APRIL INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अप्रैल 2024, अंक ३४ | प्रबंध सम्पादक: संपादक मंडल
|
|
|
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी सदस्यों और हिन्दी प्रेमियों का अभिवादन।
भारतीय नववर्ष विक्रम संवत २०८१ अप्रैल ९ को था और सबों को बधाई। ईद, राम नवमी, महावीर जयंती, बिहू, बैसाखी, पुथांडू, हनुमान जन्मोत्सव, आंबेडकर जयंती, गुडी पड़वा, युगादि, गणगोर आदि इस माह में आने वाले सभी पारम्परिक त्योहारों के लिए हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ।
भारतीय नववर्ष भारत के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग रीति -रिवाजों के साथ मनाया जाता है पर यह मूल रूप में ऋतु परिवर्तन का पर्व है। जाड़े की सिहरन कम हो जाती है और खेतों से नई फसलें खलिहानों में आ जाती है, उसके बाद त्यौहार मनाने का आनन्द ही कुछ और है।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की न्यू जर्सी शाखा ने होली कार्यक्रम ६ अप्रैल को शाखा अध्यक्ष बबीता श्रीवास्तव के घर पर आयोजित किया और काफ़ी सफल रहा। वाशिंगटन शाखा ने होली समारोह अप्रैल १४, २०२४ बाल्टीमोर, मैरीलैंड में भाग लिया। शाखा अध्यक्ष चौधरी प्रताप सिंह ने होली आयोजन में अन्य संस्थाओं को सहयोग दिया और साथ मिलकर सार्वजनिक जगह में होली मनाई। शाखा के एक सदस्य धर्मेन्द्र कुमार खारी ने अपने भोजनालय से सभी प्रोग्राम में भाग लेने वाले लोगों के लिये निःशुल्क भोजन का प्रबन्ध किया। कार्यक्रम में भारतीयों के साथ- साथ स्थानीय नागरिकों और जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भी होली का आनंद लिया। विस्तृत समाचार और फोटो नीचे संलग्न है।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की विशेष प्रस्तुति हास्य कवि सम्मेलन का कार्यक्रम अमेरिका के २३ महानगरों में १२ अप्रैल २०२४ से २७ मई २०२४ के बीच आयोजित है। डॉलस एवं ह्यूस्टन शाखा से आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत खूब शानदार रही। आशा है आप सभी अपने शहरों या आसपास के आयोजन स्थलों पर इसका आनंद लेंगे। मैं सभी शाखाओं को उनके प्रयासों के लिये धन्यवाद ज्ञापन करती हूँ। सभी शाखा अध्यक्ष एवं संयोजक से अनुरोध है कि वे अपने कार्यक्रमों के सचित्र विवरण भिजवाएं जिससे उन्हें पाठकों के साथ साझा किया जा सके।
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की इंडियाना शाखा ने मार्च महीने में समाज के अन्य कार्यक्रम में अपनी समिति के लिए एक टेबल लगाई और दर्शकों को समिति से अवगत कराया। उत्तर पूर्व शाखा ने भी इसी तरह का प्रोग्राम अप्रैल ११ को अपने यहाँ आयोजित किया। दोनों कार्यक्रम काफ़ी सफल रहे और समिति की दृश्यता बढ़ाने में सहयोगी भी रहे। दोनों शाखाओं को मेरा बहुत बहुत धन्यवाद। सभी शाखाओं से अनुरोध है कि वे जहाँ मौक़ा मिले लोगों को अपनी समिति के उद्देश्यों से अवगत करायें।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के मिशन को आगे बढ़ाने के लिये सभी सदस्यों एवं पाठकों के विचारों एवं सुझावों का स्वागत है। हमारी समिति अभी “seal of biliteracy” पर काम कर रही है और यदि आप इसके लिए अपने शहर में काम करना चाहते हैं या अपने बच्चों के स्कूल में कोशिश कर रहें हैं और सफलता नहीं मिल रही है, तो हम से संपर्क करें और हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगें।
आप किसी भी तरह से समिति की सहायता करना चाहते हैं या अपने सुझाव हमसे साझा करना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है। कृपया ईमेल या कॉल द्वारा संपर्क करें।
धन्यवाद
शैल जैन
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति २०२४-२५
ईमेल: shailj53@hotmail.com
सम्पर्क: 330-421-7528
***
|
|
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति – हिंदी सीखें
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन - 2024
अमेरिका के महानगरों में 12 अप्रैल से 27 मई तक
|
|
|
|
|
कवियों का परिचय -- प्रतिवेदन : अनीता गुप्ता
कवि अरुण जैमिनी
अरुण जैमिनी एक ऐसा चर्चित नाम जो किसी पह्चान का मोहताज नहीं है। आपने अपनी अनोखी शैली और धमाकेदार प्रस्तुतिकरण की वजह से देश विदेश में अपार सफलता प्राप्त की है। आप नई दिल्ली, भारत के निवासी है। आपने हंस राज कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा ग्रहण की है। आप हास्य कविताओं के साथ साथ चुटकुलों का भी बख़ूबी प्रयोग जानते हैं, जहाँ एक ओर हास्य कविताएँ श्रोताओं के आकर्षण का केन्द्र बनती है, वहीं आपके चुटकुले मन को भीतर तक गुदगुदा जाते हैं। आपने त्वरित हास्य के लिए चुटकुलों का प्रयोग चातुर्यता के साथ काव्य मंचो पर किया। आपकी सफलता आपकी विलक्षण प्रतिभा का उदाहरण है।
आप ने प्रस्तुतीकरण की योग्यता अपने पिता जेमिनी हरियाणवी जी, जो कि अपने समय के बहुचर्चित हास्य कवि थे, उनसे विरासत में पाई है। आपने पिछले तीन दशकों से भी ज़्यादा वर्षों से हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी प्रतिभा, कला कौशल और विशिष्ट प्रस्तुतिकरण का उत्तम प्रदर्शन दिया है। आपकी कविताओं के प्रस्तुतिकरण का हरियाणवी अंदाज़ काव्य मंचों पर एक ट्रेडमार्क सा बन गया है। वर्तमान में आप कवि सम्मेलन समिति के अध्यक्ष पद पर आसीन हैं।
आपकी प्रचलित प्रख्यात कृतियाँ १. फ़िलहाल इतना ही २. खून बोलता है ३. हास्य विज्ञान की शिखर कविताएँ
विभिन्न टेलीविज़न प्रस्तुतियाँ
१. वाह वाह क्या बात है २. कपिल शर्मा शो ३. छप्पर फाड़ के ४. लाफ़्टर चैम्पियन ५. आज तक ६. इंडिया न्यूज़ ७. फूल झड़ी एक्सप्रे ८. दूरदर्शन एवं अन्य चैनल
पुरस्कार एवं सम्मान
१. हरियाणा गौरव सम्मान २. काका हाथरसी सम्मान ३. ओम प्रकाश आदित्य सम्मान ४. मन हर ठहाका और अट्टहास सम्मान ५. नेपा और हिंदी गौरव सम्मान ६. शिखर सम्मान
आपने 18 से भी अधिक विदेशों की यात्रा की है जिनमें USA, कनाडा, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, हाँग काँग, सिंगापुर, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और अन्य कई देशो में सफलतापूर्वक काव्य पाठ किया है।
कवि शम्भू शिखर
शम्भू शिखर यह हास्य और व्यंग्य जगत का बहुचर्चित नाम है। इस नाम की चर्चा केवल भारत में ही नहीं अपितु देश विदेश में भी ख़ूब धूम मचा रही है। शम्भू शिखर मधुबनी, बिहार प्रदेश से आते हैं। आपने पॉलिटिकल साइंस में मोती लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त की है। आपने अपनी आजीविका की शुरुआत एक स्टैंडअप कॉमेडियन के रूप में ही स्टार प्लस TV के “द ग्रेट इंडियन लाफ़्टर” कार्यक्रम के माध्यम से की थी। शम्भू शिखर उस कार्यक्रम के सेमी फ़ाइनलिस्ट रहे और अपनी विशिष्ट प्रतिभा और पह्चान लोगों के दिलों में बनायी।
आप एक सफल लेखक भी है, जहाँ आपने अपनी क़लम से अनेक प्रचलित उपन्यासों को प्रसारित किया और पढ़ने वालों के दिलों को जीत लिया। आप हिन्दी साहित्य के जगत में लगभग दो दशकों से कवि सम्मेलनों और मुशायरों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। साधारण सहज और सरल भाषा की अभिव्यक्ति आप की अनोखी पह्चान है। कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दौरों पर आपने ख़ूब नाम कमाया है। दर्जनों विदेश यात्राओं में भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी को उच्चतम शिखर पर पहुँचा कर उसे गौरान्वित किया है। इनका ऐसा विश्वास है, कि दूसरों पर नहीं, ख़ुद पर किया गया हास्य ही श्रेष्ठ हास्य होता है और श्रेष्ठ हास्य ही चेहरे पर मुस्कान और दिलों में ख़ुशी भर देता है।
आपकी उपन्यास कृतियाँ
१. और वैज्ञानिक लव २. सन्यासी योद्धा ३. सिलवटों की महक ४. बात पते की ५.चाँद पर प्लाट
६. आगामी रचना चीनी को जमा कर गन्ना बना दूँ
विभिन्न टेलीविज़न प्रस्तुतियाँ
टेलिविज़न की दुनिया में शम्भू शिखर ने अपने हास्य व्यंग्य की कविताओं द्वारा अपार ख्याति अर्जित की है १. वाह वाह क्या बात है( सब टीवी) २. ग्रेट इंडियन लाफ़्टर चैनल (स्टार वन टीवी) ३. लपेटे में नेताजी (न्यूज़ १८ टीवी) ४. इधर उधर और शिखर (रेडियो FM 94.3)
पुरस्कार और सम्मान
१. भारतेन्दु हरिश्चंद्र सम्मान २. पुष्कर सम्मान ३. साहित्य शिखर सम्मान ४. रोटरी क्लब से सम्मानित
कवयित्री मुमताज़ नसीम
मुमताज़ नसीम आकर्षक प्रतिभा की धनी उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर से ताल्लुक़ रखती है। मुमताज़ नसीम हिंदी और उर्दू मंचों पर बहुत ही लोकप्रिय और ख़ास नाम है। आपने उर्दू में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से प्राप्त की है। बेहतरीन प्रस्तुतीकरण का हुनर रखने वाली ऐसी कवयित्री और शायरा है, जिन्हें देश-विदेशों से हर वर्ग के श्रोताओं ने सराहा और लोकप्रिय बनाया है।
मुमताज़ नसीम ने काव्य मंचों और मुशायरों में अपने गीत गजलों के माध्यम से अपनी अलग से पहचान बनायी है। जन सामान्य को समझ आने वाली सरल ज़ुबान के दम पर लोगों के दिलों में जगह बनाने में क़ामयाब हुई है। मुमताज़ नसीम की आकर्षक प्रस्तुति पूरी महफ़िल को अपनी सुरीली आवाज़ और आकर्षक अंदाज़ से बाँध देती है, मोह लेती हैं। आप लगभग दो दशकों से अपनी ग़ज़ल, मुक्तक, नज़्म और गीत अंतरराष्ट्रीय काव्य मंचों पर पढ रही है।
आपने अपनी कविताओं के संकलन की दो पुस्तकें प्रसारित की है। आप कई सामाजिक संस्थानों द्वारा जिगर अवार्ड के लिए सम्मानित की गई है।
विशेष टेलीविज़न प्रस्तुतियाँ
१. दूरदर्शन २. ऑल इंडिया रेडियो ३. एनडी टी वी इंडिया ४. सब TV ५. आज तक ६. सहारा समय ७. दबंग, महुआ और साधना TV पर प्रसारण
आपकी विदेश यात्राएँ
बेहरीन, पाकिस्तान, क़तर, यू ए इ, ओमान, इथोपिया एवं यू एस ए।
***
|
|
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति - उत्तर पूर्व ओहायो शाखा आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन, मई 3, 2024
|
|
|
|
|
होली मिलन समारोह अप्रैल ६,२०२४ में
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति -इंडियाना शाखा द्वारा हिन्दी शिक्षा पर प्रकाश
प्रतिवेदन : डॉ. राकेश कुमार एवं आदित्य शाही
|
|
|
अप्रैल 6, 2024 को अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति - इंडियाना शाखा ने इंडियानापोलिस में हिन्दी भाषी साँस्कृतिक संगठन द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में स्वर्ण प्रायोजक के रूप में भाग लिया और वहाँ पर समिति का एक बूथ लगाया। इस अद्वितीय होली मिलन समारोह में नृत्य प्रतियोगिताएँ, होली के लोकगीत, अग्निरहित पाककला का आयोजन हुआ था जिसमे 45 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। सभी प्रतियोगिताएँ प्रतिभाओं से भरी थी। छोटे बच्चों से लेकर युवाओं ने अद्भुत नृत्य कला और अग्निरहित पाककला प्रतियोगिता में कुछ अविश्वसनीय व्यंजनों का प्रदर्शन किया। फाल्गुन पर लोकगीत भी गाया गया जो लोगो ने काफी पसंद किया। इस समारोह में 250 से अधिक लोगो ने भाग लिया। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति को अपने उद्देश्यों एवं विशेषकर हिन्दी शिक्षा पर बात करने के लिए मंच उपलब्ध कराया गया।
अं. हि. स.- इंडियाना शाखा की अध्यक्षा श्रीमती विद्या सिंह जी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए समिति के लक्ष्यों को बताया और श्री आदित्य शाही (उपाध्यक्ष, अं. हि. स.- इंडियाना शाखा) ने समिति द्वारा स्व-चालित ऑनलाइन हिन्दी शिक्षा और आगामी हिन्दी दिवस कार्यक्रम का विवरण दिया और लोगों को उसमें हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया। लोकगीतों की प्रस्तुति के समय श्री आदित्य शाही ने फाल्गुन माह और इससे सम्बंधित लोकगीतों का महत्व भी बताया।
समिति के बूथ का संचालन श्री आदित्य शाही, डॉ. राकेश कुमार, डॉ. कुमार अभिनव, डॉ. देवव्रत सिंह, श्रीमती विद्या सिंह और दो छात्र स्वयंसेवक छात्रों (12वीं कक्षा के कौस्तुभ तिवारी और 9वीं कक्षा के कौशल तिवारी) द्वारा किया गया था। बूथ टेबल पर, हमारे प्रदर्शन में एक पृष्ठ पर मुद्रित समिति के उद्देश्य, हिन्दी शिक्षा फ़्लायर, पूर्व में प्रकाशित "विश्वा" पत्रिकाएँ, सम्मलेन की समरिका और हिन्दी दिवस के आगामी कार्यक्रम शामिल थे।
इस समारोह में श्रीमती विद्या सिंह को नृत्य प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार देने के लिए आमंत्रित किया गया, जो अ. हि. स.- इंडियाना शाखा के लिए भी एक सम्मान था। समारोह में उपस्थित लोगों से हमें हिन्दी शिक्षा और समग्र नियोजित गतिविधियों को बढ़ावा देने के हमारे प्रयासों पर बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। कुछ लोगों ने हिन्दी शिक्षा के हमारे उद्देश्य से जुड़ने के लिए अपनी रुचि दिखाई। इस समारोह में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति अपने मूल्यों और लक्ष्यों को लोगों तक पहुँचाने में सफल रही और हमें आशा है कि भविष्य में आयोजित इस प्रकार के कार्यक्रम में हम पुनः समिति के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए भाग ले सकेगें।
***
|
 |
 |
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति - इंडियाना शाखा की भागीदारी और होली मिलन समारोह की झलकियाँ
***
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की
स्थानीय होली मिलन समारोह में भागीदारी और दृश्यता
प्रतिवेदन - डॉ. शैल जैन
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा ने मारवाड़ी एसोसिएशन ऑफ़ ओहायो एवं अग्रवाल समाज द्वारा आयोजित होली समारोह में भाग लिया और वहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के बारे में लोगों को अवगत कराया। ये होली मिलन समारोह मार्च १६, २०२४ को था और इसमें सभी उम्र के व्यक्ति शामिल थे ।
यहाँ ज्यादातर कार्यक्रम बच्चों द्वारा किये गये थे। बड़ो की भी पूरी भागीदारी थी। इस कार्यक्रम में २०० से अधिक लोगो ने भाग लिया।
अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति को अपने उद्देश्यों एवं हिन्दी शिक्षा पर बात करने के लिए मंच उपलब्ध हुआ । अं. हि. स. की उत्तर पूर्व ओहायो शाखा की पूर्व अध्यक्षा श्रीमती किरण खेतान ने सभी अतिथियों को समिति के लक्ष्यों और स्थानीय 'इंडिया संडे स्कूल' के बारे में बताया। उन्होंने ‘समर इण्डियन हेरिटेज कल्चर कैंप’ के बारे में भी बताया, जहाँ बच्चे भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा सीख सकेंगे। ये ३ सप्ताह का कार्यक्रम है, जुलाई ८ से जुलाई २६ तक। ५ से १५ साल के बच्चों का ये कैम्प इंडिया संडे स्कूल के साथ उत्तर पूर्व ओहायो शाखा और चिन्मय मिशन की भागीदारी के साथ हो रहा है। इस प्रकार नार्थ ईस्ट ओहियो शाखा अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के लक्ष्यों और स्थानीय हिन्दी शिक्षण के प्रोग्रामों को लोगों तक पहुँचाने में सक्षम रही।
***
|
|
 |
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- न्यू जर्सी शाखा
द्वारा- होली मिलन 2024 कार्यक्रम
प्रतिवेदन: बबिता श्रीवास्तव, शाखा अध्यक्ष
|
|
|
अ.हि.स. की न्यूजर्सी शाखा का ‘होली समारोह’ कार्यक्रम अध्यक्षा बबीता श्रीवास्तव के घर 6 अप्रैल, 2024 सायं 6 बजे आयोजित किया गया था।
सबों ने मिल कर होली प्रोग्राम मनाया, गाने बजाने का आनंद लिया और बबीता श्रीवास्तव द्वारा बनाये स्वादिष्ट व्यंजनों का मजा भी लिया ।
|
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- वाशिंगटन, डी. सी. शाखा
होली मिलन 2024 कार्यक्रम में शामिल
प्रतिवेदन: चौधरी प्रताप सिंह, वाशिंगटन, डी. सी. शाखा के अध्यक्ष
|
|
|
अ.हि.स. की वाशिंगटन शाखा के शाखा अध्यक्ष चौधरी प्रताप सिंह और लाइफ मेंबर धर्मेन्द्र सिंह ने जाँन हापकिन्स युनिवर्सिटी के छात्रों एवं स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर ‘होली मिलन’ समारोह मनाया। क़रीब ३०० लोगों ने भाग लिया और होली मिलन समारोह में भारतीय लोगों के साथ साथ स्थानीय अमेरिकी नागरिकों ने भी मिलकर होली का आनंद उठाया। इस प्रोग्राम में धर्मेन्द्र भाई के रेस्टोरेंट के द्वारा निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की गयी थी।
होली के रंग भरे त्यौहार में प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ स्थानीय लोगों का भी उल्लास देखकर बहुत अच्छा लग रहा था। फोटो सबों के साथ मनाई होली त्योहार को अच्छी तरह दिखा रहा है ।
|
|
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- डॉलस, टेक्सास शाखा
हास्य कवि सम्मलेन, अप्रैल १२, २०२४
द्वारा- वीणा शर्मा, अध्यक्षा डॉलस शाखा
|
|
|
डॉलस, टेक्सास में 12 अप्रैल , 2024 को इरविंग आर्ट सेंटर में, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी सदस्यों के सौजन्य से कवि सम्मेलन बहुत ही धूम-धाम से मनाया गया। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति की शाखा ने एक टेबल अपनी समिति के बारे में दर्शकों को जानकारी देने के लिये लगाई और साथ -साथ इस बार फोटो बूथ भी लगाया। लोगों ने फोटो बूथ पर खूब फोटो लिए और अंत में स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया।
भारत से आये तीनों कवियों अरुण जैमिनी, शम्भू शिखर एवं मुमताज़ नसीम जी ने श्रोताओं का मन मोह लिया। सभी श्रोता अंत तक कार्यक्रम से जुड़े थे। 400 से अधिक श्रोताओं ने भरपूर आनंद उठाया। कई श्रोता तो अगले साल के कवि सम्मलेन की टिकट की बुकिंग के लिए भी तैयार थे।
***
|
|
 |
|
|
|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- हयूस्टन शाखा
हास्य कवि सम्मलेन, अप्रैल १३, २०२४
श्री स्वपन धैर्यवान द्वारा- हास्य कवि सम्मलेन की कुछ झलकियाँ
|
|
|
अमेरिका में प्रवासी राजस्थानियों ने मनाया गणगौर महोत्सव
फिलाडेल्फिया, पेन्सिलवेनिया
|
|
|
अमेरिका में प्रवासी राजस्थानियों ने मनाया गणगौर महोत्सव
सोलन, ओहायो
|
|
|
महाकवि गुलाब खंडेलवाल ‘जन्म शताब्दी महोत्सव’
२४ फ़रवरी, २०२४ क्लीवलैंड, ओहायो
द्वारा : अलका खंडेलवाल
|
|
|
24 फरवरी, 2024 को ‘महाकवि गुलाब खंडेलवाल जन्म शताब्दी महोत्सव’ क्लीवलैंड के भारतीय समुदाय के बीच शिव विष्णु मंदिर, क्लीवलैंड के सभागार में धूमधाम के साथ मनाया गया। साहित्य वाचस्पति महाकवि गुलाब खंडेलवाल जी का जन्म राजपूताना राजस्थान के नवलगढ़ शहर में 21 फरवरी, 1924 को हुआ था। 2, जुलाई, 2017 को वे इस लौकिक संसार से विदा ले अनंत में समा गए।
उन्हें छायावादी कवि के साथ हिंदी में ग़ज़लों का प्रयोग करने वाले प्रथम कवि के रूप में भी जाना जाता है। वे बेढब बनारसी, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, हरिवंश राय ‘बच्चन’ सुमितानंदन पन्त, महादेवी वर्मा आदि कवियों के समकालीन थे। उन्होंने भारत के साथ-साथ अमेरिका के क्लीवलैंड शहर में रह रहे भारतीय समुदाय के हृदयों को भी अपने अमूल्य काव्य से सराबोर किया।
कार्यक्रम की शुरुआत शाम पाँच बजे अल्पाहार के साथ की गई। 6 बजे तक लोगों ने अपने-अपने स्थान ग्रहण किये। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण यू ट्यूब के माध्यम से भी किया जा रहा था। डा. शोभा खंडेलवाल ने अतिथियों को संबोधित करते हुए उनका स्वागत किया। तत्पश्चात सरस्वती वंदना द्वारा कार्यक्रम का शुभारम्भ श्रीमती रेनू चड्डा ने किया। उन्होंने गुलाब खंडेलवाल जी के साथ के अपने निजी अनुभवों को याद करते हुए उनके द्वारा लिखी सरस्वती वंदना ‘जीवन सफल करो’ को गाकर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। संगीत शिक्षिका श्रीमती नीलम गुप्ते ने भी ‘कमला कमल हासिनी’ सरस्वती वंदना गाई जोकि कवि ने अपने काव्य साधना के प्रारम्भिक काल 1940-41 में लिखी थी।
कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गुलाबजी की नतनी मुक्ता झालानी ने, जिन्होंने ग़ज़ल ‘कभी सर झुकाके चले गए, कभी मुँह फिराके चले गए’ गाई और पौत्री अंकुर खंडेलवाल ग्रोएन ने गीत ‘बैठकर मेरे सुर में गाओ’ गाया जिसमें गुलाब जी ने सात सुरों के माध्यम से पूरे जीवन की गाथा कही है। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक के जीवन के सभी पड़ावों के बारे में बताया है। ऐक्रन, ओहायो की वंदना हरियाणी जोकि अपनी जिंदगी के आठवें दशक में हैं और शास्त्रीय संगीत में बचपन से रूचि रखती हैं, ने गुलाबजी की ग़ज़ल ‘बात जो कहने की थी ओंठों पे लाकर रह गये’ उनकी किताब ‘पंखुरियाँ गुलाब की’ से गाई।
श्रीमती सुगाता चटर्जी ने गीत ‘मन मेरे ! नीलकंठ बन’ अहीर भैरव राग में बहुत ही सुरीले स्वर में सुनाया। वे संगीत प्रभाकर की डिग्री से सम्मानित हैं और क्लीवलैंड शहर में 25 सालों से भी ज्यादा समय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्रदान कर रहीं हैं। गीत में कवि ने विषम परिस्थितियों में भी दृढ़ता से आगे बढ़ते रहने की बात कही है।कार्यक्रम की एक रसता को भंग करते हुए गुलाबजी की पौत्री आभा खंडेलवाल ने भरत नाट्यम शैली में उनके गीत ‘नाथ क्या राधेश्याम कहलाये, एक बार राधा से मिलने भी ब्रज लौट न पाये’ पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया।
विश्वनाथ नारायण को संगीत गायन अपनी माँ से विरासत में मिला है। ये शास्त्रीय संगीत मे परांगत हैं। लगभग पिछले 40 सालों से क्लीवलैंड में संगीत सिखा रहे हैं। गुलाब जी के 80 के दशक में अमेरिका आने के समय से ही नारायण जी का संपर्क गुलाबजी से रहा है। उनके सानिध्य में नारायण जी ने गुलाब जी की अनेकों रचनाओं को संगीतबद्ध किया है। जब रचनाकार और संगीतज्ञ साथ मिलकर सृजन करते हैं तब एक अद्भुत कृति का निर्माण होता है उसी की एक झलक उनके द्वारा प्रस्तुत भजन ‘कैसी अद्भुत तेरी माया’ में श्रोतागणों को सुनने को मिली।
कार्यक्रम दर्शकों को मनोरंजित करते हुए धीरे धीरे अपने अंत की तरफ बढ़ रहा था और अब समय था ‘महाकवि गुलाब खंडेलवाल जन्म शताब्दी महोत्सव’ पर प्रकाशित 100 पृष्ठों की स्मारिका के विमोचन का, जिसे डा. तेज पारिक द्वारा विमोचित किया गया। स्मारिका में गुलाब जी द्वारा अलग अलग रसों में लिखी विभिन्न कविताओं और ग़ज़लों का संग्रह है। उसके अलावा प्रसिद्ध कवियों और रचनाकारों की गुलाब जी के लिए लिखी गई सम्मतियाँ विशेष आकर्षण हैं। स्मारिका में श्री नारायण चतुर्वेदी जी के 75 वें जन्मदिवस पर इलाहबाद में ली गई एक दुर्लभ फोटो भी है, जिसमें गुलाबजी के साथ तत्कालीन लगभग सभी प्रसिद्ध साहित्यकार हैं, दुर्भाग्यवश वे सब अब हमारे बीच नहीं हैं।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण गुलाबजी की पुत्र वधु डा. शोभा खंडेलवाल द्वारा निर्मित गुलाब जी के जीवन पर बना चलचित्र था। चलचित्र का सम्पादन श्री अनंत माथुर द्वारा किया गया था और उसमें कथावाचक के रूप में अपनी जानदार आवाज़ में जान डाली थी डा. तेज पारिक ने । ध्वनि प्रभाव डा. विवेक खंडेलवाल द्वारा दिया गया था। चलचित्र में गुलाबजी का पूरा जीवन दर्शन दर्शाया गया था जिसे दर्शकों ने साँस साधे और मन्त्र मुग्ध होकर देखा और सराहा।
योजना शर्मा ने गीत ‘किस सुर में मैं गाऊँ?’ राग यमन में गाया। वे विस्कांसिन में मैडिसन कॉलेज से सेवानिवृत्त डीन हैं। उन्होंने संगीत में गंधर्व महाविद्यालय दिल्ली से विशारद किया है। इन्होंने मन्ना डे के साथ और भारत में रेडियो स्टेशन में भी गाया है। श्री प्रत्युष रंजन ने गुलाब जी की ग़ज़ल ‘आज तो शीशे को पत्थर पे बिखर जाने दे’ सुनाई और संगीतमय समाँ बाँध दिया।
गुलाब जी ने अपनी पुस्तक ‘रविंद्रनाथ: हिंदी के दर्पण में’ में रविंद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित बंगला कविताओं का भावानुवाद हिंदी में किया है, उन्हीं में से २ कविताएँ ‘एक दिन तुम प्रिय’ और ‘मुख की छवि तो देखूँ’ उनकी पुत्री श्रीमती विभा झालानी द्वारा प्रस्तुत की गईं।
श्री राजन वैद्यनाथन ने ‘हुआ प्यार का यह असर मिलते मिलते’ और रूबी झा ने ग़ज़ल ‘क्या जिंदगी को दीजिये, क्या क्या न दीजिये’ सुनाई। ‘मैंने तेरी तान सुनी है’ गीत को ऑर्केस्ट्रा पर श्री नीलेश कुलकर्णी ने सुनाया। उनका साथ बांसुरी पर अनीष तामस्कर, गिटार पर डा. विवेक खंडेलवाल, हारमोनियम पर श्री विश्वनाथ नारायण ने दिया था। श्री विश्वनाथ नारायण ने ग़ज़ल ‘जो न आए लौट के फिर कभी, मुझे उससे मिलने की आस है’ सुनाई। इस ग़ज़ल में गुलाब जी ने अपनी पत्नी के मृत्युपरांत अपनी विरह वेदना को व्यक्त किया है, जो सुनने वालों के ह्रदय को स्पर्श कर गई।
कार्यक्रम का समापन गुलाब जी द्वारा लिखित उनके प्रिय भक्ति गीत ‘सब कुछ कृष्णार्पणम’ जिसमें भगवद्गीता का सार है द्वारा किया गया। इसे उनकी पुत्री विभा झालानी, प्रत्यूष रंजन, योजना शर्मा, विश्वनाथ नारायण ने प्रस्तुत किया और गिटार पर साथ दिया डा. विवेक खंडेलवाल ने।
श्री विश्वनाथ नारायण, श्रीमती सुगाता चटर्जी, श्रीमती वंदना हरियाणी और श्री कोटि रवि 10 वर्षों से भी ज्यादा समय से अपनी अपनी कला और हुनर द्वारा गुलाबजी को समय समय पर सहयोग देते रहे थे। इस अवसर पर इनके योगदान के लिए इन्हें शाल उढ़ाकर सम्मानित किया गया।
डा. शोभा खंडेलवाल ने अपने धन्यवाद ज्ञापन में आभासी रूप से जुड़े और उपस्थित सभी दर्शकों, प्रस्तुतकर्ताओं, शिव विष्णु मंदिर, फोटोग्राफर श्री कोटि रवि, स्वादिष्ट खाने के लिए श्री गजेन्द्र श्रीवास्तव, स्मारिका के प्रकाशन के लिए श्रीमती मधु बंसल, चलचित्र निर्माण के लिए श्री अनंत माथुर, स्टेज निर्माण के लिए श्री मुकेश देसाई और एशिया टी.वी. के प्रसारण हेतु महेश देसाई जी का धन्यवाद किया।
लगभग 200 लोग इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। अंत में सभी ने स्वादिष्ट खाने का आनंद उठाया और जाते समय यादगार के रूप में हर परिवार को एक-एक स्मारिका और इस अवसर पर छपी डायरी दी गईं।
|
|
 |
|
|
|
अपनी कलम से
"एक न एक दिन"
|
|
|
|
|
|
|
सुशांत सुप्रिय जी हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार, कवि तथा साहित्यिक अनुवादक हैं। इनकी कहानियाँ और कविताएँ कई राज्यों के स्कूल-कॉलेजों में बच्चों को पढ़ाई जाती हैं ।
|
|
|
|
|
एक न एक दिन
वह सोमवार की बिना बारिश वाली एक गर्म सुबह थी। औरेलियो एस्कोबार एक बिना डिग्री वाला दाँतों का डॉ. था। सुबह जल्दी उठ कर उसने छह बजे ही अपना चिकित्सालय खोल लिया। उसने शीशे की बड़ी डिबिया में से प्लास्टर के साँचे पर चढ़े कुछ नक़ली दाँत निकाल लिये। मेज़ पर कुछ उपकरण रखकर उसने उन्हें क़रीने से सजाया जैसे वे प्रदर्शनी के लिए रखे गए हों। उसने बिना कॉलर की एक धारीदार क़मीज़ पहन रखी थी, जिसका गला सोने के बटन से बंद था। उसने फ़ीते वाली पतलून भी पहनी हुई थी। वह दुबला-पतला किंतु सीधा खड़ा होने
वाला व्यक्ति था। उसकी निगाह से हालात का पता शायद ही कभी चलता था। बल्कि उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे कोई बहरा आदमी आपको देख रहा हो।
जब उसने चीज़ों को व्यवस्थित ढंग से मेज़ पर रख लिया तो उसने दाँतों में छेद करने वाली मशीन को कुर्सी की ओर खींचा और बैठकर नक़ली दाँतों को चमकाने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वह क्या कर रहा है, इसके बारे में वह बिल्कुल नहीं सोच रहा था। लेकिन वह अपने पैरों से दाँतों में छेद करने वाली मशीन को चलाते हुए लगातार काम करता रहा। यहाँ तक कि जब ज़रूरत नहीं थी, तब भी वह उस मशीन को चलाता जा रहा था।आठ बजने के बाद उसने कुछ देर के लिए काम करना बंद कर दिया और खिड़की में से आकाश की ओर देखने लगा। बाहर उसे दो चिंताग्रस्त बाज़ दिखे जो पड़ोसी के मकान की शहतीर पर बैठे धूप में अपने पंखों को सुखा रहे थे। उसे लगा कि दोपहर का भोजन करने से पहले दोबारा बारिश होगी। तभी उसके ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज़ आवाज़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया।
“पापा।“
“क्या है?”
“मेयर जानना चाहते हैं कि क्या आप उनका सड़ा हुआ दाँत निकाल देंगे?”
“उन्हें कहो कि मैं यहाँ नहीं हूँ!”
अब वह एक सोने के दाँत को पॉलिश कर रहा था। उसने वह दाँत एक हाथ की दूरी पर रखा और अपनी आधी मुँदी आँखों से उस दाँत की जाँच की। उसका बेटा छोटी-सी बैठक में से दोबारा चिल्लाया।
“वे कह रहे हैं कि आप यहीं हैं क्योंकि वे आपकी आवाज़ सुन सकते हैं।”
दाँतों का डॉ. सोने के दाँत को ध्यान से देखता रहा। उस दाँत को पूरी तरह चमका कर मेज़ पर रख देने के बाद उसने कहा : “ठीक ही है।”उसने फिर से दाँतों को तराशने वाला उपकरण उठा लिया। फिर उसने गत्ते के डिब्बे में से काम का कुछ सामान निकाल लिया। वह बचे हुए काम की चीज़ें वहीं रखा करता था। उसके बाद वह सोने के दाँत को फिर से पॉलिश करने लगा।
“पापा।”
“क्या है?”
उसने अभी भी अपना हाव-भाव नहीं बदला था।
“वे कह रहे हैं, यदि आपने उनका सड़ा हुआ दाँत नहीं निकाला तो वे आपको गोली मार देंगे।”
"बिना जल्दबाज़ी किए, अपना काम रोककर डॉ. ने दाँतों में छेद करने वाला उपकरण कुर्सी के पास से हटाया और अपनी मेज़ की निचली दराज़ को पूरा खोला। वहाँ एक रिवॉल्वर पड़ा था।
“ठीक है।” उसने कहा। “उसे कहो कि आकर मुझे गोली मार दे।”उसने एक हाथ से कुर्सी को दरवाज़े के ठीक विपरीत घुमाया जबकि उसका दूसरा हाथ अब भी खुली दराज़ के किनारे को पकड़े हुए था। मेयर खुले दरवाज़े के सामने प्रकट हुआ। उसने अपने चेहरे की बाईं ओर की दाढ़ी बना ली थी लेकिन चेहरे के दूसरी ओर सूजन थी और पाँच दिनों की बढ़ी हुई दाढ़ी थी। वह दर्द से पीड़ित लग रहा था। दाँतों के डॉ. ने उसकी सुस्त आँखों में कई रातों की पीड़ा और छटपटाहट देखी। उसने अपनी उँगलियों से धकेल कर दराज़ को बंद कर दिया और नरम आवाज़ में कहा : “ बैठिए।”
“नमस्ते।” मेयर बोला।
“नमस्ते।” दाँतों के डॉ. ने कहा।
जब उपकरण उबल रहे थे, मेयर ने अपना सिर कुर्सी के ऊपरी हिस्से पर टिका लिया और अच्छा महसूस करने लगा। उसकी साँस बर्फ़-सी ठंडी थी। वह एक सामान्य सा कमरा था। वहाँ लकड़ी की एक पुरानी कुर्सी थी। पैर से चलने वाला दाँतों में छेद करने वाला उपकरण था और शीशे के खोल में चीनी मिट्टी की कुछ बोतलें थीं। कुर्सी की विपरीत दिशा में एक खिड़की थी जहाँ कंधे जितनी ऊँचाई पर पर्दा लगा हुआ था। जब मेयर ने दाँतों के डॉ. के क़रीब आने की आहट सुनी तो उसने अपनी एड़ियाँ ज़मीन पर कस कर टिका दीं और अपना मुँह खोल लिया। औरेलियो एस्कोबार ने अपना सिर रोशनी की ओर घुमाया। सड़े हुए दाँत की जाँच करके डॉ. अपनी उँगलियों केहल्के दबाव से मेयर का जबड़ा बंद कर दिया।
“यह शल्य-क्रिया आपको बेहोश किए बिना करनी पड़ेगी।
“क्यों?”
“क्योंकि दाँत में मवाद वाला फोड़ा है।”
मेयर ने डॉ. की आँखों में देखा। “ठीक है,” उसने कहा और मुस्कुराने की कोशिश की। दाँतों के डॉ. ने जवाब में कोई मुस्कान नहीं दी। डॉ. कीटाणु-मुक्त किए गए उपकरणों के पात्र को उठा कर काम करने वाली अपनी मेज़ पर ले आया। फिर उसने चिमटी से पकड़ कर उन्हें पानी में से निकाल लिया। वह यह सारा काम धीमी गति से करता रहा। फिर उसने थूकदान को अपने जूते की मदद से धकेला और चिलमची में अपने हाथ धोने चला गया। उसने यह सारा कार्य बिना मेयर की ओर देखे हुए किया। किंतु मेयर उसे लगातार देखता रहा। वह निचली अक़्ल-दाढ़ थी। डॉ. ने अपने पैर फैलाए और गर्म चिमटी से अक्ल-दाढ़ को पकड़ा। मेयर ने कुर्सी के हत्थे को कस कर पकड़ लिया। उसने अपने पैर पूरी ताक़त से फ़र्श पर टिका लिए। उसने अपने गुर्दे में एक बर्फ़ीला ख़ालीपन महसूस किया। लेकिन उसने मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकाली। दाँतों के डॉ. ने केवल अपनी कलाई हिलाई। बिना किसी विद्वेष के, बल्कि एक कड़वी कोमलता से वह बोला, “अब आपको हमारे बीस लोगों की मौत की क़ीमत चुकानी होगी।”
मेयर ने जबड़े में से हड्डी के टूटने की आवाज़ सुनी। असहनीय पीड़ा की वजह से उसकी आँखों में आँसू आ गए। लेकिन उसने तब तक साँस नहीं ली जब तक उसने संक्रमित अक़्ल-दाढ़ को मुँह से बाहर आता हुआ महसूस नहीं किया। फिर उसने अपने आँसुओं के बीच से उस दाँत को देखा। उसे लगा कि उसकी पिछली पाँच रातों की यातना का इस दर्द से कोई वास्ता नहीं था। थूकदान पर झुका हुआ वह पसीने से तरबतर था और हाँफ़ रहा था। उसने अपने अंगरखे के बटन खोल लिये और अपने पतलून की जेब से अपना रुमाल निकालने लगा। डॉ. ने उसे एक साफ़ कपड़ा दिया। “अपने आँसू पोंछ लीजिए।” उसने कहा। मेयर ने ऐसा ही किया। वह काँप रहा था। जब दाँतों का डॉ. अपने हाथ धो रहा था, मेयर ने कमरे की ढहती हुई छत और कमरे के एक कोने में धूल से भरी हुई जगह पर मकड़ी के जाले और उसके अंडे देखे। जाले में मरे हुए कीड़े फँसे हुए थे।
डॉ. अपने हाथों को पोंछता हुआ लौटा।
“जा कर सो जाइए,” उसने कहा। “नमक वाले गर्म पानी से गरारे भी कीजिए।”
मेयर उठकर खड़ा हो गया। उसने डॉ. को एक फ़ौजी सलाम दिया। डॉ. से विदा लेकर वह चलता हुआ दरवाज़े तक पहुँचा। उसने बिना अपने अंगरखे के बटन बंद किए अपने पैरों को थोड़ा-सा फैलाया।
“बिल भेज देना,” वह बोला।
“आपके या शहर के नाम?”
मेयर ने उसकी ओर नहीं देखा। उसने दरवाज़े को बंद करते हुए पर्दे के बीच से कहा, “एक ही बात है।” मूल कहानी : गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज़
***
|
|
|
|
|
"जिंदगी सबूत भी मांगती है" और "जीवन का सफर "
|
|
|
|
|
|
|
द्वारा - श्री राजेंद्र भाटिया
|
श्री राजेंद्र भाटिया जी ७४ वर्षीय भारत सरकार के एक प्रतिष्ठित पीएसयू में सेवा की और एक वरिष्ठ पद पर सेवानिवृत्त हुये हैं| इन्होने बी.ई (मैकेनिकल) की योग्यता प्राप्त की है।
|
|
|
|
|
१ ) जिंदगी सबूत भी मांगती है
जिंदगी सबूत भी मांगती है
जिंदा हो तो जिंदा होने का सबूत देते रहो,
लोगों से मिलते रहो और अपने तजुर्बे शेयर करते रहो,
अपने कामों से लोगों की मदत करते रहो,
अहंकार को छोड़, कभी बच्चे तो कभी वृद्ध बनते रहो,
सीखने सिखाने का सिलसिला जारी रखते रहो,
जिंदगी कब साथ छोड़ दे इस चिंता से मुक्त रहते रहो,
आपके अच्छे कर्म आपके साथ ही जायेंगे, इसे यकीन मान खुश रहते रहो
आपके बाद भी आपको लोग एक अच्छा इंसान समझें, इसके लिए प्रयत्न करते रहो,
जो हो गया उससे सीख तो लो, पर उसकी व्यर्थ चिंता में आज को मत खोते रहो,
जो नहीं है, उसकी फिक्र किए बिना, जो है उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करते रहो,
किसी के दुख को हो सके तो कम करो, पर किसी के दुख का कारण मत बनते रहो,
कोइ तुम्हें याद करे या ना करे, पर अपनो को भुलाते मत रहो,
मरने के बाद भी लोगों के दिलों में कुछ तो जिंदा रह सको,
यही सबूत रहे तुम्हारा, इसी का प्रयास करते रहो।
२) जीवन का सफर
जीवन का सफर
जितना काम सामान रहेगा
उतना सफर आसान रहेगा
उससे( ईश्वर से) मिलना ना मुमकिन है
जब तक अपना ध्यान रहेगा।
इच्छाएं जितनी कम होंगी
उतना ही मन शांत रहेगा
उससे मिलना ना मुमकिन है
जब तक अपना ध्यान रहेगा।
भोग विलास जितने कम होंगे
उतना जीवन सरल रहेगा
उससे मिलना ना मुमकिन है
जब तक अपना ध्यान रहेगा।
सिमरन कर लोगे तुम जितना
उतना ही अज्ञान मिटेगा
दुख दुख तुमको एक लगेंगे
जब सच्चा वो ज्ञान मिलेगा।
जब औरों के कम आओगे
तब तब जीवन सफल रहेगा
उससे मिलना फिर मुमकिन है
जब औरों का ध्यान रहेगा।
***
|
|
|
|
|
द्वारा - डॉ. सुनील त्रिपाठी
|
डॉ. सुनील त्रिपाठी, निराला राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित हैं।अभी ये उच्च श्रेणी शिक्षक, शिक्षा विभाग म.प्र. में हैं। पढ़ने-पढ़ाने के अलावा आकाशवाणी, दूरदर्शन में प्रसारण भी करते है। स्वतन्त्र लेखक के साथ-साथ इनकी रचनाएँ दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में छपती रहती हैं।
|
|
|
|
|
वसन्त ऋतु है
वसन्त ऋतु है
खिले हैं तरुवर, मगन है डाली,
नवीन कोपल, नवीन पत्ते।
पुनीत पावन, वसन्त ऋतु है,
गगन, धरा को करे नमस्ते।।
लुभा रही, उसकी चित्रकारी,
धरा-गगन का, मिलन क्षितिज में,
दशों दिशायें, महक रहीं हैं,
सजीव-निर्जीव, सब बहकते।
तरंगिणी का, प्रवाह अद्भुत,
लहर लहरती, उछल रही है,
जलधि की बाहों में झूमने को,
चली है द्रुतगति से वो मचलते।
नियति नटी के, क्रियाकलापों,
में भर गया है, नवीन चिंतन,
छिड़ी है उपवन, में ध्वनि वसंती,
उठा है कलरव, विहग विहसते।
लुटा रहा रवि, उजास जग को,
किरण सुशोभित, ललाम नभ में,
मगन हुआ मन, सुनील ऐसे,
मिला हो जैसे, वो चलते-चलते।
***
|
|
|
|
|
द्वारा - श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव
|
श्री रामेश्वर वाढेकर महादेव, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय”, औरंगाबाद- महाराष्ट्र से हैं। लेखन के साथ-साथ शोध कार्य में अध्ययनरत हैं।
|
|
|
|
|
अग्निदाह
" हैलो..,हैलो..पमा!"
"हाँ । हैलो..बोल बालू।"
-"मैं गाँव में आया हूँ। तू कहाँ है?"
-"मैं काम पर हूँ। रात को जल्द घर आया तो मिलता हूँ; नहीं तो कल मिलेंगे।
-"ठीक है।रखता हूँ। बाय।"
दूसरे दिन दोपहर के समय रास्ते से जोर से आवाज आयी," बालू है घर पर।"
माँ ने घर का गेट खोला, तो रास्ते पर पमा दिखाई दिया । मैंने कहा,"पमा, थोड़ी देर के लिए आ, चाय पीते हैं।" "अभी नहीं । अगली बार। बालू तू ही बाहर आ। हम बाहर घूमकर आते हैं। बहुत दिन हुए खुलकर बातें नहीं हुई।"-"दो मिनट ठैर, मैं अभी आया।"
हम दोनों बातें करते- करते गाँव से बहुत दूर आए। मैंने दुःख भरे स्वर में कहा, "पमा, तुम्हारे पिता भीमराव की मृत्यु वार्ता सुनी, बहुत दुःख हुआ। क्या वे बीमार थे?"
"बीमार नहीं थे, किंतु उन्हें कुछ दिन पहले पैरालिसिस का अटैक आया था। वे एक जगह बैठे रहते थे। खाना हर दिन खाते थे।" पमा ने कहा।
"फिर, अचानक यह कैसे हुआ?" बालू ने पूछा।
मुझे भी समझ नहीं आया। उन्होंने रात में खाना भी खाया था। किंतु अचानक सुबह..." पमा रोते हुए कहने लगा।"दुःखी मत हो पमा। तू उन्हें समय पर अस्पताल लेकर जाता था। उनकी निरंतर सेवा की। जो हाथ में था, सब किया।" बालू ने धीर देते हुए कहा।"भले ही वे एक जगह पर थे। कुछ बोलते नहीं थे। हमें पहचान नहीं पाते थे। इतना सब होने के बावजूद भी वे मेरे आधार स्तंभ थे।" पमा ने खुद को सँभालते हुए कहा।
"हाँ। वह तो सच है।" बालू ने कहा।
" पिताजी के जाने का दुःख तो था ही। साथ ही गाँव के कुछ सवर्ण लोगों ने जाति के नाम..." इतना कहकर पमा शांत बैठा।"मतलब, मैं नहीं समझा।" सोच में पड़कर बालू ने पूछा।"पिताजी के अंतिम संस्कार को लेकर प्रश्न खड़ा किया। पिताजी का मृत्यु राजनीतिक मुद्दा बनाया। " उदास भाव से पमा ने कहा।
"गाँव में दो श्मशान भूमि हैं।" बालू ने कहा।
तुझे मालूम है बालू दलित समाज की श्मशान भूमि। वह सिर्फ नाम के लिए है। वहाँ जाने- आने के लिए रास्ता तक नहीं। वहाँ सभी ओर कीचड़ है। मनुष्य,जानवर की विष्ठा भी ! सुविधा कुछ भी नहीं। बारिश के दिनों में क्या हालत होती है? यह पूछो मत। तू ही बता वहाँ कैसे खड़े रहें?
"दलित समाज के श्मशान भूमि को सरकार की ओर से बहुत फंड आता है।"बालू ने कहा।
"आता है, किंतु कोई कुछ नहीं करता।" गुस्से में पमा ने कहा।" दलित समाज के नेता भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाते।" बालू ने पूछा।"दलित बस्ती में कई जगह पर नालियाँ भी नहीं हैं। इस वजह से रोगराई बढ़ती है।
इन पर कोई ध्यान नहीं देता। शिक्षित युवा आवाज उठाता है, पर उनकी कोई नहीं सुनता। बस मिली-भगत है सब की।" पमा ने गंभीर स्वर में कहा।
जाने दो पमा। बदलाव एक दिन जरूर होगा। पिताजी के शव को गाँव के श्मशान भूमि में लेकर जाना चाहिए था।"बालू,पिताजी का गाँव के श्मशान भूमि में करने से पिताजी के आत्मा को शांति या मुक्ति नहीं मिलने वाली। पर मेरे सामने कोई पर्याय नहीं है, इसलिए मैं वहाँ अंतिम संस्कार कर रहा हूँ। मैंने पहले भी सरपंच को दलित समाज की श्मशान भूमि की परिस्थिति को लेकर चर्चा की थी, किंतु उन्होंने कोई भी कार्य नहीं किया। अब जो भी परिस्थिति निर्माण होगी उसे जिम्मेदार वही होंगे।"
"पमा,कैसी परिस्थिति? कुछ नहीं होगा। समय बदल गया है । सभी मनुष्य तो है। सभी को समान अधिकार हैं।"“बालू,समय बदला है, किंतु जातिभेद, अस्पृश्यता का स्वरूप वहीं है। यह वर्तमान का वास्तविक चित्र हैं । संविधान में जातिभेद, अस्पृश्यता के संदर्भ में अनेक प्रावधान है, लेकिन उसका अमल नहीं होता। कहने के लिए वर्तमान में लोकतंत्र है, अस्तित्व में तो तानाशाही है।"
"पमा,युवा पीढ़ी परिवर्तन करेंगी।"
मुझे नहीं लगता जल्द परिवर्तन होगा, हम निरंतर प्रयास करते रहेंगे।बालू,जब मैंने मेरे पिताजी के अंतिम संस्कार को लेकर सरपंच से चर्चा फोन की, तो उन्होंने खुद का स्वार्थ देखा।
"कैसा स्वार्थ? पमा। "मैंने सरपंच से फोन पर कहा कि मैं मेरे पिताजी का शव गाँव के श्मशान भूमि में लेकर जा रहा हूँ तो उन्होंने कहा कि अभी चुनाव का समय है, इस घटना का परिणाम मुझ पर होगा। यह स्वार्थ ही हुआ ना।
"पमा,चुनाव पर परिणाम कैसे?"
सरपंच का कहना था कि इस बार सरपंच पद का जनता से चयन होने वाला है। दोनों पार्टी ने दलित समाज के कुछ स्री, पुरूष को सदस्य के रूप में टिकट दिया हैं। मैंने हिंदू धर्म के श्मशान भूमि में अंत्यसंस्कार करने की अनुमति दी, तो मेरी हार निश्चित है। गाँव के कई लोग मुझ पर दबाव डाल रहे हैं।
"फिर,पमा तूने क्या निर्णय लिया?"
बालू, गाँव के पढ़े-लिखे कई लोग कह रहे है कि मैं गाँव के संस्कार रीति-रिवाज मोड़ रहा हूँ, यानी उन्हें हमारे जाति से आज भी परिशानी हैं। हमें जीवन भर निम्न समझा। मेरे पिताजी के शव को मैं अग्निदाह भी सुकून से नहीं दे पा रहा हूँ। जीवन भर भी और मरने के पश्चात भी धार्मिक परंपरा से संघर्ष करना पड़ रहा है। तब भी वे मुझे दोषी ठहरा रहे हैं। उन्हें जो कहना है कहने दो। मुझे मालूम है, मैं कोई गलत कार्य नहीं कर रहा ।मैं पिताजी का शव गाँव के श्मशान भूमि में लेकर गया।
"पमा,गाँव का वातावरण दूषित हुआ।"
बालू, कुछ नहीं हुआ।चुनाव पर भी कोई परिणाम नहीं हुआ। वे अच्छे वोट से चुनकर आए। किंतु कुछ लोगों के नीच विचार समझ आए। इतना ही नहीं तो मुझे ग्रामपंचायत कार्यालय के कामकाज से निकाल दिया। क्यों निकाला? यह कारण अभी तक नहीं बताया।पमा, परंपरा के विरोध में जाने से सजा तो मिलेगी। डरना नहीं है,आगे बढ़ना है। यह क्रांति की शुरुआत है। ऐसे ही बदलाव वर्तमान की माँग है। यह कार्य युवा पीढ़ी ही कर सकती हैं। तभी सही में समाज में समानता स्थापित होगी। महापुरुष के सपनों का समाज निर्माण होगा।
***
|
|
|
|
|
बाल विभाग (किड्स कार्नर )
अपनी कविताएँ / ग़जल
“कविता - परीक्षा”
|
|
|
|
|
|
|
द्वारा : डॉ. उमेश प्रताप वत्स
|
डॉ. उमेश प्रताप वत्स यमुनानगर, हरियाणा के निवासी हैं। लेखक के साथ-साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं। 2004 में अखिल भारतीय कुश्ती प्रतियोगिता में 63 किलो भार वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्णपदक प्राप्त कर चुके हैं। इनको बाँसुरी वादन का भी शौक है।
|
|
|
|
|
परीक्षा
सुबह परीक्षा तो परीक्षा ठहरी, चाहे कोई हो कितना भी विद्वान
परीक्षा में डर सबको लगता, सामान्य हो या ज्ञान की खान
कितने लोगों को परीक्षा में, भय से बुखार चढ़ जाता है
नाम परीक्षा का सुनते ही, उत्साह मंद पड़ जाता है
परीक्षा लेना जितना सरल है, देना उतना ही मुश्किल
प्रिंसिपल हो या मेजर-कर्नल, धक-धक करता सबका दिल
परीक्षा तो हरिश्चन्द्र ने दी थी, पूरा राजपाट गंवाया था
पुत्र-पत्नी से बिछड़ हरिश्चंद्र, जल्लाद के घर आया था
रामचन्द्र की परीक्षा स्मरण हमें, चौदह वर्ष वनवास गये
भरत भाई भी अयोध्यापुरी में, कुटिया में रहकर राजा भये
एक रात में ला संजीवनी, हनुमान जी पास हुए
चक्रव्यूह में अभिमन्यु का, देख शौर्य ह्रास हुए
घास की रोटी खा प्रताप ने, धैर्य परीक्षा की थी पास
ला स्वराज्य वीर शिवा ने, की माँ जीजाऊ की पूरी आस
महापुरुषों को भूला बैठे हम, हर परीक्षा में घबरा जाते
कुछ भी समस्या हो जीवन में, तुरंत हम भरमा जाते
आत्मविश्वास से धीरज धरकर, हम परीक्षा में जायेंगे
फिर कैसी भी परीक्षा हो चाहे, हम सफल हो जायेंगे
***
|
|
|
|
|
पाठकों की अपनी हिंदी में लिखी कहानियाँ, लेख, कवितायें इत्यादि का
ई -संवाद पत्रिका में प्रकाशन के लिये स्वागत है।
|
|
|
|
|
"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
1.रचनाओं में एक पक्षीय, कट्टरतावादी, अवैज्ञानिक, सांप्रदायिक, रंग- नस्लभेदी, अतार्किक
अन्धविश्वासी, अफवाही और प्रचारात्मक सामग्री से परहेज करें। सर्वसमावेशी और वैश्विक
मानवीय दृष्टि अपनाएँ।
2.रचना एरियल यूनीकोड MS या मंगल फॉण्टमें भेजें।
3.अपने बायोडाटा को word और pdf document में भेजें। अपने बायो डेटा में डाक का पता, ईमेल, फोन नंबर ज़रूर भेजें। हाँ, ये सूचनायें हमारी जानकारी के लिए ये आवश्यक हैं। ये समाचार पत्रिका में नहीं छापी जायेगी।
4.अपनी पासपोर्ट साइज़ तस्वीर अलग स्पष्ट पृष्ठभूमि में भेजें।
5.हम केवल उन रचनाओं को प्रकाशित करने की प्रक्रिया करते हैं जो केवल अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति को भेजी जाती हैं। रचना के साथ अप्रकाशित और मौलिक होने का प्रमाणपत्र भी संलग्न करें।
E-mail to: shailj53@hotmail.com
contact
330-421-7528
***
|
|
|
|
|
“संवाद” की कार्यकारिणी समिति
|
|
|
|
|
प्रबंद्ध संपादक – संपादक मंडल sushilam33@hotmail.com
सहसंपादक – अलका खंडेलवाल, OH, alkakhandelwal62@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH, shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार – मनीष जैन, OH, maniff@gmail.com
|
|
|
रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति - नीति से कोई संबंध नहीं है।
|
|
|
|
|
 |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
This email was sent to {{ contact.EMAIL }}You received this email because you are registered with International Hindi Association
mail@hindi.org | www.hindi.org
Management Team
|
|
|
|
|
|
|
|
|
© 2020 International Hindi Association
|
|
|
|
|