AUGUST INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अगस्त 2024, अंक ३८ । प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र। सम्पादक: डॉ. शैल जैन
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्यों और संवाद के पाठकों का अभिनंदन !
भारत का स्वतंत्रता दिवस, रक्षा बंधन, कृष्ण जन्माष्टमी दिवस एवं फ्रेंडशिप दिवस “friendship Day” की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
फ्रेंडशिप दिवस अगस्त में होता है और यह एक महत्वपूर्ण दिन है। ये अमेरिका के साथ साथ भारत और अन्य कई देशों में मनाया जाता है। इस अवसर पर हम साथ मिल कर अपनी- अपनी शाखाओं में अपनेपन की भावनाओं को जागृत और विस्तृत करें। ये कैसे हो सकता है इसका रास्ता हर शाखा को अपने आप ही खोजना होगा । जैसे ह्यूस्टन शाखा ने इस महीने अपने यहाँ “स्नेह मिलन समारोह” का आयोजन किया। लोगों ने मिलकर एक- दूसरे से मुलाक़ात की एवं साथ में समय बिताया। विस्तृत विवरण ह्यूस्टन शाखा के द्वारा संलग्न है।
भारत का स्वतंत्रता दिवस हर साल 15 अगस्त को भारत के साथ-साथ दुनिया के अन्य देशों में प्रवासी भारतीय एवं भारतीय मूल के लोग गर्व और उत्साह के साथ मनाते हैं । 1947 में इस दिन, भारत ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की और एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपने नए युग की शुरुआत की। ये दिन हमें उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान और संघर्ष की याद दिलाता है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें आज़ादी दिलाई। भारत का स्वतंत्रता दिवस भारतीयों को अपने देश के प्रति प्रेम, समर्पण और एकता का संदेश देता है। इस दिन, हम सभी को अपने राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।अमेरिका में मनाए गये कुछ कार्यक्रम, जिनमें अ.हि.स. के सदस्यों की भागीदारी रही, वे अगस्त संवाद पत्रिका में संलग्न है।
“हिन्दी दिवस का ७५ वां वर्षगाँठ ” इस साल १४ सितम्बर, २०२४ को है। समिति की शाखायें अपनी गोष्ठियाँ कर रहीं हैं ताकि वे अपने शहरों में अलग-अलग तरह के कार्यक्रम कर सकें। अगला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का विशाल कार्यक्रम ७५ वां “हिन्दी दिवस” है जो १४ सितम्बर को हर साल भारत और अन्य देशों में मनाया जाता है। १४,सितम्बर १९४९ को हिंदी भाषा को संविधान में राज भाषा का दर्जा दिया गया था और हमारे लिये बहुत ही गर्व की बात है। हमारे सभी नौ चैप्टर बड़े या छोटे कार्यक्रम उत्साह एवं ऊर्जा के साथ अपने-अपने शहरों में आयोजित कर रहे हैं। इनके अलावा हमारे आउटरीच राज्य में शार्लॉट, नार्थ कैरोलाइना भी भव्य रूप में “हिंदी दिवस” समारोह का आयोजन कर रही है। कार्यक्रमों की जानकारी के लिये आप अपने राज्यों में पता करें: नीचे फ्लायर में संपर्क के बारे में सूचना है। कोई भी दिक़्क़त हो तो कृपया मुझसे संपर्क करें। अगर आपके राज्य में यह कार्यक्रम नहीं हो रहा है और आप इसे करना चाहते हैं तो कृपया हम से संपर्क करें और हम उसमें आपकी सहायता करने की कोशिश करेंगे।
युवाओं को जोड़ना बहुत ही आवश्यक है। यदि हम चाहतें हैं कि हमारी धरोहर “हिंदी भाषा और संस्कृति” हमारे बच्चों और आने वाली सभी पीढ़ियों में जीवित रहे और पनपती रहे तो हमें अपने परिवार से ही इसकी कोशिशों का प्रारंभ करना होगा। समिति से बालपन से जोड़ने से बच्चों को एक मंच मिलेगा और वो आगे भी जुड़े रहेंगे। पाठकों से विशेष अनुरोध है कि वे अपने जानने वाले और परिवार के युवकों को समिति से जोड़ें और यदि उनके पास सुझाव हों कि कैसे युवाओं को हम जोड़ सकते हैं तो आपके विचारों का स्वागत है।
अ.हि.स की सदस्यता में बढ़ोतरी, कोई भी संस्था के विकास के लिये सदस्यता बढ़ाना बहुत ही आवश्यक है। सदस्यता योजना का विकास हर शाखा में होना ज़रूरी है। नए सदस्य अपने साथ नये विचार और तरीक़े लाते हैं जो किसी भी संस्था के विकास के लिये बहुत ही आवश्यक है। नए सदस्यों को खोजने के लिए, शाखा अपनी खोज पर ध्यान केंद्रित करें, आस पास के लोगों का विश्लेषण कर खोजें वैसे सदस्य जो हमारी समिति के उद्देश्य पर विश्वास करते हैं और उसे जीवन में अपनाना चाहते हैं। सभी नए सदस्यों को तुरंत कार्य और भूमिकाएँ सौंपी जाना भी बहुत ज़रूरी है ताकि नये सदस्यों को मानसिक संतोष मिले और अपने उद्देश्य पूर्ति को सफल होता देख ख़ुशी भी हो । अपने यहाँ होने वाले सामूहिक कार्यक्रमों में “सदस्यता अभियान” को भी शामिल करें।
अ.हि.स. की सभी स्थानीय समिति के अध्यक्षों से विशेष आग्रह है कि अपनी-अपनी समितियों में होने वाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके । साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाए तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके और पाठक उन कार्यक्रमों का आनंद ले सकें। स्थानीय विविधता (Diversity) कार्यक्रम जिसमें भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा को भी स्थान दिया गया हो, उनका विवरण भी फोटो के साथ भेजिए, हमें उन्हें प्रकाशित करने में ख़ुशी होगी।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का उद्देश्य हिन्दी भाषा और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना, पुनर्जीवित करना एवं जागरूक करना है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखाएँ और आउटरीच, अमेरिका के कई शहरों के साथ- साथ दूसरे देशों में भी हैं। हमारी शाखाओं एवं आउटरीच शहरों में कार्यक्रम बराबर होते रहते हैं। प्रोग्रामों की रिपोर्ट हमारी समिति की ई- संवाद पत्रिका में प्रकाशित हो रही हैंऔर उम्मीद करती हुँ कि आप उसका भरपूर आनंद ले रहें होंगे। आपके विचारों और सुझाओं का हमेशा स्वागत है।
धन्यवाद
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति २०२४-२५
ईमेल: president@hindi.org
shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हिंदी दिवस की 75 वीं वर्षगांठ
हिंदी दिवस समारोह, सितम्बर / अक्टूबर २०२४
द्वारा: अ. हि. स. के सभी चैप्टर्स और कुछ आउटरीच प्रांत
अपने -अपने शहरों में
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- शाखाओं के फ्लायर्स
हिंदी दिवस की 75वीं वर्षगांठ समारोह
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"इंडियन हेरिटेज कल्चरल कैंप" -- उत्तर पूर्व ओहायो में
5 -15 उम्र के बच्चों के लिये संपन्न
जुलाई 8 से 26 , 2024 तक
किरण खेतान, प्रोग्राम डायरेक्टर एवं अ.हि.स. उत्तर पूर्व ओहायो
शाखा की पूर्व अध्यक्षा
द्वारा :डॉ. शैल जैन
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जुलाई 8 से 26, 2024 ग्रीष्मकालीन शिविर, 5 -15 उम्र के बच्चों के लिये उत्तर पूर्व ओहायो में बहुत अच्छी तरह संपन्न हुआ।
ये प्रोग्राम रिचफील्ड, ओहायो में हुआ। कैंप डायरेक्टर श्रीमती किरण खेतान ने ये प्रोग्राम अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के उत्तर पूर्व ओहायो शाखा एवं चिमनय मिशन, क्लीवलैंड की भागीदारी में किया।
कुछ फोटो संलंग है। मैं प्रोग्राम में कुछ दिन स्वयं सेविका थी । सबसे बड़ी बात ये थी कि जब भी मैं वहां थी मैंने सभी बच्चों को उत्साहित, खुश और सक्रिय देखा। रिसाइटल प्रस्तुति, प्रोग्राम के अंत में बिलकुल अद्भुत था । विस्तृत समाचार अगले महीने में।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- ह्यूस्टन शाखा
स्नेह मिलन दिवस कार्यक्रम की रिपोर्ट
(द्वारा : स्वपन धैर्यवान, पूर्व अध्यक्ष, ह्यूस्टन शाखा )
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अ.हि.स.) की ह्यूस्टन शाखा द्वारा, 10 अगस्त, 2024 को आयोजित कार्यक्रम, स्नेह मिलन की मेजबानी करने का सौभाग्य, श्री स्वपन धैर्यवान एव उनकी पत्नी श्रीमती पल्लवी धैर्यवान को मिला। यह कार्यक्रम मिलने और जश्न मनाने के लिए एक अनौपचारिक कार्यक्रम है। ह्यूस्टन शाखा द्वारा ये स्नेह मिलन समारोह गये ४ वर्ष से हर त्रैमासिक तौर से अलग अलग कार्यकर्ताओं के घर पे होता आ रहा है। उन सभी को धन्यवाद जिन्होंने इसमें भाग लिया और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़े। फतेह अली ने हिन्दी नाटक की झाँकी कराई। संगीता पसरीज़ा ने सुरेंद्र शर्मा की ‘कालू” पेशकशी की। संजय सोहोनी ने मानस सरोवर की यात्रा का पूर्ण स्वरूप वर्णन किया।
बहुत खुशी हुई कि हमें ह्यूस्टन के आसमान में हवाई बैनर IHA के नाम सहित श्री राम का उदघोष किया। 2 महीने के लिए राम प्रतिष्ठा महोत्सव में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय विश्व हिन्दू परिषद से प्रशंसा प्रमाण पत्र मिला। ह्यूस्टन चैप्टर को टेक्सास हिंदू कैंपसाइट द्वारा आर्थिक रूप से समर्थक होने वाला पहला गैर-लाभकारी संगठन होने के लिए भी मान्यता दी गई थी। ये दोनों आयोजन के द्वारा ह्यूस्टन शाखा $15,000 के करीब जुटाने में सक्षम थे।हमारी शाखा विभिन्न सामुदायिक गतिविधियों में शामिल रहने के लिए निरंतर प्रयास करती है और करती रहेगी ।
अगले मास 14 सितंबर को भारतीय वाणिज्य दूतावास के साथ हिंदी दिवस समारोह मनाया जाएगा। यदि किसी को रुचि हो तो विषय और समावेशन के बारे में हमसे बात करें।
अगला स्नेह मिलन नवंबर में फतेह अली द्वारा आयोजित किया जाएगा। सभी को धन्यवाद।
स्वपन धैर्यवान,
पूर्व अध्यक्ष, ह्यूस्टन शाखा
वर्तमान ट्रस्टी, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति
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भारत स्वतंत्रता दिवस समारोह में
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की भागीदारी
इंडिया कल्चरल गार्डन, क्लीवलैंड, ओहायो, अगस्त 15, 2024,
द्वारा :डॉ. सोमनाथ राय, सचिव, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
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भारत के 78वें स्वाधीनता दिवस समारोह का आयोजन क्लीवलैंड फेडरेशन ऑफ इंडिया कम्युनिटी एसोसिएशन (FICA), ने 15 अगस्त, 2024 को इंडिया कल्चरल गार्डन, क्लीवलैंड में बड़ी धूमधाम के साथ किया। मुख्य अतिथि के रूप में ओहायो स्टेट सीनेटर श्रीमान नीरज अन्तानि ने उपस्थित भारतीय समुदाय को संबोधित किया।
ध्वजारोहण के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रगान गाया गया, और उसके बाद प्रमुख गायिका श्रीमती प्रेरणा खेमका के साथ मिलकर सबने देशभक्ति गीत "हम हैं हिंदुस्तानी" का भी गायन किया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने मिलकर लड्डू, नमकीन और चाय का आनंद लिया। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति, नार्थ ईस्ट ओहियो शाखा के प्रतिनिधि, सदस्य और सामुदायिक भागीदार सदस्यों ने सक्रियता के साथ इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
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भारतीय स्वतंत्रता दिवस के समारोह के दिन, 15 अगस्त, 2024 को क्लीवलैंड, ओहायो, डाउनटाउन के टर्मिनल टॉवर को तिरंगे रंग में रोशन किया गया था!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- टेनेसी शाखा
द्वारा आयोजित
नैशविल में पहली बार स्वतंत्रता दिवस परेड में भागीदारी
द्वारा :पूजा श्रीवास्तव,शाखा की अध्यक्षा
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के टेनेसी शाखा ने - नैशविल में पहली बार आयोजित स्वतंत्रता दिवस परेड में पूरे उत्साह के साथ भाग लिया ।
हमारी समिति के सदस्य हिन्दी समिति के बैनर के साथ आगे बढ़े । भारत माता की जय और वंदे मातरम् के नारों से आकाश गुंजायमान था। हमारी समिति के बच्चो ने राजस्थानी लोकनृत्य प्रस्तुत किया। हमने वहाँ एक डेस्क भी लगायी थी जिसपर हिन्दी समिति के बारे में जानकारी दी जा रही थी ।
इस कार्यक्रम में बच्चे बड़े मिलाकर लगभग ६०-७० सदस्यों ने भाग लिया। हमारी समिति के कई सदस्य इस आयोजन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में भी शामिल थे।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना शाखा की भागीदारी
इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडियानापोलिस द्वारा आयोजित
भारत दिवस कार्यक्रम में
द्वारा : डॉ. कुमार अभिनव
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इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडियानापोलिस द्वारा आयोजित भारत दिवस कार्यक्रम में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना शाखा का सफल प्रदर्शन
वार्षिक भारत दिवस कार्यक्रम 18 अगस्त, 2024 को डाउनटाउन इंडियानापोलिस के मध्य में स्मारक सर्कल में खुली हवा में हुआ। भारत दिवस भारत के स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाने के लिए 15 अगस्त को या उसके आसपास मनाया जाता है। भारत दिवस का आयोजन इंडिया एसोसिएशन ऑफ इंडियानापोलिस (आईएआई) द्वारा किया जाता है और यह सैकड़ों लोगों को आकर्षित करता है जो कार्निवल शैली के माहौल में भारत के संगीत और नृत्य, कला और संस्कृति, स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हैं। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना को इस प्रतिष्ठित अवसर पर एक बूथ रखने का अवसर दिया गया। भारत दिवस कार्यक्रम, जिसमें इंडियाना के राज्य सचिव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए और शहर के विभिन्न अधिकारियों ने भाग लिया, ने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना को समुदाय से जुड़ने के लिए एक उत्कृष्ट मंच प्रदान किया।
हमारा बूथ डॉ. राकेश कुमार और डॉ. कुमार अभिनव द्वारा आईएचए बैनर और अन्य प्रदर्शन सामग्री के साथ स्थापित किया गया था। हमने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के उद्देश्यों, मूल्यों और लक्ष्यों के बारे में जानकारी प्रदर्शित की। श्रीमती विद्या सिंह, अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना और डॉ. देवव्रत सिंह बूथ की देखरेख में डॉ. कुमार और डॉ. अभिनव के साथ शामिल हुए।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक परेड से हुई और हम चारों परेड का नेतृत्व करने के लिए राज्य सचिव, आईएआई अध्यक्ष और अन्य अधिकारियों के साथ चले। डॉ. अभिनव ने फेसबुक लाइव पर परेड को प्रसारित किया और यह अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना के फेसबुक पेज पर देखने के लिए उपलब्ध है।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना बूथ ने कई आगंतुकों को आकर्षित किया, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना की पहल और आगामी कार्यक्रमों के बारे में अधिक जानने में गहरी रुचि व्यक्त की। कई लोगों ने अतिरिक्त जानकारी और सदस्यता के लिए साइन अप करने का अवसर लिया। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना के अधिकारी, एवं विशेष रूप से डॉ. देवव्रत सिंह, समुदाय में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के काम के मूल्य और प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए, संगठन के लक्ष्यों और उद्देश्यों के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए मौजूद थे।
भारतीय और गैर-भारतीय मूल के लोगों की रुचि देखकर प्रसन्नता हुई। युवा और स्कूल जाने वाले बच्चों के कई अभिभावकों ने हमारे प्रयासों पर हमारी सराहना की। यह आयोजन आउटरीच और जुड़ाव के लिए एक मूल्यवान अवसर साबित हुआ, जिससे स्थानीय समुदाय के भीतर अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना की उपस्थिति और संबंध मजबूत हुए। कुल मिलाकर, यह आयोजन स्थानीय समुदाय के भीतर अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति- इंडियाना की पहुंच और जुड़ाव का विस्तार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की तरफ से बहुत बधाइयाँ
पूजा श्रीवास्तव, टेनेसी शाखा अध्यक्षा को
पूजा श्रीवास्तव का ऍप ‘गाथा’ को सफल 5 वर्ष के लिये सम्मानित
‘गाथा महोत्सव’ 2024 का आयोजन
जुलाई 2024. आईआई टी कानपुर, भारत
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हिंदी भाषा को विश्व में एक विशिष्ट पहचान मिले यह अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का हमेशा ही प्रयास रहा है और आप सभी को बताते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की टेनेसी चैप्टर की प्रेसिडेंट पूजा श्रीवास्तव जी का ऍप ‘गाथा’ भारतीय संस्कृति और साहित्य से जुडी कहानियों और कविताओं को आज विश्व भर में सहज ही उपलब्ध करवा रहा है।
भारतीय संस्कृति एवं साहित्य को ऑडियो प्रारूप में उपलब्ध कराने वाला प्रसिद्ध ऑडियो प्लेटफॉर्म ‘गाथा’ एप ने दिनांक 21 जुलाई 2024 को सफल 5 वर्ष पूरे होने पर आईआईटी कानपुर के आउटरीच सभागार में ‘गाथा महोत्सव’ 2024 का आयोजन किया। आयोजन का शुभारंभ आईआईटी कानपुर के उप निदेशक प्रो ब्रजभूषण, co prof इंचार्ज SIIC प्रो. अमिताभ बंदोपाध्याय, डीन ऑफ एकेडमिक अफेयर्स आईआईटी कानपुर प्रो शलभ, दिन ऑफ फॉरेन रिलेशंस प्रो. बुशरा अतीक, राजभाषा प्रकोष्ठ के प्रो. अर्क वर्मा, गाथा की सह संस्थापक और निदेशक पूजा श्रीवास्तव, कविता प्रकोष्ठ की निदेशक डॉ भावना तिवारी ने दीप प्रज्वलित कर किया। उद्बोधन में उप निदेशक आईआईटी कानपुर प्रो. ब्रजभूषण ने कहा कि ‘गाथा’ हिंदी साहित्य के उत्थान के लिए उत्कृष्ट योगदान दे रहा है।
‘गाथा’ का बढ़ता यूजर बेस लोगों में कविता के प्रति नए संस्कार रोपित कर रहा है। इसके अतिरिक्त प्रो. शलभ, प्रो. बुशरा अतीक, प्रो. अमिताभ बंदोपाध्याय और पूजा श्रीवास्तव ने भी उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। ‘गाथा’ की सह संस्थापक एवं निदेशक पूजा श्रीवास्तव ने बताया कि गाथा वर्तमान स्वरूप के साथ तकनीक के नए आयामों पर भी काम कर रहा है, जिसमे आप किसी भी कविता, कहानी को सुनने के साथ अपनी भाषा में पढ़ भी सकेंगे। कार्यक्रम में ज्योति बधिर विद्यालय के छात्रों ने गणेशा वंदना और फिर नृत्य नाटिका प्रस्तुत करके सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रसिद्ध ट्रैवल ब्लॉगर और लेखक संजय शेफर्ड की पुस्तक में एक स्याह फिरदौस का विमोचन मंच पर उपस्थित अतिथियों के द्वारा किया गया।
ज्योति बधिर विद्यालय और कानपुर प्लोगर्स को उत्कृष्ट सामाजिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया। प्रथम सत्र का धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अर्क वर्मा के द्वारा किया गया।
इसके बाद उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थलों पर चर्चा करने के लिए प्रथम सत्र में डॉ प्रदीप दीक्षित की अगवानी में सुप्रसिद्ध लेखक और ट्रैवल ब्लॉगर संजय शेफर्ड के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत डॉ एम के पाण्डेय ने उत्तर प्रदेश में पर्यटन को लेकर रुचि और आगामी संभावनाओं पर विस्तार पूर्वक चर्चा की। चर्चा का निचोड़ यह था कि उत्तरप्रदेश में काशी, माथुर वृंदावन और अयोध्या के अतिरिक्त भी एक शुद्ध घुमक्कड़ के दृष्टिकोण के अपार संभावनाएं हैं पर अभी भी अनेक स्थल लोगों की नज़र में ही नहीं आ पाए है।
दूसरे आयोजन में हिंदी काव्य में प्रसिद्ध एवं वरिष्ठ नवगीतकार रामसनेही लाल शर्मा, वीरेंद्र आस्तिक राजा अवस्थी ने गीत और नवगीत की भिन्नताओं पर और नवगीत की बारीकियों पर विस्तृत चर्चा की। नवगीत के कथ्य, शिल्प और व्याकरण पर वरिष्ठ नवगीतकारों ने वार्ता की। इस सत्र का संचालन जाने-माने साहित्यकार और समालोचक डॉ राकेश शुक्ला ने किया।
तीसरे सत्र में जाने-माने युवा साहित्यकार भगवंत अनमोल और आकांक्षा पारे काशिव ने नए रचनाकारों और युवाओं के लिए साहित्य में संभावनाओं पर वार्ता की। इस सत्र का संचालन कहकशां के संस्थापक आनंद कक्कड़ ने किया।
चौथा सत्र युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए ओपन माइक का था जिसे पल्लवी गर्ग ने संचालित किया। ओपन माइक में कुल सात कवियों ने काव्यपाठ किया जो प्रियम दीक्षित, अमित पाण्डेय, अंशुल अवस्थी, शुभम तिवारी, आकाश ओझा, अक्षय मिश्रा और इम्तियाज अहमद रहे।
पांचवे सत्र में जाने माने अभिनेता राजेंद्र गुप्ता से सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ भावना तिवारी ने चर्चा की। राजेंद्र गुप्ता जी ने अपने जीवन के अनछुए पहलुओं पर बात की और प्रसिद्द लेखक धीरेन्द्र अस्थाना जी की कहानी एक कहानी "बहादुर को नींद नहीं आती" और कविताओं का भी पाठ किया।
छठा सत्र जाने माने संगीतकार मदन मोहन को समर्पित रहा जिसमें आकाशवाणी की आरजे अर्चना और सारेगामापा के विजेता गोपाल शर्मा ने अपनी संगीतमय प्रस्तुति से लोटपोट कर दिया।
सातवें कार्यक्रम में चर्चित वेब सीरीज पंचायत के जाने माने किरदार विनोद को निभाने वाले अभिनेता अशोक पाठक अपनी जीवन यात्रा और संघर्षों पर वार्ता करते नजर आए। उनके छोटे छोटे व्यंग्य पर लोग लोटपोट होते रहे।
आठवाँ और अंतिम सत्र कवि सम्मेलन का थी जिसमें जाने माने कवि डॉ विष्णु सक्सेना, अजय अंजाम, राहुल शर्मा, योगेश शुक्ला, योगेश शुक्ला और आलोक बेजान ने अपनी कविताओं से समां बाँधा।
काव्यपाठ करते हुए लखनऊ से आए योगेश शुक्ला ने पढ़ा-
घेरे हों जिंदगी में अगर मुश्किलें तमाम सुबहो शाम,
तो टकराओं मुश्किलों से लेके राम जी का नाम सुबहो शाम।
डॉ आलोक बेजान ने पढ़ा-
जमीदंरी को गुजरे एक अरसा हो गया कब का
मगर जिल्ले इलाही ने हवेली पाल रखी है।।
हेमंत पाण्डेय ने हास्य की कविताओं से सभी को गुदगुदाया।
मुरादाबाद से आए राहुल शर्मा की गजलों पर पूरा सभागार वाह वाह कर उठा।
अजय अंजाम
ठंड की इमदाद पाली जा रही है जून में
खेत को पानी मिला है फसल मुरझाने के बाद।
अध्यक्षता कर रहे डॉ विष्णु सक्सेना ने थाल पूजा का लेकर चले आइए, द्वार के सतिए तुम्हारी हैं प्रतीक्षा में जैसे गीतों से कार्यक्रम को आकाश की बुलंदियों तक पहुँचा दिया।
"गाथा ऍप " भारतीय साहित्य, संस्कृति और पर्यटन से संबंधित हमारी धरोहरों को सहेजने और आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते हुए इसको जन मानस तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हैं, हमें कहते हुए प्रसन्न्ता हो रही है कि आज ‘गाथा’ के श्रोता सम्पूर्ण भारत के साथ साथ अमेरिका, यूरोप, ब्राज़ील, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के अतिरिक्त अनेक देशों में हैं।
SIIC IIT कानपुर में इंक्यूबटेड ‘गाथा’ आज भारतीय साहित्य एवं संस्कृति से जुड़ी कहानियों और कविताओं को एक ऑडियो लाइब्रेरी में सहेजने के लिए प्रयासरत हैं। आज ‘गाथा’ पर हज़ारों की संख्या में कहानियाँ, कविताएं और भारतीय संस्कृति, इतिहास और पर्यटन से जुड़ी कहानियाँ उपलब्ध हैं।
आप भी निचे दिए गए कोड को स्कैन कर के ‘गाथा’ की ऍप डाउनलोड करके हर विधा की कहानियों और कविताओं का आनंद ले सकते सकते हैं।
https://gaathamahotsav.com/
द्वारा :पूजा श्रीवास्तव,नैशविल, टेनेसी शाखा की अध्यक्षा
"गाथा ऍप" Gatha App की फाउंडर
poojarajnish2@gmail.com
615-839-6766
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अपनी कहानियाँ -लघु कथा
"केतक और केतकी"
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द्वारा - श्री आनंद प्रकाश
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आनंद प्रकाश जी अ.हि.स.के आजीवन सदस्य है। हिंदी रचनाओं का प्रशंसक वयोवृद्ध जल अभियंता; हिंदी तथा संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा; तत्पश्चात कवियों और लेखकों की रचनाओं का स्वाध्याय और मनोरंजन।
व्यवसाय- जलविज्ञान और तत्संबंधित अभियांत्रिक कार्य, १२ वर्ष भारत में, तत्पश्चात ५२ वर्ष अमेरिका के लगभग ३० प्रदेशों में, और यदाकदा १५ विभिन्न देशों में व्यावसायिक विशेषज्ञ सलाहकार, टेक्निकल राइटिंग और सम्पादकीय कार्य।
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केतक और केतकी
वैसे तो वह एक सुशिक्षित एवं सम्मानित व्यक्ति था। किन्तु गृहस्थ-कार्यों (उदारणार्थ, वैक्वम क्लीनर, एयर क्लीनर, ह्यूमिडिफायर, हैंड-मिक्सर, वाशिंग, ड्रॉयिंग, कॉफ़ी, कुकिंग, और ऑयरनिंग-सम्बन्घित उपकरणों की सूक्ष्म रिपेयर, इत्यादि) में दक्ष नहीं था। प्रायः, जब जब इस प्रकार की किसी भी घरेलू क्रिया में असमर्थ, असहाय और विचलित हो जाता था तो विभंगित, हताश और रुष्ट हो कर केतकी से प्रलाप प्रारम्भ हो जाता था।” मुझ से यह नहीं हो रहा है। इसी लिए बार बार यही कथा दुहराता हूँ, तुमको मुझ से विवाह ही नहीं करना था। न व्यावहारिक बुद्धि, न विशेष रूप-रंग, न शील, न गुण, न धर्म, न अकल, न शकल, न असाधारण आकार। तुमको तो मुझसे उत्तमतर वर उपलब्ध हो सकते थे। तुम्हारे पास तो कई विकल्प थे, भूमिपति-कृषिकार परिवार, व्यवसायी साहूकार युवक, राजकीय अथवा प्राइवेट संस्था में कार्यरत युवा, इत्यादि। बिना गंभीर सोच-विचार किये, स्वीकार कर लिया यह सम्बन्ध। अब भुगतो।” यह कह कर, रुष्ट होकर, अपने कक्ष में जा बैठता था।
“नहीं हो रहा, नहीं हो रहा है तो क्या? आकाश तो नहीं टूट पड़ा है? ऐसी क्या विषम समस्या हो गयी? भलीभाँति समझते हो ‘यत्ने कृते यदि न सिध्यति को अत्र दोषः’। तुमने यथा-शक्ति प्रयास तो किया है। अब छोड़ो, किसी टेक्नीशियन को सहायतार्थ बुला लेंगे।”
“और अब तुमने जो चार दशक पूर्व के गठ-बंधन के विषय में प्रश्न उठाया है, जिस की बार बार रट लगाते हो, तो आज मेरी कथा सुनो। मुझे तो पिता, पितृनथ, मातुल, और अन्य सगे सम्बन्धियों द्वारा आश्वस्त किया गया था कि यह युवक श्वेत-गौर वर्ण का सुन्दर, स्वस्थ, विनम्र एवं मेधावी है। एक-एकार्ध वर्ष में स्नातकी शिक्षा पूर्ण हो जाएगी, तत्पश्चात पद-नियुक्ति। मेरे परिवार में सर्व-विदित था कि मेरा मन-वांछित जीवन-संगी सुशिक्षित होना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं चाहिए। धनाढ्य परिवार और अन्य व्यवसाय तथा विशेषताएं गौण हैं। यह सब सोच कर मेरा तो यह अन्तर्निहित निश्चय हो गया था, कि मेरे लिए केवल यही सम्बन्ध नितांत उपयुक्त और अभीष्ट है। यदि मेरे गुण-परीक्षण के पश्चात् वर-पक्ष की अस्वीकृति हुयी अथवा किसी अनपेक्षित कारण वश यह सम्बन्ध फलीभूत न भी हुआ तो अविवाहित रह कर एक शिक्षक बन कर जीवन यापन हो जायेगा। परन्तु, श्रीमान, आपने बिना एक बार भी साक्षात्कार किये, बिना मिले जुले, ‘बस मुझे यह सम्बन्ध स्वीकार है’ यह बोल दिया था। यह कहाँ की बुद्धिमत्ता थी? मेरे पास न उच्चतर शिक्षा थी, न अद्वितीय सौंदर्य, और न अपार धन-धान्य। क्या पाया तुमने? यदि दूरदर्शी होते, तो इस प्रकार यह सम्बन्ध कभी न करते। कुतूहल और आश्चर्य होता था मुझे, कैसा निरीह व्यक्ति है? भावी जीवन-साथी के रूप-रंग, व्यक्तित्व, भाषण-शैली और भाषा-परीक्षण बिना इतने घनिष्ट, आजन्म संगठन का निर्णय ले रहा है। यह कैसी उदासीनता, असावधानी, और विरक्ति है ?”
“अब मेरी बात सुनो, एक बार, सूर्योदय से पूर्व, ब्राह्म मुहूर्त में, प्रातःकाल रेलवे लाइन के समानान्तर एक पगडण्डी पर भ्रमण करने निकला था, दिवा-स्वप्न अवस्था में सामने से आती हुयी एक सौम्य युवती से साक्षात्कार हुआ, प्रणाम नमस्कार हुआ, और मैंने निवेदन किया ‘भद्रे, इस समय मेरा भविष्य एक दम अनिश्चित है। अभी तो शिक्षा समाप्ति में ही समय है। मार्ग पर आते-आते कई वर्ष लग जायेंगे। इस बीच आपको व्यर्थ ही अनभीष्ट कष्टप्रद समय व्यतीत करना पड़ेगा। मैंने कल ही निर्दिष्ट कर्मचारियों से अभिहित प्रमाण-पत्र प्राप्त कर के राजकीय शिक्षा-ऋण की स्वीकृति हेतु याचिका प्रेषित की है। आशा है उचित धन-राशि ऋण के रूप में उपलब्ध हो जाएगी और तत्कालिक आर्थिक बाधा का समाधान हो जायेगा। किन्तु तत्पश्चात भी पारिवारिक आर्थिक समस्याएं तो रहेंगी ही। अतः, आप बुद्धि एवं विवेक के साथ समय और वास्तविक स्तिथि पर विचार करके व्यावहारिक दृष्टि से इस परिणय के विषय में निर्णय लीजिये धन्यवाद’।
अतः, कल्पना में ही सही, सत्य तो यह था कि मुझको तो पहले ही तुम्हारा दर्शन-लाभ हो चुका था। मेरे पास केवल एक ही विकल्प था और वह थी तुम। मेरी मत्वाकांक्षा वर-वधु तक सीमित थी, अभिनेता-अभिनेत्री मेरी कल्पना से परे थे। तुम न मिल पाती तो पारिवारिक स्तिथि कुछ ऐसी थी कि संभवतः मेरा विवाह इतना विलंबित हो जाता कि सुयोग्य अनुकूल आयु की युवती अलभ्य हो जाती।”
“अति सुंदर, मितवा! अब आभास हो रहा है, कि इतने सरल, सुशील और शालीन भी नहीं थे, जितना स्वजनों से श्रवण किया था और बाह्यावरण के साथ प्रतीत होता था। प्रत्यक्ष में विवाह-पूर्व साक्षात्कार अनावश्यक, और स्वप्न में सौम्य युवती से आंतरिक वार्ता?? और वह सौम्य युवती थी कौन, प्रिय केतक, केतकी ही ना?”
"अच्छा चलो अब, उठो मेरे पार्श्व में आओ, चक्षु बंद, और लेट जाओ, एक दम शांत। तनिक सोचो, कितनी विचित्र बात है कि प्रायः अपनी ही त्रुटि पर अपने आप रुष्ट होकर मौन साध कर बैठ जाना और हर बार मेरा सचेत करना कि आवेश और अति शीघ्रता अनुचित और वर्जित है।"
हर बार की भांति वह कुछ लज्जित सा, चुप चाप पास लेट कर, दबी दबी मुस्कराहट से अपना स्पष्टीकरण करने लगा। ‘यह ऐसे था, यह अनुचित था, मुझे यह अच्छा नहीं लगता, अपमान-जनक सा लगता है, इत्यादि, इत्यादि।’
"याद करो, कभी मुझे भी इस प्रकार रुष्ट होते देखा है।"
"बस, यही तो बात है, केतकी। तुम तो मुझ से रुष्ट हो ही नहीं सकती। तुम तो मेरी पूर्व जन्म की जननी से सहिष्णुता-संस्कार लेकर, मेरी पत्नी के रूप में उतर आयी हो इस जीवन में; एक गहन सागर हो जहाँ मेरी हर भूल, हर धृष्टता और रुष्टता एक क्षण में लुप्त हो जाती है। तुम साथ हो तो मुझ में शक्ति है, साहस है, और एकमात्र विश्वसनीय समर्थक की अनुभूति होती है।”
जन्माष्टमी का पर्व था, केतकी ने मिष्ठान के लिए ग्राम्य विधि से पेड़े बनाये थे। फिर कुछ गृह-सामग्री क्रय करने के लिए सेम्स क्लब गए। केतक को कुछ पग-पीड़ा थी। अतः केतकी ने स्वयं ही सामान क्रय करके कार में रखा, कार चलायी और गराज में प्रवेश किया। द्वार से अंदर जाने के लिए स्टेप पर पग रखा तो अनायास ही पीछे गिर गयी, और वहाँ खड़ी दूसरी कार के हुड पर फिसलकर, कंक्रीट के फर्श पर लेट गयी। आपत्कालीन सेवा के कर्मचारियों ने उठाकर औषधालय पहुँचाया। कई सूक्ष्माकार अस्थि-भंग निकले, जिनकी शल्य-चिकित्सा संभव नहीं थी। अतः तीन मास की शारीरिक चिकित्सा (फिजिकल थेरेपी) हुयी, जिसके लिए परिचर्यागृह में रहना पड़ा। सुखमय विवाहित जीवन ग्रहणग्रस्त हो गया।
शनैः शनैः शारीरिक चिकित्सा द्वारा स्वास्थ्य-लाभ हुआ और घर के निकटवर्ती परिसर में वाकर एवं गृहांतर में केन की सहायता से आवागमन प्रारम्भ हो गया। प्रायः केतक के कार्य-कक्ष में रेलिंग का सहारा लेकर अप्रत्याशित रूप में सोपान से ऊपर आ जाती थी। उस के कार्य-कक्ष में स्थित लव-सीट पर विराजमान हो जाती थी और अध्ययन-रत केतक को धीमी मधुर ध्वनि से चौंका कर विस्मित कर देती थी। “आगे आने वाले समय में इसी प्रकार एकाग्र-चित्त, शांत मुद्रा में कार्यरत रहने का अभ्यास कर लो। मुझे पता है, बहुत रोया करोगे, एकांत में, मेरे बिना”। “नहीं, ऐसा न कहो, ऐसा कभी नहीं हो सकता, मेरी जीवन-संगिनी।”
दोनों लव सीट पर एक दूसरे के पार्श्व में बैठ जाते थे। इस प्रकार बैठे बैठे दिन प्रति दिन घंटों बातें करते रहते थे। “कितनी बातें करते हैं हम, केतक?” “मधुर बातों का कहाँ अवसान है, केतकी?” “अच्छा चलो, नीचे चलते हैं, अब बहुत समय हो गया है। भोजन का प्रबंध करते हैं।”
रात्रि-भोज के उपरांत अपनी विद्युत-संचालित आराम कुर्सी पर विश्राम करती थी। कभी कभी सायंकाल परिवार के सदस्य सम्मिलित हो कर बहुत समय तक घन्टों परस्पर वार्तालाप करते रहते थे। केतक चुपचाप, अपनी सीट पर बैठा निर्निमिष उसी की ओर दृष्टि-बद्ध देखता रहता था। "क्या देखते रहते हो मुझ में?" "कुछ नहीं, बस, तुम मेँ समाहित अपना सम्पूर्ण जीवन देखता रहता हूँ, केतकी।” "बस यही स्वर्ग है, केतक; यही स्वर्ग है; परिपूर्ण आत्मीयता, स्नेह-सिंचित अहर्निश, और सम्पन्न एवं सुखी, हम-तुम।”
अमावस्या की घोर अन्धकार-मयी मध्य-निशा थी। अकस्मात् केतकी को स्ट्रोक हुआ, आपत्कालीन सेवा कर्मचारी औषधालय ले गए। किंतु, हंत-हंत, इस बार केतकी का निजी निवास-स्थान पर पुनरागमन नहीं हो पाया।
कई वर्ष व्यतीत हो गये हैं। केतक लेटा हुआ अपने कक्ष की अवाक, मौन भित्तियों से शोकान्वित, आभार और पश्चाताप सहित, विलाप-वार्तालाप कर रहा था :
“अब जब विरह पीड़ा मुझे चुप चुप रुलाती है,
और तेरी स्मृति आ आकर सताती है,
अपनी हर एक भूल की भूली कहानी याद आती है,
और तेरी स्नेह-सिंचित मधुर वाणी याद आती है।”
***
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अपनी कहानियाँ
"कुछ भी न कहो"
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नीरजा हेमेन्द्र जी ने एम.ए.( हिन्दी साहित्य ), बी.एड. की शिखा ली है। पेशे से शिक्षिका है।
पठन-पाठन, लेखन, अभिनय, रंगमंच, पेन्टिंग, एवं सामाजिक गतिविधियों में रूचि रखती हैं। इन्हें अनेक सम्मानों से भी पुरस्कृत किया गया।
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कुछ भी न कहो
शाम गहराने लगी थी। वह दुपट्टे से सिर को ढ़के हुए तीव्र गति से अपने कदम बढ़ा रही थी। शाम ढलती जा रही है, इसलिए वह शीघ्र घर पहुँचना चाह रही है। घर पहुँच कर दरवाजे की घंटी बजाते कर वह दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगी। वह जानती है कि प्रतिदिन की भाँति आज भी दरवाजा नाज़िया खोलेगी। दरवाजा नाज़िया ने ही खोला।
“आज देर कैसे हो गयी अप्पी?’’ दरवाजा खोलते ही नाजिया ने आतुरता से पूछा। उसके चेहरे पर चिन्ता की रेखाए स्पष्ट थीं। नाजिया की उम्र यद्यपि दस-ग्यारह वर्ष की ही है। किन्तु समझदारी उसके भीतर अपनी उम्र से अधिक है।
“क्या बताऊँ ! आज कार्यालय में कुछ अधिकारी आ गये थे। वे कार्यालय के कागजात् व फाईलों की जाँच पड़ताल कर रहे थे। इन सब में कुछ वक्त लग गया।......चाहे जितनी भी तीव्र गति से चलो आटो स्टैण्ड तक पैदल आने में भी कुछ समय लग ही जाता है। ’’ उसने देर से आने का कारण बताते हुए स्थिति स्पष्ट की।
वह नाज़िया से बातें कर ही रही थी कि पास के कमरे से अम्मी दीवार के सहारे चलती हुई आ गयी थीं। आगे बढ़ कर उसने अम्मी को सहारा देकर कमरे में बिछी पलंग पर बैठा दिया। वह अम्मी से आगे कुछ कह पाती कि अम्मी स्वतः उसके प्रश्नों के उत्तर देते हुए धीमें स्वर में कहने लगीं,”सरकारी काम है। कोई अपनी मर्जी की मालिक तो है नही कि जब मन हुआ उठ कर घर चल दे।’’ उसने अम्मी की बातों का कोई उत्तर नही दिया, तथा शीघ्रता से गुसलखाने में घुस गयी।
हाथ-मुँह धोया, कपड़े बदले तथा दरी बिछा कर नमाज पढ़ने बैठ गयी। वह जानती है कि अम्मी से अभी बातें करने लगेगी तो बातें खत्म न होंगी। घर का सारा काम धरा रह जायेगा। फिर उसे ही अकेले देर रात तक सब कुछ करना पड़ेगा। करना तो सब कुछ उसे अब भी अकेले ही है, किन्तु यदि इसी समय से लग जायेगी तो सभी काम समय से तो हो जाएगें। उसे भी आराम करने के लिए थोड़ा समय मिल जाएगा।
अम्मी खामोशी से बैठी उसे ही देख रही थीं। अभी अम्मी से कुछ भी बातें करने की उसकी इच्छा नही है। शरीर थकान से टूट रहा है....किन्तु उसके पास दो घड़ी आराम करने का समय नही है। नमाज खत्म कर वह रसोई की ओर बढ़ चली। शाम ढल चुकी है। चाय व रात का खाना बनाते-बनाते काफी समय हो जाएगा। सोने से पूर्व उसे सुबह के खाने की भी थोड़ी बहुत तैयारी करनी होती है। जिससे सुबह के कार्य कर वह समय पर कार्यालय पहुँच सके। इन सबके साथ अम्मी को दूध, दवा आदि भी देना रहता है। आखिर घर के कार्यों को करने का उत्तरदायित्व उसका ही तो है।
इस समय बहुत सारा काम करना है उसे। पहले रसोई में जाकर कार्य प्रारम्भ कर दे, तत्पश्चात् बीच में समय निकाल कर अम्मी से दिन भर का उनका हाल भी पूछेगी। सर्वप्रथम चाय बनाकर उसने नाज़िया को आवाज लगा दी थी कि वह अम्मी की चाय व बिस्कुट ले जाकर उन्हें दे दे। जिसके पश्चात् वह शाम की अम्मी की दवा दे सके।
उसकी भी इच्छा हो रही है कि वह कुछ देर अम्मी के पास बैठ कर बातें करे किन्तु वह जानती है यदि इस समय वह अम्मी के पास बैठ गयी तो अम्मी की बातें शीघ्र समाप्त न होंगी। अम्मी भी तो सारा दिन घर में अकेली पड़ी रहती हैं। उन्हें भी तो कोई ऐसा चाहिए जिससे दिन भर का अपना हाल या अपने मन की कुछ कह सकें।
अम्मी के लिए सोच कर उसका मन दुखी होने लगा। उसे स्मरण है कुछ माह पूर्व तक अम्मी बिलकुल स्वस्थ थीं। उन दिनों अम्मी सिर्फ पेट की समस्या से परेशान रहती थीं। कभी पेट में दर्द, तो कभी पेट में गैस की शिकायत करती थीं। उनके पेट की समस्या से घर में किसी को तकलीफ न होने पाये इसलिए कभी काला नमक, अजवायन, तो कभी गैस दूर करने का कोई चूरन आदि घरेलू उपाय स्वंय कर लेतीं। कुछ देर के लिए आराम मिल जाता तो घर के कार्यों में लग जातीं।
बहुत अधिक समस्या बढ़ जाती तो मुहल्ले के किसी डाक्टर को बताकर स्वंय अपनी दवा ले आतीं। इसी प्रकार वे अपने दिन काटती रहीं। एक रात अम्मी के पेट में असहनीय दर्द उठा। वह रात भर परेशान रही। वो कराहती रहीं। वह उन्हें सहलाती रही। घर में उस समय उसके व नाजिया के अतिरिक्त कोई भी न था। अम्मी ने सुबह होने तक प्रतीक्षा कर लेने के लिए कहा। वह कर भी क्या सकती थी? रात के समय वह अकेले क्या कर सकती थी? कहाँ लेकर अम्मी को जाती?
सुबह होने की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त हम सब के पास कोई अन्य मार्ग न था। रिश्तेदारों की तरफ से टूट चुके हृदय के कारण उसका मन नही हुआ कि पास के पी.सी.ओ. में जाकर अम्मी की अस्वस्थता का हाल किसी को बता देती। अपने सगे भाई नाज़िया के पिता को इतनी रात में घर के बहर जाकर फोन द्वारा बताने को अम्मी ने मना कर दिया। रात भर अम्मी दर्द से तड़पती रहीं। सुबह होते ही वह और नाजिया अम्मी को लेकर शहर के सरकारी अस्पताल पहुँच गयीं। वहाँ अम्मी की अनेक जाँचें हुईं।
नाजिया को अम्मी के पास बैठाकर दिन भर वह अस्पताल में दौड़-भाग करती रही। यद्यपि उसने अपने भाई यानि नाज़िया के पिता को दूसरे दिन फोन पर अम्मी की बीमारी की सूचना दे दी थी। किन्तु घर के उत्तरदायित्वों को पूरा कर अस्पताल आते-आते उसे भी समय लग गया। अगले दिन अम्मी की जाँचों की रिपार्ट भी आ गयी। हम सब के पैरों तले जमीन खिसक गयी जब डाक्टरों ने बताया कि अम्मी को आँतों का कैंसर हो गया है।
हम अम्मी से यह बात छुपाना चाह रहे थे किन्तु कब तक यह बात उनसे छुपी रह पाती? अस्पतालों व डाक्टरों के चक्कर लगने जो प्रारम्भ हुए तो अम्मी को यह बात पता चल ही गयी। छः माह हो गये। बीमारी अब सम्भवतः बढ़ चुकी है। अम्मी भी अब चलने-फिरने में असमर्थ होकर बिस्तर पर ही पड़ी रहती हैं। बहुत हुआ तो किसी प्रकार दीवार के सहारे चल कर कुछ देर के लिए दूसरे कमरे तक आ जाती हैं।
अम्मी की बीमारी, अपनी नौकरी की व्यस्तता और तो और नाते रिश्तेदारों की बेरूखी से वह अकेले ही जूझ रही है। पुराने दिन, पुरानी बातें याद कर उसका मन कसैला होने लगता है। इसलिए वह पुरानी बातें याद करना ही नही चाहती। किन्तु उसके चाहने न चाहने से क्या होता है? जीवन में ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं जो पुरानी घटनाओं से स्वतः जुड़ जाती हैं।
रसोई का काम समाप्त कर नाजिया से खाना खा लने के लिए कह कर वह अम्मी के पास आ गयी है। अपने कमरे में बैठी नाजिया पढ़ाई कर रही थी। वह उठ कर रसोई में खाना लेने चली गयी। अम्मी को दूध व दवा देने के पश्चात् वह उनके पास बैठ गयी। उनकी तबीयत का हाल पूछा। वह जानती है कि प्रतिदिन की भाँति आज भी अम्मी यही कहेंगी कि दवा से कोई फायदा नही है। किन्तु वह और कर भी क्या सकती है?
डाक्टरों ने जो दवा बताई है वह उन्हें दी जाती है। वह दवा, दुआ और अम्मी की सेवा के अतिरिक्त और क्या कर सकती है? अम्मी को दवा देकर उन्हें बिस्तर पर लिटा कर वह अपने कमरे में आ गयी। इस छोटे-से किराये के मकान में दो ही कमरे है। सामने का एक कमरा कुछ है जिसके आधे हिस्से में बैठक है, आधे हिस्से में अम्मी की चारपाई व दवाईयों की मेज रखी है।
सामने रसोई व गुसलखाना है। इस दूसरे कमरे में वह और नाज़िया रहती हैं। कमरे में एक ओर चैड़ा तख्त है जो उसके व नाजिया के सोने के लिए पर्याप्त है। खाना खा कर नाजिया वापस कमरे में आकर पढ़ाई कर रही है। पढ़ते-पढ़ते वह कुछ देर में सो जायेगी। अम्मी बिस्तर पर लेट गयी हैं। वह जानती है कि वो बिस्तर पर सोने के लिए लेट अवश्य गयी हैं। किन्तु रात भर दर्द से कराहती रहेंगी। कराहते-कराहते यदि कुछ देर के लिए बीच में झपकी आ गयी तो ठीक है। ये ही अम्मी की नींद भी है।
उसकी आँखों में आज नींद नही है। बगल के कमरे से अम्मी के कराहने की आवाजें रोज की अपेक्षा आज कुछ अधिक ही आ रही हैं। दिनोंदिन उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा है। डाॅक्टरों के अनुसार उनके पास उनके जीवन के कुछ दिन ही शेष हैं। डाॅक्टरों की यह बात वह अब तक स्वीकर नही कर सकी है। अम्मी के बिना अकेले जीवन जीने की कल्पना करते हुए उसे न जाने क्यों डर लगता है। आजकल रात में सोते-सोते उसकी नींद टूट जाती है। व्याकुलता में करवटें बदलते-बदलते सवेरा हो जाता है।
आज पुनः उसे नींद नही आ रही है। चिन्ता से मन बोझिल हो रहा है। जिस दिन अम्मी नही रहीं उस दिन वह क्या करेगी? कैसे रहेगी इस बेगानी दुनिया में अकेले? बिस्तर पर लेटी और बीमार ही सही, अम्मी का होना उसके लिए इस निष्ठुर दुनिया व उसके बीच एक मजबूत दीवार की तरह है। आज उसे अपनी किशोरावस्था के दिन याद आ रहे हैं। जब वह पन्द्रह-सोलह वर्ष की किशोरी थी। कितने बेफिक्र दिन थे वे।
उन दिनों अब्बू सरकारी नौकरी में थे। वह दो भाइयों की इकलौती बहन थी। उस समय हम सभी पढ़ रहे थे। अम्मी उन दिनों स्वस्थ तो थी हीं सभी कहते थे वो देखने में आर्कषक भी बहुत थीं। मैं उनके जैसी बिलकुल नही थी। मुझमें अम्मी जैसा आकर्षण नही है। मेरी शक्ल अब्बू पर पड़ी थी। देखने में साधारण शक्ल थी मेरी अब्बू की तरह ही। घर के कार्यों को करने के पश्चात् नहा-धोकर कर बालों को बाँध कर अम्मी जब भी तैयार हो कर आँगन में बैठती मैं उन्हें देखा करती। उनके चेहरे का बेदाग आकर्षण देख कर सोचा करती मैं भी अम्मी के जैसी क्यों नही हुई? मैं अब्बू पर क्यों पड़ गयी?
बचपन के वे दिन शीघ्रता से व्यतीत होते जा रहे थे। उसे भली प्रकार कितने खूबसूरत दिन थे वे अम्मी, अब्बू, हम सब। उस समय कभी-कभी अब्बू के नाते रिश्ते दार भी गाँव से आ जाते। अब्बू सरकारी नौकरी में थे। यह उनके गाँव के रिश्तेदारों के लिए बड़ी बात थी। वे आते अम्मी- अब्बू उनका यथोचित सत्कार करते। जाते समय वे चुपचाप चले जाते उनके चेहरे पर प्रसन्नता नही होती।
अम्मी बतातीं कि रिश्तेदारों को अब्बू से पैसों की उम्मीद रहती। इसलिए वे कभी प्रसन्न नही होते। अम्मी बतातीं कि शहर में किसी प्रकार हम लोगों का घर चल जाता था यही बहुत था। किराये के मकान से लेकर हमारी पढा़ई-लिखाई आदि पर व्यय करने के पश्चात् कुछ बचता नही था। उसे वो दिन भी कभी नही भूलता जब अब्बू के कार्यालय से एक आदमी आया था। उसने अम्मी को जो सूचना दी उसे सुनकर अम्मी दहाड़ें मार कर रो पड़ी। हम समझ भी पाये कि क्या हुआ? कुछ ही देर में अब्बू का निर्जीव शरीर घर में था। उस समय घर में वह और उसके दो छोटे भाइयों के अतिरिक्त कोई नही था।
अम्मी रो-रोकर बेहाल थीं। धीरे-धीरे पास-पड़ोस के कुछ लोग इकट्ठे हो गए। किन्तु इस समय घर में कोई भी ऐसा नही था जो इस अन्तिम संस्कार के समय परिवार का दायित्व वहन कर सके। अब्बू के बड़े दानों भाई इस शहर से लगभग साठ किमी. दूर पुश्तैनी गाँव में रहते थे।
अब्बू को इस नौकरी के कारण अपना गाँव छोड़कर शहर में आना पड़ा। उनसे सम्पर्क करने का सीधा कोई जरिया नही था। अम्मी ने एक फोन नम्बर दिया जो गाँव के किसी व्यक्ति का था। वह पी.सी.ओ. गयी और अचानक घटी उस घटना की जानकारी देते हुए उस व्यक्ति से दोनों चाचाओं को बताने का अनुरोध किया। लगभग दो दिनों तक अब्बू को बर्फ की सिल्लियों पर रख कर चाचाओं की राह देखी गयी।
दोनों चचा और उनका परिवार अब्बू के दफ़न होने के बाद आये। उस समय वह समझ गयी थी कि ऐसा उन्होंने इसलिए किया था कि कहीं वो समय पर पहुँच गये तो भाई के अन्तिम संस्कार मे पैसे खर्च करने न पड़ जायें। रिश्तों के रेशमी डोर को वीभत्स तरीके से तार-तार होते उसने किशोरवय में देखा था। रही-सही कसर बाद में दोनों भाईयों ने पूरी कर दी थी।
विवाह के पश्चात् अपनी -अपनी पत्नियों को ले कर दोनों अलग मकान में रहने चले गए। बहाना यह था कि इस छोेटे से किराये के मकान में इतने लोग नही रह पाएंगे। विवाह योग्य बहन के विवाह का उत्तरदायित्व पूर्ण करना तो दूर उसके बारे में सोचा तक नही। अपने परिवार, अपनी समस्याओं में जो उलझे तो फिर पीछे मुड़ कर देखने का समय कहाँ था उनके पास? कभी-कभी अम्मी का हाल पूछ लेते उनका यही उपकार कम नही था उस पर। छोटे भाई रहमान को बेटे की चाहत में पाँच बेटियाँ हो गयीं। महंगाई में बढ़ते जा रहे खर्चों से परेशान होकर उसने अपनी बड़ी पुत्री नाज़िया को उसके पास रख छोड़ा है। नाजिया को पढ़ाने-लिखाने से ले कर खाने-पीने, कपड़े-लत्ते आदि सभी आवश्यकताओं का खर्च वह उठाती है। उसकी प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करने में उसे न जाने क्यों प्रसन्न्ता मिलती है। एक अजीब-सा सुकून मिलता है।
वह भूल जाती है कि नाजिया रहमान की बेटी है। नाजिया से उसका वात्सल्य बढ़ता जा रहा है। घर की बड़ी पुत्री होने के कारण परिस्थितियोंवश असमय उस पर घर की जिम्मेदारियाँ आ गयीं। छः वर्ष की उम्र से नाज़िया को उसने अपने पास रखा है। नाज़िया भी अपने अम्मी-अब्बू से अधिक उससे लगाव रखती है। उसके साथ माँ बेटी-सा रिश्ता कायम हो गया है।
अब पैसों की तंगी नही है, इसलिए रहमान भी अम्मी का हालचाल पूछने खूब आने लगा है। अम्मी भी उसकी ज़रूरतें पूरी करती रहती हैं। जब भी वह उनसे पैसे मांगता है, अम्मी कहीं न कहीं से व्यवस्था कर देती हैं। अम्मी को पेंशन भी मिलती है। रहमान की दृष्टि उनकी पेंशन पर भी रहती हैं।
रहमान भी क्या करे? पाँच बेटियों के अतिरिक्त घर के सभी खर्चों को पूरा करते-करते वह उसकी आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो जाती है। पैसे खत्म हो जाते हैं। अम्मी जानती है कि प्राइवेट नौकरी करके आज के समय में परिवार चलाना सरल नही है। जो भी हो पुराने दिनों की कटु स्मृतियों से मन कसैला हो उठा है। हृदय की व्याकुलता बढ़ने लगी है। अम्मी की बीमारी ने उसे उदिग्न कर रखा है। उसने बगल में लेटी नाज़िया को देखा। बेखबर सो रही है। उसके सिरहाने कोई पुस्तक रखी है, जिसे पढ़ते-पढ़ते वह सो गयी है। वह देर तक नाजिया के चेहरे को देखती रही। नाज़िया से कैसा मोह-सा होने लगा है उसे।
बचपन से उसे अपने पास रखा है। अतः मोह-ममता स्वाभाविक है। नाज़िया उसके भाई की पुत्री है। उस भाई की जिसने अपने स्वार्थ के लिए माँ व बहन की भावनाओं को कभी नही समझा। अब यदि वह उन सबसे जुड़ा है तो मात्र विवशता में। नाजिया में वह अपनी छवि देखती है। एक लड़की की, एक स्त्री की छवि। जिसे इस दुनिया में सम्मान से जीने के लिए कदम-कदम पर संघर्ष करना है। इस समय सो रही नाज़िया की मासूमियत उसे अच्छी लगी। उसे देखकर कुछ देर में मन की व्याकुलता कम होने लगी। और न जाने कब उसकी आँख लग गयी। जीवन के लिए तिल-तिल कर संघर्ष करती अम्मी अन्ततः हार ही गयी। आज उनका इन्तकाल हो गया। दानों भाईयों का परिवार, रिश्तेदार सभी एकत्र हो गए। अम्मी की अन्तिम यात्रा के लिए इस बार रिश्तेदारों का मुँह नही देखना पड़ा।
उसने इस मतलब परस्त दुनिया से उम्मीद लगाना छोड़ दिया था। प्रथम बार का धोखा उसे सबक सिखाने के लिए काफी था। हमने अम्मी की अन्तिम यात्रा से ले कर उसके पश्चात् के सभी रस्मो-रिवाज को विधिवत् पूर्ण किया। सभी एकत्र मेहमान चले गए। भाई भी अपने परिवार के साथ अपने घर चले गए। इस घर में वह और नाज़िया रह गयी हैं। ये घर अब अम्मी के बिना काटने दौड़ता है। इस घर में वह नही रहना चाहती। किन्तु अपने मन की यह पीड़ा, यह दुविधा वह किससे कहे? कौन समझेगा उसे?
दोनों भाई अपने परिवारों के साथ अलग-अलग रहते हैं। बड़ा भाई सरकारी नौकरी में है। उसकी अर्थिक स्थिति अच्छी है। उसने अपना घर बनवाने के लिए कहीं जमीन ले रखी है। कुछ समय बाद घर बनवाने का वह इरादा रखता है। छोटा भाई विपन्नता की स्थिति में जी रहा है। पाँच-पाँच बेटियों की पढा़ई-लिखाई व विवाह की चिन्ता रहती है उसे। अब्बू ने यहाँ आकर रहने के लिए यही किराये का मकान लिया था। जिसमें अम्मी के साथ वह रहती थी। इस घर को कभी न कभी उसे छोड़ना ही पड़ेगा।
दिन धीरे-धीरे व्यतीत होते जा रहें हैं। उसने अब सोचना छोड़ दिया है। दिन कार्यालय में व्यतीत हो जाता है। नाज़िया भी कालेज चली जाती है। रहमान प्रतिदिन उसका हाल पूछने आता है। बड़ा भाई भी जब अवकाश मिलता है। उससे मिलने आ जाता है। नाज़िया धीरे-धीरे बड़ी हो रही है। उसकी इच्छा है कि वो खूब पढ़े। उच्च शिक्षा प्राप्त कर किसी अच्छी नौकरी में जाये। ले दे कर उसके जीवन का एक ही लक्ष्य एक ही सपना है नाज़िया की अच्छी परवरिश और देखभाल।
कभी-कभी अकलेपन में वह अपने बारे में सोचती है। क्या है उसके जीने का अर्थ? किसके लिए जी रही है? उसकी मृत्यु के पश्चात् सब कुछ उसके भाईयों का ही तो होगा। उसके पैसे, उसके गहने, उसकी पेन्शन सब कुछ उन भाईयों का होगा जिन्होंने अब्बू की मृत्यु के पश्चात् अपने उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ लिया था। उसे रहमान की दशा देखकर दया आती है। उसका परिवार सचमुच अभावों में रह रहा है। खाने-कपड़े से लेकर सभी चीजों का अभाव है। भले ही उसने उसके लिए कुछ न किया हो, किन्तु वह रहमान लिए कुछ करना चहती है। वह उसे एक छोटा-सा घर दिलाना चाहती है। नाज़िया का पूरा उत्त्रदायित्व वह ले लेना चाहती है। उसकी पढ़ई- लिखाई, उसका विवाह आदि सब कुछ करेगी।
रहमान को उसकी फिक्ऱ करने की आवश्यकता नही है। शाम को रहमान के आने पर अपने मन की बात उससे बता दी है। यह बात जान कर वह कितना प्रसन्न था मानों उसके सर से बहुत बड़ा पत्थर किसी ने उतार कर रख दिया है। उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव स्पष्ट दिख रहे थे। बोला उसने कुछ भी नही। उसने अपनी नौकरी के आधार पर लोन ले कर उसके लिए एक घर देखना प्रारम्भ कर दिया है। कुछ माह में बना-बनाया एक छोटा-सा मकान मिल गया। रहमान के परिवार को लेकर वह उसके साथ वह अपने नये घर में रहने आ गयी है। जब से वह उनके साथ रहने आयी है। रहमान की पत्नी, उसकी बेटियाँ उसका कितना ध्यान रखती हैं। उसको किसी बात की तकलीफ न हो इस बात का पूरा ख्याल रखती हैं।
वह प्रतिमाह मकान का लोन अदा करने के अतिरक्त घर के खर्चों में भी उनकी अर्थिक मदद करने लगी है। रहमान की पत्नी उसको पूरा मान सम्मान का देती है। वह जानती है यह सब भाई के अभावों से जूझते परिवार को पैसे देने के कारण ही सम्भव हुआ है। वरना तो क्या भाई..क्या रिश्तेदार सभी को इस उम्र तक आते-आते उसने देख-परख लिया है। अब भाई के परिवार के साथ ही रहना है। अम्मी-अब्बू भी तो उसे अकेला छोड़कर चले गये। ये भी नही सोचा कि उनकी बेटी किसके सहारे इस दुनिया में रहेगी? इस वर्ष उसने सैंतालिसवें वर्ष में प्रवेश किया है। उसके जीवन में अनेक ऋतुएँ आयीं और आकर चली गयीं। फरवरी माह के आगमन के साथ पतझड़ की ऋतु प्रारम्भ हो गयी है। यह पतझड़ स्थाई नही है। इसके पश्चात् सूने वृक्षों की टहनियों पर नवपल्लव, नवपुष्प आएंगे। यह तो मात्र ऋतुएँ हैं जो आती-जाती रहेंगी। किन्तु जीवन में कभी-कभी ये ऋतुएँ ठहर क्यों जाती हैं? विशेषकर पतझर की ऋतु।
उसे याद आने लगे अपने युवावस्था के दिन। जब वह भी अपने विवाह के सपने देखा करती थी। जीवन के इस रूप की तो कल्पना भी नही की थी उसने। वह विवाह योग्य होने लगी और सोचती कि अम्मी व उसके भाई उसके विवाह के लिए कहीं न कहीं रिश्ता देख रहे होंगे। उसकी हमउम्र अन्य लड़कियों के समान उसका भी विवाह अवश्य होगा। उस उम्र में वह भी साज- ऋंगार करने लगी थी। आज की भाँति नही कि जैसे जीवन में कुछ शेष ही नही रहा। किसके लिए नये कपड़े व साज-ऋृंगार करे? कौन है उसे देखने वाला? धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई पूरी हो गयी थी। पढ़ाई के साथ-साथ उसने टाइपिंग भी सीख ली थी। वह नौकरी के लिए आवेदन करने लगी थी।
उस दिन अम्मी कितनी प्रसन्नत थीं, जब एक सरकारी कार्यालय में उसे टाईपिस्ट की नौकरी मिल गयी थी। पहला वेतन लेकर जब वह घर में आयी थी, उस दिन तो घर में सबकी प्रसन्नता देखते बनती थी। अम्मी के साथ दोनों भाई भी बहुत खुश थे। उन सबको खुश देखकर वह भी वह भी प्रसन्न थी। वह नौकरी करती रही घर वाले प्रसन्न होते रहे।
धीरे-धीरे दोनों भाइयों का विवाह हो गया। उनके बच्चे हो गए। बच्चे बड़े भी होने लगे। पढ़ने जाने लगे। अम्मी बीमार हुईं। चल बसी। किन्तु उसके जीवन में इतना ही तो नही था। और भी बहुत कुछ था। वसंत तो उसके जीवन में भी आया था। उस समय वह स्नातक की शिक्षा पूरी कर रही थी। मामू की बेटी की शादी में गाँव गयी थी। उसका गाँव कहने भर को गाँव रह गया था। आधुनिक सुख-साधन, और सुविधाएँ वहाँ तक पहुँच चुकी थीं। मामू के घर में शादी का माहौल था। खुशियाँ हर तरफ मुस्करा रही थीं। वही उसे आरिफ मिला था। प्रथम बार का छोटा-सा परिचय उसे अपनापन के बन्धन में बाँध कर चला गया था। उसके बाद वह उसके घर आया। वह मामी का दूर का रिश्तेदार था। उससे उसका रिश्ता हो सकता था। आरिफ़ सम्पन्न घर का लड़का था। पढा़-लिखा था।
अपने भाईयों के साथ उसने व्यवसाय करना प्रारम्भ किया था। व्यवसाय खूब चल गया था। कितनी खुश रहती थी वह उन दिनों। उसकी कल्पनाओं में सोते--जागते हर समय आरिफ़ उसके साथ रहता था। वह जीवन साथी के रूप में आरिफ़ के सपने देखती। आरिफ़ जब भी घर आता अम्मी उसका कितना सत्कार करतीं। इस बीच उसकी नौकरी लग गयी। उसकी कल्पनाओं को पंख लग गए। लगभग छः माह व्यतीत हो गये थे उसे नौकरी करते हुए। वह आरिफ के आने की राह तक रही थी। वह सोचती आरिफ़ को उसकी नौकरी लग जाने के बारे में अब तक ज्ञात ही हो चुका होगा। वह भी कितना प्रसन्न होगा यह जानकर कि उसे सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिल गयी है, जिसे पाना आज के प्रत्येक युवा का सपना है।
एक दिन सहसा आरिफ़ आया। इस बार अम्मी ने और भी अच्छी तरह से आरिफ़ की खातिरदारी की। उसके खाने-पीने से लेकर घूमने-फिरने तक खूब ध्यान रखा। अम्मी ने शायद मेरे मन की बात पढ़ ली थी। उन्हें भी आरिफ़ पसन्द था। उस दिन शाम को उसे छत पर मुझे अकेला देख कर वह भी आ गया। आरिफ को अपने समीप पा कर मेरा हृदय जोर से धड़कने लगा। धक्..धक्..धक्..। शर्म से उसका चेहरा गर्म व गुलाबों सा सुर्ख हो गया था। “शिराज तुम्हें अपनी बीवी के रूप में पाने के सपने मैं देखा करता था। घर में मैंने कह रखा था कि मैं तुमसे ही निकाह करूँगा।’’ कहते-कहते आरिफ़ सहसा चुप हो गया। उसकी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी कि आरिफ़ आखिर कहना क्या चाहता है? उसने देखा आरिफ़ का मुँह कसैला हो रहा था जैसे कोई कड़वी चीज उसने खा रखी हो।
“तुमने नौकरी करके सही नही किया शिराज। तुम्हे पता है गाँव में तुम्हारी व तुम्हारे परिवार की कितनी थू..थू.. हो रही है। तुम्हारे परिवार को लड़की की कमाई खाने वाला परिवार कहा जा रहा है।’’ आरिफ ने दूसरी ओर मुँह घुमाते हुए कहा। “बस आरिफ बस! अब कुछ न कहो। कुछ भी न कहो।’’ कह कर मैं फूट-फूट कर रो पड़ी थी। ओह! इतनी निकृष्ट बात। कोई इस स्तर तक नीचे गिर कर कैसे सोच सकता है? उसे लगा जैसे वह छत पर नही बल्कि किसी सार्वजनिक स्थान पर नंगी कर दी गयी हो। वह आरिफ का कसैला मुँह देख रही थी। आरिफ़ के चेहरे पर उसने अपने लिए घृणा की जो पराकाष्ठा देखी उसे कभी विस्मृत नही कर सकती। दूसरे दिन आरिफ़ चला गया। उससे कोई बात नही हुयी।
इस घृणित सोच से उपजे प्रश्नों के जवाब न वह उस समय चाहती थी न ही उसे मिला। आज भी वह सोचती है कि शहरों मुस्लिम समाज की लड़कियों का पढ़ना-लिखना आम बात है। शहरों में हमारे समाज की लड़कियाँ पढ़ने के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियों के साथ ही खेल, कला, साहित्य आदि क्षेत्रों में भी बढ़-चढ़ कर आगे आ रही हैं। गाँवों में क्या अब भी हम आदिम युग में जी रहे हैं? आरिफ भी उसी आदिम समाज सदियों पुरानी की सोच में जी रहा है। विकास की दौड़ में वह कहाँ पर है? यूँ वसंत तो प्रतिवर्ष आता है। किन्तु उसके जीवन में वसंत बस एक बार ही आया था। पुष्प खिले, प्रेम की बयार बही। फिर जो पतझण आया तो वह उसके जीवन में ठहर-सा गया। वह अपने सपने वह नाज़िया में पूरे करना चाहती है।
नाज़िया के जीवन में आरिफ़ जैसा वसंत बिलकुल नही चाहती। आरिफ़ जैसी सड़ी-गली मानसिकता वालों को पीछे छोड़कर, विकास में बाधक बेड़ियों को तोड़ कर आगे बढ़ने का मार्ग वह नाज़िया को दिखाएगी। पतझण के बाद वसंत अवश्य आयेगा। किन्तु आरिफ़ के साथ गुज़रे वसंत के दिन वह पुनः नाज़िया के जीवन में ही नही, अपने समाज व पूरी सृष्टि पर कहीं भी नही देखना चाहती।
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अपनी कवितायेँ /गजल
"दो कवितायेँ "
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द्वारा - श्री राजेंद्र भाटिया
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राजेंद्र भाटिया जी ७४ वर्षीय ने भारत सरकार के एक प्रतिष्ठित पीएसयू में सेवा की और एक वरिष्ठ पद पर सेवानिवृत्त हुयें हैं| इन्होने बी.ई (मैकेनिकल) की योग्यता प्राप्त की है|
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१ ) टेंशन (परिभाषा, कारण व समाधान)
प्राब्लम जब बने उलझन,
होता है तब टेंशन।
जो हो रहा है, और जो होना चाहिए में का फर्क, जब व्यक्ति को करे बेचैन,
होता है तब समस्या का जन्म,
और शुरू होता है तब टेंशन।
जब समस्या हो व्यक्ति के बस में,
तब खत्म हो सकता है टेंशन।
पर जब समस्या ना हो व्यक्ति के बस में, और निर्भर हो दूसरों के सहयोग पर,
तब वक्त लग सकता है , दूर करने में टेंशन।
जब समस्या किसी भी व्यक्ति के बस में ना हो,
तब सिर्फ ईश्वर की प्रार्थना ही कर सकती है दूर टेंशन।
समय पर समस्या को दूर ना करने पर भी होता है टेंशन,
जितनी पुरानी समस्या, उतना बड़ा होता है टेंशन।
समस्या को टालने के बजाय, इसे फेस कर, दूर करने में होता है खत्म टेंशन।
समस्या को सही समझना जरूरी है,
ताकि उचित प्रयासों से खत्म हो टेंशन।
अगर समस्या को समझने में हो कोई कंफ्यूजन,
तब लिख कर समस्या को बयां करें,
फिर पढ़े, कंफ्यूजन दूर करें,
जल्द खत्म होगा तब टेंशन
यही है , प्रोवन जापानी तरीका,
खत्म करने का टेंशन।
चाहतें यदि जरूरतों से ज्यादा हों
तब लेता है जन्म टेंशन।
व्यक्तिगत जरूरतों को करे हम कम,
घट जाएगा तब टेंशन।
सच का पकड़े रहें दामन,
नहीं रहेगा तब टेंशन।
अच्छी हेल्थ से होता है अच्छे विचारों का जन्म,
हेल्थ पर भी हो पूरा ध्यान, व्यायाम का हो जीवन में उचित स्थान,
नहीं होगा तब टेंशन।
कठिन परिस्थियों में भी रखें चेहरे पर मुस्कान,
आसान होगा तब टेंशन का समाधान।
वाणी पर रखो पूरा नियंत्रण, जब हो टेंशन,
नहीं बढ़ेगा तब टेंशन।
अपने हितकारी को , खुलकर बताएं टेंशन,
सलाह और सहयोग से , करें खत्म टेंशन।
विषय के विशेषज्ञों की जरूर लें सलाह, और करें इसका पूरा पालन,
नहीं रहेगा तब टेंशन।
बचें औरों की करने से आलोचना,
यदि चाहते हो दूर रहे टेंशन।
औरों के अच्छे कामों व गुणों का खुले दिल से करो एप्रीसिएशन,
नहीं पनपेगा तब कोई टेंशन।
यदि कर दे तुम्हारा कोई नुकसान,
तो तुरंत क्रोध की बजाय करो विश्लेषण ,
और खोजो कारण एवं इंटेंशन,
यदि इंटेंशन ना हो दूसरे का तुम्हे करने का कोई नुकसान,
तो हो सके तो कर दो उसे माफ,
दो उचित ज्ञान, ताकि ना हो सके दोबारा नुकसान।
तो प्रेम से उसे समझाओ,और दोबारा ना हो सके नुकसान, इसका करो इत्मीनान।
हो सके तो दूसरे के इंटेंशन का कारण ढूंढो, और करो उस कारण का निदान।
ताकि वो बने तुम्हारा हितैषी,
और ना करे कोई नुकसान।
और यदि सभी प्रयत्न हो जाएं विफल,
तो फिर उस व्यक्ति से कर लो अपने को दूर,
या फिर, उसके बुरे इरादों का करो मुहतोड़ जवाबे ऐलान।
लड़ाई का भी हो रास्ता कानूनन,
ताकि आ ना सके कोई अनड्यू टेंशन।
रिश्तों में ना पड़े दरार,
निभा ना सको, करो मत ऐसा इकरार।
रखो मत ज्यादा किसी से एक्सपेक्टेशन,
चाहते हो यदि ना पनपे टेंशन।
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२ ) क्यूं और कैसे खत्म होगा भ्रष्टाचार?
बिना धरम जब कमाने का होता है व्यापार,
तब होता है भ्रष्टाचार।
भूल गए जब हम सारे शिष्टाचार,
तब होता है भरष्टाचार।
छोड़ दिया जब अच्छा व्यवहार,
तब होता है भ्रष्टाचार।
जिस समाज में भरी हो सिर्फ मारधाड़ ,
होता वहां है भ्रष्टाचार।
बन जाए जब आदमी का आदमी आहार,
होता है तब भरष्टचार।
जब कर देते तुम अच्छी शिक्षा का तिरस्कार,
होता है तब भरष्टचार।
नैतिक मूल्यों से हारकर भी, जब हम नहीं माने हार,
होता है तब भ्रष्टाचार।
अपनी झूठी शान दिखाने के लिए, जब हम करें दूसरों पर आए दिन वार,
होता है तब भ्रष्टाचार।
नहीं हो जब हमे किसी के दुख दर्द से कोई सरोकार,
होता है तब भ्रष्टाचार।
कब नहीं होगा भ्रष्टाचार?
दूसरों की भूख मिटाकर, जब हम रह सकेंगे निराहार,
नहीं होगा तब भ्रष्टाचार।
दूसरों के लिए कुछ करने के बदले,
नहीं लेंगे जब हम कोई उपहार,
नहीं होगा तब भ्रष्टाचार।
हर नियुक्ति पर जब होगा, व्यक्ति होनहार और ईमानदार,
नहीं होगा तब भ्रष्टाचार।
स्कूल, कालेजों , और विश्वविद्यालयों में, जब दिए जायेंगे अच्छे संस्कार,
जड़ से खत्म होगा तब भ्रष्टाचार।
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बाल विभाग "किड्स कार्नर"
"विद्यार्थी जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन"
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प्रेम बजाज एक वरिष्ठ रचनाकारा है। अब तक अनेकों सम्मान पत्र, ट्रॉफीज़, एवं अवार्ड द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया है। अनेकों पत्र-पत्रिकाओं एवं सांझा संग्रह में इनकी कहानियाँ, कविताएँ तथा आलेख छपते हैं। सुप्रसिद्ध दिल्ली पब्लिकेशन से प्रकाशित गृह शोभा, सरिता, मुक्ता, मनोहर कहानियां तथा सरस सलिल में भी इनकी कहानियां एवं आलेख छपते हैं।
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विद्यार्थी जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन
आज के समय में नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। लेकिन नैतिक मूल्यों का पतन क्यों हो रहा है इसका कोई एक विशेष कारण नहीं है। पारिवारिक संरचनाओं की बदलती गतिशीलता के कारण परिवारों का टूटना, परिवारों के व्यस्त कार्यक्रम, सोशल मिडिया का प्रभाव, भौतिकवाद और व्यक्तिवाद पर ध्यान केंद्रित करना, पक्षपात पूर्ण व्यवहार, एवं आज का इन्सान अपने स्वधर्म को भूल कर काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अंहकार में लिप्त होकर अपने नैतिक मूल्यों को खो रहा है। हमारी शिक्षा प्रणाली द्वारा भी नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है क्योंकि शिक्षा में नैतिकता का अभाव है।
ज़रा सोचिए जिस देश का विद्यार्थी जो कि देश का भविष्य होता है अगर वह नैतिक मूल्यों से रहित होगा तो क्या वह देश कभी तरक्की कर पाएगा? लेकिन हमारी विडम्बना है कि आज हमारे बच्चे, हमारे युवा, हमारे विद्यार्थी नैतिक आचरण खोते जा रहे हैं। आज हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार में लिप्त होकर अपने वास्तविक स्वधर्म को भूल बैठे हैं।
लेकिन क्या हम ये जानते हैं कि नैतिक मूल्य क्या हैं?
नैतिक शिक्षा मानव जीवन का एक अभिन्न अंग है। जिस देश के विद्यार्थी नैतिक मूल्यों से सम्पन्न होंगे वह देश सदैव उन्नति की राह पर चलेगा। जिसका आरम्भ बाल्यकाल से ही करना चाहिए।
करूणा, स्वतंत्रता, विनम्रता, प्रशंसा, स्वास्थ्य, बहादुरी, सब पर दया करना, सबकी मदद करना, किसी की बुराई न करना, बड़ों का सम्मान, झूठ न बोलना, दुर्बलों को तंग न करना, मिलजुल कर काम करना अर्थात टीम वर्क, पर्यावरण की देखभाल, निष्पक्षता एवं सामुदायिक भागीदारी इत्यादि ये नैतिक मूल्यों की श्रेणी में आते हैं।
नैतिक शिक्षा द्वारा छात्र ईमानदारी, निष्ठा, सम्मान करना व अपने काम की जिम्मेदारी समझता है। जिससे छात्र अपने कार्यो के परिणाम पर विचार करना तथा ऐसे विकल्प चुनना सीखता है जिससे न केवल छात्र का बल्कि अन्य का भी फायदा हो। सभी धर्मग्रंथों में भी नैतिक मूल्यों का विकास दिखाया गया है।
आज के समाज की स्थिति हर तरफ इस हद तक गिर चुकी है कि जिधर देखो चोरी, डकैती, झूठ, फरेब, हत्याएं, धोखाधड़ी, बड़ों का अनादर, नफ़रत, भ्रष्टाचार, बुरी आदतें इत्यादि ही नज़र आती है जिनका कारण नैतिक मूल्यों की कमी है। अपने थोड़े से लालच के चलते किसी का विश्वास तोड़ना, किसी को धोखा देना अथवा किसी भी तरह से किसी को नुक्सान पहुंचाना आदि नैतिक मूल्यों का हरण ही है। जिसका कारण उचित शिक्षा और मार्गदर्शन का अभाव है।
दूसरी तरफ़ देखा जाए तो आज प्रताड़ित केवल विधार्थी ही नहीं समस्त शिक्षक वर्ग भी है। दरअसल आज बच्चों का संस्कार और संस्कृति से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं,जिसके जिम्मेदार अधिकतर माता-पिता माने जाते हैं। क्योंकि आज हर घर में एक या कहीं पर दो बच्चे होते हैं जो कि माता-पिता के अत्याधिक लाडले होने के कारण अनजाने में कई गलतियाँ कर जाते हैं तथा माता-पिता भी अपने बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालते हुए यह भी नहीं सोचते कि वह एक ऐसे बीज का रोपण कर रहे हैं जो बड़ा होकर कड़वा फल देगा या कि वह अपने बच्चे को ऐसे राह पर चला रहे हैं जोअंधे कुएँ की तरफ जाएगा, जहाँ से आगे कोई राह नहीं मिलती ।
इससे बच्चा समझता है कि वह जो कर रहा है सही कर रहा है। इस तरह से वह अपनी मनमानी करते-करते ज़िद्द भी करने लगता है जो कि विवश होकर माता-पिता को मानना ही पड़ता है। यही स्थिति स्कूल में भी होती है। सभी माता-पिता अपने बच्चे को सही साबित करना चाहते हैं, विवश होकर शिक्षक केवल अपनी नौकरी ही कर रहे हैं, विद्या-दान नहीं। एक वक्त था जब शिक्षक को विद्या-दानी कहा और माना जाता था, आज शिक्षक केवल अपनी ड्यूटी करते हैं। इस पर सरकार ने भी सिस्टम बना दिया कि शिक्षक विधार्थी को मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना नहीं दे सकते। सरकार के इस फैसले से एतराज़ नहीं हमें लेकिन इससे बच्चे की ग़लती का सारा दोष शिक्षक के माथे मढ़ दिया जाता है।
नैतिक मूल्यों का महत्व किसी भी परिवार, समाज या देश की प्रगति उसके नैतिक मूल्यों पर निर्भर करती है। नैतिक मूल्यों का आधार जितना मजबूत होगा, क्षेत्र या देश उतनी ही तरक्की करेगा।
नैतिक मूल्यों का ह्रास क्यों होता है ?
(1) ज्ञान के अभाव के कारण.... सही और ग़लत को न समझकर केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु अनैतिक कार्य करना या उसमें भागीदारी करना नैतिक मूल्यों का ह्रास करना है।
(2) अभिवृति होना... मात्र ज्ञान होना ही परिपूर्णता नहीं है, इस पर अमल भी करना चाहिए। ज्ञान के लिए तो हजारों-लाखों पुस्तकें मिल जाएंगी। लेकिन ज्ञान को अमल में लाकर ही जीवन बदला जा सकता है।
(3) कर्तव्य बोध होना.. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज में रहते हुए प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहना चाहिए, चाहे वो घर-परिवार हो, रिश्ते-नाते हो या व्यापार-नौकरी। सभी कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से करना चाहिए।
(4) शिक्षा प्रणाली में सुधार... बच्चों का मन कोमल और मस्तिष्क कोरा कागज़ होता है। उन के मन-मस्तिष्क पर नैतिकता और अनैतिकता की परत हम बड़े ही चढ़ाते हैं। यदि बचपन से ही उन्हें घर के साथ-साथ स्कूल में भी शिक्षा पद्धति में नैतिक आचरण लागू किया जाए तो हम बच्चों से नैतिक आचरण की उम्मीद कर सकते हैं।
(5) प्रेरणा... महापुरूषों के जीवन को, चरित्र को तथा उनकी नीतियों को प्रेरणा स्रोत बनाकर अपने जीवन में उतारें तथा बच्चों को भी प्रेरित करें। अर्थात सुन्दर समाज के निर्माण हेतु हमें संस्कृति तथा संस्कारों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। तथा अपनी आन्तरिक उर्जा को मानव कल्याण में ही उपयोग करें।
यदि आज का विधार्थी नैतिक मूल्यों से सम्पन्न होगा तो मानव पीड़ा कम होगी, हमारा समाज एक मजबूत, न टूटने वाला समाज होगा, मजबूत समाज एक मजबूत देश का निर्माण करता है, और मजबूत देश सदैव तरक्की करता है।
इसलिए हमें चाहिए कि हम नैतिक मूल्यों की कद्र करें और उन्हें अपने जीवन का अंग बनाएं, जिसके लिए हमें छोटी उम्र से ही शुरूआत करनी होगी। शैक्षिक संस्थानों को नैतिकता और अखंडता के महत्व को समझाना होगा। नैतिक मूल्यों के बिना बच्चों को मार्गदर्शन नहीं मिलता एवं जीवन दिशाहीन हो जाता है। नैतिक मूल्यों के पालन से आत्मविश्वास बढ़ेगा, सुन्दर चरित्र का निर्माण होगा, जिससे एक सुखी और समृद्ध समाज का निर्माण होगा।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की तरफ से स्वागत
इंडियाना शाखा की युवा समिति के नए नेतृत्व का
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नए नेतृत्व की नियुक्ति: अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -इंडियाना की युवा समिति के अध्यक्षा और सह-अध्यक्षा और कार्मेल हाई स्कूल में हिन्दी क्लब के सह-संस्थापकों की घोषणा की गई।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना अपनी युवा समिति के नए अध्यक्षा और सह-अध्यक्षा के रूप में आरिनी पारीक और अन्विता राजपूत की नियुक्ति की घोषणा करते हुए गौरवान्वित है!
आरिनी और अन्विता कार्मेल हाई स्कूल के उत्कृष्ट छात्र हैं जिन्होंने अपने स्कूल में हिन्दी भाषा क्लब की स्थापना करके उल्लेखनीय नेतृत्व और पहल का प्रदर्शन किया है। सांस्कृतिक जागरूकता और भाषा कौशल को बढ़ावा देने के लिए उनका समर्पण और उत्साह वास्तव में प्रेरणादायक है और हमारे संगठन के मूल्यों के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। अध्यक्षा और सह- अध्यक्षा के रूप में, आरिनी और अन्विता नई पहल करने और हमारे समुदाय में युवाओं की भागीदारी के लिए एक गतिशील वातावरण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
कृपया आरिनी पारीक और अन्विता राजपूत को बधाई देने में हमारे साथ शामिल हों क्योंकि वे आईएचए-इंडियाना के साथ इस उत्साहिक यात्रा पर निकल रहे हैं। हम उन सकारात्मक बदलावों और जीवंत ऊर्जा की आशा करते हैं जो वे हमारी युवा समिति में लायेगी।
द्वारा: डॉ. राकेश कुमार
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𝐍𝐞𝐰 𝐋𝐞𝐚𝐝𝐞𝐫𝐬𝐡𝐢𝐩 𝐀𝐩𝐩𝐨𝐢𝐧𝐭𝐞𝐝: 𝐂𝐡𝐚𝐢𝐫 𝐚𝐧𝐝 𝐂𝐨-𝐂𝐡𝐚𝐢𝐫 𝐀𝐧𝐧𝐨𝐮𝐧𝐜𝐞𝐝 𝐟𝐨𝐫 𝐘𝐨𝐮𝐭𝐡
𝐂𝐨𝐦𝐦𝐢𝐭𝐭𝐞𝐞 𝐨𝐟 𝐈𝐇𝐀-𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚𝐧𝐚 & 𝐂𝐨-𝐟𝐨𝐮𝐧𝐝𝐞𝐫𝐬 𝐨𝐟 𝐇𝐢𝐧𝐝𝐢 𝐂𝐥𝐮𝐛 𝐚𝐭 𝐂𝐚𝐫𝐦𝐞𝐥
𝐇𝐢𝐠𝐡 𝐒𝐜𝐡𝐨𝐨𝐥.
International Hindi Association-Indiana is thrilled to announce the appointment of Aarini Pareek and Anwita Rajput as the new Chair and Co-Chair of its Youth Committee!
Aarini and Anwita are standout students from Carmel High School who have demonstrated remarkable leadership and initiative by founding the Hindi Language Club at their school. Their dedication and enthusiasm for promoting cultural awareness and language skills are truly inspiring and align perfectly with the values of our organization. As Chair and Co-Chair, Aarini
and Anwita will be pivotal in driving new initiatives and fostering a dynamic environment for youth involvement in our community.
Please join us in congratulating Aarini Pareek and Anwita Rajput as they embark on this exciting journey with IHA-Indiana. IHA-Indiana looks forward to the positive changes and vibrant energy they will bring to its Youth Committee!
By Rakesh Kumar
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पाठकों की अपनी हिंदी में लिखी कहानियाँ, लेख, कवितायें इत्यादि का
ई -संवाद पत्रिका में प्रकाशन के लिये स्वागत है।
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"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
1.रचनाओं में एक पक्षीय, कट्टरतावादी, अवैज्ञानिक, सांप्रदायिक, रंग- नस्लभेदी, अतार्किक
अन्धविश्वासी, अफवाही और प्रचारात्मक सामग्री से परहेज करें। सर्वसमावेशी और वैश्विक
मानवीय दृष्टि अपनाएँ।
2.रचना एरियल यूनीकोड MS या मंगल फॉण्टमें भेजें।
3.अपने बायोडाटा को word और pdf document में भेजें। अपने बायो डेटा में डाक का पता, ईमेल, फोन नंबर ज़रूर भेजें। हाँ, ये सूचनायें हमारी जानकारी के लिए ये आवश्यक हैं। ये समाचार पत्रिका में नहीं छापी जायेगी।
4.अपनी पासपोर्ट साइज़ तस्वीर अलग स्पष्ट पृष्ठभूमि में भेजें।
5.हम केवल उन रचनाओं को प्रकाशित करने की प्रक्रिया करते हैं जो केवल अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति को भेजी जाती हैं। रचना के साथ अप्रकाशित और मौलिक होने का प्रमाणपत्र भी संलग्न करें।
E-mail to: shailj53@hotmail.com
or: president@hindi.org
contact
330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
हिंदी लेखन के लिए स्वयंसेवकों की आवश्यकता
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के विभिन्न प्रकाशनों के लिए हम हिंदी (और अंग्रेजी दोनों) में लेखन सेवाओं के लिए समर्पित स्वयंसेवकों की तलाश कर रहे हैं जो आकर्षक और सूचनात्मक लेख, कार्यक्रम सारांश और प्रचार सामग्री आदि तैयार करने में हमारी मदद कर सकें।
यह आपके लेखन कौशल को प्रदर्शित करने, हमारी समृद्ध संस्कृति को दर्शाने और हिंदी साहित्य के प्रति जुनून रखने वाले समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ने का एक अच्छा अवसर है। यदि आपको लेखन का शौक है और आप इस उद्देश्य के लिए अपना समय और प्रतिभा योगदान करने में रुचि रखते हैं, तो कृपया हमसे alok.iha@gmail.com पर ईमेल द्वारा संपर्क करें। साथ मिलकर, हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने और संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र
alok.iha@gmail.com
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“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
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प्रबंद्ध संपादक – श्री आलोक मिश्र, NH, alok.iha@gmail.com
संपादक -- डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
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