AUGUST INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अगस्त 2025, अंक ४९ प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र। सम्पादक: डॉ. शैल जैन
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों एवं संवाद के पाठकों का हार्दिक अभिनंदन।
भारतीय स्वतंत्रता दिवस, फ्रेंडशिप-दिवस, रक्षाबंधन, हरियाली-तीज, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा गणेश चतुर्थी की सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
समय अपनी तीव्र गति से निरंतर आगे बढ़ता रहता है, और देखते ही देखते ग्रीष्मावकाश विदा लेने को है। इसी के साथ हमारी समिति की शाखाएँ तथा आउटरीच राज्य अपने अपने नगरों में आगामी कार्यक्रमों की तैयारियों में रत हैं। अगस्त का स्वतंत्रता दिवस हो, सितंबर का हिंदी दिवस या फिर आने वाले पर्व—दीपावली और ईद—हर आयोजन के लिए उत्साहपूर्ण गतिविधियाँ प्रारंभ हो चुकी हैं। ये उत्सव मात्र तिथियों का उत्सव नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और भाषा की जीवंत धड़कन हैं, जो हमें जोड़ते हैं, संवारते हैं और सामूहिक आनंद से आलोकित करते हैं।
भारत में 15 अगस्त 2025 को अपनी स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगाँठ पूर्ण उत्साह और गहन श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह केवल 1947 में ब्रिटिश शासन से मुक्ति का स्मरण नहीं, बल्कि उन अनगिनत बलिदानों की गूँज है, जिन्होंने हमें स्वतंत्रता का अमूल्य वरदान दिया। वास्तव में, सच्ची स्वतंत्रता केवल बाहरी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि अपने विचारों, संस्कारों और संस्कृति में आत्मनिर्णय की शक्ति में निहित है। आज का भारत, परंपरा और आधुनिकता का संगम बनकर, ज्ञान, नवाचार और सामाजिक सामंजस्य के माध्यम से विश्व पटल पर अपनी अमिट छवि बना रहा है। इस शुभ वासर पर देशभर में विद्यालयों, शासकीय कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रध्वज का गौरवपूर्ण आरोहण, राष्ट्रगान की प्रतिध्वनि, रंगीन सांस्कृतिक कार्यक्रम और लालकिले से प्रधानमंत्री का प्रेरणादायक संबोधन आयोजित होते हैं। यह पर्व न केवल हमारे आधुनिक भारत की उपलब्धियों की झाँकी प्रस्तुत करता है, बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों के साहस, तप, बलिदान और त्याग को सच्ची श्रद्धा अर्पित करने का अवसर भी है।
प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को भारत में राष्ट्रीय हिंदी दिवस (National Hindi Diwas) उल्लास और गर्व के साथ मनाया जाता है। यह दिवस संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाए जाने की ऐतिहासिक गौरव का स्मरण करता है। इस अवसर पर हिंदी भाषा की महत्ता, साहित्यिक योगदान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सम्मान किया जाता है। विद्यालयों, सरकारी कार्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं में व्याख्यान, कवि‑सभाएँ, लेख‑स्पर्धाएँ और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो न केवल भाषा के सौंदर्य और समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं, बल्कि हिंदी के प्रचार-प्रसार और युवा पीढ़ी में इसके प्रति प्रेम और आत्मसात को भी प्रेरित करते हैं।
हमारी शाखाएँ राष्ट्रीय हिंदी दिवस के आयोजन की तैयारियों में पूरे उत्साह और जोश के साथ लगी हुई हैं। इस वर्ष, सभी मिलकर विशेष रूप से युवाओं को कार्यक्रमों में अधिक सक्रिय रूप से सम्मिलित करने का प्रयास कर रहे हैं। कार्यक्रम अमेरिका के विभिन्न शहरों में 1 से 30 सितंबर के बीच आयोजित किए जा रहे हैं। कुछ कार्यक्रमों के घोषणा-पत्र इस संवाद में संलग्न हैं, जबकि अन्य स्थानों के लिए आप संबंधित शाखाओं से संपर्क कर विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
हम आपके मूल्यवान विचारों और प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा करेंगे, जो हमारे आयोजन को और अधिक सार्थक और समृद्ध बनाने में सहायक होंगे।
धन्यवाद,
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
ईमेल: president@hindi.org | shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: +1 330-421-7528
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इम्पायर स्टेट बिल्डिंग तिरंगे के रंगों में
न्यूयॉर्क ने भव्य अंदाज़ में मनाया भारत का स्वतंत्रता दिवस 2025
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हिंदी दिवस 2025 समारोह
द्वारा : डॉ. शैल जैन, राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
हिंदी दिवस 2025
द्वारा : अश्विनी भारद्वाज ,अध्यक्ष, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा (2024-25)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- नैशविल, टेनेसी शाखा
हिंदी दिवस 2025
द्वारा : सीमा वर्मा, शाखा अध्यक्षा, नैशविल, टेनेसी
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति --शार्लोट
हिंदी दिवस 2025
द्वारा : प्रिया भारद्वाज , शार्लोट
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हूस्टन शाखा की साझेदारी
भारतीय कॉन्सुलवास, हूस्टन, टेक्सास
हिंदी दिवस 2025
द्वारा : स्वपन धैर्यवान, हूस्टन शाखा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -न्यासी समिति
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- इंडियाना शाखा
हिंदी दिवस 2025
द्वारा :राकेश कुमार , इंडियाना शाखा पूर्व अध्यक्ष
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- उत्तर पूर्व ओहायो शाखा रिपोर्ट
समिति की साझेदारी
इंडियन हेरिटेज कल्चर कैम्प 2025 के साथ
द्वारा : डॉ. शैल जैन, राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर-पूर्वी ओहायो शाखा ने स्थानीय ”इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप” के साथ साझेदारी कर भारत की राष्ट्रीय भाषा हिंदी सिखाने के एक अनूठे अवसर में अपना योगदान प्रदान किया। कैंप इस वर्ष 'चिन्मय मिशन, रिचफील्ड, ओहायो'( Chinmaya Mission, Richfield, Ohio), में स्थापित किया गया था। पाठ्यक्रम में हिंदी भाषा बोलने, लिखने और पढ़ने की बुनियादी दक्षताएँ शामिल हैं, जिन्हें वास्तविक जीवन के भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्यों के माध्यम से एक मनोरंजक और चुनौतीपूर्ण वातावरण में प्रस्तुत किया जाता है। छात्रों को एक ऐसी नींव का निर्मित की गई, जो उन्हें हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेरित और गहन समझ विकसित करने में सहयोग करेगी।
यह वर्ष कैंप ( शिविर) के 10वें वर्ष की उपलब्धि और स्थायित्व का प्रतीक है।इस वर्ष का कार्यक्रम
2013 में आरंभ हुए इस शिविर को कोविड-19 के दौरान दो वर्षों तथा कार्यक्रम निदेशक श्रीमती किरण खेतान के पारिवारिक कारणों से एक वर्ष के लिए विराम लेना पड़ा। शिविर के पहले पांच वर्षों में यह आयोजन अमेरिकी सरकार के सुरक्षा विभाग द्वारा अनुमोदित, विनियमित, निरीक्षित और वित्तपोषित था, जो इसकी गंभीरता और गुणवत्ता का परिचायक है।
तत्पश्चात, अनुदान न होने के बावजूद, कार्यक्रम को समुदाय, अनेक स्वयंसेवकों और कार्यक्रम निदेशक श्रीमती किरण खैतान के अथक प्रयासों से सफलतापूर्वक संचालित किया गया। वर्ष 2025 का शिविर 7 जुलाई से 25 जुलाई तक, सुबह 8:50 से शाम 3:30 तक चला, जिसमें प्रतिभागी बच्चों को दिन में दो बार स्वल्पाहार और दोपहर का भोजन प्रदान किया गया। इस शिविर में 5 से 15 वर्ष की आयु वर्ग के 70 से अधिक बच्चों ने भाग लिया, और इसे संचालित करने में 15–18 शिक्षक तथा 15 स्वयंसेवक शामिल थे, जिन्होंने बच्चों को भाषा, संस्कृति और गतिविधियों में मार्गदर्शन प्रदान किया।
”इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप” में सत्तर से अधिक छात्रों को हिंदी का प्रशिक्षण दिया गया। यह कार्यक्रम15 दिनों तक चला जिसमें कुल 90 घंटे का शिक्षण हुआ।
2025 कैंप (शिविर) का प्रसंग-विषय था —
“मनुष्य और पशुओं के बीच का रिश्ता”
शिविर का उद्देश्य था कि छात्र अपने वर्तमान स्तर से एक कदम आगे बढ़ें और विभिन्न वास्तविक जीवन की गतिविधियों को आत्मविश्वासपूर्वक कर सकें। प्रत्येक दिन सुबह 8:50 बजे योगाभ्यास से आरंभ होता, जिससे बच्चों में ताजगी, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। तद्पश्चात उन्हें उनके समूहों और गतिविधियों के अनुसार विभाजित किया जाता था।
दोपहर के भोजन में विविध प्रकार के भारतीय व्यंजन परोसे जाते, जिसमें स्वयंसेवक, शिक्षक और बच्चे मिलकर सेवा में सहभागी होते थे। प्रतिभागियों को अधिकतर हिंदी में संवाद करने के लिए प्रेरित किया जाता था, ताकि भाषा का अभ्यास सहज रूप से हो। सभागृह की दीवारों पर हिंदी वर्णमाला और संबंधित शब्दों की सजावट की गई थी, जिससे बच्चे एक स्थान से दूसरे स्थान जाते समय भी भाषा के संपर्क में बने रहें और उनका सीखने का अनुभव निरंतर प्रगाढ़ होता रहे।
दूसरे सप्ताह में “मेला” का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों ने कागज़ी भारतीय मुद्रा (रुपये) का प्रयोग कर भोजन की बिक्री की और विभिन्न गतिविधियों के लिए पटल सजाए। प्रवेश निःशुल्क था, लेकिन बच्चों, शिक्षकों और स्वयंसेवकों की मेहनत और उत्साह ने पूरे कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। मेले में पाव भाजी, भेल, आलू टिक्की, कचौरी, नींबू पानी, गुलाब जामुन जैसे स्वादिष्ट व्यंजन बेचे गए। बच्चे ग्राहकों को आकर्षित करते हुए कहते—“कचौरी ले लो!”, “गरम‑गरम ले लो!”, “स्वादिष्ट पाव भाजी यहाँ है!”।
अत्यंत प्रभावशाली बात यह थी कि कई बच्चों के परिवार हिंदी-भाषी नहीं थे, फिर भी उन्होंने केवल एक सप्ताह के अभ्यास में उल्लेखनीय हिंदी बोलने की क्षमता प्रदर्शित की, जिससे अभिभावक और समुदाय के सदस्य आश्चर्यचकित और प्रसन्न रह गए। यह अनुभव बच्चों के आत्मविश्वास और भाषा के प्रति उत्साह का अद्भुत प्रदर्शन था।
24 जुलाई को शाम 5:15 बजे समापन प्रस्तुति ‘जेनिंग्स कम्युनिटी लर्निंग सेंटर’, एक्रन , ओहायो ( Jennings Community Learning Center, Akron Ohio) में संध्या के समय आयोजित हुई, जिसमें बच्चों ने परिवार, मित्रों और समुदाय के समक्ष भव्य कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम में 170 से अधिक लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम के 10वें वर्ष के विशेष अवसर पर, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, उत्तर-पूर्व ओहायो शाखा ने हर वर्ष इस कैंप में योगदान देने वाले तीन प्रतिभाशाली व्यक्तियों को विशेष सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की राष्ट्रीय अध्यक्ष, डॉ. शैल जैन द्वारा दिया गया। सम्मानित व्यक्ति थे:
-श्रीमती साधना कुमार (शिक्षिका और प्रशिक्षक ): साधना कुमार ने हिंदी और उर्दू भाषा शिक्षण-शास्त्र (Pedagogy) में अपनी मास्टर डिग्री न्यू जर्सी के केन विश्वविद्यालय से प्राप्त की।इनकी अमेरिका में हिंदी शिक्षण यात्रा 1998 में इंडिया संडे स्कूल, एक्रन, ओहायो से शुरू हुई। वर्तमान में ये क्लासरोड्स प्रोग्राम्स में एक भाषा विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं, जहाँ वे अन्य द्वितीय भाषा शिक्षकों को उनके कक्षाओं में शिक्षण-शास्त्र लागू करने में मार्गदर्शन देती हैं। इस कैंप में भी इन्होंने शिक्षिका और प्रशिक्षक के रूप में सक्रिय योगदान योगदान दिया।
-श्रीमती रेनू सिंह (शिक्षिका): शिविर की आरंभिक तिथि से ही ये इस शिविर के प्रति समर्पित सामुदायिक स्वयंसेविका और शिक्षिका के रूप में निरंतर सक्रिय रही हैं।उन्होंने अपने प्रवास और अवकाश योजनाएँ इस तरह से तय कीं कि वे हमेशा शिविर में उपस्थित रह सकें।
-श्रीमती किरण खेतान (संस्थापक एवं निदेशक): ये इस कार्यक्रम की संस्थापक और निर्देशक हैं। श्रीमती खेतान पिछले 45 वर्षों से अगली पीढ़ी को हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति सिखाने के लिए समर्पित हैं।इन्होंने 2013 में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभाग (National Security Division) द्वारा अनुमोदित स्टारटॉक ग्रीष्मकालीन शिविर कार्यक्रम की शुरुआत की। वर्तमान में कार्यक्रम को 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं (कोविड के दौरान 2 वर्षों और पारिवारिक कारणों से 1 वर्ष का विराम रहा)।आर्थिक सहायता समाप्त होने के बावजूद, वह लगातार”इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप” का आयोजन करती रही हैं। वह इंडिया संडे स्कूल, एक्रोन, ओहायो की सह-संस्थापकों में से एक हैं और पिछले 45 वर्षों से स्कूल में निष्ठावान स्वयंसेवक के रूप में सक्रिय रही हैं। अपने अथक प्रयासों और समर्पण के माध्यम से उन्होंने बच्चों तक हिंदी और भारतीय संस्कृति को निरंतर पहुँचाया है, उनके जीवन में भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों की गहरी जड़ें स्थापित की हैं। समुदाय के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति भी उनके इस अनमोल योगदान और अटूट समर्पण की हृदयपूर्वक सराहना करती है।
कार्यक्रम के बाद सभी के लिए भारतीय भोजन की व्यवस्था थी, जहाँ सभी ने बच्चों की सफलता पर चर्चा की। कुछ श्रोताओं की प्रतिक्रियाएँ—
“मेरे पोते ने कहा— ‘दादी, आप कैसी हैं’, मेरा हृदय गर्व से भर गया।”
“मेरा बच्चा अपना नाम हिंदी में लिख सकता है।”
“मेरे बच्चे रोज़ भारतीय खाना खा रहे हैं और उन्हें बहुत पसंद आ रहा है।”
“मेरे बच्चों ने यहाँ कई नए दोस्त बनाए।”
“मेरे बच्चे कह रहे हैं कि अगले साल भी आना है।”
“कैंप केवल 3 हफ्तों का ही क्यों होता है?”
कैम्प के अंतिम दिन दोपहर 3 से 5 बजे तक प्रतिभागी बच्चों, शिक्षकों, स्वयंसेवकों और युवा स्वयंसेवकों के लिए पुरस्कार एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर अभिभावकों को भी आमंत्रित किया गया था, और कार्यक्रम के साथ -साथ सभी के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था की गई।
यह ”इंडियन हेरिटेज कल्चर कैंप” निश्चित रूप से अत्यंत सफल रहा। इसमें 70 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें से दो प्रतिभागी दूसरे प्रदेशों से आये। एक प्रतिभागी हूस्टन, टेक्सास (Houston, TX) से आया और एक इंडियाना (Indiana) से। सभी प्रतिभागी और उनके अभिभावक शिविर के अनुभव से अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट रहे। उन्होंने अगले वर्ष के शिविर के प्रति अपनी उत्सुकता व्यक्त की। इस शिविर ने बच्चों को हिंदी सीखने और अपनी संस्कृति से जुड़ने का ने सिर्फ सुअवसर प्रदान किया, बल्कि उनके अभिभावकों और समुदाय के लिए भी एक गर्व और आनंद का अनुभव प्रदान किया।
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इंडियन हेरिटेज कल्चर कैम्प 2025- गतिविधियां , 'चिन्मय मिशन, रिचफील्ड, ओहायो'
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इंडियन हेरिटेज कल्चर कैम्प 2025- मेला, 'चिन्मय मिशन, रिचफील्ड, ओहायो'
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समापन प्रस्तुति ‘जेनिंग्स कम्युनिटी लर्निंग सेंटर’, एक्रोन, ओहायो
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जुलाई 25 -प्रतिभागी बच्चों, शिक्षकों, स्वयंसेवकों और युवा स्वयंसेवकों के लिए पुरस्कार एवं सम्मान समारोह, 'चिन्मय मिशन, रिचफील्ड, ओहायो'
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- ग्रीष्म (summer) कैंप 2025
नैशविल, टेनेसी शाखा
द्वारा : सीमा वर्मा, शाखा अध्यक्षा, नैशविल, टेनेसी
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की टेनेसी शाखा द्वारा पहली बार एक विशेष हिंदी समर कैंप के सफल आयोजन ने नई ऊर्र्जा का संचार किया। इस शिविर में सभी आयु वर्ग के प्रतिभागियों में भाषा सीखने, और उसे अपनाने का अद्भुत उत्साह देखने को मिला। कुल 8 प्रतिभागियों ने इस कैंप में भाग लिया, जिनकी उम्र 5 वर्ष से लेकर 25 वर्ष तक थी।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य था — “हर घर तक हिंदी शिक्षा पहुँचाना”, ताकि समुदाय में भाषा की गहरी समझ और जुड़ाव को बढ़ावा दिया जा सके।
यह कैंप कुल 9 सप्ताह तक चला, जिसमें सप्ताहिक कक्षाओं के माध्यम से प्रतिभागियों को हिंदी भाषा के मूल सिद्धांत, पढ़ना, लिखना, बोलना और सांस्कृतिक गतिविधियाँ सिखाई गईं।
कक्षाओं का संचालन दो मुख्य स्थानों -माउंट जुलिएट और फ्रेंक्लिन ( Mt. Juliet and Franklin) में किया गया, जिससे प्रतिभागियों को उनके घर के समीप ही सीखने का अवसर मिला।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- वाशिंगटन डी.सी. शाखा, रिपोर्ट
जून 29 , 2025
द्वारा : चौधरी प्रताप सिंह अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, वाशिंगटन डी.सी. शाखा अध्यक्ष और आयोजक
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, वाशिंगटन डी.सी. शाखा के अध्यक्ष चौधरी प्रताप सिंह एवं सभी सदस्यों द्वारा सम्मानित, भारतीय दूतावास के कौंसिलर (प्रेस एवं सामुदायिक कार्य) श्री दैवेश कुमार बैहरा जी की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित की गई।
ये कार्यक्रम रविवार, 29 जून, 2025 को शाम 5:00 से 8:00 बजे, वुडलैंड रेस्टॉरेंट , 555 क्विंस ऑर्चर्ड रोड, सूट 140, गेथर्सबर्ग, एम.डी. 20878 में हुई। चौधरी प्रताप सिंह ने उपस्थित सभी सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने और हिन्दी साहित्य और भाषा के विकास एवं प्रचार के लिए कार्य करने का आह्वान किया और सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया।
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अपनी कलम से
मधुर वाणी की महत्ता
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जयश्री बिर्मि अहमदाबाद, भारत में रहती हैं। ये ७२ वर्ष की हैं और अहमदाबाद से निवृत्त शिक्षिका हैं।इन्हें हिंदी से प्रेम है और लिखने का शौख है। अपने विचारों को साधारण भाषा में लिखती रहती हैं।
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"मधुर वाणी की महत्ता "
जीवन के लिए पानी की जितनी महत्ता हैं उतनी ही वाणी की महत्ता जिन्दगी में हैं। पानी खारा हुआ तो आर ओ सिस्टम लगा के उसे मीठा किया जा सकता हैं। वाणी के लिए कोई ऐसा प्रावधान हैं क्या? कहावत हैं न,गुड़ से मरता हैं कोई तो ज़हर क्यों दे? मतलब कि प्यार से, मधुर वाणी से जो काम हो रहा हैं उसे गुस्से से या कड़वी वाणी से क्यों किया जाएं ?
वैसे भी गुस्से को पाशवी कक्षा में गिना जाता हैं। ये राक्षसी अभिव्यक्ति हैं जो क्षणिक हैं, जब कि स्नेह और प्रेम की भावना अनंत हैं।
मधुर वाणी में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा रहती है, जबकि क्रोध या कठोर शब्दों में नकारात्मकता का प्रभाव रहता है। ऐसे शब्द सुनने वाले के मन पर प्रतिकूल असर डाल सकते हैं और संबंधों में दूरी उत्पन्न कर सकते हैं। इसके विपरीत, मधुर वाणी न केवल सामने वाले का मन मोह लेती है, बल्कि विश्वास और स्नेह भी बढ़ाती है, लोगों को आपसे जोड़ती है। जब हम कटु या कठोर शब्द बोलते हैं, तो सामने वाला व्यक्ति मन से विरोधी पक्ष में खड़ा हो जाता है, जबकि मधुर शब्दों का प्रभाव रिश्तों और संवाद को सहज और सौहार्दपूर्ण बना देता है।
संत कबीर ने भी कहा हैं,
'ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोई
औरन को शीतल करे आपहूं शीतल होई'
वैसे हर ज्ञान-विज्ञान वर्धक पुस्तकों में इसी वाणी के गुण गाएं जातें हैं।
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अपनी कहानियाँ
"बूढ़ी चौपाल"
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द्वारा - सुनीता निमिष सिंह
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सुनीता निमिष सिंह उदयपुर राजस्थान , भारत में रहती हैं। आल इंडिया रेडियों एवं 92.7 बिग एफ एम के कार्यक्रम में भागीदारी ,अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय संगठन (Human rights and social justice Organisation) उदयपुर इकाई की अध्यक्षा। महिला काव्य मंच उदयपुर इकाई की अध्यक्षा l राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से "जिंदगी के रंग " पुस्तक प्रकाशित। इन्हें दो विश्व-कीर्तिमान प्राप्त है।
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"बूढ़ी चौपाल"
शहर से करीब ५० किलोमीटर दूर बसा केशव गांव जहां प्रकृति का सौंदर्य चरम पर है। हरियाली की वादियां दुल्हन की चुनरी की तरह गांव को ओढ़े रहती हैं।
यह चौपाल गांव की आत्मा है। यह चौपाल वह नींव है जिस पर गांव की परंपरा, भावना और आपसी जुड़ाव टिका हुआ है। यहीं पर हर बुजुर्ग अपने जीवन के अनुभवों को जीता है, साझा करता है, और नई पीढ़ी को सौंपता है।
हरिया बाबा जब अपने जवान बेटे को खोकर टूट चुके थे, तो यही चौपाल थी जिसने उन्हें सहेजा। किसना चाचा जब अपनी बेटी वैदेही को उसके लालची ससुराल से निकाल कर लाए , तो पूरा गांव चौपाल पर इकट्ठा हुआ और बोला, “वैदेही केवल तुम्हारी नहीं, हम सबकी बेटी है।”
दरोगाइन अम्मा - असल में अम्मा के पति दारोगा थे तब से सारा गाँव उन्हें दरोगाइन अम्मा कहता है। वो आज भी चौपाल पर बैठती हैं, अपने बेटे की शहादत का गर्व लिए ,चौपाल ने उन्हें अकेलेपन से ही नहीं बचाया बल्कि गर्व से जीना सिखाया है।
हर शाम जब ढलती धूप की किरणें बरगद की शाखाओं से छनकर मिट्टी को छूती हैं, मिट्टी पर छिड़काव होता है और उससे उठती सौंधी महक चौपाल की पहचान बन चुकी है।
एक दिन गांव में एक जीप आकर रुकी। उसमें से उतरे एक सरकारी अधिकारी ने घोषणा की—“गांव का नवीनीकरण होगा, अतिक्रमण हटाया जाएगा। चौपाल और उसके आसपास की ज़मीन विकास योजनाओं में आएगी।”
गांव जैसे सन्न रह गया। अफसर चला गया, पर गांव की निगाहें टिक गईं वीर सिंह पर - गांव के संबंध, समझदार और सबके आदरणीय। वीर सिंह ने बस इतना कहा—“कल सोचेंगे। कोई भी बदलाव अगर आत्मा को छू जाए, तो फिर वह विकास नहीं होता।”
उस रात वीर सिंह को नींद नही आई। वे चौपाल की ओर देखने लगे। क्या अब ये चौपाल बच पाएगी? क्या परंपरा और विकास एक साथ चल पायेंगे ?
अगले दिन गांव भर की बैठक हुई कोई बोला, “विकास ज़रूरी है”, कोई बोला, “जड़ें मत काटो बाबा!” किशना चाचा ने कहा, “बेटी को तो बचा लिया, अब चौपाल को भी बचाना होगा।”
वीर सिंह बोले, “हम विकास के विरोध में नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास जो हमारे संस्कारों को उखाड़ दे, वह हमें मंज़ूर नहीं। बूढ़ी चौपाल को हटाने की बात उसी तरह है जैसे किसी के दिल से उसकी मां की यादें मिटाना।”
गांव की राय स्पष्ट हो गई। चौपाल नहीं हटेगी l
रात गहराती रही बाहर बरगद की शाखाएं हवा में सरसराती रहीं, मानो गांव के इतिहास की फुसफुसाहट कर रही हों। चौपाल की मिट्टी में न जाने कितनी पीढ़ियों के कदमों की धूल बसी थी—क्या अब यही मिट्टी खोखली की जाएगी?
सुबह होते ही सरकारी फरमान की चर्चा घर-घर में होने लगी। सरकारी नक्शे में वो एक खाली जमीन थी, पर गांव वालों के लिए वो इतिहास, वर्तमान और भविष्य तीनों का संगम थी।
चौपाल पर आज असामान्य भीड़ थी। वीर सिंह आज पहली बार थोड़े असहज दिखाई दिए। उन्होंने गहरी सांस ली और बोले,
"बदलाव जरूरी है, पर ये बदलाव ऐसा हो जो हमारी जड़ों को न काटे। जो चौपाल हमारी पहचान है, क्या हम उसे मिटा देंगे? क्या नया गांव बनाने के लिए हमें अपनी आत्मा ही बेच देनी चाहिए?"
तभी युवा नेता अर्जुन बोला "बाबा, हम चौपाल को बचा सकते हैं, पर हमें समझौता करना होगा। क्यों न हम गांव की योजना में चौपाल को 'धरोहर स्थल' घोषित करवाएं? हम मिलकर काम करें, बदलाव भी आए और परंपरा भी बचे।"
वीर सिंह उसकी बातों से प्रभावित हुए, पर कुछ बुजुर्ग नाखुश थे। "हमारी चौपाल को कोई 'स्थल' नहीं बनाएगा, वो हमारे रिश्तों की थाती है, कोई प्रदर्शन की चीज़ नहीं!"—हरिया बाबा ने गुस्से में कहा।
तभी किशना चाचा बोले—"पर कुछ न कुछ तो करना ही होगा वरना अगले महीने सरकारी जेसीबी यहां खड़ी होगी।"
एक योजना बनाई गई।
सरकारी अफसर को गांव ने एक प्रस्ताव भेजा l
कुछ हफ्तों बाद खबर आई—सरकार ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है। बूढ़ी चौपाल अब गांव की धरोहर मानी जाएगी वीर सिंह की आंखों में छलकते आंसुओं ने कहा—"हम बदल भी रहे हैं, और बच भी रहे हैं।"
बरगद के नीचे बैठी दरोगाइन अम्मा ने चुपचाप आसमान की ओर देखा और कहा,
"देख बेटा... तेरा गांव अब भी जिंदा है।"
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बाल विभाग (किड्स कार्नर )
अपनी तीन कवितायेँ
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हेमन्त देवलेकर का जन्म जुलाई 1972 में हुआ। इनकी पहली कविता संग्रह 2012 में प्रकाशित, और "हमारी उम्र का कपास' शीर्षक से राधाकृष्ण से पुनर्प्रकाशित 2023 में.हुई। दूसरा कविता संग्रह ' गुल मकई' 2017 में बोधि प्रकाशन से। विभिन्न पत्रिकाओं और ब्लॉग्स पर कविताओं का निरंतर प्रकाशन। नाटकों का लेखन और रूपांतरण भी किया और 25 से अधिक नाटकों में गीत लेखन और संगीत सृजन। ये
वागीश्वरी सम्मान, शशिन सम्मान, स्पंदन युवा सम्मान से सम्मानित हैं। सौरभ अनंत के निर्देशन में विहान ड्रामा वर्क्स में रंगकर्म में निरंतर सक्रिय भी हैं।
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१ ) तेरा पड़ोस
तेरे जन्म के वक्त
जितना ज़रूरी था मां के स्तनों में दूध उतरना
उतना ही ज़रूरी था पड़ोस
एक स्तन को छोड़
दूसरे को मुँह लगाने जितना पास
यह पड़ोस
मां का ही विस्तार है
घुटनों घुटनों सरक कर पड़ोस में जाना
धरती नापने की शुरुआत है
पड़ोस तुझे क्षितिज की तरह लगता
कितने सारे रहस्यों भरा और पुकारता
वहां तेरी हर इच्छा के लिए "हां" है,
जब जब घर तुझे रुलाता
तेरे आंसू पोंछने पड़ोस भागा चला आता
तेरे लंगोट पड़ोस की तार पर सूखते
और जब तू लौटती है घर
तेरे मुंह पर दूध या भात चिपका होता
वहां की कोई न कोई चीज
रोज़ तेरे घर चली आती
तू अपना घर पड़ोस को बताती
और पड़ोस पूछने पर अपना घर
बचपन के बाद यह बर्ताव
हम धीरे-धीरे भूल क्यों जाते हैं?
***
2) बर्थ डे गिफ्ट
केक का क्या है
कटेगा और खप जायेगा।
मिठाई भी वैसी
बँटेगी और खत्म हो जायेगी
कपड़े भी कहाँ अलग
पहने जायेंगे, फट जायेंगे।
खिलौने भी थोड़ा खेलेंगे
फिर टूट जायेंगे।
लेकिन किताब पढ़ी जाने के बाद भी
पढ़ी जायेगी, पढ़ी जायेगी
फिर भी खत्म होगी नहीं
कईयों के भीतर बस जायेगी।
***
३ ) एक शोक गीत
उस पहाड़ को ध्यान से देख लो
बहुत ध्यान से देख लो उस पहाड़ को
पर ध्यान रहे, पहाड़ देखते हुए
तुम्हारी आँखें दया से ना भर जाये
उनमें कोई चिंता उभर ना आये
थोड़ा थोड़ा मुस्कुराते देख लो
अजी, प्यार से देख लो उस पहाड़ को
इतना ध्यान से
कि पहाड़ बस जाये तुम्हारी स्मृतियों में
क्योंकि कोई जेसीबी
स्मृतियों को ध्वस्त नहीं कर सकती
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