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अप्रैल INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
अप्रैल 2022 अंक ११ | प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
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Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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प्रिय मित्रों,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की ओर से आप सभी को चैत्र नवरात्रि और राम नवमी की हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ। श्री राम जी की कृपा से हम आप सभी के परिवार के कल्याण की कामना करती हूँ ।
कोविड के प्रकोप के कारण हमारा वार्षिक कवि सम्मेलन, जो 2020 एवं 2021 से अर्थात् पिछले दो वर्षों से नहीं हो पाया था, इस वर्ष होने जा रहा हैं। यह बताते हुए हमें बहुत ही प्रसन्नता हो रही है कि भारत से तीन कवि आ रहे हैं। हास्य कवि दीपक गुप्ता जी, गीतकार अंकिता सिंह जी और व्यंगकार तेज प्रकाश शर्मा जी हैं।
आगामी काव्य गोष्ठियाँ 3 जून से 10 जुलाई २०२२ तक अमेरिका के विभिन्न शहरों में होगी। जब भी आपके शहर में यह कवि सम्मेलन आयोजित किये जाएँ तो कृपया इसका भरपूर आनंद लीजिएगा।
आप सभी को विदित है, कि जागृति का कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति हर माह हिंदी के विद्वानों के सहयोग से कर रही है, कृपया आप सभी उसमें अपने बन्धु बान्धवों सहित सम्मिलित होकर कार्यक्रम को सफलबनाएँ और हिंदी भाषा के इतिहास से सम्बन्धित अपने ज्ञान का वर्धन करें।
आप सभी से विनम्र निवेदन है, कि हमारी संस्था की पूर्ण जानकारी के लिए hindi.org और कृपया इस ईमेल anitagsinghal@gmail.com के माध्यम से हमसे सम्पर्क करें और इस फ़ोन नम्बर 817-319-2678 पर वार्ता कर सकते हैं ।
सादर सहित
अनिता सिंघल
अंतर-राष्ट्रीय हिंदी - समिति -अध्यक्षा (२०२२-२०२३)
(anitagsinghal@gmail.com)
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- जागृति वेबिनार:
"भक्ति काव्य का उद्भव और स्वरूप ", 14 मई 2022 |
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जैसा आप को ज्ञात है, जागृति, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की हिंदी-साहित्य-केंद्रित व्याख्यानों की एक श्रृंखला है जिसकी अगली कड़ी, 14 मई 2022, शनिवार को भारतीय समय से 8 :30 बजे शाम को निश्चित की गयी है| इस वेबिनार का सीधा प्रसारण फेसबुक पर किया जाएगा।
जागृति शृंखला की अगली कड़ी के वक्ता हैं: प्रख्यात आलोचक और चिंतक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, वरिष्ठ प्रोफेसर हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई, एवं अंतरराष्ट्रीय महासचिव हिंदी साहित्य भारती। इस व्याख्यान और चर्चा का विषय है: "भक्ति काव्य का उद्भव और स्वरूप"।
आइये उनसे सुनें: भक्तिकाल के साहित्य की पूर्वपीठिका क्या थी, क्या थे राजनीतिक, सामाजिक या अन्य कारण? उस काल में जो अलग अलग पंथ जो उद्भूत हुए, जैसे राम-भक्ति, कृष्ण-भक्ति , सूफी, आदि; उस अलगाव के कारण क्या थे ? क्या इन विभिन्न मतों में इस अलगाव के बावजूद कोई एक समापवर्तक (common denominator) था ? क्या था वह समापवर्तक ? आइये इन प्रश्नों के उत्तर जानें और चर्चा करें उस समय के हिंदी साहित्य के बारे में। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति शनिवार, 14 मई 2022 को इस वेबिनार में आपको सादर आमंत्रित करती है।
सम्मिलित होने के लिए लिंक है: http://www.facebook.com/ihaamerica
शनिवार, 14 मई 2022; 8 :30 बजे शाम भारतीय समय (IST)
USA/Canada: 11:00 AM EST, 10:00 AM CST, 9:00 AM MST, 8:00 AM PST, UK: 4:00 PM
आशा है कि आप शनिवार, 14 मई 2022 के वेबिनार में शामिल हो सकेंगे।
यदि आपके कोई प्रश्न या सुझाव हैं तो कृपया जागृति टीम से 317-249-0419 या Jagriti@hindi.org पर संपर्क करें
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति और जागृति: अमेरिका स्थित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (www.hindi.org), हिन्दी भाषा और साहित्य के संरक्षण और प्रचार/प्रसार के लिए प्रतिवद्ध, 1980 में स्थापित, एक वैश्विक हिन्दी संस्थान है |पिछले 41 वर्षों में समिति के प्रयत्न हिंदी शिक्षण, अपनी त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "विश्वा", और कवि -सम्मेलनों पर केंद्रित रहे हैं | स्वतंत्रता के इस अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति ने अपने नए प्रयत्न 'जागृति" की शुरुआत की है |"जागृति" हिन्दी साहित्य केंद्रित है; और इसका उद्देश्य हैं हिन्दी के विश्व प्रसिद्ध विद्वानों की वक्तृता और विचार विनिमय द्वारा हिन्दी के विशाल साहित्य भंडार को समझना और नए लेखकों को हिन्दी में साहित्य सृजन के लिए अनुप्रेरित करना | यदि आप जागृति के इसके पहले के वेबिनार में शामिल नहीं हो पाए, तो आप नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से इसका आनंद ले सकते हैं।
https://www.hindi.org/Jagriti.html
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- अमेरिका के महानगरों में :
"हास्य के रंग गीत - ग़ज़ल के संग ", ३ जून से १० जुलाई, 2022 |
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जागृति रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- अप्रैल ०९, २०२२
जागृति व्याख्यान की तीसरी कड़ी में:
"आदिकाल से भक्तिकाल की यात्रा" पर एक रोचक व्याख्यान और चर्चा |
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प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश सिंह
"भक्तिकाल आदिकाल के धरातल पर स्थित है और उसकी पृष्ठ्भूमि अखिल भारतीय है "
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जागृति व्याख्यानमाला की तीसरी कड़ी 09 अप्रैल 2022 को जूम से आयोजित हुई । अमेरिका ,भारत और अन्य देशों के दर्शक /श्रोता फेसबुक के माध्यम से इस कार्यक्रम से बड़ी संख्या में जुड़े थे । व्याख्यान का शीर्षक था: "आदिकाल से भक्तिकाल की यात्रा", और इस यात्रा की अगुआई करने के लिए आमंत्रित थे विद्वान् आचार्य और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र के अध्य्क्ष प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह । "जागृति" टीम की सदस्या सुश्री पूजा श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का प्रारम्भ करते हुए डॉ. सिंह का और देश -विदेश में फैले श्रोताओं /दर्शकों का स्वागत किया । पूजा जी ने प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश सिंह के अध्ययन -अध्यापन के लम्बे इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि डॉ. सिंह को हिंदी साहित्य के स्नातकोत्तर स्तर पर अध्यापन, और पी.एच.डी. तथा एम फिल के विद्यार्थियों को निर्देशित करने का, ३२ वर्षों का लम्बा अनुभव है । उनकी रचनाओं में कई महान लेखकों की ग्रंथावलियाँ और मौलिक चिंतन तथा शोधपुस्तकें शामिल है। इनमें प्रमुख हैं" आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली; आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली; आधुनिक काव्यधारा-विचार और दृष्टि; प्रेमचंदोत्तर कथा साहित्य में साम्प्रदायिक समस्याएं; आदिकाल, भक्तिकाल, और रीतिकाल के प्रमुख कवि; हिंदी के ऐतिहासिक उपन्यासों में इतिहास और कल्पना, आदि ।
डॉ. सिंह ने अपने वक्तव्य का प्रारम्भ करते हुए कहा कि यह तो सर्व-ज्ञात है कि "साहित्य समाज का दर्पण है"; पर साहित्य यथास्थिति बताने के अतिरिक्त, आगे भी जाता है। वह केवल आइना ही नहीं दिखाता, वह आगे की स्थितियों की ओर संकेत भी देता है। प्रेमचंद के अनुसार 'साहित्य केवल महफ़िल ही नहीं सजाता, बल्कि वह राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने वाली सच्चाई भी है" ... उसके बताये हुए पथ पर आगे बढ़ कर समाज अपना गंतव्य प्राप्त कर सकता है । प्रोफ़ेसर सिंह के अनुसार भक्तिकाल के साहित्यिक भावनाओं और सरोकारों की नींव आदिकाल के समय में ही पड़ गयी थी। बल्कि, प्रस्थान-त्रयी: उपनिषद, ब्रह्म-सूत्र, और भगवद्गीता; भारत में भक्ति की अवधारना और उसके रूप को और गहरे अतीत में ले जाते हैं । हर्षवर्धन के शासन के बाद भारत में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं थी, अत: समाज का प्रशासन स्थानीय राजा, नबाब आदि के हाथों में था। इस विश्रृंखल स्थिति के चलते समाज में कई धार्मिक सिद्धांतों का प्रचलन हुआ जैसे नाथ, सिद्ध,आदि। समाज में धर्म और भक्ति सम्बन्धी कई प्रश्न आदिकाल में ही उठते थे, जैसे: क्या भक्ति की अभिव्यक्ति केवल एक विशिष्ट वर्ग ही कर सकता है, क्या भक्ति का अधिकार इन मतावलम्बियों को ही है, आदि ? भक्तिकाल, आदिकाल के उन प्रश्नों का उत्तर था।
डॉ. सिंह ने बताया कि जिसे हम भक्तिकाल कहते हैं, वह भक्तिकाल नहीं, वह आदिकाल के सामाजिक/धार्मिक प्रश्नों के उत्तर में एक भक्ति-आंदोलन था। भक्ति का मार्ग क्या हो? यह प्रश्न समाज में अक्सर उठा करता था क्योंकि, विभिन्न सम्प्रदाय के लोग, जैसे जैन, बौद्ध, सिद्ध आदि अलग अलग तरीके अपने धार्मिक सिद्धांतों को प्रतिपादित करते थे, अपने मतो में रचनाएँ करते थे, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी भी धारा निकल रही थी जो इन सबों से अलग, देश-दशा को लेकर चिंतित थी । हिंदी -साहित्य का भक्तिकाल उस धारा का प्रतिफलन है, वह आदिकाल के धरातल पर अवस्थित है और उसकी पृष्ठभूमि अखिल-भारतीय है । इस अखिल भारतीयता के मूल को ढूंढें तो प्राय: यह दोहा उद्धृत किया जाता है :
"भक्ति द्राविड़ ऊ-प~जी, लाये रामानंद, परगट किया कबीर ने, सप्तदीप नव-खंड".।
भक्तिकाल की जो नींव दक्षिण भारत (द्राविड़ ) में पहली दूसरी शताब्दी में पड़ी थी, वही उत्तर भारत में बारहवीं शताब्दी में प्रकट हुई । यह दोहा इस बात का परिचायक है कि भक्तिकाल तक की यात्रा आदिकाल से शुरू हुई, अखिल भारतीय धरातल पर चलती हुई वह द्राविड़ से उत्तर तक फैली ।
भक्तिकाल की तीन मुख्य धाराओं; सगुण, निर्गुण,और सूफी, को रेखांकित करते हुए उन्होने बताया कि भक्ति को परिभाषित करने के, ब्रह्म को परिभाषित करने के, इन तीनों धाराओं के अपने अपने तरीके हैं। निर्गुण-मार्गी नेति-नेति तो कहते हैं, पर वे भी मानते हैं कि कोई तो नियंता है जिससे यह सृष्टि चलती है । सगुण-भक्ति में स्वरुप वर्ण है उस नियंता का । निर्गुण-सगुण की कतार अलग थी पर ब्रह्म की अवधारणा एक ही थी। तुलसीदास ने तो सगुण-निर्गुण को एक ही कह दिया : 'अगुनै- सगुनै नहीं कछु भेद..। सूफियों के लिए प्रेम ईश्वर प्राप्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण है: इसीलिए वे कहते हैं: "हुस्ने -बुता में खुदा का नूर देखते हैं"। भक्तिकाल का साहित्य, इन अलग-अलग धाराओं -अवधारणाओं, उनके संधि-स्थल, उनकी आपसी दूरियों, की अभिव्यक्ति है ।
प्रोफ़ेसर सिंह ने इस साहित्यक यात्रा के अन्य मुख्य पड़ाव; शास्त्र या लोक-अनुभव, पर बात करते हुए भक्तिकाल साहित्य के कुछ उदाहरणों द्वारा यह स्थापित करने की चेष्टा की कि ज्ञान, शास्त्र और लोक-अनुभव दोनों से आता है । कबीर का ज्ञान उनके लोक-अनुभव पर आधारित है : "तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखें की देखी"। यह 'आँखन की देखि', यह प्रत्यक्षता, महत्वपूर्ण है । अन्य कवियों ने भी लोक, ग्राम, धरती, नदी आदि की प्रत्यक्षता को भक्ति और ज्ञान से जोड़ा है । रसखान कहते है कि उन्हें और कुछ नहीं चाहिए; बस चाहिए वही ब्रज के गाँव, वही यमुनातीरे कदम्ब की डालियाँ। उसी तरह देखिये तुलसीदास को: "सरयू नाम सुमंगल मूला" । केवल शास्त्रों में निहित भक्ति जो धरातल से न जुडी हो, लोक अनुभव की आंच में न पकी हो, अधूरी भक्ति है । तुलसीदास के 'सुमंगल' वाले प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए, थोड़ा विषयांतर करते हुए, उन्होंने बताया कि केवल हिंदी-साहित्य का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का उद्देश्य लोक-मंगल रहा है । कालिदास की प्रसिद्ध कृति "मेघदूत" का रोचक हवाला देते हुए उन्हीने कहा कि 'मेघदूत' के मूल में हालाँकि यक्ष के विरह की कहानी है, पर वहाँ भी यक्ष मेघ को कहता है: मेघ जल्दी मत करना, आम्रकूट के पर्वतों में गर्मी से लगी आग को बुझा कर ही आगे बढ़ना । लोक-कल्याण की यह कामना और अभिव्यक्ति भारतीय साहित्य की विशेषता है ।
प्रोफ़ेसर साहब ने उपर्युक्त विषयों के अलावा, हिंदी साहित्य के आदिकाल से भक्तिकाल तक की इस यात्रा, से सम्बंधित कई अन्य विषयों पर भी चर्चा की । एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि भक्तिकाल का साहित्य मुख्यत: काव्य का साहित्य है,गद्य का नहीं । अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने उस काल के अनेक प्रमुख कवियों और उनकी काव्यकृतियों को रेखांकित किया; उदाहरणतः सूरदास, रहीम, नानक, और विद्यापति । कार्यक्रम के अंत में "जागृति" प्रोग्रम के प्रमुख डॉ. राकेश कुमार ने प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश सिंह जी को उनके विद्व्त्तापूर्ण वक्तव्य के लिए धन्यवाद दिया और भविष्य में भी समिति से उनकी सहभागिता का अनुरोध किया। डॉ. कुमार ने विश्व भर में इस कार्यक्रम से जुड़े श्रोताओं को भी धन्यवाद दिया और आनेवालों पर्वों नवरात्र और रमदान के लिए उनके मंगल की कामना की ।
सम्पूर्ण व्याख्यान के लिए नीचे वाले लिंक पर जायँ:
https://youtu.be/8QCnfkZm_io या https://hindi.org/Jagriti.html
प्रस्तुति: सुरेन्द्रनाथ तिवारी (जागृति टीम)
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शाखाओं के कार्यक्रम एवं अन्य रिपोर्ट
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- नैशविल शाखा
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श्रीमती पूजा श्रीवास्तव
आगामी अध्यक्षा २०२४ -२०२५ नैशविल शाखा
एक सफल रेडियो कलाकार |
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श्रीमती पूजा श्रीवास्तव, की जड़ें कानपुर, उत्तर भारत में हैं लेकिन नैशविले पिछले 15 सालों से उनका घर है। भारतीय साहित्य और संगीत पूजा के दिल में बसा हुआ है। पूजा एक उत्साही पाठक हैं और किताबों के साथ पली-बढ़ी हैं। कानपुर विश्वविद्यालय से गणित में परास्नातक पूजा एक कुशल वक्ता, स्टोरीटेलर और संयोजक हैं। पूजा एक डेटा साइंटिस्ट हैं और कई वर्षो से डेटा एनालिस्ट के तौर पर कार्यरत हैं।
आज वे अमेरिका में एक कहानीकार होने के साथ-साथ एक सफल रेडियो कलाकार भी हैं। वे प्रत्येक रविवार ‘देसी ज़ायका’ नामक एक बॉलीवुड रेट्रो कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, जिसमें लोकप्रिय गीतों के अतिरिक्त बॉलीवुड की बहुत सारी बातें भी पूजा अपने सुनने वालों से करती हैं। इस कार्यक्रम का सजीव प्रसारण आप “RadiofreeNashville.org”
(https://www.radiofreenashville.org/)
पूजा एक प्रशिक्षित भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं और अक्सर मंच पर अपनी कुशल प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लेती हैं।
अमेरिका में हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न संगठनों के साथ पूजा सक्रियता के साथ काम करती हैं। पूजा "गाथा" की सह संस्थापक हैं, जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक ऑडियोबुक app हैं। उनके उद्यम "गाथा" के लिए वर्ष 2020 में पूजा को टाई वुमन इंटरनेशनल बिजनेस प्लान प्रतियोगिता में रनर अप एंटरप्रेन्योर से नवाजा गया है। पूजा के कुशल नेतृत्व, दूरदर्शिता और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने बहुत ही कम समय में "गाथा" को विश्व के चुनिंदा ऑडियोबुक app में स्थापित कर दिया है।
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| पादुका |
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ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही,
सुदूर नदिया पार की सुंदर दुनिया की आस लगाती रही,
कलकल झरने की मृगमरीचिका के पीछे भागती रही,
मैं ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही।
धूल, मिट्टी, कीचड़ ओढ़ तिरस्कृत होती रही,
जीन क्षीण होने पर कौड़ियों के भाव बिकती रही,
मैं ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही।
भिन्न भिन्न रूप आकारों में बाजार में सजती रही,
पथ पर बिखरे काँटों, कंकड़ों की चुभन सहती रही,
मैं ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही।
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| द्वारा -डॉ. सुनीता द्विवेदी |
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डॉ. सुनीता द्विवेदी, ‘श्याम’ ने संजय गाँधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ से प्रतिरक्षा विज्ञान (Immunology) में पीएचडी की उपाधि ग्रहण की है। इनको Big Data में बहुत रूचि है। इसलिए इन्होंने Health Informatics में MS भी किया है। ये अपने परिवार सहित पिछले कई वर्षों से सोलन, ओहायो में हैं। इन दिनों कोरोना की महामारी के कारण घर में रह कर अपने बचपन की लिखने की रूचि को संवार रही हैं।
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अंधी दौड़ की धक्कामुक्की में रूंधती रही,
कर्मठ संकल्प से पथिकों को मंज़िल पहुंचाती रही,
मैं ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही।
देवस्थान पर अपने मनमोहक रूप के पूजन से विस्मित होती रही,
दोगले समाज पर मन ही मन हंसती रही,
मैं ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही।
अपनी कहानी कहने का अवसर ढूंढती रही,
अंततः बेज़ुबान ही बनी रही,
मैं ड्योढ़ी के एक कोने में पड़ी रही।
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| "जब मैंने देखा ‘धुआँधार’" |
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जब मैंने देखा "धुआँधार" |
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जब मैंने देखा ‘धुआँधार’
कोई फकीर, बन राहगीर,
नर्मदा तीर, हिम सा शरीर,
वह परम वीर, भू चला चीर,
गर्जन अधीर, कहता समीर ।।
फेनिल तरंग, ऐसी धुअंग,
जैसे अनंग रति संग- संग,
चढ़कर तुरंग, भरकर निषंग,
मारे कुरंग, कहते विहंग ।।
कर लो इस तट पर भी विहार ।
जब मैंने देखा धुआँधार ।।
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| द्वारा - श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया |
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श्री गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण" का जन्म इटावा जिले के एक ग्राम में एक साधारण परिवार में हुआ। आपने हिन्दी, अँग्रेजी व संस्कृत तीनों में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। इन्दौर में 37वर्षों तक शिक्षक रह कर 2019 में सेवा निवृत्त हुए हैं। आपकी रचनाओं में भाषा का सरस प्रवाह एवं काव्य के तत्त्वों के साथ काव्य सौन्दर्य के दर्शन होते हैं। हिन्दी के उत्थान में आपकी सेवा निरन्तर चल रही है। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में नर्मदा नदी के भेड़ा घाट पर प्रसिद्ध धुआँधार जल प्रपात है। कवि की दृष्टि में यह कैसा है पढ़िए।
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यह उच्छवास, या अधःश्वास,
उल्लासभास, या अट्टहास ,
मन का विलास, या प्रकृतिरास,
धौला लिबास, या बस कपास।।
दुविधायें देता, बार-बार ।
जब मैंने देखा धुआँधार।।
जल का निपात, कह लो प्रपात,
बिछती बिछात, दिन और रात,
मिटती अघात, हो रही बात ,
यह है अजात, कहता प्रभात।।
उस जल गति में, है गति अपार।
जब मैंने देखा धुआँधार।।
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द्वारा- डॉ. रंजना जायसवाल
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डॉ. रंजना जायसवाल मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश की रहने वाली है। लेख,लघु कथा,कहानी,बाल कहानी,कविता,संस्मरण और व्यंग्य आदि विधाओं में लिखती हैं।
इन्होने कई पुरस्कार प्राप्त किये हैं।
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यूटरस ( uterus )
भावना जब से अस्पताल से लौट कर आई थी मन बहुत उखड़ा-उखड़ा सा था। इन दिनों तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती थी।
"मैं अपने लिए चाय बनाने जा रही हूँ, आप पियेंगे।"
"इस वक्त चाय…!"
पंकज ने कलाई में बंधी घड़ी पर नजर डालते हुए कहा,
"सर में दर्द हो रहा है, आप पियेंगे या फिर…"
अपनी बात को अधूरा छोड़ भावना रसोईघर की ओर बढ़ गई।
"थोड़ी सी मैं भी ले लूँगा।"
पंकज ने अपनी आवाज के सुर को बढ़ाते हुए कहा,पंकज अपना फोन लेकर बैठ गए और नवीन को फोन घुमा दिया।
" कैसे हो नवीन…"
"नमस्ते पापा!कैसे हैं आप…मैं ठीक हूँ।आज तो आप मम्मी को लेकर अस्पताल जाने वाले थे,क्या हुआ क्या बताया डॉक्टर ने…"
" ऑपरेशन बताया है…डॉक्टर ने कहा है जल्दी ही करा दीजिए टालने का कोई मतलब नहीं है। अपनी मम्मी को समझाओं,जब से आई हैं मुँह लटकाए टहल रही हैं। आज के जमाने में यह आम बात है। हर दूसरी औरत का यूट्रस का ऑपरेशन होता है।डॉक्टर ने कहा है एक हफ्ते की बात है, एक हफ्ते में अस्पताल से छोड़ देंगे। डेढ़-दो महीने परहेज करना पड़ेगा फिर जैसा चाहो वैसे जियो… बस भारी सामान उठाने को मना किया। थोड़ी बहुत सावधानी बरतनी होगी।"
"ठीक कह रहे हैं आप...इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। घबराना कैसा? मम्मी का बेस्ट अस्पताल में इलाज कराइए, पैसे की चिंता मत कीजिए। मैं तो कहूँगा उन्हें दिल्ली ले जाइए, एक से एक बढ़िया और लग्जरी अस्पताल हैं।ऐसे-ऐसे अस्पताल हैं कि पूछिये ही मत... किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं होते है ये अस्पताल। हर तरह की सुख-सुविधा... डॉक्टर एक पैर पर खड़े रहते हैं। आप को और मम्मी को कोई तकलीफ नहीं होगी। मैं कल ही अकाउंट में पैसे डाल देता हूँ। हमारा आना तो संभव नहीं है,आप से हाल-चाल तो मिलता ही रहेगा।"
इधर-उधर की बातें करके पंकज ने फोन रख दिया।पंकज की बड़ी खराब आदत थी वह हमेशा फोन स्पीकर पर रख कर बात करते थे।नवीन की आवाज रसोई घर तक आ रही थी। कितनी बार भावना का पंकज से इस बात को लेकर झंझट भी हो जाता था।नवीन के अंतिम वाक्य को सुन चाय छानती भावना के हाथ काँप गये और गर्म चाय की कुछ बूंदें उसके हाथों पर छलक गई,मुँह से एक टीस उभर आई,उसकी आँखों में धुंधलका छा गया।ये धुंधलका उसके आँसुओं की वजह से ही था,उसकी आँखें कब नम हो गई आँखों के कोर कब भीग गये उसे पता भी नहीं चला।मन न जाने क्यों खट्टा हो गया था जिस बेटे के लिए न जाने कितनी रातें जागरण कर- कर के बिताई थी।जो जरा सी चोट लगने पर रो-रोकर घर सर पर उठा लेता था।आज उसे अपनी माँ का ऑपरेशन एक छोटी सी बात लगती थी। भावना न जाने क्यों झुंझला गई।
"एक तो आप कम सुनते हैं और दूसरे को भी बहरा बनाने पर तुले हुए हैं।'
पंकज ने मासूमियत से कहा,
"कुछ भी कह लो अब तो इसी बुड्ढे के साथ ही जीवन बिताना है,मुझे छोड़कर जाओगी भी कहाँ?"
सच ही तो कह रहे थे पंकज...मायके की दहलीज तो वैसे भी पराई मानी जाती है।माँ-पिताजी के आँख मुंदते ही वह उस घर के लिए बिल्कुल ही पराई हो गई थी।सम्बंध शादी-विवाह और तीज-त्योहार पर बधाई देने तक ही रह गये थे।पंकज जब से डॉक्टर के यहाँ से आये थे तब से उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे पर वो…
"तुम भी न फालतू में डर रही हो,अरे वो जमाना गया कि ये मत खाओ वो मत खाओ… मेडिकल साइंस में बहुत उन्नति हो गई है।अब ये सब तो छोटे-मोटे ऑपरेशन माने जाते हैं।"
"पर वो…"
"पिछले साल मैंने भी तो मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था,बताओ क्या दिक्कत हुई थी।पति सेवा करने के लिए तैयार है और तुम…"
पंकज ऐसे माहौल में भी चुटकी लेने से बाज नहीं आये।
भावना सोच रही थी। क्या यूट्रस का ऑपरेशन कराना उसके लिए इतना आसान था।कहते हैं एक बच्चे को जन्म देने में सिर्फ बच्चे का नहीं एक औरत का भी पुनर्जन्म होता है।डॉक्टर्स भी ये मानते हैं कि एक बच्चे को जन्म देते समय महिला को बीस हड्डियों के एक साथ टूटने जितना दर्द होता है।पुरुष में तो ये दर्द सहने की क्षमता भी नहीं होती है।वो तो ये दर्द बर्दाश्त भी नहीं कर सकते।इतना दर्द होने पर पुरुष की मौत भी हो सकती है। सात साल…सात साल तक उसने माँ बनने का इंतज़ार किया था।शहर का कोई डॉक्टर,कोई वैध जहाँ उसने इलाज न कराया हो, यहाँ तक की कोई मंदिर, मस्जिद, दरगाह नहीं बची थी जहाँ उसने माथा न रगड़ा हो, झोली न फैलाई हो।
लोगों ने उसे शुभ कामों में बुलाना तक छोड़ दिया था।वही ननद जो नवीन के पैदा होने पर फूली नहीं समा रही थी,उन्होंने ही अपनी बेटी के शादी में पैर तक नहीं पूजने दिया था।उन्हें डर था कि उसके जीवन की काली छाया उनकी बेटी के सुनहरे भविष्य पर न पड़ जाये पर किसे पता था भावना को मनहूस और बाँझ समझने वाली ननद के जीवन में ऐसी कालिख पुतेगी।दो बार गर्भवती होने के बावजूद उनकी बेटी शुभी को सन्तान का सुख प्राप्त न हो सका,गर्भ ठहरता ही नहीं था।शुभी को यूट्रेस का कैंसर हो गया था।
"जिंदगी बचानी है तो यूट्रेस तुरन्त निकलवा दीजिये।"
कितना रोई थी वो…उम्मीद का वो सहारा भी उससे छीना जा रहा था। दीदी भी कितना छटपटाई थी।शुभी का मासूम चेहरा देख-देख उनके आँसू नहीं रुकते थे। दीदी अपनी संतान के लिए छटपटा रही थी और शुभी अपनी संतान के लिए…
आज भी उसे वो दिन याद है,भावना की छोटी बहन की शादी थी।भैया-भाभी उसे विदा कराने आये थे।दीदी के बच्चों की छुट्टियाँ चल रही थी,दीदी उन दिनों पीहर में ही थीं।भाभी ने दबे स्वर में दीदी से कहा था,
"जब ईश्वर को मंजूर नहीं है तो क्या किया जा सकता है। जीजा जी आप लोग बच्चा गोद क्यों नहीं ले लेते?आजकल तो ये आम बात है, बच्चे को माँ बाप मिल जायेंगे और दीदी-जीजा जी को सन्तान…"
दीदी ने वहीं खड़े-खड़े ही भाभी को इतना सुनाया कि भाभी ने फिर कभी उसके घर में कदम भी नहीं रखा।
" भाभी!ये किताबी बातें किताबों में ही रहने दीजिए। दूसरों के घर में होता होगा पर हमारे घर में नहीं…न जाने किस का खून हो।किस जाति और धर्म का हो। ऐसे कैसे किसी को उठा लाये, कोई मज़ाक है क्या…"
आज वही दीदी शुभी को दुनियादारी समझा रही थी,
"किसकी संतान अपने साथ रही है। तुम भी तो मेरी संतान हो पर मेरे साथ कहाँ रहती हो। तुम्हारा भाई वहाँ विदेश में पड़ा है और तुम अपने ससुराल…बताओ क्या फायदा है सन्तान पैदा करने का। हर आदमी अपने जीवन में अकेला ही है। जहाँ तक बच्चों की बात है, अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हें भी माँ बनना चाहिए तो किसी अच्छे से अनाथ आश्रम से हम बच्चा गोद लेते हैं।तुम्हें सन्तान मिल जायेगी और एक अनाथ को माँ-बाप।"
न जाने दिल के किसी कोने में कुछ चटक सा गया था,शायद दिल ही …क्योंकि रिश्तों के धागे तो कब के टूट चुके थे,जिसकी चटकन वो उस आज तक महसूस करती थी।पंकज का तो वो नहीं जानती पर भावना उन्हें कभी माफ नहीं कर पाई।क्योंकि इस धागे में न जाने कितनी गाँठें थी अपमान की,आँसुओं की,वितृष्णा की,घृणा की और न खत्म होने वाली फासले की।वो उसके लिए बस पंकज की बहन और नवीन की बुआ भर ही रह गई थी।शायद ठीक भी था,एक औरत का दर्द अगर औरत न समझ सके तो उसके औरत होने का क्या मतलब…पंकज दीदी से बहुत छोटे थे।कहने को तो वो उनकी बहन थी पर उन्होंने पंकज को माँ की तरह पाला था।ग्यारह साल बड़ी थी वो पंकज से… उम्र का एक लंबा फासला था उन दोनों में,दीदी माँ-बाबूजी की पहली संतान थी,नाजों से पाला था उन्हें…फिर भी एक बेटे की कमी खलती ही थी। माँ जी ने बताया था …कुल के दीपक के लिए उन पर दबाव पड़ने लगा। सिर्फ सन्तान होना ही काफी नहीं होता लड़का या लड़की का होना भी बहुत मायने रखता है।
"तुम लोग कोई अमर होकर थोड़ी आए हो कि जिंदगी भर यही बैठे रहोगे। कल तुम लोगों के बाद बिटिया का तो मायका ही खत्म हो जाएगा उसे भी तो मन करता होगा कि उसका भी कोई भाई होता जिसे वह राखी बांधती।"
उसकी ददिया सास ने यही तो उनसे कहा था।भावना अक्सर सोचती थी,अगर पहली संतान बेटा हो जाये तो क्या पुत्र हो जाने के बाद बेटी के जन्म के लिए भी लोग ऐसा ही सोचते होंगे। दीदी की खुद पहली संतान बेटा ही था फिर भी उन पर भी कितना दबाव था। एक बार उनके बेटे से भावना के सामने ही किसी ने पूछ लिया था,
"तुम अकेले बोर नहीं हो जाते। मम्मी से कहो तुम्हारे लिए बहन लाकर दे।वह तुम्हारे साथ खेलेगी,तुम्हारे हाथों पर राखी भी बाँधेगी।"
तब नन्हे मासूम पार्थ ने कितनी मासूमियत से कहा था,
"ताई जी की बेटी मेरे हाथों में राखी बाँधती है न…"
"अपनी तो अपनी होती है, दूसरों से क्या उम्मीद रखना…"
मासूम पार्थ सगी चचेरी का फर्क नहीं जानता था,दीदी भी तो नहीं चाहती थी कि वो उस फर्क को जाने या समझे।खून के रिश्ते सिर्फ खून के रिश्ते होते हैं।बहन सिर्फ बहन होती है, सगी या चचेरी नहीं पर सोचने और होने में बहुत फर्क होता है। जमीन-जायदाद के कारण दीदी का अपनी जिठानी के साथ सम्बन्ध खराब हो गए और सम्बन्धों की टूटन के साथ रिश्तो ने दम भी तोड़ दिया। दीदी की जिठानी ने अपनी बेटी से पार्थ को राखी बंधवाना बंद कर दिया। पार्थ उस दिन कितना रोया था, दीदी बताती थी जब भी राखी का त्यौहार आता वह उदास हो जाता। सुबह जल्दी उठ जाने वाला पार्थ उस दिन देर सुबह तक सोता रहता है, दीदी भी उसे जगाती नहीं थी। जानती थी उसका मासूम दिल किस कशमकश से गुजर रहा है, जानती थी उसकी इस कशमकश का इलाज उनके पास शायद किसी के पास नहीं है।कितना कसमसाई थी वो उस दिन…
"ये दुनिया ऐसी ही है।"
पंकज ने उसे सांत्वना देते हुए कहा था।धरती भी तो माँ है, वो भी अपने कोख में न कितने रंग समेटे रखती है। वो भी तो एक माँ थी। नवीन के आगमन की सुगबुगाहट ने उसके जीवन मे खुशियाँ भर दी।नवीन ने सिर्फ उसकी कोख नहीं भरी थी,वो उम्मीद थी, उसके खोये हुए सम्मान को वापस लाने में, वो उसकी रहगुजर थी।क्या इतना आसान था उस कोख को यूँ अपने शरीर से बाहर निकल देना।वह सिर्फ उसके एक माँ होने की पहचान नहीं था,एक औरत होने की भी पहचान थी।सच कहूँ तो बना दी गई थी,कम से कम उसकी वजह से वो बाँझ होने के आरोपों से मुक्त तो हो ही गई थी पर नवीन के विदेश जाने के बाद वो फिर से वही जीवन जी रही थी। सच कहा है किसी ने स्त्रियाँ पैदा नहीं होती स्त्रियाँ बना दी जाती हैं।
नवीन के पैदा होने से पहले अकेली वो तब थी और आज भी…नवीन के पैदा होने से पहले वो और पंकज पति-पत्नी थे पर उसके पैदा होने के बाद वह सिर्फ माता-पिता ही बनकर रह गए। नवीन जब छोटा था तो उसकी छोटी-छोटी चीजों का ध्यान रखना उसके भविष्य के लिए सपने गढ़ना फिर उन सपनों की परिणति के लिए प्रयास करना… उन सपनों की परिणति के पश्चात फिर से नए सपनों को बुनना यही तो उसका जीवन रह गया था।नवीन के सपनों के ताने-बाने में जिंदगी की चादर न जाने कब और कितनी बढ़ गई कि खुद की इच्छाओं और सपनों की चादर खुद में ही सिमट कर रह गई। स्कूल में हमेशा भूगोल में पूरे नम्बर मिलते थे पर जिंदगी का भूगोल उसे कभी समझ नहीं आया।आधे-पूरे से सपने टूटी-फूटी सी ख्वाहिशें के सहारे वो आज तक जीती आ रही थी।
आज भी मौसम बदलने के साथ नवीन की पैदाइश के समय लगाया गया वह इंजेक्शन उसे रह-रह कर टीस दे जाता है पर उस टीस के साथ चेहरे पर मातृत्व की झलक भी साथ ही उभर आती है। इस दर्द के लिए वह कितने वर्षों तक तड़पी थी। आज भी नवीन को याद कर उसके हाथ अपनी कोख पर चले जाते हैं। हर करवट हर सांस के साथ सिर्फ नवीन उसकी कोख में जी नहीं रहा था बल्कि वह भी नवीन के साथ जी रही थी। एक माँ अपनी संतान से सिर्फ गर्भनाल से जुड़ी नहीं होती बल्कि उसके अस्तित्व से भी जुड़ी होती है ।क्या इतना आसान था नवीन के उस पहले घर को अपने शरीर से अलग कर देना, नवीन न सही पर उससे जुड़ी हुई यादें आज भी उसे एक क्षण को तड़पाती थी तो दूसरे ही पल उसके चेहरे पर सहज मुस्कान ले आती थी। जब उसने पंकज को नवीन के आगमन की खबर दी थी तो पंकज की आँखें सहज ही सजल हो आई थी,उसका चेहरा गुलाब की तरह खिल गया था,
"आप पापा बनने वाले हैं।"
सिर्फ इस एक वाक्य से पंकज ने एक पल में पति से पिता तक के सफर को जी लिया था।जिंदगी साँप-सीढ़ी का खेल ही तो थी,जिसमे हर पासे के साथ जिंदगी अचानक से पलट जाती है।क्या सच में इतना आसान था उसके लिए यह ऑपरेशन…जानती थी हर चीज़ भावनाओं में बह कर नहीं सोची जाती। वर्षों तक किसी घर में रहने के पश्चात उस घर को छोड़ना क्या इतना आसान होता है अपनी जगह से हटने की वेदना को समझना आसान कहाँ होता है।एक इंसान अपने जीवन मे चाहे जितने भी घर बना ले पर पहला घर पहला ही होता है क्योंकि वो सिर्फ घर नहीं उसकी उम्मीदों, ख्वाहिशों और सपनों की जमीन होती है।उस जमीन को उससे छीन लेना क्या आसान हैं।
पंकज और नवीन उसका भला ही तो चाहते थे पर क्या सचमुच ये इतना आसान था।क्या यूट्रेस सिर्फ उसके लिए सिर्फ एक अंग भर ही था,क्या सचमुच !
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द्वारा- डॉ. मधुसूदन झवेरी
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डॉ. मधुसूदन झवेरी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में प्रसिद्ध है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुड़ें हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी) में प्रोफेसर हैं।
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(एक) प्रवेश:
==>बहुतों को, विशेषकर कुछ सुसंस्कृत सुशिक्षित महिलाओं को भी, अबला शब्द को लेकर प्रश्न सताता है; कि, हमें अबला क्यों कहा जाता है?
इसका उत्तर सही संदर्भ में, समझने के लिए, कम से कम *अबला* शब्द के साथ *महिला* शब्द को भी जानना होगा। सद्भाग्य से निरुक्त के आधारपर (Authentic) अधिकृत उत्तर का प्रयास किया जा सकता है। संस्कृत के शब्द धातुबीज से उत्पन्न होते हैं। इस लिए उनका मौलिक अर्थ होता है, जो, खो नहीं सकता। और साथ-साथ सारे शब्दों में और उस कारण भाषा में भी एक प्रकार का अनुशासन बना रहता है। इसी कारण शब्दार्थवाले शब्द कोश संस्कृत में पहले नहीं थे। निघण्टु या शब्दों का ही बिना अर्थ संग्रह हुआ करता था। विद्वान जानकार धातु, उपसर्ग और प्रत्ययों के आधार पर अर्थ लगा लेते थे। लेखक भी ऐसा ही प्रयास कर रहें हैं।
(दो) संस्कृत का गुणवाचक, अर्थवाचक शब्द:
==>पहले, जानिए, कि, संस्कृत के शब्द गुणवाचक, अर्थवाचक या अर्थवाही होते हैं।
इस लिए संस्कृत के अनेक शब्द मौलिक अर्थ साथ लेकर चलते हैं।
अन्य भाषाओं में शब्द अधिकतर उधार ही, लिए होते है। ऐसी भाषाएँ प्रमुखतः *बहता नीर* कही जा सकती हैं। ऐसे शब्दों का अनेक भाषाओं से होकर प्रवास करते हुए विशिष्ट भाषा में कब और कैसे आया; इसका इतिहास ढूँढना पड़ता है। इस शब्द प्रवास के इतिहास को Etymology एटिमॉलॉजी कहा जाता है। अंग्रेज़ी ने १२० तक भाषाओं से उधार लेकर समृद्धि पायी है। पर इस कारण अंग्रेज़ी भाषा खिचडी भी बनी हुयी है। आज तक तीन बार अंग्रेज़ी बदली है। इसी कारण उसकी वर्तनी और शब्द उच्चारण के कोई निर्दोष नियम भी नहीं होते।
पर, संस्कृत में शब्दों की व्युत्पत्ति होती है। इस बिन्दू पर भाषावैज्ञानिकों ने बिना विशेष सोचे ही, Etymology का अर्थ व्युत्पत्ति कर दिया है। एटिमॉलॉजी शब्द का इतिहास होता है। कैसे शब्द विविध भाषाओं में, प्रवास करता हुआ किसी भाषा में आया, इस का इतिहास एटिमॉलॉजी कहा जाता है।
व्युत्पत्ति में शब्द का मूल होता है, कोई धातु जिसे आप शब्द बीज कह सकते हैं। निरुक्त में व्युत्पत्ति के आधार पर अर्थ लगाने की विधि बताई गयी है। यह संस्कृत की विशेषता है।
(तीन) महिला शब्द की (व्युत्पत्ति)
==>अब महिला, शब्द की व्युत्पत्ति खोजते हैं।
महिला शब्द के साथ मह (महते और महयति-ते) धातु-मूल जुडा हुआ है। जिसका अर्थ जुड़ता है महानता, मह्त्ता या आदरणीया से। महिला और अबला का अर्थ समान नहीं है। महिला का संबंध महानता से हैं। जिन महिलाओं ने सिद्धियाँ पाई हैं; जो विदुषियाँ हैं; जिन्होंने जीवन में कुछ करके दिखाया है; उन्हें आप अबला नहीं कह सकते। संस्कृत भाषा अर्थवाची होने के कारण, किसी को भ्रम पालने की आवश्यकता नहीं है।
M. R. Kale की संस्कृत व्याकरण की पुस्तक के धातु कोश में ==> मह् (१ प. और १० उ.) To honour, to delight, अर्थात आदर करना,आनन्दित करना, बढावा देना <=== ऐसे अर्थ दिए गए हैं।
(चार) अबला शब्द की व्युत्पत्ति:
===> अबला उन के लिए उचित है, जो दुर्बल हैं, वृद्धाएँ, हैं, पीडित है, जिन्हें सहायता दी जानी चाहिए, क्योंकि वे अबलाए हैं, बलहीन हैं। इस शब्द का मूल बल है, जिसके आगे अ लगने पर नकारात्मक अर्थ निकलता है। जैसे अनीति, अधर्म, अन्याय, अहिंसा, अमर्त्य, और अमर ऐसे उदाहरणों के अनुसार इस शब्द से भी, नकारात्मक अर्थ व्यक्त होता है।
(पाँच) नारी शब्द की व्युत्पत्ति:
===>और नारी वह है, जो पुरुष को प्रेरणा देकर आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देती है। न यह १ और ९ गण का परस्मैपदी धातु हैं। परस्मैपद में पर है। परायों, दूसरों के लिए प्रयुक्त। यहाँ पुरूष को प्रेरणा देनेवाली स्त्री नारी कही जाएगी। नारी किसी स्वार्थी स्त्री के लिए प्रयुक्त नहीं होता। उसे आगे बढ़ने में सहायता देने वाली इस अर्थ में ही मैं लेता हूँ। *नारी तूं नारायणी* भी आप ने सुना होगा। और , यत्र नार्यस्तु पूज्यंते। रमन्ते तत्र देवताः॥ भी आप ने सुना होगा ही।
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| "माँ दुर्गा के पवित्र नवरात्रे से प्रारंभ होता है भारतीय नववर्ष" |
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द्वारा--डॉ उमेश प्रताप वत्स
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साहित्यकार डॉ उमेश प्रताप वत्स, हिन्दी प्राध्यापक हैं। शिक्षा विभाग हरियाणा में एनसीसी ऑफिसर (कैप्टन) हैं। इन्होंने हिन्दी में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। कविता, कहानी, लघुकथा, बाल कविता, आलेख आदि लिखते हैं। ये यमुनानगर, हरियाणा से हैं।
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माँ दुर्गा के पवित्र नवरात्रे चल रहे हैं। सारा देश श्रद्धा व अध्यात्मिकता के रंग में रमा हुआ है। घर और मंदिर सज्जा से आलोकित हो रहे हैं। भारतवर्ष की संस्कृति को अपने इतिहास में समेटे हुए अपना नववर्ष एक जनवरी को नहीं अपितु चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को देवी माँ के पवित्र नवरात्रे के साथ पूजा-पाठ करते हुए मनाया जाता है। यह ओर अधिक धूमधाम से मनाया जाना चाहिये क्योंकि भारतीय नववर्ष का अध्यात्मिक, सांस्कृतिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक आधार भी है। यह नववर्ष ऋतु परिवर्तन लेकर आता है। सर्द ऋतु की ठिठुरन से निजात दिलाते हुए चैत्र मास के नवरस दिवस अपने सुहावने मौसम से प्रकृति में सुंदरता की छटा बिखरते हैं। दूसरी ओर एक जनवरी को ऋतु में किसी भी तरह का परिवर्तन दिखाई नहीं देता। व्यक्ति, पशु-पक्षी यहां तक कि पेड-पौधे भी ठंड की ठिठुरन में सिकुड़े रहते हैं यद्यपि नव संवत्सर ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ नई उमंग, नई ऊर्जा और स्फूर्ति लेकर आती है। एक जनवरी की सन सनाती हवाओं के बीच कड़ाके की ठंड में हड्डियों के जमने पर मोमबत्ती बुझाकर नया वर्ष मनाना कहां तक तर्कसंगत हो सकता है। वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यन्त मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं अपितु जड़-चेतन नर-नाग, यक्ष-रक्ष किन्नर-गन्धर्व, पशु-पक्षी, लता, पादप, नदी-पर्वत, देवी-देवता व्यष्टि से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नद्ध रहते हैं।
ऐसी मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी दिन से विक्रम संवत के नए साल का आरंभ भी होता है। इसे गुड़ी पड़वा, उगादि आदि नामों से भारत के अनेक क्षेत्रों में मनाया जाता है। भारतीय नववर्ष का ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक महत्व भी है। यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 112 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने जगत की रचना प्रारंभ की। इतिहास गवाह है कि संवत का पहला दिन उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। ऐसे ही महान राजा सम्राट विक्रमादित्य ने 2079 वर्ष पहले इस महत्व को समझते हुए इसी दिन अपने राज्य की स्थापना की थी। विक्रमादित्य ने भारत राष्ट्र की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर कैलेंडर को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत राष्ट्र इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है। दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, कला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धन्वंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे। तभी से इस संवत का नाम विक्रमी संवत निश्चित हो गया।
भारत वर्ष में प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।
सनातन धर्म में शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन है यह। इसी पावन दिन को सिख परंपरा के द्वितीय गुरू अंगद देव प्रगटोत्सव का जन्म दिवस मनाया जाता है। समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए। विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
इसी दिन युगाब्द संवत्सर भी प्रारंभ हुआ था और 5126 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी और सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, दूरदर्शी, प्रखर राष्ट्रवादी पूज्य डॉ केशव राव बलिराम हेडगेवार जी का जन्म भी इसी पावन दिवस को हुआ था। इसे सौभाग्य कहे, इत्तेफाक या फिर परमात्मा का कोई संकेत कि इन्होंने अपना पूरा जीवन देश और समाज के लिए स्वाहा कर दिया।
इस दिन के महत्व को बढ़ाते हुए प्रकृति भी स्पष्ट संदेश देती है। बसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। सूखे, ठूँठ वृक्षों पर भी कोमल पत्र नव संवत के आगमन पर पलकें बिछायें प्रतिक्षारत्त दिखाई देते हैं।
फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था-किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं। यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ? आइये! विदेशी को फेंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही नव वर्ष के रूप में मनाएं।
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी दुनिया में सबसे पहले तारो, ग्रहों, नक्षत्रों आदि को समझने का सफल प्रयास भारत में ही हुआ था, तारों, ग्रहों, नक्षत्रों, चाँद, सूरज आदि की गति को समझने के बाद भारत के महान खगोल शास्त्रियों ने भारतीय कलेंडर (विक्रम संवत) तैयार किया, इसके महत्त्व को उस समय सारी दुनिया ने समझा। इस कलेंडर को बनाने में कोई नयी खगोलीय गणना करने के बजाय सीधे से भारतीय कैलेण्डर (विक्रम संवत) में से ही उठा लिया गया था। विद्वानों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवा भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।
सूर्य सिध्दान्त और सिध्दान्त शिरोमाणि आदि ग्रन्थों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है। लेकिन यह इतना अधिक व्यापक था कि आम आदमी इसे आसानी से नहीं समझ पाता था, खासकर पश्चिम जगत के अल्पज्ञानी तो बिल्कुल भी नहीं। किसी भी विशेष दिन , त्यौहार आदि के बारे में जानकारी लेने के लिए विद्वान् (पंडित) के पास जाना पड़ता था। इसके प्रचलन में आने के 57 वर्ष के बाद सम्राट आगस्तीन के समय में पश्चिमी कैलेण्डर (ईस्वी सन) विकसित हुआ। लेकिन उस में कुछ भी नया खोजने के बजाय, भारतीय कैलेंडर को लेकर सीधा और आसान बनाने का प्रयास किया था। पृथ्वी द्वारा 365 / 366 में होने वाली सूर्य की परिक्रमा को वर्ष और इस अवधि में चंद्रमा द्वारा पृथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मान कर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रख दिए गए। पहला महीना मार्च (एकम्बर) से नया साल प्रारम्भ होना था।
1. - एकाम्बर (31)
2. - दुयीआम्बर (30)
3. - तिरियाम्बर (31)
4. - चौथाम्बर (30)
5. - पंचाम्बर (31)
6. - षष्ठम्बर (30)
7. – सितम्बर (31)
8. - ओक्टाम्बर (30)
9. - नबम्बर (31)
10. - दिसंबर (30)
11. - ग्याराम्बर (31)
12. - बारम्बर (30/29)
इस प्रकार 12 महीने निर्धारित किए गए। सेप्तम्बर में सप्त अर्थात सात, अक्तूबर में ओक्ट अर्थात आठ, नबम्बर में नव अर्थात नौ, दिसंबर में दस का उच्चारण महज इत्तेफाक नहीं है। लेकिन फिर सम्राट आगस्तीन ने अपने जन्म माह का नाम अपने नाम पर आगस्त (षष्ठम्बर को बदलकर) और भूतपूर्व महान सम्राट जुलियस के नाम पर जुलाई (पंचाम्बर) रख दिया। इसी तरह कुछ अन्य महीनों के नाम भी बदल दिए गए। फिर वर्ष की शुरुआत ईसा मसीह के जन्म के 6 दिन बाद (जन्म छठी) जनवरी से प्रारम्भ माना गया। नाम भी बदल कर इस प्रकार कर दिए गए थे, जनवरी (31), फरवरी (30/29), मार्च (31), अप्रैल (30), मई (31, जून (30), जुलाई (31), अगस्त (30), सितम्बर (31), अक्तूबर (30) , नवम्बर (31), दिसंबर (30)। फिर अचानक सम्राट आगस्तीन को लगा कि उसके नाम वाला महीना अगस्त छोटा 30 दिन का हो गया है तो उसने जिद पकड़ ली कि उसके नाम वाला महीना 31 दिन का होना चाहिए। राजहठ को देखते हुए खगोल शास्त्रीयों ने जुलाई के बाद अगस्त को भी 31 दिन का कर दिया और उसके बाद वाले सितम्बर (30), अक्तूबर (31), नवम्बर (30), दिसंबर (31) का कर दिया। एक दिन को एडजस्ट करने के लिए पहले से ही छोटे महीने फरवरी को और छोटा करके (28/29) कर दिया।
यह बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारी अनपढ़ माँ, ताई, चाची और दादी भी सभी भारतीय महीनों के नाम क्रमशः जानती हैं किन्तु हम पढ़े-लिखे होकर भी स्मरण नहीं रख पाते। जिस तरह जनवरी अंग्रेज़ी का पहला महीना है उसी तरह हिन्दी महीनों में चैत वर्ष का पहला महीना होता है। हम इसे कुछ इस तरह से समझ सकते हैं-
मार्च-अप्रैल - चैत्र (चैत)
अप्रैल-मई -वैशाख (वैसाख)
मई-जून - ज्येष्ठ (जेठ)
जून-जुलाई - आषाढ़ (आसाढ़)
जुलाई-अगस्त - श्रावण (सावन)
अगस्त-सितम्बर - भाद्रपद (भादो)
सितम्बर-अक्टूबर - अश्विन (क्वार)
अक्टूबर-नवम्बर - कार्तिक (कातिक)
नवम्बर-दिसम्बर - मार्गशीर्ष (अगहन)
दिसम्बर-जनवरी - पौष (पूस)
जनवरी-फरवरी - माघ
फरवरी-मार्च - फाल्गुन (फागुन)
विक्रम संवत का शुभारम्भ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव श्रृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करते हैं।
हम सदियों से थोपी गई अंग्रेजी शिक्षा से आज तक भी पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो पाएं हैं। मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्घति का ही नतीजा है कि आज हमने न सिर्फ अंग्रेजी बोलने में हिन्दी से ज्यादा गर्व महसूस किया बल्कि अपने प्यारे भारत का नाम संविधान में इंडिया दैट इज भारत तक रख दिया। इसके पीछे यही धारणा थी कि भारत को भूल कर इंडिया को याद रखो क्योंकि यदि भारत को याद रखोगे तो भरत याद आएंगे, शकुन्तला व दुष्यंत याद आएंगे, हस्तिनापुर व उसकी प्राचीन सभ्यता और परम्परा याद आएंगी। राष्ट्रीय चेतना के स्वामी विवेकानंद ने कहा था यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले दिनांकों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्म गौरव खो बैठता है। इसी प्रकार महात्मा गांधी ने 1944 की हरिजन पत्रिका में लिखा था‘स्वराज्य का अर्थ है स्व-संस्कृति, स्वधर्म एवं स्व-परम्पराओं का हृदय से निर्वाह करना। पराया धन और पराई परम्परा को अपनाने वाला व्यक्ति ईमानदार नहीं होता। मेरा आप सभी पाठकों से निवेदन है कि नकली कैलेण्डर के अनुसार नए साल पर, फ़ालतू का हंगामा करने के बजाय, पूर्णरूप से वैज्ञानिक और भारतीय कलेंडर (विक्रम संवत) के अनुसार आने वाले नव वर्ष प्रतिपदा पर समाज उपयोगी सेवाकार्य करते हुए नववर्ष का स्वागत करें।
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बाल खंड (किड्स कार्नर)
"अनुष्ठान" |
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| श्री समीर उपाध्याय अपनी माँ के साथ |
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| द्वारा:श्री समीर उपाध्याय |
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श्री समीर उपाध्याय गुजरात, भारत से हैं। पेशे से शिक्षक हैं। इनकी शिक्षा एम.ए.,बी.एड.,एम.फिल.(हिन्दी) है। इन्होने कई काव्य संग्रहों में साझा काम किया है। इनको कई सम्मान भी मिल चुके है। इनकी लेखनी का भविष्य उज्वल लग रहा है।
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अजय:- "महेश, तुम्हें पता है आजकल चैत्री नवरात्रि के दिन चल रहें है? हम दोनों पति पत्नी ने तो माँ दुर्गा का अनुष्ठान किया है। नौ दिनों का उपवास रखा है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के मंदिर जाकर लड्डू का भोग चढ़ाने का व्रत भी रखा है।"
महेश:- "दोस्त, तुम्हें पता है कि कल मैं तुम्हारे घर तुम्हारी माँ की खबर पूछने आया था?"
अजय:-"सच कहते हो?"
महेश:-"हाँ, मैं सच कहता हूँ। कल सुबह आठ बजे मैं तुम्हारे घर आया था और पूरे दो घंटे तक माँ के साथ बैठा और बातचीत भी की। भाभी जी तो पूजा के कमरे में बैठकर मंत्र-जाप कर रही थी और दोनों बच्चे टीवी सीरियल देखने में व्यस्त थे। माँ का दवाई लेने का समय हो गया था तो डिबिया से दवाई निकाल कर मैंने माँ को दी और साथ ही फ्रिज से फ्रूट निकालकर काटकर नाश्ते की डिश भी तैयार करके माँ को दी। दो घंटे तक माँ ने अपने पुराने दिनों की बातें की तो उनके दिल को बहुत सुकून मिला और मुझे भी इस बात का संतोष मिला कि आज मेरे कारण किसी का एकाकीपन दूर हुआ। जब मैं घर से निकला तब माँ बहुत भावुक हो गई थी।"
अजय:- "लेकिन तुम्हारी भाभी ने तो मुझे कुछ बताया ही नहीं!"
महेश:- "अरे दोस्त, बताएगी कैसे? वो तो दो घंटे तक पूजा के कमरे में माँ दुर्गा के अनुष्ठान में बैठी थी और अनुष्ठान पूरा होते ही वहीं से यह कह कर बाहर निकल गई कि माँ दुर्गा के दर्शन के लिए मंदिर जा रही है। उसे क्या पता की माँ का दवाई और नाश्ते का समय हो गया है। घर में कौन आया और कौन चला गया?"
अजय:- (बिल्कुल चुप होकर महेश को सुन रहा है)
महेश:- "क्या तुम नहीं जानते हो कि तुम्हें नौकरी दिलाने में माँ ने जिंदगी भर की पूंजी दाव पर लगा दी थी? और आज तुम दोनों उस माँ को भूल कर मंदिर में बैठी माँ दुर्गा की आराधना में लगे हो! अरे दोस्त, घर में बैठी माँ को खुश रखो। उसकी सेवा करो। उसके लिए थोड़ा समय निकालो। यही है सच्चा अनुष्ठान। इससे मंदिर में बैठी माँ अपने आप खुश हो जाएगी।"
विजय के सत्य वचन के आगे अजय मुँह से एक शब्द भी नहीं निकाल पाया और वह अवाक् रह गया।
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| प्रस्तुति : सुश्री नुपुर खंडेलवाल |
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सुश्री नुपुर खंडेलवाल, अमेरिका के ओहायो राज्य में रहती हैं। इन्होने अर्थशास्त्र में शिक्षा ग्रहण की है। रीयल एस्टेट में काम करती है। इनको लिखने और किताबें पढ़ने के अलावा शास्त्रीय संगीत, आध्यात्मिकता और मैडिटेशन में रूचि है।
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मेरी ज़िन्दगी में भी हर किसी की ज़िन्दगी की तरह अनेक अनुभवों की यात्रा रही है। इस यात्रा में अनेक लोग मिले हैं, अनेक परिस्थितियाँ आयी हैं, और अनेक प्रकार के अनुभव भी हुए हैं। इन सब अनुभवों से मैंनें बहुत कुछ सीखा है। अभी के वातावरण में, मुझे कुछ लोग ऐसे भी मिले हैं जिनकी सोच नकारात्मक थी। इनसे किनारा कर मैंने अपना जीवन व्यतीत करने का प्रयास तो किया है, पर अब ये एहसास हो रहा है, कि इस प्रकार सभी लोगों से किनारा करते हुए मैं इस दुनिया में कहीं खो गयी हूँ और सोचने पर विवश हूँ कि असल में इन अनुभवों से बनी सँवरी मेरी ज़िन्दगी का उद्देश्य क्या है?
अपने जीवन का मतलब या अपने अन्दर की प्रसन्नता की खोज के लिए, जब अपने अन्दर और दुनिया में झाँका, तो बहुत से ऐसे लोग मिले जो बहुत कम साधनों में एवं विपरीत परिस्थितियों में भी सुखी ही नहीं बल्कि बहुत खुश रहते हैं। दुनिया के गरीब, असहाय लोगों की आँखों की चमक, मन की मुस्कान और और होंठों की हँसी ने मुझे समझा दिया की मेरी ज़िन्दगी का असल उद्देश्य है- अपनी ख़ुशी और मुस्कान को हर हालात में उजागर रखना, बरकरार रखना है ।
अपनी प्रसन्नता को उजागर रखने तथा अपनी जिन्दगी के उद्देश्य एवं उसके समाधान पर सोचा तो मेरे मन में स्वाभाविक ही प्रश्न उठा- क्या मेरी ख़ुशी, मेरा उद्देश्य इन अनुभवों पर ही निर्भर है या ख़ुशी मेरे अन्दर की ही बनायी स्थिति है? मेंरे विचार में खुशनसीब और सुखी वो ही रह पाते हैं, जो अपने अनुभवों से सीख कर, उन्हें समेट कर अपना और दूसरों का उद्धार कर पाते हैं। यह ही एक सुखद और ख़ुशी जीवन की परिभाषा है। आत्मा का यह गुण, यह ख़ुशी की स्थिति, मैं कैसे हमेशा देदीप्यमान रख सकती हूँ? हर पल को सुखी बनाने के इस सचेत निर्णय के लिए, मेरे विचार में सकारात्मक सोच का रखना अति आवश्यक है क्योंकि अच्छी सोच से मुझे शक्ति मिलती है, मेरी ऊर्जा बढ़ती है और इससे मेरे अन्दर कर्म करने का और जीवन जीने का उत्साह भी बढ़ता है।
आज के परिवेश में सकारात्मक सोच शब्द बहुत प्रचलन में है। ऐसे शब्द बोलने से आप सुलझे विचारों और उच्च विचारों वाले प्रतीत होते हैं। पर क्या यह इतना आसान है सकारात्मक सोच रखना और उस पर अमल करना, मेरे विचार में साकारात्मक सोच के लिए, तीन बातों पर ध्यान रखना अनिवार्य है। पहला-अच्छी संगति, दूसरा- रोज़ नियमित व्यायाम करना और तीसरा- अपने शौक (Hobby), पर दृढ़ता और स्थिरता से मन लगाकर काम करना।
मुझे लगता है कि अच्छी संगति मेरे दिमाग और शरीर पर अच्छा और प्रेरणादायक प्रभाव डालती है। अच्छी सोच रखने वाले, और मेरे समान सोच रखने वाले लोगों की संगति से मुझे अपने लक्ष्य को पाने की प्रेरणा मिलती है । प्रतिदिन नियमित व्यायाम करने से शरीर में फुर्ती आती है जिससे मनुष्य को अपना जीवन कर्म योगी के रूप में जीवन बिताने में सहायता मिलती है। अपने शौक (Hobby), संगीत साधना, से मेरे अन्दर रचनात्मक सोच की उत्पति हुई है। संगीत साधना से मैं अपने कार्य और चीज़ों को नए परिपेक्ष में देख पाती हूँ। अगर मैं इन तीन बातों पर ध्यान दे हर रोज़ कार्य करूँगी, तो मुझे विश्वास है की मेरे अन्दर के ख़ुशी का संस्कार सदा जागृत रहेगा।
मेरे जीवन का उद्देश्य, ख़ुशी की अनुभूति भी सकारात्मक सोच रखने का ही परिणाम है। कोई भी व्यक्ति सकारात्मक सोच के द्वारा अपने विचारों को पक्का कर लेगा तो उसे अपने उद्देश्य पर पहुँचने में हर परेशानी रुई समान आसन प्रतीत होगी और उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कोई संकट नहीं आएगा।
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| "संवाद" की कार्यकारिणी समिति |
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प्रबंद्ध संपादक – सुशीला मोहनका , OH , sushilam33@hotmail.com
. सहसंपादक - अलका खंडेलवाल, OH , alkakhandelwal62@gmail.com
. सहसंपादक - डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, UP , dr.archana2309@gmail.com
डिज़ाइनर – डॉ. शैल जैन, OH , shailj53@hotmail.com
तकनीकी सलाहकार -- मनीष जैन , OH , maniff@gmail.com
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| प्रबंध सम्पादक |
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- सुशीला मोहनका
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति परिवार के सभी आजीवन सदस्य एवं सदस्याओं को,
भारतीय नववर्ष विक्रम संवत २०७९, राम नवमी, महावीर जयंती, बिहू, बैशाखी, पुथांडू (तमिल नववर्ष) आदि पारम्परिक त्यौवहारों के लिए हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित करती हूँ। भारतीय नववर्ष भारत के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग रीती-रिवाज के साथ मनाया जाता है पर यह मूल रूप में ऋतू परिवर्तन का पर्व है। जाड़े की सिहरन कम हो जाती है और खेतों से नई फसलें खलिहानों में आ जाती है, उसके बाद त्यौहार मनाने का आनन्द ही कुछ और है।
आशा करती हूँ कि अभी Covid-19 की ओमिक्रोन (Omicron) प्रकोप काल में अपना एवं अपने परिवार का सावधानी पूर्वक पूरा ध्यान रख रहे होंगे। यह बहुत आवश्यक है कि आप सरकार के बनाये स्वास्थ्य नियम का पूरी तरह से पालन करे, मास्क लगायें, छ: फिट की दूरी रखें और वैक्सीन अवश्य लगवाएं एवं स्वस्थ्य रहें।
इस सत्र की विशेष सूचनायें :-
जनवरी माह से मासिक ‘संवाद’ में बालकों और युवा वर्ग को भी जगह देने का प्रावधान
किया गया है – बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिये और बच्चों के शुभचिंतकों की कलम से लिखी रचनाओं को भी इसमें स्थान दिया जायेगा । सभी पाठकों से निवेदन है कि इस दिशा में लेखन कार्य प्रारम्भ करें, अपनी रचनायें भेजें तथा औरों से भी भिजवायें।
युवा-वर्ग के लिए विशेष सूचना- ‘जागृति’ के नाम से एक श्रृंखला बसंत पंचमी से प्रारम्भ की गयी है ‘जागृति’ के माध्यम से हिन्दी प्रेमियों को हिन्दी भाषा के इतिहास की सही जानकारी प्राप्त होगी । ‘जागृति’ की चौथी कड़ी सनिवार, १४ मई ,२०२२ को दिन में ११:०० बजे से अमेरिका में और १४ मई, २०२२ को शाम ८ .३० बजे से भारत में प्रारम्भ होगी । सभी से नम्र निवेदन है कि इस कार्यक्रम को देखिये, सुनिए और गुनिये तभी “जागृति” स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत सफल हो पायेगी। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के सभी स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष-अध्यक्षाओं के लिए विशेष सूचना:- सभी समितियों के पदाधिकारियों एवं आजीवन सदस्यों से अनुरोध है कि अपने यहाँ के हिन्दी प्रेमियों तक अ.हि.स. द्वारा १४ मई, २०२२ को होनेवाले कार्यक्रम की सूचना दें। यह आपका पावन कर्तव्य और समय की माँग भी है।
अ.हि.स. की सभी स्थानीय समिति के अध्यक्ष -अध्यक्षाओं से विशेष आग्रह है कि अपनी -अपनी समितियों में होनेवाले कार्यक्रमों की अग्रिम सूचना भेजें ताकि ‘संवाद’ में उन्हें प्रकाशित किया जा सके। साथ ही एक और अनुरोध है कि जब कार्यक्रम हो जाये तो उसकी रिपोर्ट फोटो के साथ भेजें ताकि ‘संवाद’ में प्रकाशित की जा सके।
आप सभी विशेष निवेदन है कि ‘संवाद’ का अप्रैल २०२२ का अंक अच्छी तरह पढ़कर अपनी पसन्द, नापसंद लिखकर भेजें। आपकी प्रतिक्रिया आने पर सम्पादक-मंडल को अपना कार्य करने में आसानी होगी। अगर और कोई किसी और किसी विशेष कार्य के लिए अपनी सेवा अर्पित करना चाहते हैं तो निसंकोच हमें बताने का कष्ट करें ।
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रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं। उनका अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की रीति -नीति से कोई संबंध नहीं है।
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