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DECEMBER INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
दिसम्बर 2022, अंक १९ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों
मैं आशा करती हूँ कि आपकी थैंक्सगिविंग का अवकाश बहुत हाई आनंदपूर्वक सम्पन्न हुआ होग़ा। क्रिसमस की छुट्टियाँ आशा करती हूँ, कि आप सभी ने हर्ष और उल्लास के साथ बिताई होगी।
जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की हिन्दी साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी, शनिवार, 14 जनवरी 2023, को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गई है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा। इस शृंखला में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार मिश्र, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला, पूर्व महासचिव, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरिशस हैं। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "हिंदी कविता में यथार्थ"। आप सभी से निवेदन है कृपया इस कार्यक्रम को अवश्य देखें।
कृपया Amezon के माध्यम से खरीदी कर के आप हमारा समर्थन अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति करने का कष्ट करें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति एक ग़ैर लाभकारी संस्था है Amezon के माध्यम से जो भी अपने पसंद का सामान खरीदने पर charitable संस्था के रुप में smile.amezon.com के द्वारा चुनने पर, कोई भी ख़रीदी करता है तो amezon.com अपनी उस आय का ०.५% अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के खाते में स्वतः भेज देती है। इस शुभकार्य के लिये अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति आप सभी के सहयोग के लिए आभारी है।
२०२२-२०२३ सत्र के न्यासी-समिति, कार्य-समिति, निदेशक मण्डल के अन्य सदस्य एवं शाखा संयोजक सभी अच्छे तरीक़े से अपना-अपना कार्यभार सम्भाल रहे हैं, उन सभी की मैं हृदय से प्रशंसा करती हूँ। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखाओं के सभी अध्यक्षों-अध्यक्षाओं के कार्यों की हृदय से प्रशंसा करती हूँ। अंत में मैं निर्धारित समय पर “संवाद” और “विश्वा” को प्रकाशित करने और आप तक पहुँचाने का कार्य कर रहे सम्पादक एवं सम्पादक मंडल को सहृदय धन्यवाद देती हूँ।
आप सभी को आने वाले नूतन नववर्ष की शुभकामनाएँ और आप सभी स्वस्थ्य रहे यही कामना ईश्वर से करती हूँ। आपका अगर कोई प्रश्न हो तो आप सभी इस ईमेल (anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
शुभकामनाएँ सहित
अनिता सिंघल
अंतरराष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२३)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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जागृति वेबिनार: “हिंदी कविता में यथार्थ”, 14 जनवरी 2023
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक शृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 14 जनवरी 2023, शनिवार को भारतीय समय से 8:30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की इस कड़ी के वक्ता हैं: प्रसिद्ध हिंदी शिक्षाविद डॉ. विनोद कुमार मिश्र, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला एवं पूर्व महासचिव, विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरीशस। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "हिंदी कविता में यथार्थ"।
भारत की आज़ादी के बाद बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिवेश का हिंदी रचनाकारों पर क्या प्रभाव पड़ा? घूस, बेईमानी, दमन और इनसे जनित कुंठाएँ या विकासोन्मुख भारत का उल्लास-आशाएँ, हिंदी साहित्य में कैसे मुखरित हुईं? आदि प्रश्नों पर विचार कर रहे हैंः हमारे अतिथि वक्ता डॉ. विनोद कुमार मिश्र ।
समिति शनिवार, 14 जनवरी 2023 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
https://www.facebook.com/events/527526372644667
www.facebook.com/ihaamerica
https://www.youtube.com/watch?v=Rzj7upG4l80
https://www.youtube.com/watch?v=H8BcXTTBqkA
शनिवार, 14 जनवरी 2023; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 10:00 AM EST, 9:00 AM CST, 8:00 AM MST, 7:00 AM PST
UK: 4:00 PM, Mainland Europe: 5:00 PM
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आशा है कि आप शनिवार, 14 जनवरी 2023 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा" और कवि-सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं। समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” जून 2021 से प्रकाशन प्रारम्भ किया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना।
यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – शाखाओं के आगामी कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – इंडियाना शाखा
आभासी “विश्व हिंदी दिवस” कवि सम्मेलन
समाचार द्वारा: डॉ. राकेश कुमार
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कृपया 10 जनवरी, 2023 के आभासी कविसम्मेलन के लिए अपना कैलेंडर चिह्नित करें।
विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ तभी से ही इस दिन को 'विश्व हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना 10 जनवरी, 2023 को आभासी "विश्व हिंदी दिवस" कवि सम्मेलन में आपको सादर आमंत्रित करती है। श्री सोमनाथ घोष, भारत के कौंसल जनरल, शिकागो, हमारे मुख्य अतिथि होंगे।
कृपया आगामी कविसम्मेलन का आनंद लेने के लिए नीचे दिए गए किसी एक लिंक पर क्लिक करें।
मंगलवार, 10 जनवरी, 2023
USA/Canada: 8:00 - 9:00 PM EST; 7:00 - 8:00 PM CST; 5:00 - 6:00 PM PST
India: 6:30 AM IST
https://www.facebook.com/indyiha
https://youtu.be/g6m4Ae0mtPU
https://youtu.be/TKrc8UyseGA
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
“विश्व हिंदी दिवस” सांस्कृतिक कार्यक्रम सुनिश्चित
समाचार द्वारा – श्रीमती किरण खेतान
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तरपूर्व ओहायो शाखा द्वारा रविवार,15 जनवरी, 2023 को 3:30 PM से 5:00 PM EST सांस्कृतिक कार्यक्रम में आप सभी सादर आमंत्रित हैं, कृपया अपना कैलेंडर चिन्हित करने का कष्ट करें।
विशेष सूचना :
“विश्व हिंदी दिवस” के कार्यक्रम में स्थानीय कलाकारों को अपनी-अपनी कला दिखाने का सुअवसर मिलेगा, इसलिए आप सभी से आग्रह है कि आप अपनी-अपनी रूचि के अनुसार कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जल्दी से जल्दी flyer में लिखे फ़ोन नंबर पर संपर्क करके अपना कार्यक्रम सुनिश्चित करने का कष्ट करें।
इस कार्यक्रम में कोई सहयोग राशि नही है पर उचित प्रबंधन एवं व्यवस्था के लिए RSVP से
कार्यकर्ताओं को अपना कार्य कुशलता पूर्वक करने में सहायता मिलेगी।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – टेनेसी शाखा
“विश्व हिंदी दिवस” जनवरी ७, २०२३
समाचार द्वारा – डॉ. तरुण सुरती, टेनेसी
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द्वारा - श्रीमती जयश्री बिरमी
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श्रीमती जयश्री बिरमी जी उच्च माध्यमिक विद्यालय, अहमदाबाद, गुजरात से निवृत शिक्षिका हैं। जीवन भर बालिकाओं की समस्याओं को अनुभव किया, समझा और सुलझाया है।
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आज जब किमो थेरेपी खत्म हुई और रेडिएशन का दौर शुरू हुआ तो रीमा को वो दिन याद आ गए, जब उसकी माताजी को कानपुर से दिल्ली ऐसी ही परिस्थितियों में ले जाया गया था। तब तो इतनी दवाइयाँ आदि का आविष्कार नहीं हुआ था किन्तु हस्पताल में रह कर कुछ तो दवाइयों आदि पर विश्वास कर लिया करते थे। रीमा तब सातवीं कक्षा में पढ़ती थी, माताजी के दिल्ली जाते ही उसके जिम्मे अपने से छोटी 5 बहनों की जिम्मेवारी आ गईं थी। सबके लिए खाना बनाना, उनके बाल बना समय से पाठशाला भेजना और क्या- क्या काम नहीं होते। उसके पिताजी भी दिल्ली आते जाते रहते थे, जब कानपुर में होते थे तो उनका भी खयाल रखना पड़ता था। रीमा से दो साल छोटी सीमा थी जो काफी समझदार थी। कुछ महीने हुए थे रीमा ने घर संभाल तो लिया था लेकिन पढ़ाई आदि ने पिछड़ती जा रही थी, क्योंकि पाठशाला नहीं जा पा रही थी। एक दिन दोनों मिल कर खाना बना रही थी तो वह बोली, "दीदी ऐसा नहीं कर सकते? आप एक दिन घर रहेंगे और एक दिन मैं ताकि आप भी पढ़ लेगी और मैं भी।” सीमा की बात से रोमा सहमत हो गई और फिर दोनों ने मिलकर सभी बहनों की जिम्मेवारी उठा कर पिता को माताजी की सेवा के लिए मुक्त कर दिया।
पिता प्यार तो सभी छ: बच्चियों से बहुत करते थे किन्तु बेटा नहीं होने का गम उन्हे बहुत रहता था। शायद रीमा की माताजी की मानसिक परिस्थित इसी वजह से बिगड़ती जा रही थी। उसे जीने में कोई रस नहीं था, रीमा के पिताजी से बोला करती थी, "मेरे मरने के बाद आप दूसरी शादी जरूर कर लेना ताकि आपको बेटे का सुख मिले”। इतनी बीमारियों में उसे यह सोच और भी बीमार कर रही थी।
दो साल कैसे बीते वह रीमा और सीमा ही जानती थी, घर से माताजी का ज्यादा हस्पताल में रहना और पिताजी का ज्यादा समय उनके साथ रहना, इन दोनों बातों ने सभी बहनों को कुछ ज्यादा ही परिपक्व बना दिया था। सब का बचपना जैसे दो-दो सीढियाँ लाँघ- लाँघ कर बहुत परिपक्वता दी और तेजी से बढ़ गया था और आज वह दिन आ ही गया था जिसका आना तय था। डॉक्टर ने जवाब दे दिया था अब माताजी पर किसी भी दवाई या ट्रीटमेंट का असर नहीं हो रहा था तो डॉक्टर ने कहाँ, "इन्हे घर ले जाइए, बच्चों को देख अंतिम समय में उन्हे अच्छा लगेगा, अब यहाँ रखने से कोई फायदा नहीं होगा। जीतने दिन हैं घर में ही रखना बेहतर होगा।"
अब रीमा का स्कूल जाना बिलकुल ही बन्द हो गया था सीमा भी कभी जाती कभी रीमा का हाथ बटाने घर पर ही रुक जाती थी। दोनों बहनों ने मिल कर बहुत सेवा की माताजी की, वह भी बोलने में असमर्थ थी किन्तु हाथ उठाके आशीर्वाद देती रहती थी। दर्द से तड़पती माँ को देखना बच्चियों के लिए भी आसान नहीं था लेकिन आपना दिल कड़ा कर के सब अपने-अपने हिसाब से माँ की सेवा कर ही लेती थी। एक दिन सुबह 5 बजे पापा बहुत घबड़ाये हुए आयें और बच्चियों को माँ के कमरे में ले गए। माँ अंतिम सांसे गिन रही थी, माँ की नज़र बच्चियों से हट नहीं रही थी, दर्द से तड़पती उन आँखों में क्षमा प्रार्थना थी कि वह उन्हें इस दुनिया में अनाथ सा छोड़ कर जा रही थी। कुछ देर वह एक के बाद एक सभी बच्चियों को देखती रही फिर हाथ रीमा की और उठाया तो रीमा उनके करीब जा बैठी, उसके सिर पर रखने के लिए उठा हाथ रीमा की गोद में बेजान सा गिर गया लेकिन खुली आँखें अभी तक रीमा को ही देख रही थी, जैसे उसको अपनी गृहस्थी की संभाल रखने के लिए कह रही हो। बच्चियों के एक साथ करुण कृदंत को सुन सभी पड़ोसी इक्कठे हो गए और अंतिम यात्रा की तैयारी करने में सब व्यस्त हो गए लेकिन रीमा अपने पिता के पास ही रही जैसे आश्वासन दे रही हो।
पिताजी को श्मशान घाट नहीं ले गए थे क्योंकि रिवाज के मुताबिक अगर दूसरा विवाह करना हो तो अंत्येष्टि नहीं करते। बड़े बुजुर्गों ने उन्हें रोक दिया था ताकि उनका विवाह हो सके। जब सब वापस आयें तो घर में एक खालीपना लग रहा था, बिस्तर पर ही सही लेकिन माँ थी तो सही, अब तो सिर्फ माँ का नाम ही रह गया था। घर में बहुत रिश्तेदार आए थे, पिताजी की ओर से भी और माताजी की ओर से भी। उनकी उत्तर क्रियाओं के समाप्त होते ही एक-एक कर सब चले गए। मामीजी रुकी थी कुछ दिन फिर वह भी चली गई थी। अब फिर से अकेले हो गए थे सब एक बेचारगी के साथ कि, बिन माँ के बच्चे बनकर।
साल बीत गया पिताजी के लिए रिश्ते आते थे लेकिन बच्चियों की जिम्मेवारी देख सारे रिश्ते मुड़ जाते थे। घर की जिम्मेवारियाँ दोनों बहने निभा ही रही थी कि चाचीजी की बहन जो दिखने में सुंदर नहीं होने की वजह से कंवारी बैठी थी उनके साथ पिताजी की शादी तय हो गई कुछ ही दिनों में वह माँ की कुर्सी पर आसीन हो गई। लेकिन उसने कभी अपने घर में जिम्मेदारी से कोई काम किया नहीं होने की वजह से कामों का बोझ दोनों बहनों पर ही रहा था। पिताजी अपने व्यवसाय जो इतने सालों से नौकरों के भरोसे चलता था, उसे सँभालने में व्यस्त हो गए। अब रीमा जवान हो गई थी तो रिश्ते आने शुरू गए लेकिन उसे घर छोड़ कर जाने के नाम पर बुखार सा आने लगता था लेकिन करती भी तो क्या? एक न एक दिन तो उसे भी घर छोड़ शादी कर ससुराल जाना ही था। नई माँ बुरी तो नहीं थी किन्तु उसने अपनी जिम्मेदारी का एहसाह ही नहीं था। खाना कभी भी समय से नहीं पकता था, समझो कोई भी काम कभी समय से हो ही नहीं सकता था। अपनी सहूलियत से उठना, काम करना और नहीं मन करता तो चाहे बच्चे भूखे ही क्यों रहे खाना नहीं बनता था। इन हालातों में रीमा और सीमा को ही सँभालने पड़ता था। ऐसे में वह घर छोड़ अपनी जिंदगी में कदम कैसे रख पाएगी? उसे माताजी का अंतिम समय याद था जब उसे पास बुलाने इशारों में ही सही पाँचों बहनों का खयाल रखने की जिम्मेदारी सौंप के दुनिया से विदा हुई थी। लेकिन जब सीमा ने कहा," दी कोई ना मैं हूँ सब संभाल लूँगी, आप चिंता नहीं करो पापा की बात मान लो।” और रीमा ने शाम को पिताजी से हामी भर दी और कुछ ही दिनों में शादी हो भी गई। नई गृहस्थी, नये लोगों के बीच होने के बावजूद उसे अपने परिवार की चिंता रहती थी, राजीव उसका पति बहुत ही अच्छा था, उसे बहुत ही संबल देता था, जब कभी उसे घर जाना होता था वह खुशी-खुशी भेजता था। लेकिन अहमदाबाद से कानपुर की दूरी की वजह से वह खुद भी हो सके तब तक इच्छा होने के बावजूद नहीं जाती थी। फिर भी फोन पर या चिट्ठी द्वारा उनके खबर पूछ ही लेती थी। अब पिताजी का दूसरी शादी में भी पुत्र प्राप्ति ही आशय था किन्तु ये भगवान को मंजूर ही नहीं था, दूसरी माँ कभी भी उम्मीद से हुई ही नहीं। जिस से पिताजी और उदास रहने लगे थे बेटे को पाने की ख्वाहिश, अपने वारिस को पाने की तमन्ना उन्हें बहुत दुखी करने लगी और वे उदास रहने लगे। तब तक सीमा की भी शादी हो गई थी। तब रिश्तेदारों की राय से चाचाजी के बारहवें बेटे ‘बिराल’ को गोद लेने की सोच ली, छोटी सी पूजा करवाके भगवान को साक्षी मान दोनों ने बिराल को बेटे के रूप में स्वीकार कर लिया था, वह अब उनके साथ ही रहने लगा था। अब पंजीकरण करवा के कानूनन उनका बेटा बिराल बहुत ही खुल्ले हाथ से खर्च करने वाला होने की वजह से हर वक्त पैसों की माँग कर दोनों को बहुत परेशान करता रहता था और बहनों को तो कामवालियों जैसे रखता था, अपने सारे छोटे-मोटे काम उन्ही से करवाता था। कुछ दो साल के अंदर- अंदर चारों बेटियों की शादी हो गई, रीमा और सीमा तो अपने घर की हो ही गई थी। बिराल बारहवीं कक्षा की परीक्षा में बहुत बार बैठने के बावजूद कभी भी उत्तीर्ण नहीं हो पाया तो पिताजी ने अपने साथ उनके व्यापार में शामिल कर लिया। अब उसने वहाँ भी अपनी आदत के अनुसार गड़बड़ियाँ करना शुरू कर दिया। अब उसकी ज्यादतियाँ बढ़ती जा रही थी लेकिन पुत्र मोह की वजह से उसे कुछ कह नहीं पाते थे, लेकिन जब बात सर से ऊपर गई तब उन्होंने रीमा और सीमा को बुलाया और सारी बातों से अवगत कराया। दोनों बहनों ने बिराल को समझाने की कोशिश की लेकिन उस पर कोई असर होता दिखाई नहीं दिया । कुछ दिन रुक कर दोनों अपने-अपने घर चली गई, वे अन्दर से चिंतित थी ।
एक दिन जब सीमा का फोन आया तो रीना हतप्रभ सी रह गई थी, बिराल ने सारा कारोबार उसके अपने नाम करवा कर सभी मिलकातों (घर मकान) और बैंक के खातों को अपने नाम धोखे से करवा लिया था। उसके पिताजी और नई माँ दोनों ने जब उसे पूछा तो उन्हें ये कह कर घर से निकाल दिया कि अब वह घर भी उसके नाम हो चुका हैं। दोनों नसीबों के मारे रीमा के घर आयें तो रीमा से लिपट कर पिताजी बहुत रोएं और अपनी सोच के प्रति घृणा जाहिर की, पुत्रमोह ने आज उन्हे बेघर, भिखारी सा बना दिया था। जिस पुत्र को पाने के लिए छ: बेटियों के होते हुए शादी की और अपना बसाबसाया संसार उजाड़ दिया। इस एहसास के मारे दोनों ही मरे जा रहे थे। जिन बेटियों से नफरत तो नहीं की किन्तु दोनों उनकी हस्ती को नहीं पहचानने का फल भुगत रहे थे।
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द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है।
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इससे बड़ा फकीर कहाँ है?
किसी घुमक्कड़ योगी जैसा, आज यहाँ कल वहाँ ठिकाना।
मात्र चीथड़े चिपके तन पर, यही सम्पदा यही खजाना।।
रूखा सूखा जो मिल जाए, भूख मिटाने को खा जाना।
मिल जाए तो ठीक नहीं तो, अँगड़ाई लेकर सो जाना।।
कर्म भोगते देखा इनके, कायिक भोगों को देखा है।
मनोरोगियों जैसे उपजे, इनके रोगों को देखा है।।
जो संयोग देखना मुश्किल, उन संयोगों को देखा है।
मैंने इस दुनिया में आकर, ऐसे लोगों को देखा है।।
जिनके पास नहीं दिखता कुछ, उनके पास बहुत होता है।
जिनके पास नहीं होता कुछ, उससे बड़ा अधीर कहाँ है।।
उस अधीर को धीर धरा दे, इतना बड़ा फकीर कहाँ है।।
सिरहाने दो ईंटें रख लीं, फुटपाथों पर कहीं सो गए।
कल की रोटी की क्या चिन्ता पेट भरा निश्चिन्त हो गए।।
थोड़ी देर गौर से देखा आसमान को और खो गए।
नींद आ गई तो फिर आड़े पुण्य आ गए पाप धो गए।।
हुआ सबेरा ठण्डक आई, धूप लगी तो छाँव घेर ली।
आगे फटी कमीज पेट पर, हवा चली तो पीठ फेर ली।।
बदरी देखी उकड़ूँ बैठे, कचरे से पन्नी कढ़ेर ली।
कैसे लोग जी रहे ! देखो! कैसी यह
माया अबेर ली।।
सौ एकड़ में बने महल को, बेशक सबसे बड़ा समझ लो।
लेकिन सच है इस दुनिया में, नभ से बड़ा कुटीर कहाँ है ?
इस कुटीर में रहनेवाले, नर से बड़ा अमीर कहाँ है??
इच्छाओं का शमन कर लिया, परवाजों को खाँसी दे दी।
घोर निराशा को चिर जीवन, आशाओं को फाँसी दे दी।।
एक आँख से कम दिखता है, दूजी आँख रुआँसी दे दी।
नीँद दान कर दी रातों को, दिन को ऊबासाँसी दे दी।।
लड़ने से पहले ही सबसे, जीती बाजी हार चुका है।
केवल दुआ पास रखता है, शेष फेंक हथियार चुका है।।
इसी दुआ को बाँट बाँट कर, खुद कइयों को तार चुका है।
बस इतना ही नहीं ताव में, ईश्वर को ललकार चुका है।।
सुनते हैं अक्खड़ कबीर भी, खरी खरी कहते थे सबसे।
फक्कड़पन की आज कहें तो, इनसे बड़ा कबीर कहाँ है?
"प्राण" चले जाते आ आ कर, इनसे प्रबल शरीर कहाँ है??
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द्वारा - डॉ. चित्रा कुमारी
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डॉ. चित्रा कुमारी, पटना, भारत से मेडिकल में डाक्टर बनकर इंग्लैंड गयी और अपने प्रोफेशन में व्यस्त हो गई। इस कविता में इन्होने मेडिकल कॉलेज के ५० वर्षों को बाँधने का प्रयास किया है।
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बीते पचास साल,
है लंबा अंतराल,
पर हमें है सुनानी
हम सबकी पुरानी कहानी !
याद है वह सुबह जब हमने,
पढ़ें अख़बार में नाम अपने !
बुनने लगे बस बेहिसाब -
भविष्य के रंगीन सपने !
फिर तो डूबते - उतराते,
हंसते- रोते - घबराते-
किए तय हम सबने-
परीक्षाओं के विकट रास्ते !
एनाटोमी का डिसेकशन हाल,
मुरदों की चीर-फाड़,
फारमेलिन की दुर्गंध,
भयंकर था पहला साल !
कुछ न्यूरोन जाते उपर,
कुछ पड़े रहते बेख़बर !
उसपर से इमबरीयोलोजी, फिसियोलोजी
सब साथ साथ ढा रहे थे क़हर !
लम्बे उबाऊ लेक्चर,
सुनते सिर पकड़ कर,
बीच में होती धम्मपद की आवाज़,
खिड़की से कूदकर भागता कोई जाँबाज़ !
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मुँह दबाए, सिर झुकाए,
हँसी रोक कर नोट्स लिखती लड़कियाँ,
राह थी छुटकारे की
लेक्चर हाल की खिड़कियाँ !
लड़कों की करें क्या बात,
वो तो थे ही तीरंदाज़ !
जाने कैसे पूरी करते पढ़ाई,
क्या था उनका राज?
सामने की सीट पर
कभी फेंकते चाक के टुकड़े,
कभी बजाते सीटी, कभी निकलती “हाय”
पर थी नहीं हिम्मत की सामने आएँ !
कुछ लड़के मासूम दिखते,
सिर झुकाए शराफ़त से चलते !
कुछ अपनी तिरछी नज़र से,
दिल करी वारदात कहते !
काग़ज़ की गोलियाँ फेंकते,
फबतियाँ कसते, हाय भरते !
सच मानिए दबदबा था लड़कियों का-
शरारती भी दूरियाँ रखते !
न था मोबाईल,
नहीं सोशल मीडिया,
बात कहने सुनने की
बिल्कुल थी अनोखी अदा !
क़िस्सा है गुजरे जमाने का,
अरसा बीता -
मिला है मौक़ा आज
आप सब को सुनाने का !
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द्वारा- डॉ उमेश प्रताप वत्स
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डॉ उमेश प्रताप वत्स लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है। ये यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं।
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प्रतिदिन की भाँति दीपक आज भी स्टेशन पर धीमी गति में आती रेलगाड़ी के कोच नं॰ 5 के साथ-साथ तब तक दौड़ता रहा जब तक रेलगाड़ी रुक न गई।
बाबू जी सामान…मैडम जी सूटकेश… अरे ओ बाबू जी आपका सामान उठवा दे।
कुछ लोग तो सीधे आगे का रास्ता पकड़ लेते किन्तु कुछ तो ऐसे घूर कर देखते जैसे उस बेचारे ने कोई गाली दे दी हो। वो भी क्या करें महगांई के जमाने में हर यात्री स्वयं ही कुली की भूमिका निभाना बेहतर समझता है। तभी एक मेम साहब गाड़ी से नीचे उतरी तो हाथ में डॉगी बेबी की चैन पकड़े हुए चिल्लाई-
“अरे कोई कुली है…”
(दीपक साथ ही खड़ा था) “हाँ मेम साहब, मैं हूँ ना…”
“तो चलो गाड़ी में से सारा समान नीचे ऊतारो”।
दीपक डिब्बे में चढ़ा तो वहाँ उसकी हमउम्र लड़के (शायद मेम साहब का लड़का था) ने सामान की ओर संकेत किया और दीपक ने एक-एक करके सारा सामान नीचे उतारा दीपक ने सूटकेश सिर पर रखा, दो बैग बाजू में दांयी ओर तथा एक बैग बांई ओर टाँग कर चलने लगा तो मेम साहब की करकश आवाज से एकदम ठिठका-
“हाँ, पैसे कितने लोगे”?
“मेम साहब बीस रुपये दे देना”।
“क्या! बीस रुपये ! रहने दो नीचे उतारों सामान, लूट मचा रखी है क्या, दस रुपये मिलेंगे”।
“नहीं-नहीं मेम साहब, इतना सारा सामान और इस महंगाई में दस रुपये, नहीं-नहीं…” दीपक ने सारा सामान नीचे रख दिया और अपने अंगोछे से पसीना पोंछते हुए मेम साहब को कनखलियों से यूँ देखा मानो रोटी का निवाला मुँह तक ले जाकर फिर हाथ वापिस खींच लेने वाले को निहार रहा हो। मैं उस नौजवान को हताश होते हुए देख रहा था। अक्सर मैं रेलगाड़ी से सफर किया करता था और दीपक को जब भी देखता तो वह व्यवहार, बोल-वाणी में अन्य कुलियों से हटकर लगता। कुछ दिन पहले की ही तो बात है जब मैं गाड़ी से नीचे उतरा तो एक साभ्रांत परिवार का शिष्ट लड़का मेरे पास आकर बोला-
“बाबू जी…बाबू जी, आपका बैग मैं…” मैं समझ गया कि था कि यह लड़का विवशता में स्टेशन पर कुली का कार्य कर रहा है”।
“बैग तो मैं स्वयं ही उठा लूँगा किन्तु…” मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-“ये बताओ तुम हो कहाँ के?”
“बाबू जी, मैं सरहंद पंजाब का रहने वाला हूँ”।
“लगते तो पढ़े-लिखे हो तो फिर ये…”
मेरी बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा। “बाबू जी, आया तो था मैं फिल्मों में काम करने लेकिन भाग्य ने लोगों का वजन उठाना लिख दिया है”।
“फिर तुम वापिस क्यों नहीं जाते”?
“बाबू जी, किस मुँह से वापिस जाऊँ, घर से लड़-झगड़ कर, मनमानी करके ही मुम्बई आया था, अब वापिस जाऊँ भी तो कैसे…घरवालों के साथ-साथ गली-मोहल्लें वाले भी ताने मार-मारकर मेरा जीना दूभर कर देंगे। बस! अब तो मुम्बई ही मेरी कर्मभूमि है, यदि किस्मत ने चाहा तो कोई अन्य कार्य ढूँढ़ लूँगा। तब तक गुजर-बसर के लिए यह सबसे उपयुक्त कार्य है”।
मैं उस होनहार नौजवान को देखता रहा। उसके चेहरे से विनम्रता झलक रही थी। मैंने उससे कहा कि “कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, सच्चाई पर चलते रहो एक दिन सफलता अवश्य मिलेगी”। मेरे दिल से आवाज आई कि यह लड़का एक दिन बहुत आगे बढ़ेगा। मैं उस लड़के के बारे में सोचता-सोचता कब ऑटो पकड़कर घर आ गया मुझे पता ही न चला। बस मेरे सामने उस नौजवान लड़के की ही तस्वीर घूमती रही जो अन्य कुलियों से बिल्कुल भिन्न किस्म का था। उसका व्यवहार से भले घर की खुशबू आती थी। पेशेवर कुलियों से बिल्कुल अलग दीपक नाम का यह लड़का अपनी मंजिल न पाकर कुछ लाचार तो दिखाई देता था किन्तु हिम्मत ना हारी थी। उसकी वाणी में भी मिठास विराजमान थी। न जाने दीपक जैसे कितने लड़के-लड़कियाँ फिल्मी पर्दे की वास्तविकता जाने बगैर मुम्बई में हीरो बनने के लिए तथा टेलिविजन के पर्दे पर छाने के लिए हर क्षण सपने बुनते रहते हैं और एक दिन हँसते -खेलते परिवार को बिना बताए उसके हाल पर छोड़कर या जिद करके मुम्बई की राह पकड़ते है। उस समय वे घर वालों की एक न सुनकर अपने निर्णय को सर्वोपरि मानकर ठीक समझते है क्योंकि वे सोचते है कि एक दिन बड़े स्टार बनकर अपने घर परिवार वालों को अधिक खुशियाँ दे पाएंगे। उनकी सोच में कोई दो राय नहीं है किन्तु फिल्मी पर्दे की जिन्दगी पर्दे पर जितनी आकर्षक चकाचौंध भरी दिखाई देती है वास्तव में बिल्कुल इसके उलट उतनी ही कठिन, संघर्षशील एवं षड़यन्त्रों से परिपूर्ण होती हैं। और जब ये फिल्मों की गंध से आकर्षित युवक-युवती सच्चाई का मुकाबला करते है तो कुछ तो होटलों, क्लबों में लोगों की सेवा करते है या फिर रेलवेस्टेशन, ढ़ाबों और वाहनों पर मजदूरी करते-करते मुम्बईयाँ छोकरों की तरह चालूकिस्म के हो जाते है। और कुछ अपराध की दुनिया के हाथों चढ़कर ताउम्र उस दलदल से बाहर आने को तरसते रहते है फिर मुम्बई के अन्धेरे में ही न जाने कहाँ गुम हो जाते है। किन्तु पता नहीं क्यों मेरे मन को लगता है कि दीपक इन सबसे अलग हटकर है, यह लड़का जीवन में आगे चलकर जरूर नाम कमाएगा। यह सोचता-सोचता मैं अपने प्रतिदिन की दिनचर्या में व्यस्त हो गया। फिर कभी-कभी जब ट्रेन से कहीं जाता तो मुझे दीपक का ध्यान हो उठता और मेरी निगाहें प्लेटफार्म पर उसे ढूँढने लगती। फिर धीरे-धीरे दीपक की बातें और उसकी सूरत दिमाग में समय के साथ धुंधली होती चली गई।
मैं अक्सर प्रतिदिन प्रातः सैर को जाया करता था, सैर के बाद घर वापिस आता तो सबसे पहले गेट में पड़े अखबार को उठाता और पसीना सूखने तक उसे पढ़ता। आज भी जैसे ही मैंने अखबार उठाया तो फ्रंट पेज पर ही मेन खबर लगी थी कि, “मुम्बई सेंट्रल रेलवेस्टेशन पर दो खतरनाक आतंकवादियों के ब्लास्ट करने के मंसूबे असफल” प्रारम्भ में हैडलाईन पढ़कर लगा कि हमारे महाराष्ट्र की पुलिस देश में सर्वाधिक चुस्त फोर्स है अवश्य ही किसी बहुत ही चौकस पुलिस ऑफिसर की बुद्धिमता के कारण ही यह सफलता मिली होगी और बहुत बड़ा हादसा जिसमें जाने कितने लोगों की जाने जा सकती थी। खैर कल्पनाओं से बाहर निकलकर जब मैंने विस्तार से आगे पढ़ना शुरु किया तो मेरा माथा ठनका... दीपक! (कुछ जाना सा नाम खैर...) दीपक नाम के नौजवान कुली की बुद्धिमता के कारण आतंकवादियों की भयंकर योजना धाराशायी हुई, क्योंकि संदेह होने पर दीपक ने पुलिस की राह पकड़ी और आतंकवादियों का पर्दाफाश किया किन्तु पुलिस की लापरवाही से दोनों आतंकवादी स्टेशन से भागने में सफल रहें और पुलिस ने पूरे क्षेत्र की नाकाबंदी की। खब़र पढ़ते ही मेरे सामने उस नौजवान लड़के का चित्र उभर आया जो एकबार मेरे पास आशा भरी नज़रों से मेरा सामान उठाने के लिए विनम्रता से बैग माँग रहा था। मेरी धुंधली यादों से जैसे ही धूल छटी, मैंने दौड़कर टी.वी. ऑन किया तो न्यूज चैनल पर यही खब़र चल रही थी कि एक होनहार युवक की होशियारी से शहर का एक बड़े हिस्सा बम ब्लास्ट की चपेट में आने से कैसे बचा। टी.वी. रिपोर्टर बता रहें थे कि जब व्यक्ति ट्रेन से उतरे तो सभी कुलियों की तरह दीपक नाम के कुली लड़के ने भी दो व्यक्तियों का सामान उठाया और उनके पीछे-पीछे चल दिया किन्तु संदेह होने पर दीपक रेलवे स्टेशन पर स्थित पुलिस चौंकी में चला गया। अब हम आपको सारा किस्सा दीपक की जुबान में ही सुनवाते है। यह सुनते ही मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे मेरा कोई सगा-सम्बन्धी, कोई अपना स्क्रीन पर आने वाला है, मैं बहुत उत्सुकता से टी.वी. की स्क्रीन से चिपककर बैठ गया। मैं बहुत धैर्यविहीन हो रहा था तभी दीपक का जीता-जागता पूरा चित्र स्क्रीन पर आया, मेरी जिह्वा उससे बोलने को आतुर हो रही थी, मैंने सिद्धार्थ की माँ को आवाज लगाई- "उमा! ओ उमा... अरे सुनो तो... देखो वही लड़का... जिसके बारे में मैं अक्सर तुम्हें बताया करता था, देखो तो टी.वी. पर उसका इन्टरव्यू आ रहा है”। तभी दीपक ने बताना शुरु किया कि “प्रतिदिन की तरह जब ट्रेन आई तो लोग अपना-अपना सामान उतार रहे थे, मैं एक यात्री परिवार का सामान ले जाने का मोल-भाव कर रहा था, सामान भी अधिक था। मैं उनसे तीस रूपये माँग रहा था किन्तु वे बीस रूपये से अधिक एक पैसा भी देने को तैयार न थे तभी दो लोगों ने मुझे आवाज लगाई अरे सुनो! हमारा सूटकेस ले जाओगे? मैंने कहा क्यों नहीं बाबू जी लेकिन पूरे तीस रूपये लगेंगे। वे बोले हम तुम्हे पूरे सौ रूपये देंगे, चलो जल्दी उठाओ। मैंने फटाफट सूटकेस उठाया, जो काफी भारी था और उनके पीछे-पीछे चल दिया। किन्तु मेरे जहन में यही बात घूम रही थी कि एक सूटकेस के लिए बाबू जी सौ रूपये दे रहे हैं जबकि मैंने तो तीस रूपये कहे थे, मुझे यह हजम ही नहीं हो रहा था, मन कह रहा था कि जरूर कोई गड़बड़ है ये आदमी भी मुझे गड़बड़ ही लग रहे थे। मैं चुपचाप उनके पीछे चलता रहा और उनकी गतिविधियों पर पैनी नज़र रखे हुए था। वे शक्ल से भी संदिग्ध लग रहे थे। उनके चलने, बात करने और इधर-उधर देखने के तरीके से मुझे लगा कि दाल में कुछ काला है और पीछे चलता हुआ यकायक रास्ता बदलते हुए स्टेशन पर ही स्थित पुलिस पोस्ट पर गया और जल्दी-जल्दी सारी बात पुलिस को बतायी। जब उन्होंने सूटकेस को खोलकर देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। पुलिस वालों के मुताबिक सूटकेस में सात-आठ ब्लास्ट का पूरा सामान था। पुलिस अधिकारी ने चार-पाँच जवान लेकर मेरे बताये अनुसार उनका पीछा किया किन्तु शायद उन्होंने मुझे पुलिस पोस्ट में घुसते हुए देख लिया होगा अन्यथा वे शूटकेस के कारण मुझे स्टेशन पर ढूँढ़ रहे होते”। रिपोर्टर ने बताया कि “पुलिस ने नाकाबंदी कर उन संदिग्ध लोगो को ढूँढना शुरु कर दिया है तथा दीपक के बताये अनुसार उनके स्कैच भी तैयार करवा लिए है। मैंने चैनल बदला तो सभी न्यूज चैनलस् पर एक ही खबर थी कोई कह रहा था कि पुलिस की नाकामी से आतंकवादी फरार हो गए। कोई ब्लास्ट से हो सकने वाले नुकसान के आंकड़े बता रहा था तो कोई बार दीपक को बताते हुए दिखा रहे थे। कोई सरकार की आतंकवाद पर ढुलमुल नीतियों को जिम्मेवार ठहरा रहे थे तो कोई दीपक से इधर-उधर के प्रश्न पूछ रहे थे। “जब आपने सूटकेस में ब्लास्ट का सामान देखा तो उस समय कैसा लगा? दीपक आपको उन पर शक पहली बार कब हुआ? क्या तुम्हे अपनी जान जाने का डर नहीं लगा? यदि तुम्हारी जान को खतरा हो जाता तो? तुम कब से स्टेशन पर काम कर रहे हो? आगे तुम क्या चाहते हो कि सरकार जन सुरक्षा के कैसे उपाय करें? तुम्हारी इस हिम्मत व बुद्धिमता का श्रेय किसे देना चाहोगे”? दीपक बारी-बारी सभी प्रश्नों का जवाब देता किन्तु तभी दूसरी ओर से कोई अन्य प्रश्न पूछने लगता। वह समझ ही नही पा रहा था कि पहले किसके प्रश्न का उत्तर दें फिर भी वह आधे-अधूरे जवाब देता जा रहा था।
इन सभी प्रश्नों में से यह भी पब्लिक के सामने आ गया कि दीपक एक अच्छे परिवार से सम्बन्ध रखता है और फिल्मों में काम न मिलने के कारण घर वापिस न जाकर यही कुली का काम करना शुरु कर दिया। फिर क्या था, इस पढ़े-लिखे युवक की लोगों ने जी भर कर प्रशंसा की।
मैं और उमा जड़ होकर स्क्रीन पर दीपक को देखे जा रहे थे। तभी सरकार की ओर से कथन (Statement) आया कि इस होनहार बहादुर युवक को 26 जनवरी पर सम्मानित किया जाएगा। जब पत्रकारों ने जनता की प्रतिक्रिया लेनी शुरु की तो हर व्यक्ति दीपक को अपना हीरो बता रहा था। कुछ लोग सरकार से ही जवाब माँग रहे थे कि क्यों ना दीपक जैसे पढ़े-लिखे बहादुर युवकों को निठल्ले पुलिस वालों के स्थान पर नौकरी में रखा जाये। कुछ दीपक को बहादुरी पुरस्कार के रूप में पुलिस में नौकरी देने की वकालत कर रहे थे। कुछ सभी को दीपक जैसा बहादुर होना चाहिए यह दलील दे रहे थे। लोगों में भारी जोश था। आज जनता का हीरो कोई अभिनेता या खिलाड़ी ना होकर राष्ट्र-सुरक्षा पर अपने जीवन को खतरें में डालने वाला यह नौजवान बहादुर दीपक था जो खतरनाक आतंकवादियों की नाक के नीचे से बम ब्लास्ट से भरा सूटकेस पुलिस के पास पहुँचाकर दुर्दांत योजना को असफल करने में सफल हो सका।
आज मुझे दीपक से कहे अपने वो शब्द याद आ रहे थे कि, “एक दिन तुम बहुत नाम कमाओगे, बड़े आदमी बनोगे।” फिल्मी पर्दे का हीरो बनने आया दीपक अब जनता का वास्तविक हीरो बन गया था।
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बाल खंड (किड्स कार्नर)
“दोहे”
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द्वारा - श्रीमती रश्मि विभा त्रिपाठी
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श्रीमती रश्मि विभा त्रिपाठी, आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत से हैं। शिक्षाशास्त्र में एम• ए• की डिग्री प्राप्त की है। घर गृहस्थी संभालते हुए कविता लिखने एवं अनुवाद करने में अपने समय का सदुपयोग कर रही है। साथ ही वाशिंगटन डी.सी. से रेडियो स्टेशन पर कविता प्रसारण तथा भाषा सम्बन्धी भेंटवार्ता, रेडियो स्टेशन ओहियो, यू.एस.ए. के लिये भी समय निकाल ही लिया।
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1. अगर मीत ऐसा मिले, दो प्रभु को आभार।
हाल तुम्हारा जान ले, जो बिन चिट्ठी, तार।।
2. तेरी वाणी रसभरी, भावों में यथार्थ।
तुझको पाकर हो गया, जीवन मेरा कृतार्थ।।
3. मुझको राहों पर मिले, पल- पल केवल हर्ष।
इसीलिए तुमने किया, पग- पग पर संघर्ष।।
4. दूजे के सुख के लिए, श्रम करते अश्रांत।
तुम ही सच्चे प्रेम का, एकमात्र दृष्टांत।।
5. मुझको तो ऐसा हुआ, सचमुच तेरा प्यार।
मानो किसी अकिंचन ने, पाया हो भण्डार।।
6. क्या बुरा जो मैं धरूँ, बस तेरा ही ध्यान।
तेरे भीतर देख लिया, मैंने तो भगवान।।
7. जग की शाला में तुम्हीं, सच्चे गुरु हो एक।
मुझे निशुल्क सिखा रहे, हर विज्ञान, विवेक।।
8. अटक गए वे देखके, धन या पद का लोभ।
तेरा प्यार मिला मुझे, उनको फिर क्यों क्षोभ।।
9. जिस मन पावन प्रेम का, अगर नहीं है लेश।
मानें ना मानें भले, जीवन उनका क्लेश।।
10. दूर किया तुमने सदा, मेरे मन का रोष।
पग- पग पर आशीष का, देके पारितोष।।
11. मन ज्यों निर्मल जाह्नवी, आशीषों की धार।
मेरे सुख का स्रोत है, केवल तेरा प्यार।।
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संकलित द्वारा: अलका खंडेलवाल
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श्रीमती अलका खंडेलवाल अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के नार्थ ईस्ट ओहायो चैप्टर की सक्रिय सदस्या है। इनकी विशेष रुचि बच्चों को हिंदी सिखाने में है और अक्रोन ऑहियो में अपना योगदान करीब १० सालों से दे रहीं हैं।
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आओ हिन्दी सुधारें
हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...।
कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...।
जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं क्रियाएँ नहीं...
जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...।
इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है...
इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...।
इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...।
'नई' ग़लत है, सही शब्द 'नयी' है...
मूल शब्द 'नया' है, उससे 'नयी' बनेगा...।
क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...?
(‘मिलाई' ग़लत है...।)
आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...।
(‘जताई' ग़लत है...।)
उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...।
('पाई' ग़लत है...।)
अब आइए 'ए' और 'ये' के प्रयोग पर...।
बच्चों ने प्रतियोगिता के दौरान सुन्दर चित्र बनाये...।
(‘बनाए' नहीं...।)
लोगों ने नेताओं के सामने अपने-अपने दुखड़े गाये...।
(‘गाए' नहीं...।)
दीवाली के दिन लखनऊ में लोगों ने अपने-अपने घर सजाये...।
(‘सजाए' नहीं...।)
तो फिर प्रश्न उठता है कि 'ए' का प्रयोग कहाँ होगा..?
`ए' वहाँ आएगा जहाँ अनुरोध या रिक्वेस्ट की बात होगी...।
अब आप काम देखिए, मैं चलता हूँ...।
(‘देखिये' नहीं...।)
आप लोग अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी के विषय में सोचिए...।
(‘सोचिये' नहीं...।) नवेद! ऐसा विचार मन में न लाइए...।
(‘लाइये' ग़लत है...।)
अब आख़िर (अन्त) में 'यें' और 'एँ' की बात...
यहाँ भी अनुरोध का नियम ही लागू होगा...
रिक्वेस्ट की जाएगी तो 'एँ' लगेगा, 'यें' नहीं...।
आप लोग कृपया यहाँ आएँ...।
(‘आयें' नहीं...।)
जी बताएँ, मैं आपके लिए क्या करूँ ?
('बतायें' नहीं...।)
मम्मी, आप डैडी को समझाएँ..।
'समझायें' नही।)
अन्त में सही-ग़लत का एक लिटमस टेस्ट...
एकदम आसान सा...
जहाँ आपने 'एँ' या 'ए' लगाया है, वहाँ 'या' लगाकर देखें...।
क्या कोई शब्द बनता है ?
यदि नहीं, तो आप ग़लत लिख रहे हैं...।
आजकल लोग 'शुभकामनायें' लिखते हैं...
इसे 'शुभकामनाया' कर दीजिए...।
'शुभकामनाया' तो कुछ होता नहीं,
इसलिए 'शुभकामनायें' भी नहीं होगा...।
सही शब्द शुभकामनाएं होगा ।
'दुआयें' भी इसलिए ग़लत हैं और 'सदायें' भी...
'देखिये', 'बोलिये', 'सोचिये' इसीलिए ग़लत हैं क्योंकि 'देखिया', 'बोलिया', 'सोचिया' कुछ नहीं होते...।
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“बॉबी राज को अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एवं प्रवासी भारतीयों की ओर से हार्दिक बधाई”
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भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारतीय भी दुनिया की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तलाश में हैं। गांवों के कई प्रतिभाशाली छात्र राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम ऊँचा कर रहें हैं। इनमें से कई लोगों को जीवन में बड़े-बड़े काम करने का मौका भी मिलता है। पटना जिले के मसौढ़ी के चापोर गांव में तीसरी कक्षा के छात्र बॉबी राज को 'छोटे खान सर' के नाम से जाना जाता है। इस समय सुर्खियों में रहने वाले बॉबी किसी भी गणित को चुटकियों में हल कर देते हैं। उन्होंने 10वीं कक्षा तक गणित के पाठ्यक्रम में भी महारत हासिल की है। बॉबी के पिता एक शिक्षक थे, इसलिए बॉबी ने यह कला अपने पिता से सीखी। बॉबी राज जैसे बच्चे, बच्चों और वयस्कों के लिए प्रेरणा और प्रेरणा के स्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से बॉबी राज को बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
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“अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री स्वपन धैर्यवान, ह्यूस्टन को हार्दिक बधाई”
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इंडिया कल्चर सेंटर के ७६वें वार्षिक समारोह में “आई.सी.सी. लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार” से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्षश्री स्वपन धैर्यवान, ह्यूस्टन, टेक्सास को सम्मानित किया
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“अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति एवं सभी हिंदी प्रेमियों की ओर से
भावभीनी श्रधांजलि”
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श्रीमती विभा मेहरोत्रा, लावेरानिया, टेनेसी
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श्रीमती विभा मेहरोत्रा, लावेरानिया, टेनेसी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की आजीवन सदस्य थी। इन्होने हिंदी की बढ़ोत्री के लिये २००५ -२०१५ तक अथक परिश्रम किया एवं सफल भी रहीं। इन्होने अच्छी संख्या में अ.हि.स.के आजीवन सदस्यों में वृद्धि की। अ.हि.स. की राष्ट्रीय सचिव जनवरी २०१२-दिसंबर २०१३ तक एवं अ.हि.स. नैशविल, टेनेसी शाखा अध्यक्ष जुलाई २००७ में रही एवं अपने दायित्व को अच्छी तरह निभाया । अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सदस्य उनको हमेशा याद रखेंगे एवं उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं।
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“अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति: इंडियाना शाखा
2023-2024 सत्र का निर्वाचन”
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नवंबर 2022 के पहले सप्ताह के दौरान, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति - इंडियाना शाखा के कुछ आजीवन सदस्यों के साथ मौजूदा कोर कमेटी की बैठक हुई। सर्वसम्मति (मतदान) के आधार पर वर्ष 2023 एवं 2024 सत्र के लिए नये पदाधिकारियों का निर्वाचन किया गया ।
1. डॉ. राकेश कुमार, २०२३ -२४ सत्र के लिये पुनः अध्यक्ष निर्वाचित किये गये
2. श्रीमती विद्या सिंह, २०२३ -२४ सत्र के लिये उपाध्यक्ष निर्वाचित की गयी
3. डॉ. कुमार अभिनव, २०२३ -२४ सत्र के लिये सचिव निर्वाचित किये गये
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"संवाद" की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
सहसंपादक – डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP, dr.archana2309@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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सुशीला मोहनका
(प्रबंध सम्पादक)
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क्रिस्मस एवं गुरु गोविन्द सिंह जयंती की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) के प्रकोप से अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवायें एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी। जागृति’ की ग्यारहवीं कड़ी शनिवार, १४ जनवरी २०२३ को दिन में १०:०० बजे (EST) से अमेरिका में और १४ जनवरी २०२३ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
शाखा अध्यक्ष-अध्यक्षाओं से एक विशेष निवेदन है कि वे अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें समय से प्रकाशित किया जा सके। जिन स्थानीय समितियों ने अग्रिम सूचना भेजी है उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजे तथा कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
‘संवाद’ नवम्बर २०२२ का अंक पढ़कर जिन्होंने प्रतिक्रया भेजी हैं उनको धन्यवाद। आप सभी से विशेष अनुरोध है कि ‘संवाद’ का दिसम्बर २०२२ का अंक भी अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने से सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें।
सहयोग की अपेक्षा के साथ,
सुशीला मोहनका
sushilam33@hotmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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