association, in cooperation with Shiva Vishnu Temple in Parma, is celebrating Vishwa Hindi Diwas on January 14th, 2024, at Shiva Vishnu Temple in Parma, Ohio.
This event is free to attend, but we ask everyone to RSVP so we can plan for the event properly. It will be a fun-filled evening with music, dance, drama, etc., highlighting our Indian culture and respect for Hindi-on-Hindi Diwas. All presenters are very talented individuals of all ages from our local communities. Please take a look at the attached flyer for details of our annual Hindi Diwas event.
Please feel free to forward this email to your Hindi-loving friends and families. We are looking forward to seeing you all.
Event details and RSVP information are in the Flyer attached below. Please make sure you RSVP for food.
Click here to RSVP or copy and paste this link into the web browser https://bit.ly/3NCx93y
If you have any questions or need additional information, please call us.
Thank you,
Regards,
Ashwani Bhardwaj, Elected President for 2024 – 2025
and the team of NE Ohio Chapter of IHA
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के कार्यक्रमों की रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
डायवर्सिटी समूह, मेडिना, ओहियो में शामिल
स्थान: ब्रंसविक, ओहायो लाइब्रेरी, 6 दिसंबर, 2023
समय: शाम 6:30 से 7:30
पैनल चर्चा -- शीतकालीन अवकाश परंपराएँ
द्वारा:डॉ. शैल जैन (अ.हि.स., उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा)
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चर्चा का विषय :
अपनी संस्कृति की शीतकालीन छुट्टियों और परंपराओं को कैसे मनाते हैं।
पाँच प्रस्तुतकर्ताओं में से प्रत्येक ने अपनी परंपराओं की 10 मिनट की प्रस्तुति दी:
1) हनुक्का (प्रस्तुतकर्ता - एईएन हैबरमैन) - हनुक्का (चानुका) यहूदियों का आठ दिवसीय, शीतकालीन "रोशनी का त्योहार" है, जो रात्रिकालीन मेनोराह रोशनी, विशेष प्रार्थनाओं और तले हुए खाद्य पदार्थों के साथ मनाया जाता है।
2) क्वान्ज़ा (प्रस्तुतकर्ता- डॉ जे. पी. पोर्टिस ) - क्वानज़ा एक अफ़्रीकी अमेरिकी और पैन-अफ़्रीकी अवकाश है, जो हर साल 26 दिसंबर से 1 जनवरी तक आयोजित किया जाता है, जो इतिहास, मूल्यों, समुदाय और संस्कृति का जश्न मनाता है। पश्चिम और दक्षिणपूर्व अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों से अफ्रीकी फसल उत्सव परंपराओं के आधार पर, क्वानजा का समापन करमू नामक एक सामुदायिक दावत में होता है जो आमतौर पर छठे दिन आयोजित किया जाता है।
3) दिवाली (प्रस्तुतकर्ता - किरण खेतान, अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा की अध्यक्ष) - दिवाली, हिंदू रोशनी का त्योहार, भारत का वर्ष का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण अवकाश है, हिंदू महीने के दौरान हर शरद ऋतु में 5 दिनों तक चलने वाला त्योहार है। कार्तिक दिवाली आध्यात्मिक "अंधकार पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की और अज्ञान पर ज्ञान की जीत" का प्रतीक है। यह त्योहार दावत से लेकर आतिशबाजी तक कई अलग-अलग तरीकों से जश्न मनाने के लिए एक साथ लाता है।
4) यूके में क्रिसमस (प्रस्तुतकर्ता- कारमेन क्रोघान ) - यूके में क्रिसमस, जश्न मनाने के विभिन्न तरीकों जैसे कि फादर क्रिसमस, रानी का भाषण, क्रिसमस पटाखे, और बहुत कुछ पर चर्चा कर रहे हैं!
5) शीतकालीन संक्रांति (प्रस्तुतकर्ता- कैंडिस ग्लेभ ) - शीतकालीन संक्रांति, जिसे हाइबरनल संक्रांति भी कहा जाता है, तब होता है जब पृथ्वी का कोई भी ध्रुव सूर्य से दूर अपने अधिकतम झुकाव पर पहुंच जाता है। पूरे इतिहास में, दुनिया भर के समाजों ने शीतकालीन संक्रांति, "सूर्य के पुनर्जन्म" के दिन को चिन्हित करते हुए त्योहारों और समारोहों का आयोजन किया है। अक्सर, शीतकालीन संक्रांति समारोहों में जीवन, मृत्यु, उगते सूरज और चंद्रमा के साथ-साथ आग और प्रकाश के प्रतीकवाद का सम्मान किया जाता है।
पूरे सत्र के दौरान श्रोता जुटे रहे। प्रस्तुति के बाद 15-20 मिनट का प्रश्नोत्तरी दौर चला। प्रस्तुति के बाद अ.हि.स. सदस्यों के सौजन्य से भारतीय नाश्ता परोसा गया। डायवर्सिटी ग्रुप के मेम्बर्स के साथ थीं डायवर्सिटी ग्रुप चेयर पैमला मिलर। डायवर्सिटी ग्रुप का अनोखा दृष्टिकोण वास्तव में अच्छा था और सभी ने इसकी सराहना की। हमारी विविधतापूर्ण दुनिया में यह विभिन्न समूहों को एक साथ लाने और प्रकाश, पारिवारिक सभा, प्रार्थना और अच्छे भोजन के साथ उत्सव में समानता के ज्ञान का विस्तार करने का एक दृष्टिकोण था।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तरपूर्व ओहायो शाखा सदस्य, प्रस्तुति कर्ता और
डायवर्सिटी समूह चेयर पैमेला मिलर
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REPORT IN ENGLISH
IHA NE Ohio chapter joins Medina Diversity group on December 6, 2023
Place Brunswick, Ohio Library
Winter Holiday Traditions Panel Discussion at 6:30 PM - 7:30PM
Various Members of the community discussed how they celebrate their culture's winter holidays and traditions. Five presenters each had 10 mnts presentation of their traditions :
1 ) HANUKKAH -- (Presenter- Ian Haberman )- Hanukkah (Chanukah) is the Jewish eight-day, wintertime “festival of lights,” celebrated with a nightly menorah lighting, special prayers and fried foods.
2 ) KWANZAA --- (Presenter - Dr. J. P. Portis )- Kwanzaa is an African American and Pan-African holiday, held annually from December 26th through January 1st, that celebrates history, values, community and culture. Based on African harvest festival traditions from various parts of West and Southeast Africa, Kwanzaa culminates in a communal feast called Karamu that is usually held on the 6th day.
3 ) DIWALI ---(Presenter- Kiran Khaitan, President NE Ohio chapter of IHA ) ---Diwali, the Hindu Festival of Lights, is India’s biggest and most important holiday of the year, a 5-day long festival every Autumn during the Hindu month of Kartik. Diwali symbolizes the spiritual “victory of light over darkness, good over evil, and knowledge over ignorance.” The festival brings people together in many different ways, from feasting to fireworks.
4 ) CHRISTMAS IN UK ---(Presenter- Carmen Croghan)- Christmas in the UK, discussing the different ways to celebrate such as Father Christmas, the Queen's Speech, Christmas crackers, and more!
5 ) THE WINTER SOLSTICE ---(Presenter- Candyce Glave )- The winter solstice, also called the hibernal solstice, occurs when either of Earth's poles reaches its maximum tilt away from the Sun. Throughout history, societies across the world have held festivals and ceremonies marking winter solstice, the day of the “sun’s rebirth.” Most often, winter solstice celebrations honored the symbolism of fire and light, along with life, death, the rising sun, and the moon.
Audience were engaged during entire session. The presentation was followed with 15-20 mnts period of question and answer. After presentation Indian snacks was served, courtesy of IHA members. With diversity group was Medina Diversity Project chair Pamela Miller. The unique approach of Diversity group was really good and appreciated by all. In our Diverse world this was an approach to bring together different groups and extend the knowledge of similarity in celebration with light, family gathering, praying and good food.
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डॉ. रामगोपाल भारतीय को बधाई
भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम
10 दिसंबर 2023 , पंचशील आश्रम, करनाल रोड, दिल्ली, भारत
डॉ. रामगोपाल भारतीय - डॉ. अंबेडकर नेशनल अवार्ड 2023 से सम्मानित
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10 दिसंबर 2023 को पंचशील आश्रम, करनाल रोड, दिल्ली में भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित 39वें सम्मान वितरण समारोह में मेरठ के साहित्यकार व दलित चिंतक डॉ. रामगोपाल भारतीय को डॉ. अंबेडकर नेशनल अवार्ड 2023 से सम्मानित किया गया।
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डॉ. रामगोपाल भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के आजीवन सदस्य और उपाध्यक्ष हैं। पिछले 40 वर्षों से सतत साहित्य सृजन कर रहे हैं। उनके लेखन में आम आदमी की पीड़ा है। समाज के दबे कुचले लोगों की मूक अभिव्यक्ति को उन्होंने अपने गीतों, गजलों में जुबान दी है।यह सम्मान उन्हे दलित साहित्य में योगदान के लिए संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर, कार्यक्रम सभापति पूर्व मंत्री व समाजसेवी श्री रेवती शरण मौर्य तथा मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा साहित्यकार डॉ. सत्य नारायण जटिया द्वारा प्रदान किया गया। ज्ञातव्य हो कि इस वर्ष संस्था ने पूरे देश से दस लोगों को नेशनल अवार्ड के लिए चुना है जिन्होंने समाज, साहित्य, कला, शिक्षा, चिकित्सा तथा कानून के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है। उत्तर प्रदेश से डॉ. भारतीय इस सम्मान के लिए चुने जाने वाले एक मात्र साहित्यकार है। सम्मेलन में देश विदेश से आए हजारों समाज सेवियों की उपस्थिति में यह सम्मान दिया गया। सम्मेलन में देश के लगभग सभी प्रदेशों के अलावा नेपाल, भूटान, कनाडा, मॉरिशस, थाईलैंड, जापान आदि से बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित थे।
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डॉ. रामगोपाल भारतीय - डॉ. अंबेडकर नेशनल अवार्ड 2023 से सम्मानित ***
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द्वारा - प्रो० अनिल कुमार,
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प्रो० अनिल कुमार, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार से 2016 में प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष के रूप में अवकाश प्राप्त हैं। विज्ञान के विद्यार्थी होते हुए भी हिंदी से लगाव है और हमेशा कार्यरत हैं।
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मैया यशोदा
नमस्कार, मैं सुगंधा माथुर, डॉ मुकेश माथुर और डॉ महक माथुर की बेटी हूँ, मेरा जन्म राँची में हुआ था, मगर आजकल मैं पढ़ाई के सिलसिले में स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबर्ग, जिसे एडिनबरा भी कहते हैं, में रह रही हूँ; यहाँ मैं बिजनेस स्टडीज में एम० एस० की छात्रा हूँ। मेरी आखिरी सेमेस्टर की परीक्षा सम्पन्न हो चुकी है, अब थोड़े दिनों के लिए घर जाऊँगी, वर्तमान में मेरे मम्मी-पापा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते हैं, अब वही मेरा घर है। मेरे पिता एक बड़े प्रतिष्ठित और कामयाब डॉक्टर हैं जिनका रायपुर के अतिरिक्त बिहार के दो बड़े शहरों में खुद का अस्पताल है। वहाँ लगभग एक माह रह कर मैं वापस आ जाऊँगी, क्योंकि मेरा एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में प्रशिक्षु (Trainee) के रूप में चुनाव हो चुका है। मैं तो भारत में ही मम्मी-पापा के साथ रहना चाहती हूँ, पर पता नहीं क्यों वे ऐसा नहीं चाहते; वे चाहते हैं कि मैं इसी देश की नागरिकता ले लूँ; है न कुछ अजीब सी बात, विशेष तौर पर तब जब मैं उन लोगों की एक मात्र बेटी हूँ और दूसरा कोई भाई भी नहीं है मेरा। मेरा बॉय-फ्रेंड रोहित अकसर कहता है – क्या उनकी यह ख्वाहिश तुम्हें कुछ अजीब नहीं लगती? आइए लगे हाथ रोहित के बारे में भी बता दूँ, वह बिजनेस कॉलेज में मेरा सीनियर था, उसकी माँ ईरानी मूल की है और पिता भारतीय; एक की खूबसूरती और दूसरे का तेज दिमाग, ये दो दुर्लभ गुण उसे एक साथ उनसे ही मिले हैं।
मैं अभी सो ही रही थी कि तड़के सुबह मेरे टेलीफोन की घंटी बजने लगी, अब ऐसे वक्त कौन फोन कर सकता है? उठाया तो उधर से माँ के रोने की आवाज मिली, “बेटी, तुरत आ जा, तेरे पापा को दिल का दौरा पड़ा है, स्थिति बेहद गंभीर है, आई० सी० यू० में जाने के पहले इतना ही कह पाए, मेरी बेटी को बुला दो, जाने के पहले एक बार उससे मिलने चाहता हूँ। मम्मी की बातें सुन मैं भी रो पड़ी, फिर अपने को संभाला और यथासंभव जल्द पहुँचने का वादा किया। ऐसे समय में रोहन ही याद आनी स्वाभाविक थी, मैंने उसे सारी बातें बताई और कहा, “जैसे हो, मुझे अगली फ्लाइट से दिल्ली का टिकट चाहिए, कुछ भी करो प्लीज, टिकट बुक करो और जरूरत हुई तो मुझे लंदन तक पहुँचाओ। रोहन ने मुझे सांत्वना दी और तुरत काम में जुट गया, केवल पंद्रह मिनट बाद उसका फोन आया, “सब हो गया, तुम अपना बैग पैक करो, बस जरूरत भर समान लो और एयरपोर्ट पहुँचो, मैं तुम्हारा टिकट लेकर आता हूँ; हाँ पासपोर्ट लेना मत भूलना; पैसे हैं या कुछ लेते आऊँ?”
मैं जब एयरपोर्ट पहुँची तो रोहन को इंतजार करता पाया, मैं रोते हुए उससे लिपट गई; मुझे साथ ले वह चेक-इन-काउन्टर की तरफ बढ़ चला। चलते हुए वह समझाता भी जा रहा था, “देख, घबराने की कोई बात नहीं, सब ठीक होगा; जब तक जरूरी हो वहीं रुकना, मैं यहाँ सब संभाल लूँगा।” मैंने रोते हुए ही टिकट के पैसे के बारे में पूछा तो उसने मुझे डांट दिया, “ये सब बातें तेरे लौटने के बाद करेंगे, पाज़िटिव माइन्ड-सेट के साथ जा, अंकल-आंटी का ध्यान रख और जब तक सब ठीक न हो जाए तुझे आने की कोई जरूरत नहीं।” प्रव्रजन पदाधिकारी तक पहुँचने के बाद उसे रुकना पड़ा, उसके आगे तो वह जा नहीं सकता था। फिर सारी औपचारिकता पूरी करते हुए मैंने एडिनबर्ग-लंदन-दिल्ली-रायपुर की यात्रा सम्पन्न की, दिल्ली से ही माँ को अपने आने की सूचना दे दी थी, रायपुर के एयरपोर्ट पर हमारा ड्राइवर गाड़ी लिए इंतजार करता मिला; साहब स्थिर (Stable) हैं, चिंता की कोई बात नहीं है बेबी; मैं समझ रही थी यह सब मुझे दिलासा देने के लिए कहा जा रहा था। अस्पताल पहुँचते मैं आई० सी० यू० की ओर दौड़ी, मुझे किसी ने रोका नहीं क्योंकि सब मुझे पहचानते थे; माँ वहीं खड़ी मिली। “मुझे पापा को देखना है, अभी तुरत।” एक डॉक्टर साथ लेकर आई० सी० यू० तक गए, आवश्यक सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ मुझे पापा के केबिन में ले जाया गया, पापा होश में थे, मुझे देखा तो मुसकुराये और हाथ हिलाया जैसे अलविदा कह रहे हों. बात करने की स्थिति तो थी नहीं, मुझे अपनी नजरों से एकटक देखते रहे और दो मिनट बाद ही अपनी आँखें सदा के लिए मूँद ली। लगा, जैसे वे केवल अपनी बेटी को एक आखिरी बार देखने के लिए ही रुके थे।
हम पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, अब हमें इस नई परिस्थिति का सामना करना था जिससे हम पूरी तरह अपरिचित थे। मेरे पापा ने बिहार से लेकर छत्तीसगढ़ तक एक छोटा-मोटा साम्राज्य ही बना रखा था, वे अपने प्रैक्टिस में व्यस्त रहते और माँ बाकी चीजें सँभालती, अस्पताल तो वह केवल नाम के लिए जाती थी। इस आर्थिक साम्राज्य पर हमें अपने पारिवारिक वकील के साथ बैठ कर विचार विमर्श तो करना ही पड़ेगा, पर फिलहाल माँ को सँभालना मेरी प्राथमिकता थी, और इसके लिए अपने दुख को भूल उनके साथ जुड़ना आवश्यक था, मैंने वही किया. पापा की इच्छानुसार हमने उनका अंतिम संस्कार किया, गायत्री परिवार से संपर्क कर हमने सारी औपचारिकता तीन दिनों में पूरी की. अब बारी थी माँ के साथ संवाद करने की, जो पापा के असमय चले जाने से इतनी व्यथित थी कि उसके मुँह पर चुप्पी का ताला लग गया था। माँ जब दुख से थोड़ी उबरी तो एक शाम मैं उससे बात करने के लिए उसे उसके बेड रूम ले गई, अंदर से दरवाजा बंद किया और फिर शुरू हुआ माता-पुत्री संवाद. वैसे मुझे एक व्यक्तिगत बात भी करनी थी, जो पिछले दस दिनों से मेरी मानसिक अशान्ति का कारण बना हुआ था। शुरुआत मैंने ही की, “मम्मी, अब हमें बदली हुई परिस्थिति पर विचार करना होगा, दूसरा तो कोई है नहीं जिससे हम कुछ दिशा निर्देश लें या जो हमें सही सुझाव दे। मगर उसके पूर्व एक मेरी व्यक्तिगत समस्या, जो मैं अपनी परीक्षा में व्यस्त रहने के कारण तुम से साझा नहीं कर पाई थी।” माँ चौकन्नी हो गई, उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच गई, “क्या हुआ तुझे, रोहन के साथ सब कुछ ठीक तो है?” “मम्मी, ऐसा कुछ भी नहीं है, मगर समस्या है, और वह है एक सपने से जुड़ी जिसे मैं पिछले दस दिनों से लगातार देख रही हूँ; ऐसा लगता है जैसे उसके पीछे कोई बड़ा भेद छुपा है।” माँ के मुँह पर थोड़ी सी मुस्कान आई, “सपनों का क्या, ये तो आते रहते हैं, मेरे एक प्रोफेसर मित्र ने बताया था कि मनुष्य सामान्य स्थिति में लगभग पूरी रात सपने देखता है, पर जब नींद गहरी न हो तो उस समय देखे सपने याद रह जाते हैं, तेरे साथ भी यही हो रहा होगा, परीक्षा के तनाव से तेरी नींद पूरी नहीं हो रही .... ” मैंने माँ को बीच में ही रोका, “नहीं मम्मी, मेरा सपना कुछ अजीब सा है जो शायद किसी पूर्व अथवा भावी घटना की पर इशारा करता है, या संभवतः कोई आत्मा मुझ से संपर्क करना चाहती है।” इतना सुनते माँ संभल कर बिछावन पर बैठ गई; उनकी आँखों में एक विचित्र भाव थे, “मम्मी, मैं सपने में एक सुनसान सड़क देखती हूँ जो शायद किसी जंगल के बीच से गुजरती है, मैं उसी सड़क पर जा रही हूँ।
अचानक मुझे खून से लथपथ, हाथ में एक छोटी सी बच्ची लिए महिला दिखती है जो एक कार से उतरी दूसरी महिला से उसकी बच्ची को बचाने की मिन्नतें करती मालूम पड़ती है, न उनका चेहरा स्पष्ट है और न उनकी बातें। उससे थोड़ी दूर सड़क किनारे एक बुरी तरह क्षतिग्रस्त कार दिखती है जिसके चालक सीट पर कोई पड़ा है जो शायद मर चुका है,” मेरे इतना कहते कमरे में सन्नाटा छा गया, माँ असहज हो गई और चेहरे पर तनाव आ गया; थोड़ी देर पूर्व मुझे सपनों का अर्थ समझाने वाली मम्मी ने तेज आवाज में पूछा, “और कुछ देखा तुमने?” “क्यों माँ, कुछ ऐसी बात है क्या जो इस सपने से जुड़ी है और तुम जान रही हो पर मुझे बतलाना नहीं चाहती? हाँ, एक बात और, इसके बाद अचानक दृश्य बदलता है और मुझे एक अस्पताल दिखता है – अस्पताल की बात तो मैं समझ सकती हूँ माँ, क्योंकि बचपन से ही मैंने यही देखा और जाना है, पर वह क्षतिग्रस्त कार, घायल महिला और छोटी सी बच्ची?” माँ ने मेरी बातों को अनसुना करते हुए पूछा, “एक बार फिर अच्छी तरह सोच कर बता, कैसी थी वह औरत, और कैसी थी उसकी बेटी, उसके मृत पति का चेहरा देखा तुमने? यह सपना कब से आ रहा है, क्या वह तुझ से कुछ कहने की भी कोशिश कर रही थी?” “तुम ऐसे प्रश्न क्यों पूछ रही हो माँ, उसका मुझ से या हमारे परिवार से क्या संबंध है? मुझे उसका या उसकी बेटी का चेहरा तो नहीं दिखा, पर ऐसा लगा जैसे वह मेरा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना और कुछ कहना चाहती हो; कौन है वह माँ?” मम्मी थोड़ी देर चुप रही, अचानक उसके रोने की आवाज मिली, “वही है, मैं समझ गई, वह तुझे देखना चाहती थी, इसी कारण प्रति दिन तेरे सपने में आती रही है।” “माँ, प्लीज पहेलियाँ मत बुझाओ, साफ-साफ बताओ पूरा माजरा क्या है?” फिर लंबी चुप्पी, मम्मी उठी, बिना कुछ बोले वाश रूम में घुस गई, उसे अंदर से बंद कर लिया और फिर उसके रोने की तेज आवाज आने लगी। मैं डर गई, ये सब कुछ किसी प्रकार की परामनोवैज्ञानिक घटना की ओर इशारा तो नहीं, किसी आत्मा वगैरह का चक्कर है क्या? मैं इतना डर गई कि खुद रोने लगी और वाश रूम का दरवाजा पीटने लगी, “माँ, बाहर आओ, मुझे बहुत डर लग रहा है माँ।” मेरा रोना सुनकर माँ ने दरवाजा खोला, आँखें पोंछती बाहर आई और मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया, “नहीं मेरी बच्ची, तुझे कुछ नहीं हुआ है, गलती मेरी है, मुझे तुझ से सब कुछ पहले ही बता देना चाहिए था, तेरे पापा हमेशा मुझे कहते रहते थे पर मैं तुझे खो देने के डर से बात टालती रही। उनके जाने के बाद इसे टालना अब असंभव है, आज मैं तुझ से एक अत्यंत गोपनीय बात बताने जा रही हूँ, मुझे पता नहीं इसे जानकार तेरी क्या प्रतिक्रिया होगी, तू अपनी माँ से कहीं घृणा न करने लगे।” “माँ, तुमने मुझे जन्म दिया है, पापा के जाने के बाद तुम एकमात्र इंसान हो जिससे मेरा खून का रिश्ता है, मैं तुमसे कैसे घृणा कर सकती हूँ; प्लीज, अब जो कहना है जल्द बताओ, मेरे हृदय की धड़कन बढ़ती जा रही है, कुछ अनिष्ट न हो जाए।” मम्मी ने आँखें पोंछी, एक गहरी साँस ली और कहना शुरू किया; मैं वह सब कुछ आप से, अपने पाठकों से, संक्षेप में साझा करूँगी। अब माँ के शब्दों में -यह कहानी पच्चीस वर्ष पुरानी है, तब हम राँची में रहते थे, तेरे पापा का बहुत बड़ा अस्पताल था और पूरे शहर में उनकी काबिलीयत की चर्चा थी। गणमान्य नागरिकों, उच्च पदाधिकारियों और राजनेताओं की माँग पर हमें हजारीबाग में भी अपने अस्पताल की एक शाखा खोलनी पड़ी। हम महीने के पंद्रह दिन राँची में गुजारते और दस दिन हजारीबाग में; शेष पाँच दिन बड़ी मुश्किल से हमें छुट्टी मिलती, वह भी तब जब हम कहीं बाहर निकल जाते। एक दिन काम के दवाब में हजारीबाग से निकलने में देर हो गई, वैसे तो दोनों शहरों के बीच की दूरी दो सौ किलोमीटर से कम ही है और राष्ट्रीय मार्ग 20 (NH20) से यह दूरी सुविधा पूर्वक तय की जाती है, मगर एक समस्या है, दोनों स्थानों के बीच तीन टुकड़ों में विभक्त लगभग साठ किलोमीटर का लंबा जंगल। दिन में यह यात्रा जितनी सुहानी होती शाम होते उतनी ही भयानक लगती; पूरा हिस्सा वीरान हो जाता, मात्र एक दो स्थानों पर लाइन होटल और कुछ दुकानों को छोड़ अन्यत्र कहीं कोई दिखता भी नहीं। हमने ईश्वर का स्मरण किया और उसी भरोसे तेरे पापा ने अपनी गाड़ी एन एच 20 पर मोड़ दी; आज गाड़ी तेरे पापा ही चला रहे थे क्योंकि कुछ व्यक्तिगत कारणों से हमारा ड्राइवर नहीं आ सका था। हजारीबाग से मोरंगी तक की यात्रा तो आराम से तय हो गई, पर उसके बाद अंधेरा बढ़ने लगा, वर्षा शुरू हो गई और जंगल का पहला हिस्सा भी। रात होते मोरंगी के बाद यात्रियों के साथ लूटपाट और मारपीट तो सामान्य घटना मानी जाती थी। कहते हैं इस क्षेत्र में अंदर नक्सलियों के अड्डे थे, कभी-कभी यात्री उनके आतंक के शिकार भी हो जाते थे। पापा तो गाड़ी चलाने में व्यस्त थे, मैं मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थी। किसी तरह हमने मोरंगी से चरही तक की 11 किलोमीटर की दूरी जंगल के बीच तय कर ली, तब मन को थोड़ी शांति मिली।
अभी तो दो बड़े सघन वन क्षेत्र आने वाले थे; पहले मांडू से बोंगाबर, लगभग 17 किलोमीटर का लंबा टुकड़ा, और फिर पिंकी से ओरमाँझी 25 किलोमीटर का विस्तार। ईश्वर की कृपा थी या कोई चमत्कार, इतने बुरे मौसम में भी बोंगाबर तक की यात्रा बिना किसी परेशानी कट गयी। फिर हम पिंकी से आगे बढ़े, शायद 17-18 किलोमीटर की दूरी हम ने तय की होगी कि सामने खून सर्द करने वाला दृश्य दिखा; खून में लथपथ एक नौजवान औरत, गोद में एक नवजात शिशु लिए गाड़ी रोकने की प्रार्थना कर रही थी. उन दोनों की हालत देख तुम्हारे पापा ब्रेक लगाने को मजबूर हो गये; तेज ब्रेक लगाने के कारण कार के चारों टायर चीखते हुए उससे मात्र एक मीटर की दूरी पर रुक पाए. हम ने खिड़कियों का शीशा चढ़ा रखा था इस कारण उसकी आवाज तो हम तक पहुँच नहीं पा रही थी पर उसकी भाव-भंगिमा बात रही थी कि वह अपने बच्चे का वास्ता देकर सहायता की गुहार लगा रही थी। डरते हुए मैंने अपनी तरफ का दरवाजा खोला, उसके करीब पहुँची तब मैंने महसूस किया कि वह बुरी तरह घायल थी, उसे खड़े रहने में भी परेशानी हो रही थी। इसी बीच पापा भी चालक सीट से उतर उसके पास आ चुके थे, उसने बेहद कमजोर आवाज में अनुनय की, “कृपया मेरी बच्ची को जितनी जल्दी हो सके किसी अस्पताल में पहुँचा दीजिए, कम से कम उसकी जिंदगी तो बच जाएगी।” तेरे पापा ने कार का पिछला दरवाजा खोल उसे बैठने का इशारा किया, मगर उस ने सर हिला कर मना कर दिया, “नहीं, आप केवल मेरी बच्ची की जिंदगी बचा लें, मुझे तो अपने शौहर के लिए सहायता पहुँचने तक यहीं रुकना होगा।” इसी के साथ उसने सामने एक पेड़ से टकरा कर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी कार की ओर इशारा किया; उसके चालक सीट पर एक व्यक्ति बेजान सा पड़ा था; शायद वही उसका पति था. कार और घायल चालक को देख इनको कहना पड़ा, “देखो, लगता नहीं तुम्हारे शौहर अब जीवित हैं और यहाँ तो कोई मदद मिलने से रही, अतः तुम अपनी बेटी को लेकर हमारे साथ चलो और हम उनको भी जल्द से जल्द ले आने का कुछ इंतजाम करेंगे।”
“नहीं, मैं उन्हें छोड़कर नहीं जा सकती, इस जंगल से निकलते आपको नेटवर्क (Network) मिल जाएगा, आप बस एक एम्बुलेंस की व्यवस्था करवा देंगे प्लीज, तब तक मैं उनके पास ही रहूँगी। हाँ, मेरी बेटी को जितनी जल्दी हो सके किसी अस्पताल तक पहुँचा दें ताकि उसकी जिंदगी बच जाए; वह जीवित रह गयी तो मुझे अपने मरने का भी दर्द नहीं होगा, हमारा अस्तित्व उसी में समाहित हो जाएगा.” ऐसा कहते हुए उसने अपनी बच्ची को मेरी गोद में डाल दिया, “माफ करना आपा, अपनी जिंदगी तुम्हें सौंप कर जा रही हूँ, साथ में ये दो मोबाइल नंबर हैं, एक इसके मामू का और दूसरा इसके चाचू का; इनसे संपर्क कर इसके जीवित रहने की और हमारे मरने की खबर दे देना। संभव है दोनों इसके साथ अपना कोई रिश्ता भी न स्वीकार करें, हम ने दोनों परिवारों की इच्छा के खिलाफ जा कर शादी जो की थी; तब वैसी स्थिति में तुम्ही इसे अपना बना लेना, तुम्हारे बच्चों के साथ इसकी भी परवरिश हो जाएगी।” मैं तो गोद में उस बच्ची को लिए संज्ञा-शून्य खड़ी रही; मेरे दिल का दर्द बाहर चालक पड़ा, “मेरा तो अपना कोई बच्चा भी नहीं है बहन, अतः उन्हें पालने का अनुभव भी नहीं; देखो, तुम साथ चलो, ईश्वर ने चाहा तो तुम बच जाओगी और तुम्हारी बच्ची भी।” मगर उसने हमारे प्रस्ताव को ठुकरा दिया, “नहीं, बस इसे बचा लीजिए, बड़ा उपकार होगा।” फिर मेरी तरफ मुखातिब हो उसने इतना ही कहा, “दीदी, आज इसके जन्म के ठीक 3 माह पूरे हुए हैं, आज से यह तुम्हारी बेटी हुई, चाहो तो अपनी गोद में स्थान दो चाहो तो सड़क पर मिली इस अभागन को सड़क पर ही छोड़ दो।” इतना कह कर वह मेरे पास आई और अपनी बेटी को आखिरी बार चूमा; तेरे पापा ने भी झट चालक सीट संभाली और तेजी से हम आगे बढ़ चले, उस बच्ची को बचाना ही अब हमारा लक्ष्य था।
ओरमाँझी पहुँचते नेटवर्क मिला तो तेरे पापा ने संपर्क कर राँची की नगर सीमा पर स्थित एक प्रतिष्ठित अस्पताल को अविलंब दुर्घटना स्थल के लिए एम्बुलेंस भेजने को कहा; शहर के जाने माने चिकित्सक होने के कारण इनके संदेश का तुरत पालन हुआ। हम मुश्किल से पाँच किलोमीटर आगे बढ़े होंगे कि एक एम्बुलेंस तेज गति से घटना स्थल की ओर जाती दिखी; हम भी कुछ मिनट बाद उसी अस्पताल की इमरजेंसी के सामने थे। हमारे पहुँचते डॉक्टर की एक टीम, जो हमारा इंतजार कर रही थी, बच्ची को लेकर तुरत आई० सी० यू० की ओर भागी। पापा जैसे थे उसी स्थिति में उनके साथ हो लिए। मैं बुरी तरह से भीग चुकी थी और कपड़ा बदलना आवश्यक था, एक नर्स की सहायता से इस कार्य को करने के बाद मुझे उस घायल महिला द्वारा दिए गए टेलीफोन नंबर की याद आई, रिसेप्शन पर पहुँच मैंने दोनों नंबर बारी-बारी से मिलाया। पूरी बात बतलाने के बाद दूसरी तरफ से जो प्रतिक्रिया मिली वह चौंका देने वाली थी, एक ने तो बात करने से ही इनकार कर दिया, दूसरे ने बस इतना कहा जब उसकी माँ से हमारा कोई रिश्ता नहीं रहा तो उसकी बच्ची से हमें क्या लेना देना, वह बचे या मरे हमें क्या; और इस मामले में आप मुझे आगे कोई फोन मत करना। मैं संज्ञा शून्य खड़ी रही, इतना अमानवीय कोई कैसे हो सकता है? तभी अंदर से तेरे पापा बाहर आए, “ईश्वर की कृपा से बच्ची बिल्कुल ठीक है, होश में है, डॉक्टर उसकी देखभाल कर रहे हैं; चलो हम दिए गए फोन नंबर पर संपर्क करें और उसके चाचा/मामा को उसके सकुशल होने की सूचना दें। मैं कुछ बोलती उसके पूर्व एम्बुलेंस ने अस्पताल परिसर में प्रवेश किया, हम दोनों उस तरफ दौड़े घायलों कि स्थिति को जानने के लिए। मगर वहाँ घायल कहाँ थे, सामने दो मृत शरीर दोनों सीट पर पड़े थे; साथ गए पुरुष नर्स ने बताया, “सर, इनको मरे तो दो घंटे से ऊपर हो चुके हैं, आश्चर्य है, आपसे पहले भी कई गाड़ियां उधर से आईं, न तो किसी ने दुर्घटना की सूचना दी और न एम्बुलेंस भेजने का आग्रह किया।” हम दोनों पति-पत्नी अपनी जगह जम से गए, ऐसा कैसे हो सकता है, उस घायल महिला ने अपने हाथों मुझे अपनी बेटी सौंपी थी। मैंने यही कहना चाहा, पर तेरे पापा ने मेरा हाथ दबा कर आँखों के इशारे से कुछ भी बोलने से मना कर दिया। मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह सब क्या हो रहा था। मामला दुर्घटना का था, अतः पुलिस को सूचना दी गई और फिर दोनों के मृत शरीर को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया। मैं तो बस उस लड़की के बेड के पास कुर्सी लगाकर बैठ गई और मन ही मन उसके स्वस्थ होने की प्रार्थना करने लगी, साथ ही उस औरत की आखिरी बात याद आने लगी, आपा, इसे अपनी बेटी बना लेना अन्यथा सड़क पर मिली लड़की को सड़क पर ही मरने के लिए छोड़ देना। मैं बहुत मुश्किल से अपने आँसू रोक पा रही थी, तभी तेरे पापा वापस लौटे और बतलाया, हाँ, उन दोनों की मृत्यु दुर्घटना के कारण अभी से दो घंटे पूर्व ही हो गई थी; मगर हम ने तो उसे जीवित देखा था। मैं स्वयं को रोक नहीं सकी और फूट-फूट कर रो पड़ी, मैंने उन से बस इतना ही कहा, “चलो, अब चलते हैं और यह बच्ची तो मेरे साथ ही जाएगी।” उन्होंने मुझे समझाया, “ऐसा नहीं होता, केवल उसकी माँ के कह देने से तुम उसकी कानूनी अभिभावक नहीं बन सकती, और अब तो वह भी जीवित नहीं रही।” “मैं कुछ नहीं जानती, कानून तुम समझो, तुम शहर के इतने बड़े डॉक्टर हो, जो कर सकते हो करो, मगर यह बच्ची अब मेरे साथ ही जाएगी।” वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखें भर आई, सभी एकदम चुप हो गए थे, तेरे पिता ने अस्पताल-अधीक्षक से अकेले में कुछ बातें की और मेरा हाथ पकड़ कार में लगभग घसीट कर ले गए, दरवाजा बंद किया, गाड़ी स्टार्ट की और धीरे से बोले, “मेरा वादा रहा कल शाम तक वह लड़की तुम्हारी गोद में होगी, तुम्हीं उसकी माँ होगी और वह तुम्हारी बेटी; बस मुझे जरूरी कानूनी कार्रवाई पूरी कर लेने दो।”
इतनी बातें कह कर मम्मी चुप हो गई, अब रोने की बारी मेरी थी; माँ ने मुझे अपने आगोश में ले लिया, “मेरी बच्ची, तू भले मेरा खून न हो पर है तू मेरी ही बेटी; हाँ तू चाहे तो तेरे मामा/चाचा की एक बार फिर तलाश कर सकते हैं और तू मुझे रोता छोड़ अपने परिवार के पास जा सकती है; मैं अभागन तो संतानहीन थी ही, वैसे ही रह लूँगी।” “माँ, ऐसे कठोर शब्दों का प्रयोग मत करो, और कैसा चाचा, कैसा मामा, जब पच्चीस वर्षों तक उन्होंने मेरी कोई चिंता नहीं की तो आज वे कैसे मेरा खून बन जाएंगे माँ? और किस ने कह दिया कि तुम अभागन हो, अरे माँ, अगर तू न मिली होती तो शायद मैं अभागन सड़कों पर कहीं भीख माँग रही होती या किसी कोठे पर पहुँचा दी गई होती। “ऐसा मत बोल मेरी बच्ची, तुझे जन्म चाहे किसी ने दिया हो, इस धरती पर तू मेरी ही बेटी बन कर आई है; हाँ, मैं उस माँ को नमन करती हूँ जिसने मुझे इतना प्यारा गिफ्ट दिया। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि तू मेरी कृष्ण कन्हैया है जिसे देवकी-वासुदेव ने जन्म दिया और फिर मैया यशोदा-नन्द बाबा को लालन-पालन के लिए सौंप दिया; तू न होती तो मेरी और तेरे पापा की दुनिया सूनी रह गई होती।”
सामान्य स्थिति में पहुँचने में हम दोनों को थोड़ा वक्त लगा, मगर मेरे मन में एक प्रश्न उठा जिसकी चर्चा मैं अपनी यशोदा मैया के साथ करना चाहती थी, बस डर यह था कि कहीं माँ इसका गलत अर्थ न लगा ले। फिर भी मैंने हिम्मत कर पूछ ही लिया, “मम्मी, बस केवल उत्सुकता वश, मैं जानना चाहती हूँ क्या तुम्हें मेरे जन्म-दाता अर्थात मेरी देवकी माँ और पिता वासुदेव के बारे में कोई जानकारी हासिल हुई थी।” “हाँ बेटी, जैसा मैंने बताया, तेरे पिता शहर के एक विख्यात डॉक्टर थे, उनके बड़े सामाजिक सरोकार थे। जब सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर लेने के बाद उन्होंने तुझे मेरी गोद में अगले दिन शाम में डाला, तो उसी के साथ शहर के पुलिस कप्तान से तेरे परिवार के बारे में सारी जानकारी हासिल कर बताने का आग्रह भी किया; मैंने उस संवाद में इतना ही जोड़ा बस केवल सूचना, अब हम दोनों इसके कानूनी माँ-बाप हैं। दो दिन बाद हमारे पास सारी जानकारी आ गई – तेरी देवकी माँ एक मुस्लिम परिवार से थी और तेरे वासुदेव पिता एक ईसाई समुदाय से आते थे, और तू पल रही थी अपनी मैया यशोदा की गोद में जो हिन्दू थी; मुझे उम्मीद है तुझे इससे कोई परेशानी नहीं होगी।” मैं हँस पड़ी, “किस बात की परेशानी माँ, प्रयागराज में तीन नदियों का मिलन पवित्र त्रिवेणी को जन्म देता है, तूने तो मेरे भीतर तीन धर्मों की त्रिवेणी बहा दी।
हाँ, मुझे अब वह बात समझ में आ गई जो तू अपने कार्यों के माध्यम से बतलाना चाहती थी- प्रत्येक सोमवार को हमारा शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करना, शुक्रवार को हजरत सैयद बाबा की दरगाह पर सजदा करना और रविवार को महावीर नगर के प्रसिद्ध संत टेरेसा चर्च के मास में सम्मिलित होना – यह हमारा नियमित कार्यक्रम हुआ करता था; उस समय छोटी थी, समझ नहीं पाती थी, पर अब उसका मर्म समझी। एक बार मैंने तुझ से इस विषय में पूछा भी था, तेरा जवाब मुझे आज तक याद है माँ, “ये पूजा की विभिन्न पद्धतियाँ है सुगंधा, ईश्वर तो एक ही है, तू जैसे चाहे पूज, पर एक बात सदैव याद रखना मेरी बेटी, उसकी सृष्टि में मनुष्य ही सबसे समझदार प्राणी है, और भाग्यशाली भी, अतः मनुष्य होने की बात कभी मत भूलना; मेरे शब्दकोश में वह इंसानियत का धर्म है।” “हाँ माँ, मैंने इस बात को कभी नहीं भुलाया और मेरा वादा है यह मैं कभी नहीं भूलूँगी। बस एक आखिरी प्रश्न मेरी अम्मा, क्या मेरे जन्म दाताओं को उचित अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ?” “नहीं मेरी बच्ची, तेरे माता-पिता के परिवार ने भले उनकी खोज-खबर न ली, हम उन्हें कैसे भूलते; मुझ निःसंतान को उन्होंने तेरे रूप में जो अमूल्य उपहार दिया उस अनुग्रह के एवज में इतना तो हम कर ही सकते थे। जब दो दिनों तक उनके मृत-शरीर का कोई दावेदार सामने नहीं आया तो हमने जिला के सर्वोच्च पदाधिकारी की सहायता से उनके शरीर को शव गृह से हासिल किया और उनके धर्म के मान्य धर्म गुरुओं की उपस्थिति में उचित स्थान पर उनका अंतिम संस्कार करवाया। बेटी, अब तो हमें हजारीबाग और राँची जाना ही होगा, तेरे पिता के अस्पतालों के लिए भी कोई जिम्मेदार खरीददार ढूँढना होगा, अब मैं कहाँ से उनकी जिम्मेवारी ले सकूँगी? उसी यात्रा के क्रम में हम तेरी देवकी माँ और पिता वासुदेव की समाधि पर जाएँगे और अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे। वैसे तू चाहेगी तो मैं तुझे तेरे चाचा/मामा से भी ....” “बस करो माँ, मेरे सामने उनका नाम भी मत लेना, पर एक बात बताओ, तुम्हारे अनुसार मेरी देवकी माँ ने स्वयं तुम्हारी गोद में मुझे डाला था, पर एम्बुलेंस वाले के अनुसार वे तो दो घंटे पूर्व ही मर चुके थे?” “नहीं बेटे, केवल इतना ही नहीं, पोस्टमार्टम से भी यही निष्कर्ष निकला था; वह तेरी माँ की आत्मा थी जो तुझे बचाने के लिए अपने ही चोला में हमारे सामने आ खड़ी हुई।” “और खड़ी होने के लिए भी कितना सही वक्त चुना उसने माँ, तेरे वहाँ पहुँचने के पूर्व भी कई गाड़ियाँ गुजरी मगर उसकी आत्मा ने उनकी सहायता नहीं ली, उसे तो बस मेरी मैया यशोदा का इंतजार था।”
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“तू तो मैं में, मैं में तू तू”
सूचना -- हमें दुःख है कि नवम्बर संवाद अंक में इस कविता के कवि का नाम गलत छप गया था। सही नाम के साथ ये कविता दिसंबर अंक में दोबारा छापी जा रही है।
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द्वारा -श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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तू तो मैं में, मैं में तू तू
जब से तेरी लगन लगी है कुछ भी और नहीं भाता।
भाना तो अब दूर जगत से टूट गया झूठा नाता।।
रोम - रोम में हुलक मारती पुलक न जाने क्या कर दे।
एक झलक की चाह लिए यह ललक न जाने क्या कर दे।।
जब - जब मैं तुझमें डूबा हूँ क्षण भंगुरता भूल गया।
प्रकृति सामने रही और मैं हर सुन्दरता भूल गया।।
ऐसा रमा कि द्वैत स्वयं अद्वैत दिखाई देता है।
महासिन्धु में उठी लहर सा वैत दिखाई देता है।।
मुझको तुझमें मैं दिखता है, तू मेरी रग - रग में है।
लगता है दो नहीं एक ही सत्ता इस जग मग में है।।
तेरी पूजा मैं करता हूँ वह मेरी ही पूजा है।
सच कह दूँ ब्रह्माण्ड काण्ड में अपने सिवा न दूजा है।।
इसीलिए मैं आत्ममुग्ध हो अपने पर इतराता हूँ।
जीवित मोक्ष पा लिया मैंने बार - बार बल खाता हूँ।।
अब चाहे अल मस्त कहे जग अस्त कहे या पस्त कहे।
ध्वस्त कहे आश्वस्त कहे विश्वस्त कहे या त्रस्त कहे।।
मैं भी मैं हूँ तू भी मैं हूँ वह भी मैं के अन्दर है।
मैं में असत् जगत की माया - माया कितनी सुन्दर है।।
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द्वारा - डॉ. सुरेंद्र नेवटिया,
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डॉ. सुरेंद्र नेवटिया, न्यू यॉर्क से हैं| ये पेशे से मेडिकल डॉक्टर है। ३ दशक पूर्व भारत से आये थे। सेवा निवृत होने के बाद पुनः कलम उठाई है और अपनी भावनाओं को अपनी भाषा में कागज पर लिपि बद्ध किया है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य हैं।
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1 ) “पतझड़”
पतझड़
पोंधों को निखरते हुए देखा है हमने,
फ़ुल और पत्तियों को उभरते हुए देखा है।
कभी छाव कभी धूप में,
कभी बरसात कभी ठंड में, गुजरते देखा है उन्हें,
हवा को कभी स्थिर कभी बहकते हुए देखा है।
पतझड़ के मौसम की बात ही है अलग,
छोटे दिन और लंबी रात की दे रही झलक,
पत्तियाँ पेड़ो पर बैठी थी झुकाए अपनी पलक।
ठंडी हवा ने शोर मचा दिया, पेड़ से उठा उन्हें आसमान में बिखेर दिया,
पत्तियों ने मानी नहीं हार, ज़मी पर आ एक ग़लीचा पिरो दिया।
डॉ. सुरेंद्र नेवटिया,अक्तूबर, २०२३
2 ) "दिन के सपने"
दिन में सपनों को देखने की कोई उम्र नहीं होती,
उनके यथोचित होने की ज़रूरत नहीं होती,
कभी भी, कहीं भी, गुंथनकर सकते हम उनका,
किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं होती।
बचपन में सपने मेरे छोटे थे, भले ही कुछ थे मुश्किल,
ज़्यादातर सुंदर और सीधे थे।
कभी दोस्तों के साथ दाल, बाटी, चूरमा की पार्टी,
कभी उनके साथ बैठ सिर्फ़ गप्पै लगाते।
घर में बिजली नहीं थी कई सालो,
पर सपनों की कमी नहीं थी।
एक दिन घर में उजाला होगा और बिजली का पंखा होगा,
यह मैंने मानी थी।
उम्र का तक़ाज़ा हुआ सपने लंबे होने लगे,
सन्नाटा पाया अपने ही वालो से, मुँह वो मोड़ने लगे।
बोले वो नामुमकिन है कैसे क्या कर पाओगे,
आसमान छूने के सपने छोड़ दो, टूटकर फिर ज़मी पर आ जाओगे
हमने सपनों का साथ न छोड़ा,
उन्होंने भी हमसे मुँह ना मोड़ा,
अकेले रास्तों पर चलते रहे हम,
इस अंधेरे को मिटाने का वादा न तोड़ा।
डॉ. सुरेंद्र नेवटिया, नवंबर २०२३
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अपनी कहानियाँ
“मुट्ठी भर प्यार”
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सुधा गोयल उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर की रहने वाली हैं। इन्होने एम.ए.हिन्दी, सी.सी.एस.वि.वि. मेरठ में शिक्षा ग्रहण की है। इनकी कहानियाँ, पौराणिक कहानियाँ, बाल कहानियाँ, बाल कविताएँ, लघुकथाएँ, व्यंग्य, कविताएँ, लेख, महिला लेख, समिक्षाएं, रिपोर्ट और कविताएँ सन् 1964 से निरन्तर समस्त राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती आ रहे हैं।
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"धरा मम्मी गुजर गयीं। पापा के कहने पर मैंने तुम्हें सूचना दे दी है। मैं निकल रही हूँ अभी"- सुबकते हुए बुआजी ने बताया अभी। मैं उन्हें एक शब्द भी नहीं बोल पाई। बुआजी ने सूचना देकर फोन फौरन काट दिया। इतना पूछने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी कि ऐसा कब और कैसे हुआ। बुआजी को अपनी मम्मी से प्यार है तो क्या मेरा अपनी दादी माँ से नहीं। बुआजी ने दादाजी के आदेश का पालन करते हुए मुझे मात्र सूचना दी है। बाकी मेरी मर्जी की मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
वे मानें या न माने, आखिर दादाजी और उनके स्नेह तंतु मुझसे भी जुड़ें हैं। वर्ना क्या बुआजी दादाजी की आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकतीं थीं। जितना हम बुआजी के प्यार को तरसे हैं क्या उतनी ही कमी बुआजी ने भी महसूस की होगी। सम्बन्धों में लक्ष्मण रेखाएं हमारे बीच हमारे मम्मी-पापा ने खींच दीं। कारण चाहे कुछ भी रहे हों।
कितना सारा सामान हमारे लिए बुआजी लेकर आतीं। बुआजी के कोई बेटी नहीं और हमारा कोई भाई नहीं। अपने कोई तायाजी या चाचाजी नहीं। इन रिश्तों की मिठास चखते तो तब जब कोई होता। मात्र अकेली बुआजी। हर रक्षाबंधन पर दौड़ी चलीं आतीं। उमंग और नमन भैया को हमसे राखी बँधवातीं और राखी बंधाई के लिए भैया हमें सुंदर-सुंदर ड्रेसें देते जिन पर मैचिंग क्लिप, रुमाल, टॉफ़ी, चाकलेट तथा चूड़ियाँ लगीं रहतीं।
हम बुआजी के आगे पीछे घूमते। बुआजी अपने हाथ से हमें नहलातीं, अपना टेलकम लगातीं, खूब खुशबुएं उड़ातीं और अपनी लाई ड्रेसें पहनातीं। अपने साथ बाजार ले जातीं, आइसक्रीम खिलातीं, कोल्डड्रिंक पिलातीं। ढ़ेरों सामान से लदे हम घर में घुसते। दादी माँ बुआजी को डांटती कि इतना खर्च करने की क्या जरुरत थी। इन दोनों के पास इतना सामान और खिलौने हैं। फिर भी इनका मन नहीं भरता। हम बुआजी के पीछे छिपे जाते। बुआजी मुस्करा पड़तीं- "ये हम बुआ भतीजी का मामला है। कोई बीच में नहीं बोलेगा। मम्मी अब घर में शैतानी करने और खेलने कूदने को यही दो बच्चियाँ ही तो हैं। इनसे घर कितना गुलजार रहता है।" और हम हिप-हिप हुर्रे करते हुए अपना सारा सामान खोलकर सबको दिखाते। मम्मी आँखें तरेरती। हम बुआ जी से शिकायत कर देते। और जब हम बुआजी के घर जाते, दोनों भैया अपनी-अपनी साइकिल पर बिठाकर कभी बाजार ले जाते तो कभी पार्क में घुमाने ले जाते। कितना अच्छा लगता था सब जैसे मुट्ठी में सितारे भर गये हों।
हम झूले पर झूलते और गाते-
"बाबा, तुम चले परदेश हमको कौन बुलाएगा?
तुम चिंता मत करना हमें बुआजी बुलाएंगी,
भैया बुलाएंगे, फूफाजी बुलाएंगे।"
थोड़े बड़े हुए तो गीत के बोल ही भूल गए। मुट्ठी में बंद सितारे बिखर गए। बुआजी का बुलाना तो दूर उनका नाम तक लेने पर पाबंदी लगा दी। बुआजी और भैया आते। हम चोरी चोरी उनसे मिलने जाते। वे प्यार करतीं। उनकी आँखें नम हो आती। बुआजी हमें चाकलेट देती। हम वहीं खा लेते। मुँह साफ करते और उनके पास आ जाते। मम्मी पूँछती- "बुआजी ने क्या खिलाया?" हम झूठ बोलते-"कुछ नहीं" बुआजी को गलबहियाँ डाल उनकी बगल में सोने का बड़ा मन करता। हम कहते, बुआजी अभी मत जाना। हम चुपके चुपके आते रहेंगे। आप आइसक्रीम खिलाना।
बुआजी आइसक्रीम और चाकलेट खरीद कर फ्रिज में रख जातीं। मम्मी-पापा ने उन्हें कभी अपने घर नहीं बुलाया। भैया से भी नहीं बोले। जबकि बुआजी अभी भी हम पर जान छिड़कती थीं। राखियाँ खुल गई। रिश्ते बेमान हो गये। कैसे इंतजार करूँ कि कभी बुआजी बुलाएंगी और उलाहना देंगी-"धरा और तान्या, तुम अपनी बुआ जी को कैसे भूल गयीं। कभी अपनी बुआ के घर आओ न।"
कैसे कहती बुआजी? उनके आगे रिश्तों का एक जंगल जो उग आया था और उसके पार बुआजी आ नहीं सकती थीं। जाने ऐसे कितने जंगल रिश्तों के बीच उग आए जो वक्त बेवक्त खरोंच कर लहुलुहान करते रहे। बुआजी के एक फोन से कितना कुछ सोच गई हूँ।
पल भर में मैंने स्वंय को सोचों से उबारा और अपने कर्त्तव्य की ओर उन्मुख हुई। तानी यानि तान्या को मैंने फ़ौरन फोन मिलाया। सुनते ही बोली- "दीदी, फिलहाल मैं नहीं निकल पाऊँगी। बेंगलोरे से वहाँ पहुँचने में दो दिन तो लग ही जायेंगे। तब तक पहुँचने का फायदा भी क्या? फ्लाइट का भी भरोसा नहीं। टिकट मिलें या नहीं। ईशान भी यहाँ नहीं है। मैं तेरहवीं पर पहुँचुंगी। प्लीज आप निकल जाइए। आप तो पास ही हैं। दो तीन घंटे लगेंगे। दीदी आपको खबर किसने दी? कैसे हुआ ये सब? पूछते पूछते रोने लगी तानी।
'तानी मुझे कुछ भी नहीं पता। बुआजी का फोन आया था। कितना प्यार करती थी दादी माँ। तानी, क्या हमारा जाना मम्मी को अच्छा लगेगा? क्या मम्मी-पापा भी उन्हें अंतिम प्रणाम करने आयेंगे?"
"नहीं दीदी, जो रिश्ते जीवन में टूट जाएँ,मृत्योपरांत उनका जुड़ना या न जुड़ना बेमानी है।ये समय रिश्तों को तौलने का नहीं है। मम्मी-पापा की पसंद नापसंद का हमने कभी ख्याल किया?वे अपने रिश्ते आप जानें। हमें तो अपनी दादी माँ के करीब उनके अंतिम क्षणों में होना चाहिए। दादी माँ को अंतिम प्रणाम करने के लिए तरस रही हूँ। आप दादी माँ को मेरी तरफ से एक मुट्ठी फूल अवश्य चढ़ा देना और कहना-"दादी माँ, तुम्हारी नटखट तानी तुम्हें बहुत मिस कर रही है।"
मैंने फोन हर्ष के आफिस लगाया और इस दुखद समाचार से उसे अवगत कराया। उत्तर मिला -"तुम तैयार रहना। मैं पंद्रह मिनिट में पहुँच रहा हूँ।"
फोन रखकर मैंने अलमारी खोली। तैयार होने के लिए साड़ी निकालने लगी। तभी दादी माँ की दी हुई कांजीवरम की साड़ी पर निगाह पड़ी। मैंने छुआ, लगा मैं दादी माँ को छू रही हूँ। उनका प्यार मुझे सहला गया है। दादी माँ के लिए सलवार सूट, जींस टॉप सब यही रखें हैं। मैं एक-एक चीज पर हाथ फिराकर देखने लगी। इतना प्यार इन चीजों पर इससे पहले कभी नहीं आया था। इन सब में मुझे दादी माँ का सुखद एहसास मिल रहा है।
आँखें हैं कि बही जा रही है। रुकने का नाम ही नहीं ले रही। लाकर खोला, दादी माँ की दी हुई चैन, अंगूठी, टाप्स, लौटते समय दादी माँ मुट्ठी में थमा देती। एक दो बार हर्ष ने मना करना चाहा तो दादी माँ की आँखें भर आईं। बोलीं- "हर्ष बेटा, इतना सा अधिकार भी तुम देना नहीं चाहते। ये प्यार और दुआ के फूल है, कोई भौतिक सम्पन्नता के प्रतीक नहीं। एक माँ की आँखों में झाँक कर देखो। तुम्हें कुछ देकर मुझे सुकून मिलता है। जिस दिन अभाव या कष्ट होगा नहीं दूँगी।" "दादी माँ, मुझे क्षमा करें। आपका प्यार और आशीर्वाद हमेशा सहेज कर रखूँगा"- और तभी से हर्ष दादी माँ से मिले नोटों पर एक छोटा सा फूल बनाकर संभाल कर रखने लगे और मुझे भी हिदायत दी कि दादी माँ के दिए रुपए खर्च न करूँ।
हमें नहीं पता कि मम्मी-पापा का झगड़ा दादाजी और दादीजी से किस बात पर हुआ। बस धुंधली सी याद है। उस समय मैं छः साल की थी। पापा दादी माँ से खूब झगड़े थे और उसी घर में ऊपर रहने लगे थे। कभी मम्मी-पापा से पूछने की जरूरत नहीं पड़ी या हिम्मत नहीं हुई। कुछ दिन तक मम्मी पापा ने हमें उनके पास नहीं जाने दिया। यदि हमें उनसे कुछ लेते देख लेते तो छीन कर डस्टबिन में फेंक देते और दादी माँ को खरी खोटी सुनाते। दादी माँ ने कभी उनकी बात का जवाब नहीं दिया। वे चुप रह जाती। हमें खूब गुस्सा आता। दादी माँ इतना सहती क्यो है। पर हम कर भी क्या सकते थे। हमें पापा गंदे लगते क्योंकि मम्मी पापा हमेशा उनके बारे में गंदी गंदी बातें करते।
जब पापा काम पर चले जाते और मम्मी आराम करने लगतीं उस समय हम यानि मैं और तानी चुपके-चुपके नीचे उतर जाते। दादी माँ कलेजे से लगा लेतीं। हमारे लिए दादाजी से टाफी, चाकलेट, बिस्कुट, फल, फ्रूटी मँगवाकर रखतीं। कभी इडली, छोले भटूरे, हलवा या पकौड़ी जैसा कुछ भी बनातीं तो हमारे लिए उठाकर रख देंती।फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक और आइसक्रीम अवश्य होती। हम दूर से ही पापा के स्कूटर की आवाज सुनकर सब खाने का सामान वहीं छोड़कर चप्पलें हाथों में उठाए ऊपर पहुँच जाते और खेलने लगते जैसे हम नीचे गये ही न हों।
मम्मी-पापा से शिकायत करती। पापा हमे दो-दो चाँटे लगाते। कान पकड़वाकर प्रोमिस कराते कि फिर नीचे नहीं जाएंगे और वहाँ से कुछ भी नहीं लेंगे। हम डर कर प्रामिस कर लेते, लेकिन उनके घर से निकलते ही हम आँखों-आँखों में इशारा करते और अपने दोस्तों के साथ खेलने का बहाना कर दादी माँ के पास पहुँच जाते। दादी माँ की गोद में लेट जाते। वे हमें खूब प्यार करतीं और समझातीं-
"अच्छे बच्चे अपने मम्मी-पापा की बात मानते हैं।"
"हमें उनकी बातें समझ में नहीं आतीं।"
तानी गुस्से में कहती- "वे आपके पास नहीं आने देते। हम तो यहाँ जरूर आएंगे। क्या आप हमारे दादा जी दादी माँ नहीं हो? क्या आपके बच्चे आपकी बात मानते हैं जो हम मानें?"
दादी माँ के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं होता था। बस स्नेह से गाल थपथपा कर कहतीं- "जरुर आना। तुम दोनों बहुत प्यारी बच्ची हो।"
दादी माँ को पापा की इन बंदिशों से दुःख तो अवश्य पहुँचता होगा लेकिन वे अपना दुःख प्रकट नहीं कर पातीं थीं। हाँ मम्मी-पापा के लिए हमारे मन में विद्रोह अवश्य पनप रहा था। हमारे अंदर ढेरों सवाल थे- दादी माँ सबको प्यार करतीं हैं। हमें भी कितना प्यार करतीं हैं। फिर मम्मी-पापा से कैसे झगड़ा कर सकतीं हैं। पता नहीं मम्मी-पापा इन्हें कंजूस क्यों कहते हैं? हमारे लिए कितना कुछ करतीं हैं। इन सवालों के कहीं उत्तर नहीं थे।
दादी माँ के एक तरफ मैं लेटती, दूसरी तरफ तानी और बीच में दादी माँ। रोज नयी कहानियाँ सुनातीं और पापा जब छोटे थे तब की ढेर सी बातें बतातीं। हमें बड़ा मज़ा आता।
वे दोनों कभी सुबह से शाम तक के लिए कहीं चले जाते तो हमारे पेट में दर्द होने लगता। स्कूल की बातें किसे सुनाएँ। मम्मी को तो फुर्सत ही नहीं है। ज्यादा कहने पर दो-चार चाँटे लगा देंगी। जैसे मम्मी का तो कभी पढ़ने से वास्ता रहा ही नहीं। जो भी पढ़ातीं गलत पढ़ातीं। स्कूल में पनिशमेंट मिलती। इसी से हम दादी माँ से अपनी प्राब्लम साल्व करा आते।
अपनी कापियाँ किसे दिखाएँ जिन पर तीन-तीन स्टार मिलें हैं। उफ़, नयी कापी, नयी ड्रेस, नयी पेंसिल रबर और लंच बाक्स भी तो दिखाना है। दादा जी की जेब की तलाशी लेनी है जिसमें से कभी जैली, कभी चुइंगम और कभी टाफी मिल जाती है। दादाजी जानते हैं कि बच्चे जेबों की तलाशी लेंगे। उन्हें निराश नहीं करना है। उनके मतलब का कुछ तो मिलना ही चाहिए।
दादी माँ दादाजी से झगड़तीं- "तुमने टाफी चाकलेट खिला-खिला कर इनकी आदतें खराब कर दी हैं। ये तानी सारा दिन चीज माँगती है। फल नहीं खाती। अब आप कुछ भी नहीं लाएँगे। इसके सारे दाँत खराब हो रहे हैं।"
दादा जी चुपचाप सुनते और मुस्कराते रहते। जबकि स्वंय दादी माँ के पर्स में सौंफ की रंग बिरंगी गोलियाँ या अनारदाने के पाऊच मिल जाते। हम दादी माँ का पर्स खोलकर अपने मतलब की चीजें निकाल लेते। वे हमारे पीछे भागती। हम भी भागते। हमें पकड़ कर दादी माँ खूब हंसती और कहतीं- "शैतानों तुमने थका डाला। मेरी साँस भी उखड़ने लगी है।" और जब शादी पक्की हुई दादी हर्ष को देखने के लिए कितना तड़पीं और जब नहीं रहा गया तो एक दिन बोलीं- "धरा अपना दूल्हा नहीं दिखाएगी।"
"अभी दिखाती हूँ दादी माँ" और एक छलाँग में हर्ष का फोटो लाकर उनके हाथ में थमा दिया। वे कभी मुझे देखतीं कभी फोटो को। फिर बोलीं-"हर्ष बहुत सुंदर है। बिल्कुल तेरे अनुरुप।"
मैंने तभी हर्ष को फोन लगाया-"दादी माँ मिलना चाहती हैं। शाम तक पहुँचो।"-और शाम को हर्ष दादी माँ के पाँव छू रहा था। शादी में सप्तपदी के बाद मैं अड़ गयी कि विदाई घर से होगी। असल में मुझे अपने दादाजी और दादी माँ से आशीर्वाद लेना था। जब भी मायके जाती दादी माँ सौगात के रुप में कभी रिंग, कभी कर्णफूल, कभी साड़ी मुठ्ठी में दबा देती। उन्होंने कभी खाली नहीं आने दिया।
"धरा, तुम अभी तक तैयार नहीं हुईं। अलमारी पकड़े क्या सोच रही हो?"
"हर्ष, मेरी दादी माँ चलीं गईं। मेरा मुठ्ठी भर प्यार चला गया। अब कौन मेरु मुठ्ठी में सौगात ठूँसेगा? कौन आशीर्वाद देगा? मैं अपनी दादी माँ को निर्जीव कैसे देख पाऊँगी?"रोने लगी।
हर्ष और धरा जब वहाँ पहुँचे लगभग सभी रिश्तेदार आ चुके थे। दादी माँ के पास बुआजी और अन्य महिलाएँ बैंठी थीं। वह बुआजी को देखकर उन्हें लिपट कर फूट फूट कर रोने लगी। रोते-रोते पूछा-"मम्मी पापा?" बुआजी ने न में गरदन हिला दी। धरा दनदनाती हुई ऊपर जा पहुँची। उसका रोदन क्षोभ बनकर फूट पड़ा- "आपको मम्मी-पापा कहते हुए आज मुझे शर्म आ रही है। पापा आपने तो अपनी माँ के दूध की भी लाज नहीं रखी। एक माँ ने आपको नौ माह अपनी कोख में रखा, आज उसी का ऋण चुका देते। अब तो आप दादी माँ को बेटे की माँ बनने के अभिशाप से मुक्त करिए और मम्मी जिसने अपना कोखजाया आपके आँचल से बाँध दिया, अपना भविष्य अपनी उम्मीदें सब आपको सौंप दीं। उन्हीं के पुत्र के कारण आप माँ का दर्जा पा सकीं। एक औरत होकर औरत का दिल नहीं समझ सकीं। उन्हीं के कारण आप इस घर में आ सकीं हैं। कितने कृतघ्न हैं आप दोनों।
यदि आप अपना फर्ज नहीं निभाएँगे तो क्या दादी माँ यों ही पड़ी रहेंगी।आप सोचते होंगे कि इस समय दादाजी आपकी खुशामद करेंगे। नहीं, उमंग भैया किस दिन काम आएँगे?
पापा, क्या आप अपनी देह से उस खून और मज्जा को नोच कर फेंक सकते हैं जो आपको इन दोनों ने दिया। उनका दिया नाम आजतक आपने क्यों नहीं मिटाया? आपकी अपनी क्या पहचान है? आप आज भी उनके बनाए मकान में किस अधिकार से रह रहे हैं? यदि आज आप दोनों ने अपना फर्ज पूरा नहीं किया तो इस भरे समाज में मैं आपका त्याग कर दूंगी और दादाजी को अपने साथ ले जाऊंगी।"
चौक पड़े दोनों। धरा तो कभी ऐसी नहीं थी। क्या हुआ है इसे?
"धरा, तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
"क्यो न आती? मैरी दादी माँ चलीं गईं हैं। उन्हें अंतिम प्रणाम करने का अधिकार कोई भी नहीं छीन सकता। आप लोग भी नहीं।" "होश में आओ धरा"।
"अभी तक होश में नहीं थी पापा। पहली बार होश आया है और अब मैं सोना नहीं चाहती। आज उस मुठ्ठी भर प्यार की कसम, आप दोनों नीचे आ रहे हैं या नहीं?"
धरा की आवाज में चेतावनी दी। विवश हो मम्मी-पापा को नीचे आना पड़ा.......।
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बाल विभाग “किड्स कार्नर”
कविता "जिंदगी की खुशबू"
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द्वारा - श्री पुष्पेश कुमार
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श्री पुष्पेश कुमार ‘पुष्प’ बाढ़, बिहार से हैं। विगत बीस वर्षों से साहित्य की सेवा में संलग्न हैं। कहानी, लघुकथा, लेख, बाल कहानी आदि लिखते हैं।
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जिंदगी की खुशबू
अपनी खुशियों की चाहत में
इंसान क्या से क्या हो गया ?
काश !
अपनी खुशियों की चाहत के बजाय
उदास चेहरों में मुस्कान लाने की
कोशिश करता,
तो क्या से क्या हो जाता ?
कभी निराशा के भंवर में
डूबते को किनारे पर लाता
तो कितना मिलता सुकून और शांति ।
अंधियारे पथ पर दीपक जलाता
तो जिंदगी चाँद की किरणों – सी
रौशन हो जाती ।
बेसहारे को सहारा देता
तो जिंदगी खुशबू से महक उठती ।
गिरते को उठा देता
तो जिंदगी खुशनुमा हो जाती ।
मन में दया – करुणा का भाव जगाता
तो लोगों के मन – मंदिर में बस जाता ।
प्रेम - समर्पण का भाव जगाता , तो
लोगों की नजरों में महान बन जाता ।
आशा – तृष्णा को मिटाकर
दूसरों की उजड़ी बगियाँ को संवार देता
तो जिंदगी खुशियों से सराबोर हो जाती ।
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"अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति": शाखाओं की
मनोनीत सूची: निदेशक व न्यासी मण्डल - 2024-2025
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इंडियाना चैप्टर -
Mrs. Vidya Singh, President – श्रीमती विद्या सिंह, अध्यक्ष
Mr. Aditya Shahi, Vice President – श्री आदित्य शाही, उपाध्यक्ष
Dr. Kumar Abhinava, Secretary – डॉ कुमार अभिनव, सचिव
Mr. Mool Vijay, Treasurer – श्री मूल विजय, कोषाध्यक्ष
Mr. Anil Gupta, Program Coordinator – श्री अनिल गुप्ता, कार्यक्रम समन्वयक
Dr. Mahesh Goel, Advisor – डॉ महेश गोएल, सलाहकार
Dr. Rakesh Kumar, Advisor – डॉ. राकेश कुमार, सलाहकार
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नार्थ कैरोलाइना, शार्लट चैप्टर -
Priya Bharadwaj, President – प्रिया भरद्वाज, अध्यक्ष
Ball Gupta, Vice President – बॉल गुप्ता, उपाध्यक्ष
Tripti Tiwari, Secretary – तृप्ति तिवारी, सचिव
Shweta Gupta, Program Coordinator – श्वेता गुप्ता, कार्यक्रम समन्वयक
Payal Shrimal, Advisory – पायल श्रीमाल, सलाहकार
Payal Shrimal, President-Elect - पायल श्रीमाल, निर्वाचित अध्यक्ष
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हॉस्टन, टेक्सास चैप्टर -
Saundarya (Sanjay) Sohoni, President - सौंदर्य (संजय) सोहोनी, अध्यक्ष
Chandrakant (Charlie) Patel, Treasurer - चंद्रकांत (चार्ली) पटेल, कोषाध्यक्ष
Nisha Mirani, Secretary - निशा मिरानी, सचिव
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वाशिंगटन, डी.सी. चैप्टर -
Mr. Choudhary Pratap Singh, President – श्री चौधरी प्रताप सिंह, अध्यक्ष
Dr. Beena Akolkar, Secretary – डॉ. बीना अकोलकर, सचिव
Dr. Rajiv Kumar, Treasurer – डॉ. राजीव कुमार, कोषाध्यक्ष
Dr. Satish C. Misra, Advisor – डॉ. सतीश सी. मिश्रा, सलाहकार
Dr. Narendra N. Tandon, Advisor & Technical Support – डॉ. नरेन्द्र अन. टंडन, सलाहकार और तकनीकी सहायता
Dr. Hari Har Singh, Immediate Past President and Advisor – डॉ. हरी हर सिंह, तत्काल पूर्व राष्ट्रपति और सलाहकार
Dr. Renu Mishra, Active Member – डॉ. रेणु मिश्रा, सक्रिय सदस्य
Asha Chand, Active Member – आशा चाँद, सक्रिय सदस्य
Kamal Chopra, Active Member – कमल चोप्रा, सक्रिय सदस्य
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उत्तरपूर्व ओहायो चैप्टर -
Ashwani Bhardwaj, President – अश्वनी भरद्वाज, अध्यक्ष
Dr. Rakesh Ranjan, Vice-President – डॉ. राकेश रंजन, उपाध्यक्ष
Dr. Somnath Roy, Secretary – डॉ. सोमनाथ र्रॉय, सचिव
Anurag Gupta, Treasurer - अनुराग गुप्ता, कोषाध्यक्ष
Ajay Chadda, Advisor - अजय चड्डा, सलाहकार
Ajit Rai, Advisor & Technical Support - अजित राये, सलाहकार और तकनीकी सहायता
Kiran Khaitan, Immediate Past President & Advisor - किरण खेतान, पूर्व अध्यक्ष और सलाहकार
Renu Chadda, Past President & Advisor - रेणु चड्डा, पूर्व अध्यक्ष और सलाहकार
Dr. Shobha Khandelwal, Past President & Advisor - डॉ. शोभा खंडेलवाल, पूर्व अध्यक्ष और सलाहकार
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अन्य शाखाओं की सूची कुछ कारणों वश अगले अंक में प्रकाशित होगी।
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – संपादक मंडल sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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