FEBRUARY INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER
फरवरी 2026, अंक ५५ प्रबंध सम्पादक: श्री आलोक मिश्र। सम्पादक: डॉ. शैल जैन
Human Excellence Depends on Culture. The Soul of Culture is Language
भाषा द्वारा संस्कृति का प्रतिपादन
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फरवरी का यह महीना भाव, संवाद और सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक है। हिंदी भाषा हमें विश्व के विभिन्न देशों और संस्कृतियों में एक सूत्र में पिरोती है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति का यह सौभाग्य है कि अमेरिका के विभिन्न शहरों में सक्रिय हमारी शाखाएं हिंदी के प्रचार-प्रसार में निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। काव्य गोष्ठियाँ, सांस्कृतिक संध्या, हिंदी शिक्षण कक्षाएँ और युवा गतिविधियाँ, इन सभी प्रयासों से हिंदी की पहचान निरंतर सशक्त हो रही है।
मैं समिति के सभी पदाधिकारियों, शाखा अध्यक्षों, स्वयंसेवकों और सदस्यों को उनके समर्पित योगदान के लिए हार्दिक धन्यवाद देता हूँ। आपकी प्रतिबद्धता और परिश्रम से हिंदी की वैश्विक उपस्थिति निरंतर सुदृढ़ हो रही है।
डिजिटल एकीकरण – हमारी प्राथमिकता
आज के डिजिटल युग में हमारी गतिविधियों का व्यापक प्रसार और प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि समिति की सभी शाखाएं अपनी गतिविधियों, कार्यक्रमों, समाचार और उपलब्धियों को नियमित रूप से हमारी आधिकारिक वेबसाइट www.hindi.org पर साझा करें।
सभी शाखाओं का वेबसाइट पर पूर्ण रूप से ऑनबोर्ड होना समय की माँग है। इससे—
समिति की वैश्विक पहचान और विश्वसनीयता और सुदृढ़ होगी
वेबसाइट पर अधिक ट्रैफिक और सहभागिता बढ़ेगी
नए सदस्यों, विशेषकर युवा पीढ़ी को जोड़ने में सुविधा होगी
हमारी सामूहिक उपलब्धियों का सुव्यवस्थित अभिलेखन संभव होगा
शाखाओं के मध्य समन्वय और सहयोग को नई दिशा मिलेगी
मैं सभी शाखाओं से आग्रह करता हूँ कि वे अपनी प्रोफ़ाइल अद्यतन करें, कार्यक्रमों की सूचना समय पर यहाँ और ‘संवाद’ न्यूज़लेटर से साझा करें तथा गतिविधियों की रिपोर्ट नियमित रूप से प्रेषित हो सके।
हमारा सामूहिक संकल्प – 2026
वर्ष 2026 में हमारा लक्ष्य है कि हिंदी को तकनीक,नवाचार और नई पीढ़ी से और अधिक प्रभावी रूप से जोड़ा जाए। डिजिटल मंचों पर सशक्त उपस्थिति के माध्यम से हम हिंदी को वैश्विक संवाद की अग्रणी भाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
आप सभी के सहयोग से ही यह संकल्प साकार होगा।
आइए, हम मिलकर अंतर्राष्टीय हिंदी समिति को एक सशक्त, एकीकृत और सक्रिय वैश्विक मंच के रूप में और आगे बढ़ाएँ।
आपके निरंतर सहयोग और सहभागिता के लिए धन्यवाद।
सादर,
संजीव जायसवाल
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति २०२६–२०२७
ईमेल: president@hindi.org
www.hindi.org
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- आगामी कार्यक्रम
हास्य कवि सम्मेलन 2026
द्वारा : आलोक मिश्रा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, न्यासी समिति
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छह सप्ताह का हास्य कवि सम्मेलन शुक्रवार, 10 जुलाई से प्रारंभ होकर रविवार, 16 अगस्त तक चलेगा। यह कार्यक्रम कविता और हास्य का सुंदर संगम होगा, जो श्रोताओं को भरपूर हँसी और आनंद प्रदान करेगा।
यदि आप अपने शहर में हास्य कवि सम्मेलन आयोजित करने में रुचि रखते हैं, तो कृपया जल्द हमसे संपर्क करें । यात्रा कार्यक्रम को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से हम आपकी प्राथमिकताओं का यथासंभव ध्यान रखेंगे। कृपया ध्यान दें कि कवियों की यात्रा को सहज और प्रभावी बनाने के लिए निकटवर्ती तीन शहरों को मिलाकर एक सप्ताहांत समूह बनाया जाएगा।
हमें आशा है कि आप 2026 के हास्य कवि सम्मेलन को भव्य सफलता बनाने में हमारे साथ जुड़ेंगे!
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति --हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें
श्री रमेश जोशी (विश्वा पत्रिका के संपादक)और उनकी टीम को
अद्भुत पुस्तक प्रकाशित करने के लिए
"मैं सागर में खड़ा हुआ हूँ "
द्वारा : आलोक मिश्रा , न्यासी सदस्य, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- ह्यूस्टन शाखा
विश्व हिंदी दिवस, 2026 समारोह का आयोजन,
भारतीय वाणिज्य दूतावास में
द्वारा : डॉ. सरिता मेहता, ह्यूस्टन शाखा
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अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ह्यूस्टन शाखा ने भारतीय वाणिज्य दूतावास, ह्यूस्टन में, 10 जनवरी को 'विश्व हिंदी दिवस" देश-भक्ति, राष्ट्र-प्रेम, निष्ठा और समर्पण की भावनाओं से परिपूर्ण कविताओं और गीतों के साथ बहुत ही उल्लास से मनाया।
अमेरिका की धरती पर अमेरिका के झंड़ें के साथ कंधे से कंधा मिलाकर झूमता, हमारे भारत की शान " हमारा तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज देख कर, गर्व से सर और भी ऊँचा हो जाता है।अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति के राष्ट्रीय संरक्षक हिन्दी प्रेमी श्री स्वपन धैर्यवान ने जिस गरिमा और उत्साह से प्रोगाम की शुरूआत " जय हिन्द" और वंदेमातरम" की, सभी उपस्तिथ लोगों ने भी उनका साथ "जय हिन्द" और "वंदेमातरम"की बुल्लंद आवाज़ में दिया।
माननीय कॉन्सुल जनरल श्री डी.सी. मंजुनाथ जी का बहुत ही महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम "हिंदी दिवस”’ पर प्रथम प्राथमिकता हिंदी भाषा को दी गई।" अहिंदी भाषी होने के बावजूद उनका गर्व के साथ हिन्दी में, हिन्दी भाषा को प्रोत्साहन के लिए दिया गया संदेश मन को छू गया।
भारत के विभिन्न प्रान्तों से आकर बसे, अहिन्दी भाषी प्रवासी भारतीयों का भी हिन्दी में बात करना, गाने और कविताएँ सुनाना, बताता है कि उन्हें अपने देश के प्रति कितना गहरा और अटूट प्यार है। निष्ठा और समर्पण की भावना से ओतप्रोत, राष्ट्र-भक्ति, अपने देश के प्रति अनुराग , उसकी संस्कृति, इतिहास और लोगों से कितना गहरा लगाव महसूस करते हैं।
इन्हीं भावनाओं से प्रेरित,प्रस्तुत हैं मेरी स्वंय रचित पंक्तियाँ :
" मत कहो प्रवासी भारतीय हमें ..
विश्व के हर देश में..
'लघु भारत' बसाया है हमने।
न भूले हैं, न भूले थे, न भूलेंगे कभी..
अपनी संस्कृति, संस्कार और भाषा..
रहकर विदेशों में भी ' हिन्दोस्तान' का
मान- सम्मान जग में बढ़ाया है हमनें।
मत कहो प्रवासी भारतीय हमें ....
अपनी जिम्मेदारी को पूर्णतय: निभाया,
" हिन्दी भाषा' का परचम विश्व भर में..
' सरिता' बड़े गर्व से फैलाया है हमने।
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विश्व हिंदी दिवस 2026 समारोह ह्यूस्टन शाखा,भारतीय वाणिज्य दूतावास में
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अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- डैलास शाखा
5 अक्टूबर को हिंदी दिवस 2025 समारोह का आयोजन
द्वारा : वीणा शर्मा , डैलास शाखा की अध्यक्षा
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५ अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के डैलास शाखा ने ‘हिंदी दिवस’ बहुत ही धूम-धाम से मनाया। इसमें सैन एंटोनियो के कवि श्री अभिनव शुक्ला जी के साथ स्थानीय कवि श्री नीरज गुप्ता, श्रीमती नेहा तिवारी, डॉ धीरेन शाह को मंच पर कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गय। डॉ शाह को सम्मान पत्र से भी सम्मानित किया गया।
पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी बच्चों ने मंच पर काव्य प्रदर्शन किया जिसकी श्रोताओं ने भरपूर सराहना की । सभी कवियों के काव्य पाठन पर हॉल में तालियाँ गूँजती रहीं । करीब २५० श्रोताओं ने अपनी उपस्थित दी जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है। कार्यक्रम का संचालन अंतर्राष्ट्रीय समिति की अध्यक्षा श्रीमती वीणा शर्मा ने अपने सभी सदस्यों के सहयोग से सफलतापूर्वक किया।
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अपनी कलम से
भारत के गणतंत्र दिवस और संविधान के बारे में प्रस्तुति एक युवा द्वारा
समाचार द्वारा : सौरभ शुक्ला ,औरिका के पिता
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डी.एफ.डब्लू. (DFW) एकता मंदिर, टेक्सास में प्रतियोगिता विश्व हिंदी दिवस एवं गणतंत्र दिवस २०२६ के अवसर पर औरिका शुक्ला, कक्षा तीन क्लैरिडन स्कूल की छात्रा द्वारा प्रस्तुति। औरिका, विद्या विकास हिंदी स्कूल की छात्रा है।
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नमस्ते मेरा नाम औरिका शुक्ला है।
मैं कक्षा तीन क्लैरिडन स्कूल की छात्रा हूँ। मैं अर्गाइल टेक्सास में अपने माता पिता और छोटे भाई के साथ रहती हूँ।
आज मैं आपके समक्ष भारत के गणतंत्र दिवस और संविधान के बारे में कुछ अद्भुत एवं प्रेरक तथ्य प्रस्तुत करूँगी। क्या आपको यह ज्ञात है की भारत का संविधान विश्व का सबसे विशाल और विस्तृत संविधान है। तो आइए जानते हैं स्वतंत्रता से गणतंत्र तक की भारत की कहानी, जो आज होगी हमारी ज़ुबानी।
१५ अगस्त १९४७ को भारत आज़ाद तो हो गया लेकिन इतने बड़े देश को चलाता एक बड़ी चुनौती थी। इस स्थिति में डॉ अंबेडकर ने अपने साथियों के साथ तीन साल की कड़ी मेहनत की। अंत में कड़ी मेहनत रंग लाई और २६ नवम्बर, १९४९ को भारत का संविधान बना । यह दिन संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। २६ जनवरी ,१९५० को संविधान पूर्ण रूप से लागू हुआ। इस दिन भारत एक संप्रभु ,समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र बना। इस दिन हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने २१ तोपों की सलामी के साथ तिरंगा ध्वज फहरा कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया।
गण मतलब लोग और यहाँ तंत्र का अर्थ है प्रशासन प्रणाली । एक गणतंत्र देश मैं सर्वोच्च सत्ता लोगो के हाथ में होती है। चुनाव के माध्यम से लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं जो फिर संविधान के हिसाब से देश की सत्ता चलाते है। इसलिए संविधान देश के सुशासन के लिए सर्वोपरि है।
भारतीय संविधान अपने नागरिकों को ६ मौलिक अधिकार देता है। यह हैं समानता, स्वतंत्रता, न्याय, धर्म, शिक्षा और संस्कृति। मौलिक अधिकार के साथ साथ संविधान हमे 11 कर्तव्य भी बताता है । यह देशभक्ति और एकता को बढ़ावा देते है।
इनमें कुछ प्रमुख हैं:
क़ानून का पालन करना, देश में एकता बनाए रखना, प्रकृति का सम्मान करना, ६ से १४ साल के बच्चों को शिक्षा दिलवाना । इन कर्तव्यों का पालन करना ही भारतीय गणतंत्र और उसके संविधान की सच्ची श्रद्धा है ।
हर वर्ष गणतंत्र दिवस राजधानी नई दिल्ली में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । आयोजन की शुरुआत हमारे राष्ट्रपति तिरंगा ध्वज फहरा कर करते हैं । ५२ सेकंड के राष्ट्रगान के साथ २१ तोपों की सलामी दी जाती है। गणतंत्र दिवस परेड में सेना की शक्ति और अनुशासन के दर्शन होते है।भारत के विभिन्न राज्यो की झाँकियाँ, अतिथियों को हमारी संस्कृति से अवगत कराती है। कई स्कूल और कॉलेज के छात्र भी परेड में हिसा लेते हैं। देश भर के सभी विद्यालयों में भी इसे बड़े गर्व से मनाया जाता है ।
इस वर्ष गणतंत्र दिवस की मुख्य अतिथि हैं उर्सुला वॉन डेर लेयेन। वे यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट हैं। यह भारत और यूरोपियन कमीशन की गहरी दोस्ती का प्रतीक है।
अंत मैं एक कविता कहना चाहूँगी।
सैंतालीस में हुए स्वतंत्र, पचास में गणतंत्र।
विश्व गुरु बनना है, बस यही हमारा गुरुमंत्र ।
आएगा फिरसे सैंतालिस, बचे हैं बस कुल २१ साल
स्वतंत्रता शताब्दी पे भारत का होगा अमृतकाल ।
जयहिंद
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कहानी
"बाहर कुछ जल रहा है"
हंगरी की कहानी का अप्रकाशित अनुवाद
मूल लेखक : लास्लो क्रैस्नहोरकाई
अनुवाद : सुशांत सुप्रिय
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Writer -
Laszlo Krasznahorkai
मूल लेखक : लास्लो क्रैस्नहोरकाई
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Translator - Sushant Supriy
अनुवाद : सुशांत सुप्रिय
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अनुवादक: सुशांत सुप्रिय जी हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार, कवि तथा साहित्यिक अनुवादक है। इनके नौ कथा-संग्रह, पाँच काव्य-संग्रह तथा विश्व की अनूदित कहानियों के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कहानियाँ और कविताएँ कई राज्यों के स्कूल-कॉलेजों में बच्चों को पढ़ाई जाती हैं ।
कहानी " बाहर कुछ जल रहा है "
ज्वालामुखी के गह्वर में स्थित संत एन्ना झील एक मृत झील है। यह झील 950 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और लगभग हैरान कर देने वाली गोलाई में मौजूद है । यह झील बरसात के पानी से भरी हुई है । इसमें जीवित रहने वाली एकमात्र मछली ‘ कैटफ़िश ‘ प्रजाति की है । जब भालू देवदार के जंगल में से चहलक़दमी करते हुए यहाँ पानी पीने के लिए आते हैं तो वे इंसान के यहाँ आने वाले रास्ते से अलग दूसरे ही रास्ते चुनते हैं । दूसरी ओर एक ऐसा इलाक़ा है जहाँ कम ही लोग जाते हैं। यह एक धँसने वाला, सपाट, दलदली इलाक़ा है। आज लकड़ी के तख़्तों से बना एक टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता इस दलदली इलाक़े के बीच में से होकर गुज़रता है। इस झील का नाम काईदार झील है। जहाँ तक पानी की बात है , अफ़वाह यह है कि यहाँ का पानी बेहद ठंड में भी नहीं जमता है। बीच में यह पानी हमेशा गरम रहता है। यह झील लगभग हज़ार सालों से मृत है और यही हाल इस झील के पानी का है। अधिकतर यहाँ एक गहरा सन्नाटा ज़मीन की छाती पर बोझ बनकर मँडराता रहता है।
आयोजकों में से एक ने पहले दिन आने वाले अतिथियों को जगह दिखाते हुए कहा कि यह चिंतन-मनन और घूमने-फिरने के लिए आदर्श स्थान है। इस बात को सबने याद रखा। उनका शिविर सबसे ऊँचे पहाड़ के पास ही था जिसके शिखर का नाम ‘ हज़ार मीटर की चोटी ‘ था। इसलिए चोटी के नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे तक दोनों दिशाओं में लोगों का आना-जाना लगा रहा। हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं था कि नीचे शिविर में उसी समय ज़बरदस्त गतिविधियाँ नहीं हो रही थीं। हमेशा की तरह समय बीतता जा रहा था। इस जगह की कल्पना करके सोचे गए रचनात्मक विचार और भी ज़बरदस्त तरीक़े से आकार और अंतिम रूप ले रहे थे। तब तक सभी अतिथि अपनी-अपनी नियत जगहों पर स्थापित हो चुके थे। ज़रूरत की कुछ चीज़ें उन्होंने अपने हाथों से लगा ली थीं। अधिकांश ने मुख्य भवन के निजी कक्ष को प्राप्त कर लिया था ।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने काफ़ी समय से इस्तेमाल में न आई झोंपड़ियों में रहना स्वीकार किया था। आगंतुकों में से तीन लोग ऐसे थे जिन्होंने शिविर के केन्द्र-बिंदु वाले भवन की बहुत बड़ी अटारी पर क़ब्ज़ा कर लिया। यहाँ भी तीनों ने अपने लिए अलग-अलग जगहें निर्धारित कर लीं। यह चीज़ सभी को बेहद ज़रूरी लग रही थी । वे काम करते हुए भी अपनी निजता में अकेले रहना चाहते थे । सभी को शांति चाहिए थी। वे उत्तेजना और अशांति से दूर रहना चाहते थे । इस तरह वे सभी अपने-अपने काम में जुट गए और इसी तरह काम करने में दिन बीतने लगे। ख़ाली समय में बाहर चहलक़दमी की जाती , झील में सुखद डुबकी लगाई जाती और शाम के समय शिविर के किनारे आग जला कर उसके इर्द-गिर्द बैठकर गाने गाए जाते। साथ ही घर की बनी फलोंवाली ब्रांडी पीने का लुत्फ़ उठाया जाता।
इस वृत्तान्त का अनुमान लगाना भ्रामक था। जो तथ्य धीरे-धीरे किंतु वास्तविक रूप से उभर कर सामने आए, उनसे तो यही लगा। काम के पहले दिन सबसे तीक्ष्ण दृष्टि वालों का भी यही विचार था । लेकिन तीसरा दिन होते-होते इस बात पर आम राय बन गई। उन बारह लोगों में से एक बाक़ी सबसे अलग था। उसका वहाँ आना भी बेहद रहस्यमय था। कम-से-कम उसका वहाँ आना बाक़ियों से तो बिल्कुल अलग था। वह वहाँ रेलगाड़ी और फिर बस से नहीं आया था। यह चाहे कितना भी अकल्पनीय लग रहा था , अपने आने के दिन शायद शाम छह या साढ़े छह बजे वह शिविर का मुख्य द्वार खोल कर सीधा अंदर आ गया था । उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह वहाँ पैदल चलकर ही पहुँचा हो। दूसरों को देखकर उसने केवल रूखाई से अपना सिर हिला दिया था। जब आयोजकों ने विनम्रतापूर्वक और सम्मान से उसका नाम पूछा , और फिर वे उससे यह पूछने लगे कि वह यहाँ तक कैसे पहुँचा था, तो उसने उत्तर दिया कि कोई उसे कार से सड़क के एक मोड़ तक छोड़ गया था। लेकिन उस प्रगाढ़ ख़ामोशी में किसी ने भी वहाँ किसी कार की आवाज़ नहीं सुनी थी जो उसे ‘ सड़क के एक मोड़ तक ’ छोड़ जाती ।
यह पूरा विचार ही अविश्वसनीय लग रहा था कि कोई उसे पूरे रास्ते नहीं बल्कि केवल सड़क के एक मोड़ तक छोड़ गया था। इसलिए, किसी को भी उसकी बात पर यक़ीन नहीं हो रहा था। या यदि और सटीकता से कहें तो किसी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उसके शब्दों की व्याख्या कैसे की जाए। अत: उसके आने के पहले दिन एकमात्र सम्भव और विवेकपूर्ण वैकल्पिक राय यही लग रही थी कि वह पूरा रास्ता पैदल चलकर आया था। हालाँकि यह राय भी अपने-आप में असंगत लग रही थी। क्या उसने बुख़ारेस्त से अपनी यात्रा इसी प्रकार शुरू की होगी और यहाँ के लिए ऐसे ही निकल पड़ा होग? और क्या बिना किसी रेलगाड़ी या बस पर चढ़े वह केवल पैदल चलता हुआ यहाँ तक पहुँच गया था? फिर तो कौन जानता है , वह कितने हफ़्तों तक पैदल चला होगा। क्या संत ऐन्ना झील तक की लम्बी यात्रा इसी प्रकार समाप्त करके वह एक शाम छह या साढ़े छह बजे शिविर का मुख्य द्वार खोलकर सीधा वहाँ पहुँच गया था? जब उससे यह प्रश्न किया गया कि क्या आयोजन-समिति श्री इयोन ग्रिगोरेस्क्यू को सम्मानित कर रही थी, तो उसने उत्तर में केवल रुखाई से अपना सिर हिला दिया।
यदि उसके वृत्तांत की विश्वसनीयता का अनुमान उसके जूतों की हालत से लगाया जाता तो फिर किसी के मन में कोई संदेह नहीं रह जाता। शायद शुरू में वे जूते भूरे रंग के थे । वे गर्मियों में पहने जाने वाले नक़ली चमड़े के हल्के जूते थे। जूतों की अंगूठे वाली जगह पर सजावट की गई थी , लेकिन अब वह सजावट उखड़ कर एक ओर लटकी हुई थी। दोनों जूतों के तल्ले आधे उखड़े हुए थे। जूतों की एड़ियाँ पूरी तरह घिस चुकी थीं और दाएँ अंगूठे के पास एक जूते के चमड़े में छेद हो गया था जिसके कारण भीतर पहनी हुई जुराब वहाँ से नज़र आ रही थी।
लेकिन यह केवल उसके जूतों की ही बात नहीं थी। अंत तक इस सब को एक रहस्य बने रहना था। कुछ भी हो, उसके कपड़े दूसरों द्वारा पहने गए पश्चिमी परिधानों से अलग दिखाई दे रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वह 1980 के दशक के दुर्दांत तानाशाह के युग से, उस समय की दुर्दशा के काल से सीधे वर्तमान युग में आ पहुँचा कोई पात्र हो। उसकी अज्ञात रंग की चौड़ी पतलून फ़लालेन जैसे किसी मोटे कपड़े से बनी हुई प्रतीत हो रही थी। वह पतलून उसके टखनों पर स्पष्टता से फड़फड़ा रही थी। किंतु उसने जो कार्डिगन पहन रखा था , वह देखने में और ज़्यादा कष्टकर लग रहा था। वह दलदली-हरे रंग का बेहद ढीला , निराश कर देने वाला कार्डिगन था। उसने उसे चौकोर खाने वाली क़मीज़ के ऊपर पहन रखा था और इस मौसम की गर्मी के बावजूद उसकी क़मीज़ के ठोड़ी तक के सभी ऊपरी बटन बंद थे।
वह किसी जल-पक्षी की तरह पतला-दुबला था और उसके कंधे झुके हुए थे। उसके डरावने , मरियल चेहरे पर दो गहरी भूरी जलती हुई आँखें मौजूद थीं। वे वाक़ई जलती हुई आँखें थीं — किसी अंदरूनी आग से जलती हुई आँखें नहीं , बल्कि केवल प्रतिबिम्बित करती हुईं, जैसे वे दो स्थिर आईने हों जो यह बता रहे हों कि बाहर कुछ जल रहा है।
तीसरा दिन होते-होते वे सभी समझ गए थे कि यह शिविर उसके लिए शिविर नहीं था। यहाँ होने वाला काम उसके लिए काम नहीं था । यह ग्रीष्म ऋतु उसके लिए ग्रीष्म ऋतु नहीं थी। तैरना या अन्य कोई आरामदायक छुट्टी मनाने का उपक्रम, जो आम तौर पर ऐसे सामूहिक आयोजनों का हिस्सा होता है , उसके लिए नहीं था। उसने आयोजकों से अपने लिए एक जोड़ी जूतों की माँग की और वे उसे मिल गए। ( उन्होंने उसे वे जूते दे दिए जो बाहर अहाते में एक कील से लटके हुए थे।) वह उन जूतों को पूरा दिन पहनकर शिविर के इलाक़े के भीतर ही ऊपर-नीचे टहलता रहता। वह न तो पहाड़ी पर चढ़ता-उतरता, न ही झील के किनारे टहलने के लिए जाता । वह दलदली झील पर बने तख़्तों के मार्ग पर भी कभी नहीं चलता। वह अपना अधिकांश समय भीतर ही बिताता। कभी-कभी वह इधर-उधर चलता हुआ पाया जाता। ज़्यादातर वह यह देखता रहता कि कौन क्या कर रहा है। वह मुख्य भवन के सभी कमरों के सामने से गुजरता। वह अपने चेहरे पर अति व्यस्त भाव लिए चित्रकारों, छाप या मुहर लगाने वालों तथा मूर्तिकारों के पीछे खड़े हो कर यह देखता रहता कि हर काम में प्रतिदिन कितनी प्रगति हो रही है।
वह अटारी पर चढ़ जाता तथा छप्पर और लकड़ी की झोंपड़ी में घुस जाता, लेकिन उसने कभी किसी से कोई बात नहीं की । पूछने पर भी उसने शब्दों में कभी किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया , गोया वह गूँगा-बहरा हो या वह किसी की कही कोई बात नहीं समझ पा रहा हो। उसका व्यवहार शब्दहीन था। जैसे वह उदासीन , जड़ या मूढ़ हो या कोई भूत-प्रेत हो। और तब बाक़ी के सभी ग्यारह लोग सतर्क होकर उसे देखने लगे, जैसे ग्रिगोरेस्क्यू उन्हें देखता था। वे सभी एक नतीजे पर पहुँचे और उन्होंने उस शाम जलती हुई आग के इर्द-गिर्द इस विषय पर चर्चा की। ( ग्रिगोरेस्क्यू वहाँ अन्य साथियों के साथ कभी नहीं देखा गया क्योंकि वह हर शाम जल्दी सोने चला जाता था।) अन्य सभी लोग इस नतीजे पर पहुँचे कि उसका यहाँ आगमन आश्चर्यजनक था, उसके जूते अजीब थे और उसका कार्डिगन, उसका भीतर धँसा चेहरा, उसका दुबलाप , उसकी आँखें — ये सभी चीज़ेँ विचित्र थीं। लेकिन उन्होंने पाया कि उसकी एक चीज़ सबसे विशिष्ट थी, जिसका उन्होंने अभी तक संज्ञान भी नहीं लिया था। वह चीज़ वाक़ई आश्चर्यजनक थी। दरअसल यहाँ मौजूद यह प्रख्यात सर्जनात्मक आकृति , जो सदा सक्रिय रहती थी , पूरी तरह से कार्यहीन और ख़ाली थी जबकि बाक़ी सभी लोग काम-काज में व्यस्त थे।
वह ख़ाली था। यानी कुछ भी नहीं कर रहा था। यह बात समझ में आने पर वे सब हैरान रह गए। लेकिन वे ज़्यादा हैरान इस बात पर हुए कि उन्होंने शिविर के शुरुआती दिनों में इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था। यदि गिना जाए तो आज आठवाँ दिन चल रहा था। आगंतुकों में से कुछ तो अपनी कला को अंतिम रूप दे रहे थे, किंतु उस अजनबी के कुछ न करने के इस अजीब तथ्य की ओर उन सब ने अब जाकर ध्यान दिया था।
वह वास्तव में कर क्या रहा था?
कुछ नहीं। कुछ भी नहीं।
उस समय के बाद से वे सभी अनजाने में ही उस पर निगाह रखने लगे। एक बार दसवें दिन उन्होंने पाया कि पौ फटने के बाद से सुबह के पूरे समय काफ़ी अरसे तक ग्रिगोरेस्क्यू कहीं दिखाई नहीं दिया, हालाँकि वह बहुत जल्दी उठ जाता था। अधिकांश लोग तब सोते रहते थे । उस समय किसी ने भी उसे कहीं जाते हुए नहीं देखा। वह झोंपड़ी के पास नहीं था, छप्पर के निकट नहीं था, न भीतर था, न बाहर था। दरअसल इस बीच वह किसी को भी दिखाई नहीं दिया था, गोया वह कुछ समय के लिए ग़ायब हो गया हो।
बारहवें दिन के अंत में कुछ लोगों ने उत्सुकता से भर कर अगली सुबह तड़के उठने का फ़ैसला किया ताकि वे इस मामले की जाँच कर सकें । हंगरी के एक चित्रकार ने सब को सुबह जल्दी उठाने की ज़िम्मेदारी सँभाल ली।
अभी भी अँधेरा ही था जब वे सब अगली सुबह सो कर उठे और उन्होंने पाया कि ग्रिगोरेस्क्यू अपने कमरे से नदारद था। वे सब मुख्य द्वार की ओर पहुँचे, वापस लौटे, और झोंपड़ी तथा छप्पर तक गए किंतु कहीं भी उसका नामो-निशान नहीं था। भौंचक्के होकर उन्होंने एक-दूसरे को देखा। झील की ओर से हल्की हवा बह रही थी , पौ फटने लगी थी और धीरे-धीरे सुबह के उजाले में उन्हें एक-दूसरे की आकृतियाँ दिखाई देने लगी थीं। चारों ओर घना सन्नाटा था।
और तब उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी। जहाँ वे खड़े थे , वहाँ से वह आवाज़ बड़ी मुश्किल से सुनाई दे रही थी। वह दूर कहीं से आ रही थी। शायद शिविर के अंतिम छोर से। या ठीक से कहें तो उस अदृश्य सीमा-रेखा के दूसरी ओर से , जहाँ दो बहिगृह मौजूद थे। वे शिविर की सीमा-रेखा पर स्थित थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उस बिंदु के बाद से भू-भाग किसी खुले आँगन जैसा नहीं दिखता था। अभी प्रकृति ने उस मैदान पर वापस क़ब्ज़ा नहीं किया था, किंतु किसी ने उस भू-भाग में कोई रुचि नहीं दिखाई थी। असल में वह एक असभ्य, डरावनी जगह थी जहाँ कोई इंसान नहीं आता-जाता था। शिविर के मालिकों ने भी उस भू-भाग पर इतना ही दावा किया था कि वे वहाँ फ़्रिज और रसोई से निकलने वाला कूड़ा-कचरा फेंक दिया करते थे। इसलिए समय के अंतराल के साथ उस पूरे इलाक़े में अभेद्य , हठी , आदमकद झाड़-झंखाड़ उग आए थे। ये बेकार की कँटीली, मोट , प्रतिकूल वनस्पतियाँ अविनाशी लगती थीं।
उस पार कहीं से , उस झाड़-झंखाड़ में से उन्होंने वह आवाज़ सुनी जो छन कर उनकी ओर आ रही थी।वे सब हिचक कर ज़्यादा देर तक रुके नहीं रहे बल्कि एक-दूसरे की ओर देख कर वे आगे किए जाने वाले काम में जुट गए। चुपचाप सिर हिला कर वे उस झाड़-झंखाड़ में घुस गए। वे सब उस आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। वे उस झाड़-झंखाड़ में काफ़ी अंदर तक चले गए थे और अब शिविर की इमारतों से दूर आ गए थे। तब जाकर वे उस आवाज़ के क़रीब पहुँच पाए और यह पता लगा पाए कि शायद वहाँ कोई खुदाई कर रहा था।वे और आगे बढ़े। अब किसी उपकरण के ज़मीन की मिट्टी से टकराने की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे रही थी। किसी गड्ढे में से मिट्टी निकाले जाने , और उस मिट्टी के लम्बी घास पर गिर कर फैलने की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
उन्हें दाईं ओर मुड़कर दस-पंद्रह कदम आगे चलना पड़ा। किंतु वे वहाँ इतनी जल्दी पहुँच गए कि वे सब ढलान से नीचे लगभग गिरने ही वाले थे। उन्होंने देखा कि वे एक विशाल और गहरे गड्ढे के किनारे खड़े थे । वह गड्ढा तीन मीटर चौड़ा और पाँच मीटर लम्बा था। उस गड्ढे के तल पर उन्हें ग्रिगोरेस्क्यू खुदाई करता हुआ नज़र आया। वह गड्ढा इतना गहरा था कि उसका सिर बड़ी मुश्किल से नज़र आ रहा था। अपने काम में व्यस्त होने की वजह से उसने उन सब के आने की आवाज़ नहीं सुनी थी। वे सब उस गहरे गड्ढे के किनारे खड़े होकर वहाँ से नीचे के दृश्य को देखते रहे।
वहाँ नीचे, उस गहरे गड्ढे के बीच में उन्हें मिट्टी से बनाया गया लगभग सजीव लगने वाला एक घोड़ा दिखाई दिया। उस घोड़े का सिर एक ओर ऊँचा उठा हुआ था। उसके दाँत दिख रहे थे और उसके मुँह से झाग निकल रहा था। वह घोड़ा जैसे किसी भयावह शक्ति से डरकर सरपट दौड़ रहा था, जैसे वह कहीं भाग रहा हो। वे सब इस दृश्य को देखने में इतने मग्न हो गए कि उन्होंने इस बात की ओर बहुत बाद में ध्यान दिया कि ग्रिगोरेस्क्यू ने एक बहुत बड़े इलाक़े से झाड़-झंखाड़ काट दिए थे और वहाँ यह गहरा गड्ढा खोद दिया था। गड्ढे के बीच में मौजूद उस मुँह से झाग निकालते, सरपट दौड़ते घोड़े के आस-पास से उसने सारी मिट्टी हटा दी थी। ऐसा लग रहा था जैसे ग्रिगोरेस्क्यू ने उस घोड़े को धरती के गर्भ से खोद निकाला था, उसे मुक्त कर दिया था जिसके कारण वह आदमक़द घोड़ा सबको दिखाई देने लगा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह घोड़ा ज़मीन के नीचे मौजूद किसी भयानक चीज़ से डर कर भाग रहा हो। भौंचक्के हो कर वे सब ग्रिगोरेस्क्यू को देखते रहे जो उनकी मौजूदगी से पूरी तरह अनभिज्ञ अपने काम में व्यस्त था।
वह पिछले दस दिनों से यहाँ खुदाई कर रहा है — उस गहरे गड्ढे के बग़ल में खड़े हो कर उन्होंने अपने मन में सोचा । यानी वह पौ फटने के समय से लेकर पूरी सुबह तक इन सारे दिनों में यहाँ खुदाई करता रहा है। किसी के पैरों के नीचे से मिट्टी फिसल कर नीचे गिरी और तब ग्रिगोरेस्क्यू ने ऊपर देखा। पल भर के लिए वह रुका। फिर उसने अपना सिर झुकाया और वह दोबारा अपने काम में व्यस्त हो गया। सभी कलाकार खुद को असुविधाजनक स्थिति में महसूस करने लगे। उन्हें लगा कि किसी-न-किसी को कुछ कहना चाहिए।
“ वाह, यह शानदार है, “ फ़्रांसीसी चित्रकार इयोन ने धीमे स्वर में कहा।
ग्रिगोरेस्क्यू ने दोबारा अपना काम करना बंद किया और वह नीचे लटकी हुई एक सीढ़ी पर चढ़ कर उस गड्ढे में से बाहर निकल आया। उसने अपनी कुदाल में लगी मिट्टी को ज़मीन पर पटक कर झाड़ा और एक रुमाल से अपने माथे का पसीना पोंछा । फिर वह उन सब लोगों की ओर आया और उसने अपनी बाँहों की धीमी, चौड़ी क्रिया के साथ उस पूरे भू-दृश्य की ओर इशारा किया।
“ इस जैसे यहाँ अब भी बहुत-से मौजूद हैं, “ उसने धीमी आवाज में कहा।
फिर उसने अपनी कुदाल उठाई और सीढ़ियों के सहारे वह वापस उस गहरे गड्ढे में उतर गया , जहाँ उसने दोबारा खुदाई आरम्भ कर दी। शेष सभी कलाकार गड्ढे के बग़ल में ऊपर खड़े हो कर अपने सिर हिलाते रहे। फिर वे सभी चुपचाप शिविर के मुख्य भवन की ओर लौट गए।
अब केवल विदाई शेष रह गई थी। निदेशकों ने एक बड़े भोज का आयोजन किया, और फिर अंतिम शाम भी आ गई। अगली सुबह शिविर के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया गया। एक बस का प्रबंध किया गया था और कार से बुख़ारेस्ट या हंगरी से आए हुए कुछ लोग भी शिविर से विदा हो गए।
ग्रिगोरेस्क्यू ने वे जूते वापस प्रबंधकों को लौटा दिए। उसने दोबारा अपना घिसा हुआ फटा जूता पहन लिया और उसने अपना कुछ समय प्रबंधकों के साथ बिताया। फिर शिविर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव के पास सड़क के मोड़ पर, उसने अचानक चालक को बस रोकने के लिए कहा। उसने जो कहा उसका आशय कुछ-कुछ यह था कि यहाँ से आगे उसका अकेले जाना ही बेहतर होगा। लेकिन दरअसल उसने क्या कहा था, यह किसी को समझ में नहीं आया क्योंकि उसने यह बेहद धीमी आवाज़ में कहा था।
फिर मोड़ मुड़ कर बस आँखों से ओझल हो गई। तब ग्रिगोरेस्क्यू सड़क पार करने के लिए मुड़ा और नीचे उतर रहे सर्पीले रास्ते पर वह अचानक ग़ायब हो गया। अब वहाँ केवल वह भू-भाग मौजूद था जहाँ पहाड़ों की ख़ामोश व्यवस्था थी । उस विशाल भू-भाग में ज़मीन नीचे गिरे हुए मृत पत्तों से ढँकी हुई थी। भू-भाग का वह असीम विस्तार भेस बदलने वाला , छिपाने वाला और सब कुछ गुप्त रखने वाला लग रहा थ , जैसे जल रही ज़मीन के नीचे मौजूद हर चीज़ को वह ढँक दे रहा हो।
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अपनी कवितायेँ
"आदरणीय गुरु आचार्य ( श्री खेम चंद जी शर्मा ) को समर्पित"
द्वारा :राजेंद्र भाटिया
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द्रारा :राजेंद्र भाटिया जी ७४ वर्षीय भारत सरकार के एक प्रतिष्ठित पीएसयू में सेवा की और एक वरिष्ठ पद पर सेवानिवृत्त हुयें हैं| इन्होने बी.ई (मैकेनिकल) की योग्यता प्राप्त की है|
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समर्पित :आदरणीय गुरु प्रधानाचार्य श्री खेम चंद जी शर्मा को प्रणाम और समर्पित कविता।
प्रधानाचार्य ,हायर सेकंड्री आदर्श विद्या मंदिर, जयपुर, राजस्थान
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आदरणीय गुरु आचार्य ( श्री खेम चंद जी शर्मा ) को प्रणाम
सरल मन, ऊँचे विचार,
सत्य और धर्म का था आधार।
कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार,
प्राचार्य थे वे महान विचार।
ज्ञान दिया, संस्कार दिए,
जीवन की राह दिखाई।
मेरे जैसे छात्रों को उन्होंने,
इंजीनियर बनने की प्रेरणा दिलाई।
ऐसे गुरु को कोटि-कोटि नमन,
आप पर हमें है अभिमान।
श्री खेम चंद शर्मा जी,
आप सदा रहेंगे हमारी शान।
आपका शिष्य - राजेंद्र भाटिया
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बाल विभाग (चिल्ड्रेन कार्नर )
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -स्टूडेंट अवॉर्ड के लिये हार्दिक बधाई
फ़लक दहिया (उत्तर पूर्व ओहायो शाखा, युवा समिति चेयर)
द्वारा : अश्विनी भारद्वाज, उत्तर पूर्व ओहायो शाखा
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फ़लक दहिया (उत्तर पूर्व ओहायो शाखा, युवा समिति चेयर) को 31 जनवरी 2026 को आयोजित 77वें भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान फेडरेशन ऑफ इंडिया कम्युनिटी एसोसिएशन्स (FICA) द्वारा स्टूडेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
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अमेरिका के कुछ कॉलेजों से स्नातक छात्रों का
जनवरी 2026 में भारत भ्रमण
द्वारा : अनुराधा एवं राजीव लोचन, कलिम्पोंग (kalimpong), भारत
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कार्यक्रम आयोजकों और समाचार देने वालों का परिचय:
अनुराधा और राजीव लोचन, HimalayanGap के आयोजक हैं, जो एक छोटा पारिवारिक उपक्रम है। वे विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर हिमालय क्षेत्र से जुड़े कार्यक्रम और यात्राएँ आयोजित करते हैं। दोनों पर्वतारोहण का शौक रखते हैं और Khumbu Himalaya क्षेत्र में ट्रेक(tracking )का नेतृत्व भी करते हैं।
कार्यक्रम विवरण :
जनवरी 2026 में अमेरिका के मेन स्थित कोल्बी कॉलेज (Jan Plan) से 14 छात्र भारत 3 सप्ताह के लिए आए। आम तौर पर मैसाचुसेट्स स्थित फ्रेमिंघम स्टेट यूनिवर्सिटी (J-Term) के छात्र भी प्रतिवर्ष इस कार्यक्रम का हिस्सा होते हैं, किंतु इस वर्ष तकनीकी कारणों से वे शामिल नहीं हो सके। इस वर्ष कोल्बी कॉलेज के स्नातक छात्रों ने कार्यक्रम में भाग लिया और हिमालय में रहकर भारत की संस्कृति और सभ्यता के बारे में अध्ययन किया। यह कार्यक्रम फैकल्टी-नेतृत्वित था और छात्रों को इसके लिए अकादमिक क्रेडिट भी प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत कालिम्पोंग स्थित 13 एकड़ के परिसर (Campus) में ठहरने से हुई। कालिम्पोंग (Kalimpong) भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में हिमालय की तलहटी में स्थित पूर्वी भारत का एक पहाड़ी नगर है। यहाँ छात्रों को घर का खाना, स्थानीय लोगों से मिलने और उनकी जीवनशैली को करीब से जानने का अवसर मिला।
कार्यक्रम में शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के बीच संतुलन बनाया गया। इसमें हिमालयी पदयात्राएँ (हाइक), योग, रचनात्मक लेखन, मिट्टी के बर्तन बनाना (Pottery), तथा तिब्बती बौद्ध दर्शन का अध्ययन शामिल रहा। छात्रों को जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं से सीधे जुड़ने का अवसर मिला—विशेष रूप से तिब्बती साधुओं के साथ मंत्रोच्चारण का साक्षात अनुभव प्राप्त हुआ। इसके साथ ही हिमालय क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और समकालीन मुद्दों पर विभिन्न विषय-विशेषज्ञों के व्याख्यान भी आयोजित किए गए।
कार्यक्रम का समापन दार्जिलिंग में कुछ दिनों के प्रवास से होता है, जिसके बाद दिल्ली में एक दिन का समय—जिसमें दिल्ली हाट में सांस्कृतिक अनुभव और खरीदारी शामिल है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के कार्यक्रम में ताजमहल का भ्रमण शामिल नहीं था, हालांकि आगामी 2027 के पाठ्यक्रम में ताजमहल और ऋषिकेश दोनों को पुनः शामिल किया जाना प्रस्तावित है।
ये कार्यक्रम हिमालयनगैप (HimalayanGap) द्वारा पिछले 12 सालों से आयोजित किया जा रहा है। भारतीय हिमालय क्षेत्र में चुनिंदा अमेरिकी कॉलेजों के लिए शीतकालीन सेमेस्टर के अंतर्गत गहन शैक्षणिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करता है और उनका संचालन करता है।
हिमालयनगैप (HimalayanGap) का उद्देश्य ऐसे कार्यक्रम प्रस्तुत करना है जो अकादमिक दृष्टि से सुदृढ़, सांस्कृतिक रूप से अर्थपूर्ण और जीवन-परिवर्तनकारी अनुभव प्रदान करे। विविध दुनिया में ये कार्यक्रम भारत की सभ्यता और देश की जानकारी विदेशी युवाओं के लिये एक अनोखा अवसर प्रदान करती है।
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तिब्बती साधुओं और उनके विद्यार्थी मंत्रोच्चार के बीच तिब्बती प्रार्थना-ध्वज (प्रेयर फ्लैग) लगाते हैं, यह विश्वास करते हुए कि हवा उनकी सुख-समृद्धि और कल्याण की कामनाओं को सब तक पहुँचा देती है।
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गाँव के लोगों के साथ खेती में सहयोग—व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से मिलकर सीखना और लोगों को जानना
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कालिम्पोंग में गर्म जलेबियों का आनंद लेते
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अपनी कवितायेँ
"किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती हैं"
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ये मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से हैं। योग एक्सपर्ट. सेवानिवृत्त अधिकारी इंटेलीजेंस विभाग, उत्तर प्रदेश से हैं।
बाल साहित्य में विशेष रूचि रखते हैं।
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किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती हैं
किताबों में चिड़ियाँ चहचहाती हैं।
किताबों में लोरियाँ गुनगुनाती हैं।।
किताबों में झरने गीत गाते हैं।
किताबों में खेत लहलहाते हैं।।
किताबों में परियाँ बतियाती हैं।
किताबों में पर्वत, वन घाटी हैं।।
किताबों में चंद्रमा आकाश है।
किताबों में ज्ञान का प्रकाश है।।
किताबें मित्रता निभाती हैं।
किताबें प्यार से सहलाती हैं।।
किताबों में ज्ञान का भंडार है।
किताबों में सारा संसार हैं।।
किताबें दुखों से उबारती हैं।
किताबें आरती उतारती हैं।।
किताबों में विज्ञान के राज हैं।
किताबों में जन-जन की आवाज हैं।।
किताबें मेरी सच्ची सहेली हैं।
किताबें बड़ी भोली अलबेली हैं।।
किताबों से मित्रता नहीं करोगे।
किताबों से अब भी क्या डरोगे।।
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संवाद के सभी अंक, जून २०२१ से आरम्भ करके जनवरी २०२६ तक - अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के साइट पर ऑनलाइन उपलब्ध हैं.
All the Samvad editions, starting from June 2021 till Jan 2026 - are available online now.
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द्वारा : डॉ. शैल जैन, ई-संवाद संपादक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति
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पाठकों की अपनी हिंदी में लिखी कहानियाँ, लेख, कवितायें इत्यादि का
ई - संवाद पत्रिका में प्रकाशन के लिये स्वागत है।
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"प्रविष्टियाँ भेजने वाले रचनाकारों के लिए दिशा-निर्देश"
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2. रचना एरियल यूनीकोड MS या मंगल फॉण्ट में भेजें।
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