संवाद - December 2021

संवाद - December 2021

 
 
 
 
 
INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
 दिसम्बर  2021, अंक  ७  | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
 
Dear readers,
On behalf of International Hindi Association, I wish you happy new year 2022.
The online Self-paced Hindi learning as 2nd language is released and available to young children to start learning at https://hindi.org/Hindi-Education-Learn.html. For additional questions or information, please contact Sh. Hari Singh at (703) 939-1838.
Starting 2022, a new online event “Jagriti” is introduced where we will have a special guest every time to discuss a special topic about Hindi. For more information, contact Sh. Rakesh Kumar at (317) 730-4086.
I congratulate editorial board for their commitment and consistent release of monthly newsletter and quarterly Vishwa publications. There are special rates for annual advertisements in Vishwa for 2022. Please contact Smt. Sushila Mohanka at (330) 786-8351.
In lieu of World Hindi Day, Indiana and North Carolina chapters are organizing special events. There is new section introduced at www.hindi.org where any announcements and upcoming events will be published. Please check this section frequently to stay updated.
With Omni virus spreading fast, we wish you good health and hope we will have in-person events this year.
Regards
On behalf of International Hindi Association
Ajay Chadda
 
 
अ.हि.स. का २०वाँ द्विवार्षिक आभासी अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन 
कार्यक्रम की झलक- बचे हुए रिपोर्ट  (सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं कार्यशालायें ) 
 
 
 
 
हिंदी संस्कृति एवं  हिंदी भाषा के सम्मान और स्वाभिमान की वैश्विक स्थापना के संकल्प के साथ  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २० वें द्विवार्षिक अधिवेशन सम्पन्न हुआ। अधिवेशन में सारी गतिविधियाँ मूल विषय के लक्ष्य की पूरक रर्हीं । विवरण अक्टूबर  एवं नवम्बर २०२१ के संवाद में प्रकासित  हुआ । इस  अंक  में  सांस्कृतिक प्रोग्राम एवं  कार्यशालाओं  का  विस्तृत  विवरण आपके समक्ष हैं।
 
 
 सांस्कृतिक कार्यक्रम संध्या ( Cultural Evening )
की रिपोर्ट, मेडाइना ओहायो - ९  अक्टूबर, २०२१
 
 
द्वारा --अधिवेशन समिति
अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो की स्थानीय समिति के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम शाम ७ बजे शुरू हुआ। समारोह की उद्घोषक श्रीमती रेणु चड्ढा और श्री नरेंद्र सिंह भानवाला थे। इस कार्यक्रम में अ.हि.स. की कई स्थानीय शाखाओं ने अपना पूर्ण सहयोग दिया।
सांस्कृतिक कार्यक्रम
सरस्वती वंदना –राधा एवं शिव कोंताम्वर
गणेश वंदना – मेधा एवं कैरव मालपानी (प्रतिभा खंडेलवाल के नतनी-नाती)
नृत्य ‘अंगकला डांस कम्पनी’ श्रीमती अन्तरा दत्ता एवं १८ बच्चों द्वारा नृत्य
श्रीमती अन्तरा दत्ता – किमया कोड़े घास्सेमिच, सानाया त्रिपाठी, सानिका महादिया, इशानी सेन, तमन्ना ठक्कर, परिनीर्ता कपूर, गार्गी चौधरी, अनीता श्रीधर, अलिफ़ लैला, अनुश्का बारवे, जानया उल्लाल, प्रेक्षा मित्तल, मेधा मित्तल, आर्ना चौधरी, शक्ति प्रभाकरन, नागैषा नागाजोठी, रीका चंद्रा एवं वृंदा राठी
डॉ. स्वस्ति पाण्डेय, लोक गीत, कैलिफ़ोर्निया
इंडिआना चैप्टर स्थनीय समिति द्वारा किये गये कार्यक्रमों का विशेष वीडियो, द्वारा इंडिआना चैप्टर अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार अधिवेशन के लिए विशेष कार्यक्रम का विडियो
नृत्य - वैशाली शर्मा, कोपली, ओहायो
डॉ. शिवानी मातनहेलिया द्वारा, गीत, उत्तर प्रदेश, भारत
नैशविल चैप्टर स्थनीय समिति द्वारा किये गये कार्यक्रमों का विशेष वीडियो –
a.अधिवेशन के लिए विशेष कार्यक्रम का विडियो b. पूजा श्रीवास्तव का कार्यक्रम
(पूजा श्रीवास्तव और आलोक नंदा ने नैशविले शाखा की गतिविधियों को साझा किया)
9.किड्स डांस - विद्या वेल्चामी, पिया खत्री, साना जैन, आरिका गैरोला, मिहिका जैन, आन्या गोयल, नव्या गोयल, नैना जैन
रिंकू कालिया के द्वारा ग़ज़ल, चंडीगढ़, भारत
कनाडा से - मुकुल स्कूल के बच्चों ने किया नृत्य किया - वीरा जैन, आशी सेठ, आशी अभिप्रिया, आद्या गोयल, डेमिरा साहित्य नक्का, सियोना अग्रवाल, तनीषा जैन, सियोना गुप्ता, अनन्या तिवारी, कोमल शुक्ला, अनन्या दत्ता, विहान श्रीवास्तव, आरव बिचित, मनस्वी कुमार, सनय पुरोहित
अद्वेका सिन्हा, अनाघा सिन्हा, दर्शिनी वदन, हंसिनी वदन, मेहर गुप्ता, प्रिया शर्मा स्वरांजलि ‘Wellington Hindi school’ -New Zealand- यह स्कूल १९९२ में स्थापित हुयी थी | १० बच्चों ने भाग लिया - नजली , आयुष रंजन, अभिरूप गोस्वामी, अद्रिक गोस्वामी, हर्षिता राजमणि, मेंहरप्रीत कौर सिंह, कार्थिक सेतुरामालिंगम, शौर्य गुप्ता, सम्रता पांडा, वैष्णवी रंजन
Kaleidoscope (केलाइडोस्कोप) नृत्य, न्यू यार्क
न्यू जर्सी, चैप्टर स्थनीय समिति द्वारा किये गये कार्यक्रमों का विशेष वीडियो –डॉ. बबिता श्रीवास्तव शाखा अध्यक्षा के द्वारा
नॉर्थ केरेलीना चैप्टर, स्थनीय समिति द्वारा किये गये कार्यक्रमों का विशेष वीडियो – प्रिय भरद्वाज शाखा अध्यक्षा के द्वारा
 
 
 
समारोह के उद्घोषक
 
श्रीमती रेणु चड्ढा और श्री नरेंद्र सिंह भानवाला
 
 
 
 
 सरस्वती वंदना
 
राधा एवं शिव कोंताम्वर
 
 
गणेश वंदना 
 
मेधा एवं कैरव मालपानी
 
 
 
 
 नृत्य ‘अंगकला डांस कम्पनी’- 
 
 श्रीमती अन्तरा दत्ता – किमया कोड़े घास्सेमिच, सानाया त्रिपाठी, सानिका महादिया, इशानी सेन, तमन्ना ठक्कर, परिनीर्ता कपूर, गार्गी चौधरी, अनीता श्रीधर, अलिफ़ लैला, अनुश्का बारवे, जानया उल्लाल, प्रेक्षा मित्तल, मेधा मित्तल, आर्ना चौधरी, शक्ति प्रभाकरन, नागैषा नागाजोठी, रीका चंद्रा एवं वृंदा राठी
 
 
  लोक गीत 
 
डॉ०  स्वस्ति पाण्डेय, लोक गीत, कैलिफ़ोर्निया, 
 
 
 
 
किड्स डांस  
 
.किड्स डांस - विद्या वेल्चामी, पिया खत्री, साना जैन, आरिका गैरोला, मिहिका जैन, आन्या गोयल, नव्या गोयल, नैना जैन.
 
 
  ग़ज़ल
 
रिंकू कालिया के द्वारा ग़ज़ल, चंडीगढ़, भारत.
 
 
भाषा की यात्रा - "हिंदी भाषा की यात्रा" शाम के कार्यक्रम का भव्य समापन "हिंदी भाषा की यात्रा" नाम की संगीत-नाटिका से हुआ। समिति की सबसे वरिष्ठ सदस्या, डॉ स्नेह राज जी के मार्गदर्शन में, श्री अनंत माथुर, श्रीमती ऋचा माथुर और श्रीमती अलका खंडेलवाल के निर्देशन में क्लीवलैंड, ओहायो के बहुत से बच्चों और वयस्कों ने इस संगीत नाटक में भाग लिया। उत्कृष्ट फिल्म संपादन, संपूर्ण संगीत और कलात्मक प्रस्तुति की डिजिटल प्रस्तुति के कारण आंखों के लिए एक सुहावनी प्रस्तुति थी। ऋग्वेद से आधुनिक काल (वर्तमान समय) तक – वेदिक, संस्कृत, प्राकृत और पाली से बुद्ध, महावीर, सूफी, तुलसी, मीरा, कबीर और सूरदास आदि को इस संगीत-नाटिका में बड़ी अच्छी तरह जोड़ा गया । नाटक में सभी युगों के तालमेल को बनाए रखने का प्रयास किया गया । उन्होंने सृष्टि के प्रारम्भ से हिंदी भाषा की यात्रा को दर्शाया गया। कैसे भारत के हर प्रमुख धर्म, आध्यात्मिक समूहों, विभिन्न शासकों और विभिन्न भाषाओं और संगीत, नृत्य जैसे विभिन्न कला रूपों को भाषा के विकाश के लिए साझा किया। लेखन, कविता, फिल्मों, डिजिटल और सोशल मीडिया आदि ने सदियों से हिंदी भाषा की अभिव्यक्ति और प्रसार में योगदान दिया है। हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, पंत, निराला, जय शंकर आदि कवियों के साथ-साथ विदेशों में रह रहे प्रवासी जैसे श्री गुलाब खंडेलवाल, श्री रमेश जोशी और कुछ आने वाले युवा कवियों के कार्यों और जुनून के माध्यम से दुनिया भर में हिंदी तक पहुँचा रहे हैं।
नाटिका में दृश्य, मौखिक, अभिव्यंजक लाइव वीडियो, चित्रमय चित्रण, लाइव गायन और अभिनय के माध्यम से खूबसूरती से प्रदर्शन किया। प्रस्तुति ने हमारी प्यारी मातृभाषा - हिंदी के महत्व के बारे में एक बहुत ही शक्तिशाली संदेश दिया। बहुत ही रचनात्मक संपादन और एक अनूठी डिजिटल रचना का श्रेय अनंत माथुर, अशोक खंडेलवाल, डॉ. विवेक खंडेलवा की टीम को जाता है। यात्रा के दौरान वॉयस ओवर रश्मि चोपड़ा, डॉ तेज पारिख, डॉ. अनूप कपूर, अनूप अरोड़ा, और डॉ. स्नेह राज द्वारा निष्पादित किया गया था। महान कवयित्री श्रीमती महादेवी का एक लाइव वीडियो वर्मा. हम भारत और अपनी मातृभाषा पर गर्व महसूस करते हुए कार्यक्रम से बाहर चले गए।
यदि आप इसे देखने से चूक गए हैं, तब भी आप पूरा कार्यक्रम यहाँ देख सकते हैं
https://www.YouTube.com/watch?v=_OMgvg575d
 
 
 
 
"हिंदी भाषा की यात्रा" कार्यक्रम से जुडे कुछ लोग 
 
 
कार्यशालाओं की रिपोर्ट, मेडाइना ओहायो -- ९ एवं १० अक्टूबर, २०२१
 
 
   द्वारा --अधिवेशन समिति
 
 
९ और १० अक्टूबर २०२१ को, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के 20 वें द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी अधिवेशन का आभासी आयोजन अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के आतिथ्य में किया गया। १५०० से भी अधिक दर्शकों को इस कार्यक्रम से जुड़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की सफलता सराहनीय रही। यह अधिवेशन हिंदी भाषा की लोकप्रियता को प्रोत्साहित करने का भी स्रोत बना।

अधिवेशन मूल विषय- ‘दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने और सिखाने की विधि’ पर केंद्रित था। दो दिनों के इस आयोजन में सांस्कृतिक कार्यक्रम, औपचारिक संवाद और सन्देश के साथ सारी बातें मूल विषय के आस-पास ही थी।

इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए ८ कार्यशालाएं हुयी। इस कार्य के लिए हिंदी भाषा के प्रमुख और सुविख्यात शोधकर्ता और शिक्षकों को निमंत्रित किया गया। चार प्रस्तुतियाँ ९ अक्टूबर और चार प्रस्तुति १० अक्टूबर को की गयी। इन सब का विवरण संक्षिप्त में नीचे दिया जा रहा है।
 
कार्यशालाओं की व्यवस्था एवं प्रस्तुति को विधिवत कार्यान्वित करने और सफल बनाने के लिये किरण खेतान एवं रश्मि चोपड़ा को विशेष धन्यवाद। ये दोनो हिंदी भाषा एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार -प्रसार में पिछले तीस - चालीस वर्षों से अमेरिका में लगातार संलग्न हैं।
 
 
कार्यशालाओं  के व्यवस्थापक एवं  प्रवक्ता 
 
 
 
 
व्यवस्थापक
श्रीमती किरण खेतान
 
 
  व्यवस्थापक
श्रीमती रश्मि चोपड़ा
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -१
डॉ. गेब्रिएला निक ल्लिएवा
 
 
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -२
डॉ आस्था नवल
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -२
 रचना श्रीवास्तव
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -२
अंशु जैन
 
 
 
 
 कार्यशाला प्रस्तुति -२
राखी शर्मा
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -३
डॉ. शिवानी मतेन्हेलिया
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -४
साधना कुमार
 
 
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -४
नुपुर खंडेलवाल
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -५
विद्या नाहर
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -६
प्रो० नीलू गुप्ता
 
 
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -७
ममता त्रिपाठी
 
 
कार्यशाला प्रस्तुति -८
डॉ० राजीव रंजन
 
 
 
 
 
 
 अक्टूबर ९, २०२१
 
 प्रस्तुति--१: द्वारा --डॉ. गेब्रिएला निक ल्लिएवा 
 विषय “हिंदी कक्षा में 21वीं सदी के कौशल” (21st century skills in the Hindi classroom)

डॉ. गेब्रिएला निक ल्लिएवा के बारे में-
गेब्रीएला निक एक क्लिनिकल प्रोफ्फेस्सर हैं| हिंदी भाषा के प्रति उनका समर्पण और अध्यन बहुत गहरा है| सामाजिक और सांस्कृतिक निर्माण में हिंदी भाषा की क्या भूमिका रही है उसके ऊपर उनकी विशेष अभिरुचि है| उन्होंने भाषा में लिंग के भेद और विभेद की क्या उपयोगिता है पर बहुत से शोध किये हैं और शोध पत्र प्राकशित किये हैं| संस्कृत भाषा पर भी उनका गहरा अध्यन है| उन्होंने बहुत सारे हिंदी और उर्दू साहित्यकारों, कथाकारों, कवियों का अध्यन किया है विशेष कर अमृता पीतम, कमलेश्वर, मोंटो| उनकी पकड़ और शोध इस बात में भी है की जब भाषाएँ एक दूसरे से जुड़ती हैं और अलग अलग संस्कृतियों का आदान प्रदान होता है तो किस प्रकार से भाषाओं का विस्तार होता है और विशेष रूप से बुल्गेरियन भाषाओं ने किस प्रकार हिंदी को और समृद्ध किया है|

प्रस्तुति--१  के बारे मे- गेब्रिएला जी ने मुख्य वक्ता के रूप में अपनी पहली प्रस्तुति की| उनकी प्रस्तुति का विषय “हिंदी कक्षा में 21वीं सदी के कौशल” (21st century skills in the Hindi classroom) था.
 
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 प्रस्तुति--२ : द्वारा --डॉ.आस्था नवल, रचना श्रीवास्ताव, अंशु जैन एवं राखी शर्मा
विषय  "हेरिटेज किड्स में हिंदी सिखाने को कैसे दिलचस्प बनाया जाए”   
डॉ. आस्था नवल परिचय- आस्था नवल का जन्म दिल्ली के साहित्यिक परिवार में हुआ। पिताः डॉ॰ हरीश नवल और माता डॉ॰ स्नेह सुधा से बचपन से ही लेखन कला को विरासत में पाया। ननिहाल और पिता के घर में सात वर्ष की आयु में कविता लेखन का प्रोत्साहन मिला और तबसे ही कविता और लेख लिख रही हैं। आस्था नवल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से प्रथम श्रेणी में हिन्दी में स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि ग्रहण की। यूजीसी से सीनियर छात्रवृत्ति प्राप्त की और साथ साथ जामिया मिलिया विश्विविद्यालय से हिन्दी नाटक में प्रो॰ अशोक चक्रधर के नेतृत्व में पीएचडी की। पीएचडी करते हुए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ और मिरांडा हाऊस कॉलेज में अध्यापन कार्य भी किया|
उन्नीस वर्ष की आयु में उनकी प्रथम पुस्तक ‘आस्था की डायरी’ का लोकार्पण बलगेरिया के सोफिया विश्वविद्यालय में हुआ। उनकी दूसरी पुस्तक ‘लड़की आज भी’ (प्रथम काव्य संकलन) का लोकार्पण सम्माननीय कमलेश्वर जी के करकमलों द्वारा २००६ में दिल्ली में हुआ। हाल ही में इनके दूसरे काव्य संग्रह ‘विस्थापित मन’ का प्रकशन भारत के हिन्दी साहित्य निकेतन द्वारा किया गया जिसका विमोचन वर्जीनिया में किया गया। जनवरी २०२१ में मॉरिशस विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित वैश्विक व्यंग्य लेखन प्रतियोगिता में आस्था नवल को अमेरिका में द्वितीय पुरुस्कार प्राप्त हुआ। सितम्बर २०२१में हिन्दी दिवस के अवसर पर विश्व हिन्दी साहित्य परिषद द्वारा आस्था नवल को हिन्दी प्रज्ञा सम्मान से सम्मानित किया गया।
इनका यू ट्यूब चैनल ‘आस्था की डायरी” के नाम से है जिसमें आप इनकी कविताओं के साथ साथ किस्से व समाज से जुड़ी चर्चायें भी सुन सकते हैं। सम्प्रति पति ललित ग्रोवर और दो बच्चों के साथ वर्जीनिया में रहती हैं। मौंटगमरी कॉलेज मैरीलैंड में हिन्दी अध्यापिका हैं और हिन्दी से जुड़े कार्यों में विशेष योगदान देती हैं।
 
रचना श्रीवास्ताव परिचय-
रचना श्रीवास्तव मूलतः लखनऊ, उत्तर प्रदेश की निवासी हैं और अभी अमेरिका के लॉस एंजेल्स शहर में रहती हैं। वो एक गृहणी हैं, एक माँ हैं, पत्नी हैं और अमेरिका के माध्यमिक विद्यालय में एक शिक्षिका हैं। वे रेडियो उदघोषिका हैं और भारत और अमेरिका के कई समाचार पत्रों के लिए स्वतंत्र लेखन और पत्रकारिता करती हैं। इन्होंने हिंदी कविता, अवधी कविता, हिन्दी हाइकु और कहानियों के लेखन में सराहनीय प्रकाशन और योगदान किया है । रचना जी ने हिन्दी के लेखन, अनुवाद और प्रचार-प्रसार में अनुकरणीय योगदान दिया है।
 
 
 अंशु जैन परिचय-
अंशु ने भारत के बैंगलोर में तीन साल के प्रवास के दौरान प्रवासी छात्रों को पढ़ाने के बाद हिंदी शिक्षक बनने के लिए आईटी में अपना सफल करियर छोड़ दिया। 2010 में, उन्होंने इंडस हेरिटेज सेंटर की स्थापना की, जहां वह और उनकी टीम लॉस एंजिल्स में सभी उम्र के छात्रों को पढ़ना, लिखना और संवादात्मक हिंदी पढ़ाती हैं। अधिकांश वयस्क पाठ कोविड के हिट होने से पहले ऑनलाइन थे और अब IHC सभी ऑनलाइन पाठ प्रदान करता है। UCLA के सेंटर फॉर वर्ल्ड लैंग्वेजेज में, अंशु ने एक हिंदी पाठ्यक्रम विकसित किया था और इसे कुछ वर्षों के लिए हाई स्कूल के हेरिटेज छात्रों को पढ़ाया था। उन्होंने उस समय ऑनलाइन ट्यूटोरियल विकसित करने के लिए अपने कंप्यूटर कौशल का भी उपयोग किया। अंशु जी ने हेरिटेज किड्स के छात्रों के हिंदी शिक्षकों और शिक्षकों दोनों के लिए STARTALK प्रशिक्षण प्राप्त किया है|
उन्होंने यह महसूस करने के बाद कि उनके छात्र चित्रात्मक रूप से बेहतर सीखते हैं, उन्होंने हिंदी फ्लैशकार्ड और गुजराती द्विभाषी फ्लैशकार्ड बनाए और प्रकाशित किए। वे अमेज़न पर उपलब्ध हैं।
वह देवनागरी लिपि को एक नए तरीके से सिखाने के लिए एक कार्यपुस्तिका बनाने की अपनी अगली परियोजना पर काम कर रही है।
वह वर्तमान में Apple के लिए एक भाषा निर्माता के रूप में काम कर रही है। शोध-आधारित भाषा अधिग्रहण शिक्षाशास्त्र में सलाह देती हैं और प्रशिक्षित करती हैं।
 
राखी शर्मा का परिचय – ”Cheeni For Tots” विधा की संस्थापक हैं इस संस्था की यात्रा 2008 में " Empower Tots Across The Earth!" (“पृथ्वी पर बच्चों को सशक्त बनाना”) की दृष्टि से शुरू हुई थी। संक्षेप में, जो सफर सिर्फ एक छात्रा (उनकी अपनी 5 साल की बेटी) के साथ शुरू हुआ था वह अब 170 देशों के हजारों लोगों तक पहुँच गया है। इनकी वेबसाइट के ग्राहक (Subscriber) में माता-पिता से लेकर प्रोफेसर और युवा शिक्षार्थियों से लेकर कॉलेज के छात्र शामिल हैं, जिन्होंने इनकी सामुदायिक सामग्री पुस्तकालय से हिंदी शिक्षण सामग्री डाउनलोड की है, इनके कार्यक्रमों में भाग लिया है, इनके ऑनलाइन संरचित कार्यक्रमों में भाग लिया है, और इनकी संस्था ने YouTube चैनल पर ‘9+ मिलियन व्यूज’ में योगदान दिया है। “Cheeni For Tots” नीचे लिखी विधियों से अपने काम को आगे बढ़ाने में प्रयत्नशील है-
१.मजेदार और दिलचस्प तरीके से भाषा सीखने की रुचि विकसित करना।
२.भाषा सीखने की प्रक्रिया में तेजी लाने में मदद करने के लिए ऑडियो, वीडियो, इंटरैक्टिव ग्राफिक्स जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग करना।
३. सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए विभिन्न शिक्षण शैलियों (जैसे श्रवण, दृश्य, और गतिज शिक्षार्थियों) के शिक्षार्थियों की मदद करने के लिए आधुनिक तकनीकी के साथ तैयार सामग्री प्रदान करना।
४.अधिकांश शब्दों को अंग्रेजी भाषा में नहीं लिखना, बल्कि आवाज़ के माध्यम से उच्चारण सिखाना जिससे की हिंदी का उच्चारण मजबूत हो सके।
५. माता-पिता, स्कूल के शिक्षकों, कॉलेज के प्रोफेसरों और संगठनों को संरचित मुफ्त सामग्री प्रदान करना, या फिर हिंदी भाषा सीखने की सामग्री उनकी शिक्षण आवश्यकताओं के अनुसार व्यवस्थित किए जा सकते हैं। इस तरह, शिक्षक सही मायने में आधुनिक सामग्री का उपयोग करके सर्वोत्तम संभव तरीके से शिक्षण की अपनी प्रतिभा पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
 
 प्रस्तुति--२  के बारे में-
आस्था नवल के नेतृत्व में “हेरिटेज किड्स में हिंदी सिखाने को कैसे दिलचस्प बनाया जाए” की प्रस्तुति की गई| शुरू के ५ मिनटों में उन्होंने अपना और अपने साथियों का परिचय दिया| फिर क्रमशः रचना श्रीवास्तव जी, अंशु जैन और राखी शर्मा जी ने अपनी अपनी प्रस्तुति दी | बीच बीच में आस्था नवल जी उनकी प्रस्तुतियों के बारे में बातचीत भी कर रही थीं और दर्शकों के सावाल भी इनके सामने रख रही थीं जिनके जवाब बखूबी मिल रहे थे| अंत में आस्था नवल जी ने प्रस्तुति को सारांशित किया|
 
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प्रस्तुति--३ : द्वारा --डॉ.  शिवानी मतेन्हेलिया 
 विषय  “हिंदी शिक्षण में एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में संगीत की भूमिका: युवा पीढ़ी के           विशेष संदर्भ में”
 
परिचय- डॉ. शिवानी मतेन्हेलिया उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद से संबद्ध कला व संस्कृति के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी डॉ शिवानी मातनहेलिया संगीतज्ञ, कवियित्री, गीतकार, लेखिका, शोधार्थी, वक्ता, शिक्षिका और संगीत निर्देशक का अद्भुत समन्वय हैं।
उन्हें शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "यश भारती" के अतिरिक्त संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए 25 से अधिक सम्मान दिए गए हैं।

प्रस्तुति --३  के बारे में-
इनकी प्रस्तुति का विषय “हिंदी शिक्षण में एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में संगीत की भूमिका: युवा पीढ़ी के विशेष संदर्भ में” था|
अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए इन्होंने शीर्ष भक्त-कवियों के उदाहरण दिये, जिन्होंने समाज के सामान्य जन को अपने विचारों से जोड़ने के लिए उपदेश या प्रवचन नहीं, वरन संगीत को माध्यम बनाया। संत कबीर, मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास, नानक देव आदि आज शताब्दियों बाद भी पढ़े या सुने नहीं, बल्कि गाए जाते हैं। इस संदर्भ में इन्होंने फिल्मी गीतों का उल्लेख भी किया और बताया कि विदेशों में अहिंदी भाषी जन-समुदाय को हिंदी भाषा से परिचित व संबद्ध करने में हिंदी फिल्मी गीतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने बताया कि संगीत के माध्यम से हिंदी-शिक्षण करने का अपरोक्ष लाभ भाषा के साथ संस्कृति का बोध होना भी स्वयमेव संभव हो जाता है। इसी प्रकार विभिन्न संस्कारों व परंपराओं से संबंधित गीत सिखा कर नई पीढ़ी को न केवल हिंदी भाषा, अपितु भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान कराया जा सकता है|
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प्रस्तुति--:४ द्वारा --साधना कुमार एवं नुपुर खंडेलवाल
विषय  “२१सवीं सदी में दूसरी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की मुख्य चुनौतियां, कुछ सुझाव, और कहानी के द्वारा भाषा शिक्षण”   
 
साधना कुमार परिचय- साधना कुमार एक हिंदी भाषा की शिक्षिका हैं जो वर्तमान में न्यूयॉर्क में रहती हैं। उन्होंने 1998 में हिंदी पढ़ाना शुरू किया और तब से प्राथमिक से कॉलेज की उम्र तक विभिन्न स्तरों पर छात्रों को पढ़ाने वाले कई भाषा स्कूलों के साथ मिलकर काम किया है। 2013 में संघ द्वारा वित्त पोषित STARTALK कार्यक्रमों के साथ उनका जुड़ाव एक महत्वपूर्ण मोड़ था जिसने उनके हिंदी शिक्षण दृष्टिकोण को बदल दिया था।
उन्होंने दूसरी भाषाओं को पढ़ाने और सिखाने के प्रभावी तरीकों का प्रशिक्षण प्राप्त किया है और हिंदी और उर्दू शिक्षाशास्त्र में मास्टर डिग्री भी हासिल की है|
वे बैकवर्ड डिज़ाइन, , मानक-आधारित दृष्टिकोण और भाषा शिक्षण में प्रदर्शन मूल्यांकन कार्यों के महत्त्व से अच्छी तरह परिचित हैं। वे अलग-अलग पाठ योजनाओं और व्यावहारिक गतिविधियों को तैयार करते समय ACTFL प्रवीणता स्तर और कैन-डू स्टेटमेंट को ध्यान में रखती है। शिक्षाशास्त्र में उनके एमए ने उन्हें दूसरी भाषा शिक्षण और सिखाने के सिद्धांत और कक्षा में उनके इम्प्लीकेशन की बेहतर समझ दी। अपने निरंतर प्रशिक्षण और अभ्यास के माध्यम से, वह इन सभी कौशलों को अपनी भाषा कक्षा में स्थानांतरित करने में सक्षम है। वह अन्य भाषा शिक्षकों को भी सलाह देती है।
नुपुर खंडेलवाल परिचय- नूपुर खंडेलवाल को बच्चों को पढ़ाने का शौक है। वह 8 साल की उम्र से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीख रही हैं। अतीत में, उन्होंने छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत, योग और हिंदी भाषा सिखाई है। वे अपने संगीत शौक और हिंदी शिक्षण शौक को जोड़ कर हिंदी सिखाने के लिए नए तरीकों का अन्वेषण करना चाहती हैं| ये अतीत में साधना कुमार की शिष्या भी रह चुकी हैं|
 
प्रस्तुति  ४  के बारे में-
साधना कुमार ने “२१सवीं सदी में दूसरी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की मुख्य चुनौतियां, कुछ सुझाव, और कहानी के द्वारा भाषा शिक्षण” पर प्रस्तुति की| कहानियों का उपयोग करके भाषा सिखाने की अपरंपरागत लेकिन बहुत प्रभावी तकनीक पर बात की| कक्षा में उपयोग करने के लिए दर्शकों को गतिविधियों के कई उदाहरण भी दिए।
वर्कशॉप के दूसरे भाग में नुपुर खंडेलवाल ने इसी अपरंपरागत तरीकों पर बात करते हुए अपनी प्रस्तुति में बताया कि कैसे बॉलीवुड गीतों और भारतीय शास्त्रीय संगीत का उपयोग करके छात्र मजेदार तरह से हिंदी शब्दावली और व्याकरण सिखाई जा सकती है|
 
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अक्टूबर  १०, २०२१
 
प्रस्तुति--५ : द्वारा -- विद्या नाहर 
विषय  " बहुमुखी एप्प्स “वॉयसथ्रेड” और “बुक क्रिएटर” के उपयोग"
परिचय- विद्या नाहर वर्तमान में योग थेरेपी में एमएस कर रही हैं। वह शिकागो के उत्तर पश्चिमी उपनगरों में 1998 से वयस्कों और बच्चों को हिंदी, मराठी, योग, स्वस्थ शाकाहारी खाना बनाना सिखा रही हैं। विद्या ने हिंदी और मराठी सीखने के लिए मजेदार, संवादात्मक तरीकों से 100 से अधिक हिंदी और मराठी गीत, स्किट, कहानियां लिखी हैं।
प्रस्तुति के बारे में-
विद्या नाहर ने ऑनलाइन सीखने के माहौल में छात्रों को हिंदी सीखने में संलग्न करने के लिए दो बहुत ही बहुमुखी एप्प्स “वॉयसथ्रेड” और “बुक क्रिएटर” के उपयोग के बारे में बताया| विद्या ने पिछले कुछ वर्षों में प्रौद्योगिकी और वास्तविक जीवन के कार्यों का उपयोग करके छात्रों के सीखने का अर्थपूर्ण तरीके से आकलन करने के लिए 1,000 से अधिक वॉयस थ्रेड और ई-पुस्तकें बनाई हैं।
 
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प्रस्तुति--६ : द्वारा -- प्रो० नीलू गुप्ता 
 विषय  " विदेशियों और गैर हिंदी भाषियों को कैसे आसान और रचनात्मक तरीकों से देवनागरी             लिखना और पढ़ना सिखाया जा सकता है" 
परिचय- प्रो.नीलू गुप्ता का जन्म फरीदाबाद (हरियाणा) में हुआ था| वे अभी ‘डि एन्जा ‘कॉलेज,कुपरटीनो, कैलिफ़ोर्निया में हिंदी शिक्षण कर रही हैं| उनकी रुचि समाजसेवा और अध्यापन में है| अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया प्रान्त में हिन्दी के प्रचार प्रसार के कार्य में योगदान दे रही हैं|। वे कोन्सलावास के तत्वावधान में ‘हिन्दी दिवस’ , कविसम्मेलन तथा साहित्यिक वेबिनार की 20 वर्षों से आयोजिका रही हैं। भारत में साधनहीन बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी संस्था ‘उपमा ग्लोबल’के द्वारा वित्तीय सहायता भी दे रही हैं। उन्हें महामहि म राष्ट्रपति जी द्वारा ‘प्रवासी भारतीय
 
सम्मान’ से 2021 में सम्मानित किया गया है। वे हिन्दी नागरी प्रचारिणी सभा देहली, संस्कृत भारती देहली, साहित्यिक सांस्कृतिक शोध संस्थान मुम्बई, कोन्सलालास कैलिफ़ोर्निया, अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी समिति अमेरिका इत्यादि के द्वारा राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय सम्मानों से पुरस्कृत हैं। राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में लेख तथा कविताएँ भी प्रकाशित होती रहती हैं।
प्रस्तुति के बारे में-
इनकी प्रस्तुति में इन्होंने बताया कि विदेशियों और गैर हिंदी भाषियों को कैसे आसान और रचनात्मक तरीकों से देवनागरी लिखना और पढ़ना सिखाया जा सकता है| यह बताते वक्त वे भारतीय संस्कृति का भी सम्मन्वय करती हैं| 
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प्रस्तुति---७ : द्वारा -- ममता त्रिपाठी
 विषय  "कैसे विश्व भाषाएं सिखाकर बच्चों को कॉलेज और सफल केरियर के लिए तैयार किया जा                सकता है"
परिचय- ममता त्रिपाठी हिंदी भाषा अकादमी में सह-संस्थापक, प्रधानाचार्य और प्रमुख प्रशिक्षका हैं। वह एक विकासवादी मानसिकता वाली एक चिंतनशील व्यक्ति हैं, जो 2008 से एक स्वयंसेवक और पेशेवर रूप में हिंदी पढ़ा रही हैं। इन के पास कीन विश्वविद्यालय, यूएसए से हिंदी अध्यापन में मास्टर डिग्री और लखनऊ विश्वविद्यालय, भारत से जैव रसायन में मास्टर डिग्री है। World Readiness Standards मानकों के माध्यम से 21वीं सदी के अध्यापन द्वारा हिंदी सिखाना उनका जुनून है जिसने उन्हें हिंदी भाषा अकादमी की कल्पना और सह-स्थापना करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान में, वह हाई स्कूल स्तर के छात्रों के लिए एक विशेष कार्यक्रम का नेतृत्व कर रही हैं, ताकि उन्हें हिंदी में स्टेट सील ऑफ बिलिटरेसी और ग्लोबल सील ऑफ बिलिटरेसी के लिए तैयार किया जा सके। उन्होंने न्यू जर्सी में मोंटगोमरी हिंदी स्कूल की सह-स्थापना भी की। ममता नियमित रूप से उभरते हिंदी शिक्षकों को शोध-आधारित भाषा अधिग्रहण शिक्षाशास्त्र में सलाह देती हैं और प्रशिक्षित करती हैं।

प्रस्तुति के बारे में-
ममता जी की प्रस्तुति हिंदी भाषा के प्रशिक्षकों, माता-पिता, छात्रों, प्रशासकों और समुदाय के नेताओं के बड़े दर्शकों के लिए थी जो हिंदी सीखने की वकालत करते हैं। इन्होंने बताया कि कैसे विश्व भाषाएं सिखाकर बच्चों को कॉलेज और सफल केरियर के लिए तैयार किया जा सकता है| विश्व भाषाएँ सीखने से महत्वपूर्ण सॉफ्ट स्किल्स जैसे महत्वपूर्ण सोच,
समस्या समाधान, अच्छा संचार, आदि का भी विकास होता है और वे टीम के सहायक सदस्य बन सकते हैं|
 
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प्रस्तुति--८ : द्वारा --डॉ. राजीव रंजन 
 विषय “दूसरी भाषा के रूप में हिंदी और व्यावहारिक अनुप्रयोग में अनुसंधान और शिक्षण के         बीच की खाई को पाटना"
परिचय- डॉ. राजीव रंजन मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी (MSU) में भाषाविज्ञान, भाषा और संस्कृति विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। MSU में राजीव एशियन स्टडीज प्रोग्राम और मास्टर ऑफ आर्ट्स इन फॉरेन लैंग्वेज टीचिंग (MFLT) प्रोग्राम से जुड़े हैं। उन्होंने 2015 में द्वितीय भाषा अधिग्रहण में पीएचडी प्राप्त की|
उनके पास कम सिखाई जाने वाली भाषाओं (हिंदी और उर्दू) को पढ़ाने का 11 साल का अनुभव है। उन्होंने बेसिक हिंदी I के लिए एक ओपन एजुकेशनल रिसोर्स पाठ्यपुस्तक बनाई है और वर्तमान में बेसिक उर्दू I और बेसिक हिंदी II के लिए OER विकसित कर रहे हैं। वह बेसिक खमेर, बेसिक टर्किश और बेसिक उज़्बेक के लिए OER पाठ्यपुस्तकों का भी मार्गदर्शन कर रहे हैं।
प्रस्तुति के बारे में- डॉ. राजीव रंजन का विषय “दूसरी भाषा के रूप में हिंदी और व्यावहारिक अनुप्रयोग में अनुसंधान और शिक्षण के बीच की खाई को पाटना" था।
प्रस्तुति दूसरी भाषा अधिग्रहण अनुसंधान और शिक्षण प्रथाओं के बीच अंतराल दिखाने के साथ शुरू हुई। इसमें अनुभवजन्य अनुसंधान, परिणाम और शैक्षणिक निहितार्थ शामिल थे। प्रस्तुति की समाप्ति, कैसे हिंदी शिक्षण को और अधिक शोध से अवगत कराया जाए, सुझाव के साथ हुई।
 
 
शाखाओं के कार्यक्रम

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना शाखा की वार्षिक रिपोर्ट 2021
 
 
 
 
द्वारा-डॉ. राकेश कुमार,
अध्यक्ष, अ.हि.स.-इंडियाना
 
 
 
 
 
 
 
 
डॉ. राकेश कुमार के नेतृत्व में जनवरी 2021 में शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के इंडियाना शाखा ने अपने प्रथम वर्ष 2021 में निम्नलिखित गतिविधियों को पूरा किया है।
शाखा ने एक कोर कमेटी का गठन किया और सदस्यता अभियान शुरू किया। वर्तमान में, इंडियाना शाखा में बीस से अधिक आजीवन सदस्य हैं।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति इंडियाना की ओर से एक उद्घाटन बैठक आयोजित की गयी। इस बैठक में छत्तीस लोगों ने भाग लिया। गहन विचार-विमर्ष में भाग लिया। बहुत से मूल्यवान सुझाव आये। उन सुझावों से सभी को अवगत कराया गया। कुछ प्रमुख सुझावों नीचे लिखे हैं:
- माता-पिता द्वारा प्रारंभिक चरण के बच्चों की भागीदारी, हिंदी शिक्षा के तीन चरणों का निर्माण (1. शिशु / बच्चा / प्राथमिक विद्यालय; 2. मध्य विद्यालय - हाई स्कूल; 3. कॉलेज / युवा पेशेवर)
- विभिन्न आयु समूहों और विभिन्न पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाना,
- अ.हि.स. के वेबसाइट के माध्यम से उपलब्ध ऑनलाइन हिंदी कक्षा पाठ्यक्रम का निर्माण।
हिंदी से संबंधित संचार के लिए इंडियाना शाखा का व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब चैनल और वेबपेज बनाया जो पूरे समाज में उपलब्ध है। अ.हि.स. में हो रहे हिंदी भाषा के विषय में सुनिश्चित कार्यक्रम, हिंदी-दिवस समारोहों, सम्मेलनों और अन्य प्रासंगिक सूचनाओं की जानकारी लगातार पोस्ट और अपडेट की जाती है। इंडियाना शाखा के बारे में जानकारी इंडियाना के विभिन्न सामाजिक समुदाय के परिवारों में साथ लिंक के द्वारा 2000 से अधिक परिवारों तक पहुँच चुकी है।
इंडियाना के छात्रों को अ.हि.स. की ऑनलाइन हिंदी कक्षाओं में भाग लेने के लिए जोड़ा गया। इंडियाना के छह छात्रों ने अ.हि.स. के माध्यम से हिंदी सीखी और लाभान्वित हुए।

इंडियाना के ईगल क्रीक पार्क में राष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाया गया, जहाँ 65 लोगों ने भाग लिया। हिंदी दिवस समारोह हमारी शाखा की पहली, एक बड़ी सफलता थी। जिसमें कई बच्चों और स्थानीय कवियों ने हमारी हिंदी भाषा, शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए तीन घंटे से अधिक समय तक हिंदी प्रश्नोत्तरी और अन्य हिंदी संबंधित गतिविधियों में भाग लिया। हिंदी में अपनी प्रतिभा दिखाने वाले बच्चों और वयस्कों को ट्राफी और प्रशंसा-प्रमाण पत्र दिए गए। कुल मिलाकर हमारा हिंदी दिवस बहुत सफल रहा। प्रतिभागियों ने कई सकारात्मक और उत्साहजनक टिप्पणियां प्रदान कीं।
 
 
 
 
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-ह्यूस्टन  शाखा की रिपोर्ट २०२०-२०२१   
 
 
स्वपन धैर्यवान पेशे से CPA सर्टीफाइड एकाउंटेंट हैं। इनकी मातृभाषा मराठी है। इनके हिन्दी और भारतीय संस्कृति से प्रेम ने इनको अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति से जोड़ा है और २०१४-१५ में ये ह्यूस्टन शाखा के अध्यक्ष बने और २०१६-१७ में अ.हि.स. के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के ह्यूस्टन शाखा ने २०२०-२१ के दौर में अनेक कार्यक्रम संयोजित किये। कोविद-१९ कि भयानक महामारी में यह शाखा हिंदी प्रेमियों के लिए रोमांचकारी एवं मनोरंजक कार्यक्रम लाती रहीं। यह महामारी मनुष्य को शरीर से स्थूल कर रही थी साथ ही मानसिक रूप से भी अनेकों ने अपना संतुलन खोया और निराशावादी बन गए। इस संकट काल में २०२० के वर्ष में अ.हि.स. के २ आजीवन सदस्यों की वृद्धि हुई।
संजय सोहनी- पहला कार्यक्रम : ८ मार्च २०२० को ‘होली के हिंदी बोल’ यह उत्साह पूर्व कार्यक्रम जैन विश्व भारती संस्था, इंडिया कल्चर सेंटर और बिहार एसोसिएशन के साथ मिलकर मनाया गया। इसके सूत्रधार समिति के सचिव संजय सोहनी थे और ९ कवियों ने बखूबी से हास्य रस, भक्ति रस और श्रृंगार रस की रचनाएँ प्रस्तुत की। १३० से अधिक लोगों ने इस कार्यक्रम का लाभ लिया और यह इस सत्र का अंतिम आमने-सामने का कार्यक्रम था। इसके तुरंत बाद ही राष्ट्र और राज्य में आपतिकलीन स्थिति उत्पन्न हुई।
ज़ूम और वर्चुअल कार्यक्रमों का दौर आ गया और इस शाखा ने तुरंत अपने कार्यों में नये रास्ते का अनुसरण किया। इस कार्य में चार्ली पटेल, निशा मिरानी और भावना कल्याण का योगदान बहुत महत्वपूर्ण था। कार्यकारी समिति ने स्वपन धैर्यवान के मार्गदर्शन से अगले अनेक मासों में कार्यक्रमों की श्रृंखला आयोजित की गयी।
डॉ. के. डी. उपाध्याय - दूसरा कार्यक्रम : २५ जुलाई २०२० को हास्य रस का कार्यक्रम ज़ूम द्वारा करीब १५० से अधिक लोगों ने इसका आनंद लिया। इस कार्यक्रम के कलाकार कवि थे - संजय सोहोनी, हरेंद्र चाहर और फ़तेह अलि चतुर। सूत्र संचालन डॉ. के. डी. उपाध्याय ने बखूबी निभाया।
 
स्वपन धैर्यवान - तीसरा कार्यक्रम : इस श्रृंखला का अगला कार्यक्रम वीर रस पर आधारित था। भारत के ७४ वे स्वतंत्र दिवस पश्चात् १६ अगस्त २०२० को मनाया गया। इसके कलाकार थे सरोजिनी गुप्ता, संगीता पसरीजा और डॉ. के. डी. उपाध्याय। सूत्र संचालन पूरी ऊर्जा के साथ स्वपन धैर्यवान ने किया। यह कार्यक्रम ज़ूम अथवा फेसबुक लाइव के माध्यम से प्रसारित हुआ और इस कार्यक्रम के ३५० से अधिक दर्शकों ने आनंद उठाया।
संजय सोहोनी- चौथा कार्यक्रम : इस यात्रा में अगली कड़ी थी श्रृंगार रस की। १८ सितंबर २०२० को यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया।
कलाकार थे महेश देराश्री, हविषा करिहालू और अलका राज थे, इन सभी ने स्वरचित कवितायेँ सुनायी और कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए। कार्यक्रम के सूत्रधार संजय सोहोनी थे। ज़ूम और फेसबुक द्वारा २८० से अधिक दर्शकों ने इसका लाभ उठाया।
राजीव भावसार --- पाँचवाँ कार्यक्रम : ह्यूस्टन शाखा 'हिंदी दिवस' अनेक वर्षों से दिसंबर के पहले शुक्रवार को मनाती है, स्थानीय कवियों के ७ कवियों ने कवितायेँ पेश कि और सिर्फ २५ लोग स्थल पर मौजूद थे। ज़ूम, फेसबुक द्वारा इस कार्यक्रम का आस्वाद २०० से अधिक श्रोताओं ने घर बैठे लिया। कार्यकारिणी समिति का उत्साह अनोखा था। एक-एक कर के सभी सदस्यों ने हिंदी प्रेमियों को समिति से एवं हिंदी से जोड़े रखा। शाखा अध्यक्ष राजीव भावसार ने वार्षिक मूल्यांकन में रकम में वृद्धि ही पाई। पूरे साल में पैसे जोड़ें और खर्च आमदनी से कम किया।
अर्चना पंडा, कैलिफ़ोर्निया - छठा कार्यक्रम : ३१ जनवरी २०२१ को मित्रत्व वाली अंताक्षरी कि प्रतियोगिता हुई अ.हि.स. की ह्यूस्टन शाखा और इंडिया कल्चर सेंटर के बीच हुई। इस कार्यक्रम का सञ्चालन और सूत्रधार थी कैलिफ़ोर्निया से अर्चना पंडा। ४० से अधिक लोग इसमें समलित हुए थे। अ.हि.स. ह्यूस्टन से नेतृत्व चार्ली पटेल कर रहे थे और इंडिया कल्चर सेंटर से संतोष वर्मा कर रहे थे। अ.हि.स. ह्यूस्टन शाखा इसमें जीत गई थी।
 

निशा मिरानी- आठवाँ कार्यक्रम : इस बार २७ फरवरी २०२१ को 'रिश्ते प्यार के' यह कार्यक्रम काजल ओझा द्वारा भारत से संयोजित किया गया। सूत्रधार निशा मिरानी थी। वैलेंटाइन डे के उपलक्ष में यह कार्यक्रम श्रृंगार रस और वास्तव वादी विषय से लेकर बहुत प्रभावी रहा २५० से अधिक लोगों ने इसका आनंद लिया।
फतेह अली चतुर- नवां कार्यक्रम : 'होली के हिंदी बोल 'का अगला कार्यक्रम २७ मार्च २०२१ को जैन विश्व भारती संस्था के साथ आयोजित किया। फूलों कि होली और शब्दों कि होली इस माध्यम से कवियों ने स्वयं रचित कवितायेँ पेश की। सूत्रधार फतेह अली चतुर थे। यह पहली बार संस्था के इतिहास में हुआ होगा कि 'हॉस्टन क्रॉनिकल' यह वृतपत्र के संपर्क और लेखकों ने इस कार्यक्रम को 'पूर्ण विस्तार’ से अपने रविवार के दैनिक वृतपत्र में डाल दिया। ५०० से अधिक लोगों ने इस कार्यक्रम को सराहा।
कुँवर बेचैन- दसवाँ कार्यक्रम : "एक साँझ कुँवर बेचैन के नाम" ११ जून २०२१ को मनाया गया। कोविद कि महामारी में अनेक हिंदी के दिग्गज हमने खो दिए हैं यह निर्विवाद सत्य है। इनमें से एक श्रेष्ठ कवि कुँवर बेचैन कि मृत्यु से ह्यूस्टन शाखा के सारे हिंदी भाषी प्रेमी एक जुट हो गए और उन्हें श्रद्धांजलि के स्वरुप ह्यूस्टन शाखा ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम 'इंडियन समर' में किया गया। २५ लोग स्थल पर उपस्थित थे । ३४० से अधिक लोगों ने ज़ूम, फेसबुक आदि से इसका आनन्द लिया। सूत्रधार डॉ. के. डी. उपाध्याय थे और ६ कवियों ने कुँवर जी रचित सुप्रसिद्ध रचनाएँ सुनाईं । यह एक सुन्दर अविस्मरणीय कार्यक्रम जो ख़तम ही न हो ऐसा लग रहा था ।
स्वपन धैर्यवान, संगीता गर्ग, हविषा करिहालू, डॉ. सरोज उपाध्याय और नीरा विपिन - ग्यारवाँ कार्यक्रम : ७ अगस्त २०२१ को हिंदी सम्मान दिवस आयोजित किया गया। ह्यूस्टन शाखा अनेक वर्षों से हिंदी शिक्षण का प्रयास और कार्य कर रही है। वल्लभ प्रिती मंदिर, गौदिया मठ और इंडिया हाउस में शनिवार या रविवार को शिक्षिकायें हिंदीं कि कक्षा आयोजित करती है। कोविद के दौरान सबका माध्यम ज़ूम वर्चुअल हुआ। विद्यार्थियों का और शिक्षिकाओं का सम्मान और उत्साह बढ़ाने हेतु “हिंदी सम्मान दिवस” आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में तीनों केंद्रों कि चार शिक्षाएं आई थी। उनका सम्मान किया गया। संगीता गर्ग, हविषा करिहालू, डॉ. सरोज उपाध्याय और नीरा विपिन ये शिक्षिकायें विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ती है। इस कार्यक्रम में 80 से अधिक बच्चें और उनके माता-पिता उपस्थित थे। बच्चों ने कविता, नाटक, भाषण कथा सुनाकर श्रोताओं का मन मोह लिया। इस कार्यक्रम के सूत्रधार स्वपन धैर्यवान थे। हिंदीं के प्रति प्रेम नयी पीढ़ी का प्रेम और लगन देख कर हम अगली पीढ़ी से बहुत आशा रखते हैं। ७०० से अधिक लोगों ने ज़ूम/फेसबुक द्वारा इस कार्यक्रम का आनन्द लिया।
हविषा करिहालू बारहवाँ कार्यक्रम : शुक्रवार, ३ दिसम्बर २०२१ को ‘कविता की एक शाम’ के नाम से हिंदी दिवस मनाया गया। इस कार्यक्रम का संचालन हविषा करिहालू ने बड़ी ही अच्छी तरह किया। ह्यूस्टन शाखा का यह अनोखा प्रयास था जिसमें स्थानीय कवि प्रत्यक्ष और सात समंदर पार से हास्य कवि शंभु शिखर ज़ूम द्वारा जुड़े थे। हविशा ने उत्तम रूप से सूत्रधार की भूमिका निभाई तथा सिया ने नारद पुराण से “गणेश स्तोत्र” संस्कृत में शुरुआत की। तत्पश्चात समिति के अध्यक्ष राजीव भावसार ने सबका स्वागत किया। स्वपन धैर्यवान ने अ.हि.स. बारे में जानकारी दी और Covid काल में कैसे लोगों को जोड़ के रखा यह भी बताया। फ़तेह चतुर ने अशोक चक्रधर की कथा से प्रारम्भ करके मंच में रौनक ला दी। प्रवीणा कड़ाकिया ने शृंगार रस पे खुद की लिखी कविता सुनाई। मीरा कपूर ने वीर रस पर अपने पिताजी की लिखी दो खूब कविताएँ बड़े ही जोश से सुनाई।
संगीता पसरिजा ने वीर रस पर कौरवों की सभा में “कृष्ण की चेतावनी” का शांति प्रस्ताव बड़े ही जोशीले अन्दाज में सुनाया। संजय सोहोनी ने खुद की लिखी कविता “सिर्फ़ चाँद से क्या होगा” सुनाई, हिरकनी की कथा से सबके रोंगटे खड़े हो गये, सब मंत्र मुग्ध थे।
 
 
इसके बाद भारत से जुड़े हास्य कवि शंभु शिखर के ने सबको हँसा-हँसा कर लोट-पोट करवा दिया। उन्होंने ३० मिनिट तक एक के बाद एक हास्य रस से सराबोर कविताएँ सुनकर सभी को आनन्दित किया। डॉ. के. डी. उपाध्याय ने इसके बाद एकता, ऊर्जा और इंसानियत कैसे बरकरार रखे इसका संक्षेप में उदाहरण दिया। निशा मिरानि ने आभार प्रदर्शन किया और सभी की कार्यक्रम की सराहना की। यह कार्यक्रम २ घंटे तक चला और अनेक माध्यमों द्वारा ४०० से अधिक लोग जुड़ गए थे।
मंज़िल अभी दूर है पर कारवाँ में बढ़ोतरी हो रही है और हम आशावादी है, हमें सफलता अवश्य मिलेगी इसी उम्मेद के साथ हमारा कारवाँ आगे बढ़ता रहेगा ।
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-शार्लट शाखा की रिपोर्ट २०२०-२०२१
 
 
 
 
द्वारा- प्रिया भरद्वाज
 
 
शाखा - गतिविधियाँ शार्लट २०२०-२०२१
Priya2828 Bharadwaj <bharadwajpriya166@gmail.com>
 
 
 
 
 
सभी सम्मान्निय सदस्यों को सविनय नमस्कार ,
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति नार्थ केरोलाइना जिसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र संघ में रह रहे अप्रवासी भारतीयों के बीच हिन्दी का प्रचार एवंप्रसार करना है,वर्ष 2021 कोविड के चलते उतार-चढ़ाव से भरा रहा।अंतर-राष्ट्रीय हिन्दी समिति नार्थ केरोलिना की अध्यक्षा श्रीमतीप्रिया भारद्वाज जी द्वारा हिन्दी समिति के सभी कार्यक्रम वर्चुअल किये गए। ज्यादा से ज्यादा संख्या में सदस्य गण जूम लिंक के माध्यमसे उपस्थित होकर हिन्दी एवं सांस्कृतिक विरासत को बढावा देने के लिए अग्रसर हुए ।
इसी तत्वावधान में समिति द्वारा कवि सम्मेलन का भी आयोजन भी वर्ष में गणतंत्रदिवस , होली ,स्वतंत्रता दिवस ,हिंदी दिवस , और।दीपावली जैसे पर्वों पर अंतर्रष्ट्रिया हिंदी समिति द्वारा ज़ूम के माध्यम से कवि सम्मेलन किए गए और यू॰एस॰,यू॰के॰ ,कनाडा और भारतसे कवियों ने हिस्सा लेकर कार्यक्रम द्वारा भारत दर्शन का आनंद कराया .
इसी तारतम्य को आगे बढ़ाते हुए हिन्दी समिति नार्थ केरोलाइना द्वारा सर्वप्रथम रंगों का त्यौहार होली मनाया और एक अन्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया ,जिसमें सभी प्रतिभागियों ने बढ -चढ कर हिस्सा लिया ।
हिन्दी समिति की तरफ से नृत्य प्रतियोगिता, वाद्य संगीत प्रतियोगिता, चित्रकला प्रतियोगिता, काव्य रचनाएं एवं आलेख आदि विषयों में प्रतिस्पर्धात्मक आयोजन किया गया , जिसमें सभी प्रतिभागियों का प्रदर्शन सराहनीय एवं प्रशंसनीय
रही ।
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-न्यूजर्सी शाखा की रिपोर्ट २०२०-२०२१   
 
 
 
 
 द्वारा-डॉ०  बबिता श्रीवास्तव
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के न्यू जर्सी चैप्टर की अध्यक्षा 
 
हिंदुस्तान में मेरा पालन पोषण और शिक्षा प्रयागराज इलाहाबाद में हुई है। मेरा पूरा परिवार अभी भी प्रयागराज में ही रहता है ।
 
 
 
 
 यहां अमेरिका में मैं हिंदू टेंपल सोसायटी एलेनटाउन पेंसिलवेनिया में बालविहार प्रोग्राम में हिंदी सिखाती हूं मैं लेखिका और कवियत्री भी हूं मेरी कई रचनाएं सरिता मनोरमा गृहशोभा कादंबिनी जैसी पत्रिकाओं में बराबर प्रकाशित होती रही हैं।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेरी कुछ रचनाएं जैसे मेरा दावा है, प्रवासिनी के बोल, नव तरंग, हिंदी चेतना , तथा प्रवासी संकलन जैसे जैसे कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं ।व्यवसाय से मैं विलियम पेटरसन यूनिवर्सिटी न्यू जर्सी में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हूं और अर्थशास्त्र गणित प्रबंधन जैसी कक्षाएं लेती हूं। विगत 2 वर्षों से मैं होली दिवाली और मकर संक्रांति स्वतंत्रता दिवस गणतंत्र दिवस जैसे समारोह का भी वर्चुअल आयोजन किया है इस बार मैंने अपने घर पर ही व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्रता दिवस का और दिवाली का आयोजन किया। आसपास के समुदाय के भारतीयों ने बड़े ही गर्मजोशी से हिस्सा लिया और आगे भी सम्मिलित होने का उत्साह दिखाया है । इसके साथ ही कवि सम्मेलन भी आयोजन करने का सोच रही हूं।

  
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति न्यू जर्सी चैप्टर
न्यू जर्सी के आंचल से, हमने विश्वास जगाया है ।
पूरी दुनिया में हिंदी का, नूतन सूर्य उगाया है।।
 
अमेरिका की सबसे पुरानी संस्था अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का गठन 1980 में हुआ। इसकी हर शाखा पूरे अमेरिका में फैली हुई है उनमें से न्यू जर्सी एक है ।
न्यू जर्सी राज्य में भारतीयों की संख्या अत्यधिक है और साथ में हिंदी बोलने लगभग 15000 परिवार भी हैं।
न्यूजर्सी में 2001 में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा आरंभ की गई जिसकी अध्यक्षा श्रीमती रचिता सिंह थी इसके बाद न्यू जर्सी में लगातार हिंदी क्षेत्र में बहुत ही अच्छी प्रगति होती रही है।
2019 में न्यूजर्सी में हिंदी कन्वेंशन का कार्यक्रम रॉयल अलबर्ट पैलेस में हुआ जो कि बहुत ही सफल रहा।
न्यूजर्सी क्षेत्र के कवियों को संगठित कर उनकी रचनाओं को *नवतंरग* पुस्तक के रुप में प्रकाशित करने का काम श्री राम बाबू गौतम जी ने बहुत ही अच्छे ढंग से किया।
करोना काल से पहले न्यू जर्सी में हर साल कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाता है और भारत से कवि बुलाए जाते हैं। जाने-माने प्रसिद्ध कवि जैसे अरुण जैमिनी और सर्वेश अस्थाना रितु गोयल अशोक चक्रधर जैसे लोग कई बार आकर के न्यूजर्सी में अपना कार्यक्रम कर चुके हैं।
आज न्यूजर्सी के स्कूलों में हिंदी भाषा पढ़ाई जाती है साथ ही साथ कई धार्मिक संस्थाएं अपने-अपने संस्था में हिंदी पढ़ा रही हैं।
न्यू जर्सी में 14 सितंबर हिंदी दिवस घोषित किया जा चुका है यहां पर हिंदी एनजे, हिंदी यूएसए की शाखा बहुत ही सुचारू रूप से अपना काम कर रही है इसके अतिरिक्त बहुत ही हिंदी के स्कूल हैं जिनमें छोटे बच्चों को हिंदी सिखाई जाती है।
हमने 2020 में वर्चुअल स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया जो काफी सफल रहा।
आगे भी हम अपना कार्यक्रम मिलजुल कर करेंगे और हिंदी में अपना योगदान देंगे।
20-2१  से मुझे न्यूजर्सी चैप्टर का अध्यक्ष बनाया गया है मेरी एक कार्यकारिणी समिति है जिसमें 4 लोग मिलकर हम सब कार्य करते हैं और हिंदी भाषा की प्रकृति में अपना भरपूर योगदान देते हैं।

*कार्यकारिणी समिति*
1.श्रीमती शोभा पाठक
2. श्री राम बाबू गौतम
3.डॉक्टर सरिता पक्काला
4. श्री द्वारिका केसरी
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दो कविताएँ
 
 
 
 
हे परमेश्वर!
 
सुनते हैं क्या? मन में उठी छोटी सी इच्छा,
सोंचती हूँ कहूँ भी या ना?"
शिवजी हुए भोंचक्के से, थोड़े छिपे अचम्बे से..
नेत्र मूंदे, मुस्काकर बोले,
" प्राणप्रिये यह क्या? तुम में - मुझ में कैसी झिझकता?
इस अनुमति में कहीं छिपी तो नहीं परीक्षा?"
" अरे नहीं!", बोली माँ हँस के,"मैं क्यों लूँ भला कोई परीक्ष?"
" वो, वृन्दावन में कल रास रचा था, क्या सुना संवाद राधा कृष्ण का?
राधा तो एक न बोली, और कृष्ण ने सारा समां रंगा था।
उसके नयन, हृदय, मुखमण्डल का विवरण लीलाधर ने अतुल्य किया था"
ठिठोली करते बोले गंगाधर,
"अरे वह तो ठहरा लीलाध, लीला करना कब न प्रिया था?
पर सच कहती हो प्रिये, शब्दों का मनो जाल बुना था,
वह कहता, तो मैं भी गोपी बनने तैयार खड़ा था!"
माता की अखियाँ चुंदियाँई, बोलीं -
" हे नाथ! आपको वह सब समझा था, अचंबित हूँ, अच्छा भी लगा था!
प्रभु, मेरे मन की भी है इच्छा, मैं भी सुँनू प्रेम प्रियतम का,
बस यही छोटी सी अनुकम्पा, दो पंक्ति कर दो विवरण अपनी प्रिया का?"
आँख खुली, ध्यान को तोडा, नील कण्ठ ने आसन छोड़ा!
यह, यदा - कदा पार्वती को क्या सूझा?
बोले,"प्रेम विवरण और व्याख्या, मैं तो ठहरा साधू भोला!
पर गर,यही है तुम्हारी इच्छा- तो, याद है वध महिषासुर का?
शुम्भ निशुम्भ को भी नहीं था छोड़ा! रक्त बीज को तो वह! क्या कर तोडा!
"बस! " टोकि फिर माता,
"बस - बहुत सुनली व्याख्या, क्षमा करें जो की प्रार्थना,
ध्यान आसान है करे प्रतीक्षा, यह सब आपके नहीं बस का। "
अधरों से हँसी लुप्त हुयी थी, नयनों में अश्रु की परत चढ़ी थी
 
 
 
 
 
हविषा करिहालू (Havisha Karihaloo) पेशे से केमिकल इंजीनियर हैं। साथ ही MBA की पढाई भी की है। ये कश्मीर से आयी हैं। उनके माता-पिता दिल्ली में निवास करते है। इन्हें हिंदी और संस्कृत से बहुत लगाव है, इसी कारण ये ह्यूस्टन, टेक्सास (Houston, TX) बच्चों को हिन्दी पढ़ाती हैं। अपनी इस कविता में शिव-पार्वती के अर्धनारिश्वर रूप को चित्रित किया है। इनका Email Id: havvishakarrihaloo5@gmail.com.
 
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देख माँ का मुरझाया चेहरा, शिव शंकर को यह बात चुभी थी।
प्रेम ह्रदय अपार भरा था, पर शब्दों में विवरण कहाँ सुलभ था?
पिघला ह्रदय शिव शंकर का फिर बोले,
" प्राण प्रिये सुनो, तनिक ठहरो, हम तो ठहरे भोले!"
"रुष्ट ना होना मुझसे प्रिये तुम, मेरी बात कहाँ पूर्ण हुयी थी?
कर सके तुम्हारी छवी का विवरण, प्रिये शब्दों में कहाँ इतना दम?
तुम न रुकी तो किसे सुनाऊँ मेरी आत्मा का आलिंगन?"
"सागर से गहरे तेरे नयन, मनो समेटे धरती और गगन,
माथे पर चमके बिंदी और टीका, कैलाश सवर्ण रूप इसी का नतीजा।
कानों में सुशोभित सुन्दर कुण्डल, रचते गृहों का दिक्षा परिक्रम,
हाथों सजे तुम्हारे कंगन, संचालित करें गुरुत्वाकर्षण। "
"होंठों सजी मंद मुस्कान तुम्हारी, पल में करती ब्रमांण्ड सृजन,
तुम्हारी पायल की ध्वनि सुन, कौतुल करता स्वयं जीवन।
हर लेता मेरा भी यह मन, योगी से गृहस्त परिवर्तन,
जो स्तोत्र तुम स्वयं अपार प्रेम का, उसका कैसे बाँधूँ विवरण?"
"तुम्हारे सुन्दर रूप की आभा, पूर्णमाषी के चाँद का दर्पण।
नव दुर्गा रूप प्रसिद्ध तुम, क्रोध में भी अतुल्य, अद्वित्य तुम,
शिव नहीं शिव, वह शव शक्ति बिन,
प्रिये केवल तुम ही मेरा मन। "
सुनकर प्राण परमेश्वर से विवरण, माँ का आनंदित हुआ मन।
प्रफुल्लित चित, शरमाये फिर नयन, ह्रदय ने ओढ़ा प्रेम आवरण।
रसभोर शिव के शब्दों से, गद - गद हुआ परमेश्वरि का मन।
था वह कैसा क्षण बतलाऊँ? स्पष्ट हुआ दोनों का मिलन,
अर्धनरेश्वर का दर्शन, स्वतः हुआ नमन यह मन।
सम्मलित बोलो श्रोता गण, "जय शिव शंकर तुम्हें नमन"!
 
 
 
 
 
आशिक का रोना—कोरोना
 
कोरोना…
तुम कोविड क्यों
कर फ़ैलाते हो,
चीन सा देश छोड़
यहाँ वहाँ
तकदीर आजमाते हो!
वुहान लैब की जेल तोड़
ये कैदी कब भागा,
हमें तुम्हें यहाँ वहाँ
किसी ने न अब तक
ये जाना,
अब प्यारे तुम्हीं बतलाओ
कोविड क्यों कर
विश्व भर में फ़ैलाया है,
एक शक तो मुझे अभी-अभी
हो आया है
शायद तुमने भी किसी से
इश्क फ़रमाया है,
मोहतरमा जब कहीं छिप गई
तब तुमने मजनूं सा कोविड
जाल बिछाया है,
कभी तो मिलेगी
कहीं तो मिलेगी
बहारों की मंजिल
इस तर्ज़ पर

नए रूप धर-धर कर
कोविड से डेल्टा और
अब डेल्टा प्लस का स्वांग
रचाया है।
अब और कितने रूप धरोगे
प्रेयसी के नाम पर
प्रियतम का ये तुमने
कैसा फ़र्ज निभाया है।
तुमने सोचा होगा
प्रेयसी तुमसे इश्क करे !
पर करे तो करे भी कैसे
 
 
 
 
अरूणा घवाना ठाकुर, संचालिका उत्थान फ़ाउंडेशन द्वारका, नई दिल्ली से हैं। फीचर, लेख, कवयित्री व बाल कथा लेखिका हैं तथा चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट द्वारा हिंदी विज्ञान कथा के लिए सम्मानित हैं।द्वारका, नई दिल्ली, भारत
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लहू मानव का पी-पी तुमने
दानव सा रूप बनाया हैविश्व भर में कोरोना का रोना सुन
शायद अब तक
उसका भी दिल भर आया है
सुना है विरक्त भाव से उसने
परसों ही मौत को गले लगाया है
अब करो
मजनूं सा चाक गिरेबां
लैला लैला कह
कूचे-कूचे फ़िरो
तुम्हारे इश्क का तो बस अब यही अंजाम है
पर मानव दृढ़ निश्चयी है,
काहे का रोना,
यकीं है
कोरोना को है हराना
मास्क लगा के
ग्लव्स पहन

दूर-दूर रहना है
तो फ़िर कैसा
कोरोना है?
हाथ बार-बार धोएंगे
सेनेटाजर भी लगाएंगे
बाहर कम ही अब जाएंगे
कैरम और लूडो को शतरंज संग
फ़िलहाल दोस्त बनाएंगे
क्योंकि
जानते हैं ह्म
कोरोना को हरा
मानवता को बचाना है।
यकीं है
जल्द ही भाग जाएगा
दुनिया से कोरो्ना
वैक्सीन जरूर लगाना है
यही गान विश्वभर में
अब बार-बार दोहराना है
बार-बार दोहराना है।
 
 
 
अपनी कलम से 
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. दीपक कोहली
 
 
डॉ. दीपक कोहली, भारत सरकार में उत्तर प्रदेश में संयुक्त सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में हैं। अभी लखनऊ में कार्यरत हैं। भारत में हुए २०२० के "लॉकडाउन के ‌‌‌‌प्रभाव" को बड़ी नजदीकी से देखा और अनुभव किया तथा उन्हें शब्दबद्ध किया है।
 
 
 
भारत में "लॉकडाउन" के ‌‌‌‌प्रभाव 
 
 
लगभग एक वर्ष पूर्व भारत में लॉकडाउन को अपनाया गया था। उसके बाद से अर्थव्यवस्था को लगातार ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है। इस लॉकडाउन के सामाजिक व आर्थिक असर आज भी दिख रहे हैं।
इस लॉकडाउन ने भारत के सभी वर्गों को किसी न किसी स्तर पर प्रभावित किया है। कुछ लोगों के लिए लॉकडाउन एक सुनहरा मौका रहा जहाँ वे अपने परिवार के साथ एक लंबी छुट्टी का आनंद ले सके, वहीं अन्य लोगों के लिए यह बेरोज़गारी, भुखमरी, पलायन और कुछ के लिए जान के जोखिम से भरा दौर रहा। आइए हम उन प्रभावों का पता लगाने का प्रयास करते हैं जो सख्त लॉकडाउन के कारण देश को झेलने पड़े। हम यह भी समझने का प्रयास करेंगे कि लॉकडाउन से किस हद तक वायरस संक्रमण रोका जा सका।
व्यापक अर्थ व्यवस्था:
कोरोनावायरस जीवन और आजीविका के नुकसान के केंद्र में रहा। लॉकडाउन के एक वर्ष बाद भी भारत में जन स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों को ही पटरी पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार भारत में लॉकडाउन से अनुमानित 26-33 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। गौरतलब है कि अधिकांश अनुमान पिछले वर्ष प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर लगाए गए हैं जब लॉकडाउन से होने वाले नुकसान ठीक तरह से स्पष्ट नहीं थे। देखा जाए तो इन गणनाओं में उन कारकों को ध्यान में नहीं लिया गया जिन्हें धन के रूप में बता पाना मुश्किल या असंभव था लेकिन नुकसान में इनका हिस्सा काफी था।
लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था को कई प्रकार की रुकावटों का सामना करना पड़ा। इसे ऐसे समय में अपनाया गया जब अर्थव्यवस्था पहले से ही संघर्ष के दौर से गुज़र रही थी। विभिन्न क्षेत्रों का व्यापार पहले से ही प्रभावित हो रहा था और लॉकडाउन के कारण जाँच उपकरणों सहित आवश्यक वस्तुओं की खरीद पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। विदेश यात्रा और परिवहन पर प्रतिबंध ने परोक्ष रूप से आयात-निर्यात के व्यवसाय को प्रभावित किया। यह आय का एक प्रमुख स्रोत है। इसके अलावा, हवाई और रेल यात्रा पर प्रतिबंध के कारण पर्यटन उद्योग को झटका लगा जो आमदनी का एक बड़ा स्रोत है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की एक विशेषता बड़ी संख्या में असंगठित खुदरा बाज़ार हैं। लॉकडाउन ने इन्हें भी झकझोर दिया। इसके चलते ऑनलाइन खुदरा बाज़ार पर दबाव बढ़ा जिसे कंपनियों ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया और परिणामस्वरूप डिजिटल भुगतान की सुविधा प्रदान करने वाली कंपनियों ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया। अधिकारिक स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इस वर्ष पर नज़र डालें, तो हालात गंभीर दिखाई देते हैं। यह डाटा अगस्त के अंत में जारी किया गया था। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट ने अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट के संकेत दिए हैं। लेकिन यह समस्या कम करके आंकती है क्योंकि इसमें अनौपचारिक क्षेत्र को ध्यान में नहीं रखा गया है जिसे लॉकडाउन का सबसे अधिक खामियाजा उठाना पड़ा था। यह इतिहास में दर्ज अत्यंत खराब गिरावटों में से है और पिछले चार-पांच दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है।
भारत के प्रमुख सांख्यिकीविद जाने-माने अर्थशास्त्री प्रणब सेन का मानना है कि यदि हम सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियांवयन मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आकड़ों में अनौपचारिक क्षेत्र को भी शामिल करते हैं तो जीडीपी में गिरावट बढ़कर 33 प्रतिशत तक हो जाएगी। सेन के अनुसार लॉकडाउन के बाद भारत की आर्थिक स्थिति गंभीर है और भविष्य में और बदतर होने की संभावना है। उनका अनुमान है कि मार्च 2021 के अंत तक भारत की जीडीपी में 10 प्रतिशत की और कमी हो सकती है।
जन स्वास्थ्य: अर्थव्यवस्था का गंभीर रूप से प्रभावित होना तो एक समस्या रही ही, लोगों की जान के जोखिम को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है जिसके चलते जन स्वास्थ्य सेवा इस अभूतपूर्व स्थिति में सबसे आगे आई। महामारी से पहले भी जन स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच एक प्रमुख चिंता रही है। गौरतलब है कि प्रत्येक देश में एक स्वास्थ्य सेवा क्षमता होती है जिससे यह पता चलता है किसी देश में एक समय पर कितने रोगियों को संभाला जा सकता है। 1947 के बाद से भारत की स्वास्थ्य सेवा क्षमता कभी भी उल्लेखनीय नहीं रही है।
वर्ष 2018 से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का अनुमानित सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपए है। अधिकांश लोगों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे सस्ता विकल्प हैं। देखा जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता अनुपातिक रूप से अधिक है। महामारी के दौरान सरकार ने वायरस की पहचान और उससे निपटने में मदद के लिए कई सरकारी और निजी जाँच प्रयोगशालाओं को आवंटन किया था।
विश्व भर के मंत्रालय रोकथाम के उपायों के माध्यम से ‘संक्रमण ग्राफ को समतल’ करने की बात कर रहे हैं लेकिन यह दशकों से स्वास्थ्य सेवा में अपर्याप्त निवेश की ज़िम्मेदारी से बचने का तरीका भर है। यह सच है कि महामारी के कारण विश्व के विकसित देश भी काफी उलझे रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि उनमें से किसी भी देश को अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक बोझ के डर से भारत की तरह सख्त लॉकडाउन को अपनाना नहीं पड़ा। वैसे भी, महामारी से निपटने में विकसित देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की नाकामी न तो हमारी तैयारी में कमी और न ही हमारे खराब प्रदर्शन का बहाना होना चाहिए। आदर्श रूप से तो किसी भी देश की स्वास्थ्य सेवा क्षमता इतनी होनी चाहिए कि वह अपनी आधी आबादी को संभाल पाए।
वर्ष 2021 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने 2021-22 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य और कल्याण के लिए 2.23 लाख करोड़ रुपए व्यय करने का प्रस्ताव रखा था जो पिछले वर्ष में स्वास्थ्य सेवा पर खर्च किए गए 94,452 करोड़ रुपए के बजट से 137 प्रतिशत अधिक है।
वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष में कोविड-19 टीकों के लिए 35,000 करोड़ रुपए खर्च करने का भी प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही न्यूमोकोकल टीकों को जारी करने की भी घोषणा की गई है। उनका दावा है कि इन टीकों की मदद से प्रति वर्ष 50,000 से अधिक बच्चों को मौत से बचाया जा सकता है।
स्वास्थ्य सेवा के आवंटन में वृद्धि के शोरगुल के बीच इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि इनमें से कुछ खर्च एकबारगी किए जाने वाले खर्च हैं – जैसे 13,000 करोड़ का वित्त आयोग अनुदान और कोविड-19 टीकाकरण के लिए 35,000 करोड़ रुपए। गौरतलब है कि पानी एवं स्वच्छता के लिए आवंटित 21,158 करोड़ का बजट भी स्वास्थ्य सेवा खर्च में शामिल किया गया है जिसके परिणामस्वरूप कुल 137 प्रतिशत की वृद्धि नज़र आ रही है।
सच तो यह है कि बजट में इस तरह के कुछ आवंटन केवल वर्तमान महामारी से निपटने के लिए हैं जिनसे स्वास्थ्य सेवा में समग्र सुधार में कोई मदद नहीं मिलेगी। इसलिए स्वास्थ्य सेवा आवंटन में तीन गुना वृद्धि वास्तविक नहीं है। अगले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए निरंतर प्रयास करना आवश्यक है। इसके लिए अनुसंधान और विकास पर निवेश बढ़ाना होगा। स्वास्थ्य सेवा के संदर्भ में देखा जाए तो हमारी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वैश्विक महामारी से निपटने के लिए न तो तैयार थी और न ही ठीक तरह से सुसज्जित। ऐसी स्थित में लॉकडाउन एक फौरी उपाय ही था।
आम आदमी: जून में प्रकाशित ग्लोबल अलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप की एक रिपोर्ट के अनुसार महामारी के पूर्व कई सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम ‘अनौपचारिकता और कम उत्पादकता के दुष्चक्र में स्थायी रूप से फंसे हुए थे’ और ‘विकसित नहीं हो रहे थे’। लॉकडाउन के बाद सरकार का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को व्यवसाय के लिए एक विशेष ऋण शृंखला तैयार करना रहा। ऐसे समय में जब नौकरी की कोई गारंटी नहीं है, लोग खर्च करने के अनिच्छुक हैं और मांग में कमी है, तब कई सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के सुचारु रूप से काम करने की संभावना सवालों के घेरे में हैं। ऐसे में विशेष ऋण लेने की क्षमता प्रदान करना अधिक सहायक नहीं लगता है। अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति दोनों की गंभीर कमी के चलते सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए अधिक ऋण निरर्थक ही हैं। ग्लोबल अलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप की रिपोर्ट का अनुमान है कि कोविड-19 छोटे अनौपचारिक व्यवसायों के लिए सामूहिक-विलुप्ति की घटना बन सकता है और लगभग 30-40 प्रतिशत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के अंत की संभावना है। इन संख्याओं का मतलब है कि भारत में बहुत कम समय में उद्योग और खुदरा व्यापारी अपने व्यवसाय खो चुके होंगे। ये छोटी स्व-रोज़गार इकाइयाँ भारतीय अर्थव्यवस्था की एक विशेषता है। इनमें से कई इकाइयाँ किराए पर दुकान लेती हैं, नगर पालिकाओं को भुगतान करती हैं और इन पर अन्य कई वित्तीय दायित्व होते हैं। वैसे भी अपने छोटे स्तर के व्यवसाय के कारण उनकी आय अधिक नहीं होती है और लॉकडाउन के कारण उन्हें अपने व्यवसाय को कई महीनों तक पूरी तरह बंद रखना पड़ा जबकि उनके वित्तीय दायित्व तो निरंतर जारी रहे। चूंकि इन्हें मोटे तौर पर अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों में वर्गीकृत किया जाता है, व्यापक अर्थ व्यवस्था के नुकसान के हिसाब-किताब में इन्हें हुए नुकसान को इन्हें शामिल नहीं किया गया। यह लॉकडाउन के दौरान होने वाले नुकसान का अदृश्य रूप है।
आजीविका ब्यूरो के अनुसार प्रवासी महिलाओं पर होने वाला प्रभाव अधिक अदृश्य और हानिकारक रहा है। यह एक ऐसी श्रेणी है जिसे लॉकडाउन में भारी नुकसान चुकाना पड़ा है लेकिन इस नुकसान को वित्तीय शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है क्योंकि महिलाएं देखभाल के अवैतनिक कार्य का सबसे बड़ा स्रोत हैं। आजीविका ब्यूरो ने यह भी पाया कि भारत के कपड़ा केंद्र अहमदाबाद में घरेलू और वैश्विक व्यवसाय द्वारा महिलाओं को घर-आधारित श्रमिकों के रूप में रखा जाता है। महामारी से पहले भी वहाँ की महिलाएं औसतन 40 से 50 रुपए प्रतिदिन कमा रही थीं (किसी प्रकार के श्रम अधिकार, आश्रय या रोज़गार एवं स्वास्थ्य सुरक्षा के बगैर)। लॉकडाउन के बाद वे केवल 10 से 15 रुपए प्रतिदिन कमा रही थीं। कई महिलाएं इसलिए भी काम जारी रखना चाहती हैं ताकि वे अपने पति की हिंसा से बच सकें। घर में किसी भी तरह से आय लाने में असमर्थ होने पर उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, काम छोड़ देने का मतलब अपने ठेकेदार से सम्बंध खो देना जिसे वे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती हैं।
नारीवादी अर्थशास्त्री अश्विनी देशपांडे ने लॉकडाउन के कारण नौकरी जाने के मामले में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत बदतर पाई है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई वर्षों से रोज़गार में महिला भागीदारी दर में गिरावट देखी जा रही है। अश्विनी देशपांडे का अनुमान है कि लॉकडाउन के दौरान दस में से चार महिलाओं ने अपनी नौकरी खो दी है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी ने बेरोज़गारी से जुड़े कुछ और चौंकाने वाले आंकड़े प्रकाशित किए हैं। लॉकडाउन के महीनों में नौकरी गंवाने के आंकड़ों को देखिए:
अप्रैल 2020 में 177 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार खो दिया।
मई 2020 में 10 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार गंवाया।
जून 2020 में 39 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार गंवाया।
जुलाई 2020 में 50 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार गंवाया।
कुल मिलाकर भारत में केवल चार महीनों में 1.9 करोड़ लोग नौकरियों से हाथ धो बैठे। गौरतलब है कि ये आंकड़े औपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के हैं, अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को तो उनके नियोक्ता की इच्छा पर नौकरी पर रखा और निकाला जाता है।
लॉकडाउन के कारण भोजन खरीदने के लिए आय की कमी और खाद्य पदार्थों के वितरण में अक्षमताओं के कारण कई क्षेत्रों में भुखमरी और अकाल जैसे हालात उत्पन्न हुए। गांव कनेक्शन द्वारा लॉकडाउन के दौरान ग्रामीण संकट पर एक रिपोर्ट में काफी निराशाजनक आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। तालाबंदी के दौरान, 35 प्रतिशत परिवारों को कई बार या फिर कभी-कभी पूरे दिन के लिए भोजन प्राप्त नहीं हो सका।
38 प्रतिशत परिवारों को कई बार या फिर कभी-कभी दिन में एक समय का भोजन प्राप्त नहीं हो सका। 46 प्रतिशत परिवारों ने अक्सर या कभी-कभी अपने भोजन में से कुछ चीज़ें कम कर दीं। 68 प्रतिशत ग्रामीण भारतीयों को मौद्रिक संकट से गुज़रना पड़ा। 78 प्रतिशत लोग ऐसे थे जिनके आमदनी प्राप्त करने वाले काम पूरी तरह रुक गए।
23 प्रतिशत लोगों को अपने घर के खर्चे चलाने के लिए उधार लेना पड़ा। 8 प्रतिशत लोगों को अपनी आवश्यक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपनी बहुमूल्य संपत्ति जैसे मोबाइल फोन या घड़ी बेचना पड़ी।
एक और बात जिसे बहुत लोग अनदेखा कर देते हैं, यह है कि लॉकडाउन के कारण नुकसान सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का नहीं हुआ है। उन लोगों ने भी नुकसान उठाया है जो गरीबी रेखा के ठीक ऊपर हैं और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से बाहर हैं। वैश्विक महामारी जैसी कठिन परिस्थितियों में इस वर्ग को अत्यंत विकट समस्याओं का सामना करना पड़ता है। और तो और, सरकारी योजनाओं में पात्रता की कमी हालात और बिगाड़ देती है। एक मायने में ये परिवार सरकार द्वारा अधिकारिक रूप से पहचाने गए असुरक्षित परिवारों की तुलना में कहीं अधिक असुरक्षित हैं।
विकल्प: अब तक यह तो स्पष्ट है कि भारत ने लॉकडाउन को अपनाकर एक भारी कीमत चुकाई है। ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल यह है कि क्या लॉकडाउन के दौरान होने वाले आर्थिक नुकसान को उचित ठहराया जा सकता है? दावा किया गया था कि वायरस को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन आवश्यक है। लेकिन वायरस अभी भी काफी तेज़ी से फैल रहा है और रोज़ नए मामले सामने आ रहे हैं। इसलिए लॉकडाउन और इसके कारण होने वाले नुकसान को उचित नहीं ठहराया जा सकता। हमें लॉकडाउन को अपनाने के लिए कम से कम एक महीने और इंतज़ार करना चाहिए था। यदि लॉकडाउन से वास्तव में संक्रमण की दर में कमी आई थी तो सख्त लॉकडाउन को अपनाने का पक्ष सही ठहराया जा सकता है। हम लॉकडाउन में थोड़ा विलंब करके अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संगठित कर सकते थे। लोगों को अपने घर जाने, आवश्यक वस्तुओं को स्टॉक करने और यदि राशन कार्ड नहीं है तो बनवाने के लिए कहा जा सकता था। इस तरह से मध्य-लॉकडाउन प्रवास के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाई जा सकती थी। यदि पुनरावलोकन किया जाए तो एक महीने इंतज़ार करने पर कुछ भयावह नहीं हुआ होता।
एक और तरीका जो ऋण आधारित प्रोत्साहन के स्थान पर अपनाया जा सकता था। यह पोर्टेबल राशन कार्ड के माध्यम से किया जा सकता था। हम राशन कार्ड का डिजिटलीकरण कर सकते थे ताकि कोई व्यक्ति राशन कार्ड की हार्ड कॉपी के बिना भी उसका लाभ उठा सके।
हम आधार कार्ड को एकीकृत करके आधार आधारित बैंक-लिंक्ड मनी ट्रांसफर सिस्टम तैयार कर सकते थे जिसे विभिन्न उपकरणों द्वारा एक्सेस किया जा सके। इस तरीके से सभी सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए तेज़ी और सुरक्षित रूप से धन का स्थानांतरण किया जा सकता है। लॉकडाउन के दौरान ऐसे कई लोग थे जिनके पास किसी प्रकार की आय का सहारा नहीं था। इस प्रणाली से उपयोगकर्ता से उपयोगकर्ता और सरकार से उपयोगकर्ता को सीधे तौर पर पैसा भेजने की सुविधा मिल पाती। यह उन लोगों को काफी फायदा पहुँचा सकता था जो लॉकडाउन के दौरान जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
हम और अधिक पैसा छाप सकते थे। भारत की आर्थिक स्थिति के बावजूद हम इसे वहन कर सकते थे। अमेरिका ने ज़रूरतमंद लोगों तक धन पहुँचाने के लिए तीन ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त मुद्रा छापने का काम किया। जर्मन सेंट्रल बैंक ने यूरोप के लोगों को सीधे धन पहुँचाने के लिए लगभग एक बिलियन डॉलर छापने की अनुमति दी। यदि भारत ने अपने जीडीपी की 3 प्रतिशत रकम भी छापी होती तो आज अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में होती। यह लॉकडाउन के दौरान एक बड़ा अंतर पैदा कर सकता था जिसका अब कोई फायदा नहीं है। क्योंकि अब तो अर्थव्यवस्था वापस पूर्ण रोज़गार की ओर बढ़ रही है इसलिए अधिक पैसा छापने से मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी।
निष्कर्ष: लॉकडाउन ने हमें किस प्रकार प्रभावित किया है? इस सवाल का जवाब देने के लिए सवाल करना चाहिए कि हम नुकसान को कैसे परिभाषित करते हैं। यदि हम इसे केवल मौद्रिक नुकसान के रूप में परिभाषित करते हैं तो लॉकडाउन के कारण हमें लगभग 26-33 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। लेकिन यहाँ अर्थशास्त्र के साथ एक समस्या है – इसने लोगों के जीवन, उनकी मृत्यु और उनकी पीड़ा को संख्याओं के रूप में देखा है। इसके बावजूद बहुत सी चीज़ों को ध्यान में नहीं रखा है जिन्हें मौद्रिक रूप से व्यक्त किया जा सकता है और इसलिए नुकसान की हमारी परिभाषा और व्यापक होनी चाहिए है। क्योंकि लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा, उन परिवारों की पीड़ा जिन्हें खाली पेट सोना पड़ा, उन प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा जिन्हें शहर की सीमाओं पर पुलिस की बदसलूकी झेलते हुए सैकड़ों किलोमीटर पैदल या साइकलों पर अपने घरों के लिए निकलना पड़ा। वास्तव में ये नुकसान के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें व्यक्त कर पाना अर्थशास्त्र की क्षमताओं से परे है।
 
 
लगभग एक वर्ष पूर्व भारत में लॉकडाउन को अपनाया गया था। उसके बाद से अर्थव्यवस्था को लगातार ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है। इस लॉकडाउन के सामाजिक व आर्थिक असर आज भी दिख रहे हैं।
इस लॉकडाउन ने भारत के सभी वर्गों को किसी न किसी स्तर पर प्रभावित किया है। कुछ लोगों के लिए लॉकडाउन एक सुनहरा मौका रहा जहाँ वे अपने परिवार के साथ एक लंबी छुट्टी का आनंद ले सके, वहीं अन्य लोगों के लिए यह बेरोज़गारी, भुखमरी, पलायन और कुछ के लिए जान के जोखिम से भरा दौर रहा। आइए हम उन प्रभावों का पता लगाने का प्रयास करते हैं जो सख्त लॉकडाउन के कारण देश को झेलने पड़े। हम यह भी समझने का प्रयास करेंगे कि लॉकडाउन से किस हद तक वायरस संक्रमण रोका जा सका।
व्यापक अर्थ व्यवस्था:
कोरोनावायरस जीवन और आजीविका के नुकसान के केंद्र में रहा। लॉकडाउन के एक वर्ष बाद भी भारत में जन स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों को ही पटरी पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार भारत में लॉकडाउन से अनुमानित 26-33 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। गौरतलब है कि अधिकांश अनुमान पिछले वर्ष प्रकाशित रिपोर्टों के आधार पर लगाए गए हैं जब लॉकडाउन से होने वाले नुकसान ठीक तरह से स्पष्ट नहीं थे। देखा जाए तो इन गणनाओं में उन कारकों को ध्यान में नहीं लिया गया जिन्हें धन के रूप में बता पाना मुश्किल या असंभव था लेकिन नुकसान में इनका हिस्सा काफी था।
लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था को कई प्रकार की रुकावटों का सामना करना पड़ा। इसे ऐसे समय में अपनाया गया जब अर्थव्यवस्था पहले से ही संघर्ष के दौर से गुज़र रही थी। विभिन्न क्षेत्रों का व्यापार पहले से ही प्रभावित हो रहा था और लॉकडाउन के कारण जाँच उपकरणों सहित आवश्यक वस्तुओं की खरीद पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। विदेश यात्रा और परिवहन पर प्रतिबंध ने परोक्ष रूप से आयात-निर्यात के व्यवसाय को प्रभावित किया। यह आय का एक प्रमुख स्रोत है। इसके अलावा, हवाई और रेल यात्रा पर प्रतिबंध के कारण पर्यटन उद्योग को झटका लगा जो आमदनी का एक बड़ा स्रोत है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की एक विशेषता बड़ी संख्या में असंगठित खुदरा बाज़ार हैं। लॉकडाउन ने इन्हें भी झकझोर दिया। इसके चलते ऑनलाइन खुदरा बाज़ार पर दबाव बढ़ा जिसे कंपनियों ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया और परिणामस्वरूप डिजिटल भुगतान की सुविधा प्रदान करने वाली कंपनियों ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया। अधिकारिक स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इस वर्ष पर नज़र डालें, तो हालात गंभीर दिखाई देते हैं। यह डाटा अगस्त के अंत में जारी किया गया था। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट ने अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट के संकेत दिए हैं। लेकिन यह समस्या कम करके आंकती है क्योंकि इसमें अनौपचारिक क्षेत्र को ध्यान में नहीं रखा गया है जिसे लॉकडाउन का सबसे अधिक खामियाजा उठाना पड़ा था। यह इतिहास में दर्ज अत्यंत खराब गिरावटों में से है और पिछले चार-पांच दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है।
भारत के प्रमुख सांख्यिकीविद जाने-माने अर्थशास्त्री प्रणब सेन का मानना है कि यदि हम सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियांवयन मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आकड़ों में अनौपचारिक क्षेत्र को भी शामिल करते हैं तो जीडीपी में गिरावट बढ़कर 33 प्रतिशत तक हो जाएगी। सेन के अनुसार लॉकडाउन के बाद भारत की आर्थिक स्थिति गंभीर है और भविष्य में और बदतर होने की संभावना है। उनका अनुमान है कि मार्च 2021 के अंत तक भारत की जीडीपी में 10 प्रतिशत की और कमी हो सकती है।
जन स्वास्थ्य: अर्थव्यवस्था का गंभीर रूप से प्रभावित होना तो एक समस्या रही ही, लोगों की जान के जोखिम को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है जिसके चलते जन स्वास्थ्य सेवा इस अभूतपूर्व स्थिति में सबसे आगे आई। महामारी से पहले भी जन स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच एक प्रमुख चिंता रही है। गौरतलब है कि प्रत्येक देश में एक स्वास्थ्य सेवा क्षमता होती है जिससे यह पता चलता है किसी देश में एक समय पर कितने रोगियों को संभाला जा सकता है। 1947 के बाद से भारत की स्वास्थ्य सेवा क्षमता कभी भी उल्लेखनीय नहीं रही है।
वर्ष 2018 से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का अनुमानित सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपए है। अधिकांश लोगों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे सस्ता विकल्प हैं। देखा जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता अनुपातिक रूप से अधिक है। महामारी के दौरान सरकार ने वायरस की पहचान और उससे निपटने में मदद के लिए कई सरकारी और निजी जाँच प्रयोगशालाओं को आवंटन किया था।
विश्व भर के मंत्रालय रोकथाम के उपायों के माध्यम से ‘संक्रमण ग्राफ को समतल’ करने की बात कर रहे हैं लेकिन यह दशकों से स्वास्थ्य सेवा में अपर्याप्त निवेश की ज़िम्मेदारी से बचने का तरीका भर है। यह सच है कि महामारी के कारण विश्व के विकसित देश भी काफी उलझे रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि उनमें से किसी भी देश को अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक बोझ के डर से भारत की तरह सख्त लॉकडाउन को अपनाना नहीं पड़ा। वैसे भी, महामारी से निपटने में विकसित देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की नाकामी न तो हमारी तैयारी में कमी और न ही हमारे खराब प्रदर्शन का बहाना होना चाहिए। आदर्श रूप से तो किसी भी देश की स्वास्थ्य सेवा क्षमता इतनी होनी चाहिए कि वह अपनी आधी आबादी को संभाल पाए।
वर्ष 2021 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने 2021-22 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य और कल्याण के लिए 2.23 लाख करोड़ रुपए व्यय करने का प्रस्ताव रखा था जो पिछले वर्ष में स्वास्थ्य सेवा पर खर्च किए गए 94,452 करोड़ रुपए के बजट से 137 प्रतिशत अधिक है।
वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष में कोविड-19 टीकों के लिए 35,000 करोड़ रुपए खर्च करने का भी प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही न्यूमोकोकल टीकों को जारी करने की भी घोषणा की गई है। उनका दावा है कि इन टीकों की मदद से प्रति वर्ष 50,000 से अधिक बच्चों को मौत से बचाया जा सकता है।
स्वास्थ्य सेवा के आवंटन में वृद्धि के शोरगुल के बीच इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि इनमें से कुछ खर्च एकबारगी किए जाने वाले खर्च हैं – जैसे 13,000 करोड़ का वित्त आयोग अनुदान और कोविड-19 टीकाकरण के लिए 35,000 करोड़ रुपए। गौरतलब है कि पानी एवं स्वच्छता के लिए आवंटित 21,158 करोड़ का बजट भी स्वास्थ्य सेवा खर्च में शामिल किया गया है जिसके परिणामस्वरूप कुल 137 प्रतिशत की वृद्धि नज़र आ रही है।
सच तो यह है कि बजट में इस तरह के कुछ आवंटन केवल वर्तमान महामारी से निपटने के लिए हैं जिनसे स्वास्थ्य सेवा में समग्र सुधार में कोई मदद नहीं मिलेगी। इसलिए स्वास्थ्य सेवा आवंटन में तीन गुना वृद्धि वास्तविक नहीं है। अगले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए निरंतर प्रयास करना आवश्यक है। इसके लिए अनुसंधान और विकास पर निवेश बढ़ाना होगा। स्वास्थ्य सेवा के संदर्भ में देखा जाए तो हमारी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली वैश्विक महामारी से निपटने के लिए न तो तैयार थी और न ही ठीक तरह से सुसज्जित। ऐसी स्थित में लॉकडाउन एक फौरी उपाय ही था।
आम आदमी: जून में प्रकाशित ग्लोबल अलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप की एक रिपोर्ट के अनुसार महामारी के पूर्व कई सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम ‘अनौपचारिकता और कम उत्पादकता के दुष्चक्र में स्थायी रूप से फंसे हुए थे’ और ‘विकसित नहीं हो रहे थे’। लॉकडाउन के बाद सरकार का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को व्यवसाय के लिए एक विशेष ऋण शृंखला तैयार करना रहा। ऐसे समय में जब नौकरी की कोई गारंटी नहीं है, लोग खर्च करने के अनिच्छुक हैं और मांग में कमी है, तब कई सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के सुचारु रूप से काम करने की संभावना सवालों के घेरे में हैं। ऐसे में विशेष ऋण लेने की क्षमता प्रदान करना अधिक सहायक नहीं लगता है। अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति दोनों की गंभीर कमी के चलते सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए अधिक ऋण निरर्थक ही हैं। ग्लोबल अलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप की रिपोर्ट का अनुमान है कि कोविड-19 छोटे अनौपचारिक व्यवसायों के लिए सामूहिक-विलुप्ति की घटना बन सकता है और लगभग 30-40 प्रतिशत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के अंत की संभावना है। इन संख्याओं का मतलब है कि भारत में बहुत कम समय में उद्योग और खुदरा व्यापारी अपने व्यवसाय खो चुके होंगे। ये छोटी स्व-रोज़गार इकाइयाँ भारतीय अर्थव्यवस्था की एक विशेषता है। इनमें से कई इकाइयाँ किराए पर दुकान लेती हैं, नगर पालिकाओं को भुगतान करती हैं और इन पर अन्य कई वित्तीय दायित्व होते हैं। वैसे भी अपने छोटे स्तर के व्यवसाय के कारण उनकी आय अधिक नहीं होती है और लॉकडाउन के कारण उन्हें अपने व्यवसाय को कई महीनों तक पूरी तरह बंद रखना पड़ा जबकि उनके वित्तीय दायित्व तो निरंतर जारी रहे। चूंकि इन्हें मोटे तौर पर अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों में वर्गीकृत किया जाता है, व्यापक अर्थ व्यवस्था के नुकसान के हिसाब-किताब में इन्हें हुए नुकसान को इन्हें शामिल नहीं किया गया। यह लॉकडाउन के दौरान होने वाले नुकसान का अदृश्य रूप है।
आजीविका ब्यूरो के अनुसार प्रवासी महिलाओं पर होने वाला प्रभाव अधिक अदृश्य और हानिकारक रहा है। यह एक ऐसी श्रेणी है जिसे लॉकडाउन में भारी नुकसान चुकाना पड़ा है लेकिन इस नुकसान को वित्तीय शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है क्योंकि महिलाएं देखभाल के अवैतनिक कार्य का सबसे बड़ा स्रोत हैं। आजीविका ब्यूरो ने यह भी पाया कि भारत के कपड़ा केंद्र अहमदाबाद में घरेलू और वैश्विक व्यवसाय द्वारा महिलाओं को घर-आधारित श्रमिकों के रूप में रखा जाता है। महामारी से पहले भी वहाँ की महिलाएं औसतन 40 से 50 रुपए प्रतिदिन कमा रही थीं (किसी प्रकार के श्रम अधिकार, आश्रय या रोज़गार एवं स्वास्थ्य सुरक्षा के बगैर)। लॉकडाउन के बाद वे केवल 10 से 15 रुपए प्रतिदिन कमा रही थीं। कई महिलाएं इसलिए भी काम जारी रखना चाहती हैं ताकि वे अपने पति की हिंसा से बच सकें। घर में किसी भी तरह से आय लाने में असमर्थ होने पर उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, काम छोड़ देने का मतलब अपने ठेकेदार से सम्बंध खो देना जिसे वे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती हैं।
नारीवादी अर्थशास्त्री अश्विनी देशपांडे ने लॉकडाउन के कारण नौकरी जाने के मामले में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत बदतर पाई है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई वर्षों से रोज़गार में महिला भागीदारी दर में गिरावट देखी जा रही है। अश्विनी देशपांडे का अनुमान है कि लॉकडाउन के दौरान दस में से चार महिलाओं ने अपनी नौकरी खो दी है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी ने बेरोज़गारी से जुड़े कुछ और चौंकाने वाले आंकड़े प्रकाशित किए हैं। लॉकडाउन के महीनों में नौकरी गंवाने के आंकड़ों को देखिए:
अप्रैल 2020 में 177 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार खो दिया।
मई 2020 में 10 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार गंवाया।
जून 2020 में 39 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार गंवाया।
जुलाई 2020 में 50 लाख वेतनभोगी लोगों ने रोज़गार गंवाया।
कुल मिलाकर भारत में केवल चार महीनों में 1.9 करोड़ लोग नौकरियों से हाथ धो बैठे। गौरतलब है कि ये आंकड़े औपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के हैं, अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को तो उनके नियोक्ता की इच्छा पर नौकरी पर रखा और निकाला जाता है।
लॉकडाउन के कारण भोजन खरीदने के लिए आय की कमी और खाद्य पदार्थों के वितरण में अक्षमताओं के कारण कई क्षेत्रों में भुखमरी और अकाल जैसे हालात उत्पन्न हुए। गांव कनेक्शन द्वारा लॉकडाउन के दौरान ग्रामीण संकट पर एक रिपोर्ट में काफी निराशाजनक आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। तालाबंदी के दौरान, 35 प्रतिशत परिवारों को कई बार या फिर कभी-कभी पूरे दिन के लिए भोजन प्राप्त नहीं हो सका।
38 प्रतिशत परिवारों को कई बार या फिर कभी-कभी दिन में एक समय का भोजन प्राप्त नहीं हो सका। 46 प्रतिशत परिवारों ने अक्सर या कभी-कभी अपने भोजन में से कुछ चीज़ें कम कर दीं। 68 प्रतिशत ग्रामीण भारतीयों को मौद्रिक संकट से गुज़रना पड़ा। 78 प्रतिशत लोग ऐसे थे जिनके आमदनी प्राप्त करने वाले काम पूरी तरह रुक गए।
23 प्रतिशत लोगों को अपने घर के खर्चे चलाने के लिए उधार लेना पड़ा। 8 प्रतिशत लोगों को अपनी आवश्यक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपनी बहुमूल्य संपत्ति जैसे मोबाइल फोन या घड़ी बेचना पड़ी।
एक और बात जिसे बहुत लोग अनदेखा कर देते हैं, यह है कि लॉकडाउन के कारण नुकसान सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का नहीं हुआ है। उन लोगों ने भी नुकसान उठाया है जो गरीबी रेखा के ठीक ऊपर हैं और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के दायरे से बाहर हैं। वैश्विक महामारी जैसी कठिन परिस्थितियों में इस वर्ग को अत्यंत विकट समस्याओं का सामना करना पड़ता है। और तो और, सरकारी योजनाओं में पात्रता की कमी हालात और बिगाड़ देती है। एक मायने में ये परिवार सरकार द्वारा अधिकारिक रूप से पहचाने गए असुरक्षित परिवारों की तुलना में कहीं अधिक असुरक्षित हैं।
विकल्प: अब तक यह तो स्पष्ट है कि भारत ने लॉकडाउन को अपनाकर एक भारी कीमत चुकाई है। ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल यह है कि क्या लॉकडाउन के दौरान होने वाले आर्थिक नुकसान को उचित ठहराया जा सकता है? दावा किया गया था कि वायरस को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन आवश्यक है। लेकिन वायरस अभी भी काफी तेज़ी से फैल रहा है और रोज़ नए मामले सामने आ रहे हैं। इसलिए लॉकडाउन और इसके कारण होने वाले नुकसान को उचित नहीं ठहराया जा सकता। हमें लॉकडाउन को अपनाने के लिए कम से कम एक महीने और इंतज़ार करना चाहिए था। यदि लॉकडाउन से वास्तव में संक्रमण की दर में कमी आई थी तो सख्त लॉकडाउन को अपनाने का पक्ष सही ठहराया जा सकता है। हम लॉकडाउन में थोड़ा विलंब करके अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से संगठित कर सकते थे। लोगों को अपने घर जाने, आवश्यक वस्तुओं को स्टॉक करने और यदि राशन कार्ड नहीं है तो बनवाने के लिए कहा जा सकता था। इस तरह से मध्य-लॉकडाउन प्रवास के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाई जा सकती थी। यदि पुनरावलोकन किया जाए तो एक महीने इंतज़ार करने पर कुछ भयावह नहीं हुआ होता।
एक और तरीका जो ऋण आधारित प्रोत्साहन के स्थान पर अपनाया जा सकता था। यह पोर्टेबल राशन कार्ड के माध्यम से किया जा सकता था। हम राशन कार्ड का डिजिटलीकरण कर सकते थे ताकि कोई व्यक्ति राशन कार्ड की हार्ड कॉपी के बिना भी उसका लाभ उठा सके।
हम आधार कार्ड को एकीकृत करके आधार आधारित बैंक-लिंक्ड मनी ट्रांसफर सिस्टम तैयार कर सकते थे जिसे विभिन्न उपकरणों द्वारा एक्सेस किया जा सके। इस तरीके से सभी सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए तेज़ी और सुरक्षित रूप से धन का स्थानांतरण किया जा सकता है। लॉकडाउन के दौरान ऐसे कई लोग थे जिनके पास किसी प्रकार की आय का सहारा नहीं था। इस प्रणाली से उपयोगकर्ता से उपयोगकर्ता और सरकार से उपयोगकर्ता को सीधे तौर पर पैसा भेजने की सुविधा मिल पाती। यह उन लोगों को काफी फायदा पहुँचा सकता था जो लॉकडाउन के दौरान जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
 
हम और अधिक पैसा छाप सकते थे। भारत की आर्थिक स्थिति के बावजूद हम इसे वहन कर सकते थे। अमेरिका ने ज़रूरतमंद लोगों तक धन पहुँचाने के लिए तीन ट्रिलियन डॉलर की अतिरिक्त मुद्रा छापने का काम किया। जर्मन सेंट्रल बैंक ने यूरोप के लोगों को सीधे धन पहुँचाने के लिए लगभग एक बिलियन डॉलर छापने की अनुमति दी। यदि भारत ने अपने जीडीपी की 3 प्रतिशत रकम भी छापी होती तो आज अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में होती। यह लॉकडाउन के दौरान एक बड़ा अंतर पैदा कर सकता था जिसका अब कोई फायदा नहीं है। क्योंकि अब तो अर्थव्यवस्था वापस पूर्ण रोज़गार की ओर बढ़ रही है इसलिए अधिक पैसा छापने से मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी।
 
निष्कर्ष: लॉकडाउन ने हमें किस प्रकार प्रभावित किया है? इस सवाल का जवाब देने के लिए सवाल करना चाहिए कि हम नुकसान को कैसे परिभाषित करते हैं। यदि हम इसे केवल मौद्रिक नुकसान के रूप में परिभाषित करते हैं तो लॉकडाउन के कारण हमें लगभग 26-33 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। लेकिन यहाँ अर्थशास्त्र के साथ एक समस्या है – इसने लोगों के जीवन, उनकी मृत्यु और उनकी पीड़ा को संख्याओं के रूप में देखा है। इसके बावजूद बहुत सी चीज़ों को ध्यान में नहीं रखा है जिन्हें मौद्रिक रूप से व्यक्त किया जा सकता है और इसलिए नुकसान की हमारी परिभाषा और व्यापक होनी चाहिए है। क्योंकि लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा, उन परिवारों की पीड़ा जिन्हें खाली पेट सोना पड़ा, उन प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा जिन्हें शहर की सीमाओं पर पुलिस की बदसलूकी झेलते हुए सैकड़ों किलोमीटर पैदल या साइकलों पर अपने घरों के लिए निकलना पड़ा। वास्तव में ये नुकसान के कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें व्यक्त कर पाना अर्थशास्त्र की क्षमताओं से परे है।
 
 
 
 
द्वारा- डॉ. प्रयाग नारायण मिश्र
 
 
डॉ. प्रयाग नारायण मिश्र, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य हैं। प्राथमिक शिक्षा इलाहाबाद में तथा नौ शिल्प में इंजीनियरिंग की पढाई आयी. टी., खड़गपुर में हुई। ततपश्चात उच्च शिक्षा डॉक्टरेट - जाग्रेब विश्वविद्यालय, क्रोशिया, यूगोस्लाविया से की। व्यवसाय के सिलसिले में जर्मनी, नॉर्वे में कार्यरत रहे थे। अमेरिका में गत ४३ वर्षों से हैं। मंदिरों तथा घर में 100 से अधिक बच्चो को हिंदी पढ़ाई। सम्प्रति फीनिक्स, एरिज़ोना में गोशाला में पिछले १२ सालों से कार्यरत हैं।
 
 
 नाना-नानी की मधुर यादें
 
 
भारतीय रेलवे के इतिहास में घनश्याम दीक्षित का नाम स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाएगा क्योंकि वे सर्व प्रथम भारतीय थे जिनका तकनीकी पर्चा अंतर्राष्ट्रीय रेलवे जर्नल में प्रकाशित हुआ था। उस समय लाल बहादुर शास्त्री जी रेलवे के मंत्री थे और वे दीक्षित जी का बड़ा आदर करते थे। एक और विशेष समानता थी: दोनों-शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री और दीक्षित जी की पत्नी रुक्मिणी देवी-अंगरेजी भाषा से अपरिचित थीं और बहुत कम पढ़ी लिखी थीं, अतएव जब भी जलसे-पार्टी होते तो इन दोनों के साथ में कोई और शामिल नहीं होता था। रुक्मिणी देवी मेरी नानी और घनश्याम दीक्षित जी मेरे नाना थे।
नाना जी का पूरा नाम घन श्याम नारायण दीक्षित था, और वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। कानपुर के समीप भासैऊ ग्राम में पैदा हुए थे। उनके पिता का देहांत अल्पायु में हो गया था अतएव परिवार की जिम्मेदारी घनश्याम जी को निभानी पड़ी क्योंकि भाई बहनों में वे सबसे बड़े थे। पढ़ने में मेघावी छात्र थे और किसी तरह कर्ज लेकर रूरकी इन्जिनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई समाप्त की और सारा उधार डेढ़ साल में चुका दिया साथ ही अपने भाइयों और बहनों की भी आर्थिक सहायता की। नाना को ५ स्वर्ण पदक मिले थे – उनका विवरण इस प्रकार है - मिडिल स्कूल में सर्व प्रथम, उत्तर प्रदेश के बोर्ड के इम्तहान में हाई स्कूल और माध्यमिक परीक्षा में सर्व प्रथम, प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा में सर्व प्रथम और फिर रूरकी इन्जीनियरिंग कॉलेज से - सर्व प्रथम - स्वर्ण पदक विजेता। नाना जी ज्योतिष विद्या के जानकार थे और एक सलाह के अनुसार उन्होंने अपना नाम घनश्याम नारायण से बदल कर सिर्फ घनश्याम दीक्षित रखा।

मेरी सगी नानी का देहांत तो बहुत पहले हो गया था जब कि मेरी माँ का विवाह भी नहीं हुआ था। अतएव उनकी बहन रुक्मिणी देवी मेरे लिए सगी नानी से बढ़कर थीं। नाना जी घनश्याम नारायण दीक्षित की मुझे याद है जब मैं ४ वर्ष का बालक था- कानपुर में मौसी के विवाह में उन्हें पहली बार देखा था। प्यार से हम उन्हें अब नाना कहेंगे-तो नाना रेलवे में बड़े अधिकारी थे और उनका बड़ा रोब रहता था। नानी तो कम पढी-लिखी थी और सादी थीं। नाना ने मुझे एक बार अपने कमरे में बुलाया और ड्राइंग बोर्ड पर बनाए स्टेशन के प्लेटफार्म का नकशा तथा गाड़ी के डिब्बे की डिजाईन दिखाई।


जब मेरा चयन आई. आई. टी.-खड़गपुर में १९५८ में हुआ तो उसका श्रेय नाना को जाएगा क्योंकि उन्होंने मुझे इंजिनीयर बनने की प्रेरणा दी थी। अपने चयन की सूचना हमने उन्हें फोन कर दी, वे तब दिल्ली में रेलवे बोर्ड में निदेशक थे। हमने रेलवे का फोन इस्तेमाल किया – दारागंज स्टेशन के एक संतरी के पास जाकर निवेदन किया और उसने लाइन मिला दी। लगभग पौन घंटे तक उन्होंने सलाह दी कि खूब मन लगाकर पढ़ाई करना। इस फोन ने याद दिलाया, ३ साल पहले १९५५ मे जब मैं एक सप्ताह तक उनके पास रुका था। भारत की पहली औद्योगिक प्रदर्शनी जिसे देखने के लिए अपने विद्यालय से हम सभी गए थे। पर हम ठहरे नानी-नाना के बंगले में जो कश्मीरी गेट के पास था। नाना ने डांट लगाई कि स्कूल की एक हफ्ते की पढ़ाई का नागा करके नुमाइश देखने क्यों आये? क्या उसकी कमी को पूरा कर पाओगे? नानी ने मेरी सिफारिश की वरना नाना तो मुझसे तुरंत वापस जाने के लिए कह रहे थे। हम बाहर का खाना नहीं खाते थे- और नानी रोज सुबह गरम गरम पराठा मेरे लिए बाँध देती थी जिसे हम दिन में भूख लगने पर खाते थे। रात में नुमाइश समाप्त हो पर घर आते थे और फिर खा कर सो जाते थे। यह सिलसिला ६ दिनों तक चलता रहा। आखिरी दिन शाम को नाना हमें कार से घुमाने ले गए और दिल्ली के प्रसिद्ध स्थान दिखाए।

१९६१ में मेरी ट्रेनिंग मुंबई में ५ महीने के लिए हुयी थी, उस समय नाना पूना में रेलवे इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रधानाध्यापक थे, उनसे मिलने के लिए मैं ३ दिनों के लिए पूना गया था। नानी तो बहुत खुश हुयी थी।

१९६५ में मेरा विवाह हुआ, मैं शादी में हिचक रहा था। नाना ने जब यह सूना तो मुझे मिलने और परामर्श के लिए बुलवाया और मेरे मार्ग दर्शक नाना ने फिर मेरी खिंचाई की – समझाया – तर्क दिए और मुझे शादी के लिए तैयार करवाया। मेरे माता–पिता की चिंता ख़त्म हुयी। शादी की शाम नाना नहीं सम्मिलित हो पाए थे – शायद मेरे ऊपर नाराज थे – पर विवाह के पश्चात उन्होंने ३२ साउथ रोड के बंगले में हमें बुलाया। हम रात वहीं रुके- एक तरह से कहें तो सुहाग रात वहीं मनाई थी। एक संयोग की बात है कि मेरे बड़े साले, रमेश चन्द्र शुक्ल नाना के बंगले के साथ लगे मकान में रहते थे और मेरी धर्म-पत्नी ने बचपन वही गुजारा था। मेरी पत्नी ने कहा कि वे बचपन में नाना के बंगले के बाहर लगे अमरुद चुरा लेती थीं।

१९६५ में अपनी बहन के विवाह के बाद मैं सपत्नीक अपनी बहन और बहनोई विनोद तिवारी के साथ नाना से मिलने और आशीर्वाद लेने गए। नाना ने मेरे बहनोई को एक तकनीकी लेख की प्रति दी–यह लेख विश्व प्रसिद्द अंतर-राष्ट्रीय रेलवे जर्नल में नाना ने प्रकाशित करवाया था – और वे पहले भारतीय लेखक थे जिनका लेख इस पत्रिका में छापा गया था।
मेरी आख़िरी मुलाक़ात १९७६ में हुयी थी। तब हम नॉर्वे में रहते थे और मिलने के लिए प्रयागराज आये थे। नाना के बाएं पैर के अंगूठे की सर्जरी हुयी थी। वे काफी दुबले हो गए थे। नाना से हमने कहा कि हमें वापस नॉर्वे जाने का दुःख है - प्रवास और विदेश में भारत को छोड़ कर जाना। हमेशा की तरह नाना बोले: तुम विदेश नहीं स्वदेश जा रहे हो! क्या तुम्हें नहीं पता कि हम आर्य लोगों का मूल स्थान स्कंदिनेविया था - नाना ने लोकमान्य तिलक की पुस्तक का उद्धरण दिया: The Arctic Home In Vedas. इस पुस्तक के अनुसार आर्य लोग उत्तर दिशा में स्कंदिनेविया के देशों में रहते थे और वहाँ से ताशकंद होते हुए भारत आये। हमारे लिए तो सारा विश्व ही कुटुंब के सामान है।


अब बात नानी की कर लें: सुबह का समय था और नानी खाना बना रही थीं। गैस का स्टोव बहुत गंदा था आंच नहीं निकल रही थी। मेरे छोटे भाई प्रकाश ने एक झाडू की सींक तोड़ी और स्टोव के सारे छेदों की सफाई करदी। फिर क्या था–भकाभक पूरी आंच निकली और नानी खुश, कहने लगी कि हे भगवान, क्या हम सपना देख रहे हैं कि आज भगवान् हमारे घर आए हैं – सब काम बना दिया।

नानी हमेशा प्रयागराज में प्राण त्यागना चाहती थीं ताकि उनकी अस्थियाँ संगम में प्रवाहित की जाएँ और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो !
 
 
 
 
 
~ ** ~
 
 
Best wishes and regards
Sat 12/4/2021 1:35 PM

आदरणीय सुशीला जी:
बहुत बहुत धन्यवाद। संवाद की प्रति मिल गयी। अध्ययन का आनंद ले रहा हूँ। "संस्मरण" लेख पर इतनी त्वरित प्रक्रिया देख कर स्तंभित हूँ। आपकी कार्यकुशलता वास्तव में सराहनीय है। बहुत बहुत अभिनन्दन आपकी कार्यक्षमता और सुसंगठित व्यवस्था का। कुछ ही समय में, देखते ही देखते संवाद का रूप कितना निखर गया है। हार्दिक शुभकामनायें ।

भवदीय
आनंद प्रकाश
Regards,
Anand Prakash
IHA ID No.: LM1208060
 
 
 अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के  न्यासी मण्डल के नए अध्यक्ष का स्वागत है !
अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के न्यासी मण्डल की बैठक १७ दिसम्बर २०२१ को हुई। समिति की अध्यक्षा सुशीला मोहनका ने सूचित किया कि दो न्यासियों का कार्यकाल ३१ दिसम्बर २०२१ को समाप्त होने जा रहा है इसलिए मनोनयन एवं निर्वाचन प्रक्रिया के तदुपरान्त आगामी २०२२-२४ सत्र के लिए दो नये न्यासी सदस्यों, डॉ. सतीश मलिक (न्यू जर्सी) और डॉ. तरूण सूरती (टेन्नसी), का चुनाव समयानुसार कर लिया गया था। इन दोनों का कार्यकाल १ जनवरी २०२२ से प्रारम्भ होगा। इस बैठक में न्यासी समिति के अध्यक्षपद के लिए श्री आलोक मिश्र का नाम श्री सुरेन्द्रनाथ तिवारी ने प्रस्तावित किया और सर्वसम्मति से संवैधानिक रूप से पारित किया गया। १ जनवरी २०२२ से आलोक मिश्र अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के चेयरमैन पद का कार्यभार लेंगे। समिति की ओर से उनके कार्यकाल की सम्पूर्ण सफलता के लिए अग्रिम बधाई है।
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के समस्त सदस्यगणों को नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं अनिरुद्ध शुभकामनाएं ! 
 
 
 
 
 
प्रबंध सम्पादक
 
- सुशीला मोहनका
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी मानद सदस्यों का अभिवादन है,
आप सभी को बड़े दिन की और नये वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ। नया वर्ष आपके लिए, आपके परिवार के लिए, समाज के लिए और देश के लिए शुभ और मंगलमय हो।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) की इस बढ़ती हुई नई लहर के प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
इस सत्र की विशेष सूचनायें :-
सम्वाद पत्र का प्रकाशन
दिसम्बर २०२१ का वर्ष अब अंत होने वाला है साथ ही अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के २०२०-२१ सत्र का भी अंत होनेवाला है। इस सत्र की बड़ी उपलब्धियों में अ.हि.स. का मासिक पत्र संवाद भी है। जून २०२१ से यह पत्र प्रारम्भ हुआ और अब दिसम्बर २०२१ का अंक आपके पास जा रहा है। प्रत्येक अंक में कुछ सुधार, कुछ निखार लाने का प्रयास किया है। अ.हि.स. की स्थानीय समितियों के समाचारों को अधिक स्थान मिल रहा है इससे समिति की लक्ष्य पूर्ति में सहायता मिलेगी। स्थानीय समितियों में आपस में भाईचारा बढ़ रहा है और मिलजुलकर काम करने की आदत भी बढ़ रही है ।
२०२२ से इस मासिक सम्वाद में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान होने जा रहा है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जायेगा। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें ।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २० वाँ अधिवेशन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ, इसके समाचार आपको मासिक संवाद पत्र के विभिन्न अंकों में मिला होगा और अपने उसे ध्यान से पढ़ा भी होगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है ।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना: सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों को नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें। जिन स्थानीय समितियों में २०२२-२३ सत्र के लिए निर्वाचन या मनोनयन हो गये है, उन्हें बधाई है और जिन्होंने उनके नाम एवं विवरण भेज दिए हैं उन्हें धन्यवाद। जो स्थनीय समितियाँ नहीं भेज पाई हैं उनसे निवेदन है कि वे अपनी समिति के वननिर्वाचित या मनोनीत पदाधिकारियों के नाम एवं अन्य विवरण की सूचना शीघ्र भेजने का कष्ट करें। एक बात और जिन स्थानीय समितियों में निर्वाचन या मनोनयन नही हुए हैं उनसे निवेदन है कि वे जल्दी से जल्दी अपने यहाँ निर्वाचन या मनोनयन करा कर पदाधिकारियों के नाम एवं अन्य विवरण भेजें। सत्र का अंत है इसलिए मेरा यह कर्तव्य है कि समितियों की संक्षिप्त सूचना आप सबको दूँ । २०२०-२१ के सत्र के प्ररम्भ में ही ९ सुप्त या निष्क्रिय समितियों को अ.हि.स. की सूची से हटा दिया गया और ५ नई समितियों का गठन किया गया।
संवाद पत्र प्रकाशन के लिये श्री अलोक मिश्रा जी एवं डॉ० शैल जैन को विशेष धन्यवाद।
 
 
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