APRIL INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अप्रैल 2025, अंक ४५ । प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र। सम्पादक: डॉ. शैल जैन
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों एवं पाठकों का अभिनंदन।
महावीर जयंती, ईद, ईस्टर, रामनवमी, बैशाखी, गुड़ी पड़वा एवं हिन्दू नव वर्ष की शुभकामनाएँ ।
हमारी संस्था के द्विवार्षिक सम्मेलन की तारीख़ अब बिल्कुल क़रीब आ गई है । उत्तर पूर्व ओहायो शाखा, जिन्होंने मेज़बानी की ज़िम्मेवारी ली है , पूरे ज़ोर शोर से तैयारियों में लगीं हैं, इसे सफल, फलदायी और यादगार बनाने के लिये । उम्मीद करती हूँ कि आप भी हमारे सम्मेलन का हिस्सा बनेंगें ।
जब हम अंतर्राष्ट्रीय द्विवार्षिक कन्वेंशन के लिए एकत्र होते हैं, तो हम अपनी संस्था के उद्देश्य को आगे बढ़ाते है और सबों के साथ विचार विमर्श कर आगे बढ़ने का नया रास्ता भी खोजने की कोशिश करते हैं । सम्मेलन एक अनूठा मिश्रण है जो वैश्विक जुड़ाव, दूरदृष्टि और क्रियान्वयन को एक साथ लाकर हमें स्थायी परिवर्तन लाने के लिए सशक्त बनाता है। सम्मेलन में ट्रस्टी, वर्तमान और पूर्व अधिकारी, हमारे सदस्य और इच्छुक गैर सदस्य सभी एकजुट होकर कार्य करते हैं और हमारे उद्देश्य को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं ।
समिति में लोग एक उद्देश्य किंतु विभिन्न विचारों के साथ एकजुट होते हैं और कार्रवाई करते हैं ताकि वैश्विक, सामुदायिक और व्यक्तिगत स्तर पर दुनिया में स्थायी परिवर्तन लाया जा सके।हमें एक महत्वपूर्ण लक्ष्य को कभी नहीं भूलना चाहिए—कि दुनिया में परिवर्तन लाने के लिए, हमें अपने भीतर भी परिवर्तन को अपनाना होगा। अपने परिवार और आसपास बसे नई पीढ़ी को हिन्दी भाषा और भारतीय संस्कृति से जोड़ना और उन्हें उत्साहित करना होगा।
सम्मेलन का पहला सत्र शुक्रवार संध्या मई २ को है। इसमें मेदाइना सिटी के मेयर पधार रहें हैं । ये शाम हमें भारतीय संस्कृति और भाषा से जोड़ने वाली है, विभिन्न स्थानीय और कुछ हमारी शाखाओं के कलाकारों के द्वारा । कार्यक्रमों का अनुभव , सभी उम्र के कलाकारों और दर्शकों से मिलने जुलने का आनंद और अच्छे व्यंजनों का स्वाद सबों का भरपूर आनंद लीजिये और प्रस्तुति कर्ताओं का मनोबल बढ़ाइये ।
दूसरा सत्र शनिवार दिन मई २ तारीख़ को है । प्रेरणादायक मूल विषय “ हमारी युवा पीढ़ी, डिजिटल युग मैं हिंदी और भारतीय संस्कृति” पर प्रस्तुति और विचारों का मंथन कार्यक्रम है । यह कार्यक्रम हम सबों के लिये एक नई ऊर्जा, युवाऑ के लिए नया रास्ता और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के मिशन की आधारशिला का नया मोड़ लायेगा ।आप सबों से अनुरोध है कि ईस कार्यक्रम में जरूर आयें और आप के सुझावों का स्वागत है । अगर आपके पास हमारे अधिवेशन के मूल विषय से जुड़े सुझाव हैं या आप इस विषय पर ख़ास प्रतिभा रखते हैं तो कृपा कर मुझसे संपर्क क़रें ताकि हम इसका लाभ ले सकें ।
तीसरा सत्र भी बहुत ख़ास है। एक अनूठी काव्य संध्या, तीन जाने माने कवियों के साथ। माननीय अभिनव शुक्ला हास्य कवि, कवित्री अर्चना पांडा गीतकार , श्री इंद्रा अवस्थी व्यंगकार। तीनों मिलकर आपको साहित्यिक स्वाद और मनोरंजन देंगें ।
जब हम अपनी संस्था की उपलब्धियों पर चिंतन करते हैं और प्रतिबद्धता का जश्न मनाते हैं, तो हम ये भी जानते हैं कि हमारे सदस्य और अन्य पाठक अपनी सेवा के माध्यम से इस उद्देश्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम सब के विचार, हमारी सोच और हमारी कार्य प्रणाली भिन्न हो सकती है पर हमारा उद्देश एक ही है - भारत की भाषा और संस्कृति का विकास।एक दूसरे के विचारों को लेकर हमें आगे बढ़ना है तभी हम सफल हो पायेंगें ।
हमारे सदस्यों और पाठकों से मैं विनम्र निवेदन करती हुँ कि वे हमें अपना सहयोग दें ।आप विभिन्न तरीकों से हमें सहयोग दे सकते हैं ।सम्मेलन में आ कर इसे सफल बनाएँ, अपने सुझावों को हमसे साझा करें, हमारे कार्येक्रम का प्रचार करने की कोशिश करें, आर्थिक सहायता या अपनी प्रतिभा के अनुसार संस्था को मदद करें । तकनीकी सहायता की समिति को बहुत आवश्यकता है और यदि आप नि:शुल्क हमें सहायता प्रदान कर सकते हैं तो कृपा कर मुझे कॉल कीजिये ।
आइये हम मिल कर दो दिनों का उत्सव क्लीवलैंड, ओहायो में मनाये। कार्यक्रमों, अच्छे व्यंजनों, एक दूसरे के साथ मिलने और विचारों के मंथन के साथ ।
धन्यवाद,
शैल जैन
डॉ. शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्षा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (2024-25)
ईमेल: president@hindi.org | shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: +1 330-421-7528
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
२२ वाँ द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन २०२५
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का २२ वाँ द्विवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन
दिन -मई २ (शुक्रवार) एवं ३ (शनिवार ), २०२५
स्थान - रिचफील्ड, ओहायो
आतिथ्य – अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्व ओहायो शाखा
अधिवेशन का मूल विषय – 'नई पीढ़ी, डिजिटल युग में हिंदी और संस्कृति'
Theme -'New Generation, Hindi and Culture in the Digital age
पंजीकरण खुला है ।
Please Registration soon
Register Now
or
https://www.eventcreate.com/e/ihaconvention2025
नोट - अधिवेशन में सारी गतिविधियाँ मूल विषय के लक्ष्य की पूरक रहेंगी ।
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नई पीढ़ी के बहुप्रतिष्ठित हास्य कवि तथा व्यंगकार अभिनव शुक्ल हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गुदगुदाते घनाक्षरी छंदों के लिए पहचाने जाते हैं। अपने आसपास घटने वाली घटनाओं से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से कसे उनके व्यंग बाण किसी पत्थर का भी दिल आर पार करने की क्षमता रखते हैं। अभिनव की रचनायें देश-विदेश की अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक अवसरों पर रेडियो और टेलीविज़न पर उनका काव्य पाठ प्रसारित हो चुका है। हिन्दी कविता के लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम कवितांजलि में भी अभिनव के संचालन को श्रोताओं नें पसंद किया है। अभिनव बैंगलोर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'दक्षिण भारत' के नियमित व्यंग स्तंभकार भी रहे हैं। वे ई-विश्वा (अमेरिका), हिन्दी चेतना (कनाडा), कवितांजलि (बैंगलोर) समेत अनेक पत्रिकाओं के संपादक मंडल में रह चुके हैं। हिन्दी ब्लाग जगत में 'निनाद गाथा' नमक चिट्ठे पर फरवरी २००६ से नियमित लेखन करने वाले अभिनव को अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन (२००१) गाज़ियाबाद में 'काव्यश्री' की उपाधि से भी सम्मानित किया जा चुका है। सन २००५ में अभिनव नें प्रख्यात गीतकार सोम ठाकुर और वरिष्ठ कवि उदय प्रताप सिंह के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका के १४ नगरों में हुए कवि सम्मेलनों में अपनी चुटीली कविताओं तथा प्रबुद्ध संचालन प्रतिभा से हजारों प्रवासी साहित्य प्रेमियों को चमत्कृत किया था। अभिनव आजकल सैन एन्टोनिओ नगरी में रहते हैं तथा अपनी कविताओं की सुगंध सारे संसार में बसे भारतीयों के हृदय हृदय में बिखेर रहे हैं। पेशे से अभिनव एक सॉफ्टवेर इंजीनियर हैं|
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लखनऊ के अखिल भारतीय कविता पीठ से ‘महादेवी वर्मा’ सम्मान से सम्मानित अर्चना पांडा बे-एरिया अमेरिका की एक सुविख्यात कवयित्री हैं। श्रृंगार रस में माहिर अर्चना अपनी मधुर वाणी और प्रेम गीतों के लिए प्रख्यात हैं। यह देश-विदेश के कई कवि सम्मेलनों मे भाग ले चुकी हैं और मंच पर गोपाल दास नीरज, मुन्नवर राना, कुँवर बैचेन, और कुमार विश्वास जैसे नामी कवियों के साथ अपनी कविताओं का प्रस्तुतिकरण कर चुकी हैं। अर्चना इन्टरनेट के ज़रिये बहुत प्रसिद्ध हैं। आपकी कविताओं के विडियो को यू-ट्यूब पर दस लाख से अधिक लोगों ने देखा और सराहा है। विश्व हिन्दी सम्मलेन २००७ न्यूयार्क में विमोचित ‘सृजनी’ तथा ‘काव्य-अर्चना’ नामक सीडी, और पुस्तकों में ‘तुम्हारी अर्चना’ और ‘सृजनी’ आपके प्रकाशित रचना संकलन हैं। शीघ्र ही इनकी एक और पुस्तक प्रकाशित होने जा रही है। कविता के साथ इनकी गहरी रूचि गायन, वादन, नृत्य, एवं साहित्य में भी है | अर्चना ने कई प्रसिद्ध आयोजनों का संचालन भी किया है | आजकल आप रेडियो ज़िन्दगी 1550 एएम् पर हर रविवार को काव्य कार्यक्रम ‘मैं शायर तो नहीं’ का आयोजन और प्रसारण करती हैं तथा बे-एरिया के कई सामाजिक संस्थानों में हिन्दी पढाती हैं। पेशे से अर्चना एक सॉफ्टवेर इंजीनियर हैं|
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कोलकाता में जन्मे और पले-बढ़े इन्द्र अवस्थी ने हिंदी साहित्य में अपना विशेष स्थान बनाया है। एन आई टी प्रयागराज से कंप्यूटर साइंस में स्नातक, इन्द्र 1995 में अपने परिवार के साथ पोर्टलैंड आ गए। उनके पिता, अरुण प्रकाश अवस्थी, जो कोलकाता के एक प्रसिद्ध कवि और लेखक थे, ने उनके साहित्यिक प्रयासों को बहुत प्रभावित किया। इन्द्र हिंदी संगम, पोर्टलैंड के संस्थापक सदस्य हैं, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदी भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। उनकी हास्य लेखनी और व्यंग्य को कविता में पिरोने की क्षमता ने उनकी रचनाओं को व्यापक रूप दिया, जिसे खूब सराहना मिली। कविता के अलावा, इन्द्र नाटकों और स्क्रिप्ट लेखन और निर्देशन में भी माहिर हैं, जो अक्सर सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डालते हैं। हिंदी साहित्य के प्रति इन्द्र की प्रतिबद्धता परामर्श, साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजन और हिंदी प्रेमियों के लिए एक समुदाय बनाने तक विस्तारित है। उनके प्रयासों ने उन्हें विभिन्न साहित्यिक समाजों और सांस्कृतिक संगठनों से मान्यता दिलाई है। इन्द्र अवस्थी की यात्रा साहित्य की शक्ति और सांस्कृतिक संरक्षण के महत्व का प्रमाण है। अपनी कविता, हास्य लेखन और साहित्यिक समुदाय में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से, उन्होंने हिंदी भाषा और संस्कृति के प्रसार पर एक स्थायी प्रभाव डाला है, चाहे भारत में हो या विदेश में। उनकी कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है जो शब्दों की शक्ति के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना चाहते हैं।
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तैयार हो जाइए, क्योंकि आ रहा है अविस्मरणीय, और भव्य हिंदी भाषा अधिवेशन!
कल्पना कीजिए - एक ऐसा भव्य आयोजन जहाँ संस्कृति, भाषा और मनोरंजन का अनोखा संगम हो। जहाँ कविता, संगीत, नृत्य और बहुत कुछ आपके मन को छू जाएँ।जहाँ परंपरा का हाथ थामे आधुनिकता चलती है, और हर क्षण एक नई कहानी कहने को तैयार रहता है। तो आइए, इस अविस्मरणीय यात्रा का हिस्सा बनिये -जहाँ हर शब्द की महत्ता है, हर सुर गूंजता है, और हर हृदय हिंदी में धड़कता है। इस विशेष हिंदी महाधिवेशन को आपकी प्रतीक्षा है जहाँ होगा उत्सव - हिंदी का, भारत का, और सबसे महत्वपूर्ण - आपका!
यहाँ होंगे दिल को आल्हादित करने वाले प्रदर्शन, आत्मा को छू लेने वाली बौद्धिक चर्चाएँ, और शब्दों की ध्वनि से बुनी मखमली कहानियाँ। देर मत कीजिए - हमारी अनमोल विरासत और संस्कृति की इन जादुई प्रस्तुतियों का आनंद अवश्य उठाइए।
सत्र 1- शुक्रवार, मई 2 , 2025, शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक
स्थान: हाइलैंड हाई स्कूल, 4150 रिज रोड, मेडिना, ओहायो 44256
निश्चित ही आपने कभी न कभी अपनी भाषा, हिंदी, को सुदूर सात समुन्दर पार उसी गरिमा और प्रेम के साथ संजोने का सपना देखा होगा, जहां यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि आपकी पहचान, आपकी जड़ों और आपके अस्तित्व की गूंज हो। आपका ये सपना साकार होने जा रहा है - इस अधिवेशन के माध्यम से! अपनी मातृभाषा की आत्मा से जुड़कर उस संसार में कदम रखिए - जहाँ हर धड़कन हमारी समृद्ध धरोहर के स्पंदन का अनुभव करवाएगी। यह हमारी भाषा, हमारी कहानियों और हमारी जड़ों के पुनर्मिलन का पर्व है। हिंदी के इस अनूठे उत्सव का आनंद उठाइए, क्योंकि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। यहाँ आप देख पायेंगे हिंदी को सीमाओं से परे जीवंत बनाए रखने की हमारी प्रतिबद्धता की ओर उठे कदमों की झलकियां!
सत्र 2- शनिवार, मई 3 , 2025, सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक
स्थान: क्वालिटी इन, 4742 ब्रेक्सविल रोड, रिचफील्ड, ओहायो 44286
भविष्य का निर्माण, अतीत का संरक्षण - एक शैक्षणिक यात्रा!
आज के इस आधुनिक संसार में जीवन तीव्र गति से भविष्य की ओर अग्रसर है। क्या आप सोच रहें हैं कि ऐसी स्थिति में हम कैसे सुनिश्चित करें कि हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, और हमारी पहचान हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी रहे? तो आइये, इस विशेष सत्र में हम भाषा और प्रौद्योगिकी के दृष्टिकोण से सम्मेलन के मूल विषय को गहराई से समझेंगे। युवा और आने वाली पीढ़ियों के बीच की दूरी को कम करने के लिए विचार-विमर्श करेंगे, जिससे हमारी संस्कृति आधुनिक संसार में भी फलती-फूलती रहे। यह अधिवेशन हिंदी और भारतीय विरासत को सहेजने और भविष्य की राह तय करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आईये, आपके मूल्यवान विचार प्रस्तुत करिये। हमें विश्वास है कि आप ये पढ़, इस अधिवेशन के लिए अत्यंत उत्साहित हैं।
सत्र 3- शनिवार, मई 3, 2025, शाम 6 बजे से रात 10:30 बजे तक
स्थान: क्वालिटी इन, 4742 ब्रेक्सविल रोड, रिचफील्ड, ओहायो 44286
कुछ शब्द अंतर्मन को छू लेते हैं, कुछ विचारों को झकझोरते हैं और कुछ भीतर एक अलख ज्योत जगा देते हैं। इस सत्र में आयोजित होगी एक अनूठी काव्य संध्या जहाँ यह तीनों अनुभव होंगे—कबीर, तुलसीदास, निराला और पंत की भूमि से दूर, तीन प्रतिष्ठित कवियों के साथ। बनारस के गंगा घाट से लेकर क्लीवलैंड की ईरी झील तक, कविताओं की गूंज आपके मन-मस्तिष्क को भावनाओं से भर देगी। हास्य, व्यंग्य और आत्मिक शांति से भरी यह संध्या आपको साहित्यिक रसास्वादन देगी। इसके साथ, हमारे विशेष अतिथि से मिलें, जो हमारी विरासत को संजोए रखने की इस यात्रा में हमारे मार्गदर्शक हैं। आपके पास है हिंदी को विदेश में भी जीवंत बनाए रखने के प्रयास में लगे समाज के साथ जुड़ने का स्वर्णिम अवसर - तो इस आयोजन में अवश्य पधारें!
आईये, जल्दी से अधिवेशन में अपना पंजीकरण करें - पर्दा उठने से पहले अपना स्थान सुनिश्चित करें, इस ऐतिहासिक अधिवेशन का हिस्सा बनें और स्वर्णिम यादों की पुस्तिका सजाएँ - क्योंकि हमारी ज़ुबां पर है हिंदी और दिल है हिंदुस्तानी!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- न्यू जर्सी शाखा रिपोर्ट
होली कार्यक्रम
मार्च 3 - 27, 2025
द्वारा: बबिता श्रीवास्तव, शाखा अध्यक्षा
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अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की न्यू जर्सी शाखा में होली का उत्सव।
बबीता श्रीवास्तव न्यू जर्सी स्थित विलियम पैटरसन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति न्यू जर्सी शाखा की अध्यक्षा भी हैं । विलियम पैटरसन विश्वविद्यालय में कई भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय छात्र हैं, जिन्हें मैं हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित करती हूँ। भारतीय त्योहारों के बारे में छात्रों को सिखाने का प्रयत्न करने की कोशिश हमेशा रहती है ।
हमने होली का उत्सव मनाया और छात्रों को हिंदी में बातचीत करने के लिए प्रेरित भी किया।
मैं उन्हें बॉलीवुड नृत्य सिखाती हूँ क्योंकि हिंदी गीतों के माध्यम से यह हिंदी सीखने का एक रोचक तरीका है। भारतीय छात्रों को हिंदी सीखने के लिए आकर्षित करने का यह मेरा मुख्य कारण है।
मेरे ईन प्रयासों से मुझे बहुत सफलता मिल रही है। दोनों प्रयास युवा छात्रों में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में सफल रहे ।
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नार्थ केरोलाइना, यूएसए में होली उत्सव
द्वारा: डॉ. पूनम नारायण, नॉर्थ कैरोलाइना
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डॉ. पूनम नारायण एक चिकित्सक हैं। उन्होंने पटना, बिहार से अपनी चिकित्सा शिक्षा पूर्ण की। इसके बाद, उन्होंने 25 से अधिक वर्षों तक यूनाइटेड किंगडम में चिकित्सा का कार्य किया। पिछले दो वर्षों से, वे संयुक्त राज्य अमेरिका में अपने पुत्र और उनके परिवार के साथ नॉर्थ कैरोलाइना में निवास कर रही हैं। डॉ. नारायण हमेशा से भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रति समर्पित रही हैं।
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होली रंगों और हर्षोल्लास का त्योहार है, जो भारत के प्रमुख और प्रसिद्ध पर्वों में से एक है। आज यह विश्वभर में मनाया जाने लगा है, जहाँ भारतीय समुदाय अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखते हैं।
मैं २५ सालों से इंग्लैंड में निवास करती हूँ, लेकिन अपने भारतीय संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई हूँ। पिछले दो वर्षों से मैं अपने परिवार के साथ नॉर्थ कैरोलाइना में रह रही हूँ और यहाँ के भारतीय समुदाय से सक्रिय रूप से जुड़ी हूँ। इस वर्ष भी मुझे होली के उत्सव में सम्मिलित होने का अवसर मिला, और मैं अपने भारतीय मित्रों और परिवार के साथ इस रंगों के त्योहार में शामिल होकर अत्यंत आनंदित हुई।
यह उत्सव हिंदू सोसाइटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलाइना (HSNC) द्वारा 15 मार्च, 2025 को मॉरिसविल में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में पारंपरिक गीत-संगीत, रंग-गुलाल, और विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों का आयोजन था। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ, पुरुष सभी इस उत्सव में शामिल थे। यहाँ तक कि विदेशी महिलाएँ, पुरुष और बच्चे भी इस समारोह में भाग लेते दिखे, जो हमारी संस्कृति की सार्वभौमिकता को दर्शाता है।
सभी एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर गले मिलते नज़र आए, जिससे समुदाय में एकता और सौहार्द की भावना प्रबल हुई। रंगों का यह त्योहार हमें यह संदेश देता है कि हम सभी अपने भेदभाव और जातिवाद को भूलकर एकजुट होकर खुशियाँ बाँटें और समाज में प्रेम और सद्भावना को बढ़ावा दें।
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -भारतीय दूतावास, वाशिंगटन डी सी के सहयोग से
विश्व हिंदी दिवस 2025 पर हिंदी भाषण प्रतियोगिता
अमेरिका में रहने वाले हाई स्कूल विद्यार्थियों के लिये
द्वारा: डॉ. शैल जैन, अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष
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विश्व हिंदी दिवस 2025 के अवसर पर, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति ने भारतीय दूतावास, वाशिंगटन डीसी के सहयोग से अमेरिका में एक राष्ट्रीय हिंदी भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया।
यह प्रतियोगिता अमेरिका के सभी 9वीं से 12वीं कक्षा ( हाई स्कूल )के विद्यार्थियों के लिए आयोजित की गई थी।
प्रतियोगिता के विषय थे :
1. अमेरिका में रहने वाले युवा हिंदी क्यों सीखें?
2. भारतीय संस्कृति और परंपराएँ
3. अपने जीवन की किसी घटना पर आधारित लघुकथा
प्रतिभागियों को इन तीन विषयों में से किसी एक का चयन कर 3 मिनट का हिंदी भाषण वीडियो तैयार कर हमारे सिस्टम में अपलोड करना था।
इस प्रतियोगिता में 28 छात्रों ने अपने हिंदी भाषण वीडियो जमा किए।
प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में शामिल थे:
• डॉ. राजीव रंजन, मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी
• सुश्री कुसुम नापज़ीक, ड्यूक यूनिवर्सिटी
• सुश्री साधना कुमार, अल्बानी, न्यूयॉर्क (crossroad भाषा विशेषज्ञ)
• सुश्री रश्मि चोपड़ा, ओहायो (पब्लिक हाई स्कूल शिक्षिका)
चारों जजों ने सभी प्रतिभागियों के वीडियो का मूल्यांकन पूर्व निर्धारित मानदंडों के अनुसार किया। प्रत्येक प्रतिभागी के वीडियो को अलग-अलग स्कोर दिया गया और औसत अंकों के आधार पर विजेताओं का घोसणा जनवरी 10, विश्व हिंदी दिवस के दिन की गई ।
विजेताओं की सूची:
विषय 1: अमेरिका में रहने वाले युवा हिंदी क्यों सीखें? (14 प्रतिभागी, 3 विजेता)
प्रथम स्थान : अंतरा वैश्णवी, 10वीं कक्षा, टेनेसी
द्वितीय स्थान : स्तव्या अग्रवाल, 9वीं कक्षा, टेक्सास
तृतीय स्थान : राधा पारीक, 12वीं कक्षा, ओहायो
विषय 2: भारतीय संस्कृति और परंपराएँ (10 प्रतिभागी, 2 विजेता)
प्रथम स्थान : अवनी रामरक्षानी, 11वीं कक्षा, टेक्सास
द्वितीय स्थान : अनिका वर्मा, 10वीं कक्षा, मेरीलैंड
विषय 3: अपने जीवन की किसी घटना पर आधारित लघुकथा (5 प्रतिभागी, 1 विजेता)
विजेता: आरिनी पारीक, 12वीं कक्षा, इंडियाना
सभी प्रतिभागियों और विजेताओं को हार्दिक बधाई !!!
विजेताओं को सम्मानित करने के लिए भारतीय दूतावास ने 14 जनवरी 2025 (मंगलवार) शाम 5 - 6 बजे एक विशेष मान्यता समारोह का आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारतीय दूतावास, वाशिंगटन डीसी के प्रांगण में हुआ।मंगलवार का दिन होने के बावजूद हमारे दो विजेता अपने अभिभावकों के साथ समारोह में उपस्थित थे ।
दूतावास की टीम श्री जग मोहन, मंत्री (समुदाय एवं कार्मिक), सुश्री नेहा सिंह , प्रथम सचिव (प्रेस , सूचना एवं संस्कृति ), श्री रविश कुमार , द्वितीय सचिव ( प्रेस , सूचना एवं संस्कृति ) एवं अन्य प्रतिनिधि थे।अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की न्यासी समिति से श्री आलोक मिस्र , श्री तरुण सुरती ( न्यासी अध्यक्ष), डॉ शैल जैन, राष्ट्रीय अध्यक्षा, चौधरी प्रताप सिंह, स्थानीय शाखा अध्यक्ष और स्थानीय समुदाय के लोग इस समारोह में शामिल हुए।
यह कार्यक्रम वाशिंगटन डी.सी. शाखा अध्यक्ष चौधरी प्रताप सिंह जी के प्रयासों से ही संभव हो पाया। वे कई वर्षों से भारतीय दूतावास के साथ स्थानीय कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। इस वर्ष, उन्होंने हमारी समिति के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम शुरू करने की पहल की, जिससे हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार को नई दिशा मिली। उनके समर्पण और नेतृत्व के लिए हम हृदय से आभारी हैं।
विजेताओं के साथ- साथ सभी प्रतिभागियों के विचार बहुत ही प्रसंशनीय थे। अधिकतर प्रतिभागियों के विचारों के पीडीऍफ़ हमारे सिस्टम में डाले गये थे। word कॉपी कुछ की हमारे पास आ गयी हैं । इन युवाओं के विचारों को हमारे पाठकों तक पहुंचाने के लिये उन्हें संवाद पत्रिका में अप्रैल , मई और जून महीनों में शामिल किया जा रहा है।
पाठकों से अनुरोध है कि वें अपनी प्रतिक्रियाओं को हमसे साझा करें।
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प्रतियोगिता विजेताओं के विचार
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विषय 1: अमेरिका में रहने वाले युवा हिंदी क्यों सीखें?
प्रथम स्थान : अंतरा वैश्णवी, 10वीं कक्षा, टेनेसी
नमस्कार। मेरा नाम अंतरा वैष्णवी है और मैं दसवीं कक्षा की छात्रा हूँ। आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करने आई हूँ जो आपके भविष्य के साथ-साथ आपकी जड़ों, आपकी पहचान से भी जुड़ा है। और वह विषय है हिंदी भाषा, जो भारत की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और परंपराओं को जानने का माध्यम है।
भारत एक प्राचीन भूमि है जहाँ ज्ञान, कला और संस्कृति का भंडार है। यहाँ विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन हिंदी एक ऐसी भाषा है जो भारत की आत्मा है और हमें एक सूत्र में बाँधती है।
हिंदी सीखने से आप भारत के महान साहित्य, वेदों, पुराणों, उपनिषदों, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को समझ सकेंगे। ये ग्रंथ न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि जीवन जीने की कला, नीति, और दर्शन का भी ज्ञान देते हैं। हिंदी संस्कृत की ही एक विकसित रूप है जिसकी देवनागरी लिपि और शब्दावली की जड़ें संस्कृत में हैं, इसीलिए हिंदी जानने वालों के लिए संस्कृत सीखना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
हिंदी आपको विश्व भर में फैले भारतीयों से जोड़ती है। हिंदी आपको एक ऐसा माध्यम प्रदान करती है जिससे आप अपनी संस्कृति और अपने लोगों से जुड़े रह सकते हैं। बॉलीवुड फ़िल्में, संगीत और साहित्य, जो दुनिया भर में लोकप्रिय हैं, हिंदी भाषा के माध्यम से भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर पहुँचाते हैं और लोगों को एक दूसरे से जोड़ते हैं।
आज के वैश्विक युग में, हिंदी का महत्व और भी बढ़ गया है। भारत एक तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए हिंदी का उपयोग कर रही हैं, इसलिए हिंदी जानने से आपको अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और संबंधों में भी लाभ मिल सकता है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने ठीक ही कहा है, "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल"। अपनी भाषा की उन्नति ही हमारी सच्ची उन्नति है। हिंदी सीखकर आप न केवल अपनी मातृभाषा का सम्मान करेंगे, बल्कि भारत की गौरवशाली परंपरा को भी आगे बढ़ाएंगे।
हिंदी भाषा में ऐसे कई शब्द हैं जिनका अनुवाद दूसरी भाषाओं में नहीं किया जा सकता क्योंकि इन शब्दों का गहरा सांस्कृतिक अर्थ होता है जो अनुवाद करने पर खो जाता है। राजीव मल्होत्रा जी अपनी पुस्तक "संस्कृत नॉन-ट्रांसलेटेबल्स" में इस बात पर ज़ोर देते हैं कि संस्कृत के कुछ शब्दों, जैसे "अग्नि", "वायु", "ॐ", "शक्ति", "पूजा" आदि का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं करना चाहिए।
हिंदी भाषा ना सिर्फ भारत की सांस्कृतिक विरासत की वाहक है, बल्कि यह आपको वैश्विक स्तर पर जोड़ती है और भविष्य के लिए नए द्वार खोलती है। तो आइए, हम सब मिलकर हिंदी सीखें, अपनी संस्कृति को अपनाएँ, और विश्व में भारत का नाम रोशन करें !
धन्यवाद ! वंदे मातरम् !
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विषय 1: अमेरिका में रहने वाले युवा हिंदी क्यों सीखें?
द्वितीय स्थान : स्तव्या अग्रवाल, 9वीं कक्षा, टेक्सास
आदरणीय राजदूत महोदय, भारतीय मिशन के अधिकारी गण, साथियों और मित्रों!
नमस्ते! मेरा नाम स्तव्य अग्रवाल है, मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता हूँ और ह्यूस्टन, टेक्सास में पिछले 12 सालों से रह रहा हूँ।
14 सितंबर, 1947 को हिंदी को आधिकारिक तौर पर भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया था। दो सौ साल की गुलामी के बाद जब देश आजाद हुआ तो हमारे संस्थापक पिताओं ने हिंदी के माध्यम से देश को एक सूत्र में जोड़ने का सपना देखा था। एक ऐसी भाषा जो पूरे देश को आपस में जोड़े।
लेकिन हम तो भारत से हजारों किलोमीटर दूर यहां अमेरिका में रह रहे हैं, तो फिर हम हिंदी क्यों सीखें? अमेरिका में रहकर अगर हिंदी नहीं सीखते हैं तो ऐसा क्या है जो हम मिस करेंगे? कुछ ऐसे ही सवाल मेरे मन में भी थे और आज वही मेरे अनुभव मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।
आज सारे संसार की जनसंख्या क़रीब 8 बिलियन है, जिसमें से अकेले भारत की जनसंख्या 1 बिलियन से ऊपर है। भारत में हर प्रांत में हिंदी पहली, दूसरी या फिर तीसरी भाषा के तौर पर लिखी, पढ़ी और बोली जाती है। इस हिसाब से यह संसार की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। कहने का मतलब यह है कि अगर आप हिंदी नहीं सीख रहे हैं, तो आप खुद को संसार की एक बहुत बड़ी जनसंख्या से, उसके अनुभवों से दूर कर रहे हैं।
मेरी अम्मा और बाबा जी, जो भारत में रहते हैं, कुछ महीने पहले हमारे साथ ह्यूस्टन में रहने आए थे। उनके साथ रहकर मैंने बहुत कुछ सीखा। मेरी अम्मा रात को कहानियाँ सुनातीं और बाबा जी मुझे कुछ भारत के किस्से भी सुनाते।
और यह सब संभव हो पाया क्योंकि मैं उनसे हिंदी में बात कर पाया। अगर मुझे हिंदी नहीं आती, तो उनकी बातें या उनके साथ का आनंद नहीं ले पाता।
एक और बड़ा कारण हिंदी सीखने का है हमारी हिंदुस्तानी विरासत, जिसका हिंदी एक बहुत बड़े रूप में प्रतिनिधित्व करती है। हिंदी की कविताएँ, रामायण की चौपाइयाँ, बॉलीवुड के गाने, अलग-अलग खाने की चीज़ों के हिंदी में नाम - ये सब हमारी विरासत का हिस्सा हैं। उदाहरण के तौर पर हिंदी गाने मुझे बहुत पसंद हैं, लेकिन अगर उनका मतलब समझ नहीं आए तो गाना गाते हुए या फिर सुनते हुए शब्दों को महसूस करना बहुत ही मुश्किल है। और इस तरह से हिंदी मुझे मेरी विरासत के बहुत करीब रखती है।
अंत में यही कहूँगा कि भाषा किसी भी देश की संस्कृति की पहचान है। हम भारत में रहें या फिर अमेरिका में, हमारी पहचान हर कदम पर हमारे साथ चलती है। हमारे पासपोर्ट का रंग हमारी पहचान निर्धारित नहीं करता है। और इसीलिए यही मान्य है कि हम अपनी इस विरासत को बनाए रखें। अगर किसी वजह से वह धुँधली हो चली है तो उसे फिर से तराशें और सराहें।
भारतेन्दु की इन पंक्तियों के साथ अपनी वाणी को विराम दूँगा:
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
ध्यान के लिए धन्यवाद। नमस्ते!
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विषय 1: अमेरिका में रहने वाले युवा हिंदी क्यों सीखें?
तृतीय स्थान : राधा पारीक, 12वीं कक्षा, ओहायो
मेरा नाम राधा पारीक है और मैं ओहायो राज्य के बीचवुड शहर में बारहवीं कक्षा की विद्यार्थी हूँ।
भाषा सिर्फ़ संवाद ही नहीं अपितु संस्कार का माध्यम है। कोई भी भाषा मात्र शाब्दिक अभिव्यक्ति नहीं अपितु एक सभ्यता और संस्कृति से जुड़ने की वृत्ति है; जिसमें उसकी मातृ भाषा एक आवश्यक उत्प्रेरक का कार्य करती है। मुझे इस बात का गर्व है कि मेरी मातृ भाषा, विश्व की पाँच सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक, हिन्दी भाषा है।
मैंने जन्म भले ही अमेरिका में लिया हो परंतु मेरी जन्मदात्री कोख भारतीय है; इसलिए अंग्रेजी चाहे मेरी नैसर्गिक भाषा हो, हिंदी मेरा अस्तित्व भी है और अभिव्यक्ति की प्राणवायु भी। मेरी धमनियों में विश्व की उसी पुरातन भारतीय संस्कृति का रक्त बहता है, जिसने वसुधैव कुटुंबकम् के भाव से सम्पूर्ण विश्व को योग, चिकत्सा, मनोविज्ञान और अध्यात्म का शाश्वत ज्ञान दिया।
मैं अपने आपको सौभागशाली समझती हूँ कि मैं आधुनिक युग में विश्व के सबसे प्राचीन लोकतंत्र अमेरिका की नागरिक भी हूँ और विश्व के सबसे विशाल और उत्कर्ष लोकतंत्र भारत की सांस्कृतिक राजदूत भी। यह दुर्लभ संयोग मुझ सरीखी अप्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढ़ी के युवाओं के लिए अतुलनीय अवसर भी है और एक बड़ी चुनौती भी। अवसर इसलिए की पूर्व और पश्चिम की इन दो महान संस्कृतियों के बीच सेतु बाँधने का पुनीत कार्य हमारे काँधे पर है; और चुनौती है इस सेतु निर्माण के सबसे आवश्यक मूलयंत्र यहाँ के समाजों की मूल भाषा को लिखने, पढ़ने और समझने की। अंग्रेजी और हिंदी भाषा इस सेतु निर्माण के दो मुख्य आधार हैं।
अपनी भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात् करने के लिए मेरे लिये यह आवश्यक है कि मैं इस भाषा का ना सिर्फ़ विधिवत अध्ययन करूँ अपितु औपचारिक उपयोग भी। ऐसे में घर में चल रहा माता पिता का संवाद, मेरी नानी और दादी का अमेरिका प्रवास और अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति द्वारा संचालित वार्षिक ग्रीष्मकालीन हिन्दी शिविर ना सिर्फ़ मेरी हिंदी की प्रथम पाठशाला हैं अपितु भारतीय सांस्कृतिक चेतना के आधार भी।
मुझे पूरा विश्वास है कि इसी क्रम में भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित हिंदी भाषा के संवाद की यह प्रतियोगिता, मेरी पीढ़ी के युवाओं को हिंदी भाषा के प्रयोग हेतु प्रोत्साहित कर, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के वैश्विक विस्तार में एक मील का पत्थर सिद्ध होगी। धन्यवाद
जय हिंदी-जय भारत !!
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विषय 2: भारतीय संस्कृति और परंपराएँ
प्रथम स्थान : अवनी रामरक्षानी, 11वीं कक्षा, टेक्सास
भारतीय संस्कृति और परंपरा की स्थिरता और महानता। हमारा भारत एक संस्कृति समृद्ध देश है। भारतीय प्राचीन ग्रंथों में संस्कृति का अर्थ संस्कार से भी माना गया है । संस्कृति किसी भी देश, जाति और समुदाय की आत्मा होती हैं, जिनके सहारे वह अपने आदर्शों एवं जीवन मूल्यों आदि का निर्धारण करता है। जीने की कला हो, या विज्ञान और राजनीति का क्षेत्र, भारतीय संस्कृति का सदैव विशेष स्थान रहा है। भारतीय संस्कृति की निरंतरता, आज भी, करोड़ों लोगों को उससे जुड़ा हुआ महसूस कराती है।
संस्कृति और परंपरा में अंतर है—परंपराएं संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं। गुरु-शिष्य परंपरा, दीपावली, दशहरा जैसी परंपराएं, सदियों से हमारे जीवन का हिस्सा रही हैं। भारतीय परंपरा में समय, तिथि और मुहूर्त को पवित्र माना गया है, और यह अमूल्य ज्ञान हमारे साहित्य में समाहित है।
भारतीय संस्कृति के चार प्रमुख मूल्य—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। "सादा जीवन, उच्च विचार" की परंपरा आज भी प्रासंगिक है लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से यह कमजोर हुई है। हम अक्सर बिना सोचे पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने के लिए ललचाते हैं। परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन यह हमारे देश और संस्कृति के पतन का कारण नहीं बनना चाहिए।
कभी-कभी परंपराओं के नष्ट हो जाने पर, आवश्यकता अनुसार, उसका पुनर आरंभ भी होता है- जैसे गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ ४.२ ||
जो राजयोग प्राचीन काल में विद्वान राजर्शियों को नियत था, और कालचक्र के प्रभाव से जिसकी परंपरा नष्ट हो गई थी, उसका पुनरुद्धार भगवान कृष्ण ने गीता द्वारा पुनःकिया और भागवत धर्म के नाम से उसकी फिर से स्थापना कर दी I भारतीय संस्कृति एक निरंतर प्रवाहित जीवनधारा है। इसका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि यदि हम अपनी संस्कृति खो देंगे, तो हम अपना अस्तित्व भी खो देंगे।
आज इस विषय पर मुझे प्रसिद्ध कवि इकबाल द्वारा लिखी गयी यह चार पंक्तियाँ याद आ रही है-
"यूनान, मिश्र, रोम सब मिट गए जहां से,
अब तक है बाकी निशां हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।"
जय हिन्द | जय भारत |
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विषय 2: भारतीय संस्कृति और परंपराएँ
द्वितीय स्थान : अनिका वर्मा, 10वीं कक्षा, मेरीलैंड
नमस्ते!
क्या आप जानते हैं, जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाता है, वह कब तक खड़ा रह सकता है? यही सवाल हमें अपने जीवन में भारतीय संस्कृति और परंपराओं के महत्व पर सोचने पर मजबूर करता है।
“संस्कृति वह है जो हमारे भीतर के अंधकार को दूर करे।” - स्वामी विवेकानंद
भारतीय संस्कृति सिर्फ़ त्योहारों और रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है। यह है हमारी पहचान, हमारी जड़ें। अमेरिका में रह रहे हमारे युवा अक्सर इस बहस में उलझ जाते हैं कि आधुनिकता और परंपरा में किसे चुना जाए। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि भारतीय संस्कृति हमें क्या सिखाती है? यह हमें धैर्य, आदर, और परिवार का महत्व सिखाती है।
संस्कृति का मतलब केवल संस्कारों का पालन करना नहीं है; यह हमारे जीवन को संवारने का तरीका है। भारत की विविधता हमें सिखाती है कि भले ही हम अलग-अलग भाषाएं बोलते हों, त्योहार मनाते हों, लेकिन हमारी आत्मा एक है।
अमेरिका में रहकर भारतीय संस्कृति को अपनाना न केवल हमें अपनी पहचान बनाए रखने में मदद करता है बल्कि हमें दूसरों को अपनी संस्कृति से परिचित कराने का मौका भी देता है। जैसे गरबा, दीवाली पार्टी, या गणेश उत्सव जैसे आयोजन भारतीयता को जीवित रखते हैं और समुदाय को जोड़ते हैं।
हमारे त्योहारों में भी एक अनोखा जादू होता है। अमेरिका में, मैंने देखा कि हमारे त्योहारों में शामिल होकर लोग कितने उत्साहित हो जाते हैं। मुझे गर्व होता है जब मैं स्कूल में अपने दोस्तों को रंगों से खेलते हुए या दिवाली पर पटाखे जलाते हुए देखती हूँ। यह मुझे याद दिलाता है कि भारतीय परंपराएँ किसी को भी जोड़ सकती हैं। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, “हमारी संस्कृति हमारे भविष्य का आईना है। एक संस्कृति को केवल तभी बचाया जा सकता है जब वह खुले दिल से नई चीजों को अपनाने को तैयार हो।”
भारतीय खाने की बात करें, तो यह मसालों का एक जादू है। मेरी माँ जब राजमा चावल बनाती हैं, तो घर की खुशबू मेरे सभी दोस्तों को खींच लाती है। अमेरिका में पिज़्ज़ा और बर्गर के बीच, समोसे और डोसा खाकर लगता है कि मैं भारत के करीब हूँ। खाने में जो विविधता है, वह हमारी संस्कृति की कहानी कहती है हर राज्य का अपना स्वाद, अपनी परंपरा ।
अमेरिका में, मैं दो संस्कृतियों के बीच रहता हूँ। यह आसान नहीं है, लेकिन यह मुझे मजबूत बनाता है। यहाँ रहकर मैंने सीखा है कि कैसे अपनी जड़ों को याद रखते हुए नई चीजों को अपनाया जा सकता है। मुझे गर्व है कि मैं उस धरोहर का हिस्सा हूँ, जो हजारों साल पुरानी है और जिसने आज तक अपनी चमक नहीं खोई। जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही सबसे ऊँचा उठता है। हमारी संस्कृति हमें जमीन से जुड़े रहने और आसमान को छूने की ताकत देती है।
भारतीय संस्कृति केवल परंपरा नहीं, यह जीवन का विज्ञान है। इसे अपनाएं, इसे जीएं, और इसे आगे बढ़ाएं।
धन्यवाद।
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विषय 3: अपने जीवन की किसी घटना पर आधारित लघुकथा।
विजेता :आरिणी पारीक 12वीं कक्षा, इंडियाना
मैं भारतीय हूँ।
मुझे बचपन में भारतीय क्या होता है, अमेरिकन क्या होता है, उसकी समझ नहीं थी। मैं बस शुरू से भारतीय संस्कृति को अपनाती रही। पता ही नहीं चला मुझे की मैं कब अमेरिकन कम और भारतीय ज़्यादा महसूस करने लगी।
मैं पैदा तो टैक्सस में हुई थी, लेकिन मेरी परवरिश जैसे हुई और जो ऐक्टिविटीज़ में मैंने हिस्सा लिया, उन सब से मैं दिल से भारतीय ही बन गई हूँ।
मेरे मम्मी पापा ने हमेशा मुझसे हिंदी में ही बात करी, तो मैंने पहले हिंदी सीखी, और उसके बाद ही इंग्लिश. बचपन से ही मैं हिंदी मूवीज और टीवी शोज़ देखती आयी हूँ, जैसे की इंडियन आइडल और कौन बनेगा करोड़पति. अब भी जब मुझे टीवी देखने का मन होता है, मैं हिंदी ही देखना पसंद करती हूँ।
हिन्दू परम्परायें और इतिहास के विषय में मैं काफ़ी कुछ जान गई हूँ। थोड़ा मेरे मम्मी पापा से, थोड़ा पुस्तकों से, और थोड़ा कत्थक में गुरुजी से। मैं ६ साल की उम्र से कत्थक सीख रही हूँ। कत्थक सीखने से मुझे बहुत ज्ञान मिला, चाहे वह संगीत के बारे में हो, कत्थक के इतिहास के बारे में, हिन्दी संस्कृति और परंपराओं के बारे में, या फिर भारतीय इतिहास के बारे में।
लेकिन तब भी मुझे हमेशा इंडियन अमेरिकन ही महसूस होता था। आखिर, मैं यूएस में पाली-बड़ी हो कर पूरी भारतीय तो नहीं हो सकती। फिर 9th ग्रेड में मैंने एक नृत्य-नाटिका, समर्पण, में हिस्सा लिया, जिसने भारत की आज़ादी की जंग को दर्शाया था। मैंने उस नाटक में मुग़लों के दरबार में कत्थक तो किया ही, मगर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के देश में लावणी भी किया, गांधीजी के पीछे दंडी मार्च में हिस्सा लिया और ब्रिटिश सिपाहियों के डंडे खाये, और जलियाँवाला बाग में गोलियों की बरसात को महसूस किया।
समर्पण में हिस्सा लेने पर मैं स्वतंत्रता की कीमत असल में समझी। आज़ादी के बारे में फ़िल्में तो मैं काफ़ी देख चुकी थी, लेकिन इन संघर्षों को असल में दर्शाने में कुछ अलग ही महसूस हुआ। मुझे बहुत गर्व हुआ भारत, भारत के इतिहास, और स्वतंत्रता सेनानियों पर। अंत के सीन में, जहां तिरंगा ऊँचा लहराया स्वतंत्र भारत में, और हम सब ने मिलके जन गण मन गाया, मेरे रोंगटे खड़े हो गये। मेरी आँखें भर आयीं और मुझे ऐसा लगा की मैं मेरे देश के बारे में गा रही हूँ। ऐसा मैंने पहली बार महसूस किया था।
तब मुझे समझ आया की भारतीय होने के लिए भारत में रहना ज़रूरी नहीं है। जैसे इस गाने में है: “मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी". चाहे मैं कहीं भी रहूँ, मेरे अनुभव और परवरिश के वजह से, दिल से, मैं सच में भारतीय ही हूँ और रहूँगी। यही मेरी पहचान है।
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अन्य प्रतिभागियों के विचार (पहला भाग )
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इशिका चाँद, 12वीं कक्षा, ओहायो
विषय: अमेरिका में रहने वाले युवा हिंदी क्यों सीखे?
अमेरिका में बहुत सारे बच्चे रहते हैं। हिंदी सीखना बहुत ज़रूरी है क्योंकि हिंदी सीखने से बहुत से दरवाज़े खुल जाते हैं। भारत से बहुत लोग विदेशों में बस गए हैं और वे भारतीय सभ्यता से अपना जड़ क़ायम रखना चाहते हैं और केवल भाषा से ही आप अपनी सभ्यता जान सकते हैं।
हिंदी पढ़ने और लिखने से आप हिंदी साहित्य के बहुत सी रचनायें जैसे कविता, कहानी, निबंध, लेख, जीवनी,आत्मकथा और उपन्यास पढ़ सकते हैं और ज्ञान अर्जित करते हैं। आप हिंदुस्तान का इतिहास अपनी भाषा में जान सखते हैं,इसके लिए आपको अंग्रेज़ी या दूसरे भाषा का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। आप भारत के पर्व-त्योहार के पीछे छुपे उसकी कहानी या कारण और उससे मिलने वाली संदेश सीखते हैं। आप भारत में कहीं भी घूम-फिर सकते हैं और वहाँ के लोग से बात कर सकते हैं। मैं अपने चचरे भाईयों और बहनों, चाचा और चाची और नानी से बात कर सकती हूँ। मैं वहाँ के रहन-सहन में हिल-मिल सकती हूँ।
नयी भाषा सीखने से आपकी बुद्धि तेज होती है। आपकी की याददाश्त बढ़ती है और रचनात्मक कार्यों में आपकी बुद्धि विकसित होती है। इससे आपका सोच-विचार विस्तृत होता है और आपकी मानसिक स्वास्थ्य भी बना रहता है। अमेरिकी बच्चों के लिए हिंदी सीखना बहुत आवश्यक है क्योंकि विश्व में क़रीब 61 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं और हर व्यक्ति भारत में नहीं रहता है। बहुत से हिंदी भाषी लोग अमेरिका, कनाडा, इंग्लेंड, मलेशिया,और कई दूसरे देशों में रहते हैं। इस हिंदी भाषायी ज्ञान से अमेरिकी बच्चे विदेशों में दूसरे अपने साथियों से हिंदी में बात कर रकते हैं।वे अपने पसंद-नापसंद, समानता-असमानता दैनिक जीवन के बारे में बात कर सकते हैं।
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शिव दवे , 10 वीं कक्षा, वर्जिनिया
विषय: अमेरिका में रहने वाले युवाओं को हिंदी क्यों सीखनी चाहिए
नमस्ते!
मेरा नाम शिव दवे है और मैं वर्जीनिया में रहता हूँ। आज मैं यह प्रस्तुत करना चाहूँगा कि
अमेरिका में रहने वाले युवाओं के लिए हिंदी सीखना क्यों ज़रूरी है। हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति और पहचान का एक अहम हिस्सा है। यह हमें अपनी जड़ों से जोड़नेका माध्यम प्रदान करती है।
मुझे स्वाध्याय के माध्यम से अपनी संस्कृति और धर्म को गहरे रूप से समझने का अवसर मिला है। भगवद गीता के अध्ययन ने मुझे जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को समझने में मदद की, और इसने मुझे यह सिखाया कि अपनी सांस्कृति की पहचान को बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है, चाहे हम दुनिया के किसी भी कोने में हों।
दर्शकों, आज के युग में, अक्सर युवा अपने सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं से दूर होते जा रहेहैं। इस दूरी को कम करने में हिंदी सीखना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अपनी भाषा के माध्यम से हम अपने परिवार और समाज से गहरे रूप से जुड़े रह सकते हैं। मुझे लगता है कि अपने वृद्ध परिवार के सदस्यों के साथ उनकी भाषा में बात करना एक अनूठा अनुभव होता है।
मेरा सपना है कि मैं एक चिकित्सक यानी डॉक्टर बनूं और भवि ष्य में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करूँ । वहाँ के लोगों की भाषा समझने के लिए और उनकी समस्याओं को गहरे रूप से समझने के लिए हिंदी का ज्ञान आवश्यक होगा। हिंदी सीखने से मैं अपने उपचारों के माध्यम से उन्हें बेहतर रूप से मदद कर पाऊँगा।
हिंदी सीखने का एक और महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसके माध्यम से हम अपने सांस्कृति के गीत, कहानियाँ और परंपराओं को असली रूप में समझ सकते हैं। जब हम अपनी भाषा में अपनी विरासत को समझते हैं, तब उसका असर हमारे मन और आत्मा दोनों पर पड़ता है।
अतः, हिंदी सीखना सिर्फ एक भाषा का ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, यह एक संकल्प है, अपनी संस्कृति को बनाये रखने का। अमेरिका में रहकर भी, हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए और अपनी सांस्कृतिक पहचान का मान
रखना चाहिए।
आप सबसे निवेदन है कि हिंदी सीखने और इसके महत्व को समझने का संकल्प लें। यह सिर्फ एक भाषा नहीं,बल्कि हम और हमारी संस्कृति के बीच एक सुन्दर पुल है।
धन्यवाद!
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अन्य प्रतिभागियों से विशेष अनुरोध ---
अन्य प्रतिभागियों से अनुरोध है कि वे अपना Word डॉक्यूमेंट इ -मेल पर भेजें ,ताकि उनके विचारों को पाठकों से साझा किया जाये।
Request parents to send the Word version of their child’s document to this email address---
ihaorg1980@gmail.com
(दूसरा भाग, संवाद इ- नूजलेटर के अगले अंक में )
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अपनी कलम से
भारतीय नववर्ष अपने इतिहास में
भारतवर्ष की संस्कृति को समेटे हुए बढ़ रहा है
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द्वारा - डॉ. उमेश प्रताप वत्स
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डॉ. उमेश प्रताप वत्स यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
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भारतीय नववर्ष अपने इतिहास में भारतवर्ष की संस्कृति को समेटे हुए बढ़ रहा है. ..
भारतवर्ष की संस्कृति को अपने इतिहास में समेटे हुए अपना नववर्ष एक जनवरी को नहीं अपितु चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को देवी माँ के पवित्र नवरात्रे के साथ पूजा-पाठ करते हुए बहुत ही भव्य, शांति व श्रद्धाभाव से मनाया जाता है।
हिन्दू नववर्ष 2082 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा नववर्ष का शुभारंभ 30 मार्च को नवरात्र के साथ ही आरंभ होने जा रहा है। नया विक्रम संवत रविवार से शुरू हो रहा है इसलिए इस साल के राजा सूर्यदेव, मंत्री और सेनापति का पद भी सूर्य देवता को ही मिलेगा। दो दशक पहले भारतीय नववर्ष को कोई बिरला ही औपचारिकता मात्र पूरी करने के लिए मनाता था किंतु सत्ता के बदलाव के साथ भारतीय जनमानस के विचारों में जो परिवर्तन आया है उसी के फलस्वरूप वर्तमान में भारतीय नववर्ष अंग्रेजी नववर्ष से भी अधिक धूम-धाम से भजन-कीर्तन, यज्ञ एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों के साथ गांव-गांव, घर-घर उत्साह के साथ हर भारतीय बढ़चढ़कर मनाता है। यह ओर अधिक धूमधाम से मनाया जाना चाहिये क्योंकि भारतीय नववर्ष का अध्यात्मिक, सांस्कृतिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक आधार भी है।
यह नववर्ष ऋतु परिवर्तन लेकर आता है। सर्द ऋतु की ठिठुरन से निजात दिलाते हुए चैत्र मास के नवरस दिवस अपने सुहावने मौसम से प्रकृति में सुंदरता की छटा बिखरते हैं। दूसरी ओर एक जनवरी को ऋतु में किसी भी तरह का परिवर्तन दिखाई नहीं देता। व्यक्ति, पशु-पक्षी यहां तक कि पेड-पौधे भी ठंड की ठिठुरन में सिकुड़े रहते हैं यद्यपि नव संवत्सर ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ नई उमंग, नई ऊर्जा और स्फूर्ति लेकर आती है। एक जनवरी की सन सनाती हवाओं के बीच कड़ाके की ठंड में हड्डियों के जमने पर मोमबत्ती बुझाकर नया वर्ष मनाना कहां तक तर्कसंगत हो सकता है। वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यन्त मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं अपितु जड़-चेतन नर-नाग, यक्ष-रक्ष किन्नर-गन्धर्व, पशु-पक्षी, लता, पादप, नदी-पर्वत, देवी-देवता व्यरष्टि से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं।
ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल का आरंभ भी होता है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादि आदि नामों से भारत के अनेक क्षेत्रों में मनाया जाता है।
भारतीय नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक महत्व भी है। यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 115 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने जगत की रचना प्रारंभ की। इतिहास गवाह है कि संवत का पहला दिन उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो।
ऐसे ही महान राजा सम्राट विक्रमादित्य ने 2082 वर्ष पहले इस महत्व को समझते हुए इसी दिन अपने राज्य की स्थापना की थी।विक्रमादित्य ने भारत राष्ट्र की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत राष्ट्र इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है। दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धन्वंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे। तभी से इस संवत का नाम विक्रमी संवत निश्चित हो गया।
भारत वर्ष में प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।सनातन धर्म में शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन है यह। इसी पावन दिन को सिख परंपरा के द्वितीय गुरू अंगद देव प्रगटोत्सव का जन्म दिवस मनाया जाता है। समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना। सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए। विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। इसी दिन युगाब्द संवत्सर भी प्रारंभ हुआ था और 5163 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी और सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, दूरदर्शी, प्रखर राष्ट्रवादी पूज्य डॉ केशव राव बलिराम हेडगेवार जी का जन्म भी इसी पावन दिवस को हुआ था। इसे सौभाग्य कहे, इत्तेफाक या फिर परमात्मा का कोई संकेत कि इन्होंने अपना पूरा जीवन देश और समाज के लिए स्वाहा कर दिया।
इस दिन के महत्व को बढ़ाते हुए प्रकृति भी स्पष्ट संदेश देती है। बसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। सूखे, ठूँठ वृक्षों पर भी कोमल पत्र नव संवत के आगमन पर पलकें बिछाएं प्रतिक्षारत्त दिखाई देते हैं। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था-किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं।
यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ? आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही नव वर्ष के रूप में मनाएं।
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी दुनिया में सबसे पहले तारो, ग्रहों, नक्षत्रों आदि को समझने का सफल प्रयास भारत में ही हुआ था, तारों , ग्रहों , नक्षत्रों , चाँद , सूरज आदि की गति को समझने के बाद भारत के महान खगोल शास्त्रीयों ने भारतीय कलेंडर ( विक्रम संवत ) तैयार किया, इसके महत्त्व को उस समय सारी दुनिया ने समझा। भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिया जिस नक्षत्र में पड़ती है उसी के नाम पर पड़ा। जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं इस लिए इसे चैत्र महीनें का नाम हुआ।
श्री मद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर थे, उसी समय से कलियुग का प्रारम्भ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलिय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ. वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारम्भ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकण्ड पर हुआ था। विश्व आश्चर्य चकित है कि भारतीय ऋषियों ने इतनी सूक्ष्म और सटीक गणना कैसे कर ली। क्रान्ती वृन्त पर 12 महीने की सीमायें तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किये गये और नाम भी तारा मण्डलों के आकृतियों के आधार पर रखे गये। जो मेष, वृष, मिथुन इत्यादित 12 राशियां बनी।
चूंकि सूर्य क्रान्ति मण्डल के ठीक केन्द्र में नहीं हैं। अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है। प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिमास होता है। भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अन्तर नहीं पड़ता। जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते है। इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीनें को लीप इयर घोषित कर देते है फिर भी नौ मिनट 11 सेकण्ड का समय बच जाता है तो प्रत्येक चार सौ वर्षो में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है तब भी पूर्णांकन नहीं हो पाता है।
दुनिया के लगभग प्रत्येक कैलेण्डर सर्दी के बाद वसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होते हैं। यहां तक की इस्वी सन वाला कैलेण्डर ( जो आजकल प्रचलन में है ) वो भी मार्च से शुरू होता है। इस कलेंडर को बनाने में कोई नयी खगोलीये गणना करने के बजाये सीधे से भारतीय कैलेण्डर ( विक्रम संवत ) में से ही उठा लिया गया था। विद्वानों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवा भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।
सूर्य सिध्दान्त और सिध्दान्त शिरोमाणि आदि ग्रन्थों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है। लेकिन यह इतना अधिक व्यापक था कि आम आदमी इसे आसानी से नहीं समझ पाता था, खासकर पश्चिम जगत के अल्पज्ञानी तो बिल्कुल भी नहीं। किसी भी विशेष दिन , त्यौहार आदि के बारे में जानकारी लेने के लिए विद्वान् ( पंडित ) के पास जाना पड़ता था।
इसके प्रचलन में आने के 57 वर्ष के बाद सम्राट आगस्तीन के समय में पश्चिमी कैलेण्डर ( ईस्वी सन ) विकसित हुआ। लेकिन उस में कुछ भी नया खोजने के बजाये, भारतीय कैलेंडर को लेकर सीधा और आसान बनाने का प्रयास किया था। पृथ्वी द्वारा 365 / 366 में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मान कर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रख दिए गए।
यह बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारी अनपढ़ माँ, ताई, चाची और दादी भी सभी भारतीय महीनों के नाम क्रमशः जानती हैं किन्तु हम पढ़े-लिखे होकर भी स्मरण नहीं रख पाते।
जिस तरह जनवरी अंग्रेज़ी का पहला महीना है उसी तरह हिन्दी महीनों में चैत वर्ष का पहला महीना होता है। हम इसे कुछ इस तरह से समझ सकते हैं-
मार्च-अप्रैल -चैत्र (चैत)
अप्रैल-मई -वैशाख (वैसाख)
मई-जून -ज्येष्ठ (जेठ)
जून-जुलाई - आषाढ़ (आसाढ़)
जुलाई-अगस्त - श्रावण (सावन)
अगस्त-सितम्बर - भाद्रपद (भादो)
सितम्बर-अक्टूबर - अश्विन (क्वार)
अक्टूबर-नवम्बर - कार्तिक (कातिक)
नवम्बर-दिसम्बर - मार्गशीर्ष (अगहन)
दिसम्बर-जनवरी - पौष (पूस)
जनवरी-फरवरी - माघ
फरवरी-मार्च - फाल्गुन (फागुन)
विक्रम संवत का शुभारम्भ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव श्रृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करते हैं।
हम सदियों से थोपी गई अंग्रेजी शिक्षा से आज तक भी पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो पाएं हैं। मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्घति का ही नतीजा है कि आज हमने न सिर्फ अंग्रेजी बोलने में हिन्दी से ज्यादा गर्व महसूस किया बल्कि अपने प्यारे भारत का नाम संविधान में इंडिया दैट इज भारत तक रख दिया। इसके पीछे यही धारणा थी कि भारत को भूल कर इंडिया को याद रखो क्योंकि यदि भारत को याद रखोगे तो भरत याद आएंगे, शकुन्तला व दुष्यंत याद आएंगे, हस्तिनापुर व उसकी प्राचीन सभ्यता और परम्परा याद आएंगी। राष्ट्रीय चेतना के स्वामी विवेकानंद ने कहा था यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले दिनांकों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्म गौरव खो बैठता है। इसी प्रकार महात्मा गांधी ने 1944 की हरिजन पत्रिका में लिखा था‘स्वराज्य का अर्थ है स्व-संस्कृति, स्वधर्म एवं स्व-परम्पराओं का हृदय से निर्वाह करना। पराया धन और पराई परम्परा को अपनाने वाला व्यक्ति ईमानदार नहीं होता। आओ भारत को सुदृढ़ बनाने के लिए हम स्व की ओर बढ़े और अपना स्वदेशी भारतीय नव वर्ष जो प्रथम नवरात्रे से शुरु हो गया है, धूमधाम से मनायें।
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कवितायेँ / गजल
"माँ पन्नाधाय"
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द्वारा - डॉ. सुनील त्रिपाठी
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डॉ. सुनील त्रिपाठी, निराला राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं। अभी ये उच्च श्रेणी शिक्षक, शिक्षा विभाग म.प्र. में हैं। पढ़ने-पढ़ाने के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन में प्रसारण भी करते है। स्वतन्त्र लेखक के साथ-साथ इनकी रचनाएँ दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।
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माँ पन्नाधाय
त्यागमूर्ति मां पन्नाधाय
सिंहासन की रक्षा को यदि, सिंहनि गाय नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
मैं अदना-सा कलमकार, रहवासी चंबल घाटी का।
चंबल के जल से अभिसिंचित, भिण्ड भदावर माटी का।।
पौरुषता जिसके कण-कण में, शौर्य समाया रहता है,
दुनिया को इतिहास बताने निकला हल्दीघाटी का।
वीरधरा की यशगाथा, राणा सांगा की समरकथा।
बलिदानी तेवर ऐसे, कण-कण में व्यापी अमरकथा।।
देविस्वरूपा जयवंता, राणा प्रताप की जननी थी।
वो प्रताप के पूज्य पिता जी, उदय सिंह की पत्नी थी।।
उदय सिंह के बचपन की, मैं चर्चित बात बताता हूं।
दीपदान की किरणों से, वो स्याह रात दिखलाता हूं।।
राणा, चेतक, हल्दीघाटी, की बुनियाद नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
उदय अभी छोटा बच्चा था, राजकाज बनवीर करे।
मगर कुदृष्टि लगाए था वो, गद्दी पर अधिकार करे।।
नदी बनास किनारे उसने, दीपदान का खेल रचा।
राजमहल को किया इकट्ठा, कोई बाकी नहीं बचा।।
था उद्देश्य भीड़ में छिपकर, अपना पूरा काम करे।
उदय सिंह की हत्या करके, वो निष्कंटक राज करे।।
किंतु धाय मां ने वनवीरी, चालों को पहचान लिया।
दीपदान का खेल देखने, कुंअर उदय को रोक दिया।।
दीपदान का खेल हज़ारों, आँखें मन से देख रहीं।
पर वनवीरी आंखें उनमें, उदय सिंह को खोज रही।।
कुंअर उदय सिंह नहीं दिखा, तो खून आँखौं में उतर गया।
हवसखोर वनवीर खंग ले, राजमहल की ओर चला।।
राजमहल षणयंत्री होते, सच की राह नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
राजवंश की लाज बचाने, उसने मन में ठान लिया।
क्षत्राणी देवी पन्ना ने, निर्णय एक कठोर लिया।।
कीरत की डलिया में उसने, उदय सिंह को छुपा दिया।
उदय सिंह के बिस्तर पर, बेटे चंदन को सुला दिया।।
बोली, कुंभलगढ़ ले जाओ, चूक नहीं होने देना।
राजवंश का दीपक है ये, दीप नहीं बुझने देना।।
राष्ट्रधर्म के रक्षक को, सुत की परवाह नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
खंग हाथ में लिए खड़ा था, वो विक्रम का कातिल था।
मेवाड़ी सत्ता हथियाने, नीच हवश में पागल था।।
बोला ओ री दासी पन्ना, शत्रु कहां पर सोया है।
मेरे राजसिंहासन के पथ में इकलौता रोड़ा है।।
विक्रम का वध करने पर भी, मेरी प्यास अधूरी है।
राजवंश की नामनिशानी, मिटना बहुत जरूरी है।।
सिंह भवानी, तुलजा माता, अगर सहाय नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
गुर्जर की बेटी थी पन्ना, बोली ओ वनवीर सुनो।
जिसका खाया नमक, उसी के साथ दगाबाजी न करो।
कहां मानने वाला था वो, उस पर खून सवार हुआ।
समय साक्षी है इसका, वनवीर एक गद्दार हुआ।।
बोला, पन्ना बतला दे, है उदय सिंह किस बिस्तर पर।
वरना तेरे बेटे के टुकड़े करने पर हूं तत्पर।।
हत्यारे हवशी लोगों के, मन में आह नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
इकलौता बेटा था चंदन, हाय कलेजे का दुकड़ा।
बेटा या मेवाड़ इन्हीं में से इक रस्ता था चुनना।।
एक नयन में पुत्रप्रेम था, एक नयन में राष्ट्रधरम।
क्षत्राणी देवी पन्ना ने, मां तुलजा की खाई कसम।।
नौ महीने तक रखा पेट में, पल-पल जिसको प्यार किया।
प्रसववेदना से भी गुजरी, लेकिन हँस के जन्म दिया।।
पल्लू से मुंह पौछा जिसका, स्तनपान कराया है।
उस बेटे का वध देखेगी, जिसको गोद खिलाया है।।
इससे ज्यादा और भयानक, पीड़ा हाय नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
कांपा अंबर, दिग्गज डोले सागर ने धीरज खोया।
कुंअर उदय के बिस्तर पर तो, बेटा चंदन था सोया।।
पीर उठी, पर माता ने, छाती पर पत्थर धार लिया।
मुंह से बोली नहीं, इशारा भर बिस्तर की ओर किया।।
मुंह ढांके सोये बच्चे पर, खल ने क्रूर प्रहार किया।
वो समझा है उदय सिंह, उसने चंदन को मार दिया।।
बलिदानी रस्ते से बढ़कर, कोई राह नहीं होती।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
हिला हृदय मां पन्ना का, पर मुंह से आह नहीं निकली।
सुतवध देखा माता ने, आंसू की बूंद नहीं निकली।।
पन्ना मां तू पन्ना है, माटी का कर्ज़ा चुका दिया।
पुत्र किया बलिदान किंतु, मेवाड़ समूचा बचा लिया।।
जिसकी रग-रग में निष्ठा की, पावन गंगा बहती है।
वीरप्रसूता उस देवी को, दुनिया पन्ना कहती है।।
नारी सबला है, अबला की वो पर्याय नहीं होती।।
कुंअर उदय मारे जाते, यदि पन्नाधाय नहीं होती।।
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