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INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अगस्त 2021, अंक 3 | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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| अध्यक्षीय संदेश |
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- अजय चड्ढा
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की तीसरी मासिक ई-पत्रिका 'संवाद' सभी को जा रहा है। आप सभी को ७४वें स्वंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकमाना प्रेषित करता हूँ एवं ७५वें अमृत महोत्सव का स्वागत है। प्राप्त सूचना के अनुसार पुनः कोविड19 का प्रकोप पहले से ज्यादा हुआ है सभी को सरकारों के बनाये नियम का पालन करना आवश्यक ही नही अनिवार्य आवश्यकता है। कोरोना महामारी के समय में पूरी दुनिया जीवन रक्षा की चिंता में लगी हुई है। संकट की इस घड़ी में जो वैश्विक नुकसान हुआ है, उसका दु:ख हम सबको है। शोक संतप्त परिजनों और पीड़ित परिवारों के प्रति हमारी संवेदनाएं हैं। ८,९, एवं १० अक्टूबर २०२१ को अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का २०वां अधिवेशन Cleveland, Ohio में हो रहा है। आप सबके सहयोग की प्रतीक्षा रहेगी | अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की गतिविधियों को बनाये रखना है। त्रैमासिक ‘विश्वा’ पत्रिका का अप्रैल २०२१ का अंक आप सब को मिल गया होगा, आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
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अ.हि.स. का २०वाँ द्विवार्षिक आभासी अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन (वर्चुअल/Virtual)
अक्टूबर ८ एवं ९, २०२१
आतिथ्य – अ.हि.स. की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
अधिवेशन का मूल विषय – ‘दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने और सिखाने की विधि’
‘Teaching & Learning Techniques for Hindi as a 2nd Language’ |
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नोट - अधिवेशन में सारी गतिविधियाँ मूल विषय के लक्ष्य की पूरक रहेंगी ।
हिन्दी भाषा हमारी भावी पीढ़ियों के बीच हमारी संस्कृति और पहचान को बनाए रखने की कुंजी है।
नोट: आज पुरी दुनिया Covid-19 की तीसरी लहर (COVID डेल्टा वैरिएंट सर्ज) से त्रस्त है। अमेरिका के ओहायो राज्य में भी Covid-19 का प्रकोप पिछले सप्ताह बड़ी तेजी से बढ़ा है। इस विषम परस्थिति को देखते हुए समिति ने आपत्तिकालीन बैठक आहूत की। गहरे विचार-विमर्श के बाद यह निश्चित किया गया है कि अब अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २०वां अधिवेशन आभासी रूप में ही किया जाये, अभी की परस्थिति में यही उचित और न्यायसंगत है।
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२०वें द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन 2021 के पदाधिकारी
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स्मारिका, पुरस्कार, सम्मान, पुस्तक-विमोचन, कवि-सम्मेलन, कार्यशालाओं, प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विभिन्न खेलों और सभी उम्र के लोगों के लिए आनन्द ही आनन्द, साथ ही बहुत कुछ नया सीखने के लिए, कृपया अपने परिवार और मित्रों के साथ बड़ी संख्या में शामिल हों।
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स्मारिका - इस अवसर पर सुन्दर, आकर्षक और सुरुचिपूर्ण रंगीन स्मारिका भी छापी जा रही है। इसके लिए तन-मन और धन तीनों की आवश्यकता है, आपका सहयोग चाहिये। आप अपनी रचनायें प्रकाशन हेतु जल्दी भेजने का कष्ट करें। रचना के साथ अपना संक्षिप्त परिचय, पासपोर्ट साईज फोटो क्लियर बैकग्राउंड के साथ अवश्य भेजें।
आभासी अधिवेशन की विशेष सूचनाएँ जल्दी ही अ.हि.स. की निम्नलिखित वेबसाइट पर देखी जा सकेंगी –
१. www.hindi.org
२. http://iha-neohio.com
३. Facebook - IHA Northeast Ohio Chapter
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ग्रीष्म हिंदी शिविर - २०२१
द्वारा - अलका खंडेलवाल, क्लीवलैंड
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तर-पूर्वी शाखा के द्वारा तीन हफ्ते का आभासी ‘ग्रीष्म हिंदी शिविर’ श्रीमती किरण खेतान के पर्यवेक्षण में आयोजित किया गया। शिविर का मुख्य उद्देश्य क्लीवलैंड तथा इसके आस पास में रहने वाले भारतीय बच्चों में हिंदी के प्रति लगाव पैदा करना है। आभासी होने की वजह से न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी, वाशिंगटन और कैलिफ़ोर्निया के राज्यों से भी बच्चे इस शिविर का फ़ायदा उठा सके।
शिविर में भाषा शिक्षण आधुनिक शोध से उपजे ‘सर्वोत्तम शिक्षण तरीक़े’ और ‘भाषा सिखाने के 5-C वैश्विक मानक’ को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। पाठ्यक्रम किसी मुद्दे को लेकर बनाया जाता है और उसका आधार व्याकरण न होकर बातचीत होता है। शिविर का दूसरा मुख्य उद्देश्य कक्षा में सीखी भाषा को क्लास रूम के कम्फर्ट जोन से बाहर उसका प्रयोग करना भी होता है। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि बच्चे भाषा की संस्कृति को समझ कर यह सीख सकें कि उन्हें कब और कैसे किस से किस तरह बात करनी होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि भाषा सीखने में छात्रों की निरंतर रुचि बनी रहे। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए इस साल शिविर का विषय “देखिये, सुनिए और जानिये: मुझे और मेरी दुनिया को”था।
कोविड-१९ के कारण यह शिविर ५ से २३ जुलाई २०२१ तक आभासी ढंग से ज़ूम और गूगल-क्लासरूम द्वारा किया गया जिसमें ३५ बच्चों ने भाग लिया। बच्चों की उम्र और उनकी हिंदी जानने की क्षमता के अनुसार उन्हें पाँच समूहों में बाँटा गया था। प्रत्येक समूह के छात्र सोमवार से शुक्रवार तक हर रोज़ दो घंटे के लिए ज़ूम से अपनी कक्षा में आकर हिंदी सीखते थे।
बच्चों ने ‘see-saw’ ‘बुक क्रिएटर’ ‘जैम बोर्ड’ जैसी और भी अन्य ऐप्स की मदद से शिविर के विषय “देखिये, सुनिए और जानिये: मुझे और मेरी दुनिया
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को” का अन्वेषण कर अपने बारे में बुक क्रिएटर में एक किताब बनाई। शिविर के अंत में सभी छात्रों ने ज़ूम द्वारा अपने कार्यों को सभी आमंत्रित अभिभावकों, दोस्तों और अन्य रिश्तेदारों के सम्मुख
अपनी किताब प्रस्तुत की। हर दिन अपनी जिंदगी के जिस भी विषय पर बच्चे हिंदी में बुक क्रिएटर पर अपना एक पेज बनाते थे, उसी विषय पर उन्हें असाइनमेंट दिया जाता था ताकि वे कक्षा में सीखी भाषा को क्लास रूम के कम्फर्ट जोन से बाहर उसका प्रयोग कर अपने माता-पिता, या कम्युनिटी के किसी सदस्य से साक्षात्कार कर उनसे उनके बचपन के बारे में जानें और आज की अपनी जिन्दगी से तुलना करें। इससे बच्चों को भारतीय संस्कृति का भी पता चला क्योंकि उनके माता-पिता ने बचपन के वे दिन भारत में बिताये थे। बच्चों के असीम उत्साह ने हम शिक्षिकाओं को भी कम प्रोत्साहित नहीं किया।
भारतीय मूल के बच्चों को हिंदी भाषा और संस्कृति से जोड़े रखने में इस शिविर का बहुत बड़ा योगदान रहता है। इसकी सफलता से हमें प्रोत्साहन मिलता है और आशा भी बंधती है कि अपनी मातृ भाषा को अमेरिका के पब्लिक स्कूलों में विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाए जाने के अपने लक्ष्य तक हम शीघ्र ही पहुँचेंगे।
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| 7 अगस्त, 2021 को आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना शाखा की बैठक की रिपोर्ट |
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द्वारा- डॉ. राकेश कुमार, अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना की एक बैठक 07 अगस्त, 2021 को 10740 इंग्लिश ओक्स ड्राइव, कार्मेल, IN 46032 में आयोजित की गई। बैठक में छत्तीस लोगों ने भाग लिया। विचार-विमर्श हुए कि किस प्रकार हिंदी को अमेरिका में दूसरी भाषा के रूप में संरक्षित करने और बढ़ावा देने में मदद की जा सकती है, विशेष रूप से हमारी युवा पीढ़ी को हिंदी और इसके साहित्य और विश्वासों में निहित भारत की संस्कृति को सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
सी.डी.सी के COVID दिशानिर्देशों का पालन करते हुए, हमारी बैठक घर के बाहर लॉन में की गई, बैठक बहुत अच्छी रही। मुलाकात और अभिवादन के बाद, सरस्वती वंदना के साथ बैठक शुरू की गयी ।सरस्वती वंदना अनन्या श्रीवास्तव ने की, अनन्या 2021 अ.हि.स. हिंदी ऑनलाइन कक्षा के छात्रों में से एक है। डॉ. राकेश कुमार ने सभी उपस्थित लोगों का स्वागत किया और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के लक्ष्यों और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। साथ ही आगामी हिंदी कवि-सम्मेलन, हिंदी-दिवस मनाने की योजना और ओहायो में होने वाले अ.हि.स. के २० वें अधिवेशन पर भी चर्चा हुई। इन सभी कार्यक्रमों पर विचार-विमश हुए।
यहाँ वर्तमान परिस्थिति में हिंदी भाषा को कैसे बढ़ावा दिया जाए, कैसे आगे बढ़ना है, इस पर सभी उपस्थित लोगों के सुझावों और मार्गदर्शन के लिए बैठक बैठक में चर्चा गई। बहुत से मूल्यवान सुझाव मिले, जो न केवल हमारे स्थानीय अध्याय को, बल्कि पूरी अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर भी काम में लाये जा सकते हैं।
हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं :-
- माता-पिता द्वारा प्रारंभिक चरण के बच्चों को हिन्दी सिखाने में प्रतिबद्धता की भागीदारी। इस तरह छोटे बच्चे हिन्दी सीखेंगे और द्विभाषी बनेंगे।
- परिवार के सदस्यों और समुदाय के बीच संचार बढ़ाएँ।
- टॉडलर, प्रीस्कूलर, ग्रेड-स्कूलर्स, टीनएजर्स, युवा वयस्कों और वयस्कों के लिए ठोस प्रयास करें। उन सभी परिवारों की सूची प्राप्त करें जिनके छोटे बच्चे हैं और उन्हें भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू करें।
- विभिन्न आयु समूहों और विभिन्न पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए अलग रणनीति बनाएं। दूसरी पीढ़ी के परिवारों को विभिन्न प्रकार के समर्थन की आवश्यकता होती है।
- हिंदी शिक्षा के तीन चरण बनाएं:
- बच्चे/बच्चे/प्राथमिक विद्यालय: माता-पिता उनसे घर पर हिंदी में बात करते हैं।
- मिडिल स्कूल - हाई स्कूल: हमारे परिवार समूह से एक रोल मॉडल की पहचान करें और उसे इस उम्र के बच्चों को हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नेतृत्व करने के लिए कहें। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के भीतर एक युवा समूह (छोटे बच्चे) बनाएं
- कॉलेज / युवा पेशेवर (मूल रूप से बच्चे जो घर छोड़ चुके हैं और अब बड़ी दुनिया में घर से बाहर हैं): हमारे समुदाय से रोल मॉडल की पहचान करें और उन्हें इस समूह में "बच्चों" के साथ जुड़ने के लिए कहें।
- बच्चों के लिए शिविरों के बाहर हिंदी सीखना जारी रखने का एक तरीका बनाएं ताकि यह एक सतत सीखने की प्रक्रिया हो।
- अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन हिंदी कक्षा पाठ्यक्रम उपलब्ध कराएं।
- जब भी हम मिलें, हमें जितना हो सके हिंदी में बोलने की कोशिश करनी चाहिए।
- हिंदी में पत्र लेखन को प्रोत्साहित करें।
आधिकारिक बैठक के बाद हमारे उपाध्यक्ष डॉ. अभिनव कुमार ने हिंदी गाने गाए और गिटार बजाया। सभी ने शाकाहारी रात्रिभोज का आनंद लिया और फिर हमने अंताक्षरी (पुरुष बनाम महिला) खेली। हमने अपना कार्यक्रम शाम 5:30 बजे शुरू किया जो रात 11.00 बजे तक चला। कुल मिलाकर यह एक बड़ी सफलता थी, और सभी ने बैठक का आनंद लिया।
हम, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति-इंडियाना समिति के सदस्य (डॉ. राकेश कुमार, डॉ. कुमार अभिनव और श्री राघवेंद्र सिंह भदौरिया), सभी बैठक प्रतिभागियों को उनके बहुमूल्य समय और सुझावों के लिए धन्यवाद देना चाहते हैं। हम सभी अपनी भविष्य की गतिविधियों के लिए उत्सुक हैं।
बैठक के बाद रात्रिभोज हुआ।
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| डॉ. चित्रा कुमारी |
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- पटना, भारत से मेडिकल में डाक्टर बनकर इंग्लैंड गयी और अपने प्रोफेशन में व्यस्त हो गई | रिटायर होने के बाद, जब कुछ समय मिला, उनके हृदय में विचारों और भावनाओं का ज्वार उमड़ा और उसे इन्होंने बड़ी अच्छी तरह स्वर बद्ध किया हैं |
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प्रार्थना |
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दो फूल गिरा दे ईश्वर,
इस निर्धन की झोली में;
भटक रही मैं दर-दर,
अंधकार की गलियों में।
अहंकार तृष्णा का दलदल,
रहा खींचता मेरा हर पल;
कर उद्धार तू, हे ईश्वर ,
बनकर मेरा दृढ़ संबल।
भोग-विलास में लिपटी,
काया है कितनी निर्धन !
जान सका न अबतक,
मेरा कुंठित विह्वल मन।
रचकर नूतन जीवन दर्शन ,
कर भगवन् पथ -प्रदर्शन ।
तेरे ही चरणों में अब
है अर्पित मेरा तन-मन।
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वसंत |
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हवा ने ली मीठी चुटकी,
देख फूलों का मुस्कुराना ;
खिल उठा बाग़-बसंती,
वसंत का नूर जगमगाया!
अधखुली आँखों से,
कलियों ने किया इशारा;
खिलूँगी कल जब मैं ,
देखना सौंदर्य हमारा!
लो भौंरो ने किया शुरू -
अपनी ही धुन पर गुनगुनाना!
बना धरती का साज
पंछियों का चहचहाना !
दर्शक थे सभी मगन,
तितलियों ने रूप सँवारा।
आलीशान हुआ जश्न ,
अदभुत था नजारा!
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| श्री लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव |
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- उत्तर प्रदेश के छोटे से ग्राम से हैं| इनके लेखन की विधायें - कविता/कहानी/लघुकथा/लेख/बाल कविता आदि हैं| स्वभाव से ये शिक्षक, कवि, लेखक, सम्पादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं| कई राष्ट्रीय एवं स्थानीय पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त कर चुके हैं|
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| कांटे भरे रास्ते... |
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आसान सरल सुलभ रास्ते
हर किसी को है भाते
पर कुछ लोग चुनते हैं अलग पथ
कांटों से भरा होता है उनका जीवन रथ
उन्हें आसान रास्ते नहीं सुहाते
इसीलिए वो संघर्षों में रम जाते
जीवन में नई पहचान बनाते
आगे चलकर ऐसे ही इतिहास
के स्वर्णिम पृष्ठों में अपना नाम दर्ज कराते
पर इसके लिए वो अपने भीतर पैदा करते हैं हौसला
उनके दिमाग में जाग्रत होता है जुनून
बिना मंजिल पर पहुँचे उन्हें नहीं मिलता सुकून
उनके भीतर उमड़ता रहता है ज्वालामुखी
उनमें असीम साहस की होती है पराकाष्ठा
वो होते हैं संघर्ष के अतीव पराक्रमी
अर्जुन जैसे ही चिड़िया के आँख पर रहता है लक्ष्य
विषम परिस्थितियों में भी लड़ने के पक्षधर
चलते रहते हैं दिन रात सुबह शाम
उन्हें न लगती है आलस न ही थकान
तभी वो बना पाते हैं अपनी एक पहचान
सच में ऐसे भी कुछ वीर होते हैं इंसान
आगे चलकर कहे जाते हैं महान
सारा जग करता है उनका गुणगान
सर्वत्र पाते हैं वो सम्मान...
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| जीवन के रंग अलसाए हैं... |
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तुम्हारे साथ न होने से
समंदर के गहराई जैसा दर्द का एहसास
सचमुच जीवन कितना है उदास
तुम्हारे होने से आएगी वो संपूर्णता
नीर पीने से जैसे तृप्त होती है प्यास...
तुम्हारे बिन क्यारी के ये फूल भी कैसे मुरझाए हैं
खिल कर भी अपनी महक न बिखेर पाए हैं
तुम्हारे न होने की कसक
हर तरफ जैसे नागफनी उग आए हैं
जीवन के रंग कैसे अलसाए हैं...
तुम्हें कब से पुकार रहा हूँ
शायद मेरे दर्द की आवाज़ तुम सुन नहीं रही हो
या सुन कर अनसुना कर दे रही हो
क्यों मुझसे अजनबी जैसा बर्ताव कर रही हो
जबकि तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है
हमारा प्रेम तुम्हारे बिना नहीं ले सकेगा कोई रूप
तुम्हारे साथ ही ख़ुशियों की होगी धूप...
तुम्हारे न होने से मेरे जीवन में
ऐसे रिक्तता का आभास होता है
जैसे सूरज उगने पर बादल से प्रकाश छुप जाता है
तुम सच में मेरे जीवन का प्रकाश हो
मेरे जीने के लिए खुशनुमा एहसास हो
बादल कितना भी कोशिश कर लें
तुम्हें मेरे जीवन में आना होगा
अपना इंद्रधनुषी प्रकाश फैलाना होगा
हमारे जीवन में अब तुम्हें
संगीत का मधुर स्वर सुनाना होगा
मेरे जीवन में छाई उदासी को मिटाना होगा...
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| कैलिफोर्निया की यात्रा |
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जबसे मेरी बहन और भाई कैलिफ़ोर्निया गए हैं, हम अपने माँ-पापा सहित कई बार कैलिफोर्निया गए हैं। इतनी बार एक जगह जाने के बाद, उस जगह का मज़ा कैसे उठाया जा सकता हैं? उस जगह को नए दृष्टिकोण से कैसे देखा जा सकता है? आखिर वही परिवार के लोग, वही जगहें और वही वातावरण, हमारे कहने का मतलब ये नहीं की कैलिफोर्निया में कुछ करने को नहीं, जबकि, वास्तव् में, वह बहुत ही सुन्दर जगह है, जहां का मौसम सुहावना है, और अन्य संस्कृति के लोग साथ रहते हैं।
इस बार कैलिफोर्निया के उसी माहोल का मज़ा उठाया हमनें। पूरा एक महीना कैलिफोर्निया में बिताया और वहाँ का आनन्द लिया। कोविद महामारी में घर से काम करने का, परिवार के साथ समय बिताने का, अपने-आप को समझने का बहुत ही सुनहरा अवसर मिला।
यात्रा का पहला हिस्सा हमनें अपनी बहन और उसके परिवार के साथ बिताया, अपने परिवार सहित डबलिन शहर में रहती हैं। वहाँ अपनी १० वर्षीय और ५ वर्षीय भानजियों के साथ बहुत आनन्द आया। साथ ही उनके बड़े होने का एहसास भी हुआ। वे हमारे लिए ही नहीं, बल्कि उन सारे खिलोनों के लिए भी बड़ी हो गयी हैं, जो हमने उनको कभी बहुत प्यार से दिए थे। हमारी बहन दोनों बेटियों और घर की अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहा करती थी।
इस बार दीदी को देखकर लगा कि भारतीय परिवार की सफल गृहणी की क्या जिम्मेदारियाँ होती है और किस प्रकार अपनी सभी कार्यों को अच्छी तरह सम्हालती है, इसका भी एहसास हुआ। दीदी और उनकी सहेलियों ने बच्चों को अच्छी तरह सँभालने के लिए एक ऐसा तरीका निकाला हुआ था, जैसे कोयल पक्षी अपने बच्चों को पालती है। पर कोयल की तरह उनका रिश्ता परोपजीवी नहीं बल्कि सहयोग और एकता का था। कोयल पक्षी अपने अण्डों को दूसरे पक्षी के घोसले में छोड़ देती है, जिससे उसे लगता की वह अपने बच्चों को पाल रही है। डबलिन में मैंने यह भी देखा की जो महिलाएं अपने वीसा के कारण काम नहीं कर सकती थीं, वे अपना समय समाज के सभी बच्चों को गणित, नृत्य, और अन्य कला सिखाने में अपना समय लगाती हैं।
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| नूपुर खंडेलवाल |
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- एक्रोन, ओहायो से हैं। ये एक उभरती युवा हिन्दी प्रेमी हैं। कैलिफ़ोर्निया में भारतीय परिवारों का आपसी सहयोग इनके कोमल हृदय को छू गया और इनकी कलम चल पड़ी।
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जो महिलाएं गाड़ी चलाती हैं वे समाज बच्चों को बाहर अन्य गतिविधियों के लिए भी ले जाती हैं। समाज में इतना प्रेम और सहयोग देख कर बहुत ही अच्छा लगा। धन्य है हमारी भारतीय संस्कृति, जिससे हमनें हमेशा सीखा है समाज में एक दूसरे की मदद करना और सबको साथ लेकर चलना।
यात्रा का दूसरा भाग हमनें अपने भाई और भाभी के साथ बिताया। उनके साथ हम सेन फ्रांसिस्को शहर के ओशन नामक समुद्र तट पर गए। वहाँ हमने समुद्र की लहरों का तो लुफ्त उठाया ही, और साथ ही अन्य प्रकार के खेल खेले। एक दोस्त के साथ अन्य और समुद्रीय तट पर जाने का अवसर भी मिला। कैलिफोर्निया शहर प्रशांत महासागर से संलग्न है। ऊंची पहाड़ियों से प्रशांत महासागर का द्रश्य भी अति सुन्दर दिख रहा था। बहुत शांति और संतुष्टता का अनुभव हो रहा था ऊंची पहाड़ियों से प्रशांत महासागर को देख कर। जिसको भी अवसर मिले, कैलिफोर्निया की यात्रा अकेले या परिवार सहित अवश्य करें, और वहां के सुन्दर नजारों, समुद्रीय तट, प्रशांत महासागर, और अन्य संस्कृति वाले इस शहर का आनन्द लें।
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द्वारा - डॉ. मीनाक्षी कर्ण, जमशेदपुर, झारखण्ड से हैं। सफल गृहणी है। इन्होने हिंदी में पी.एच.डी. की है।
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नौ वर्ष की सुखिया घर भर की दुलारी बेटी थी। दिन भर घर -आंगन में इधर से उधर फुदकती रहती, कभी एक ओसारे पर गुड्डे-गुड़ियों का जमावड़ा लगाती तो कभी दूसरे ओसारे पर प्लास्टिक के रसोई बर्तन बिखरा कर रख देती। पूरा आंगन उसके खिलौनों और सामानों से बिखरा रहता।
सुखिया प्लास्टिक के रसोई बर्तन में तरह-तरह के खाने बनाती. उसमें भी खाना क्या?….बर्तन भले नकली हो... परंतु खाने का सामान कभी असली में … चावल, दाल, नमक,हल्दी,मसाले, हरी -सब्जी, माँ के रसोई से आ जाते तो....कभी माँ की डाँट पड़ने के डर से बाड़ी - झाड़ी में उग आये फूल- पत्ते और मिट्टी से ही खाना बन जाता, लेकिन परोसा सभी भाइयों को जाता।
तीन भाईयों के बाद सुखिया थी, अम्मा -बाबूजी की लाडली, उससे छोटा एक पाँच साल का भाई था,
तीन बड़े भाइयों को तो वह बड़े मान -मनौव्वल के साथ खाने के लिए बैठाती ...परन्तु छोटे भाई के मना करने पर वह डाँट - फटकार कर बैठा देती।
सभी भाइयों के लिए एक पंक्ति में आसन बिछाती।
किसी पेड़ से चार पत्ते तोड़ कर ले आती और भाइयों के आगे डाल देती.....साथ ही पानी पीने के लिए कुछ नहीं मिलता तो घर का ही गिलास लाकर उसमें पानी भरकर भाइयों के आगे रख देती।
सुखिया बड़े प्रेम से बोल- बोल कर एक- एक चीज परोसती.... ले -ले भैया! यह है गरमा गरम पूरिया ... ये है सब्जी... ये है दाल.....और जैसे-जैसे सुखिया बोलती जाती भाइयों के मुँह में पानी आने लगता,
खाना मुँह तक ले जाते और उसे वापस पत्ते पर डाल देते... यह झूठ का नाटक तो उस समय कर लेते लेकिन बाद में माँ को तंग करने लगते.. माँ आज सुखिया ने पूरी खीर बनाई थी आज असली में बनाओ ना.. माँ रोज-रोज के सुखिया के नाटक वाली रसोई और फिर इन भाइयों को असली में तंग करने से झुंझला जाती।
एक दिन सुखिया माँ से जिद करने लगी अम्मा -अम्मा आज मैं अपने गुड्डे -गुड़ियाँ की शादी करूंगी. अम्मा सुनकर भी अनसुना कर दी... मन ही मन झुंझलाते हुए कहा --- आज फिर इसकी सनक शुरू हो गई.... ना जाने कब बड़ी होगी और इन मुसीबतों से छुटकारा मिलेगा।
सुखिया अम्मा के पीछे पीछे सब जगह घूम रही थे उसने सोचा अम्मा ने सुना ही नहीं और वह फिर से मचलते हुए कहा -"अम्मा सुनो ना! आज मैं गुड्डे गुड़ियाँ की शादी करुँगी तुम मेरा साथ दोगी ना", बहुत सारा काम है... बराती वाले रहेंगे, शराती वाले रहेंगे बहुत खाना बनाना है,बहुत सजावट करना है,गुड्डे गुड़ियों को सजाना है...अम्मा तुम कुछ असल में रसोई बना देना,
अम्मा अब तो फूट ही पड़ी। "मैं नहीं बनाती तुम्हारे बराती- शराती के लिए खाना"....
और हटो मेरे पास से,ढंग से कोई काम करने नहीं देती... बस पीछे पीछे घूमती रहती है. अम्मा के डाँटने से सुखिया मुँह फुला कर बैठ गई। तभी उसके बाबूजी खेत से लौटकर आए और सुखिया को मुँह फुलाए बैठे देख कर पूछा -"क्या हुआ मेरी चिड़िया रानी को? इसकी आवाज नहीं आ रही है और ना ही इधर-उधर फुदक रही है।" अपने बाबूजी की आवाज सुन सुखिया दौड़ी हुई आई और बाबूजी को कसकर पकड़ रोने लगी।
अरे -अरे! मेरी चिड़ियों को क्या हुआ? भाइयों से झगड़ा हो गया क्या? या अम्मा ने डांटा है?
" नहीं -नहीं बाबूजी किसी से झगड़ा नहीं हुआ है,
अम्मा मेरी बात नहीं मान रही है ".….अम्मा क्यों नहीं बात मान रही है? क्यों नाराज है तुमसे?
बाबू जी आज का दिन बहुत शुभ है और मैं अपने गुड्डे- गुड़ियाँ की शादी करना चाहती हूँ...गाँव में भी तो आज कमला दीदी की शादी है, उसकी भी बारात आज आएगी.....तो आज दिन शुभ है ना बाबूजी?,आज मैं भी अपनी गुड़ियाँ की शादी गुड्डे से कर दूँगी....लेकिन अम्मा है कि बात ही नहीं मान रही है।
अच्छा-अच्छा चुप हो जा मेरी चिड़िया रानी मैं तुम्हारी अम्मा को मना लूँगा। तुम शादी की तैयारी करो.
आश्चर्य से सुखिया उछल पड़ी और बाबूजी के गोद में चढ़ गई। 'सच्ची बाबूजी'! आप अम्मा को मना लेंगे.
हाँ -हाँ! ....मैं तुम्हारी अम्मा को मना लूँगा और उसके दोनों गाल को चूम नीचे उतार दिया।
उसके बाबूजी सुखिया के अम्मा के पास जाकर कहने लगे... क्या हुआ?सुखिया की अम्मा... क्यों बच्चों से नाराज हों? क्यों सुखिया को रुला दिया?...मैं कहाँ नाराज हूँ?...तुम्हारी चिड़िया ही सुबह से पीछे पड़ी है.... गुड्डे -गुड़ियाँ की शादी करना है उसे....तुम्ही बताओ सुबह- सुबह कितना काम रहता है..... चूल्हा -चौका,खेत- खलिहान सब करना पड़ता है...इस पर इसका एक अलग से झमेला रहता है.....और भी तो तीनों भाई हैं, वह थोड़ा भी तंग नहीं करते, नाश्ता पानी करा दो उसके बाद यह तीनों अपने अपने खेल में लग जाते हैं.... लेकिन सुखिया है कि मेरे ही पीछे- पीछे घूमती रहती है,दिन भर। अरे!सुखिया की अम्मा.… क्यों नाराज होती हो अपनी बिटिया से? उसने कोई बहुत बड़ी दौलत तो नहीं माँग ली.....सोने-चांदी, घर द्वार,तो नहीं माँगी.....छोटी सी खुशी ही तो माँग रही है..... वह अपने गुड्डे -गुड़ियों की शादी करना चाहती है तो कर लेने दे....तुम जो रसोई बनाएगी उसी में कुछ ज्यादा बना देना।
बेटी चिड़ियाँ ही तो होती है कुछ साल माँ बाप के पास रहती है फिर फुर्र... से उड़ जाती है,हमारी चिड़ियाँ भी कुछ सालों के बाद उड़ जाएगी.....फिर कहाँ से आवेगी तुमसे लाड लड़ाने.
अम्मा का मन भी पिघलने लगा. ठीक है..ठीक है तुम ही सुखिया को सिर पर बिठाए रखते हो ससुराल जाएगी तो तुम्ही को तकलीफ ज्यादा होगी.... इसलिए कहते हैं...इतना लाड़- दुलार ना करो इससे.... एक दिन रुला कर चली जाएगी, सुखिया की अम्मा जब तक हमारे पास है तब तक तो प्यार कर लो.
अच्छा जाओ दो लीटर दूध ले आओ ज्यादा भाषण न दो सुखिया के पापा.....अपनी चिरैया पर.....
मैं भी अपने बापू की चिरैया थी हमारा दर्द तो कभी समझ ना आए तुमको....
अरे! सुखिया की अम्मा कहाँ तुम बेटी से तुलना करने लगी.....चलो मैं आज फिर से बारात लेकर आऊंगा और तुम भी गुड़ियाँ को दुल्हन बनाते समय थोड़ी सज -धज लेना.…गुड्डे- गुड़ियों की शादी के साथ हम भी दोबारा शादी कर लेंगे।
अच्छा... तो तुम भी इस उमर में आकर के रसिया गए हो....दोनों एक दूसरे को देख कर ठठाकर हँसने लगे.
जाओ अब हमें भी काम करने दो ढेर सारा काम आन पड़ा है...
हम भी जा रहे हैं खेत पर बहुत सारा काम बाकी है।
धान की रोपाई चल रही है,दूध लाकर दे देता हूँ ..... खीर थोड़ा स्वादिष्ट से बनाना सुखिया को खीर बहुत पसंद है। हमें खेत से लौटने में देर हो जाएगी शाम तक आ जाएंगे. तुम सारी तैयारी करके रख लेना और तीनों भाइयों को भी अच्छे से तैयार कर देना....
सुखिया को भी वह लाल वाला लहंगा जो उसके जन्मदिन में लाकर दिए थे, वही पहना देना,
सुखिया की अम्मा- तुम भी वही लाल वाली साड़ी पहनना.... उसमें तुम सुंदर लगती हो...अच्छा! अब जाओ खेत पर तुमको अब यही सब सूझता है....और मन ही मन मुस्कुराने लगी।
सुखिया की अम्मा जल्दी-जल्दी रसोई के काम निपटाने लगी उसे बहुत ढेर सारी तैयारी करनी थी, वह सुखिया को आवाज दी -सुखिया!--कहाँ हो?"जल्दी से अपनी सहेलियों को न्योता दे कर आ जाओ.… सबको शाम में आने के लिए कहना... दिन में किसी को आने के लिए नहीं ...जल्दी आकर सब हुडदंग मचाएंगे... साथ ही फूलकाकी को भी कह देना... वह गीत बहुत अच्छा गाती है...विवाह के दो गीत गा देगी ",ठीक है अम्मा....कहकर सुखिया सब को न्योता देने चली गई, इधर तीनों भाइयों को भी काम बांट दिया गया....मंडप बनाने की जिम्मेदारी उसे ही सौंप दी गई, तीनो भाई बड़े ही उत्साह से काम में लग गए..... पूजा वाली चौकी लाकर उस पर अम्मा की लाल साड़ी बिछा दी गई साथ ही चारों तरफ केले के पत्ते से बांध दिया गया फिर बाड़ी से ही फूल पत्ती लाकर चौकी को सजा दिया गया।
सुखिया जल्दी से न्योता देकर अपने गुड्डे गुड़ियों को सजाने लगी. अम्मा का श्रृंगार डिब्बा ही ले आई और उसे सजाने लग गई,,, गुड़िया का लहंगा चोली तो गांव के ही सुलेमान काका के यहां से एक दिन पहले ही बन कर आ गई थी.... सुलेमान काका को जब गुड्डे गुड़ियों के कपड़े बनवाने दी थी उसी समय उन्हें शादी में आने का न्योता भी दे दिया था।
शाम हो गई घर के सभी लोग तैयार हो गए गुड्डे गुड़िया भी दूल्हा दुल्हन के जोड़े में तैयार हो गए दोनों मंडप वाली चौकी पर बैठ गए। सुखिया की सहेलियां भी आंगन में आ गयी थी, फुल काकी भी आंगन में आकर विवाह के गीत गाने शुरू कर दिए....घर में ऐसा लग रहा था मानो वास्तव में सुखिया की ही शादी हो रही हों और सभी शादी को संपन्न कराने में लगे हो।
इधर सुखिया बार बार दरवाजे की ओर ही देख रही थी,
उसकी नजरें अपने बाबूजी को ढूंढ रही थी.... अभी तक घर नहीं आए। वह अम्मा से पूछने गई-" अम्मा -अम्मा बाबूजी अभी तक घर नहीं आए"। बाबूजी हाट चले गए होंगे तुम परेशान मत हो जल्दी आ जाएंगे और अम्मा अपने काम में लग गयी।
सुखिया फिर से गुड्डे गुड़ियाँ की शादी में व्यस्त हो गई.... पर उसका मन कहीं नहीं लग रहा था, वह रह रह कर के दरवाजे की ओर देख रही थी.... पर उसके बाबूजी नहीं आ रहे थे, अंधेरा होने लगा था, घर मे सभी व्यस्त थे. किसी को बाबूजी की फ़िक्र नहीं थी सिवाय सुखिया के।
वह बिना कुछ बताए घर से निकल गई, खेत की ओर जाने लगी जहाँ उसके बाबूजी काम कर रहे थे, पगडंडियों पर चलते हुए उसे थोड़ा डर भी लग रहा था, वह तेज कदमों से चली जा रही थी, तभी उसको पीछे से कुछ कदमों की आहट सुनाई दी, वह थोड़ा ठिठक गई, लेकिन फिर से तेज कदमों के साथ आगे बढ़ने लगी और डर इतना हावी हो गया कि वह दौड़ने ही लग गई, फिर अचानक में तीन-चार लोगों ने उसे कस कर पकड़ लिया वह जोड़ -जोड़ से चिल्लाने लगी....तभी किसी ने उसके मुँह को कस कर बंद कर दिया और खींचकर उसे गन्ने के खेत की ओर ले गए, नन्ही सी बच्ची उन चार लड़कों के चंगुल से बचने की पुरजोर कोशिश करने लगी... मुँह पर से हाथ हटते ही किसी के बाँह पर जोड़ से दाँत काटा था, जिससे किसी ने जोड़ से सुखिया के गाल पर चाँटा मारा था, उसकी कनपट्टी लाल हो गयी थी.. फिर से मुँह में किसी ने गमछा ठूंस दिया,...अपने आप को इन दरिंदो से बचाने की पुरजोर कोशिश कर रही थी परन्तु चारों उसे कसकर दबोचे हुए था, किसी ने उसके लाल फ्रॉक को खोलने की कोशिश की..... उसी समय सुलेमान काका पगडंडी से होकर घर लौट रहे थे तभी उन्हें गन्ने के खेत में से कुछ आहट सुनाई दी, वह कुछ देर रुक गए उन्हें लगा कि कोई जानवर खेत में घुस आया है और वह हट -हट की आवाज लगाने लगे.... टॉर्च जलाकर गन्ने के खेत की ओर रोशनी डाली तो उन्हें बीच में कुछ लाल रंग के दिखाई दिए वह गन्ने की खेत की ओर बढ़ने लगे तभी तीन चार लड़के तेजी से भागते हुए दिखाई दिए। सुलेमान काका के पैर ठिठक गए सोचा इसलिए समय गन्ने के खेत में ये लड़के क्या कर रहें थे वो कुछ और बढ़े और टोर्च की रोशनी जलाकर देखने लगे...उन्हें लाल कपड़े जैसी चीज दिखायी दी... वह और करीब जाने लगे... देखा तो सुखिया बदहवास खड़ी हैं उसका मुँह तौलिए से बंधा हैं। सुलेमान काका को देख....दौड़ कर पकड़ लिया , सुलेमान काका आश्चर्य से! सुखिया-"तुम यहाँ पर कैसे आई? कौन थे यह लोग...आज तुम्हारे गुड्डे गुड़ियों की शादी हैं?...”
सुलेमान काका सुखिया के मुँह पर बँधी तौलिए को खोल गोदी में उठा लिया.....उसके आँसू पूछते हुए कहा- "क्या हुआ बेटा? तुम इतने शाम में यहाँ कैसे आयी"? काका मैं बाबूजी को ढूंढने के लिए घर से निकली थी लेकिन रास्ते में यह चार लड़कों ने मुझे पकड़ लिया और गन्ने के खेत की तरफ खींच कर ले गए......"क्या तुम्हारे साथ कुछ गलत किया बेटी?"
तुम नहीं आते काका तो यह लोग मुझे मार देते....यह सभी मेरा फ्रॉक खोल रहे थे. सुलेमान काका सन्न रह गए .... चलो घर चलो बेटी।
इधर बाबूजी हाट से घर आ चुके थे।
सुखिया..... ऐ! सुखिया देख तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ हाट से... ढ़ेर सारा बैलून, खिलौने, और सलवार-कुर्ती भी लाया हूँ, जल्दी से आ, पर आंगन में लोगों के शोरगुल से किसी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था .... सुखिया भी कहीं दिखायी नहीं दे रही थी।
ऐ! सुखिया की अम्मा, सुखिया कहाँ हैं? वो मेरी आवाज़ से ही दौर पड़ती हैं, आज़ कहाँ हैं?
होगी यहीं कहीं तुम्हारी लाडली, दिन भर घर को सिर पर उठाये रखती हैं, अभी तो गुड्डे-गुड़ियाँ को सजाकर मंडप पर रख रही थी, अपने भी सज-धज्ज कर बैठी थी, तुरंत कहाँ चली गयी.... देखती हूँ कहाँ गयी?
फूल काकी सुखिया कहीं दिखायी दी हैं क्या? नहीं बहुरिया अबही तो मंडप पर अपने गुड्डे-गुड़ियाँ के साथ बैठी थी, और अपने बाबूजी की बाट जोह रही थी, अभी कहाँ चली गयी.... अपनी सखी सहेलियों के पास होगी देखो वहाँ.... सब सहेलियाँ तो आँगन में हैं, वो नजर नहीं आ रही हैं,.
सब गुड्डे-गुड़ियाँ की शादी छोड़ सुखिया को खोजने में लग गए.... पर सुखिया कहीं नजर नहीं आ रही थी घर का कोना-कोना ढूंढ लिया सब पर सुखिया, नहीं मिली,
अब तो अम्मा का कालेज मुँह में आ गया,.... अरे! मेरी सुखो कहाँ चली गयी?.….और लगी रोने...
सुखिया के बाबूजी दालान पर जाकर देख आओ, या गाँव में किसी के घर तो नहीं चली गयी,
अरे! मेरी सुखिया....और फिर अम्मा रोने लगी।
बाबूजी भी टोर्च लेकर निकलने लगे.... तभी दरवाजे पर सुलेमान काका की आवाज़ सुनाई दी.... अरे! बिन्देसर कहाँ हों? साथ ही सुखिया भी दिखायी दी। सभी दौड़े आए....क्या हुआ सुलेमान भाई? सुखिया आपके साथ कहीं गयी थी?
नहीं-नहीं! आज़ तुम्हारी चिड़िया हैवानियत की शिकार होते होते बच गयी, यदि मैं तुम्हारे खेत की पगदंडी से होकर नहीं जाता तो आज़ ये नहीं बचती, वो तो अल्लाह का कर्म हैं जो मैं उधर से गुजर रहा था और मुझे तुम्हारी खेत में कुछ सुगबुगाहट दिखायी दिया, मुझे लगा कोई जानवर घुस गया हैं और मैं उसे भागने के लिए चला गया और सुखिया पर नज़र पड़ी.सुखिया तुम्हें खोजते -खोजते वहाँ चली गयी थी।
बिन्देसर और सुखिया के अम्मा के तो होश ही उड़ गए, अम्मा सुखिया को कस कर पकडे गोदी मे बैठाये हुए थी सुखिया भी डरी सहमी अम्मा से लिपटी थी। यह बात तो पूरे गाँव में जंगल के आग की तरह फ़ैल गयी,
पूरा गाँव आँगन में उठ कर आ गया।
बिन्देसर -"वो लोग कौन थे सुलेमान भाई?
सुलेमान -"मैं जब तक वहाँ पहुँचता तब तक वो लोग भाग गए थे.. यही शायद तीन-चार लडके थे। जिसे मैं नहीं पहचान सका।
बिन्देसर -"चलो भाई रपट लिखाने, नहीं छोडेंगे उन सालों को"
आँगन में आए गाँव के लोगों ने भी उत्तेजित होंकर कहा -"हाँ-हाँ चलो हम भी चलते हैं, हमारे गाँव की बेटी-बहू का सवाल "ऐसे नहीं छोडेंगे किसी को"।
तभी जोर से चिल्लायी सुखिया की अम्मा -"हम नहीं जायेंगे थाने रपट लिखाने, हमारी बेटी की इज्जत का सवाल हैं, हमारी बेटी से उलूल-जुलूल सवाल पूछेंगे। थाना चौकी का जिंदगी भर चक्कर काटते रह जायेंगे,
"भगवान की कृपा से हमारी बिटिया को कुछ हुआ तो नहीं
सारी जिंदगी एक कलंक लग जाएगी, सो हम तो नहीं जाएंगे,”
"सुखिया के बाबूजी तुम भी इस झमेला में नहीं पड़ो.बैठे बिठाएं एक मुसीबत हों जाएगी, बेटी को कोई ब्याहने भी नहीं आएगा ऐसे में"
बिन्देसर जोर से चिल्लाते हुए कहा -तुमको बेटी के ब्याह की चिंता पड़ी हैं, उसके जीवन की चिंता नहीं हैं।
चल सुखिया उठ...रोना धोना बंद कर...तुम मेरी साहसी चिड़ियाँ हैं, उड़ना जानती हैं, हिम्मत रख डरने की कोई बात नहीं हैं, तुम्हारा बाबूजी तुम्हारे साथ खड़ा हैं, किसी पुलिस दरोगा से डरना नहीं हैं,.... और कहते हुए सुखिया का हाथ पकड़ माँ के गोद से खींचते हुए, अपने गोद में उठा लिया,
सुखिया की अम्मा रोते और काँपते स्वर में कहा -"तुम ठीक नहीं कर रहें हों सुखिया के बाबूजी, जीवन भर पछताओगे, कोई गाँव वाला तुम्हारा साथ नहीं देगा, अकेले रह जाओगे, " सुखिया अभी बहुत बच्ची और नादान हैं उसे कोर्ट कचहरी में मत धकेलो।
सुखिया अम्मा को रोते देख बाबूजी के गोदी से उतर अम्मा के पास जाकर उससे लिपट गयी -"अम्मा तुम नहीं रोओ, मैं सब दरोगा चाचा को सच सच बता दूँगी, तुम ही कहती थी न कि सच की हमेशा जीत होतीं हैं तो फिर किसलिए डरती हैं, हमलोग तो कोई अपराध नहीं किये हैं तो किसलिए दरोगा चाचा से डरेंगे "हमें जाने दो अम्मा,” बिन्देसर, सुलेमान काका, और गाँव के सभी बूढ़े-बुजुर्ग एक झुंड थाने पहुँचे,...
अचानक गाँव के इतने सारे लोगों को देख कर दरोगा साहब सकते में आ गए... जरूर कुछ बड़ी घटना हुई हैं.
कुर्सी पर बैठते हुए कहा -"क्या हुआ सुलेमान भाई?" सुलेमान -"अरे दरोगा साहब आपलोग के रहते हुए भी गाँव में बहू -बेटी सुरक्षित नहीं हैं, तभी बिन्देसर ने कहा -“अब तो गाँव में छोटी-छोटी बच्चियों का भी घर से निकलना मुश्किल हों गया हैं” “क्या हुआ भाई? कुछ बताओगे भी, बच्ची के तरफ देखते हुए इशारा किया इस बच्ची को क्यों लाये हों?”
यह मेरी बेटी हैं सुखिया बिन्देसर ने कहा "-आज़ शाम में मुझे ढूंढ़ते-ढूंढ़ते खेत पर चली गयी, वहाँ कुछ लड़कों ने इसके साथ जोड़-जबरदस्ती करने की कोशिश की।
दरोगा साहब ने बच्ची पर नज़र डाली बच्ची, निर्भीक, शांत होकर चुपचाप कुर्सी पर बैठी थी
दरोगा साहब बच्ची से पूछा क्या हुआ? तुम्हारे साथ पूरी घटना बताओं, सुखिया ने बिना डरे सारी घटना बता दी। “सुखिया बेटा क्या तुम उन लडको को जानती हों?” -दरोगा साहब ने पूछा “नहीं दरोगा चाचा-गाँव में इन लडको को कभी नहीं देखे थे, लगता हैं सभी लडके आसपास के गाँव के होंगे”
“क्या तुम उन लडको को पहचान सकोगी?” - हाँ में सुखिया ने सिर हिला दिया।
ठीक हैं बिन्देसर अभी तुमलोग सभी गाँव जाओ मैं तहकीक़ात करता हूँ, और उन चारों को पकड़ कर कड़ी से कड़ी सजा दिलाता हूँ। तुमलोग अभी जाओ जब जरुरत पड़ेगी तब फिर से आना पड़ेगा सभी को।
दिन बितते जा रहा था, इस घटना के हुए एक महीना होने होने को था। एक दिन अचानक एक सिपाही ने आकर बिन्देसर को कहा – “दरोगा साहब ने सुखिया को बुलाया हैं,” सुखिया की अम्मा दौरे हुए आँगन में आयी और पूछा – “क्या सभी लडके पकड़े जा चुके? “हाँ! पास के गाँव के कुछ दबंग लडके हैं, उसपर संदेह हैं उसी के पहचान के लिए बुलाया हैं दरोगा साहब ने” नहीं-नहीं अब हमारी बिटिया नहीं जाएगी थाने उन लडको के पहचान के लिए। "सुखिया की अम्मा तुम बेटी को हिम्मत देने के बजाय उसे डरा रही हैं उसको जाने से रोक रही हैं," सुखिया के बाबूजी अम्मा को समझाने लगे – “बेबजह अपने भी डरती हैं और बच्चों को भी डराती हैं।“
"अम्मा तुम डरो मत दरोगा चाचा अच्छे हैं,"- कहकर सुखिया अपने बाबूजी की अंगुली पकड़ जाने लगी।
अम्मा -दरवाजे से पिता और बेटी को जाते देख ख़ुश भी हुई और एक अनजाना डर बेटी के भविष्य का भी था। आशंका थी क्या होगा?
सुखिया थाने में बिना डरे चारों लडको को पहचान लिया था। सुखिया के इस साहसिक कदम से दरोगा साहब बहुत प्रभावित हुए... बिन्देसर की ओर देखते हुए कहा -"बिन्देसर तुम्हारी बेटी बहुत बहादुर है, इसे खूब पढ़ाना- लिखाना...भविष्य में जरूर तुम्हारी बेटी नाम करेगी,” सुखिया सभी लड़कियों के लिए प्रेरणास्त्रोत है।
"जी दरोगा साहब - ये सब आपकी कृपा है, आप यदि साथ नहीं देते तो हमारी बिटिया को न्याय नहीं
मिलता " -हाथजोड़ कर खड़े बिन्देसर ने कहा, और मन ही मन आज़ उसे अपनी चिड़िया रानी पर गर्व महसूस हों रहा था।
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| प्रबंध सम्पादक |
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- सुशीला मोहनका
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी मानद सदस्यों का अभिवादन है।
आशा करती हूँ आप इस Covid-19 की सुनामी की इस तीसरी लहर में अपना एवं अपने परिवार का पूरा ध्यान रख रहे होंगे। इस महामारी में यह बहुत आवश्यक है की आप सरकार के बनाये स्वस्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे एवं स्वस्थ्य रहें।
कोविद की तीसरी लहर की बढ़ती हुयी गति को देखकर अधिवेशन समिति को बाध्य हो कर आभासी विधि से अ.हि.स. का २०वाँ अधिवेशन करने का निर्णय लेना पड़ा |
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति का २०वाँ अधिवेशन ९ और १० अक्टूबर २०२१ को ओहायो में आभासी विधि से होने जा रहा है तथा अधिवेशन का मूल विषय ‘’दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने और सिखाने की विधि” (Teaching and Learning Techniques for Hindi as a 2nd Language) है।
इस शुभ अवसर पर एक स्मारिका भी प्रकाशित करने की योजना है। अधिवेशन में आप सभी अपनी-अपनी भागीदारी निभायेंगे ऐसा मेरा विश्वास है। उसमें तन-मन-धन से सभी का सहयोग अपेक्षित है। आप सभी जानते हैं कि अधिवेशन के समय समिति को विभिन्न विधायों के विशेषज्ञ स्वयंसेवकों की आवश्यकता होगी जैसे:- वैबसाइट, पत्रकारिता, पब्लिक रिलेशन, आदि विधायें।
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