संवाद - August 2022

संवाद - August 2022

 
 
 
 
 
 AUGUST INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
  अगस्त 2022, अंक १५    | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
 
 
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
 
 
 
 
 
 
 
अध्यक्षीय संदेश
 
 
 
 
 
प्रिय मित्रों ,
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को रथ यात्रा तथा गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि अभी Covid19 की बढ़ती महामारी से मानव समाज को सुरक्षित रखें।
हिंदी शिक्षण समिति ने हिन्दी भाषा के भविष्य को ध्यान मे रखते हुए अपने आप याने स्वयं हिंदी सीखने का बहुत ही आसान और रोचक विधि की खोज कर हिंदी को सीखना सरल कर दिया है। दिन-प्रतिदिन इस पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है, कृपया इस पाठ्यक्रम के माध्यम से अपने बच्चों को लाभान्वित करें और अधिक जानकारी के लिए info@hindi.Org पर सम्पर्क करें।
काव्य गोष्ठियों की श्रंखला 3 जून से 10 जुलाई २०२२ तक अमेरिका में बहुत ही हर्ष और उल्लास के साथ सम्पन्न हुई। अमेरिका के हिंदी भाषी परिजनों ने यहाँ आयोजित कवि गोष्ठियों का पूर्ण आनंद लिया।
जागृति का कार्यक्रम ९ जुलाई २०२२ को भक्तिकाल की सीमारेखा पर डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने वेबिनार में आये प्रश्नों के उत्तर बड़ी अच्छी तरह दिये। यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं:- https://www.hindi.org/Jagriti.html
जागृति मंच के माध्यम से शनिवार,13 अगस्त 2022 को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी विद्वान् प्रोफ़ेसर शंभुनाथ तिवारी, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "रीतिकाल : समाज और संस्कृति का कलात्मक संगम"। आप अपने प्रश्न jagriti.hindi.org पर पूछ सकते है।
आप सभी इस ईमेल (anitasinghal@gmail.com) के माध्यम से मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं और इस फोन नम्बर पर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतरराष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
 
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- जल्दी आ रहा है ( COMING SOON )
 
 
 
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम 
 
 
 "जागृति वेबिनार: “ रीतिकाल : एक पुनर्पाठ ”, 10 सितम्बर 2022  
 
 
जागृति वेबिनार : “ रीतिकाल : एक पुनर्पाठ ”, 10 सितम्बर 2022

जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 10 सितम्बर 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है। इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक एवं यूट्यूब पर किया जाएगा।

जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रतिष्ठित हिन्दी आलोचक एवं साहित्यकार डॉ. सुधीश पचौरी, पूर्व कुलपति एवं हिंदी विभागाध्यक्ष, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (भारत)। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: " रीतिकाल : एक पुनर्पाठ "।

आइये उनसे सुनते हैंः क्या रीतिकालीन स्थापित अवधारणाएँ सही हैं ? क्या रीतिकाल की श्रिंगार-सज्जित नाईकाएँ मात्र कल्पनायें हैं? रीतिकाल के पहले के रचनाकारों का रीतिकाल के साहित्य और उसका के प्रमुख साहित्यकारों जैसे कविवर बिहारी पर क्या प्रभाव है ?

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति शनिवार, 10 सितम्बर 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।

सम्मिलित होने के लिए लिंक है:
www.facebook.com/ihaamerica
https://youtu.be/lekuoXI4xeE

शनिवार, 10 सितम्बर 2022; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST, UK:
4:00 PM
 
 
 
 
आशा है कि आप शनिवार, 10 सितम्बर 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें।

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है। पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं । समिति ने एक डिजिटल मासिक पत्र “संवाद” जून २०२१ से प्रकाशन प्रारम्भ किया है। स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है। "जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना ।

यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।

 
 
 
  अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  -- अमेरिका के नार्थईस्ट ऑहियो चैप्टर , ग्रेटर क्लीवलैंड शिव विष्णु टेम्पल साथ मिल  मना रहें हैं
हिंदी दिवस-- सितम्बर १८ ,२०२२
( ५  से ८ बजे शाम -- भोजन एवं प्रोग्राम,  निःशुल्क)

 
 
 
 
जागृति रिपोर्ट  
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति  --१३ अगस्त, 2022 


 जागृति व्याख्यान माला की सातवीं कड़ी:
"रीतिकाल- समाज और संस्कृति का कलात्मक संगम "
एक संक्षेपण
 
 
 
 
 
प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी
 
 
 
 
वक्ता: प्रोफेसर डॉ. शम्भुनाथ तिवारी
 
 
 
 
 
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति ने इस आजादी के अमृत महोत्सव में प्रारम्भ जागृति व्याख्यानमाला की सातवीं कड़ी - १३ अगस्त 2022 को स्ट्रीमयार्ड (Streamyard) से वेबिनार के रूप में आयोजित हुई। इस कड़ी की परिचर्चा का शीर्षक था "रीतिकाल- समाज और संस्कृति का कलात्मक संगम"। इस रोचक परिचर्चा का नेतृत्व अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. शम्भुनाथ तिवारी ने किया। डॉ. तिवारी ने कई राज्यों के उच्च शिक्षा विभाग में, और मसूरी स्थित भारतीय प्रशानिक सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियो के प्रशिक्षण केंद्र लाल बहादुर शास्त्री अकादमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन में, अपनी सेवाएं प्रदान की है। 30 वर्ष के शिक्षण अनुभव के साथ प्रो. तिवारी आज सक्रिय रूप से शिक्षण और शोध में संलग्न हैं। इनके शोध का क्षेत्र हिंदी साहित्य, तुलनात्मक साहित्य और आधुनिक काव्य का इतिहास है।
अपने व्याख्यान में डॉ. शम्भुनाथ तिवारी ने रीतिकाल के विषय में स्थापित अवधारणाओं को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि यह सही है कि रीतिकाल के साहित्य में श्रृंगार और प्रेम की प्रधानता है, पर उस काल का साहित्य मानवीय अनुभूतियों के अन्य आयामों से भी परिपूर्ण है। वीररस का उदाहरण लें तो प्रो: तिवारी के अनुसार असलियत यह है कि आदिकाल की वीर-गाथा की धारा जो भक्ति-काल में सूखने लगी थी, वह रीतिकाल में एक नए ढंग से उभरी, पुनर्जीवित हुई। उस काल के महाकवि भूषण, चंद्रशेखर बाजपेई, लालकवि और अन्य कई कवियों का वीर-रस से परिपूर्ण साहित्य हिंदी-साहित्य के किसी भी काल का मुकुट-मणि है। उसी तरह भक्ति की अगाध सरिता भी रीतिकाल में पूर्ण रूप से प्रवाहित थी, बस कहने का ढंग, उसकी भंगिमा अलग थी। भक्ति की अनुभूति भी कलात्मक अभिव्यक्ति की भंगिमा से सुसज्जित थी। बिहारी का प्रसिद्ध दोहा "करौं कुटिल जग कुटिलता तजौं न दीनदयाल; दुखी होहगे सरल हिय, बसत त्रिभंगीलाल" इस परकाष्ठा का एक सटीक उदाहरण है। मलूक दास, गरीब दास, दयाबाई, सहजोबाई, जगजीवन दास, दरिया साहब आदि कवियों का हवाला देते हुए डॉ. तिवारी ने कहा कि उस काल के भक्त कवियों का साहित्य भक्ति-से लबालब और बड़े ही उच्च कोटि का है।
भक्ति और वीरगाथा के अलावा रीतिकाल में “नीति" के भी बड़े कवि हुए हैं, जैसे रहीम, गिरिधर कविराय, आदि। प्रोफ़ेसर तिवारी ने बड़े रोचक ढंग से यह व्याख्यायित किया कि रीतिकाल में घनआनंद जैसे कवियों की 'वेदना' जनित अनुभूति भी है और बिहारी का 'उल्लास' भी है; यूँ कहें कि उसमें 'आह' भी है और 'वाह' भी। उर्दू के शायरों का अगर उदाहरण लें तो उसमें गालिब साहब का 'वाह वाह' तो है ही, प्रसिद्ध शायर मीर की "आह" भी है। हमारी सांस्कृतिक-सामजिक अनुभूतियों को भी तत्कालीन कवियों ने बड़ी साज-सज्जा से परोसा है। प्रोफ़ेसर साहब ने इस सामाजिक-संस्कृतक सरोकार की याद दिलाई बिहारी के ही एक दोहे से। एक युवती अपने ससुराल से अपने पीहर जा रही है। उसे प्रिय से बिछुड़ने का दुसह दु:ख तो है, पर माँ-बाप से मिलने का आनंद भी है। बिहारी कहते हैं :"पिय बिछुडन को दुसह दुःख, हरसि जात प्योसार, दुरजोधन लौं देखियत, तजत प्राण इहि बार" .... "उसके मन में एक तरफ प्रिय-वियोग का दुसह दुःख है, तो दूसरी तरफ माता-पिता से मिलने का सुख भी। उसे चिंता इस बात की है कि ऐसा न हो कि ये सुख दुःख बराबर हो जायें,क्योंकि कथा यह है कि दुर्योधन के जब दुःख-सुख बराबर हो गए थे तो उसका प्राणांत हो गया था। श्लेष का यह अतिरेक, कथन की यह भंगिमा, अभिव्यक्ति की यह कलात्मकता; चाहे वह भक्ति के विषय में हो, नीति के विषय में, वीर-गाथा के विषय में, प्रेम-श्रृंगार के विषय में , या सामाजिक सरोकार के विषय में; रीतिकाल के साहित्य की एक बड़ी धरोहर है। रीतिकाल में अनुभूतियों का भी बाहुल्य है; हर तरह की मानवीय अनुभूतियाँ मुखर हुई हैं, केवल श्रृंगार ही नहीं; बस केवल एक अनुपम भंगिमा से !
इस "अनुपम भंगिमा" पर बोलते हुए डॉ. तिवारी ने अंग्रेजी कवि Coolidge के कथन ..."poetry is the best word in the best order" की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि रीतिकाल के कवि को इस best word in the best order की पहचान है। इसी लिए रीतिकाल की भाषा और शैली कलात्मकता की ऊंचाई ऊँचाई पर है। शब्दों के विषय में विद्वान प्रोफ़ेसर ने बादल औअर चन्द्रमा जैसे शब्दों के पर्यायवाची शब्दों (पयोद, घन, अम्बुवाह; और शशि, राकेश आदि) के हवाले यह तर्क दिया कि एक शब्द के तथाकथित पर्याय तो कई हो सकते हैं; पर हर पर्याय हर जगह 'फिट' नहीं हो सकता। सन्दर्भों के अनुसार उनकी उपयोगिता अलग-अलग होती है; इसका ज्ञान न होने से अर्थ का अनर्थ हो सकता है। एक बड़ा रोचक उदाहरण उन्होंने "आँख" शब्द के पर्याय नयन, नजर, का उपयोग कर दिया। जैसे "नजर लग गई", और "आँख लग गई" के अलग-अलग माने होते हैं। अत: पर्यायवाची होते हुए भी अलग-अलग संदर्भों में किसी एक की ही जगह सही होती है, जैसे किसी नग को सोने के आभूषण में सही जगह पर जड़ने से ही आभूषण और नग दोनों की शोभा बढ़ती है। रामचंद्र शुक्ल जी का कहना था कि रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी को --- किस नग को काव्य के आभूषण में कहाँ मढ़ना है --- की अद्भुत पहचान थी। रीतिकाल के कवियों में कलात्मकता की यह ऊँचाई अपनी पराकाष्ठा पर है।
रीतिकाल के आलोचकों ने 'रीति' शब्द को केवल श्रृंगार-जनित अनुभूतियों से जोड़ा है, जबकि रीति शब्द के अनेक अर्थ होते हैं; जैसे परम्परा (रघुकुल रीति सदा चली आई), प्रवृति या आदत (मधुकर यह कारे की रीति), चलन, पद्धति आदि। रीतिकाल में साहित्यिक व्यंजना की एक अलग पद्धति है; अनुभूतियों पर कोई बंदिश या सीमा उस काल के साहित्य में नहीं है जैसा ऊपर के विवेचन से सपष्ट है। श्री तिवारी ने संगीत से तुलना करते हुए बताया कि रीतिकाल का साहित्य "शास्त्रीय" संगीत" (classical music) जैसा है। शास्त्रीय संगीत सभी नहीं गा सकते, हर कोई उसका आनंद भी नहीं ले सकता। उसके अलग अलग आयामों की समझ सबको नहीं होती। पर जो गाते हैं, जो समझते हैं; उन्हें गाने और सुनने में स्वर्गिक आनंद की अनुभूति होती है। और इसके लिए एक अलग काबलियत, एक विद्वत्ता की आवश्यकता है। इसी लिए रीतिकाल के ज्यादा कवि विद्वान् हैं। रीतिकाल के प्रवर्तक कवि केशवदास स्वयं बड़े विद्वान् थे। उनका पद है: "भाषा बोल न जानहिं जिनके कुल के दास"। उनके नौकरों को केवल संस्कृत आती थी वे हिंदीं नहीं बोलते थे, पर केशव दास जी को हिंदी में कविता करनी पड़ी! --- एक कुंठा सी स्थिति थी। एक विशेषता और: शास्त्रीय संगीत सभी गा-समझ नहीं सकते,अतः उन्हें एक मंच की आवश्यकता होती है और वह मंच उन्हें तत्कालीन शासकों से मिला। इसलिए यह धारणा बना ली गई कि रीतिकाल के कवि केवल राजाओं के गुण गाते हैं, उनके प्रेम-प्रसंग का विवरण करते हैं। आश्रयदाता शासकों का गुण गाना मंच के लिए आवश्यक सा था पर इसका मतलब यह नहीं की केवल उतना ही कहा गया।
समाज और संस्कृति के कलात्मक संगम से परिभाषित रीतिकाल पर डॉ. तिवारी का यह व्याख्यान, उनकी विद्वत्ता और हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी-संस्कृत के कवियों के समीचीन उद्धरणों से भरपूर, अत्यंत रोचक था। इस रोचक व्याख्यान का पूर्ण आनंद लेने के लिए पूरी प्रस्तुति इस लिंक पर देखें: https://www.youtube.com/watch?v=H9GBOO7jep0 या http://hindi.org/Jagriti.html
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शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट
 
 
 आज़ादी के अमृत महोत्सव के महा-उपलक्ष्य में
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की ह्यूस्टन,टेक्सास अमेरिका में
वीरोत्सव रविवार, ७ अगस्त २०२२

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
<<<<  स्वपन धैर्यवान (पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय एवं  हूस्टन शाखा) के द्वारा लिखित  रिपोर्ट 

>>>>सुनीता द्विवेदी  उत्तरपूर्व ओहायो शाखा के द्वारा अनुवादित 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आज़ादी के अमृत महोत्सव के महा-उपलक्ष्य में ह्यूस्टन, टेक्सास, अमेरिका में वीरोत्सव का कार्यक्रम रविवार, ७ अगस्त २०२२ को शाम ४:३० से ७.३० बजे तक स्टैफ़ोर्ड सिविक सेंटर में आयोजित किया गया। इस सुन्दर मनोभाव की परिकल्पना श्री स्वपन धैर्यवान ने की थी। इस अद्भुत कार्यक्रम ने ४ घंटे तक निरंतर, निर्बाध रूप से दर्शकों को बांधें रखा।

संगीता पसरीजा और नौशा असरार द्वारा प्रस्तुत वीर रस से ओतप्रोत काव्य पाठ अत्यंत मनोहर एवं जोशीला रहा। इस कार्यक्रम में तीन नाट्य विद्यालयों के शिष्यों ने भी अनुपम नृत्य प्रस्तुतियाँ दी। ‘अंजलि स्कूल’, ‘शिवांगिनी अकादमी’ एवं ‘सुनंदा परफोर्मिंग आर्ट्स नृत्य विद्यालयों’ के शिष्यों ने श्री राम, श्री कृष्ण और माँ शक्ति पर आधारित नृत्यों का दिव्य प्रदर्शन किया।

‘वी. वी. एम. विद्यालय’ के बच्चों ने महाकवि दिनकर जी के महाकाव्य - रश्मिरथी पर अपनी हृदय स्पर्शी प्रस्तुति से सभी को मोहित कर दिया।

कार्यक्रम को गति देते हुए ‘श्री कृति म्यूजिक स्कूल’ के दो छात्रों ने बहुत सुन्दर दो प्रस्तुतियाँ दी। जहाँ एक युवा कलाकार रेयंश पाण्डेय द्वारा बांसुरी वादन बहुत ही मनमोहक था। अनिल कुमार द्वारा देशभक्ति गीत – “ऐ मेरे प्यारे वतन” (काबुलीवाला) गाकर दर्शकों को भावविभोर कर दिया। डॉ. के. डी. उपाध्याय जी ने अपनी ओजपूर्ण, साहित्यिक प्रासंगिक प्रस्तुति की थी।

श्री फ़तह अली जी द्वारा प्रस्तुत “कहाँ गये वो लोग” अत्यंत रोचक रहा। पच्चीस कलाकारों ने इस नाटक में भाग लिया और नेपथ्य के कार्यकर्ताओं के अद्भुत तालमेल ने इस प्रस्तुति का सफल प्रदर्शन किया।

 
 
 
 
 
                                                         नाटक : कहाँ गये वो लोग
 
 
 
 
 
                                        नृत्य : शिवंगिनी अकेडेमी द्वारा प्रस्तुती
 
 
श्री गजेंद्र सोलंकी, दिल्ली और श्री प्रख्यात मिश्रा, उत्तर प्रदेश भारत से आये कवियों ने वीर रस से परिपूर्ण कवितायें आभासी (virtual) माध्यम द्वारा सुनाई।
इस कार्यक्रम का सफल आयोजन कर्मठ स्वेच्छाकर्मियों के अभूतपूर्व सहयोग से संभव हो पाया। सभी कार्यकर्ताओं को आयोजकों की ओर से साभार धन्यवाद। श्री संजय सोहोनी और श्री अजित कुमार पटेल जी को तकनीकी सहयोग और प्रारम्भ से अंत तक सहयोग देने के लिए धन्यवाद। श्री राजीव भावसार जी को निर्धारित-पूँजी के भीतर कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए धन्यवाद। भारत के साथ आभासी-सञ्चालन के लिए श्री चार्ली पटेल जी को धन्यवाद।
स्वागत-द्वार पर दर्शकों के स्वागत और कार्यक्रम की जानकारी देने के लिए श्रीमती स्वप्ना शाह और श्री प्रफुल्ल गाँधी को धन्यवाद। इस कार्यक्रम के सफल, निर्बाध और रोचक सञ्चालन के लिए श्री अमित गोडबोले जी को धन्यवाद। श्रीमती निशा मिरानी का इस कार्यक्रम को सफल बनाने में अभूतपूर्व योगदान रहा। उनके तकनीकी, और अन्य सहयोग के लिए आयोजक समिति आभारी हैं।
आयोजकों को इस कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए लगातार बधाई सन्देश आ रहे हैं जिसके लिए वे सभी के आभारी हैं।
 
 
 
 
 भारतीय दूतावास से कॉउंसलर जनरल को सम्मानित करते हुए
 
 
 
 

नृत्य : अंजली स्कूल द्वारा प्रस्तुती
 
 
 
 
 
 भारतीय दूतावास से कॉउंसलर जनरल माननीय श्री असीम महाजन अपनी टीम के साथ इस कार्यक्रम को देखने आये थे और काफी आनंदित तथा प्रभावित हुए। उन्होंने राज-भाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रति किये जा रहे प्रयत्नों को सराहा। इस कार्यक्रम में लगभग ४५० दर्शकों की उपस्थिति रही। इसी उपस्थिती से कार्यक्रम की सफलता ज्ञात हो रही है। इस प्रकार के कार्यक्रम अगली पीढ़ी को हमारी विस्तृत और समृद्ध संस्कृति से अवगत करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
इसलिए इन कार्यक्रमों का आयोजन एक अच्छी और अनुकरणीय पहल है।
***                                            
 
 
 अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा
शॉर्लट (Charlotte, NC)"
   
 
 
 
    प्रिया भारद्वाज, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा
शॉर्लट (Charlotte, NC) अध्यक्ष
को भारतीय वाणिज्य दूतावास से ३० जुलाई २०२२ को सम्मानित किया

 
 
 
अपनी  कलम से 

"  कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर नहीं आए "
(आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में)

 
 
 
 
 
कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट              के घर नहीं आए
 
 
 
 
द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स
 
साहित्यकार डॉ. उमेश प्रताप वत्स, हिन्दी प्राध्यापक हैं। शिक्षा विभाग हरियाणा में एनसीसी ऑफिसर (कैप्टन) भी हैं। इन्होंने हिन्दी में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। कविता, कहानी, लघुकथा, बाल कविता, आलेख आदि लिखते हैं। ये यमुनानगर, हरियाणा से हैं।
 
 
हिन्दुस्तान की यह 'वीर भोग्या वसुन्धरा', धर्म की पताका फहराने वाली पुण्य भूमि भारतवर्ष सदियों से ही सहनशीलता एवं सुशीलता के कारण ईरान, तुर्क आदि क्षेत्रों से अलग-अलग आक्रांताओं के आक्रमणों को झेलता आया है। जिस देश के बच्चे खेल-खेल में सिंहों के दाँत गिनते आये हों जिनके नाम से ही इस आर्यव्रत का नाम सम्मान से भारत लिया जाता हो। जहाँ राम-कृष्ण, लव-कुश, एकलव्य जैसे बालवीर हुये हों, जो आगे चलकर महान योद्धा हुए, क्या ऐसे देश में वीरों की कमी हो सकती है? नहीं कभी नहीं, यह देश सदैव वीरों से गौरवान्वित रहा है।

यद्यपि इतिहास के अनुसार हमारे देश पर सातवीं शताब्दी में विदेशी आक्रांता मीरकासिम का आक्रमण हुआ जिसे पहला सफल आक्रमण माना जाता है। कहते हैं कि तब से ही हम किसी न किसी विदेशी शासक के गुलाम रहे हैं। तथापि यह सही नहीं है। सत्य यह है कि ईसा पूर्व के आक्रमणों से लेकर ब्रिटिश शासन तक हमने कभी भी पूर्ण रूप से ना हार मानी है और ना ही पूर्ण रूप से दासता स्वीकार की है, अपितु यथाशक्ति अनुसार हम संघर्षरत रहे।

इतिहास के पन्ने पलटकर देखने से ज्ञात होता है कि भारत वर्ष के किसी न किसी क्षेत्र में सदैव स्वतंत्रता की लौ जलती रही है। मातृभूमि के लिए कोई न कोई राजा, महान योद्धा विदेशियों को रोकने अथवा भगाने के सतत् प्रयास में संघर्ष करता अवश्य ही दिखाई देता है।

मीर कासिम को राजा दाहिर ने रोका तो सिकंदर को पौरष ने रोका। मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान ने बार-बार हराया तो बाबर को महाराणा संग्राम सिंह सांगा ने धूल चटाई। अकबर को महाराणा प्रताप ने रोका तो शिवाजी ने औरंगजेब की नाक में दम करके रखा। यह भारत भूमि कभी भी वीरों से रिक्त नहीं हुई। यहाँ महाराणा प्रताप और शिवाजी के बाद एक प्रखर योद्धा के रुप में बाजीराव बल्लाल भट्ट पेशवा का भी नाम आता है। बाजीराव मुगलों से लंबे समय तक लोहा लेने वाले महान योद्धा थे। अटक से कटक तक केसरिया लहराने का और हिंदू स्वराज लाने का जो सपना छत्रपति शिवाजी महाराज ने देखा था उसे पेशवा बाजीराव ने ही पूरा करने का प्रयास किया। इतिहास में कई ऐसे वीर हुए हैं जिन्होंने मुगलों को दिल्ली तक ही समेट दिया था। जिनमें से एक प्रमुख नाम बाजीराव पेशवा का है। हेमचंद्र विक्रमादित्य, छत्रपति संभाजी, गुरु गोविंद सिंह, वीर बहादुर बंदा बैरागी, महाराज छत्रसाल, अमरसिंह राठौर आदि ऐसे योद्धा रहे जिन्हें भारत की यह पावन माटी कभी विस्मृत नहीं कर पायेगी। किंतु इन वीरों की, बड़े-बड़े युद्धों की सफलता के पीछे ऐसे भी बहुत महान वीर एवं वीरांगनाओं ने संघर्ष किया था जिन्हें इतिहास के पन्नों में वो सम्मानित स्थान नहीं मिल पाया जिसके वो अधिकारी थे। यह आजादी का 75 वाँ अमृत महोत्सव उन वीरों को याद करने का ही एक सुअवसर है।

बाबर ने हिन्दुस्तान के कुछ हिस्से में मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूँ को तो यहाँ के राजाओं ने हराकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब के आते-आते उखड़ गई। कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में इस तरह पढ़ाया जाता है मानो मध्ययुग नाम से सृष्टि का सबसे बड़ा कालखंड यही हो। जबकि इन 100 वर्षों में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व के भी कई राज्य इनसें मुक्त थे। यद्यपि अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्ष तक टिका रहा। महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने, 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष, 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक, 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक, 12 मौर्यों ने 316 वर्ष तक, 10 शुंगों ने 300 वर्ष तक, 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक, 33 आंध्रों ने 506 वर्ष तक, 7 गुप्तों ने 245 वर्ष तक राज्य किया। इन सबका वर्णन इतिहास में नाम मात्र ही मिलता है। फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था। इतने महान् सम्राट होने पर भी इनको भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिया गया। अन्य योद्धा तोगा जी, वीरवर कल्लाजी, जयमल जी, जेता कुपा, गोरा बादल, राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छावा, मोहन सिंह मँढाड़, राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस, राव शेखाजी, राव चन्द्रसेन जी दोड़, राव चन्द्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलङ्की, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुण्डीर, बल्लू जी चम्पावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंह तोमर और उनका वंश, झाला राजा मान, महाराजा अनङ्गपाल सिंह तोमर, स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह, सुशीला भाभी,अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्श सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह, ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूङ्गजी, भुरजी, बलजी, जवाहर जी आदि असंख्य वीर बलिदानियों को इतिहास ने विस्मृत कर दिया।

इसी प्रकार 10 मई 1857 को देशवासियों में एक ही जूनून था कि बस अंग्रेजों को भगाना है। जब यह संघर्ष आरम्भ हुआ तो कई लोग तो इतिहास का हिस्सा बन गए, परन्तु असंख्य वह थे जो विस्मृत हो गए।

आशा देवी गुज्जर के पति मेरठ सैनिक विद्रोह में अग्रणी स्थान पर थे। आशा देवी ने 11 मई को अपनी ससुराल तहसील कैराना में संकल्प लिया कि वह हर मूल्य पर अंग्रेजों से मोर्चा लेंगी ? फिर उन्होंने नवयुवतियों की टोली बनाकर उसका संचालन किया। इसके साथ ही उन्होंने एक छापामार हमला करके 13 मई को कैराना के आसपास के सरकारी कार्यालयों एवं 14 मई को शामली तहसील पर हमला बोलकर अंग्रेज सरकार को आर्थिक हानि पहुँचाई।
भगवती देवी त्यागी अद्भुत वीरांगना थीं। उन्होंने मुजफ्फरनगर का नाम रोशन किया था। 22 दिनों तक अपनी टोली के साथ जाकर प्रचार करती रहीं और गाती रहीं कि अंग्रेज अब बस जाने ही वाले हैं। जन जागरण करती थी और फिर अंतत: अंग्रेजों की पकड़ में आ गयी और उन्हें तोप से उड़ा दिया गया।
शोभा देवी ब्राह्मणी वीर योद्धा थीं। इन्होने अपनी महिला टोली बनाई थी और साथ ही जो उनकी टुकड़ी थी उसमें आधुनिक हथियारों से लेकर, तलवार, गंडासा, कृपाण आदि धारण किये गए सैनिक भी थे। एक दिन उनका सामना अंग्रेजी टुकड़ी से हुआ। सैकड़ों की संख्या में पुरुष और कई महिलाओं ने लड़ते-लड़ते प्राण दिए। यह पकड़ में आ गईं और उन्हें फाँसी दे दी गयी।

इस संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने वाली 255 महिलाओं को फाँसी पर चढ़ाया गया था और कुछ लड़ती-लड़ती मारी गयी थीं। हमारे प्रसिध्दि प्राप्त स्वतंत्रता सेनानियों के अतिरिक्त भी ऐसे बहुत से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं जिनके नाम इतिहास की किताबों के पन्नों से गायब हैं या लोग इन लोगों के बारे में बहुत कम जानते हैं, आज ऐसे ही कुछ गुमनाम स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों और शहीदों के बारे में जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है। यह भी हमारे नायक हैं लेकिन ये गुमनामी के अंधेरे में रहे हैं हालांकि जहाँ तक त्याग और तपस्या की बात है तो इन्होंने सुप्रसिद्ध लोगों से कम बलिदान नहीं दिए हैं। उन सभी का उद्देश्य देश को आजादी दिलाना था। इस देश के नागरिक होने के कारण हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि हम उन स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में भी जानें जोकि गुमनामी में रहते हुए देश सेवा का अपना काम करते रहे।

अलीगढ़ में अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान 1804 में ही हो गया था। ऊदैया ने अंग्रेजों की गलत नीतियों से खफा होकर सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। उनकी वीरता के चर्चे आज भी अलीगढ के आस-पास के क्षेत्रो में कहे-सुने जाते हैं। आखिर 1807 में अंग्रेजो ने उन्हें पकड़ लिया और फाँसी दे दी, लेकिन निडर ऊदैया ने अकेले ही अंग्रेजों से लोहा लिया था।

1857 के संघर्ष के समय अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करने वालों में दिल्ली के गाँवों के किसान भी थे। 10 मई 1857 को मेरठ में हुए विद्रोह के बाद उन सैनिकों का पीछा करने वाले अंग्रेज सैनिकों को हरनंदी किनारे बसे गांव के लोगों ने कड़ी टक्कर दी थी। विद्रोही सैनिकों ने 10 मई की रात मेरठ की विक्टोरिया जेल तोड़कर 85 सैनिकों को रिहा कराकर कच्चे रास्ते से दिल्ली की ओर कूच किया।
मातंगिनी हाजरा एक ऐसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थी जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन और असहयोग आंदोलन के दौरान भाग लिया था। एक जुलूस के दौरान वे भारतीय झंडे को लेकर आगे बढ़ रही थीं और पुलिसकर्मियों ने उनपर गोली चला दी। उनके शरीर में तीन गोलियाँ लगीं फिर भी उन्होंने झंडा नहीं छोड़ा और वे 'वंदे मातरम्' ने नारे लगाती रहीं।

स्वतंत्रता के बाद पहली बार सेनापति बापट को पुणे में भारतीय ध्वज फहराने का सम्मान मिला था। तोड़फोड़ और सरकार के खिलाफ भाषण करने के कारण उन्होंने खुद की गिरफ्तारी दी थी। वे एक सत्याग्रही थे जोकि हिंसा का मार्ग नहीं चुन सकता था।
पोटी श्रीरामुलू जो कि महात्मा गाँधी के कट्‍टर समर्थक और भक्त थे। जब गाँधी जी के देश और मानवीय उद्देश्यों के प्रति उनकी निष्ठा देखी तो कहा था कि 'अगर मेरे पास श्रीरामुलू जैसे 11 और समर्थक आ जाएँ तो मैं एक वर्ष में स्वतंत्रता हासिल कर लूँगा’।

भीकाजी कामा के नाम पर वैसे तो देश के कई शहरों में बहुत सारी सड़कें और भवन हैं लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि कामा ने न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया वरन वे भारत जैसे देश में लैंगिक समानता की पक्षधर एक नेता थीं। उन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग लड़कियों के लिए अनाथालय बनाने पर खर्च किया था। वर्ष 1907 में उन्होंने इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस, स्टुटगार्ट (जर्मनी) में भारत का झंडा फहराया था।

बिहार के सीवान नगर के पुलिस थाने पर तारा रानी श्रीवास्तव ने अपने पति के साथ एक जुलूस का नेतृत्व किया था। उन्हें गोली मार दी गई थी लेकिन वे अपने घावों पर पट्‍टी बाँधकर आगे चलती रहीं। जब वे लौंटी तो उनकी मौत हो गई थी। लेकिन मरने से पहले वे देश के झंडे को लगातार पकड़े रहीं।
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को कुलपति के नाम से भी जाना जाता था क्योंकि उन्होंने भारतीय विद्या भवन की स्थापना की थी। वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और विशेष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बहुत सक्रिय रहे थे। स्वतंत्र भारत के प्रति उनके प्रेम और त्याग के कारण वे अनेक बार जेल गए।
लीलापथ पटवारी एक बहुत ही बहादुर, जागरूक, सामाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति एवं अटूट देशभक्त थे। 1902 में राजस्थान के जैसलमेर जिले से आकर सहारनपुर के गाँव सोना अर्जुन पुर में बस गये। अंग्रेजों के विरुद्ध लोगों को जागरूक किया। कई बार अंग्रेजों की नीतियों का विरोध करने पर इनको जेल भी जाना पड़ा।

कमलादेवी चट्‍टोपाध्याय भारत के शुरुआती विद्रोहियों में से एक थे और उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें 14 अन्य लोगों के साथ फाँसी की सजा दी गई थी। उमराव सिंह, मास्टर श्याम मनोहर शर्मा, रामेश्वर सिंह, मास्टर रामजी लाल टेलर, बाबू राम (रि. स्टेशन मास्टर), कमला देवी आदि लोगों ने शामिल होकर आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गाँव के सिपाही ज्ञानचंद यादव व जगमाल सिंह चौहान 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चुशूल घाटी में देश के लिए शहीद हुए।

लिली चक्रवर्ती का संग्राम 1931 में उनकी शादी के महज़ सात दिनों के अंदर शुरू हो गया था जब उन्होंने अपने शादी के गहनों को एक तरफ़ समेट दिया था और भारत की आज़ादी के आंदोलन की मशाल अपने हाथों में थाम ली थी। यह अनकही कहानी है एक ऐसे दंपत्ति की जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी ज़िंदगी की बाज़ी लगा दी और दशकों तक उन्हें जेल की सलाखों के पीछे यातनाएँ सहनी पड़ी। अविभाजित भारत की आज़ादी की इस योद्धा की ज़िंदगी तो गुमनामी में गुज़री ही, उनकी मौत भी गुमनाम ही रह गई। उनकी क़ुर्बानी को ना सिर्फ़ झारखंड में भुला दिया गया बल्कि देश के किसी कोने से भी उनकी मौत पर किसी नेता का कोई शोक संदेश नहीं आया। दुर्गावती देवी 15 अक्टूबर 1999 को संघर्ष करती हुई शहीद हो गई।
डॉ. हेडगेवार युगान्तर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्लवी संगठनों में डॉ. पाण्डुरंग खानखोजे, श्री अरविन्द, वारीन्द्र कुमार घोष, त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे तथा अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षरत क्रांतिकारियों को शरण देने के पुनीत कार्य में लगे रहते थे। भैया जी दाणी, लाला हंसराज गुप्त, श्री भाऊसाहब देशमुख, पं.सातवलेकर जी भी क्रांतिकारियों को आश्रय देकर स्वतंत्रता की इस लड़ाई में अपनी भूमिका निभा रहे थे। रमाकान्त केशव देशपाण्डे उपाख्य बालासाहब देशपाण्डे को आन्दोलन में भाग लेने पर मृत्युदण्ड सुनाया गया। मेरठ जिले में मवाना तहसील पर तिरंगा फहराते स्वयंसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई, अनेक घायल हुए।

ऐसे ही हँसते-हँसते बलिवेदी पर जाने वाले महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस, गणेश दामोदर सावरकर, अशफाक़उल्ला खां, भगवतीचरण वोहरा, अल्लूरी सीताराम राजू, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, हेमू कालाणी, नरसिंहा रेड्डी, बाबू कुंवर सिंह, चितरंजन दास, रानी गाइडिलू, अनंत लक्ष्मण कन्हेरे, अम्बिका चक्रवर्ती, प्रफुल्ल चाकी, बीना दास, राजेन्द्र लाहिड़ी, ऋषि अरविन्द घोष, पंडित बालकृष्ण शर्मा, सागरमल गोपा, महादेव गोविन्द रानाडे, पुष्पलता दास, गरिमेला सत्यनारायण, जतिंद्र मोहन सेन गुप्ता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, पोट्टी श्रीराममल्लू, कनेगंती हनुमंतु, पर्बत गिरी, वेलु नाचियार, सेनापति बापट, नीलीसेन, तारारानी श्रीवास्तव, सुचेता कृपलानी, कुशल कंवर, रानी चिन्म्मा, तिरुपुर कुमारन आदि और भी बहुत से ऐसे वीर हैं जिनके सतत् संघर्ष व प्रयासों से ही हम सब आन्नद का जीवन जी रहे हैं। हम सबका नैतिक व राष्ट्रीय कर्तव्य है कि हम अपने गुमनाम योद्धा को भी अपने हृदय में वही सम्मान दे जो अपने नायक देशभक्तों को देते हैं। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी इन रणबाँकुरों से परिचित हो सके और आजादी का 75 वाँ अमृत महोत्सव सार्थक हो सके।

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अपनी  कविताएँ / ग़जल 
 
 
  "  ३ - ग़ज़लें " 
 
 
 
 
   ३ - ग़ज़लें
 
ग़ज़ल-1
 
बहुत कठिन है बहुत सरल है
जीवन धूप छाँव का छल है
सोचो तो जंगल भी बस्ती
वरना बस्ती भी जंगल है
पाषाणों को भी पिघला दे
वो बस आँखों का ही जल है
ये काया गागर है तो फिर
प्रेम इसी गागर का जल है
जो मृत्यु से भी लड़ जाये
उसका जीवन सहज सफल है
जो दुख अपनी समझ न आये
समझो करनी का ही फल है
 
 
 
 द्वारा - डॉ. रामगोपाल
 
डॉ. रामगोपाल भारतीय गज़लकार, गीतकार, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य हैं।
 
 
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 ग़ज़ल-2
फिर नई चाल ये चल देंगे जमाने वाले
झूठ को सच मे बदल देंगे जमाने वाले
अपने नापाक इरादों को सजाने के लिए
फूल कलियों को मसल देंगे जमाने वाले
तय हुआ जख्म का मिलना तेरे भोलेपन को
अब नहीं देंगे तो कल देंगे जमाने वाले
प्यार करने की तमन्ना है तो करना लेकिन
तेरे अरमान कुचल देंगे जमाने वाले
देख ले बनके भी सूरज कि तेरे ढलने पर
तुझसे मुँह फेरके चल देंगे जमाने वाले
 
 ग़ज़ल-3

मिला है जहर पर संभाले बहुत हैं
कई साँप हमने भी पाले बहुत हैं
हमारी नजर से भी देखो कभी तो
अंधेरों में भी तो उजाले बहुत हैं
ये सन्नाटा क्यों है तुम्हारी गली में
सुना है बड़े नाम वाले बहुत हैं
कड़ी धूप में मेरे गम बाँटने को
मेरे पाँव के सुर्ख छाले बहुत हैं
नजर आ रहे हैं जो उजले से तुझको
जरा गौर से देख काले बहुत हैं
***
 
 
 
 
   बहुत दूर जाना है ..!
 
 बहुत दूर जाना है ..!
ये तेज़ रफ़्तार कर दे थोड़ी धीमी,
थक गए है हम, ए जिंदगी !
खुशियों के क़र्ज़ उतरना बाकि है
अभी कुछ फ़र्ज़ निभाने बाकी हैं

 
 
 
 द्वारा - श्री प्रकाश सिन्हा
 
श्री प्रकाश सिन्हा “इंडिया इंटरनेशनल”, मासिक पत्रिका के संपादक है। यह पत्रिका क्लीवलैंड, ओहियो, संयुक्त राज्य अमेरिका से में प्प्रकाशित होती है।
 
 
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रुलाने वालों की यादें बाकि है
कुछ रंज-औ-ग़म भुलाने बाकी है
कुछ दर्द-ई-इश्क़ मिटाना बाकी है
एक बार फिर से मुस्कुराना बाकी है
कहानी जिंदगी की अभी तो अधूरी है
कुछ दिल के अरमान अभी बाकी हैं
कुछ जख्मों पे मरहम लगाना बाकी है
कुछ आखों से आँसू चुराना बाकी है |
***
 
 
अपनी कहानियाँ  
 
 
“पिता”  
 
 
 
 
    पिता
 
 
 
 
  द्वारा- प्रो० अनिल कुमार
 
प्रो० अनिल कुमार, जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) से 2016 में प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष के रूप में अवकाश प्राप्त हैं। विज्ञान के विद्यार्थी होते हुई भी हिंदी से लगाव है और हमेशा कार्यरत हैं।
 
 
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पाठकों, आइए आपका परिचय अपने छोटे से परिवार से कराऊँ, मैं सर्वेश एक पत्रकार हूँ, देश की राजधानी से प्रकाशित एक महत्वपूर्ण समाचार पत्र के ‘ऑन-लाइन’ संस्करण में कार्य करता हूँ और मेरी पत्नी है रेवथी (नाम से आप समझ ही गए होंगे कि वह दक्षिण भारत से है। जहाँ ‘त’ की जगह अक्सर ‘थ’ का प्रयोग किया जाता है); रेवथी भी उसी समाचारपत्र के ‘प्रिन्ट’ संस्करण के संपादकीय टीम की सदस्या है। स्पष्ट है मेरा कार्य कंप्युटर के सामने होता है तो उसे समाचार इत्यादि एकत्र करने के लिए सतत गतिमान रहना पड़ता है। एक बार एक सहकर्मी ने हँसते हुए कहा भी, “तुम दोनों के लिए ही वह गाना बना है – अंगना में बाबा, दुआरे पे माँ...” पर यह स्थिति तो शुरू से रही है, मेरा मतलब है हमारे कॉलेज के ही दिनों से। मैं एक शांत अंतर्मुखी विद्यार्थी और दूसरी तरफ तेज तर्रार बाह्यमुखी रेवथी; सबों को आश्चर्य होता कि आखिर वह कौन सा ‘फैविकोल’ था जिसने हमें बाँधे रखा। पढ़ने में दोनों ठीक-ठाक ही थे पर व्यक्तित्व में 36 का आंकड़ा। एक बार हमारे मनोविज्ञान के शिक्षक ने बताया था, “प्रत्येक मनुष्य अपने जोड़ीदार (Partner) में अक्सर उन गुणों की तलाश करता है जिसकी कमी वह अपने अंदर पाता है”। शायद इसी मानसिक स्थिति ने हमें पास आने की प्रेरणा दी; हाँ एक समानता अवश्य थी, हम दोनों सदैव विश्वविद्यालय में एवं अन्यत्र आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी, अपने महाविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते थे, पर इनमें भी हमारे विचार परस्पर विरोधी ही रहते। यह भी संयोग था कि पढ़ाई पूरी करते करते हमें एक ही संस्था में मनचाही नौकरी मिल गई और फिर कुछ मित्रों के प्रयास से हम ने 36 के आँकड़े को 63 में बदल डाला। बहुतों को उम्मीद थी कि यह “संयुक्त उद्यम (joint venture)” ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाएगा, पर सबों को निराश करते हुए हम अब तक 20 वर्षों की “लंगड़ी दौड़” पूरी कर चुके हैं। जब प्रारंभ किया था तो दो ही थे, आज एक बार पुनः उसी अवस्था में पहुँच चुके हैं क्योंकि दोनों बच्चे अपनी-अपनी पसंद की पढ़ाई करने अलग-अलग शहरों में जा चुके हैं, साल मे एक या दो बार ही मुलाकात होती है। भविष्य का नारा शायद “हम दो हमारे दो” से जल्द ही “बस हम ही दो” बनने के कगार पर हैं।
तो इतना परिचय काफी है उस बात के लिए जो आज आप सबों के साथ साझा करने का इरादा रखता हूँ। हाँ, एक आखिरी बात; रेवथी को मैंने अपनी सुविधा के लिए ‘रेवा’ बना दिया है और उसने मेरा नामकरण सर्वेश से ‘सुवि’ कर दिया है। बात एक सप्ताह पूर्व की है, प्रतिदिन की तरह मैं तो संध्या 6 बजे घर पहुँच गया और उसका इंतजार करने लगा; आज हमें एक पार्टी में जो जाना था। उसने भी वादा किया था कि वह साढ़े-छः तक अवश्य घर पहुँच जाएगी, मगर अन्य दिनों की तरह आज भी वह समय पर न पहुँच सकी। वैसे भी आजकल संसद का सत्र चल रहा था और उसे एक विशेष प्रोग्राम के लिए एक सांसद महोदय (जिन्हे वह अंकल कहती थी) का साक्षात्कार लेना था। फिर भी मैंने सोंचा तैयार रहूँ ताकि वह जब भी आए हम तुरत निकल सकें। पर मेरे इंतजार की अवधि बढ़ती जा रही थी और उसी के साथ मेरी बेचैनी भी, घड़ी देखते हुए हर आधे घंटे पर मैं चाय बनाता, आधा पीता और आधा सिंक के हवाले कर देता। देखते देखते रात के 10 बज गए, अब मुझे दूसरी चिंता सताने लगी; पता नहीं हम सबों के बेबाक लेखन/प्रस्तुतीकरण से कब कौन “बड़ा आदमी” खफा हो जाए और.... मैं आगे कुछ सोंचना नहीं चाहता था सिवा इसके कि अब कुछ मित्रों को फोन करूँ। तभी कॉल बेल बजा और मैंने लगभग दौड़ते हुए दरवाजा खोला।
“यार रेवा, एक फोन तो कर सकती थी कि तुम्हें पहुँचने में देर होगी।”
“सुवि, तुम्हारी यही बात मुझे सालती है, उम्मीद कर रही थी कि तुम दरवाजा खोलते मुझ पर बरस पड़ोगे पर एक तुम हो .. ; अरे कभी तो एक भारतीय पति की तरह ब्यवहार करो नहीं तो जब चली जाऊँगी तो अफसोस ही रह जाएगा कि ऐसा क्यों नहीं किया।”
“अच्छा, अब नाटकीयता छोड़ो, यह बताओ इतनी देर क्यों लगी; यदि सांसद महोदय, सॉरी, मेरा मतलब है अंकल, की कोई अतिरिक्त व्यस्तता थी तो लौट आती कल भी तो साक्षात्कार हो सकता था।”
“सही है, पर साक्षात्कार जैसी कोई बात थी ही नहीं, उन्होने एक निजी मामले में सहायता हेतु मुझे साक्षात्कार के बहाने बुला लिया था।”
“कमाल है यार, तुम इतनी प्रभावशाली कब से हो गयी कि एक सांसद तुम से सहायता माँगने लगे; क्या मंत्रिमंडल के अगले “उलट-फेर (reshuffle)” मेँ तुम्हें कोई मंत्री पद मिलने की संभावना है?”
“भूल गए क्या – ‘..........जहाँ काम आवे सूई कहाँ करे तलवार’, अरे हम जैसे भी कभी कभी बड़े लोगों के काम आ जाते हैं यार. वैसे मेरा भी कुछ स्वार्थ है; तुम जानते हो न कि अंकल प्रधानमंत्री के कितने करीबी हैं; उन्होने मुझे “पीएम” के साथ एक “एक्सक्लूसिव इंटरव्यू” के लिए समय दिलाने का वादा किया है।”
“अच्छा छोड़ो इन बातों को, अब यह तो बता दो कि उनका कौन सा काम था जिसमें तुम्हारे सहयोग की आवश्यकता आ पड़ी?”
“अभी ‘राज को राज रहने दो’¸ कल सुबह सारी बातें होंगी, अभी मैं बहुत थक गयी हूँ, विशेष रूप से मानसिक तौर पर. चलो अब खाना खाया जाए; मैं साथ में पिज्जा लेती आई हूँ, इस वक्त खाना बनाने की ताकत मुझ में नहीं रह गई है।”
मैं ने भी बात को वहीं समाप्त करना बेहतर समझा और खाने की मेज पर हम दोनों आज टीवी पर चलाए जा रहे “हॉट ब्रेकिंग न्यूज” को देखते हुए ठंढा होते पिज्जा के टुकड़ों को उदरस्थ करने लगे।
सुबह देर से जागे क्योंकि आज रविवार होने के कारण प्रेस भागने की जल्दी नहीं थी, नित्यक्रिया से मुक्त हो चाय की चुस्की के साथ कल की बात को रेवा ने ही आगे बढ़ाया,
“अच्छा बताओ, तुम्हारे विचार में पिता कहलाने का अधिकार किसे है, उसे जिसका ‘स्पर्म’ माँ के ‘अंडे‘ से मिलकर बच्चे के वजूद को इस दुनियाँ में लाता है या उस पुरुष को जो उसका “डीएनए” जाने बगैर उसकी परवरिश करता है?’
“यह कैसा प्रश्न है, क्या ये दोनों एक ही नहीं होते? हाँ, कभी कभी जब माँ-बाप अलग हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति आती है और तब जो उसका लालन-पालन करे वही पिता कहलाने का हक रखता है।”
“ठीक है, मगर क्या तुम यह नहीं जानते कि पश्चिमी मुल्कों में ही नहीं हमारे देश में भी एक अच्छी संख्या में ऐसे बच्चे बहुत से घरों में पल रहे हैं जहाँ ये दोनों “पिता” अलग अलग हैं. शायद इसकी जानकारी केवल माँ के पास हो, या शायद वह भी निश्चित तौर पर न कह सके कि बच्चे का “जैविक पिता (Biological Father)” कौन है. प्रश्न बेहद विचलित करने वाला है, मगर ऐसी संभावना को क्या तुम पूरी तरह नकार सकते हो।”
“देखो, इसके जवाब की ओर तुम ने ही ईशारा कर दिया. तुम ने एक शब्द का प्रयोग किया – “जैविक पिता”; तो चलो मैं एक दूसरे शब्द का निर्माण करता हूँ – “सामाजिक पिता (Social Father)”. स्पष्ट है महत्व तो उसका है जो माँ द्वारा प्रदत्त बच्चे के डीएनए पर बगैर कोई प्रश्न उठाए उसे अपना लेता है. दूसरे शब्दों में जो पिता-धर्म का निर्वाह करे पिता तो वही है, एक सेकंड से भी कम समय में स्त्री-शरीर के भीतर होने वाले एक जीव-वैज्ञानिक प्रक्रिया को क्यों इतना महत्व देना?”
“फिर हमारा समाज “वंश-वृक्ष” और “पारिवारिक परंपराओं” को आगे बढ़ाने वाली बात पर इतना जोर क्यों देता है?”
“ये सारे शब्द शायद इसलिए प्रयोग में आए ताकि समाज में “अनाचार” और “अव्यवस्था” न फैले, लोग दांपत्य की गरिमा का ख्याल रखें।”
“मैं थोड़ी दिग्भ्रमित हूँ सुवि; एक तरफ तो तुम सामाजिक पितृत्व को तरजीह दे रहे हो और दूसरी तरफ तुम “अनाचार” और “सामाजिक अव्यवस्था” के विरोध में भी खड़े दिखते हो. जब किसी बच्चे का “जैविक” और “सामाजिक” पिता दो हो तो क्या उसमें “अनाचार” अंतर्निहित नहीं है ?”
“शायद मैं अपनी बात ठीक से समझा नहीं पाया. देखो, विज्ञान के नियम बड़े “अनम्य और सार्वभौमिक (Rigid & Universal)” होते हैं, मगर “भाषा के नियमों (अर्थात ब्याकरण)” में कठोरता होते हुए भी कुछ अपवाद स्वीकार्य है. ठीक उसी तरह “जीवन का ब्याकरण” भी अपवादों के बगैर नहीं चल सकता; मैं जिसकी वकालत कर रहा हूँ उसे तुम नियम नहीं अपवाद मानो और तब सोचो क्या मेरी बातों में अंतर्विरोध है? खैर, ये “वैचारिक पिंग-पोंग” तो हम बहुत खेल लिए, अब क्यों नहीं मुद्दे की बात की जाये, अन्यथा हमें फिर अगले रविवार तक इन्तजार करना पड़ेगा।”
“सही है, देखो बात एक ऐसे डॉक्टर-दंपति की है जिनसे तुम भी अच्छी तरह से परिचित हो; यह अलग बात है कि अपनी-अपनी व्यस्तता और पिछले दो वर्षों के “आयातित वाइरस” के कारण हमारा मिलना नहीं हुआ। मैं बात अपने स्कूल के मित्र डॉ. काव्या की कर रही हूँ। जानते ही हो वह और उसका पति डॉ. रजनीश (जिसे काव्या सहित हम सब राज नाम से बुलाते हैं) इसी नगर के दो अलग-अलग अस्पतालों में कार्यरत हैं। दोनों की जिंदगी मजे से गुजर रही थी, अपने घर में अपनी बेटी नव्या के साथ दोनों काफी खुश थे, जबतक यह आफत न आन पड़ी। इसी क्रम में मुझे कल ही पता चला कि सांसद अंकल काव्या के पिता के “लंगोटिया यार” हैं, दोनों परिवारों में रिश्तेदारी भी है और वह भी निकट की। कुछ ही माह पूर्व काव्या ने अचानक अपने पति से संबंध-विच्छेद का बम फोड़ दिया, और वह भी बिना कोई कारण बताए। इसके साथ एक और परेशान करने वाली बात यह हुई कि मेरी वाचाल मित्र अचानक “मौनव्रती” हो गयी; यह स्पष्ट दिख रहा था कि उसका फैसला सामान्य स्थिति में लिया गया निर्णय नहीं था, अवश्य किसी जबदस्त दवाब के तहत वह ऐसा अप्रिय “हठ” कर रही थी। खैरियत यह है कि अबतक इस खबर की जानकारी चुनिन्दा लोगों को ही है, पर ऐसी बातें देर तक छुपती कहाँ है। दूसरी तरफ काव्या ने तो जैसे कुछ न बोलने की कसम खा रखी हो, उसने बस एक ही रट लगाए रखा है, “मुझे पति से कोई शिकायत नहीं, पर हम दोनों अब साथ नहीं रह सकते; मैं अपनी बेटी को लेकर अलग हो जाऊँगी और आगे की जीवनयात्रा अपनी मर्जी से तय करूँगी” जब लगा कि बात परिवार अदालत (Family Court) पहुँच सकती है तब उसके पिता के आग्रह पर अंकल ने इसके समाधान हेतु मुझे, यानि काव्या के बचपन के मित्र से गुहार लगाई।”
“मगर एक बात मैं नहीं समझ पाया; यह जो जैविक-पिता और सामाजिक-पिता की चर्चा की हम ने उसका इस मामले से क्या संबंध? कहीं तुम यह तो नहीं .....”
“जी हाँ, पत्रकार महोदय, आपने सही समझा; उस परिचर्चा का सीधा संबंध काव्या, राज और उनकी बेटी नव्या से जुड़ा है। मुझे सारी बातें चार दिन पहले ही बताई गयी थी और तब मैंने शायद चार वर्षों बाद काव्या को फोन किया था। तत्पश्चात कल ही काव्या को अंकल के निवास पर बुलाया गया और उससे विस्तार से इस मामले पर बहस हुई - चर्चा नहीं, बहस। इस बैठक में काव्या ने जो कहा वह सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी, “मेरा पति मेरी बेटी का जैविक पिता नहीं है, अब मैं उसे और धोखा नहीं दे सकती, मैं उसके साथ नहीं रहूँगी और अपनी बेटी को ले कर ऐसी जगह चली जाऊँगी जहाँ मुझे कोई न जानता हो। ऐसा सुनते आंटी, सांसद अंकल की पत्नी, तो रोने लगी और अंकल अपना सर झुकाये कमरे से बाहर निकल गए।”
“तुम ने यह नहीं पूछा कि अचानक उसका अपराध बोध बेटी के जन्म के ग्यारह वर्ष बाद कैसे जग गया? नहीं रेवा, मेरी समझ से मामला कुछ और है; काव्या पर कोई बहुत बड़ा दवाब है, या वह किसी भयादोहन (blackmail) की शिकार है। खैर, फिर आगे क्या हुआ?”
“होना क्या था, थोड़ी देर बाद अंकल कमरे में वापस आए, आंटी को चाय बनाने को कहा; चाय पीने के बाद उन्होंने काव्या को इस शर्त पर जाने दिया कि जबतक वे मामले की स्वयं पूरी तहक़ीक़ात नहीं कर लेते वह परिवार अदालत जाने की गलती नहीं करेगी और तबतक मेरे संपर्क में रहेगी और उसके जाने के बाद उन्होंने मुझ पर अपने बचपन के दोस्त को समझाने और इस संकट से पूरे परिवार को उबारने की ज़िम्मेदारी डाल दी; इतना विचलित होते मैंने उन्हे कभी नहीं देखा था। आज उसी सिलसिले में मैंने काव्या को यहाँ बुलाया है; अब यह केस तुम्हारे हवाले, क्योंकि यह कार्य तुम्हारे सिवा कोई कर ही नहीं सकता बीस वर्षों में मैं तुम्हारा भीतर-बाहर सब समझ चुकी हूँ, और इसी कारण मुझे काव्या को इस दलदल से निकालने में तुम्हारा सहयोग चाहिए. देखो यार, “यदि एक बसे बसाये परिवार का अकारण टूटना और किशोरावस्था में कदम रखती एक मासूम लड़की की जिंदगी का तबाह होना” – तुम्हें विचलित नहीं करते तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना, अन्यथा यह कार्य तो करना ही होगा।”
मैं क्या कहता, जब अंकल ने रेवा पर इतना भरोसा किया है तो इन गुत्थियाँ को सुलझाना ही होगा, साथ ही काव्या के दाम्पत्य जीवन को तबाह करने की कोशिश करने वाले इंसान का चेहरा भी सामने आना ही चाहिए। रेवा ने फिर चाय बनाई, चाय की चुस्की के साथ हम काव्या का इंतजार करने लगे। काव्या अपने निर्धारित समय ठीक दस बजे पहुँच गयी; थोड़ी औपचारिक बातें करने के पश्चात हम अपने बेड रूम की ओर बढ़ चले, न जाने कब कोई बिन बुलाया मेहमान दस्तक दे दे। बात मुझे ही शुरू करनी पड़ी,
“काव्या, आज जो कुछ मैंने जाना स्पष्टतः वह असामान्य बात है. मेरी समझ से कोई तुम्हारा भयादोहन कर रहा है, पूरे मामले में तुम्हारी चुप्पी भी यही कह रही है. अतः तुम से आग्रह है कि यदि तुम्हें अपने बचपन के मित्र रेवा, जिसे तुम बहन की तरह समझती रही हो, पर भरोसा है तो प्लीज बेझिझक हमें उस घटना की पृष्टभूमि से अवगत कराओ जिसने तुम्हें इस हालात में पहुँचा दिया। यदि मेरी उपस्थिती से तुम्हें परेशानी महसूस होती हो तो मैं थोड़ी देर के लिए बाहर ताजी हवा खाने निकल जाऊँगा ताकि तुम अपना सम्पूर्ण दर्द अपनी सहेली के सामने उड़ेल सको। मगर याद रहे, तुम यह नहीं कह सकती कि “यह तुम्हारा निजी मामला है”; क्योंकि तुम से ज्यादा जिनकी जिंदगी इस बात से प्रभावित होने जा रही है वे हैं तुम्हारे पति और तुम्हारी बेटी सामाजिक अथवा न्यायिक, दोनों प्रक्रियाओं के तहत तुम्हें इन दो निर्दोषों को सजा देने का कोई अधिकार नहीं है।”
“देखो सुवि, रेवा के रिश्ते से मैंने तुम्हें सदा एक मित्र के अतिरिक्त अपना बहनोई भी माना है, अतः तुम्हारी उपस्थिती में मुझे खुल कर बात करने में कोई परेशानी नहीं। साथ ही यह भी जानती हूँ कि तुम दोनों अंकल द्वारा दी गयी ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हो। पर एक बात समझ लो, मैंने बहुत सोच विचार के बाद यह फैसला लिया है - मुझे अपने पापों का प्रायश्चित करना ही होगा। मैं जानती हूँ मेरे परिवार अदालत जाने पर राज द्वारा विरोध किया जाएगा और उस क्रम में उसका वकील मुझे सरेआम “नंगा” कर देगा; ऐसा न मैं चाहूंगी और शायद न राज। इसी कारण मैं चाहती हूँ कि मुझे समझाने की जगह तुमलोग राज से बात करो, उसे परस्पर सहमति से तलाक के लिए तैयार कराओ। तलाक के बाद मुझे उससे अपनी बेटी के सिवा और कुछ नहीं चाहिए; फिर वह उसका वास्तविक पिता भी तो नहीं . . . . .”
काव्या अपना वाक्य भी पूरा न कर पाई; उसके भीतर जो कष्ट, अवसाद और घुटन इतने दिनों से भर रहा था वह आँखों के रास्ते बह चला, ऐसे मौके पर किसी अपनों के कंधे की जरूरत महसूस तो होती ही है, अभी रेवा से ज्यादा उसका अपना कौन था? थोड़ी देर रोने के पश्चात जब वह सामान्य हुई तो मैंने ही पूछा, “तुम ठीक तो हो, हम आगे बढ़ें?”
उसकी सहमति मिलने पर मैंने बातचीत की डोर को वहाँ से पकड़ा जहाँ काव्या ने उसे छोड़ा था,
“तुमने जो भी कहा, उसके बावजूद क्या तुम इस बात से इंकार कर सकती हो कि तुम्हारी बेटी और उसके अपने “पिता” राज के बीच स्नेह का एक अटूट बंधन है? तुम्हारा यह कदम उनकी ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करेगा इसपर तो तुमने अवश्य विचार किया होगा? खैर,पहले यह बताओ कि जब यह “राज” राज के समक्ष तुमने पहली बार खोला तो उसकी प्रतिक्रिया क्या थी?”
“मेरी बात सुन वह थोड़ी देर के लिए चुप हो गया, लगा जैसे किसी गहरी सोंच में खो गया हो, फिर बड़े शांत भाव से उसने कहा, तुम मेरी पत्नी हो और मेरी समझ से पति-पत्नी का रिश्ता इतना भी कमजोर नहीं होता कि किसी एक की मूर्खतापूर्ण गलती उसे पल में ध्वस्त कर दे। मैं पूरी बात तो नहीं जानता क्योंकि तुम अभी भी उस कारण को नहीं बतला रही जिसने तुम्हें इस निर्णय तक पहुँचाया , पर मुझे लगता है कोई निकृष्ट इंसान किसी “अनहोनी” का लाभ उठा तुम्हें “ब्लैकमेल” करने की कोशिश कर रहा है। काश, तुमने मुझ से इस हादसे को पहले ही साझा किया होता तो बात हमारे अलग होने तक नहीं पहुँचती। फिर भी एक बात अच्छी तरह से समझ लो काव्या, मैं अपनी बेटी को किसी हालत में स्वयं से जुदा नहीं होने दूँगा। नव्या गत ग्यारह वर्षों से मेरी बेटी थी, है और रहेगी; पिता का कर्तव्य पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है मैंने, कोई मुझ से उसे छीन नहीं सकता, तुम भी नहीं। और यह “जैविक पिता” न होने वाली बात कह कर तुम मेरे निर्णय को बदल नहीं सकती। जहाँ तक हम दोनों के साथ रहने या न रहने का प्रश्न है तो अलग होने की बात तुम कर रही हो मैं नहीं; मेरी समझ से इस बिन्दु पर तुम्हें ठंढे दिमाग से सोंचने की जरूरत है, हाँ तुम्हें सही निष्कर्ष पर पहुँचने में मैं सदैव मदद करने को तैयार हूँ, बस तुम्हें अपने दिमाग को खुला रखना होगा।”
“तुम स्वयं सोचो काव्या, एक तरफ है राज की समझदारी और दूसरी तरफ तुम्हारी नादानी; मेरे लिए यह एक अबूझ पहेली सा है क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि महिलाएं पुरुषों से ज्यादा ब्यावहारिक और दुनियादार होती हैं। खैर, यह बताओ इसके बाद क्या तुमने राज को उस “दुर्घटना” के विषय में विस्तार से बताया, विशेष रूप से उस खलनायक के बारे में जिसने पूरे कुकर्म की पटकथा तैयार की थी?”
“नहीं, मैं हिम्मत नहीं कर पाई और उठ कर चल दी, न मैं उससे आँखें मिला पा रही थी और न कुछ कहने की स्थिति में थी।”
“तो ठीक है, आज तुम स्वयं हम दोनों के समक्ष सारी बातें राज को बताओगी, फिर सुनते हैं उसकी प्रतिक्रिया। रेवा, चलो राज को फोन करो और उसे तुरत आने को कहो। तुम्हें तो इस स्थिति का अंदाजा था, तभी तो उसे भी आने के लिए तैयार रहने को तुमने कह दिया था।”
काव्या रेवा द्वारा राज को बुलाने का विरोध करती रही, मगर मैंने कुछ नहीं सुना; आधे घंटे से भी कम समय में राज हमारे बीच था. एक बार फिर काव्या का रोना धोना शुरू हुआ, मगर हमारे दवाब पर उस पर हुए अत्याचार की कहानी तो उसे बतानी ही थी। सर झुकाये, सबों से नजरें चुराये काव्या ने अत्यंत धीमे स्वर में कहना शुरू किया,
“ठीक है, शायद सब बता कर मैं भी कुछ हल्का महसूस करूँ। तो सुन ही लो मेरा पाप, इस दुखद प्रसंग का जन्म अस्पताल में मेरे सरल स्वभाव के कारण हुआ और इसका “खलनायक” मेरा ही एक कनीय सहकर्मी है जिसे मैंने सदा अपना मित्र समझा। हमें महीने में एक सप्ताह “रात्रि-ड्यूटि” करनी पड़ती है जिसमें एक पुरुष और एक महिला चिकित्सक पूरी रात वार्ड में तैनात रहते हैं; महिला डॉक्टर को अपनी सुविधानुसार पुरुष सहकर्मी चुनने का अधिकार दिया जाता है। इस सहकर्मी को मैंने ही चुना था क्योंकि वह कॉलेज के दिनों से ही मेरा जूनियर था और मुझे लगता था कि मैं उसे अच्छी तरह जानती हूँ; मेरे मन में उसके प्रति प्रारम्भ से ही स्नेह का भाव था। चिकित्सकों के लिए वार्ड से जुड़ा सभी सुविधाओं से युक्त एक विश्राम-कक्ष भी होता है जहाँ आवश्यकता पड़ने पर वे थोड़ा आराम कर सकते हैं। एक रात हम दोनों ड्यूटी पर थे, संयोग से उस रात ऐसा कोई मरीज भी वार्ड में नहीं था जिसकी स्थिति नाजुक हो। हम विश्राम कक्ष में ही सोफ़े पर बैठे थे; मैं थोड़ी देर के लिए “रेस्ट रूम” गयी और लौटी तो मेरा कनीय सहकर्मी दो कप चाय मँगवा चुका था। बातचीत करते हुए हम चाय की चुसकियाँ लेने लगे; थोड़ी ही देर बाद मेरी आँखें झपकने लगी और फिर मुझे कुछ याद नहीं। जब मेरी आँखें खुली तब अपनी अवस्था देखकर मुझे समझते देर नहीं लगी कि मेरे साथ क्या हुआ था और यह किस की कारस्तानी थी। मैं बिस्तर पर ही बैठी देर तक रोती रही, फिर उठी अपने कपड़े संभाले और पानी से अपना चेहरा साफ किया; कक्ष से बाहर निकली तो उस सहकर्मी का कोई अतापता नहीं था। सुबह होने ही वाली थी, ड्यूटी समाप्त हुई और मैंने घर का रास्ता पकड़ा, रास्ते भर यही सोंचती रही, मुझे क्या करना चाहिए; उस समय की तुम सब मेरी मानसिक अवस्था समझ सकते हो।”
“तुम ने रजनीश को यह सब क्यों नहीं बताया?”
“मैं इस दुर्घटना के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानती, अतः हिम्मत ही नहीं हुई कि उस वक्त राज से कुछ कहूँ, यद्यपि प्रति दिन सोचती कल कहूँगी, पर वह कल कभी नहीं आया; आई लगभग दस महीने बाद मेरी बेटी। अबतक तो मैं केवल खुद के प्रति घृणा के भाव से भरी थी, अब मुझे घृणा करने के लिए कोई और भी मिल चुका था, वह थी मेरी बेटी नव्या। मैं उसे देखना नहीं चाहती थी, मगर सारी बातों से अनजान रजनीश इस बेटी का ख्याल कुछ इस तरह से रखते जैसे वे उसकी माँ हों। यह बात याद आते मैं अपराध बोध से भर उठती, पर समझ नहीं पाती कि करूँ तो क्या?”
“मगर तुमने यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि तुम्हारी बेटी का पिता रजनीश नहीं वह ‘भेड़ की खाल ओढ़ने वाला भेड़िया’ ही है।”
“पता नहीं, शायद उसके जन्म का समय और मेरा अपराध बोध, इन्ही दो कारणों से मैंने ऐसा मान लिया। मगर डीएनए टेस्ट रिपोर्ट से तो सब कुछ स्पष्ट हो चुका है, अब तो कोई उलझन ही नहीं रही।”
“उसपर तो हम बाद में विचार करेंगे, पहले यह बता दो कि नव्या के प्रति अचानक तुम्हारे अंदर प्यार कैसे उमड़ पड़ा, साथ में यह भी स्पष्ट करो कि ग्यारह वर्षों बाद इस अपराध बोध के जागृत होने का कारण क्या है?”
“उस दुष्टात्मा ने मुझे यहीं नहीं बख्शा, जब मर्जी होती रजनीश की अनुपस्थिति में मेरे घर चला आता और मुझे बदनाम करने का डर दिखा अपनी मनमानी कर लेता। इसे संयोग ही कहेंगे कि एक दिन मेरी पुरानी सहेली जो दिल्ली में ही डीसीपी है मेरे घर आई थी और हम बात कर रहे थे, तभी वह तथाकथित सहकर्मी आ पहुँचा, मगर मेरी सहेली को देख उसके भीतर का चोर सावधान हो गया और वह उल्टे पाँव लौट गया। इससे मुझे थोड़ी हिम्मत बँधी और तब मैंने स्पष्ट शब्दों में उस दुर्घटना को महिला थाना तक पहुँचाने की धमकी दे डाली; फिर उस पतित से पीछा छूटा। धीरे धीरे मैं अपने साथ हुई दुर्घटना को भूलने लगी, साथ ही इस बात का भी एहसास होने लगा कि मेरी गलती की सजा मेरी बेटी क्यों भुगते। हाँ, मैंने उस अस्पताल को छोड़ दूसरी जगह नौकरी कर ली ताकि मैं उससे दूर हो सकूँ। सब कुछ ठीक चल रहा था मगर मेरा दुर्भाग्य, आज से लगभग एक वर्ष पूर्व उसकी बेवफाईयों से तंग आकर उसकी डॉक्टर पत्नी ने पश्चिम-एशिया के किसी मुल्क के एक अस्पताल में नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और अपने दोनों बच्चों के साथ गायब हो गयी। उसके बाद उसने अपनी बीबी और बच्चों को बहुत खोजा मगर सफल नहीं हो सका। तब उसकी नजर एक बार फिर मुझ पर गयी और . . . . .”
“.... और तब उसने धमकी दी कि तुम उसकी हो जाओ अन्यथा वह दुनिया को तुम्हारी बेटी के “असली पिता” का राज बता देगा, प्रमाण में पेश कर दिया एक झूठा डीएनए टेस्ट-रिपोर्ट; सही कह रहा हूँ न मैं काव्या? प्लीज, एक बार चुप रह कर तुम ने स्वयं को “ब्लैकमेल” होने दिया, अब तो वह गलती मत करो। एक समझदार पति, एक प्यारी सी बेटी, इन्हे छोड़कर उस अमानुष से शादी करोगी जिसने तुम्हें इस हाल में पहुँचा दिया?”
“शादी करेगी मेरी जूती; मैं तो बस उससे दूर, बहुत दूर जाना चाहता हूँ. . . .”
काव्या अपनी बात भी पूरी न कर पाई और फूट फूट कर रोने लगी। रेवा उसे सांत्वना देने और चुप कराने के लिए उद्यत हुई, पर मैंने उसे इशारे से मना किया,
“रेवा, उसे रो लेने दो, कुछ तो हल्का होगा उसका मन।”
जब वह शांत हुई तो मैं राज की ओर मुखातिब हुआ,
“क्या कहते हो डॉक्टर?”
“क्या कहूँ मैं, इसे कहते हैं मूर्खता की पराकाष्ठा; यह बात तुम्हें सबसे पहले मुझे बताना चाहिए था काव्या । शायद मुझे में ही कुछ कमी रह गयी होगी जिससे तुमने मेरे उपर भरोसा नहीं किया, क्या तुम्हारी नजर में हमारे बीच मात्र शरीर का संबंध था, इतने वर्षों बाद भी क्या हम “आत्मीय” नहीं हो पाये थे?”
यह सुनते काव्या फिर एक बार रो पड़ी,
“नहीं राज, तुम बिल्कुल “पर्फेक्ट” हो, शायद जरूरत से ज्यादा। मैं अपराधी थी राज, किस मुँह से तुम से यह सब कहती?”
“कमाल है रेवा, तुम्हारी दोस्त तो डॉक्टर ही नहीं एक जज भी है; गलती किसी की और अपराधी घोषित कर दिया स्वयं को। अच्छा है तुम न्यायिक सेवा में नहीं गयी, अन्यथा तुम्हारी अदालत में बलात्कार का दोषी मुलजिम नहीं होता वह पीड़ित मासूम होती जिस पर अत्याचार हुआ होता। काव्या, एक तरफ तो तुम में अपनी बेटी के प्रति इतना प्रेम जागृत हो उठा, दूसरी तरफ तुम्हारा मूर्खता पूर्ण फैसला उसकी जिंदगी को नरक बना देगा, यह नहीं सोचा? मामला यदि अदालत गया - और तुम अड़ी रही तो जाएगा ही - तो कैसे समझाओगी नव्या को उसके पैदा होने का जीव-विज्ञान? किशोरावस्था की ओर बढ़ती एक मासूम बच्ची की ज़िंदगी तुम नरक बना दोगी काव्या, ईश्वर के लिए ऐसी गलती मत करो।”
“फिर तो शायद एक ही रास्ता बचा है मेरे लिए – मुझे ही इस दुनिया को अलविदा कह देना चाहिए।”
रेवा ने लगभग चीखते हुए कहा,
“जस्ट शटअप काव्या, खबरदार जो ऐसी बात दुबारा की तुम ने। मुझे तुम्हारी कोई बकवास नहीं सुननी, पहले यह बताओ तुम इस निष्कर्ष पर पहुँची कैसे कि तुम्हारा पति राज तुम्हारी बेटी का ‘जैविक पिता’ नहीं है।”
“मेरे पास अपनी बेटी और उसके “जैविक पिता” का डीएनए टेस्ट-रिपोर्ट है, दोनों की ‘पर्फेक्ट मैचिंग’ है।”
“यह रिपोर्ट आई कैसे? डॉक्टर होकर मूर्खों की तरह बातें करती हो काव्या; क्या तुम यह नहीं जानती कि डीएनए टेस्ट कोई सामान्य ‘खून जांच’ की प्रक्रिया नहीं है। यह टेस्ट विशेष परिस्थितियों में ही होता है, वह भी ज़्यादातर कोर्ट के हस्तक्षेप पर। जैसे, यही मामला यदि अदालत के संज्ञान में आया तो सर्वप्रथम कोर्ट तुम से बच्ची के जैविक पिता का नाम पूछेगा, फिर उसे अदालत द्वारा ‘समन (summon)’ किया जाएगा। तत्पश्चात उसके आदेश पर आवश्यक ‘प्रोटोकॉल’ का पालन करते हुए दोनों के रक्त-नमूने लिए जायेंगे और उसकी रिपोर्ट सील बंद लिफाफे में कोर्ट को सीधे हस्तगत करायी जाएगी। तुम अपनी बेटी को इन सारी प्रक्रियाओं से गुजारने को तैयार हो? और ‘बाई द वे’, तुम्हें यह ‘पर्फेक्ट मैचिंग’ वाला रिपोर्ट मिला कैसे?”
“उसी (........) ने दिया।”
“लो सुनो; ऐसी महिलाएँ ही सफेदपोश अपराधियों को प्रोत्साहन देती हैं, झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर। अरे मेरी बहना, अपराधी वह नरपिशाच है, तुम नहीं; फिर स्वयं को और साथ में एक समझदार पति तथा अपनी प्यारी सी बेटी को क्यों सजा देने पर तुली हो?”
“सजा तो मैं भुगत रही हूँ, प्रतिदिन जिस मानसिक पीड़ा को मैं झेलती हूँ वह कोई नहीं समझ सकता.”
इस बार तेज स्वर राज की गूंजी,
“इसके लिए भी तुम जिम्मेदार हो; तुमने यदि सारी बातें उसी दिन बताई होती तो . .”
“तो भी कुछ नहीं होता राज, गलती मेरी है और उसकी सजा तो भुगतना ही होगा।”
“अरे यार, फिर कहता हूँ गलती तुम्हारी नहीं है, तुम्हारे साथ जो हुआ वह गलत था, समझती क्यों नहीं? क्यों एक अपराधी प्रवृति वाले इंसान के फर्जी और अविश्वसनीय रिपोर्ट के आधार पर तीन-तीन जिंदगियाँ बर्बाद करने पर तुली हो, भूल जाओ इन बातों को और चलो हम वापस लौट चलें उस खुशहाल जिंदगी की ओर जहाँ वह हमारा इंतजार कर रही है।”
“और रिपोर्ट यदि सत्य हुआ तो; मैं एक और “अग्नि परीक्षा” के लिए तैयार नहीं हूँ राज, उससे बेहतर मैं मर जाना समझती हूँ।”
“पर कौन तुमसे अग्नि परीक्षा की माँग कर रहा है? कम से कम मैं तो ऐसी अपेक्षा नहीं रखता, और इसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है, वह रिपोर्ट सही हो तो भी नहीं। देखो एक बात बताऊँ, डॉक्टर होने के नाते तुम “आइभीएफ” से अच्छी तरह से परिचित हो, यदि कभी अंतरात्मा तुम्हें परेशान करे तो उसी प्रक्रिया को याद कर लेना पर हमारी मासूम बेटी संग मुझे तो सजा मत दो।”
पहली बार काव्या की मुखाकृति बदली, राज का हाथ पकड़ रोते हुए उसने पूछा,
“क्या सचमुच तुम मुझे माफ कर दोगे राज, मुझ से नाराज तो नहीं रहोगे न?”
उसके प्रश्न को अनसुना करते हुए राज ने हँसते हुए बस इतना ही कहा,
“यार रेवा, अब मुझे दो दो रोंदू बच्चों – काव्या और नव्या - को एक साथ संभालना पड़ेगा, पता नहीं कब बेमौसम बरसात होने लगे।”
माहौल को थोड़ा और खुशगवार बनाने के लिए मैंने भी हँसते हुए जोड़ दिया,
“भई कमाल है, इन दोनों का तो मिलन अब हो ही गया समझो, पर मेरे साथ तो अन्याय न करो, मेरा भी इस वार्ता में कुछ सकारात्मक सहयोग रहा है, एक “जादू की झप्पी” का हकदार तो मैं भी हूँ।”
हँसते हुए काव्या मेरे गले लग गयी, रेवा तथा राज ने ताली बजाई और हम सब खाने की मेज की ओर बढ़ चले।
***
 
 
बाल खंड (किड्स कार्नर)

 " ३ कवितायें"
 
 
 
 
 
 ३ कवितायें
 
१.गजानन महाराज
 
भाद्र शुक्ल की चतुर्दशी,
मनत है गणपति त्योहार।
सवारी प्रभु का मूषक डिंक
मोदक उनका प्रिय आहार।।

उमा सुत है प्रथम पूज्य,
प्रभु गजानन महाराज।
रिद्धि सिद्धि संग पधार,
पूर्ण करो मेरे सब काज।

मोदक संग चढ़े जिन्हें,
दूर्वा, शमी, पुष्प लाल।
हे लंबोदर! सिद्धिविनायक!
आओ हरो मेरे सब काल।।

हे रिद्धि, सिद्धि के दायक,
हे एकदंत! हे विनायक!
गणेश उत्सव पर पधार,
बनो हमरे सदा सहायक।।

बप्पा गणपति पूजा हेतु,
दस दिवस को आए।
पधार पुत्र शुभ लाभ संग,
सारी खुशियाँ संग लाए।।

फूल, चंदन संग अक्षत, रोली,
लिए हाथ जोड़ करते वंदन।
हे गणाध्यक्ष!, हे शिवनंदन!
स्वीकार करो मेरा अभिनन्दन।।

***
 
२ शिक्षक

प्रणाम उस मानुष तन को,
शिक्षा जिससे हमने पाया।
माता पिता के बाद हमपर,
उनकी है प्रेम मधुर छाया।।
 
नमन करता उन गुरुवर को,
शिक्षा दें मुझे सफल बनाएं
अच्छे बुरे का फर्क बता,
उन्नति का सफल राह दिखाएं।।
 
शिक्षक अध्यापक गुरु जैसे,
नाम अनेकों मानुष तन के,
कभी भय, कभी प्यार जता,
हमें जीवन की राह दिखाते।।
 
 
 
 
 द्वारा - अंकुर सिंह
 

अंकुर सिंह जौनपुर, उत्तर प्रदेश से हैं। इन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। ये आदित्य बिरला ग्रुप में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।
 
               ~*~*~*~*~*~*~*~
 
  कभी भय, कभी फटकार कर,
कुम्हार भाँतिरोज़ पकाते।
लगन और अथक मेहनत से,
शिक्षक हमें सर्वश्रेष्ठ बनाते।
 
 कहलाते हैं शिक्षक जग में,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश से महान।
मिली शिक्षक से शिक्षा हमें
जग में दिलाती खूब सम्मान।।
 
शिक्षा बिना तो मानव जीवन,
दुर्गम, पीड़ित और बेकार।
गुरुवर ने हमें शिक्षा देकर,
हमपर कर दी बहुत उपकार।।
 
अपने शिष्य को सफल देख,
प्रफुल्लित होता शिक्षक मन।
अपने गुणिजन गुरुवर को मैं,
अर्पित करता श्रद्धा सुमन।।
 
३. हिंदी बने राष्ट्रभाषा
 
हमारा हो निज भाषा पर अधिकार,
प्रयोग हिंदी का, करें इसका विस्तार।
निज भाषा निज उन्नति का कारक,
निज भाषा से मिटे सभी का अंधकार।।
 
हिंदी है हिंदुस्तान की रानी,
हो रही अब सभी से बेगानी।
अन्य भाषा संग, हिंदी अपनाओ,
ताकि हिंदी संग ना हो बेमानी।।

माथे की शोभा बढ़ाती बिंदी,
निज भाषा जान है हिन्दी।
आओ इसका विस्तार करें,
ताकि करें गर्व नई आबादी।।
 
हिंदी है हम सब की मातृभाषा,
छोड़ इसे ना करो तुम निराशा।
हिंदी बोलने पे तुम मत शरमाओ,
ताकि हिंदी बने हमारी राष्ट्रभाषा।।
 
हिंदी है अपनी राजभाषा,
बनाना इसे अब राष्ट्रभाषा।
हम निज भाषा से प्यार करें
ताकि इसे ना मिले निराशा।।
 
महात्मा गाँधी जी कहते थे,
हिंदी है जनमानस की भाषा ।
बापू ने कहा उन्नीस सौ अठारह में,
बनाओ सब हिंदी को राष्ट्रभाषा।।
 
पहली अंग्रेजी, फिर चीनी,
ज्यादा बोले जाने वाली है भाषा।
हर कार्य में हिंदी को अपनाकर,
बनाओ इसको सब पहली भाषा।
 
***
 
 
 "भारत  के 14वें उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ का स्वागत  "
 
 
 
 
भारत के 14वें उपराष्ट्रपति
 
.
 
 
श्री जगदीप धनखड़ ने भारत के 14वें उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है।

राष्ट्रपति भवन में भारत की राष्ट्रपति महामहिम  द्रौपदी मुर्मू ने श्री जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई।


 
 
 
 
 
  
"१५ अगस्त, 2022 को स्वतंत्रता दिवस, अमृत महोत्सव के अवसर पर"

 
 
 
 
   १५  अगस्त, 2022 को स्वतंत्रता दिवस, अमृत महोत्सव के अवसर पर
लंदन में अ.हि.स. परिवार ने भोजन में तिरंगे का बहुत ही सुन्दर तरीके से प्रदर्शित किया
द्वारा : इंदिरा खंडेलवाल के पति पूरन खंडेलवाल
 
 
"जन्माष्टमी, अगस्त, 2022  के अवसर पर"
 
 
 
 
 
 
 
 
 
जन्माष्टमी अगस्त २०२२ के अवसर पर अमेरिका, ऑहियो में
 कृष्ण-राधा की एक झलक



राधा- महिका जैन
कृष्ण- रिआन रायापल्ली

 
 
 
 
 
 भारत की उपलब्धि कामनवेल्थ गेम्स 2022 में 
 
 
 
 
   भारत की उपलब्धी कामनवेल्थ गेम्स  2022 अभियान, 26 जुलाई से 8 अगस्त 2022 तक बर्मिंघम, इंग्लैंड के स्टैंडिंग में चला।  भारत ने  61 पदकों के साथ सभी को गरवान्तित किया । भारत ने  इस खेल के  इतिहास में अपना चौथा सर्वश्रेष्ठ पदक हासिल किया और  22 स्वर्ण, 16 रजत और 23 कांस्य पदक जीते। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति एवं सभी प्रवासी हिंदी प्रेमियों की ओर से बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
 
 
 " डॉ. राम गुप्ता को समस्त अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार की ओर से श्रद्दांजलि   "
 
 
 
 
 डॉ. राम गुप्ता
 
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 डॉ. राम गुप्ता पेशे से इंजिनीर थे और अमेरिका में लगभग ४५ वर्षों से रहे थे। अपने पेशे में सफलता के साथ आगे बढ़ते हुए वे रोड आयलंड में भारतीय समाज के मध्य, हिंदी भाषा एवं भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने में विगत ४० सालों से अधिक परिश्रम किया। इन्होंने रोड आयलंड में हिंदी स्कूल ( HARI )की स्थापना की। वे हिंदी साहित्य में बहुत रूचि रखते थे। उनके द्वारा लिखी कवितायें, छोटी कहानियाँ, स्क्रिप्ट (scripts) प्रकाशित हुई थी। अंतरराष्ट्रिय हिंदी समिति की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं शतत नमन।
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 "संवाद" की कार्यकारिणी समिति
 
 
  प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका, OH, sushilam33@hotmail.com
. सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
. सहसंपादक – डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP, dr.archana2309@gmail.com
  डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
  तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
 
 
 प्रबंध सम्पादक संदेश
 
 
 
 
प्रबंध सम्पादक
 
 सुशीला मोहनका
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्य एवं सदस्याओं को,
मुहर्रम, रक्षा बंधन, स्वतंत्रता दिवस (अमृत महोत्सव), जन्माष्टमी, तथा गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
भारत को स्वाधीन हुए ७५ वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार द्वारा दो वर्षों का कार्यक्रम एक कार्यक्रम ‘अमृत महोत्सव’ के नाम से निर्धारित किया गया। इस अवसर पर स्वतंत्रता में भाग लेनेवाले सेनानियों के कठिन त्याग, परिश्रम, समर्पण, लगन को फिर से नई तथा पुरानी पीढ़ियों से परिचय करना भी आवश्यक समझा गया। इस अवसर पर विभन्न स्थानों में भारत सरकार द्वारा बहुत से कार्यक्रम निर्धारित किये गये। १३ अगस्त से १५ अगस्त २०२२ तक पूरे भारत के हर घर-घर में तिरंगा लहरा रहा था। हर घर में तिरंगा लगाने के अभियान में ५०० करोड़ रुपयों के झंडें बेचे और ख़रीदे गये, ३० करोड़ से भी अधिक तिरंगे झंडें पूरा भारत वर्ष में लहराते दिखें। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
देशवासी भी आजादी के ७५ वें अमृत महोत्सव के अंतर्गत काफी उत्सुक नजर आ रहे है क्योंकि वर्तमान भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 12 मार्च 2021 को महात्मा गांधी की दांडी यात्रा शुरुआत दिवस के दिन आजादी के अमृत महोत्सव का शुभारंभ किया था।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) प्रकोप में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करें, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी । जागृति’ की सातवीं कड़ी शनिवार, १० सितम्बर २०२२ को दिन में ११:०० बजे (EST) से अमेरिका में और १० सितम्बर २०२२ को शाम ८.३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी। सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिये और गुनिये तभी “जागृति” में काम करने वाले स्वयंसेवकों की कठिन मेहनत सफल हो पायेगी।
अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि अपने-अपने यहाँ १४ सितम्बर २०२२ को “हिंदी दिवस” उत्साह और ऊर्जा के साथ मनायें। कार्यक्रम के बाद फोटो के साथ कार्यक्रम की रिपोर्ट भेजने का कष्ट करें। एक बात और कि अपनी-अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट वर्ड एवं पीडीऍफ़ दोनों रूपों में भेजें साथ ही कार्यक्रम की फोटो भी शीर्षक के साथ भेजने का कष्ट करें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
जनवरी २०२२ से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जा रहा है। सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
आप सभी विशेष निवेदन है कि ‘संवाद’ का अगस्त २०२२ का अंक अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें। सहयोग की अपेक्षा के साथ,
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  "Disclaimer"    
 
 
 रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति -नीति से कोई संबंध नहीं है।    
 
 
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